उत्पादन (Generation): यह वह चरण है जहाँ विभिन्न स्रोतों, जैसे कि कोयला, गैस, परमाणु, जल, सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग करके बिजली का उत्पादन किया जाता है।
पारेषण (Transmission): उत्पादन केंद्र से बिजली को दूर-दराज के क्षेत्रों तक उच्च वोल्टेज (high voltage) पर पहुँचाने के लिए पारेषण लाइनों (transmission lines) का उपयोग किया जाता है। ऐसा करने से ऊर्जा का नुकसान कम होता है।
वितरण (Distribution): सबस्टेशन (substations) में उच्च वोल्टेज को कम वोल्टेज में बदला जाता है, जिसके बाद इसे घरों, व्यवसायों और कारखानों तक स्थानीय वितरण लाइनों के माध्यम से पहुँचाया जाता है।
उपभोग (Consumption): यह अंतिम चरण है जहाँ उपभोक्ता (consumer) बिजली का उपयोग विभिन्न उपकरणों और मशीनों को चलाने के लिए करते हैं।
उपभोग (Consumption): यह अंतिम चरण है जहाँ उपभोक्ता (consumer) बिजली का उपयोग विभिन्न उपकरणों और मशीनों को चलाने के लिए करते हैं।
यह प्रणाली एक ग्रिड (grid) के रूप में काम करती है, जो पूरे क्षेत्र में बिजली की आपूर्ति को बनाए रखने के लिए इन सभी घटकों को आपस में जोड़ती है।
विद्युत प्रणाली का महत्व (Importance of an Electrical System)
विद्युत प्रणाली आधुनिक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमारे जीवन के लगभग हर पहलू को संचालित करती है, जिसमें उद्योग, संचार, परिवहन, स्वास्थ्य सेवा और घरेलू उपयोग शामिल हैं। इसके बिना, अधिकांश आधुनिक तकनीकें और सेवाएं असंभव हो जाएंगी।
विद्युत टावरों का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई चरण शामिल होते हैं, जिनमें डिजाइन, सामग्री का चयन, और साइट पर असेंबली शामिल है।
निर्माण प्रक्रिया के चरण (Steps of the Construction Process)
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सर्वेक्षण और डिजाइन (Surveying and Designing):
- सबसे पहले, इंजीनियर और सर्वेक्षणकर्ता (surveyors) टावर लगाने के लिए उपयुक्त स्थान का चुनाव करते हैं।
- इस दौरान जमीन की भौगोलिक स्थिति, मिट्टी की संरचना और मौसम की स्थितियों का अध्ययन किया जाता है।
- इसके आधार पर, टावर का डिजाइन तैयार किया जाता है, जिसमें उसकी ऊंचाई, संरचना और भार वहन क्षमता (load-bearing capacity) को निर्धारित किया जाता है।
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सामग्री का निर्माण और परिवहन (Fabrication and Transportation):
- टावर के लिए आवश्यक स्टील के पुर्जे (parts) कारखानों में बनाए जाते हैं।
- ये पुर्जे अलग-अलग टुकड़ों में होते हैं, जिन्हें बोल्ट और नट्स से जोड़ा जा सकता है।
- इन सभी टुकड़ों को सावधानीपूर्वक निर्माण स्थल तक पहुँचाया जाता है।
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न्यू का निर्माण (Foundation Construction):
- टावर को मजबूती से खड़ा करने के लिए एक ठोस नींव (foundation) का निर्माण किया जाता है।
- इसके लिए, जमीन में गहराई तक खुदाई की जाती है और कंक्रीट डालकर आधार बनाया जाता है।
- यह नींव टावर को स्थिरता प्रदान करती है और इसे हवा, भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं से बचाती है।
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टावर की असेंबली (Tower Assembly):
- नींव तैयार होने के बाद, स्टील के अलग-अलग पुर्जों को एक-एक करके जोड़ा जाता है।
- यह काम अक्सर क्रेन या अन्य भारी मशीनों की मदद से किया जाता है।
- टावर को खंडों (sections) में जोड़ा जाता है और फिर उन्हें एक के ऊपर एक खड़ा किया जाता है।
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कंडक्टरों की स्थापना (Conductor Installation):
- एक बार टावर खड़ा हो जाने के बाद, उस पर इंसुलेटर (insulators) लगाए जाते हैं।
- फिर, इन इंसुलेटरों के सहारे उच्च वोल्टेज वाले कंडक्टर (तार) लगाए जाते हैं, जो एक टावर से दूसरे टावर तक जाते हैं।
- इस प्रक्रिया में तारों को सही तनाव के साथ खींचना बहुत महत्वपूर्ण होता है।
विद्युत टावरों के निर्माण में कई प्रकार की सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक का विशिष्ट कार्य होता है।
मुख्य संरचना
- इस्पात (Steel): विद्युत टावरों का सबसे महत्वपूर्ण घटक इस्पात होता है। टावर की मुख्य संरचना जालीदार इस्पात (Lattice Steel) के कोणों (angles) से बनी होती है। ये कोण एक दूसरे से बोल्ट और नट से जुड़े होते हैं, जिससे एक मजबूत और लचीला ढाँचा बनता है। इस्पात की उच्च शक्ति और स्थायित्व इसे हवा और मौसम के दबाव का सामना करने के लिए उपयुक्त बनाती है। कुछ टावरों में खोखले स्टील के पाइप भी इस्तेमाल होते हैं, जिन्हें ट्यूबलर स्टील टावर कहते हैं।
- प्रबलित कंक्रीट (Reinforced Concrete): टावर को जमीन में मजबूती से खड़ा करने के लिए नींव (foundation) का निर्माण प्रबलित कंक्रीट से किया जाता है। कंक्रीट के अंदर स्टील की छड़ें डालकर इसे और मजबूत बनाया जाता है, जिससे यह टावर के भारी भार को सहन कर सके।
अन्य महत्वपूर्ण घटक
- कंडक्टर (Conductors): ये वे तार होते हैं जिनसे होकर बिजली प्रवाहित होती है। ये आमतौर पर एल्यूमीनियम के बने होते हैं क्योंकि यह हल्का, सस्ता और एक अच्छा विद्युत चालक (conductor) है। अक्सर, एल्यूमीनियम कंडक्टर के अंदर एक स्टील का कोर होता है, जिससे उसे अतिरिक्त शक्ति मिलती है।
- इंसुलेटर (Insulators): ये टावर की संरचना और कंडक्टर के बीच लगे होते हैं। इनका मुख्य कार्य बिजली को टावर से गुजरने से रोकना है। इंसुलेटर पॉर्सिलेन (चीनी मिट्टी), कांच या पॉलिमर जैसी सामग्रियों से बने होते हैं, क्योंकि ये विद्युत के कुचालक (non-conductors) होते हैं। ये टावरों पर डिस्क के रूप में या लंबी छड़ों के रूप में लगे होते हैं।
- ग्राउंड वायर (Ground Wires): टावर के सबसे ऊपरी हिस्से पर एक या दो तार लगे होते हैं जिन्हें ग्राउंड वायर कहते हैं। ये तार बिजली गिरने की स्थिति में टावर और लाइनों की सुरक्षा करते हैं। ये तार भी आमतौर पर स्टील या अन्य मिश्रित धातुओं के बने होते हैं।
विद्युत टावरों की नींव एक अत्यंत महत्वपूर्ण संरचनात्मक हिस्सा है, जो टावर को स्थिरता प्रदान करती है। यह सुनिश्चित करती है कि भारी भार, तेज हवा और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी टावर अपनी जगह पर स्थिर रहे।
नींव के प्रकार (Types of Foundations)
विद्युत टावरों की नींव के प्रकार जमीन की स्थिति, मिट्टी की संरचना और टावर के भार के आधार पर चुने जाते हैं। कुछ प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं:
- समतल राफ्ट फाउंडेशन (Flat Raft Foundation): यह तब इस्तेमाल होता है जब मिट्टी की असर क्षमता (bearing capacity) कम होती है। इसमें कंक्रीट का एक बड़ा, सपाट स्लैब बनाया जाता है जो पूरे भार को एक बड़े क्षेत्र में फैला देता है।
- ढेर नींव (Pile Foundation): जब जमीन कमजोर होती है या पानी से भरी होती है, तो जमीन में गहराई तक ढेर (piles) गाड़कर नींव बनाई जाती है। ये ढेर टावर के भार को सीधे मजबूत मिट्टी की परत तक पहुंचाते हैं।
- स्व-सहायक स्वतंत्र आधार (Self-Supporting Independent Base): इस प्रकार की नींव में, टावर के प्रत्येक पैर के लिए अलग-अलग कंक्रीट का आधार बनाया जाता है। यह आमतौर पर जालीदार स्टील टावरों के लिए उपयोग किया जाता है।
निर्माण प्रक्रिया (Construction Process)
नींव का निर्माण एक सावधानीपूर्वक प्रक्रिया है, जिसमें निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
- स्थल का सर्वेक्षण: निर्माण से पहले, जमीन की जांच की जाती है, जिसमें मिट्टी की संरचना और भूवैज्ञानिक स्थितियां शामिल हैं।
- खुदाई: डिजाइन के अनुसार जमीन में खुदाई की जाती है, ताकि नींव के लिए आवश्यक जगह बनाई जा सके।
- कंक्रीट डालना: खुदाई वाली जगह में स्टील की छड़ें बिछाई जाती हैं और फिर उसमें कंक्रीट भरा जाता है, जिससे नींव को मजबूती मिलती है।
- टॉवर की असेंबली: नींव के पूरी तरह से सूख जाने के बाद, टावर के निचले हिस्से को नींव से जोड़ा जाता है।
विद्युत टावर के सदस्य (members) वे स्टील के पुर्जे होते हैं जो टावर की जालीदार संरचना का निर्माण करते हैं। ये पुर्जे बोल्ट और नट से आपस में जुड़े होते हैं और टावर को मजबूती और स्थिरता प्रदान करते हैं।
मुख्य सदस्य (Main Members)
- मुख्य टांगें (Main Legs): ये टावर के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य होते हैं जो नींव से शुरू होकर ऊपर की ओर जाते हैं। ये टावर के अधिकांश ऊर्ध्वाधर भार (vertical load) को वहन करते हैं।
- क्रॉस-आर्म्स (Cross-arms): ये क्षैतिज पुर्जे होते हैं जो टावर की मुख्य टांगों से बाहर की ओर निकलते हैं। इन पर ही इंसुलेटर लगे होते हैं, जिन पर से होकर कंडक्टर (तार) गुजरते हैं। क्रॉस-आर्म्स की लंबाई और संख्या टावर के डिजाइन और वोल्टेज स्तर पर निर्भर करती है।
- ब्रेकिंग (Bracing): ये छोटे-छोटे स्टील के टुकड़े होते हैं जो मुख्य टांगों को आपस में जोड़ते हैं। इनका कार्य टावर को हवा और अन्य पार्श्व (lateral) बलों के विरुद्ध मजबूती प्रदान करना है। ब्रेकिंग विभिन्न पैटर्न में होती है, जैसे कि X-आकार या W-आकार, जो टावर को स्थिरता देते हैं।
- लैटिस (Lattices): ये ब्रेकिंग के समान होते हैं, लेकिन ये टावर की जालीदार संरचना के हर हिस्से को जोड़ते हैं। ये पुर्जे टावर की पूरी संरचना को कठोर बनाते हैं और उसे मुड़ने या टूटने से बचाते हैं।
- शीर्ष भाग (Peak): यह टावर का सबसे ऊपरी हिस्सा होता है, जहाँ पर ग्राउंड वायर लगा होता है। यह बिजली गिरने की स्थिति में टावर और लाइनों की सुरक्षा करता है।
सदस्यों की पहचान (Identification of Members)
प्रत्येक सदस्य को कारखाने में एक विशिष्ट संख्या या कोड दिया जाता है ताकि निर्माण स्थल पर उनकी पहचान करना और उन्हें सही जगह पर असेंबल करना आसान हो। ये सभी सदस्य टावर की संरचना को एक एकीकृत और मजबूत इकाई बनाते हैं, जो विभिन्न प्रकार के भारों को सफलतापूर्वक सहन कर सकती है।
विद्युत टावरों की ऊँचाई विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है और आमतौर पर 16 मीटर से 45 मीटर तक होती है, हालाँकि कुछ विशेष परिस्थितियों में ये 380 मीटर तक भी ऊँचे हो सकते हैं।
ऊँचाई को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Height)
विद्युत टावरों की ऊँचाई कई तकनीकी और भौगोलिक कारकों से निर्धारित होती है:
- वोल्टेज स्तर (Voltage Level): उच्च वोल्टेज वाले कंडक्टरों को जमीन से अधिक दूरी पर रखना होता है ताकि सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और बिजली का रिसाव (leakage) रोका जा सके। जैसे-जैसे वोल्टेज बढ़ता है, टावर की ऊँचाई भी बढ़ती जाती है।
- कंडक्टरों के बीच की दूरी (Conductor Spacing): उच्च वोल्टेज पर कंडक्टरों के बीच चिंगारी (arcing) से बचने के लिए उन्हें एक-दूसरे से पर्याप्त दूरी पर रखा जाता है। यह दूरी टावर की चौड़ाई और ऊँचाई को प्रभावित करती है।
- कंडक्टरों का सैग (Conductor Sag): कंडक्टरों का सैग (झुकाव) तापमान और तनाव (tension) पर निर्भर करता है। टावरों के बीच की दूरी बढ़ने पर सैग भी बढ़ता है, जिससे यह सुनिश्चित करने के लिए टावर ऊंचे होने चाहिए कि तार जमीन से न्यूनतम सुरक्षित दूरी पर रहें।
- भूमि निकासी (Ground Clearance): यह जमीन से सबसे निचले कंडक्टर की न्यूनतम दूरी है। यह सुरक्षा मानकों द्वारा निर्धारित होती है और इसे बनाए रखने के लिए टावरों की ऊँचाई को पर्याप्त रखा जाता है।
- भूगोल और इलाके (Topography and Terrain): यदि ट्रांसमिशन लाइनें नदी, घाटी, या ऊबड़-खाबड़ इलाके से गुजरती हैं, तो टावरों को बहुत ऊँचा बनाया जाता है ताकि तारों को जमीन से पर्याप्त ऊँचाई पर रखा जा सके।
- सुरक्षा आवश्यकताएँ (Safety Requirements): रेलवे क्रॉसिंग, सड़कों, या अन्य संरचनाओं को पार करते समय, सुरक्षा नियमों के अनुसार तारों को ऊँचा रखना आवश्यक होता है।
11kV वितरण से 765kV ट्रांसमिशन तक विद्युत टावरों की ऊँचाई वोल्टेज स्तर पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे वोल्टेज बढ़ता है, टावर की ऊँचाई भी बढ़ती जाती है, क्योंकि कंडक्टरों को जमीन से सुरक्षित दूरी पर रखना आवश्यक होता है।
विभिन्न वोल्टेज स्तरों के लिए टावरों की ऊँचाई
11kV वितरण (Distribution):
- ये वितरण लाइनें होती हैं जो घरों और व्यवसायों को बिजली पहुँचाती हैं।
- इनके लिए उपयोग किए जाने वाले खंभे या टावर अपेक्षाकृत छोटे होते हैं, जिनकी ऊँचाई आमतौर पर 9 मीटर से 15 मीटर तक होती है।
132kV ट्रांसमिशन:
- यह उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन की शुरुआत होती है।
- इन टावरों की ऊँचाई लगभग 25 मीटर से 35 मीटर तक हो सकती है।
220kV ट्रांसमिशन:
- इस वोल्टेज स्तर पर टावर और भी ऊँचे होते हैं, जिनकी ऊँचाई लगभग 30 मीटर से 40 मीटर तक होती है।
400kV ट्रांसमिशन:
- यह अति-उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन है।
- इन टावरों की ऊँचाई आमतौर पर 35 मीटर से 50 मीटर तक होती है।
765kV ट्रांसमिशन:
यह अल्ट्रा-हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन है।
इन टावरों की ऊँचाई सबसे अधिक होती है, जो 60 मीटर से 100 मीटर या उससे भी अधिक हो सकती है।
ऊँचाई में अंतर का कारण
टावरों की ऊँचाई में यह वृद्धि कई कारणों से होती है:
- सुरक्षा (Safety): उच्च वोल्टेज पर, कंडक्टरों के चारों ओर एक मजबूत विद्युत क्षेत्र बनता है। इस क्षेत्र के कारण बिजली का रिसाव (corona discharge) हो सकता है, जो आसपास के लोगों या जानवरों के लिए खतरनाक होता है। अधिक ऊँचाई इस जोखिम को कम करती है।
- दूरी (Clearance): विभिन्न वोल्टेज स्तरों के लिए, कंडक्टरों को जमीन, सड़कों, इमारतों और अन्य संरचनाओं से एक निश्चित न्यूनतम दूरी पर रखना अनिवार्य होता है। उच्च वोल्टेज के लिए यह दूरी अधिक होती है, जिसके लिए ऊँचे टावरों की आवश्यकता होती है।
- कंडक्टरों के बीच की दूरी (Conductor Spacing): उच्च वोल्टेज के कंडक्टरों को आपस में भी पर्याप्त दूरी पर रखा जाता है ताकि चिंगारी (arcing) से बचा जा सके। यह अधिक दूरी टावरों के क्रॉस-आर्म्स को लंबा बनाती है, जिससे टावर की कुल संरचना बड़ी हो जाती है।
विद्युत टावरों पर इंसुलेटर और कंडक्टर दो सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं। कंडक्टर वे तार होते हैं जो बिजली को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं, जबकि इंसुलेटर वे घटक होते हैं जो इन कंडक्टरों को टावर से अलग रखते हैं और बिजली को टावर में प्रवाहित होने से रोकते हैं।
इंसुलेटर
इंसुलेटर विद्युत के कुचालक होते हैं, यानी वे अपने माध्यम से बिजली को प्रवाहित नहीं होने देते हैं। इनका मुख्य कार्य टावर और कंडक्टर के बीच विद्युत अलगाव (electrical insulation) प्रदान करना है।
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प्रकार:
- पिन इंसुलेटर (Pin Insulator): ये छोटे वोल्टेज (जैसे 33 kV) वाली वितरण लाइनों में उपयोग होते हैं।
- सस्पेंशन इंसुलेटर (Suspension Insulator): ये सबसे आम प्रकार हैं और उच्च वोल्टेज लाइनों (66 kV से अधिक) में उपयोग किए जाते हैं। ये डिस्क के रूप में होते हैं, और वोल्टेज जितना अधिक होता है, उतनी ही अधिक डिस्क एक साथ जोड़ी जाती हैं।
- स्ट्रेन इंसुलेटर (Strain Insulator): इनका उपयोग वहां किया जाता है जहां लाइन की दिशा बदलती है या जहां लाइन समाप्त होती है, क्योंकि ये कंडक्टर के उच्च तनाव को सहन कर सकते हैं।
- सामग्री:
- इंसुलेटर मुख्य रूप से पॉर्सिलेन (चीनी मिट्टी), कठोर ग्लास या पॉलिमर से बने होते हैं। इन सामग्रियों में उच्च प्रतिरोधकता होती है, जो उन्हें उत्कृष्ट इंसुलेटर बनाती है।
कंडक्टर
कंडक्टर वे पदार्थ हैं जो आसानी से बिजली को प्रवाहित होने देते हैं। ये टावरों पर लगे होते हैं और एक सबस्टेशन से दूसरे सबस्टेशन तक बिजली ले जाते हैं।
- प्रकार:
- कंडक्टरों को आमतौर पर उनके आकार और संरचना के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। सबसे आम प्रकार ACSR (Aluminum Conductor Steel Reinforced) है, जिसमें एक मजबूत स्टील कोर के चारों ओर एल्यूमीनियम के तार होते हैं।
- सामग्री:
- कंडक्टरों के लिए सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली सामग्री एल्यूमीनियम है। एल्यूमीनियम हल्का और सस्ता होता है, साथ ही यह एक अच्छा विद्युत चालक भी है। कुछ मामलों में, तांबा भी उपयोग किया जाता है, हालांकि यह अधिक महंगा और भारी होता है।
विद्युत टावरों का मुख्य कार्य बिजली उत्पादन केंद्रों से उपभोक्ताओं तक बिजली को उच्च वोल्टेज पर सुरक्षित रूप से पहुँचाना है। ये टावर पारेषण लाइनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और इन्हें इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि ये बिजली के तारों को जमीन और अन्य संरचनाओं से पर्याप्त ऊँचाई पर बनाए रखें।
कार्यप्रणाली (Working Principle)
विद्युत टावरों की कार्यप्रणाली दो मुख्य सिद्धांतों पर आधारित है: यांत्रिक स्थिरता और विद्युत अलगाव।
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यांत्रिक स्थिरता (Mechanical Stability):
- टावर की जालीदार इस्पात संरचना, जिसे ब्रेकिंग (bracing) और लैटिस (lattices) कहते हैं, उसे मजबूत बनाती है।
- यह संरचना हवा, बर्फ, भूकंप और तारों के भारी भार का सामना कर सकती है।
- टावर का आधार, जो कि प्रबलित कंक्रीट से बना होता है, उसे जमीन में मजबूती से टिकाए रखता है।
- टावर को इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि यह तारों के तनाव और किसी भी तरह के पार्श्व भार (lateral load) को सहन कर सके।
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विद्युत अलगाव (Electrical Insulation):
- टावर पर लगे इंसुलेटर यह सुनिश्चित करते हैं कि बिजली केवल कंडक्टरों (तारों) में ही प्रवाहित हो।
- ये इंसुलेटर, जो चीनी मिट्टी, ग्लास या पॉलिमर से बने होते हैं, विद्युत के कुचालक होते हैं।
- वे कंडक्टरों को टावर की इस्पात संरचना से अलग रखते हैं, जिससे बिजली टावर में नहीं जाती।
- इंसुलेटरों की संख्या और प्रकार वोल्टेज के स्तर पर निर्भर करते हैं; उच्च वोल्टेज के लिए अधिक इंसुलेटर डिस्क की आवश्यकता होती है।
टावरों के कार्य (Functions of Towers)
तारों को सहारा देना (Supporting Conductors): यह टावर का प्राथमिक कार्य है। टावर, क्रॉस-आर्म्स की मदद से बिजली के तारों को सहारा देते हैं, उन्हें जमीन और अन्य वस्तुओं से पर्याप्त दूरी पर रखते हैं।
सुरक्षा सुनिश्चित करना (Ensuring Safety): टावर यह सुनिश्चित करते हैं कि उच्च वोल्टेज वाले तार लोगों, जानवरों और इमारतों के लिए सुरक्षित दूरी पर रहें। टावरों के शीर्ष पर लगे ग्राउंड वायर (ground wire) बिजली गिरने की स्थिति में लाइनों और उपकरणों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
पारेषण लाइन को बनाए रखना (Maintaining the Transmission Line): टावर पूरी पारेषण लाइन को सुचारू रूप से कार्य करने में मदद करते हैं। इन पर लगे इंसुलेटर और अन्य उपकरण यह सुनिश्चित करते हैं कि बिजली बिना किसी रुकावट के अपने गंतव्य तक पहुँचे।
दूरी बनाए रखना (Maintaining Clearance): टावर तारों के बीच और जमीन से न्यूनतम आवश्यक दूरी बनाए रखते हैं। यह दूरी वोल्टेज के आधार पर निर्धारित होती है ताकि बिजली का रिसाव (corona discharge) न हो।
उपयोग और आकार के आधार पर विद्युत टावरों को कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। ये वर्गीकरण टावर के कार्य, उसकी संरचना और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।
उपयोग के आधार पर (Based on Usage)
विद्युत टावरों को उनके कार्य के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है:
- सस्पेंशन टावर (Suspension Tower): ये सबसे सामान्य प्रकार के टावर हैं और इनका उपयोग सीधी ट्रांसमिशन लाइनों पर किया जाता है। इनका मुख्य कार्य कंडक्टरों (तारों) को लंबवत रूप से सहारा देना है और ये हवा के कारण होने वाले क्षैतिज भार को सहन करते हैं।
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टेंशन टावर/एंगल टावर (Tension Tower/Angle Tower): इन टावरों का उपयोग वहां किया जाता है जहाँ ट्रांसमिशन लाइन की दिशा बदलती है या समाप्त होती है। ये टावर कंडक्टरों के उच्च तनाव को संभालने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। इन्हें उनके मोड़ के कोण के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है:
- टेंशन/टर्मिनल टावर: लाइनों के अंत में।
- एंगल टावर: लाइनों के मोड़ों पर।
- ट्रांसपोजिशन टावर (Transposition Tower): इन टावरों का उपयोग कंडक्टरों की स्थिति को बदलने के लिए किया जाता है, जिससे लाइन के तीनों फेज में भार का संतुलन बना रहे।
- डेल्टा टावर (Delta Tower): इन टावरों का उपयोग 132kV ट्रांसमिशन लाइनों में किया जाता है, जहाँ कंडक्टर एक त्रिकोणीय (डेल्टा) आकार में व्यवस्थित होते हैं।
आकार के आधार पर (Based on Size)
आकार के आधार पर टावरों को उनकी ऊँचाई और संरचना के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। टावर का आकार वोल्टेज स्तर, इलाके और कंडक्टरों के बीच की दूरी पर निर्भर करता है।
- छोटे टावर (Short Towers): ये आमतौर पर वितरण लाइनों (जैसे 11kV, 33kV) के लिए उपयोग किए जाते हैं, जिनकी ऊँचाई लगभग 9 से 15 मीटर होती है। ये सामान्यतः शहरी या आवासीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- मध्यम आकार के टावर (Medium-sized Towers): इनका उपयोग उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों (जैसे 132kV, 220kV) के लिए होता है। इनकी ऊँचाई 25 से 40 मीटर तक हो सकती है।
- ऊँचे टावर (Tall Towers): ये अति-उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों (जैसे 400kV, 765kV) के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनकी ऊँचाई 40 मीटर से 100 मीटर तक या उससे भी अधिक हो सकती है। इन्हें बड़े क्षेत्रों, नदियों या घाटियों को पार करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।
आकार के आधार पर विद्युत टावरों को उनकी ऊँचाई और संरचना के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। टावर का आकार मुख्य रूप से वोल्टेज स्तर, भू-भाग (terrain), और कंडक्टरों के बीच की दूरी पर निर्भर करता है।
छोटे टावर (Short Towers)
ये टावर आमतौर पर वितरण लाइनों (जैसे 11kV, 33kV) के लिए उपयोग किए जाते हैं जो घरों और व्यवसायों को बिजली पहुँचाती हैं। इनकी ऊँचाई अपेक्षाकृत कम होती है, जो लगभग 9 से 15 मीटर तक होती है। ये सामान्यतः शहरी या आवासीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ जगह सीमित होती है और उच्च वोल्टेज की आवश्यकता नहीं होती।
मध्यम आकार के टावर (Medium-sized Towers)
इनका उपयोग उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों (जैसे 132kV, 220kV) के लिए होता है। ये टावर उत्पादन केंद्रों से सबस्टेशन तक बिजली पहुँचाने का काम करते हैं। इनकी ऊँचाई लगभग 25 से 40 मीटर तक हो सकती है। इन टावरों का उपयोग अक्सर खुले मैदानों और ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है।
ऊँचे टावर (Tall Towers)
ये टावर अति-उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों (जैसे 400kV, 765kV) के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनकी ऊँचाई सबसे अधिक होती है, जो 40 मीटर से 100 मीटर या उससे भी अधिक हो सकती है। इन्हें लंबी दूरी तक, खासकर जब नदियाँ, घाटियाँ, या ऊबड़-खाबड़ इलाके को पार करना होता है, बिजली संचारित करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। इन टावरों पर लगे कंडक्टरों के बीच की दूरी भी अधिक होती है, जिससे बिजली के रिसाव (corona discharge) से बचा जा सके।
विद्युत टावरों का रखरखाव बिजली वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। टावरों का रखरखाव कई चरणों में किया जाता है, जिसमें नियमित निरीक्षण और आवश्यक मरम्मत शामिल होती है।
रखरखाव के प्रकार (Types of Maintenance)
रखरखाव को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
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नियमित या निवारक रखरखाव (Preventive Maintenance): यह रखरखाव एक पूर्वनिर्धारित समय-सारणी के अनुसार किया जाता है ताकि संभावित समस्याओं को होने से पहले ही रोका जा सके। इसमें शामिल हैं:
- दृश्य निरीक्षण: टावर की संरचना, नट-बोल्ट की कसावट, जंग के निशान और इंसुलेटर की स्थिति की जाँच करना।
- सफाई: इंसुलेटर और अन्य घटकों पर जमी धूल और गंदगी को हटाना, क्योंकि यह बिजली के रिसाव का कारण बन सकती है।
- पेंटिंग: जंग से बचाने के लिए टावर की संरचना पर समय-समय पर पेंट करना।
- सुधारात्मक रखरखाव (Corrective Maintenance): यह तब किया जाता है जब कोई खराबी या समस्या पहले से ही हो चुकी हो। इसमें टूटे हुए इंसुलेटर, ढीले नट-बोल्ट, या क्षतिग्रस्त कंडक्टरों की मरम्मत या उन्हें बदलना शामिल है।
- भविष्यसूचक रखरखाव (Predictive Maintenance): इसमें विशेष उपकरणों और सेंसर का उपयोग करके टावर की स्थिति की लगातार निगरानी की जाती है। उदाहरण के लिए, थर्मल इमेजिंग का उपयोग गर्म बिंदुओं (hot spots) का पता लगाने के लिए किया जा सकता है, जो किसी संभावित समस्या का संकेत देते हैं।
प्रमुख रखरखाव कार्य (Key Maintenance Tasks)
- संरचनात्मक निरीक्षण: टावर के सभी सदस्यों (members) और बोल्टों की जाँच करना ताकि किसी भी तरह की दरार, जंग, या टूट-फूट का पता लगाया जा सके।
- इंसुलेटर की जाँच: इंसुलेटर की डिस्क में दरारों या टूटने की जाँच करना, क्योंकि क्षतिग्रस्त इंसुलेटर बिजली के रिसाव का कारण बन सकते हैं।
- कंडक्टरों का निरीक्षण: कंडक्टरों पर किसी भी तरह के नुकसान, जैसे कि कट या घिसाव, की जाँच करना।
- ग्राउंडिंग सिस्टम की जाँच: टावर के ग्राउंडिंग (earthing) सिस्टम की जाँच करना ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बिजली गिरने की स्थिति में यह प्रभावी रूप से काम करे।
विद्युत ट्रांसमिशन टावर, जिसे बिजली का खंभा भी कहते हैं, एक बड़ी संरचना है जो बिजली को लंबी दूरी तक पहुँचाने के लिए उच्च-वोल्टेज वाले कंडक्टरों (तारों) को सहारा देती है। इसका मुख्य कार्य बिजली उत्पादन केंद्रों से सबस्टेशनों तक बिजली को सुरक्षित रूप से पहुंचाना है, जिससे ये तार जमीन, इमारतों और अन्य संरचनाओं से पर्याप्त ऊँचाई पर रहें।
प्रमुख कार्य और घटक
- संरचनात्मक सहारा: टावर की जालीदार स्टील की संरचना तारों के भारी भार और प्राकृतिक बलों, जैसे तेज हवा और बर्फ, को सहन करने के लिए डिज़ाइन की जाती है।
- इंसुलेटर: टावर पर लगे इंसुलेटर, जो चीनी मिट्टी, ग्लास या पॉलिमर के बने होते हैं, कंडक्टरों को टावर की धातु संरचना से अलग रखते हैं, जिससे बिजली टावर में प्रवाहित नहीं होती।
- सुरक्षा: टावर यह सुनिश्चित करते हैं कि उच्च-वोल्टेज वाले तार लोगों, जानवरों और इमारतों के लिए सुरक्षित दूरी पर रहें। टावर के शीर्ष पर एक ग्राउंड वायर भी होता है, जो बिजली गिरने की स्थिति में टावर और लाइनों की सुरक्षा करता है।
- प्रकार: टावर के कई प्रकार होते हैं, जैसे सस्पेंशन टावर (सीधी लाइनों के लिए) और टेंशन टावर (मोड़ों पर)। इनका आकार वोल्टेज स्तर के आधार पर बदलता है।
बिजली प्रणालियों में ट्रांसमिशन टावर की आवश्यकता कई महत्वपूर्ण कारणों से होती है, जिनमें मुख्य रूप से सुरक्षा, दक्षता और विश्वसनीयता शामिल है।
प्रमुख कारण
- सुरक्षा (Safety): ट्रांसमिशन टावर उच्च-वोल्टेज वाले कंडक्टरों (तारों) को जमीन और अन्य संरचनाओं जैसे इमारतों, सड़कों और पेड़ों से सुरक्षित दूरी पर रखते हैं। इससे लोगों, जानवरों और संपत्ति को बिजली के झटके या आग के खतरे से बचाया जा सकता है।
- दक्षता (Efficiency): बिजली को लंबी दूरी तक कम नुकसान के साथ पहुँचाने के लिए उसे बहुत उच्च वोल्टेज (जैसे 400kV, 765kV) पर संचारित किया जाता है। इतने उच्च वोल्टेज पर तारों को हवा में सहारा देने के लिए मजबूत और ऊँचे टावरों की आवश्यकता होती है।
- यांत्रिक सहारा (Mechanical Support): टावर तारों के भारी भार, हवा के दबाव, बर्फ और अन्य प्राकृतिक बलों को सहन करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। उनकी जालीदार संरचना और मजबूत नींव उन्हें यांत्रिक स्थिरता प्रदान करती है।
- निरंतर आपूर्ति (Continuous Supply): ट्रांसमिशन टावर एक मजबूत और स्थिर ढाँचा प्रदान करते हैं, जिससे बिजली की निरंतर और विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित होती है। यदि कोई टावर विफल हो जाता है, तो यह पूरे पावर ग्रिड को प्रभावित कर सकता है, इसलिए उनकी विश्वसनीयता बहुत महत्वपूर्ण है।
- विद्युत अलगाव (Electrical Isolation): टावरों पर लगे इंसुलेटर यह सुनिश्चित करते हैं कि बिजली सिर्फ कंडक्टरों में ही प्रवाहित हो और टावर की धातु संरचना में न जाए। यह अलगाव बिजली के रिसाव को रोकता है और सुरक्षा बनाए रखता है।
ट्रांसमिशन टावर के निर्माण के लिए मुख्य रूप से इस्पात (Steel) का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, नींव और इन्सुलेशन के लिए अन्य सामग्री भी इस्तेमाल की जाती है।
मुख्य सामग्री (Main Materials)
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इस्पात (Steel):
- टावर की पूरी संरचना जालीदार इस्पात से बनी होती है। इस्पात की उच्च शक्ति इसे हवा, भूकंप और तारों के भारी भार का सामना करने में सक्षम बनाती है।
- टावर के विभिन्न हिस्से, जैसे कि मुख्य टांगें (main legs), क्रॉस-आर्म्स और ब्रेकिंग सदस्य, कारखाने में बनाए जाते हैं और फिर निर्माण स्थल पर बोल्ट और नट की मदद से जोड़े जाते हैं।
- कुछ विशेष प्रकार के टावरों में, जैसे कि शहरी क्षेत्रों में उपयोग होने वाले, खोखले स्टील के पाइप (ट्यूबलर स्टील) का भी उपयोग किया जाता है।
- प्रबलित कंक्रीट (Reinforced Concrete):
- टावर को जमीन में मजबूती से स्थिर करने के लिए इसकी नींव प्रबलित कंक्रीट से बनाई जाती है। कंक्रीट के भीतर स्टील की छड़ें (rebar) डालकर इसे और मजबूत बनाया जाता है, जिससे यह टावर के भारी भार को वहन कर सके।
अन्य घटक (Other Components)
- कंडक्टर (Conductors): बिजली ले जाने वाले तार आमतौर पर एल्यूमीनियम के बने होते हैं, क्योंकि यह हल्का, सस्ता और एक अच्छा विद्युत चालक है। इन्हें अक्सर अतिरिक्त शक्ति के लिए स्टील के कोर के साथ मिश्रित किया जाता है।
- इंसुलेटर (Insulators): ये कंडक्टरों को टावर की धातु संरचना से अलग करते हैं। ये पॉर्सिलेन (चीनी मिट्टी), कठोर ग्लास या पॉलिमर जैसी सामग्रियों से बने होते हैं, जो विद्युत के कुचालक होते हैं।
- ग्राउंड वायर (Ground Wires): टावर के शीर्ष पर लगा यह तार बिजली गिरने से बचाने के लिए होता है। यह अक्सर गैल्वेनाइज्ड स्टील से बना होता है।
एक ट्रांसमिशन टावर की सामान्य ऊँचाई 30 मीटर से 45 मीटर तक हो सकती है, लेकिन यह कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि वोल्टेज स्तर और भू-भाग (terrain)।
ऊँचाई को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Height)
- वोल्टेज स्तर: उच्च वोल्टेज वाले टावरों की ऊँचाई अधिक होती है। उदाहरण के लिए, 765 kV लाइनों के लिए टावर 100 मीटर से भी अधिक ऊँचे हो सकते हैं, जबकि 132 kV लाइनों के लिए ये 25-35 मीटर तक होते हैं।
- भूमि निकासी (Ground Clearance): यह जमीन से सबसे निचले तार की न्यूनतम सुरक्षित दूरी है। सुरक्षा मानकों को बनाए रखने के लिए, टावरों को इतना ऊँचा होना चाहिए कि तार ज़मीन, सड़कों और इमारतों से पर्याप्त दूरी पर रहें।
- भू-भाग (Terrain): यदि ट्रांसमिशन लाइन किसी नदी, घाटी या पहाड़ी को पार करती है, तो टावरों को बहुत ऊँचा बनाया जाता है ताकि तार सुरक्षित ऊँचाई पर रहें।
- कंडक्टरों का सैग (Conductor Sag): कंडक्टरों का झुकाव (सैग) तापमान और तनाव पर निर्भर करता है। टावरों के बीच की दूरी बढ़ने पर सैग भी बढ़ता है, जिसके कारण तारों को जमीन से न्यूनतम सुरक्षित दूरी पर रखने के लिए ऊँचे टावरों की आवश्यकता होती है।
टावर की नींव में आरसीसी (Reinforced Concrete) का उपयोग इसलिए किया जाता है ताकि टावर को अत्यधिक भार, तेज हवा और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए अधिकतम शक्ति और स्थिरता मिल सके।
आरसीसी के उपयोग के कारण
- उच्च भार वहन क्षमता (High Load-Bearing Capacity): टावर के स्टील ढांचे का पूरा भार नींव पर आता है। आरसीसी (कंक्रीट और स्टील की छड़ें) का संयोजन कंक्रीट की संपीड़न शक्ति (compressive strength) और स्टील की तन्यता शक्ति (tensile strength) का लाभ उठाता है, जिससे यह भारी भार को आसानी से वहन कर सकता है।
- मजबूती और स्थायित्व (Strength and Durability): टावर की नींव जमीन के नीचे होती है, जहाँ मिट्टी का दबाव, नमी और रासायनिक तत्व होते हैं। आरसीसी इन सभी स्थितियों का सामना कर सकती है और लंबे समय तक संरचना को मजबूत बनाए रखती है।
- जंग से बचाव (Corrosion Protection): हालांकि स्टील मजबूत होता है, यह जंग लगने से कमजोर हो सकता है। कंक्रीट स्टील की छड़ों को चारों ओर से घेरकर उन्हें नमी और हवा के संपर्क से बचाता है, जिससे जंग लगने का खतरा कम हो जाता है।
- लचीलापन (Flexibility): आरसीसी का उपयोग करके किसी भी आकार और गहराई की नींव बनाई जा सकती है, जिससे इसे विभिन्न प्रकार की मिट्टी और भू-भाग (terrain) के लिए अनुकूलित किया जा सकता है।
- स्थिरता (Stability): आरसीसी की नींव जमीन में मजबूती से टावर को पकड़कर रखती है, जिससे तेज हवा या भूकंप के दौरान टावर के हिलने या गिरने का खतरा कम हो जाता है।
ट्रांसमिशन टावर मुख्य रूप से उनके उपयोग, संरचना और वोल्टेज स्तर के आधार पर कई प्रकार के होते हैं।
उपयोग के आधार पर (Based on Usage)
- सस्पेंशन टावर (Suspension Tower): ये सबसे आम प्रकार के टावर हैं जो सीधी ट्रांसमिशन लाइनों पर उपयोग किए जाते हैं। इनका मुख्य काम तारों को लटकाकर रखना है।
- टेंशन टावर/एंगल टावर (Tension Tower/Angle Tower): इन टावरों का उपयोग वहाँ होता है जहाँ ट्रांसमिशन लाइन की दिशा बदलती है (जैसे, मोड़ पर) या जहाँ लाइन समाप्त होती है। ये तारों के तनाव को सहन करने के लिए बनाए जाते हैं।
- ट्रांसपोजिशन टावर (Transposition Tower): इनका उपयोग कंडक्टरों की स्थिति को बदलने के लिए किया जाता है ताकि तीनों फेज में लोड संतुलित रहे।
- टर्मिनल टावर (Terminal Tower): ये टावर लाइनों के अंत में या किसी सबस्टेशन के पास लगाए जाते हैं।
संरचना के आधार पर (Based on Structure)
जालीदार स्टील टावर (Lattice Steel Tower): ये लोहे के एंगल और क्रॉस-ब्रेकिंग से बने होते हैं। ये सबसे मजबूत और आमतौर पर उपयोग किए जाने वाले टावर हैं।
ट्यूबलर स्टील टावर (Tubular Steel Tower): ये खोखले स्टील के पाइप से बने होते हैं और इनका उपयोग अक्सर शहरी क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ कम जगह होती है।
मोनोपोल टावर (Monopole Tower): ये एक ही खंभे जैसे दिखते हैं और इनका उपयोग भी शहरी और सौंदर्य की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में होता है।
सर्किट के आधार पर (Based on Circuits)
सिंगल-सर्किट टावर (Single-Circuit Tower): ये एक ही सर्किट के तीन कंडक्टरों को ले जाते हैं।
डबल-सर्किट टावर (Double-Circuit Tower): ये दो सर्किट के छह कंडक्टरों को ले जाते हैं, जिससे एक ही टावर से दोगुनी बिजली संचारित की जा सकती है।
मल्टी-सर्किट टावर (Multi-Circuit Tower): इनका उपयोग तब होता है जब दो से अधिक सर्किट को एक ही टावर पर ले जाना होता है।
निलंबन (Suspension) और स्ट्रेन (Strain) टावर दोनों ही ट्रांसमिशन लाइनों में तारों को सहारा देने के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन इनके कार्य और उपयोग की जगह अलग-अलग होती है। स्ट्रेन टावर को टेंशन टावर भी कहा जाता है।
निलंबन (सस्पेंशन) टावर (Suspension Towers)
- उपयोग: इन टावरों का उपयोग मुख्य रूप से सीधी ट्रांसमिशन लाइनों पर किया जाता है जहाँ तारों में कोई कोणीय विचलन नहीं होता है।
- कार्य: इनका प्राथमिक कार्य कंडक्टरों को लंबवत रूप से सहारा देना और उन्हें ज़मीन से पर्याप्त ऊँचाई पर बनाए रखना है। ये टावर ऊर्ध्वाधर भार (vertical load) को सहन करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं।
- इंसुलेटर का प्रकार: इनमें सस्पेंशन इंसुलेटर स्ट्रिंग्स का उपयोग किया जाता है, जो ऊर्ध्वाधर (vertically) लटके होते हैं। ये स्ट्रिंग्स कंडक्टरों को टावर के क्रॉस-आर्म से सीधे नीचे लटका देती हैं।
स्ट्रेन/टेंशन टावर (Strain/Tension Towers)
- उपयोग: इन टावरों का उपयोग वहाँ किया जाता है जहाँ ट्रांसमिशन लाइन की दिशा बदलती है (जैसे मोड़ पर), लाइन समाप्त होती है (डेड-एंड), या किसी नदी या सड़क को पार करती है।
- कार्य: इनका मुख्य कार्य कंडक्टरों के उच्च क्षैतिज तनाव (high horizontal tension) को सहन करना है। ये टावर लाइन के तनाव को संतुलित करने और किसी भी तरह के भारी भार को वहन करने के लिए बहुत मजबूत होते हैं।
- इंसुलेटर का प्रकार: इनमें स्ट्रेन इंसुलेटर स्ट्रिंग्स का उपयोग होता है, जो क्षैतिज रूप से (horizontally) लगे होते हैं। ये स्ट्रिंग्स कंडक्टरों को टावर से मजबूती से बाँधती हैं ताकि तनाव को नियंत्रित किया जा सके।
टर्मिनल टावर का मुख्य कार्य एक ट्रांसमिशन लाइन के अंत बिंदु पर कंडक्टरों के उच्च तनाव को सहन करना है। ये टावर लाइन को समाप्त करते हैं और अक्सर इन्हें सबस्टेशन या स्विचयार्ड के प्रवेश द्वार पर लगाया जाता है।
प्रमुख कार्य
- तनाव को वहन करना (Carrying Tension): टर्मिनल टावर लाइन के अंतिम सिरे पर होने के कारण कंडक्टरों के एकतरफा तनाव (unilateral tension) को झेलते हैं। इनका डिजाइन इतना मजबूत होता है कि ये इस तनाव को सफलतापूर्वक नियंत्रित कर सकें।
- लाइन को समाप्त करना (Terminating the Line): ये टावर लंबी दूरी से आ रही ट्रांसमिशन लाइन को समाप्त करते हैं और इसे सबस्टेशन में प्रवेश करने या दूसरे प्रकार की संरचनाओं से जोड़ने में मदद करते हैं।
- सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करना (Providing Safety and Stability): टर्मिनल टावर एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं जो लाइन के अंतिम बिंदु पर तारों की स्थिरता सुनिश्चित करता है। ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस बिंदु पर तनाव सबसे अधिक होता है।
- सर्किट स्विचिंग की अनुमति देना (Allowing Circuit Switching): सबस्टेशन में, टर्मिनल टावर सर्किट ब्रेकर और आइसोलेटर जैसे उपकरणों को समायोजित करने के लिए जगह प्रदान करते हैं, जिससे बिजली को नियंत्रित और स्विच किया जा सके।
नदी पार करने वाले टावरों का उपयोग वहाँ किया जाता है जहाँ ट्रांसमिशन लाइन को किसी बड़ी नदी, जलमार्ग या चौड़ी घाटी को पार करना होता है। इन टावरों को विशेष रूप से डिज़ाइन किया जाता है ताकि वे लंबी दूरी तक फैले तारों के भारी भार और तनाव को वहन कर सकें।
प्रमुख कार्य और विशेषताएँ
- लंबी दूरी की कवरेज: सामान्य टावरों की तुलना में, नदी पार करने वाले टावरों के बीच की दूरी बहुत अधिक होती है। यह दूरी हजारों मीटर तक हो सकती है।
- ऊँचाई: इन टावरों को बहुत ऊँचा बनाया जाता है ताकि तारों का झुकाव (sags) बहुत अधिक न हो और वे जलमार्ग के ऊपर जहाजों या अन्य यातायात के लिए पर्याप्त निकासी प्रदान कर सकें।
- मजबूत संरचना: नदी के पार टावर पर पड़ने वाले अतिरिक्त तनाव और भार को देखते हुए, इनकी संरचना को बेहद मजबूत बनाया जाता है। ये आमतौर पर सबसे ऊँचे और सबसे मजबूत प्रकार के ट्रांसमिशन टावर होते हैं।
- डेड-एंड टावर के रूप में कार्य: इन्हें अक्सर डेड-एंड या टेंशन टावर के रूप में डिज़ाइन किया जाता है, जो दोनों ओर से आने वाले तारों के तनाव को सहन कर सकते हैं।
ट्रांसपोज़िशन टावर (Transposition Tower) एक विशेष प्रकार का ट्रांसमिशन टावर है जिसका उपयोग ट्रांसमिशन लाइनों पर कंडक्टरों की स्थिति को व्यवस्थित रूप से बदलने के लिए किया जाता है। इसकी आवश्यकता इसलिए होती है ताकि बिजली के तीनों फेजों में संतुलित भार और कम ऊर्जा हानि सुनिश्चित की जा सके।
आवश्यकता के कारण (Reasons for Necessity)
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प्रेरक और धारिता संतुलन (Inductive and Capacitive Balance):
- जब कंडक्टरों को लंबे समय तक एक ही ज्यामितीय स्थिति में रखा जाता है, तो प्रत्येक फेज का प्रेरकत्व और धारिता (inductance and capacitance) अलग-अलग हो जाता है।
- यह असंतुलन, वोल्टेज ड्रॉप और पावर लॉस का कारण बनता है।
- ट्रांसपोज़िशन टावर का उपयोग करके, प्रत्येक कंडक्टर को बारी-बारी से तीनों फेजों (ऊपरी, मध्य और निचले) की स्थिति में रखा जाता है, जिससे पूरी लाइन में प्रेरकत्व और धारिता संतुलित हो जाती है।
- दक्षता में सुधार (Improvement in Efficiency):
- फेजों के बीच संतुलन से लाइन में कुल ऊर्जा हानि कम होती है, जिससे ट्रांसमिशन प्रणाली की दक्षता में सुधार होता है।
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संचार हस्तक्षेप को कम करना (Reducing Communication Interference):
- असंतुलित लाइनें आसपास के संचार लाइनों, जैसे टेलीफोन या रेडियो सिग्नल, में हस्तक्षेप उत्पन्न कर सकती हैं।
- ट्रांसपोज़िशन हस्तक्षेप को कम करने में मदद करता है।
ट्रांसपोज़िशन प्रक्रिया:
ट्रांसपोज़िशन आमतौर पर एक लाइन के कुल लंबाई के 1/3, 2/3 और 3/3 बिंदुओं पर किया जाता है। इससे प्रत्येक फेज को प्रत्येक स्थिति में समान दूरी तक रहने का मौका मिलता है, जिससे पूरी लाइन में संतुलन बना रहता है।
विद्युत टावरों को उनके आकार के आधार पर मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: छोटे, मध्यम और ऊँचे। यह वर्गीकरण टावर की ऊँचाई और संरचना पर आधारित है, जो बदले में वोल्टेज स्तर, भू-भाग (terrain) और कंडक्टरों के बीच की दूरी पर निर्भर करता है।
छोटे टावर (Short Towers)
ये टावर आमतौर पर वितरण लाइनों के लिए उपयोग किए जाते हैं जो घरों और व्यवसायों को बिजली पहुँचाती हैं। इनकी ऊँचाई कम होती है, जो लगभग 9 से 15 मीटर तक होती है। इन टावरों का उपयोग कम वोल्टेज स्तरों (जैसे 11kV, 33kV) के लिए किया जाता है और ये अक्सर शहरी या आवासीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ जगह सीमित होती है।
मध्यम आकार के टावर (Medium-sized Towers)
इन टावरों का उपयोग उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों (जैसे 132kV, 220kV) के लिए होता है। ये टावर उत्पादन केंद्रों से बड़े सबस्टेशनों तक बिजली पहुँचाते हैं। इनकी ऊँचाई लगभग 25 से 40 मीटर तक हो सकती है। इन टावरों का उपयोग आमतौर पर खुले मैदानों और ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है।
ऊँचे टावर (Tall Towers)
ये टावर अति-उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों (जैसे 400kV, 765kV) के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनकी ऊँचाई सबसे अधिक होती है, जो 40 मीटर से 100 मीटर या उससे भी अधिक हो सकती है। इन ऊँचे टावरों को लंबी दूरी तक, खासकर जब नदियाँ, घाटियाँ, या ऊबड़-खाबड़ इलाके को पार करना होता है, बिजली संचारित करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। इन पर लगे कंडक्टरों के बीच की दूरी भी अधिक होती है, जिससे बिजली के रिसाव (corona discharge) से बचा जा सके।
डेल्टा टावर एक विशेष प्रकार का विद्युत ट्रांसमिशन टावर है जिसका उपयोग हाई-वोल्टेज लाइनों के लिए किया जाता है। इसका नाम इसकी अनूठी त्रिकोणीय (triangular) संरचना के कारण पड़ा है, जो ग्रीक अक्षर डेल्टा (Δ) जैसा दिखता है।
प्रमुख विशेषताएँ और उपयोग
- त्रिकोणीय संरचना: डेल्टा टावर के कंडक्टरों को एक त्रिभुज के आकार में व्यवस्थित किया जाता है, जिसमें एक कंडक्टर शीर्ष पर होता है और दो कंडक्टर नीचे की ओर होते हैं। यह कॉम्पैक्ट डिज़ाइन टावर के लिए आवश्यक जगह को कम करता है।
- कम जगह की आवश्यकता: डेल्टा टावर का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे लगाने के लिए कम राइट-ऑफ़-वे (right-of-way) की आवश्यकता होती है। इसकी संकीर्ण संरचना इसे शहरी क्षेत्रों या जहाँ भूमि महँगी है, वहाँ उपयोग के लिए आदर्श बनाती है।
- वोल्टेज स्तर: ये टावर आमतौर पर 132kV और 220kV जैसी उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
- सौंदर्यशास्त्र: पारंपरिक जालीदार (lattice) टावरों की तुलना में, डेल्टा टावर का डिज़ाइन अधिक आकर्षक माना जाता है, जिससे यह सौंदर्य की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों के लिए एक पसंदीदा विकल्प बन जाता है।
संक्षेप में,
डेल्टा टावर का उपयोग मुख्य रूप से जगह की कमी और सौंदर्य संबंधी विचारों के कारण होता है, जबकि यह उच्च वोल्टेज बिजली को कुशलता से और सुरक्षित रूप से संचारित करने का कार्य भी करता है।
चौकोर मीनार, जिसे चौकोर जालीदार टावर (square lattice tower) भी कहा जाता है, विद्युत ट्रांसमिशन लाइनों में उपयोग होने वाला एक सामान्य प्रकार का टावर है। इसका नाम इसकी चौकोर आधार और पूरे ऊँचाई तक बनी चौकोर संरचना के कारण पड़ा है।
प्रमुख विशेषताएँ
- संरचना: यह आमतौर पर लोहे के कोणों (steel angles) से बनी एक जालीदार संरचना होती है। इसमें चार मुख्य टांगें (legs) होती हैं जो एक चौकोर आकार में व्यवस्थित होती हैं।
- मजबूती: इसकी चौकोर और संतुलित संरचना इसे बहुत मजबूत और स्थिर बनाती है। यह हवा, बर्फ, और तारों के भारी भार जैसे विभिन्न प्रकार के बलों को सहन करने में सक्षम है।
- उपयोग: चौकोर मीनारें बहुमुखी होती हैं और इनका उपयोग सीधी लाइनों (सस्पेंशन टावर) और दिशा बदलने वाली लाइनों (टेंशन टावर) दोनों के लिए किया जाता है। ये विभिन्न वोल्टेज स्तरों, जैसे कि 132kV, 220kV और 400kV, के लिए उपयुक्त हैं।
इनकी मजबूती और निर्माण में सरलता के कारण, चौकोर मीनारें दुनिया भर में सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले ट्रांसमिशन टावरों में से एक हैं। हालाँकि, इन्हें लगाने के लिए अधिक जगह की आवश्यकता होती है, जिसके कारण शहरी क्षेत्रों में इन्हें कम उपयोग किया जाता है।
संकीर्ण आधार टावर (Narrow-Base Tower), जैसा कि नाम से पता चलता है, एक ऐसा ट्रांसमिशन टावर है जिसका आधार (base) उसकी ऊँचाई की तुलना में बहुत संकीर्ण (narrow) होता है। इन टावरों को विशेष रूप से उन जगहों के लिए डिज़ाइन किया गया है जहाँ भूमि बहुत महंगी या सीमित है, जैसे कि घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्र, राजमार्गों के मध्य भाग (medians) या रेलवे गलियारे।
प्रमुख प्रकार और विशेषताएँ
मोनोपोल टावर (Monopole Tower):
यह संकीर्ण आधार टावरों का सबसे आम प्रकार है। यह एक एकल, बेलनाकार या बहुभुजीय स्टील के खंभे जैसा दिखता है।
इसका आधार बहुत छोटा होता है, जिससे यह न्यूनतम जगह लेता है।
इन्हें अक्सर सौंदर्य की दृष्टि से बेहतर माना जाता है और पारंपरिक जालीदार (lattice) टावरों की तुलना में इन्हें जल्दी स्थापित किया जा सकता है।
संकीर्ण जालीदार टावर (Narrow Lattice Tower):
- यह पारंपरिक जालीदार टावर का एक प्रकार है, लेकिन इसके चार पैर आधार पर एक-दूसरे के बहुत करीब होते हैं।
- इसका उपयोग उन स्थितियों में होता है जहाँ जालीदार टावर की मजबूती की आवश्यकता होती है, लेकिन जगह की कमी होती है।
संकीर्ण आधार टावरों के लाभ
- कम भूमि की आवश्यकता: इनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इन्हें लगाने के लिए बहुत कम जगह की ज़रूरत होती है, जिससे भूमि अधिग्रहण की लागत और जटिलता कम हो जाती है।
- सौंदर्यशास्त्र: इनका पतला और आधुनिक डिज़ाइन इसे शहरी परिदृश्य के लिए अधिक उपयुक्त बनाता है।
- स्थापना में आसानी: विशेष रूप से मोनोपोल टावरों को पूर्वनिर्मित (prefabricated) खंडों में लाया जाता है और उन्हें साइट पर जल्दी से जोड़ा जा सकता है।
संक्षेप में,
संकीर्ण आधार टावर उन परिस्थितियों में एक कुशल और व्यावहारिक समाधान प्रदान करते हैं जहाँ जगह एक महत्वपूर्ण बाधा होती है।
चौड़े आधार वाला टावर एक प्रकार का विद्युत ट्रांसमिशन टावर है जिसे अधिकतम स्थिरता और भार वहन क्षमता प्रदान करने के लिए एक विस्तृत आधार के साथ डिज़ाइन किया गया है। इन टावरों का उपयोग आमतौर पर लंबी दूरी की उच्च-वोल्टेज लाइनों के लिए किया जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ और उपयोग
- संरचनात्मक स्थिरता: चौड़े आधार वाला डिज़ाइन टावर को हवा, बर्फ और भूकंप जैसे पार्श्व (lateral) बलों के खिलाफ उत्कृष्ट स्थिरता प्रदान करता है। टावर की चार मुख्य टांगें एक बड़े क्षेत्र में फैली होती हैं, जिससे भार समान रूप से वितरित होता है।
- उच्च भार वहन क्षमता: इन टावरों का उपयोग भारी कंडक्टरों और कई सर्किटों को सहारा देने के लिए किया जाता है। इनकी मजबूती उन्हें अति-उच्च वोल्टेज (जैसे 400kV और 765kV) के लिए आदर्श बनाती है।
- उपयोग: चौड़े आधार वाले टावर खुले मैदानों और ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे आम हैं, जहाँ भूमि की उपलब्धता एक समस्या नहीं है।
इनकी मजबूती और विश्वसनीयता के कारण, ये टावर बिजली के ग्रिड की रीढ़ हैं जो लंबी दूरी तक बिजली के कुशल और सुरक्षित पारेषण को सुनिश्चित करते हैं। हालाँकि, इन्हें लगाने के लिए अधिक जगह की आवश्यकता होती है, जो इन्हें शहरी क्षेत्रों के लिए अनुपयुक्त बनाती है।
खुले क्षेत्रों में चौड़े आधार वाले टावरों का उपयोग उनकी उच्च स्थिरता और भार वहन क्षमता के कारण किया जाता है। ये टावर उन सभी यांत्रिक और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं जो लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों में सामने आती हैं।
प्रमुख कारण
- अधिक स्थिरता:
- चौड़ा आधार टावर को अत्यधिक स्थिरता प्रदान करता है। खुले क्षेत्रों में हवा का दबाव बहुत अधिक होता है, और चौड़े आधार वाले टावर इस दबाव को कुशलता से झेल सकते हैं, जिससे टावर के गिरने का जोखिम कम हो जाता है।
- उच्च भार वहन क्षमता:
- ये टावर बहुत भारी कंडक्टरों और कई सर्किटों को सहारा देने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। इनका विस्तृत आधार भार को एक बड़े क्षेत्र में वितरित करता है, जिससे नींव पर पड़ने वाला दबाव कम होता है।
- लागत-प्रभावशीलता:
- शहरी क्षेत्रों की तुलना में खुले क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण सस्ता और आसान होता है, इसलिए टावर के लिए अधिक जगह की आवश्यकता कोई बड़ी समस्या नहीं होती।
- विभिन्न प्रकार के भारों का सामना:
- चौड़े आधार वाले टावर न केवल हवा के भार का बल्कि बर्फ, भूकंप और तारों के उच्च तनाव जैसे अन्य बलों का भी प्रभावी ढंग से सामना कर सकते हैं।
संक्षेप में,
खुले क्षेत्रों में चौड़े आधार वाले टावरों का उपयोग उनकी बेजोड़ मजबूती, विश्वसनीयता और सुरक्षा के लिए किया जाता है, जो उन्हें लंबी दूरी की बिजली पारेषण के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प बनाता है।
शहरों में संकीर्ण आधार वाले टावर को कई कारणों से प्राथमिकता दी जाती है, जिनमें मुख्य रूप से कम जगह की आवश्यकता और सौंदर्यशास्त्र शामिल हैं।
प्रमुख कारण (Major Reasons)
- भूमि की उपलब्धता:
- शहरी क्षेत्रों में भूमि बहुत महंगी और दुर्लभ होती है। चौड़े आधार वाले टावरों के लिए बड़ी जगह की आवश्यकता होती है, जबकि संकीर्ण आधार वाले टावर, जैसे कि मोनोपोल टावर, बहुत कम जगह लेते हैं। इससे भूमि अधिग्रहण की लागत और जटिलता कम हो जाती है।
- कम व्यवधान (Minimal Disruption):
- संकीर्ण आधार वाले टावरों को भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में, जैसे कि सड़कों के किनारे, रेलवे लाइनों के साथ या मौजूदा इमारतों के बीच, आसानी से स्थापित किया जा सकता है। इससे यातायात और दैनिक जीवन में कम व्यवधान आता है।
- सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics):
- शहरी परिदृश्य में बड़े और जालीदार टावर अनाकर्षक लग सकते हैं। संकीर्ण और पतले डिज़ाइन वाले टावर अधिक आधुनिक और आकर्षक दिखते हैं, जिससे वे शहर के सौंदर्य को कम प्रभावित करते हैं।
- स्थापना में आसानी:
- मोनोपोल टावरों को आमतौर पर पूर्वनिर्मित (prefabricated) खंडों में लाया जाता है और उन्हें साइट पर कम समय में जोड़ा जा सकता है, जिससे निर्माण प्रक्रिया तेज हो जाती है।
संक्षेप में,
संकीर्ण आधार वाले टावर शहरों की विशिष्ट चुनौतियों का एक व्यावहारिक और कुशल समाधान प्रदान करते हैं, जहाँ जगह और दृश्य प्रदूषण प्रमुख चिंताएं होती हैं।
टावर ज़मीन से कंडक्टर की सुरक्षित दूरी (clearance) को कई तरीकों से बनाए रखते हैं, जो ट्रांसमिशन लाइन की सुरक्षा और विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि तारों और ज़मीन के बीच हमेशा एक न्यूनतम सुरक्षित दूरी हो।
प्रमुख तरीके
- टावर की ऊँचाई (Tower Height):
- यह सबसे सीधा तरीका है। टावर की ऊँचाई को इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि सबसे निचले तार का सैग (झुकाव) भी जमीन से सुरक्षित दूरी पर रहे। उच्च वोल्टेज वाली लाइनों के लिए अधिक ऊँचे टावरों की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनके तारों के बीच और जमीन से अधिक दूरी की आवश्यकता होती है।
- कंडक्टरों का सैग और तनाव (Conductor Sag & Tension):
- इंजीनियर टावरों के बीच की दूरी (span) और कंडक्टरों में तनाव की गणना करते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तापमान बढ़ने पर भी तारों का सैग (झुकाव) न्यूनतम सुरक्षित दूरी से नीचे न जाए। गर्म मौसम में तार फैलते हैं और अधिक झुकते हैं, इसलिए डिज़ाइन में इसका ध्यान रखा जाता है।
- इंसुलेटर का उपयोग (Use of Insulators):
- टावर पर लगे इंसुलेटर, जो चीनी मिट्टी या ग्लास के बने होते हैं, कंडक्टरों को टावर की धातु संरचना से अलग रखते हैं। यह विद्युत अलगाव सुनिश्चित करता है कि बिजली केवल तारों में ही प्रवाहित हो और टावर में न जाए, जिससे सुरक्षा बनी रहती है।
- राइट-ऑफ़-वे (Right-of-Way):
- ट्रांसमिशन लाइन के नीचे एक निश्चित चौड़ाई का गलियारा (corridor) बनाया जाता है जिसे "राइट-ऑफ़-वे" कहते हैं। इस क्षेत्र में पेड़-पौधे और इमारतें नहीं होतीं, जिससे तारों के संपर्क में आने का कोई खतरा नहीं रहता।
इन सभी कारकों को मिलाकर, इंजीनियर यह सुनिश्चित करते हैं कि टावर हर स्थिति में कंडक्टरों को जमीन से और अन्य वस्तुओं से पर्याप्त ऊँचाई पर बनाए रखें, जिससे बिजली का सुरक्षित और निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित हो सके।
शॉर्ट सर्किट को रोकने में विद्युत ट्रांसमिशन टावरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। टावर यह सुनिश्चित करते हैं कि उच्च वोल्टेज वाले कंडक्टर (तार) एक-दूसरे से या टावर की धातु संरचना से सीधे संपर्क में न आएं, जिससे शॉर्ट सर्किट का खतरा टल जाता है।
शॉर्ट सर्किट को रोकने के तरीके (Ways to Prevent Short Circuits)
कंडक्टरों के बीच पर्याप्त दूरी (Adequate Spacing Between Conductors):
- टावरों का डिज़ाइन ऐसा होता है कि वे अलग-अलग फेज के कंडक्टरों को एक-दूसरे से सुरक्षित दूरी पर रखें। उच्च वोल्टेज पर, यदि कंडक्टर बहुत करीब हों, तो उनके बीच हवा के माध्यम से बिजली का प्रवाह (arcing) हो सकता है, जिससे शॉर्ट सर्किट हो जाता है। टावरों की क्रॉस-आर्म्स की लंबाई यह सुनिश्चित करती है कि सभी कंडक्टर एक सुरक्षित दूरी पर रहें।
इंसुलेटर का उपयोग (Use of Insulators):
टावरों पर लगे इंसुलेटर कंडक्टरों और टावर की धातु संरचना के बीच विद्युत अलगाव (electrical isolation) प्रदान करते हैं। इंसुलेटर विद्युत के कुचालक होते हैं, जो बिजली को टावर में प्रवाहित होने से रोकते हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट नहीं होता। वोल्टेज जितना अधिक होता है, इंसुलेटर की संख्या भी उतनी ही अधिक होती है।
यांत्रिक स्थिरता (Mechanical Stability):
- टावर की मजबूत संरचना और नींव कंडक्टरों को तेज हवा, बर्फ के भार और अन्य यांत्रिक बलों से हिलने या झूलने से रोकती है। यदि तार बहुत अधिक हिलते हैं और एक-दूसरे से टकराते हैं, तो शॉर्ट सर्किट हो सकता है।
राइट-ऑफ़-वे (Right-of-Way):
- टावरों के आसपास के क्षेत्र को "राइट-ऑफ़-वे" के रूप में बनाए रखा जाता है, जहाँ पेड़ों को काटा जाता है और इमारतों को बनने से रोका जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि कंडक्टर किसी बाहरी वस्तु से न टकराएं, जिससे शॉर्ट सर्किट का खतरा कम हो जाता है।
विद्युत टावर अपनी संरचना, सामग्री और इंजीनियरिंग डिजाइन के कारण हवा और यांत्रिक तनाव का सामना करने में सक्षम होते हैं। इन कारकों को मिलाकर, टावर बिजली पारेषण प्रणाली की स्थिरता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं।
प्रमुख तरीके (Key Methods)
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जालीदार संरचना (Lattice Structure):
- अधिकांश टावरों में जालीदार स्टील की संरचना का उपयोग किया जाता है। यह डिज़ाइन टावर के भार को समान रूप से वितरित करता है और इसे हवा के दबाव के प्रति लचीला बनाता है।
- छोटे-छोटे स्टील के पुर्जे जिन्हें ब्रेकिंग कहते हैं, एक दूसरे को सहारा देते हैं, जिससे टावर मजबूत और स्थिर बनता है।
-
मजबूत नींव (Strong Foundation):
- टावर का आधार, जो आमतौर पर प्रबलित कंक्रीट (Reinforced Concrete) से बना होता है, उसे जमीन में गहराई तक गाड़कर बनाया जाता है।
- यह नींव टावर को स्थिरता प्रदान करती है और इसे तेज हवाओं और भूकंप के दौरान हिलने या गिरने से बचाती है।
- सामग्री का चयन (Material Selection):
- टावरों के लिए उच्च-शक्ति वाले गैल्वेनाइज्ड स्टील का उपयोग किया जाता है, जो जंग लगने से बचाता है और उन्हें कठोर मौसम की स्थिति का सामना करने में सक्षम बनाता है।
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टेंशन टावर (Tension Towers):
- जहाँ ट्रांसमिशन लाइन की दिशा बदलती है या लाइन समाप्त होती है, वहाँ विशेष रूप से मजबूत टेंशन टावर का उपयोग किया जाता है।
- ये टावर कंडक्टरों के उच्च तनाव को सहन करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं, जिससे पूरी लाइन की यांत्रिक स्थिरता बनी रहती है।
संक्षेप में,
टावर अपनी इंजीनियरिंग डिजाइन, मजबूत नींव और उपयुक्त सामग्री के कारण हवा और तारों के भारी यांत्रिक तनाव दोनों का प्रभावी ढंग से सामना कर पाते हैं।
टावर डिजाइन में कंडक्टर सैग (conductor sag) कई कारणों से महत्वपूर्ण है, जो टावर की संरचनात्मक अखंडता, सुरक्षा और समग्र प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। सैग एक कंडक्टर की शिथिलता या ढीलापन है जो दो सपोर्ट टावरों के बीच होता है।
सुरक्षा और निकासी
कंडक्टर सैग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सुरक्षा है। एक निश्चित सैग की गणना यह सुनिश्चित करने के लिए की जाती है कि कंडक्टर जमीन, इमारतों, पेड़ों और अन्य वस्तुओं से एक न्यूनतम सुरक्षित दूरी बनाए रखे। यदि सैग बहुत कम है, तो तनाव (tension) बढ़ सकता है, जिससे कंडक्टर टूट सकता है या टावर क्षतिग्रस्त हो सकता है। इसके विपरीत, यदि सैग बहुत अधिक है, तो कंडक्टर जमीन या अन्य संरचनाओं के बहुत करीब आ जाएगा, जिससे एक खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है और बिजली के झटके या शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ सकता है।
यांत्रिक तनाव
कंडक्टर का सैग सीधे उस पर लगने वाले यांत्रिक तनाव (mechanical stress) से संबंधित है।
- कम सैग, उच्च तनाव: यदि कंडक्टर को बहुत कसकर खींचा जाता है (कम सैग), तो उस पर यांत्रिक तनाव बढ़ जाता है। यह उच्च तनाव कंडक्टर को कमजोर कर सकता है, खासकर तेज हवा, बर्फ या आइस लोडिंग जैसी चरम मौसम स्थितियों के दौरान, जिससे कंडक्टर के टूटने की संभावना बढ़ जाती है।
- उच्च सैग, कम तनाव: यदि कंडक्टर को अधिक ढीला छोड़ा जाता है (अधिक सैग), तो उस पर तनाव कम होता है, जो कंडक्टर की जीवनकाल को बढ़ाता है। हालांकि, जैसा कि ऊपर बताया गया है, बहुत अधिक सैग सुरक्षा संबंधी जोखिम पैदा करता है।
इंजीनियरों को एक इष्टतम सैग ढूंढना होता है जो सुरक्षा और तनाव दोनों के बीच संतुलन बनाए रखता है।
टावर की ऊंचाई और लागत
सैग सीधे टावर की ऊंचाई और परिणामस्वरूप, परियोजना की लागत को प्रभावित करता है।
- यदि आप सैग कम रखना चाहते हैं, तो आपको कंडक्टर को जमीन से सुरक्षित दूरी पर रखने के लिए ऊंचे टावरों की आवश्यकता होगी। ऊंचे टावर अधिक महंगे होते हैं और उन्हें स्थापित करना अधिक कठिन होता है।
- यदि आप कम ऊंचाई वाले टावरों का उपयोग करना चाहते हैं, तो आपको अधिक सैग की अनुमति देनी होगी, जो सुरक्षा निकासी को खतरे में डाल सकती है।
सैग की उचित गणना करके, इंजीनियर सबसे कम संभव टावर ऊंचाई का निर्धारण कर सकते हैं जो सुरक्षा और प्रदर्शन आवश्यकताओं को पूरा करता है, जिससे परियोजना की लागत कम होती है।
कंडक्टर का तापमान और मौसम का प्रभाव
सैग तापमान और मौसम की स्थिति के साथ बदलता रहता है।
- तापमान में वृद्धि: जब कंडक्टर का तापमान बढ़ता है (गर्मियों के दौरान या उच्च विद्युत भार के कारण), तो यह फैलता है, जिससे सैग बढ़ जाता है।
- तापमान में कमी: जब तापमान कम होता है (सर्दियों के दौरान), तो कंडक्टर सिकुड़ता है, जिससे सैग कम हो जाता है और तनाव बढ़ जाता है।
- बर्फ और हवा: बर्फ या बर्फ के जमाव का वजन सैग को बहुत बढ़ा सकता है, जबकि तेज हवाएं कंडक्टर को बगल में हिला सकती हैं, जिसे स्विंग (swing) कहते हैं, जिससे टावरों के बीच शॉर्ट सर्किट हो सकता है।
टावर डिजाइन में,
इन सभी कारकों (सबसे खराब स्थिति) को ध्यान में रखा जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कंडक्टर सभी मौसम स्थितियों में सुरक्षित दूरी और तनाव सीमा के भीतर रहे।
टावर पेट्रोलिंग का मतलब है किसी ऊर्जा पारेषण लाइन (power transmission line) के मार्ग में आने वाले टावरों और उनके घटकों का नियमित रूप से निरीक्षण करना। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य किसी भी संभावित समस्या का पता लगाना और उसका निवारण करना है, ताकि बिजली आपूर्ति में कोई बाधा न आए और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। टावर पेट्रोलिंग को गश्त या निरीक्षण भी कहते हैं।
टावर पेट्रोलिंग के मुख्य उद्देश्य और जाँच के बिंदु
टावर पेट्रोलिंग के दौरान, तकनीशियन और इंजीनियर कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जाँच करते हैं:
- संरचनात्मक अखंडता: टावर की संरचना में किसी भी प्रकार की क्षति, जैसे मुड़ा हुआ या टूटा हुआ सदस्य (member), ढीले नट-बोल्ट, या जंग लगने की जाँच करना।
- कंडक्टर और इंसुलेटर: कंडक्टर में किसी भी तरह के कट, टूटन, या शिथिलता (sag) की जाँच करना। इंसुलेटर में दरार, टूटन, या गंदगी की जाँच करना, क्योंकि ये इंसुलेशन को प्रभावित कर सकते हैं।
- ग्राउंड क्लीयरेंस: कंडक्टर और जमीन या पेड़-पौधों के बीच की सुरक्षित दूरी (ground clearance) की जाँच करना। यह सुनिश्चित करना कि कंडक्टर किसी भी वस्तु के बहुत करीब न हो।
- सुरक्षा और अतिक्रमण: यह देखना कि टावर के आसपास कोई अनाधिकृत निर्माण, अतिक्रमण, या खुदाई तो नहीं हो रही है।
- चोरी और बर्बरता: टावर के घटकों, जैसे कि कंडक्टर या इंसुलेटर की चोरी या बर्बरता (vandalism) के संकेतों की जाँच करना।
पेट्रोलिंग के प्रकार
टावर पेट्रोलिंग को आमतौर पर तीन मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
- सामान्य पेट्रोलिंग (Normal Patroling): यह एक नियमित और पूर्वनिर्धारित गश्त है जो पूरे मार्ग (route) के साथ की जाती है। इसका उद्देश्य पूरी लाइन की स्थिति का मूल्यांकन करना और छोटी-मोटी समस्याओं का पता लगाना है।
- इंटेंसिव पेट्रोलिंग (Intensive Patroling): यह तब की जाती है जब किसी विशेष खंड में कोई बड़ी समस्या का संदेह होता है, जैसे तूफान या भूकंप के बाद। इसमें अधिक विस्तृत और गहन जाँच की जाती है।
- स्पेशल पेट्रोलिंग (Special Patroling): यह तब की जाती है जब कोई विशेष घटना या समस्या रिपोर्ट की जाती है, जैसे कि किसी विशिष्ट टावर पर आग लगना, कंडक्टर टूटना, या कोई दुर्घटना।
टावर पेट्रोलिंग एक महत्वपूर्ण निवारक रखरखाव (preventive maintenance) कार्य है जो बिजली ग्रिड की विश्वसनीयता, दक्षता और सुरक्षा को बनाए रखने में मदद करता है।
टावर पेंटिंग, जिसे पुन: संरक्षण (re-protection) भी कहते हैं, बिजली पारेषण (transmission) टावरों के रखरखाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। टावरों को पेंट करने का मुख्य कारण उन्हें जंग और जंग से होने वाली क्षति से बचाना है।
यहां कुछ मुख्य कारण दिए गए हैं कि टावर पेंटिंग क्यों आवश्यक है:
- जंग से बचाव (Corrosion Protection):
टावर आमतौर पर गैल्वेनाइज्ड स्टील (galvanized steel) से बने होते हैं। गैल्वेनाइजेशन, जो स्टील पर जिंक की एक परत चढ़ाता है, जंग से बचाने का एक प्रभावी तरीका है। लेकिन समय के साथ, मौसम की स्थिति जैसे बारिश, हवा, धूप, और औद्योगिक प्रदूषण के कारण यह परत घिस जाती है। एक बार जब जिंक की परत हट जाती है, तो टावर का स्टील हवा और नमी के संपर्क में आ जाता है, जिससे जंग लगने लगती है। जंग लगने से टावर कमजोर हो जाता है, जिससे उसके ढहने या टूटने का खतरा बढ़ जाता है, जो एक बड़ा सुरक्षा जोखिम है। पेंट की एक नई परत लगाने से एक अतिरिक्त सुरक्षात्मक अवरोध (protective barrier) बन जाता है जो टावर को जंग से बचाता है।
- संरचनात्मक अखंडता को बनाए रखना (Maintaining Structural Integrity):
जंग लगने से धातु कमजोर हो जाती है और समय के साथ टावर की संरचनात्मक अखंडता (structural integrity) खराब हो जाती है। नियमित पेंटिंग से टावर की सामग्री की मजबूती बनी रहती है और उसका जीवनकाल बढ़ता है। यह सुनिश्चित करता है कि टावर कई दशकों तक बिजली लाइनों को सुरक्षित रूप से सहारा दे सके।
- सुरक्षा और दृश्यता (Safety and Visibility):
कुछ क्षेत्रों में, खासकर हवाई अड्डों के पास या कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों के मार्ग में, टावरों को लाल और सफेद जैसे चमकीले रंगों से पेंट किया जाता है। यह पेंट टावरों को उड़ान सुरक्षा के लिए अधिक दृश्यमान (visible) बनाता है, जिससे हवाई दुर्घटनाओं को रोका जा सके। यह खासकर घनी धुंध या कम रोशनी की स्थिति में महत्वपूर्ण होता है।
- सौंदर्य और पर्यावरण (Aesthetics and Environment):
कुछ मामलों में, टावरों को उनके आसपास के परिदृश्य (landscape) के साथ बेहतर ढंग से मिलाने के लिए पेंट किया जाता है, जिससे उनका दृश्य प्रभाव कम हो जाता है।
संक्षेप में,
टावर पेंटिंग एक निवारक रखरखाव (preventive maintenance) का काम है जो न केवल टावरों को जंग से बचाता है, बल्कि बिजली पारेषण प्रणाली की विश्वसनीयता, सुरक्षा और दीर्घायु सुनिश्चित करने में भी मदद करता है। नियमित पेंटिंग से दीर्घकालिक लागत में भी कमी आती है क्योंकि यह महंगे मरम्मत या टावर को पूरी तरह बदलने की आवश्यकता को टाल देता है।
बिजली के टावरों में ढीले नट और बोल्ट कई गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते हैं, जो टावर की सुरक्षा और संरचनात्मक अखंडता को खतरे में डालते हैं।
ढीले नट और बोल्ट के परिणाम
- संरचनात्मक अस्थिरता: नट और बोल्ट टावर के विभिन्न हिस्सों को एक साथ कसकर जोड़ने का काम करते हैं। यदि ये ढीले हो जाते हैं, तो टावर की संरचनात्मक अखंडता (structural integrity) कमजोर हो जाती है। हवा, बर्फ, या भूकंप जैसे बाहरी बल टावर पर अतिरिक्त तनाव डालते हैं, जिससे इसके ढहने की संभावना बढ़ जाती है।
- घर्षण और क्षति: ढीले नट और बोल्ट कंपन (vibration) के कारण टावर के धातु के हिस्सों के बीच घर्षण (friction) पैदा कर सकते हैं। यह घर्षण धीरे-धीरे टावर के घटकों को खराब कर देता है, जिससे धातु में दरारें आ सकती हैं या वे टूट सकते हैं।
- फास्टनर का टूटना या गिरना: कंपन और तनाव के कारण ढीले नट और बोल्ट टावर से गिर सकते हैं। एक भी महत्वपूर्ण बोल्ट का गायब होना पूरे टावर के संतुलन को बिगाड़ सकता है, जिससे यह खतरनाक रूप से अस्थिर हो सकता है।
- आवाज (Noise): ढीले हिस्सों के कंपन से एक तेज, खड़खड़ाने वाली या गूंजने वाली आवाज पैदा हो सकती है, जो विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों के पास परेशान करने वाली हो सकती है।
- रखरखाव लागत में वृद्धि: ढीले नट और बोल्ट का समय पर पता न लगने पर बड़ी मरम्मत या टावर को पूरी तरह बदलने की आवश्यकता हो सकती है, जिससे लागत काफी बढ़ जाती है।
इसलिए,
टावर पेट्रोलिंग के दौरान नट और बोल्ट की नियमित जाँच करना और उन्हें कसना टावर के सुरक्षित संचालन और लंबी उम्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
टावर अर्थिंग, जिसे ग्राउंडिंग भी कहते हैं, एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है जो बिजली पारेषण (transmission) टावरों में किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों और उपकरणों को बिजली के खतरों से बचाना है।
यहां टावर अर्थिंग की आवश्यकता के कुछ मुख्य कारण दिए गए हैं:
1. बिजली गिरने से सुरक्षा (Lightning Protection)
टावरों पर बिजली गिरने का खतरा हमेशा रहता है। टावर की संरचना पर लगने वाली बिजली की उच्च मात्रा को सुरक्षित रूप से जमीन में प्रवाहित करने के लिए अर्थिंग सबसे प्रभावी तरीका है। अर्थिंग प्रणाली एक कम प्रतिरोध (low resistance) का मार्ग प्रदान करती है, जिससे बिजली का करंट सीधे जमीन में चला जाता है और टावर की संरचना या पास के उपकरणों को कोई नुकसान नहीं होता।
2. विद्युत रिसाव से सुरक्षा (Fault Current Protection)
कभी-कभी, इंसुलेटर (insulators) खराब होने या कंडक्टर के टूटने पर टावर की धातु की संरचना में करंट आ सकता है। यदि टावर की अर्थिंग नहीं की गई हो, तो कोई भी व्यक्ति जो टावर के संपर्क में आता है, उसे गंभीर बिजली का झटका लग सकता है। अर्थिंग सिस्टम यह सुनिश्चित करता है कि ऐसा कोई भी लीकेज करंट तुरंत जमीन में प्रवाहित हो जाए, जिससे लोगों और जानवरों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
3. वोल्टेज को नियंत्रित करना (Voltage Control)
अर्थिंग प्रणाली यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि टावर और उसके आसपास के क्षेत्र में वोल्टेज का स्तर सुरक्षित सीमा के भीतर रहे। यह किसी भी क्षणिक ओवरवॉल्टेज (transient overvoltage) को नियंत्रित करता है, जो बिजली गिरने या स्विचिंग संचालन के दौरान हो सकता है। यह विद्युत प्रणाली के संतुलन को बनाए रखता है।
टावर अर्थिंग कैसे काम करती है?
टावर अर्थिंग के लिए,
टावर के पैरों को जमीन में गड़ी हुई धातु की प्लेटों या इलेक्ट्रोड (electrode) से जोड़ा जाता है। इन इलेक्ट्रोड को जमीन में पर्याप्त गहराई तक गाड़ा जाता है ताकि वे एक बहुत ही कम प्रतिरोध का मार्ग प्रदान कर सकें। जब भी कोई अतिरिक्त करंट टावर पर आता है, तो वह इस कम प्रतिरोध वाले मार्ग से होकर जमीन में चला जाता है, जिससे टावर और उसके आसपास का क्षेत्र सुरक्षित रहता है।
टावर रखरखाव में कई आम समस्याएं आती हैं, जिनका नियमित निरीक्षण और मरम्मत से समाधान करना आवश्यक होता है।
जंग (Corrosion)
टावरों की सबसे आम और गंभीर समस्याओं में से एक है जंग लगना। टावर आमतौर पर गैल्वेनाइज्ड स्टील (galvanized steel) से बने होते हैं, लेकिन समय के साथ नमी, हवा और प्रदूषण के कारण जिंक की सुरक्षात्मक परत घिस जाती है। जंग लगने से टावर की धातु कमजोर हो जाती है और उसकी संरचनात्मक अखंडता (structural integrity) को खतरा होता है, जिससे टावर के ढहने की संभावना बढ़ जाती है।
नट और बोल्ट का ढीला होना या गायब होना (Loose or Missing Nuts and Bolts)
टावर कई हिस्सों को जोड़कर बनाया जाता है, और ये हिस्से नट और बोल्ट से कसकर जोड़े जाते हैं। हवा के कंपन, तापमान में बदलाव और अन्य बाहरी कारकों के कारण ये नट और बोल्ट ढीले हो सकते हैं या गिर सकते हैं। ढीले बोल्ट टावर को अस्थिर कर देते हैं और उसके हिस्सों के बीच घर्षण पैदा करते हैं, जिससे टावर कमजोर हो जाता है।
कंडक्टर और इंसुलेटर की समस्याएं (Conductor and Insulator Problems)
- कंडक्टर सैग (Conductor Sag): तापमान में बदलाव या बर्फ के भार के कारण कंडक्टर का सैग (शिथिलता) बदल सकता है। यदि सैग बहुत अधिक है, तो कंडक्टर जमीन के बहुत करीब आ सकता है, जिससे सुरक्षा का खतरा पैदा होता है।
- इंसुलेटर की क्षति (Insulator Damage): इंसुलेटर, जो कंडक्टर को टावर से अलग करते हैं, टूट सकते हैं, उनमें दरार आ सकती है, या वे गंदे हो सकते हैं। एक खराब इंसुलेटर बिजली के रिसाव (leakage) का कारण बन सकता है और शॉर्ट सर्किट का जोखिम बढ़ा सकता है।
- कंडक्टर का टूटना (Conductor Breakage): तेज हवा या अचानक भार बढ़ने से कंडक्टर टूट सकते हैं, जिससे बिजली आपूर्ति बाधित हो सकती है।
टावर संरचना को नुकसान (Damage to Tower Structure)
- सदस्यों का मुड़ना या टूटना (Bent or Broken Members): वाहन दुर्घटनाओं, बर्बरता, या तेज हवाओं के कारण टावर के सदस्य (structural members) मुड़ सकते हैं या टूट सकते हैं।
- पक्षियों के घोंसले (Bird Nests): कुछ पक्षी टावरों पर घोंसले बनाते हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट हो सकता है या टावर की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
- अतिक्रमण (Encroachment): टावर के पास अनाधिकृत निर्माण या खुदाई से टावर की नींव कमजोर हो सकती है, जिससे उसके ढहने का खतरा बढ़ जाता है।
इन सभी समस्याओं का पता लगाने और समय पर उनका समाधान करने के लिए नियमित रूप से टावर पेट्रोलिंग (निरीक्षण) और रखरखाव करना बहुत जरूरी है।
400 kV (किलोवोल्ट) जैसी उच्च वोल्टेज लाइनों के लिए, कई प्रकार के टावरों का उपयोग किया जाता है। इन टावरों को मुख्य रूप से उनके डिजाइन, कार्य और जिस इलाके में वे स्थापित किए गए हैं, उसके आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
संरचना के आधार पर प्रकार
- जाल-स्टील टावर (Lattice Steel Towers): 400 kV लाइनों में ये सबसे आम प्रकार के टावर हैं। ये टावर एंगल स्टील के सदस्यों से बने होते हैं जिन्हें एक जालीदार संरचना में बोल्ट किया जाता है। ये मजबूत, हल्के और खुले डिजाइन के कारण हवा के दबाव का अच्छी तरह से सामना कर सकते हैं।
- ट्यूबलर स्टील पोल (Tubular Steel Poles): ये टावर बेलनाकार (cylindrical) होते हैं और इनका उपयोग अक्सर शहरी क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ कम जगह उपलब्ध होती है। ये जालीदार टावरों की तुलना में अधिक सौंदर्यपूर्ण और कम जगह घेरने वाले होते हैं, लेकिन आमतौर पर अधिक महंगे होते हैं।
कार्य के आधार पर प्रकार
400 kV लाइनों में, विभिन्न कार्यों के लिए कई प्रकार के टावर होते हैं:
- टैन्जेंट टावर (Tangent Towers): इन्हें सीधे रास्तों पर उपयोग किया जाता है जहाँ लाइन की दिशा में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होता है। ये सबसे आम प्रकार के टावर हैं और इनमें कंडक्टरों को सस्पेंशन इंसुलेटर (suspension insulators) से लटकाया जाता है। इन्हें आमतौर पर 'A' टाइप टावर कहा जाता है।
- एंगल टावर (Angle Towers): इन टावरों का उपयोग वहाँ होता है जहाँ लाइन को दिशा बदलनी होती है। दिशा में बदलाव के कोण के आधार पर, इन्हें विभिन्न श्रेणियों में बांटा जाता है, जैसे 'B' (2-15 डिग्री), 'C' (15-30 डिग्री), और 'D' (30-60 डिग्री) टाइप टावर। इन टावरों पर तनाव (tension) अधिक होता है, इसलिए ये टैन्जेंट टावरों की तुलना में अधिक मजबूत होते हैं।
- डेड-एंड टावर (Dead-End Towers): इनका उपयोग लाइन के अंत में, सबस्टेशन के प्रवेश द्वार पर या किसी नदी या बड़े अवरोध को पार करने से पहले और बाद में किया जाता है। ये टावर बहुत मजबूत होते हैं क्योंकि इन्हें कंडक्टरों के कुल तनाव का सामना करना पड़ता है।
- ट्रांस्पोजीशन टावर (Transposition Towers): इन टावरों का उपयोग तब किया जाता है जब कंडक्टरों के क्रम को बदला जाता है ताकि लाइन के तीन फेज के बीच विद्युत विशेषताओं को संतुलित किया जा सके।
विद्युत प्रणाली में उपयोग किए जाने वाले टावरों में से नदी पार करने वाले टावर (river crossing towers) या विशेष प्रयोजन वाले टावर (special purpose towers) आमतौर पर सबसे ऊंचे होते हैं।
ये टावर इसलिए ऊंचे बनाए जाते हैं ताकि वे चौड़ी नदियों, झीलों, या गहरी घाटियों के ऊपर से बिजली लाइनों को सुरक्षित रूप से गुजार सकें। इन टावरों के बीच की दूरी (स्पैन) भी बहुत अधिक होती है, इसलिए कंडक्टरों को जमीन या पानी की सतह से पर्याप्त ऊंचाई पर रखने के लिए टावर की ऊंचाई बढ़ाना आवश्यक होता है।
कुछ सबसे ऊंचे टावरों के उदाहरण:
- यांग्त्ज़ी नदी क्रॉसिंग (चीन): चीन के जियांग्सू प्रांत में यांग्त्ज़ी नदी के पार 500 kV की लाइन को पार करने वाले दो टावर दुनिया के सबसे ऊंचे पारेषण टावरों में से हैं। इनकी ऊंचाई 385 मीटर (1,263 फीट) है। इन्हें नदी में जहाजों की आवाजाही को बाधित किए बिना बिजली लाइन को पार कराने के लिए बनाया गया है।
- झोउशान क्रॉसिंग (चीन): चीन के झेजियांग प्रांत में झोउशान द्वीप पर स्थित 380 मीटर ऊंचे टावर भी दुनिया के सबसे ऊंचे टावरों में से एक हैं।
सामान्य पारेषण टावरों
(जैसे कि टैन्जेंट या एंगल टावर) की तुलना में, जो आमतौर पर 15 से 45 मीटर (50 से 150 फीट) ऊंचे होते हैं, नदी पार करने वाले टावर अपनी विशेष आवश्यकताओं के कारण बहुत ऊंचे होते हैं।
टावर रखरखाव एक उच्च जोखिम वाला कार्य है जिसमें कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त उपाय अपनाए जाते हैं। इन सुरक्षा उपायों का उद्देश्य दुर्घटनाओं, गिरने, बिजली के झटके और अन्य खतरों से बचाव करना है।
व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE)
कर्मचारियों को हमेशा उचित व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (Personal Protective Equipment) पहनने चाहिए, जिनमें शामिल हैं:
- हेलमेट: सिर की चोटों से बचने के लिए।
- सेफ्टी हार्नेस और लाइफलाइन: टावर पर चढ़ते और काम करते समय गिरने से बचाने के लिए। हार्नेस को टावर के सुरक्षित बिंदु से हमेशा जोड़ा जाना चाहिए।
- इंसुलेटेड ग्लव्स और बूट्स: बिजली के झटके से बचाव के लिए।
- सेफ्टी ग्लासेस और फेस शील्ड: आंखों को धूल, मलबे या आर्क फ्लैश से बचाने के लिए।
- रिफ्लेक्टिव जैकेट: रात में या कम रोशनी में दृश्यता (visibility) बढ़ाने के लिए।
कार्यस्थल सुरक्षा उपाय
- लॉकआउट/टैगआउट प्रक्रिया (LOTO): यह सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों में से एक है। रखरखाव शुरू करने से पहले, यह सुनिश्चित किया जाता है कि लाइन में कोई बिजली नहीं है। इसके लिए, सर्किट ब्रेकर को बंद करके लॉक कर दिया जाता है और उस पर टैग लगा दिया जाता है ताकि कोई भी गलती से बिजली चालू न कर दे।
- सुरक्षित दूरी (Safe Clearance): यदि लाइन को पूरी तरह से बंद नहीं किया जा सकता है, तो श्रमिकों को काम करने वाले कंडक्टर से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखनी होती है।
- जमीन से संपर्क (Grounding): लाइन को डी-एनर्जाइज़ करने के बाद भी, प्रेरित वोल्टेज (induced voltage) या आकस्मिक चार्ज से सुरक्षा के लिए कंडक्टर को जमीन से जोड़ा जाता है।
- टूल और उपकरण की जांच: उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरणों और औजारों की नियमित रूप से जांच की जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे अच्छी स्थिति में हैं और कोई भी खराब उपकरण दुर्घटना का कारण न बने।
- मौसम की स्थिति का ध्यान: खराब मौसम जैसे तेज हवा, तूफान, भारी बारिश या बिजली गिरने की स्थिति में टावर पर काम नहीं किया जाता।
- संचार: काम करने वाले कर्मचारियों और नीचे के ग्राउंड स्टाफ के बीच स्पष्ट संचार बनाए रखा जाता है।
आपातकालीन योजना
- आपातकालीन प्रतिक्रिया योजना: किसी दुर्घटना या आपात स्थिति में क्या करना है, इसकी एक स्पष्ट योजना होनी चाहिए, जिसमें प्राथमिक चिकित्सा, बचाव उपकरण और आपातकालीन सेवाओं से संपर्क करने की जानकारी शामिल हो।
- प्रशिक्षण: सभी कर्मचारियों को सुरक्षा प्रक्रियाओं, आपातकालीन प्रतिक्रिया और बचाव तकनीकों में नियमित रूप से प्रशिक्षित किया जाता है।
ये सभी सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि टावर रखरखाव का काम सुरक्षित और प्रभावी ढंग से पूरा हो।
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