पावर ट्रांसफॉर्मर एक विद्युत उपकरण है जिसका उपयोग बिजली उत्पादन संयंत्रों और सबस्टेशनों में उच्च वोल्टेज (HV) और मध्यम वोल्टेज (MV) प्रणालियों के लिए किया जाता है। इसका मुख्य कार्य लंबी दूरी तक बिजली के कुशल संचरण के लिए वोल्टेज को बढ़ाना या कम करना है। यह चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर काम करता है और आमतौर पर 200 MVA से अधिक की उच्च क्षमता वाले होते हैं।
पावर ट्रांसफार्मर का उपयोग मुख्य रूप से विद्युत ग्रिड के ट्रांसमिशन नेटवर्क में होता है, जो बिजली को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है।
पावर ट्रांसफार्मर के कार्य और उपयोग
पावर ट्रांसफार्मर का उपयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्यों के लिए किया जाता है:
- वोल्टेज का रूपांतरण: ये ट्रांसफार्मर बिजली संयंत्रों से उत्पन्न होने वाली बिजली के वोल्टेज को बहुत उच्च स्तर तक बढ़ाते हैं, ताकि लंबी दूरी तक बिजली के संचरण के दौरान होने वाली ऊर्जा हानि को कम किया जा सके।
- लोड संतुलन: ये ट्रांसफार्मर पूरे दिन बिजली की मांग में उतार-चढ़ाव के अनुसार बिजली की आपूर्ति को समायोजित करने में मदद करते हैं, जिससे ग्रिड अतिभारित होने से बचता है।
- सुरक्षा: कुछ पावर ट्रांसफार्मर को अलग-अलग सर्किटों को अलग करने के लिए भी उपयोग किया जाता है, जिससे विद्युत शोर को खत्म करने में मदद मिलती है।
पावर ट्रांसफार्मर और डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर में अंतर
पावर ट्रांसफार्मर और डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके कार्य और उपयोग में कई अंतर हैं।
पावर ट्रांसफार्मर और डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर के बीच मुख्य अंतर नीचे दी गई तालिका में दिए गए हैं:
पावर ट्रांसफॉर्मर एक विद्युत उपकरण है जिसका उपयोग बिजली के उच्च वोल्टेज को बढ़ाने या घटाने के लिए किया जाता है। यह मुख्य रूप से बिजली उत्पादन संयंत्रों और सबस्टेशनों में काम आता है।
इसका प्राथमिक उद्देश्य लंबी दूरी तक बिजली के कुशल संचरण को सुनिश्चित करना है।
पावर ट्रांसफॉर्मर चुंबकीय प्रेरण (magnetic induction) के सिद्धांत पर काम करता है, जिसमें एक प्राथमिक कॉइल में लगाया गया एसी वोल्टेज एक चुंबकीय क्षेत्र बनाता है, जो फिर एक द्वितीयक कॉइल में वोल्टेज को प्रेरित करता है।
पावर ट्रांसफार्मर के मुख्य कार्य
- वोल्टेज रूपांतरण: ये ट्रांसफार्मर बिजली उत्पादन स्टेशनों पर वोल्टेज को बहुत उच्च स्तर (जैसे 400 kV या 220 kV) तक बढ़ाते हैं ताकि बिजली को कम से कम ऊर्जा हानि के साथ लंबी दूरी तक ले जाया जा सके।
- लोड संतुलन: ये ट्रांसफार्मर बिजली की मांग में उतार-चढ़ाव के अनुसार वोल्टेज को समायोजित करते हैं, जिससे ग्रिड का संतुलन बना रहता है।
- सुरक्षा: कुछ पावर ट्रांसफार्मर सर्किट को अलग करने का काम करते हैं, जिससे विद्युत शोर को कम करने में मदद मिलती है।
पावर ट्रांसफार्मर के प्रकार
पावर ट्रांसफार्मर को विभिन्न मानदंडों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जैसे:
-
कार्य के आधार पर:
- स्टेप-अप ट्रांसफार्मर: ये वोल्टेज को बढ़ाते हैं। इनका उपयोग बिजली संयंत्रों में बिजली को ट्रांसमिशन लाइनों में भेजने के लिए किया जाता है।
- स्टेप-डाउन ट्रांसफार्मर: ये वोल्टेज को घटाते हैं। इनका उपयोग सबस्टेशनों में होता है।
-
चरणों की संख्या के आधार पर:
- एकल-चरण (Single-phase) ट्रांसफार्मर
- तीन-चरण (Three-phase) ट्रांसफार्मर
-
निर्माण के आधार पर:
- कोर टाइप ट्रांसफार्मर: इनमें कॉइल एक आयताकार कोर के चारों ओर लिपटे होते हैं।
- शेल टाइप ट्रांसफार्मर: इनमें कॉइल एक केंद्रीय भाग में लिपटे होते हैं और चुंबकीय पथ दो या अधिक रास्तों से पूरा होता है।
पावर ट्रांसफॉर्मर बिजली प्रणालियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और उनकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए निर्माण, परीक्षण और सुरक्षा के हर चरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
निर्माण (Construction)
पावर ट्रांसफॉर्मर का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई चरण शामिल होते हैं। यह मुख्य रूप से कोर (core) और वाइंडिंग (winding) से मिलकर बना होता है।
- कोर का निर्माण: कोर को पतली-पतली सिलिकॉन स्टील की प्लेटों को एक साथ जोड़कर बनाया जाता है। इन प्लेटों पर वार्निश का लेप लगाया जाता है ताकि एड़ी करंट लॉस (eddy current loss) को कम किया जा सके।
- वाइंडिंग का निर्माण: वाइंडिंग आमतौर पर तांबे (copper) या एल्यूमीनियम (aluminium) से बनी होती है। इन्हें कोर के चारों ओर लपेटा जाता है। स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर में, प्राथमिक वाइंडिंग में कम और द्वितीयक वाइंडिंग में अधिक टर्न होते हैं, जबकि स्टेप-डाउन में इसका उल्टा होता है।
- टैंक में असेंबल करना: कोर और वाइंडिंग को एक मजबूत स्टील के टैंक में रखा जाता है। इस टैंक को ट्रांसफॉर्मर तेल से भरा जाता है। यह तेल वाइंडिंग को ठंडा करने और इंसुलेशन प्रदान करने का काम करता है।
परीक्षण (Testing)
निर्माण के बाद, ट्रांसफॉर्मर की गुणवत्ता और प्रदर्शन को सुनिश्चित करने के लिए कई परीक्षण किए जाते हैं।
- विद्युत प्रतिरोध परीक्षण (Insulation Resistance Test): यह वाइंडिंग और कोर के बीच इन्सुलेशन की जांच करता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई लीकेज करंट न हो।
- टर्न अनुपात परीक्षण (Turns Ratio Test): यह प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग के बीच के अनुपात की जांच करता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि वोल्टेज को सही स्तर पर रूपांतरित किया जा रहा है।
- नो-लोड लॉस और करंट परीक्षण (No-Load Loss and Current Test): यह ट्रांसफॉर्मर के कोर लॉस को मापता है जब कोई लोड नहीं होता है।
- शॉर्ट-सर्किट प्रतिबाधा और लोड लॉस परीक्षण (Short-Circuit Impedance and Load Loss Test): यह ट्रांसफॉर्मर की दक्षता और लोड के तहत होने वाले नुकसान को मापता है।
- ट्रांसफॉर्मर तेल परीक्षण: तेल की परावैद्युत शक्ति (dielectric strength) और नमी की मात्रा की जांच की जाती है।
सुरक्षा (Protection)
पावर ट्रांसफॉर्मर की सुरक्षा के लिए कई उपकरण और प्रणालियाँ लगाई जाती हैं ताकि इसे आंतरिक और बाहरी दोषों से बचाया जा सके।
- बुखोल्ज़ रिले (Buchholz Relay): यह सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपकरण है। यह ट्रांसफॉर्मर के आंतरिक दोषों, जैसे शॉर्ट-सर्किट या तेल के अतिताप (overheating) के कारण उत्पन्न होने वाली गैसों का पता लगाता है और अलार्म बजाता है या सर्किट ब्रेकर को ट्रिप कर देता है।
- अधिभार सुरक्षा (Overload Protection): यह ट्रांसफॉर्मर को तब बचाता है जब उस पर उसकी निर्धारित क्षमता से अधिक भार डाला जाता है।
- अति-करंट रिले (Over-current Relay): यह ट्रांसफॉर्मर को शॉर्ट-सर्किट जैसे बाहरी दोषों से बचाता है।
- तापमान संकेतक (Temperature Indicators): ये वाइंडिंग और तेल के तापमान की निगरानी करते हैं और यदि तापमान बहुत अधिक हो जाता है तो अलार्म या ट्रिप सिग्नल देते हैं।
पावर ट्रांसफॉर्मर आमतौर पर 33 kV से 400 kV और उससे भी अधिक के वोल्टेज स्तरों पर काम करते हैं। ये मुख्य रूप से बिजली के उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन नेटवर्क में उपयोग किए जाते हैं,
जो बिजली को बिजली संयंत्रों से दूर-दराज के सबस्टेशनों तक पहुंचाते हैं।
ट्रांसफॉर्मर की क्षमता को kVA (किलोवोल्ट-एम्पीयर) या MVA (मेगावोल्ट-एम्पीयर) में मापा जाता है। पावर ट्रांसफॉर्मर की रेटिंग आमतौर पर 200 MVA से अधिक होती है, जो उन्हें डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर की तुलना में बहुत अधिक क्षमता वाला बनाती है।
प्रमुख वोल्टेज स्तर
- 132 kV, 220 kV, 400 kV: ये भारत सहित कई देशों में मुख्य ट्रांसमिशन लाइन वोल्टेज हैं।
- 765 kV: कुछ आधुनिक अति-उच्च वोल्टेज (UHV) ट्रांसमिशन लाइनों में इस स्तर का उपयोग किया जाता है।
पावर ट्रांसफॉर्मर को उनकी विशिष्ट वोल्टेज और क्षमता की आवश्यकताओं के अनुसार डिज़ाइन और निर्मित किया जाता है, जो उन्हें ट्रांसमिशन ग्रिड के लिए अपरिहार्य बनाता है।
वितरण ट्रांसफार्मर (Distribution Transformer) वह ट्रांसफार्मर है जो बिजली के वितरण नेटवर्क का अंतिम चरण होता है। इसका मुख्य कार्य उच्च वोल्टेज (High Voltage) बिजली को सुरक्षित और उपयोग योग्य निम्न वोल्टेज (Low Voltage) में बदलना है ताकि इसे सीधे घरों, दुकानों और उद्योगों तक पहुंचाया जा सके।
यह आमतौर पर हमारे आस-पास बिजली के खंभों पर या छोटे सबस्टेशनों में लगे होते हैं।
मुख्य कार्य और उपयोग
- वोल्टेज को कम करना: यह ट्रांसफार्मर 11 kV या 33 kV जैसे उच्च वोल्टेज को 440V या 220V जैसे घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त वोल्टेज में बदलता है।
- निकटता: ये ट्रांसफार्मर उपभोक्ताओं के करीब स्थापित किए जाते हैं ताकि बिजली के नुकसान को कम किया जा सके और बिजली की आपूर्ति में स्थिरता बनी रहे।
- लोड के अनुसार संचालन: वितरण ट्रांसफार्मर का लोड दिन भर बदलता रहता है। इसकी दक्षता (efficiency) कम लोड पर भी अच्छी होती है।
वितरण ट्रांसफार्मर के प्रकार
वितरण ट्रांसफार्मर को कई मानदंडों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है:
-
माउंटिंग के आधार पर:
- पोल-माउंटेड (Pole-mounted): ये ट्रांसफार्मर बिजली के खंभों पर लगाए जाते हैं।
- पैड-माउंटेड (Pad-mounted): ये ट्रांसफार्मर जमीन पर रखे जाते हैं और अक्सर घनी आबादी वाले क्षेत्रों में उपयोग होते हैं।
- अंडरग्राउंड (Underground): ये ट्रांसफार्मर जमीन के नीचे लगाए जाते हैं।
-
चरणों की संख्या के आधार पर:
- सिंगल-फेज (Single-phase): इनका उपयोग आमतौर पर आवासीय क्षेत्रों में किया जाता है।
- थ्री-फेज (Three-phase): इनका उपयोग औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में किया जाता है।
-
कूलिंग विधि के आधार पर:
- ड्राई-टाइप (Dry-type): इनमें कूलिंग के लिए तेल का उपयोग नहीं होता है, जिससे ये आग के जोखिम को कम करते हैं।
- तेल-निम्न (Oil-immersed): इनमें वाइंडिंग को ठंडा करने के लिए तेल भरा होता है।
वितरण ट्रांसफार्मर की क्षमता आमतौर पर 50 kVA से 200 kVA तक होती है।
वितरण ट्रांसफार्मर: निर्माण, परीक्षण और संरक्षण
वितरण ट्रांसफार्मर का निर्माण, परीक्षण और संरक्षण बहुत महत्वपूर्ण है ताकि यह सुरक्षित और विश्वसनीय रूप से काम कर सके।
निर्माण (Construction)
एक वितरण ट्रांसफार्मर का निर्माण कई चरणों में होता है:
- कोर और वाइंडिंग: सबसे पहले, पतली-पतली सिलिकॉन स्टील की प्लेटों को जोड़कर कोर बनाया जाता है, जो चुंबकीय पथ प्रदान करता है। इसके बाद, तांबे या एल्यूमीनियम की वाइंडिंग (प्राथमिक और द्वितीयक) को कोर पर लपेटा जाता है।
- टैंक में असेंबल करना: कोर और वाइंडिंग को एक मजबूत स्टील के टैंक में रखा जाता है। इस टैंक को ट्रांसफार्मर तेल से भरा जाता है। यह तेल ट्रांसफार्मर को ठंडा करने और इन्सुलेशन प्रदान करने का काम करता है।
- बुशिंग्स और टैप चेंजर: टैंक के बाहर, वोल्टेज इनपुट और आउटपुट के लिए बुशिंग्स लगाई जाती हैं। कुछ ट्रांसफार्मर में टैप चेंजर भी होता है, जो वोल्टेज को थोड़ा-बहुत समायोजित करने में मदद करता है।
परीक्षण (Testing)
निर्माण के बाद, ट्रांसफार्मर की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कई परीक्षण किए जाते हैं:
- विद्युत प्रतिरोध परीक्षण (Insulation Resistance Test): यह वाइंडिंग और कोर के बीच इन्सुलेशन की जांच करता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई लीकेज करंट न हो।
- टर्न अनुपात परीक्षण (Turns Ratio Test): यह इनपुट और आउटपुट वोल्टेज के अनुपात की जांच करता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ट्रांसफार्मर सही वोल्टेज दे रहा है।
- लोड लॉस और नो-लोड लॉस टेस्ट: यह ट्रांसफार्मर की दक्षता और लोड के तहत होने वाले नुकसान (जैसे कोर लॉस और कॉपर लॉस) को मापता है।
- ट्रांसफार्मर तेल परीक्षण: तेल की गुणवत्ता और नमी की जांच की जाती है क्योंकि यह ट्रांसफार्मर के जीवन के लिए महत्वपूर्ण है।
संरक्षण (Protection)
वितरण ट्रांसफार्मर को नुकसान से बचाने के लिए कई सुरक्षा उपकरण लगाए जाते हैं:
- अति-करंट सुरक्षा (Over-current Protection): यह ट्रांसफार्मर को शॉर्ट-सर्किट जैसे दोषों से बचाने के लिए फ्यूज या सर्किट ब्रेकर का उपयोग करता है।
- अतिभार सुरक्षा (Overload Protection): यह ट्रांसफार्मर को तब बचाता है जब उस पर उसकी निर्धारित क्षमता से अधिक भार डाला जाता है।
- तापमान संकेतक (Temperature Indicators): ये ट्रांसफार्मर के तापमान की निगरानी करते हैं और यदि यह बहुत बढ़ जाता है, तो अलार्म देते हैं या बिजली काट देते हैं।
- प्रेशर रिलीज़ वाल्व (Pressure Release Valve): यदि ट्रांसफार्मर के अंदर अत्यधिक दबाव बनता है (उदाहरण के लिए, एक आंतरिक दोष के कारण), तो यह वाल्व अतिरिक्त दबाव को बाहर निकालता है।
वितरण ट्रांसफॉर्मर आमतौर पर 3.3 kV से 33 kV तक के वोल्टेज स्तरों पर काम करते हैं। ये ट्रांसफॉर्मर बिजली के अंतिम उपयोगकर्ताओं, जैसे कि घरों, दुकानों और छोटे उद्योगों, को बिजली की आपूर्ति के लिए वोल्टेज को कम करते हैं।
इन ट्रांसफॉर्मर की प्राथमिक (प्राइमरी) वाइंडिंग उच्च वोल्टेज (जैसे 11 kV या 33 kV) पर होती है, जबकि द्वितीयक (सेकेंडरी) वाइंडिंग कम वोल्टेज (जैसे 440V या 220V) पर होती है।
वितरण ट्रांसफॉर्मर की क्षमता (रेटिंग) भी पावर ट्रांसफॉर्मर की तुलना में काफी कम होती है, जो आमतौर पर 200 kVA से 2500 kVA तक होती है।
विद्युत ट्रांसफार्मर का उपयोग विद्युत प्रणाली में मुख्य रूप से वोल्टेज के स्तर को बदलने के लिए किया जाता है। ट्रांसफार्मर के बिना, लंबी दूरी तक बिजली का संचरण करना अत्यधिक अक्षम और महंगा होगा।
ट्रांसमिशन में उपयोग
वोल्टेज बढ़ाना (स्टेप-अप): बिजली उत्पादन स्टेशनों पर, ट्रांसफार्मर वोल्टेज को बहुत उच्च स्तर (जैसे 400 kV) तक बढ़ा देते हैं। ऐसा करने से, बिजली संचरण के दौरान होने वाली ऊर्जा हानि ( लॉस ) कम हो जाती है।
वोल्टेज घटाना (स्टेप-डाउन): बिजली सबस्टेशनों पर, ट्रांसफार्मर वोल्टेज को कम करते हैं ताकि इसे स्थानीय वितरण नेटवर्क में भेजा जा सके और अंततः घरों और उद्योगों तक पहुंचाया जा सके।
वितरण में उपयोग
- सुरक्षित वोल्टेज: वितरण ट्रांसफार्मर का उपयोग उच्च वोल्टेज (जैसे 11 kV) को घरों और वाणिज्यिक भवनों के लिए सुरक्षित और उपयोग योग्य वोल्टेज (220V या 440V) में बदलने के लिए किया जाता है।
ट्रांसफार्मर के उपयोग से बिजली को कुशलतापूर्वक और सुरक्षित रूप से लंबी दूरी तक पहुंचाया जा सकता है, जिससे बिजली का वितरण और उपयोग दोनों संभव हो पाते हैं।
ट्रांसफार्मर की दक्षता (Efficiency) को उसके आउटपुट पावर और इनपुट पावर के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसे अक्सर प्रतिशत (%) में व्यक्त किया जाता है।
एक आदर्श ट्रांसफार्मर की दक्षता 100% होती है, लेकिन वास्तविक ट्रांसफार्मर में कुछ नुकसान (लॉस) होने के कारण यह हमेशा 100% से कम होती है।
ट्रांसफार्मर की दक्षता की गणना का सूत्र निम्नलिखित है:
जहां, हानि (लॉस) दो प्रकार की होती है:
- कोर लॉस (Core Loss) या लोहा लॉस (Iron Loss): यह ट्रांसफार्मर के कोर में होने वाली हानि है, जो ट्रांसफार्मर में वोल्टेज पर निर्भर करती है।
- कॉपर लॉस (Copper Loss): यह वाइंडिंग (कॉपर के तार) में होने वाली हानि है, जो लोड करंट पर निर्भर करती है।
क्योंकि ट्रांसफार्मर में घूमने वाले हिस्से नहीं होते, इसलिए इसमें अन्य विद्युत मशीनों की तुलना में घर्षण हानि (friction loss) नहीं होती, और यही कारण है कि इसकी दक्षता बहुत अधिक (95% से 99%) होती है।
पावर ट्रांसफॉर्मर को पूर्ण लोड पर अधिकतम दक्षता के लिए डिज़ाइन किया जाता है क्योंकि वे आमतौर पर पूर्ण लोड या उसके करीब काम करते हैं। इस डिज़ाइन का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जब ट्रांसफॉर्मर अपने सबसे आम ऑपरेटिंग पॉइंट पर काम कर रहा हो,
तो वह सबसे कम ऊर्जा हानि करे। यह ग्रिड में दक्षता को अधिकतम करता है और ऊर्जा लागत को कम करता है।
हानि का समीकरण
किसी ट्रांसफॉर्मर की दक्षता को उसके आउटपुट पावर और इनपुट पावर के अनुपात से परिभाषित किया जाता है:
यहाँ, कुल हानि दो मुख्य घटकों से बनी है:
- कोर हानि (P_i): ये हानियाँ ट्रांसफॉर्मर के कोर में होती हैं और स्थिर होती हैं, जिसका अर्थ है कि वे लोड के साथ नहीं बदलती हैं। इनमें हिस्टैरिसीस (hysteresis) और एड़ी करंट (eddy current) हानियाँ शामिल हैं, जो वोल्टेज पर निर्भर करती हैं।
- कॉपर हानि (P_{cu}): ये हानियाँ ट्रांसफॉर्मर की वाइंडिंग में होती हैं और लोड पर निर्भर करती हैं। वे वाइंडिंग में बहने वाली धारा के वर्ग के सीधे आनुपातिक होती हैं,
अधिकतम दक्षता के लिए शर्त
ट्रांसफॉर्मर की दक्षता तब अधिकतम होती है जब उसकी स्थिर हानियाँ (कोर हानि) उसके वेरिएबल हानियों (कॉपर हानि) के बराबर होती हैं:
P_i = P_{cu}
पावर ट्रांसफॉर्मर को इस शर्त को पूर्ण लोड के करीब पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। इसका मतलब है कि उनके कोर और वाइंडिंग सामग्री को इस तरह से संतुलित किया जाता है कि जब ट्रांसफॉर्मर अपनी पूर्ण-रेटेड धारा (full-rated current) ले जा रहा हो, तो कोर और कॉपर हानियाँ लगभग बराबर हों।
इसके विपरीत,
डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर (वितरण ट्रांसफॉर्मर) को आमतौर पर लगभग 50-70% लोड पर अधिकतम दक्षता के लिए डिज़ाइन किया जाता है क्योंकि वे पूरे दिन बदलते हुए लोड (जैसे घरों और व्यवसायों) पर काम करते हैं और शायद ही कभी पूर्ण लोड पर चलते हैं।
पावर ट्रांसफॉर्मर का मुख्य कार्य उच्च-वोल्टेज बिजली को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लंबी दूरी तक संचारित करना है। वे बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, और उप-स्टेशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रमुख अनुप्रयोग
पावर ट्रांसफॉर्मर के मुख्य अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:
- स्टेप-अप ऑपरेशन (Step-Up Operation): पावर प्लांट में, जनरेटर द्वारा उत्पादित कम वोल्टेज को स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर का उपयोग करके बहुत अधिक वोल्टेज (उदाहरण के लिए, 400 kV या 765 kV) तक बढ़ाया जाता है। ऐसा करने से ट्रांसमिशन लाइनों में ऊर्जा हानि (I^2R हानि) काफी कम हो जाती है, जिससे लंबी दूरी तक बिजली का संचरण अधिक कुशल और किफायती हो जाता है।
- स्टेप-डाउन ऑपरेशन (Step-Down Operation): ट्रांसमिशन लाइनों के अंत में, सबस्टेशनों में स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर का उपयोग उच्च वोल्टेज को कम करने के लिए किया जाता है। यह वोल्टेज को विभिन्न वितरण स्तरों (जैसे 33 kV या 11 kV) तक लाता है, ताकि इसे शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में सुरक्षित रूप से वितरित किया जा सके।
- ग्रिड इंटरकनेक्शन (Grid Interconnection): पावर ट्रांसफॉर्मर का उपयोग अलग-अलग वोल्टेज स्तर वाले पावर ग्रिडों को आपस में जोड़ने के लिए भी किया जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि बिजली विभिन्न क्षेत्रों के बीच कुशलतापूर्वक प्रवाहित हो सके और ग्रिड को अधिक स्थिर बनाया जा सके।
- औद्योगिक उपयोग (Industrial Use): बड़े औद्योगिक संयंत्रों में, उच्च-शक्ति वाले मोटर और उपकरण चलाने के लिए विशेष पावर ट्रांसफॉर्मर का उपयोग किया जाता है। ये ट्रांसफॉर्मर आवश्यक वोल्टेज और धारा की आपूर्ति करते हैं।
ट्रांसफॉर्मर का वोल्टेज विनियमन (Voltage Regulation) यह मापने का एक तरीका है कि जब उस पर लोड (load) डाला जाता है, तो उसके आउटपुट वोल्टेज में कितना बदलाव आता है।
यह दर्शाता है कि एक ट्रांसफॉर्मर कितनी अच्छी तरह से विभिन्न लोड स्थितियों के तहत एक स्थिर द्वितीयक वोल्टेज (secondary voltage) बनाए रख सकता है।
परिभाषा
वोल्टेज विनियमन को गणितीय रूप से नो-लोड वोल्टेज और फुल-लोड वोल्टेज के बीच के अंतर के प्रतिशत (percentage) के रूप में परिभाषित किया जाता है।
इसे इस सूत्र से दर्शाया जाता है:
जहाँ:
- V\_{NL} नो-लोड वोल्टेज (जब ट्रांसफॉर्मर पर कोई लोड नहीं होता) है।
- V\_{FL} फुल-लोड वोल्टेज (जब ट्रांसफॉर्मर अपनी पूर्ण-रेटेड धारा वहन कर रहा हो) है।
महत्व
एक आदर्श ट्रांसफॉर्मर का वोल्टेज विनियमन 0% होता है, जिसका मतलब है कि लोड की स्थिति में कोई भी बदलाव होने पर उसके आउटपुट वोल्टेज में कोई बदलाव नहीं आता है। हालांकि, वास्तविक ट्रांसफॉर्मर में वाइंडिंग प्रतिरोध (R) और लीकेज रिएक्टेंस (X) के कारण वोल्टेज ड्रॉप होता है, जिससे आउटपुट वोल्टेज घट जाता है।
एक कम वोल्टेज विनियमन (जो 0% के करीब हो) बेहतर माना जाता है, क्योंकि यह इंगित करता है कि ट्रांसफॉर्मर कनेक्टेड उपकरणों को अधिक स्थिर और विश्वसनीय वोल्टेज की आपूर्ति करता है।
पावर ट्रांसफॉर्मर के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:
- कोर (Core): यह ट्रांसफॉर्मर का केंद्रीय भाग होता है जो लेमिनेटेड स्टील शीट से बना होता है। इसका काम चुंबकीय प्रवाह (magnetic flux) के लिए एक रास्ता प्रदान करना है।
- वाइंडिंग (Windings): ये तांबे या एल्यूमीनियम के तारों के दो सेट होते हैं जो कोर के चारों ओर लपेटे होते हैं। एक को प्राथमिक वाइंडिंग (primary winding) और दूसरे को द्वितीयक वाइंडिंग (secondary winding) कहा जाता है। प्राथमिक वाइंडिंग को इनपुट सप्लाई से जोड़ा जाता है और द्वितीयक वाइंडिंग से आउटपुट लिया जाता है।
- इंसुलेटिंग सामग्री (Insulating Materials): ये वाइंडिंग को एक-दूसरे से और कोर से अलग रखने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट नहीं होता। इसमें मुख्य रूप से पेपर, प्रेसबोर्ड और ट्रांसफॉर्मर तेल का इस्तेमाल होता है।
- ट्रांसफॉर्मर तेल (Transformer Oil): यह एक विशेष प्रकार का खनिज तेल होता है जो ट्रांसफॉर्मर को ठंडा करने और इंसुलेशन प्रदान करने का काम करता है। यह ट्रांसफॉर्मर के अंदर की गर्मी को बाहर निकालने में मदद करता है।
- टैंक और बुशिंग (Tank and Bushings): टैंक एक बड़ा कंटेनर होता है जिसमें कोर और वाइंडिंग तेल में डूबे होते हैं। बुशिंग्स का उपयोग ट्रांसफॉर्मर को पावर ग्रिड से जोड़ने के लिए किया जाता है, जो उच्च वोल्टेज को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
- कूलिंग सिस्टम (Cooling System): ट्रांसफॉर्मर को ठंडा रखने के लिए इसमें पंखे और रेडिएटर (कूलिंग ट्यूब) लगे होते हैं। ये तेल को ठंडा करके ट्रांसफॉर्मर का तापमान सामान्य बनाए रखते हैं।
ट्रांसफार्मर में कोर का मुख्य कार्य प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के बीच चुंबकीय फ्लक्स के लिए एक रास्ता प्रदान करना है। यह चुंबकीय फ्लक्स को एक वाइंडिंग से दूसरी वाइंडिंग तक कुशलतापूर्वक स्थानांतरित करने में मदद करता है।
कोर के अन्य कार्य:
चुंबकीय युग्मन (Magnetic Coupling): कोर वाइंडिंग के बीच चुंबकीय युग्मन का काम करता है। यह सुनिश्चित करता है कि प्राइमरी वाइंडिंग में उत्पन्न होने वाला अधिकांश चुंबकीय फ्लक्स सेकेंडरी वाइंडिंग तक पहुंचे, जिससे ऊर्जा का स्थानांतरण प्रभावी ढंग से हो।
कम रिलक्टेंस पाथ: कोर कम रिलक्टेंस (कम चुंबकीय प्रतिरोध) का एक बंद रास्ता बनाता है। यह चुंबकीय फ्लक्स को आसानी से प्रवाहित होने देता है, जिससे फ्लक्स लीकेज (प्रवाह का रिसाव) कम होता है और ट्रांसफॉर्मर की दक्षता बढ़ती है।
हानि को कम करना: कोर को विशेष रूप से लैमिनेटेड (पतली शीट्स से बना हुआ) बनाया जाता है। ऐसा करने से इसमें होने वाली एडी करंट हानि (eddy current loss) और हिस्टेरेसिस हानि (hysteresis loss) को कम किया जा सकता है। ये हानियां ट्रांसफॉर्मर की कार्यक्षमता को प्रभावित करती हैं और गर्मी पैदा करती हैं।
कोर आमतौर पर सिलिकॉन स्टील जैसी चुंबकीय सामग्री से बनाया जाता है, क्योंकि इसकी पारगम्यता (permeability) बहुत अधिक होती है, जो चुंबकीय फ्लक्स को आसानी से प्रवाहित होने देती है।
ट्रांसफार्मर का कोर मुख्य रूप से सिलिकॉन स्टील से बना होता है। यह एक विशेष प्रकार का स्टील होता है जिसमें सिलिकॉन मिलाया जाता है, जिससे इसकी चुंबकीय और विद्युत गुणधर्म बेहतर हो जाते हैं।
सिलिकॉन स्टील का उपयोग क्यों किया जाता है?
कम हिस्टेरेसिस हानि (Low Hysteresis Loss): सिलिकॉन स्टील में चुंबकीय हिस्टेरेसिस हानि कम होती है, जिसका मतलब है कि जब चुंबकीय क्षेत्र बार-बार उलटता है तो ऊर्जा की कम हानि होती है। इससे ट्रांसफार्मर की दक्षता बढ़ती है
उच्च पारगम्यता (High Permeability): इसकी पारगम्यता बहुत अधिक होती है, जो चुंबकीय फ्लक्स को आसानी से कोर के माध्यम से प्रवाहित होने देती है। यह प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के बीच कुशल चुंबकीय युग्मन (magnetic coupling) सुनिश्चित करता है।
उच्च प्रतिरोधकता (High Resistivity): सिलिकॉन मिलाने से स्टील की विद्युत प्रतिरोधकता बढ़ जाती है। यह एडी करंट हानि (eddy current loss) को कम करने में मदद करता है। एडी करंट कोर के अंदर घूमने वाले छोटे-छोटे विद्युत धाराएं होती हैं जो गर्मी पैदा करती हैं और ऊर्जा बर्बाद करती हैं।
कम लागत (Low Cost): अन्य उच्च-प्रदर्शन वाली सामग्रियों की तुलना में सिलिकॉन स्टील अपेक्षाकृत सस्ता और आसानी से उपलब्ध है, जो इसे बड़े पैमाने पर ट्रांसफार्मर के निर्माण के लिए आदर्श बनाता है।
आमतौर पर,
ट्रांसफार्मर कोर को पतली सिलिकॉन स्टील शीट्स (laminations) से बनाया जाता है, जिन्हें एक-दूसरे से विद्युत रूप से इंसुलेट किया जाता है। यह लैमिनेटेड डिज़ाइन एडी करंट को और कम करने में मदद करता है, क्योंकि यह बड़े एडी करंट पाथ को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित कर देता है।
कोर प्रकार (core type) और शेल प्रकार (shell type) ट्रांसफार्मर के बीच मुख्य अंतर उनकी संरचना और वाइंडिंग की व्यवस्था में होता है।
कोर प्रकार ट्रांसफार्मर (Core Type Transformer)
इस प्रकार के ट्रांसफार्मर में, वाइंडिंग कोर को चारों ओर से घेरे रहती है। इसमें आमतौर पर दो लिंब (limbs) और दो योक (yokes) होते हैं, जो एक आयताकार फ्रेम बनाते हैं।
- संरचना: यह L-आकार की लैमिनेशन से बनता है।
- वाइंडिंग: प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग दोनों अलग-अलग लिंब पर होती हैं। पहले लो-वोल्टेज वाइंडिंग और फिर उसके ऊपर हाई-वोल्टेज वाइंडिंग लपेटी जाती है।
- चुंबकीय सर्किट: इसमें एक ही चुंबकीय सर्किट होता है।
- अनुप्रयोग: यह उच्च-वोल्टेज और उच्च-शक्ति वाले अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त है।
शेल प्रकार ट्रांसफार्मर (Shell Type Transformer)
इस प्रकार के ट्रांसफार्मर में, कोर वाइंडिंग को चारों ओर से घेरे रहता है। इसमें एक केंद्रीय लिंब और दो बाहरी लिंब होते हैं।
- संरचना: यह E और I-आकार की लैमिनेशन से बनता है।
- वाइंडिंग: प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग दोनों एक ही केंद्रीय लिंब पर होती हैं। वाइंडिंग एक के ऊपर एक रखी जाती है, जिसे सैंडविच वाइंडिंग (sandwich winding) कहा जाता है।
- चुंबकीय सर्किट: इसमें दो चुंबकीय सर्किट होते हैं जो केंद्रीय लिंब में उत्पन्न फ्लक्स को विभाजित करते हैं।
- अनुप्रयोग: यह कम-वोल्टेज और कम-शक्ति वाले अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इसमें फ्लक्स लीकेज कम होता है।
ट्रांसफार्मर में वाइंडिंग का मुख्य कार्य विद्युत ऊर्जा को एक सर्किट से दूसरे सर्किट में स्थानांतरित करना है। यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन के सिद्धांत पर काम करती है।
एक ट्रांसफार्मर में मुख्य रूप से दो वाइंडिंग होती हैं:
- प्राथमिक वाइंडिंग (Primary Winding): यह वाइंडिंग इनपुट वोल्टेज स्रोत से जुड़ी होती है। जब इसमें से प्रत्यावर्ती धारा (AC current) प्रवाहित होती है, तो यह कोर में एक बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) उत्पन्न करती है।
- द्वितीयक वाइंडिंग (Secondary Winding): यह वाइंडिंग लोड (जिस उपकरण को बिजली दी जाती है) से जुड़ी होती है। प्राथमिक वाइंडिंग द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र कोर के माध्यम से द्वितीयक वाइंडिंग तक पहुँचता है, जिससे इसमें वोल्टेज प्रेरित होता है और करंट प्रवाहित होता है।
वाइंडिंग के मुख्य कार्य:
- वोल्टेज रूपांतरण (Voltage Transformation): वाइंडिंग में मोड़ों (turns) की संख्या का अनुपात तय करता है कि ट्रांसफार्मर वोल्टेज को बढ़ाएगा (स्टेप-अप) या घटाएगा (स्टेप-डाउन)। यदि द्वितीयक वाइंडिंग में मोड़ों की संख्या प्राथमिक से अधिक है, तो यह एक स्टेप-अप ट्रांसफार्मर होता है, और यदि कम है, तो यह एक स्टेप-डाउन ट्रांसफार्मर होता है।
- ऊर्जा का स्थानांतरण (Energy Transfer): वाइंडिंग चुंबकीय युग्मन (magnetic coupling) के माध्यम से ऊर्जा को प्राइमरी साइड से सेकेंडरी साइड में स्थानांतरित करती है।
- सर्किट को अलग करना (Circuit Isolation): प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के बीच कोई सीधा विद्युत कनेक्शन नहीं होता। वाइंडिंग एक दूसरे से और कोर से इंसुलेटेड होती हैं, जो दोनों सर्किट को एक दूसरे से अलग रखता है और सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
ट्रांसफॉर्मर वाइंडिंग में तांबे (copper) और एल्यूमीनियम (aluminum) का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि ये दोनों ही उत्कृष्ट विद्युत चालक हैं। ये आसानी से बिजली को प्रवाहित होने देते हैं और ट्रांसफॉर्मर के कामकाज के लिए आवश्यक गुणों को पूरा करते हैं।
तांबा (Copper)
- उत्कृष्ट चालकता (Superior Conductivity): तांबा एल्यूमीनियम की तुलना में अधिक अच्छा विद्युत चालक है। इसका मतलब है कि समान मात्रा में करंट प्रवाहित करने के लिए तांबे के तार का व्यास (diameter) कम हो सकता है।
- उच्च यांत्रिक शक्ति (High Mechanical Strength): तांबे में एल्यूमीनियम की तुलना में अधिक यांत्रिक शक्ति होती है, जिससे यह शॉर्ट सर्किट के दौरान उत्पन्न होने वाले तनाव को बेहतर ढंग से झेल सकता है।
- कम क्रीप (Less Creep): तांबा गर्मी और दबाव में कम विरूपित (deform) होता है, जिससे कनेक्शन समय के साथ ढीले नहीं होते हैं।
- कम जंग (Less Corrosion): तांबा एल्यूमीनियम की तुलना में जंग और ऑक्सीकरण (oxidation) के प्रति अधिक प्रतिरोधी होता है।
एल्यूमीनियम (Aluminum)
- कम लागत (Lower Cost): एल्यूमीनियम तांबे की तुलना में काफी सस्ता होता है, जिससे बड़े ट्रांसफॉर्मर या कम लागत वाले अनुप्रयोगों के लिए यह एक किफायती विकल्प बन जाता है।
- हल्का वजन (Lighter Weight): एल्यूमीनियम तांबे की तुलना में बहुत हल्का होता है। यह बड़े ट्रांसफॉर्मर का कुल वजन कम करने में मदद करता है, जिससे परिवहन और स्थापना आसान हो जाती है।
- उच्च मात्रा (Higher Volume): समान चालकता प्राप्त करने के लिए, एल्यूमीनियम वाइंडिंग को तांबे की तुलना में अधिक मोटा बनाया जाता है, क्योंकि इसकी चालकता कम होती है।
दोनों सामग्रियों के फायदे और नुकसान होते हैं, और इनका चुनाव अक्सर ट्रांसफॉर्मर के अनुप्रयोग, लागत और वजन की ज़रूरतों पर निर्भर करता है।
ट्रांसफार्मर टैंक का मुख्य कार्य ट्रांसफार्मर के आंतरिक भागों को सुरक्षित रखना और उन्हें बाहरी वातावरण से बचाना है। यह एक मजबूत स्टील का कंटेनर होता है जिसमें कोर, वाइंडिंग और ट्रांसफार्मर तेल रखे जाते हैं।
ट्रांसफार्मर टैंक के प्रमुख कार्य
- सुरक्षा प्रदान करना: टैंक ट्रांसफार्मर के मुख्य हिस्सों (कोर और वाइंडिंग) को धूल, नमी, प्रदूषण और यांत्रिक क्षति (mechanical damage) से बचाता है।
- तेल को धारण करना: यह ट्रांसफार्मर तेल के लिए एक बड़ा भंडार (reservoir) का काम करता है। तेल ट्रांसफार्मर के अंदर के हिस्सों को ठंडा रखने और इंसुलेशन प्रदान करने में मदद करता है।
- गर्मी का संचलन (Heat Dissipation): टैंक की सतह और उस पर लगे रेडिएटर या कूलिंग ट्यूब्स, तेल के तापमान को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। गर्म तेल ऊपर आता है, ट्यूब्स से होकर गुजरता है, ठंडा होता है और फिर वापस टैंक में चला जाता है।
- संरचनात्मक आधार (Structural Foundation): टैंक ट्रांसफार्मर के सभी आंतरिक और बाहरी भागों को सहारा देता है।
एक ट्रांसफार्मर टैंक में कंजर्वेटर टैंक भी जुड़ा होता है। इसका काम ट्रांसफार्मर के लोड और तापमान में बदलाव के कारण तेल के आयतन (volume) में होने वाले फैलाव और संकुचन को समायोजित करना है। यह सुनिश्चित करता है कि मेन टैंक हमेशा तेल से भरा रहे।
कंजर्वेटर टैंक ट्रांसफार्मर के मुख्य टैंक के ऊपर लगा एक बेलनाकार टैंक होता है। इसे विस्तार टैंक (expansion tank) भी कहते हैं। इसका मुख्य कार्य ट्रांसफार्मर में मौजूद इन्सुलेटिंग तेल के आयतन में होने वाले बदलाव को समायोजित करना है।
जब ट्रांसफार्मर पर लोड बढ़ता है तो वाइंडिंग और कोर गर्म हो जाते हैं, जिससे तेल का तापमान भी बढ़ जाता है। गर्म होने पर तेल फैलता है और इसका आयतन बढ़ जाता है। कंजर्वेटर टैंक इस अतिरिक्त तेल को अपने अंदर ले लेता है, जिससे मुख्य टैंक में दबाव नहीं बढ़ता और ट्रांसफार्मर को कोई नुकसान नहीं होता। इसके विपरीत, जब तापमान कम होता है, तो तेल सिकुड़ता है और कंजर्वेटर टैंक से तेल वापस मुख्य टैंक में आ जाता है, जिससे टैंक हमेशा तेल से भरा रहता है।
यह टैंक तेल और बाहरी हवा के बीच सीधे संपर्क को भी कम करता है, जिससे तेल में नमी या धूल के प्रवेश को रोका जा सकता है।
ब्रीदर ट्रांसफार्मर के कंजर्वेटर टैंक से जुड़ा एक छोटा बेलनाकार डिवाइस है। इसे ट्रांसफार्मर का फेफड़ा भी कहा जाता है क्योंकि यह सांस लेने का काम करता है। इसका मुख्य कार्य वातावरण से आने वाली हवा में मौजूद नमी को अवशोषित करके ट्रांसफार्मर तेल को नमी से बचाना है।
ब्रीदर का कार्य
- नमी को अवशोषित करना: ट्रांसफार्मर के लोड में बदलाव होने पर तेल गर्म और ठंडा होता है, जिससे इसका आयतन (volume) घटता-बढ़ता है। जब तेल का आयतन घटता है, तो बाहर की हवा कंजर्वेटर टैंक में प्रवेश करती है। यह हवा नमी वाली होती है। ब्रीदर में भरा हुआ सिलिका जेल इस नमी को सोख लेता है, जिससे सूखी हवा ही टैंक के अंदर जा पाती है।
- तेल की इन्सुलेटिंग शक्ति बनाए रखना: नमी ट्रांसफार्मर तेल की इन्सुलेटिंग शक्ति को कम कर देती है, जिससे आंतरिक शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है। ब्रीदर इस खतरे को कम करके ट्रांसफार्मर के जीवन को बढ़ाता है।
सिलिका जेल का रंग
- नीला: जब सिलिका जेल सूखा और प्रभावी होता है।
- गुलाबी/सफेद: जब सिलिका जेल नमी सोख लेता है और अपनी क्षमता खो देता है। इस स्थिति में इसे बदलना या सुखाना पड़ता है।
जिस उपकरण में सिलिका जेल का उपयोग होता है, वह ट्रांसफार्मर का ब्रीदर है। ट्रांसफार्मर ब्रीदर में सिलिका जेल का उपयोग हवा से नमी को सोखने के लिए किया जाता है ताकि यह नमी ट्रांसफार्मर के अंदर न जा सके। यदि नमी अंदर चली जाती है, तो यह ट्रांसफार्मर के इन्सुलेटिंग तेल के गुणों को खराब कर देती है, जिससे ट्रांसफार्मर की कार्यक्षमता और जीवन काल कम हो जाता है।
ट्रांसफार्मर के ब्रीदर में सिलिका जेल का उपयोग उसके नमी-अवशोषक गुणधर्मों (moisture-absorbing properties) के कारण किया जाता है।
ट्रांसफार्मर में बुशिंग का मुख्य कार्य उच्च-वोल्टेज कंडक्टरों को ट्रांसफार्मर के टैंक से सुरक्षित रूप से अलग रखना है। ये एक तरह के इंसुलेटर (विद्युत रोधक) होते हैं जो बिजली के तारों को ट्रांसफार्मर के बाहरी आवरण (टैंक) से गुजरने देते हैं, जबकि यह सुनिश्चित करते हैं कि उच्च वोल्टेज सीधे टैंक के मेटल से संपर्क में न आए।
बुशिंग के कार्य
- इंसुलेशन (विद्युत रोधन): बुशिंग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ट्रांसफार्मर के टर्मिनल और ग्राउंडेड टैंक के बीच उच्च-वोल्टेज इन्सुलेशन प्रदान करना है। यदि बुशिंग न हो, तो उच्च-वोल्टेज सीधे टैंक को छूएगा, जिससे शॉर्ट सर्किट और बड़ा हादसा हो सकता है।
- यांत्रिक सहारा: बुशिंग ट्रांसफार्मर से आने वाले और बाहर जाने वाले कंडक्टरों को यांत्रिक सहारा भी प्रदान करती है। यह सुनिश्चित करती है कि कंडक्टर अपनी जगह पर स्थिर रहें और बाहरी तनाव या कंपन से प्रभावित न हों।
- सुरक्षित कनेक्शन: ये बाहरी पावर ग्रिड लाइनों को ट्रांसफार्मर के आंतरिक वाइंडिंग से सुरक्षित रूप से जोड़ने के लिए एक रास्ता प्रदान करती हैं।
आमतौर पर,
बुशिंग पोर्सिलेन, एपॉक्सी राल या कंपोजिट सामग्री से बनी होती हैं। उनकी संरचना और आकार वोल्टेज स्तर पर निर्भर करता है—उच्च वोल्टेज के लिए लंबी और अधिक जटिल बुशिंग का उपयोग किया जाता है।
बुचोलज़ रिले (Buchholz relay) एक गैस-चालित सुरक्षा उपकरण है जिसका उपयोग बड़े तेल-निमज्जित ट्रांसफार्मर और इंडक्टर्स को आंतरिक दोषों से बचाने के लिए किया जाता है। इसका नाम जर्मन आविष्कारक मैक्स बुचोलज़ के नाम पर रखा गया है।
कार्य और उपयोग
बुचोलज़ रिले का उपयोग ट्रांसफार्मर के मुख्य टैंक और कंजर्वेटर टैंक के बीच की पाइपलाइन में किया जाता है। यह ट्रांसफार्मर के भीतर होने वाली छोटी-बड़ी खराबी का पता लगाता है, जैसे:
- अल्प-वोल्टेज दोष (Minor Faults): जब ट्रांसफार्मर में कोई छोटी खराबी (जैसे कोर का गर्म होना या इंसुलेशन में खराबी) होती है, तो तेल में गैस के बुलबुले बनने लगते हैं। ये बुलबुले रिले के ऊपरी हिस्से में जमा हो जाते हैं, जिससे एक फ्लोट (float) नीचे झुक जाता है और एक अलार्म सर्किट को सक्रिय करता है।
- गंभीर दोष (Major Faults): जब कोई बड़ी खराबी (जैसे वाइंडिंग में शॉर्ट सर्किट) होती है, तो बड़ी मात्रा में गैस तेजी से बनती है। यह गैस तेल को बहुत तेजी से कंजर्वेटर टैंक की ओर धकेलती है। इस प्रवाह के कारण रिले के अंदर एक और फ्लोट नीचे झुक जाता है, जिससे एक सर्किट ब्रेकर सक्रिय होता है और ट्रांसफार्मर को तुरंत बंद कर देता है, जिससे बड़े नुकसान से बचा जा सके।
यह रिले ट्रांसफार्मर के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपकरण है, क्योंकि यह शुरुआती चरणों में ही दोषों का पता लगा लेता है, जिससे समय रहते कार्रवाई की जा सकती है।
विस्फोट वेंट (explosion vent) एक सुरक्षा उपकरण है जिसका उपयोग ट्रांसफार्मर में दबाव को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। यह ट्रांसफार्मर को आंतरिक दबाव के कारण होने वाले विस्फोट से बचाता है।
कार्यप्रणाली
जब ट्रांसफार्मर में कोई गंभीर खराबी आती है (जैसे कि शॉर्ट सर्किट), तो बहुत तेज़ी से गर्मी पैदा होती है। यह गर्मी ट्रांसफार्मर तेल को वाष्पित करती है और बड़ी मात्रा में गैसें उत्पन्न होती हैं, जिससे ट्रांसफार्मर के अंदर का दबाव बहुत बढ़ जाता है।
विस्फोट वेंट इस बढ़े हुए दबाव को एक सुरक्षित स्तर पर बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह एक पाइप जैसा होता है जिसके ऊपर एक पतली डायाफ्राम (diaphragm) या प्लेट लगी होती है। जब ट्रांसफार्मर के अंदर का दबाव एक पूर्व निर्धारित (pre-determined) सीमा से अधिक हो जाता है, तो यह डायाफ्राम फट जाती है, जिससे अतिरिक्त गैसें और तेल बाहर निकल जाते हैं।
यह दबाव कम होने से ट्रांसफार्मर का टैंक फटने से बच जाता है, जिससे आसपास के उपकरणों और कर्मचारियों को संभावित नुकसान से बचाया जा सकता है। यह एक निष्क्रिय (passive) सुरक्षा उपकरण है, जिसका मतलब है कि यह दबाव बढ़ने पर खुद ही काम करता है, और इसे किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता नहीं होती।
ट्रांसफार्मर म्यूचुअल इंडक्शन (mutual induction) के सिद्धांत पर काम करता है। यह सिद्धांत कहता है कि जब एक कॉइल (प्राथमिक वाइंडिंग) में बहने वाली धारा में परिवर्तन होता है, तो इसके पास स्थित दूसरी कॉइल (द्वितीयक वाइंडिंग) में एक वोल्टेज प्रेरित (induced) होता है।
सिद्धांत की कार्यप्रणाली
चुंबकीय फ्लक्स का निर्माण: जब ट्रांसफार्मर की प्राथमिक वाइंडिंग में प्रत्यावर्ती धारा (AC current) प्रवाहित होती है, तो यह एक बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र (varying magnetic field) उत्पन्न करती है।
चुंबकीय फ्लक्स का स्थानांतरण: यह चुंबकीय क्षेत्र ट्रांसफार्मर के कोर से होकर गुजरता है और द्वितीयक वाइंडिंग तक पहुँचता है। कोर का काम इस चुंबकीय फ्लक्स के लिए एक कम प्रतिरोध (low reluctance) वाला रास्ता प्रदान करना है।
वोल्टेज का प्रेरण: फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम (Faraday's Law of Electromagnetic Induction) के अनुसार, जब द्वितीयक वाइंडिंग से गुजरने वाले चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो इसमें एक वोल्टेज प्रेरित होता है। इस प्रेरित वोल्टेज की मात्रा प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग में मोड़ों (turns) की संख्या के अनुपात पर निर्भर करती है।
यदि द्वितीयक वाइंडिंग में मोड़ों की संख्या प्राथमिक से अधिक है, तो आउटपुट वोल्टेज इनपुट वोल्टेज से अधिक होगा (स्टेप-अप ट्रांसफार्मर)। यदि मोड़ों की संख्या कम है, तो आउटपुट वोल्टेज कम होगा (स्टेप-डाउन ट्रांसफार्मर)। इस तरह, ट्रांसफार्मर एक सर्किट से दूसरे सर्किट में ऊर्जा को कुशलतापूर्वक स्थानांतरित करता है, बिना किसी प्रत्यक्ष विद्युत कनेक्शन के।
ट्रांसफार्मर को स्थिर उपकरण (static device) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें कोई घूमने वाला भाग नहीं होता है। यह एक ही जगह पर स्थिर रहकर काम करता है।
इसका कार्य सिद्धांत, जो कि म्यूचुअल इंडक्शन पर आधारित है, केवल चुंबकीय फ्लक्स और वाइंडिंग के बीच परस्पर क्रिया पर निर्भर करता है। इसमें मोटर या जनरेटर की तरह कोई रोटेटिंग शाफ्ट, आर्मेचर या कम्यूटेटर नहीं होता। इसी कारण, इसमें घर्षण (friction) और यांत्रिक हानि (mechanical losses) नहीं होती, और इसका रख-रखाव भी कम होता है।
ट्रांसफार्मर का EMF (इलेक्ट्रोमोटिव फोर्स) समीकरण ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग में प्रेरित होने वाले वोल्टेज के RMS (रूट-मीन-स्क्वायर) मान को दर्शाता है। यह फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम से प्राप्त किया गया है।
प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग के लिए समीकरण
इस समीकरण का उपयोग करके हम प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग में प्रेरित होने वाले वोल्टेज की गणना कर सकते हैं:
इन समीकरणों से पता चलता है कि प्रेरित होने वाला वोल्टेज इनपुट आवृत्ति, वाइंडिंग में मोड़ों की संख्या और कोर के अधिकतम चुंबकीय फ्लक्स पर निर्भर करता है।
ट्रांसफार्मर का मूल्यांकन किलोवाट (kW) के बजाय किलोवोल्ट-एम्पीयर (kVA) में करने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- लोड का पावर फैक्टर अज्ञात होता है: एक ट्रांसफार्मर निर्माता को यह नहीं पता होता कि भविष्य में ट्रांसफार्मर पर किस प्रकार का लोड जोड़ा जाएगा। लोड का प्रकार (प्रतिरोधक, प्रेरक, या संधारित) उसके पावर फैक्टर को निर्धारित करता है। kW लोड के पावर फैक्टर पर निर्भर करता है (kW = kVA \times Power Factor), जबकि kVA (आभासी शक्ति) लोड के पावर फैक्टर से स्वतंत्र होता है। इसलिए, kVA में रेटिंग देने से ट्रांसफार्मर किसी भी प्रकार के लोड के लिए उपयुक्त हो जाता है।
-
हानियां वोल्टेज और करंट पर निर्भर करती हैं: ट्रांसफार्मर में होने वाली हानियाँ, जिन्हें तापन हानियाँ भी कहते हैं, दो प्रकार की होती हैं:
- कोर लॉस (आयरन लॉस): यह लॉस ट्रांसफार्मर के वोल्टेज पर निर्भर करता है।
- कॉपर लॉस: यह लॉस वाइंडिंग में बहने वाले करंट पर निर्भर करता है।
चूंकि ये दोनों हानियां केवल वोल्टेज और करंट पर निर्भर करती हैं, न कि लोड के पावर फैक्टर पर, इसलिए ट्रांसफार्मर को kVA (जो वोल्टेज और करंट का गुणनफल है) में रेट करना सबसे तार्किक है।
सरल शब्दों में,
निर्माता ट्रांसफार्मर की अधिकतम वोल्ट-एम्पीयर (VA) क्षमता बताता है जो यह सुरक्षित रूप से संभाल सकता है, क्योंकि इससे होने वाली गर्मी (हानि) इसी पर निर्भर करती है। kW रेटिंग लोड के प्रकार के अनुसार बदल जाएगी, इसलिए यह एक स्थिर या विश्वसनीय माप नहीं है।
जब ट्रांसफार्मर को डीसी (DC) सप्लाई पर चलाया जाता है, तो यह काम नहीं करता और कुछ ही समय में जल जाता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ट्रांसफार्मर म्यूचुअल इंडक्शन के सिद्धांत पर काम करता है, जिसके लिए एक परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स (changing magnetic flux) की आवश्यकता होती है।
- कोई प्रेरित वोल्टेज नहीं: एसी (AC) सप्लाई में करंट लगातार अपनी दिशा और मान बदलता रहता है, जिससे एक परिवर्तनशील चुंबकीय फ्लक्स बनता है। यह फ्लक्स द्वितीयक वाइंडिंग में वोल्टेज को प्रेरित करता है। इसके विपरीत, डीसी सप्लाई का करंट स्थिर होता है, जिससे एक स्थिर चुंबकीय फ्लक्स बनता है। यह स्थिर फ्लक्स द्वितीयक वाइंडिंग में कोई वोल्टेज प्रेरित नहीं करता।
- वाइंडिंग का जलना: ट्रांसफार्मर की प्राथमिक वाइंडिंग का प्रतिरोध बहुत कम होता है। एसी सप्लाई में, इंडक्टिव रिएक्टेंस (प्रेरक प्रतिघात) करंट के प्रवाह को सीमित करता है। लेकिन डीसी के लिए, कोई इंडक्टिव रिएक्टेंस नहीं होता (क्योंकि आवृत्ति शून्य होती है)। इसलिए, जब डीसी सप्लाई दी जाती है, तो वाइंडिंग के कम प्रतिरोध के कारण बहुत अधिक करंट प्रवाहित होता है। यह अत्यधिक करंट वाइंडिंग में बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा करता है, जिससे इंसुलेशन पिघल जाता है और वाइंडिंग जल जाती है।
इसलिए,
ट्रांसफार्मर को केवल एसी सप्लाई के लिए डिज़ाइन किया गया है और इसे डीसी पर कभी नहीं चलाना चाहिए।
ट्रांसफार्मर का ध्रुवता परीक्षण (Polarity Test) यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि प्राथमिक (primary) और द्वितीयक (secondary) वाइंडिंग में प्रेरित वोल्टेज एक ही दिशा में है या विपरीत दिशा में। यह परीक्षण यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि जब ट्रांसफार्मर को समानांतर (parallel) में जोड़ा जाए तो कोई शॉर्ट सर्किट न हो।
ध्रुवता के प्रकार
- योगात्मक ध्रुवता (Additive Polarity): जब प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग में प्रेरित वोल्टेज एक ही दिशा में होते हैं, तो कुल वोल्टेज दोनों वाइंडिंग के वोल्टेज का योग होता है।
- घटात्मक ध्रुवता (Subtractive Polarity): जब प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग में प्रेरित वोल्टेज विपरीत दिशा में होते हैं, तो कुल वोल्टेज दोनों वाइंडिंग के वोल्टेज का अंतर होता है।
परीक्षण विधि
यह परीक्षण एक साधारण वोल्टमीटर का उपयोग करके किया जाता है।
- ट्रांसफार्मर की प्राथमिक वाइंडिंग को एक कम वोल्टेज वाले एसी स्रोत से जोड़ें।
- प्राथमिक वाइंडिंग के एक टर्मिनल को द्वितीयक वाइंडिंग के एक टर्मिनल से जोड़ें।
- अब, दो खुले टर्मिनलों के बीच (प्राथमिक का दूसरा और द्वितीयक का दूसरा) एक वोल्टमीटर जोड़ें।
- वोल्टमीटर की रीडिंग को रिकॉर्ड करें।
परिणाम:
- यदि वोल्टमीटर की रीडिंग प्राथमिक वाइंडिंग के वोल्टेज के योग के बराबर है, तो यह योगात्मक ध्रुवता है।
- यदि वोल्टमीटर की रीडिंग प्राथमिक वाइंडिंग के वोल्टेज के अंतर के बराबर है, तो यह घटात्मक ध्रुवता है।
घटात्मक ध्रुवता को आमतौर पर बड़े ट्रांसफार्मर के लिए पसंद किया जाता है क्योंकि यह बस बार और स्विचगियर की लागत को कम करता है।
ट्रांसफार्मर का वेक्टर समूह (Vector Group) एक संकेतन प्रणाली है जिसका उपयोग तीन-फेज ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग कनेक्शन (जैसे डेल्टा या स्टार) और उनके बीच के फेज शिफ्ट (phase shift) को दर्शाने के लिए किया जाता है। यह ट्रांसफार्मर के प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के बीच वोल्टेज संबंधों को बताता है।
वेक्टर समूह का महत्व
वेक्टर समूह का सही पता होना कई कारणों से महत्वपूर्ण है:
- समानांतर संचालन (Parallel Operation): जब दो या दो से अधिक ट्रांसफार्मर को समानांतर में जोड़ना होता है, तो उनका वेक्टर समूह समान होना अनिवार्य है। यदि वेक्टर समूह अलग हो, तो सर्कुलेटिंग करंट प्रवाहित होगा, जो ट्रांसफार्मर को गर्म करके नुकसान पहुंचा सकता है।
- सिस्टम की सुरक्षा: यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि ट्रांसफार्मर सिस्टम के बाकी हिस्सों के साथ सही ढंग से जुड़े हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट और अन्य दोषों से बचा जा सके।
वेक्टर समूह संकेतन
यह चार भागों वाले एक कोड से दर्शाया जाता है, जैसे 'Dyn11'। आइए इस कोड को समझते हैं:
-
पहला अक्षर (D): प्राथमिक वाइंडिंग का कनेक्शन प्रकार बताता है।
- D: डेल्टा कनेक्शन
- Y: स्टार (या वाई) कनेक्शन
- Z: जिग-जैग कनेक्शन
-
दूसरा अक्षर (y): द्वितीयक वाइंडिंग का कनेक्शन प्रकार बताता है।
- d: डेल्टा कनेक्शन
- y: स्टार (या वाई) कनेक्शन
- z: जिग-जैग कनेक्शन
- तीसरा अक्षर (n): न्यूट्रल पॉइंट (neutral point) की स्थिति बताता है।
- n: द्वितीयक वाइंडिंग का न्यूट्रल टर्मिनल बाहर निकाला गया है (grounded)।
-
संख्या (11): प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग के वोल्टेज के बीच फेज शिफ्ट को दर्शाता है। यह 0 से 11 तक होता है, जहाँ प्रत्येक संख्या 30 डिग्री के फेज शिफ्ट का प्रतिनिधित्व करती है।
- 0: कोई फेज शिफ्ट नहीं (0°)।
- 11: 330° का फेज शिफ्ट (या -30°)।
यह संकेतन ट्रांसफार्मर की विद्युत विशेषताओं को स्पष्ट करता है, जिससे इसका सही उपयोग और सुरक्षित स्थापना सुनिश्चित होती है।
ट्रांसफार्मरों का समानांतर संचालन (parallel operation) इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करता है जो एक अकेले बड़े ट्रांसफार्मर से संभव नहीं होते हैं।
समानांतर संचालन के लाभ
- लोड की बढ़ती हुई मांग को पूरा करना (Meeting Increased Load Demand): यदि किसी क्षेत्र में बिजली की मांग बढ़ जाती है, तो एक नया ट्रांसफार्मर मौजूदा ट्रांसफार्मर के साथ समानांतर में जोड़कर कुल बिजली आपूर्ति को बढ़ाया जा सकता है। यह एक बड़े ट्रांसफार्मर को बदलने की तुलना में अधिक लागत प्रभावी होता है।
- विश्वसनीयता (Reliability): यदि किसी कारण से एक ट्रांसफार्मर में खराबी आ जाती है, तो उसे सेवा से बाहर निकाला जा सकता है, जबकि अन्य ट्रांसफार्मर बिजली की आपूर्ति जारी रखते हैं। इससे बिजली सेवा में रुकावट (interruption) कम होती है।
- दक्षता में सुधार (Improved Efficiency): जब लोड कम होता है, तो कम संख्या में ट्रांसफार्मर चलाए जा सकते हैं, जिससे वे अपनी अधिकतम दक्षता पर काम करते हैं। एक ही बड़े ट्रांसफार्मर को हल्के लोड पर चलाने से उसकी दक्षता कम हो जाती है।
- रखरखाव में आसानी (Ease of Maintenance): एक ट्रांसफार्मर को नियमित रखरखाव के लिए बंद किया जा सकता है जबकि अन्य ट्रांसफार्मर लोड की आपूर्ति करते रहते हैं, जिससे बिना बिजली कटौती के काम करना संभव हो जाता है।
- परिवहन और स्थापना में आसानी (Ease of Transportation and Installation): कई छोटे ट्रांसफार्मरों को एक बड़े ट्रांसफार्मर की तुलना में अधिक आसानी से परिवहन और स्थापित किया जा सकता है।
समानांतर संचालन के लिए आवश्यक शर्तें
समानांतर संचालन के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें पूरी होनी चाहिए:
- समान वोल्टेज अनुपात (Same Voltage Ratio): दोनों ट्रांसफार्मर का वोल्टेज अनुपात समान होना चाहिए।
- समान प्रतिशत प्रतिबाधा (Same Percentage Impedance): दोनों ट्रांसफार्मर की प्रतिशत प्रतिबाधा समान होनी चाहिए ताकि लोड दोनों में समान रूप से वितरित हो सके।
- समान ध्रुवता (Same Polarity): दोनों ट्रांसफार्मर की ध्रुवता समान होनी चाहिए।
- समान वेक्टर समूह (Same Vector Group): तीन-फेज ट्रांसफार्मर के लिए वेक्टर समूह समान होना चाहिए ताकि कोई सर्कुलेटिंग करंट प्रवाहित न हो।
ट्रांसफार्मरों के समानांतर संचालन के लिए, सुरक्षा और दक्षता सुनिश्चित करने हेतु कुछ आवश्यक शर्तों का पूरा होना महत्वपूर्ण है। यदि इन शर्तों का पालन नहीं किया जाता, तो यह सर्कुलेटिंग करंट का कारण बन सकता है, जिससे ट्रांसफार्मर गर्म हो सकता है और अंततः क्षतिग्रस्त हो सकता है।
यहाँ समानांतर संचालन के लिए आवश्यक शर्तें दी गई हैं:
- समान वोल्टेज अनुपात (Same Voltage Ratio): दोनों ट्रांसफार्मर का वोल्टेज अनुपात (जैसे 11kV/415V) बिल्कुल समान होना चाहिए। यदि वोल्टेज अनुपात अलग-अलग होगा, तो द्वितीयक वाइंडिंग में प्रेरित वोल्टेज में अंतर होगा, जिससे ट्रांसफार्मरों के बीच एक सर्कुलेटिंग करंट प्रवाहित होगा।
- समान प्रतिशत प्रतिबाधा (Same Percentage Impedance): दोनों ट्रांसफार्मरों की प्रतिशत प्रतिबाधा समान होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होता है कि लोड दोनों ट्रांसफार्मरों के बीच उनकी kVA रेटिंग के अनुपात में वितरित हो। यदि प्रतिबाधा में अंतर है, तो कम प्रतिबाधा वाला ट्रांसफार्मर अधिक लोड उठाएगा, जो उसे ओवरलोड कर सकता है।
- समान ध्रुवता (Same Polarity): दोनों ट्रांसफार्मरों की ध्रुवता (पोलैरिटी) समान होनी चाहिए। यदि ध्रुवता अलग हो, तो दोनों ट्रांसफार्मरों के वोल्टेज जुड़ जाएंगे, जिससे एक बड़ा सर्कुलेटिंग करंट प्रवाहित होगा, जो शॉर्ट सर्किट का कारण बन सकता है।
- समान वेक्टर समूह (Same Vector Group): तीन-फेज ट्रांसफार्मर के लिए, वेक्टर समूह का समान होना अनिवार्य है। यह सुनिश्चित करता है कि प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के बीच फेज शिफ्ट समान हो, जिससे सर्कुलेटिंग करंट से बचा जा सके।
नोट:
समान kVA रेटिंग की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन यह वांछनीय है। यदि रेटिंग अलग-अलग है, तो लोड प्रतिशत प्रतिबाधा के आधार पर वितरित होगा।
ट्रांसफार्मर के विभिन्न शीतलन विधियाँ निम्नलिखित हैं:
1. तेल प्राकृतिक, वायु प्राकृतिक (ONAN)
यह सबसे सामान्य और सरल शीतलन विधि है।
- कार्यप्रणाली: ट्रांसफार्मर के कोर और वाइंडिंग तेल में डूबे होते हैं। जब ट्रांसफार्मर गर्म होता है, तो तेल में संवहन धाराएँ (convection currents) उत्पन्न होती हैं। गर्म तेल ऊपर उठता है, टैंक की दीवारों और रेडिएटर से होकर गुजरता है और ठंडा होकर नीचे आता है। इस प्रक्रिया में, रेडिएटर की सतह के संपर्क में आने वाली हवा भी प्राकृतिक रूप से गर्म होकर ऊपर उठती है, जिससे तेल ठंडा होता रहता है।
- उपयोग: यह विधि आमतौर पर 500 kVA तक के छोटे और मध्यम आकार के ट्रांसफार्मरों में उपयोग की जाती है।
2. तेल प्राकृतिक, वायु बलित (ONAF)
यह विधि तब उपयोग की जाती है जब ONAN अपर्याप्त होता है।
- कार्यप्रणाली: यह ONAN विधि के समान है, लेकिन इसमें अतिरिक्त पंखे (fans) लगाए जाते हैं जो रेडिएटर पर हवा को तेजी से धकेलते हैं। पंखे हवा के प्रवाह को बढ़ाते हैं, जिससे तेल की शीतलन दर बढ़ जाती है।
- उपयोग: यह 500 kVA से लेकर 5000 kVA तक के ट्रांसफार्मरों में उपयोग की जाती है।
3. तेल बलित, वायु बलित (OFAF)
यह विधि बहुत बड़े और उच्च-रेटिंग वाले ट्रांसफार्मरों के लिए है।
- कार्यप्रणाली: इसमें पंखों के साथ-साथ तेल पंप भी लगाए जाते हैं। तेल पंप गर्म तेल को मुख्य टैंक से खींचकर जबरदस्ती (forcibly) रेडिएटर के माध्यम से प्रवाहित करते हैं, जिससे शीतलन प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती है। पंखे रेडिएटर को और अधिक ठंडा करते हैं।
- उपयोग: इसका उपयोग 5000 kVA से अधिक रेटिंग वाले बड़े पावर ट्रांसफार्मरों में किया जाता है।
4. तेल बलित, जल बलित (OFWF)
यह सबसे शक्तिशाली शीतलन विधियों में से एक है।
- कार्यप्रणाली: इसमें तेल को एक हीट एक्सचेंजर में पंप किया जाता है, जहाँ से ठंडा पानी गुजरता है। यह पानी तेल से गर्मी को अवशोषित करता है, जिससे तेल तेजी से ठंडा होता है।
- उपयोग: यह बहुत बड़े ट्रांसफार्मरों, जैसे कि पनबिजली स्टेशनों और बहुत उच्च-वोल्टेज सबस्टेशनों में उपयोग की जाती है।
5. वायु प्राकृतिक, वायु प्राकृतिक (ANAN)
यह विधि सूखे प्रकार के ट्रांसफार्मरों (dry type transformers) के लिए है।
- कार्यप्रणाली: इन ट्रांसफार्मरों में तेल का उपयोग नहीं किया जाता। कोर और वाइंडिंग सीधे हवा द्वारा ठंडे किए जाते हैं, जो प्राकृतिक संवहन के माध्यम से प्रवाहित होती है।
- उपयोग: ये ट्रांसफार्मर आमतौर पर उन स्थानों पर लगाए जाते हैं जहाँ तेल का रिसाव एक जोखिम हो सकता है, जैसे कि इमारतों के अंदर।
ONAN का मतलब तेल प्राकृतिक, वायु प्राकृतिक (Oil Natural, Air Natural) है। यह ट्रांसफार्मर को ठंडा रखने की एक सबसे सामान्य और सरल विधि है।
कार्यप्रणाली
ONAN विधि में, ट्रांसफार्मर को ठंडा करने के लिए किसी बाहरी पंप या पंखे का उपयोग नहीं किया जाता। यह पूरी तरह से प्राकृतिक संवहन (natural convection) पर निर्भर करती है।
- जब ट्रांसफार्मर पर लोड बढ़ता है, तो वाइंडिंग और कोर गर्म हो जाते हैं, जिससे उनके संपर्क में आने वाला ट्रांसफार्मर तेल भी गर्म होता है।
- गर्म होने पर, तेल का घनत्व कम हो जाता है और यह ऊपर की ओर उठता है।
- यह गर्म तेल ट्रांसफार्मर के टैंक के ऊपरी हिस्से और उससे जुड़े रेडिएटर (कूलिंग ट्यूब) में प्रवेश करता है।
- जैसे ही तेल रेडिएटर से गुजरता है, यह रेडिएटर की सतह के संपर्क में आता है।
- रेडिएटर की बाहरी सतह हवा के संपर्क में होती है, जो प्राकृतिक रूप से गर्म होकर ऊपर उठती है, और ठंडी हवा उसकी जगह लेती है। इस तरह, रेडिएटर के माध्यम से गर्मी हवा में स्थानांतरित हो जाती है।
- ठंडा हुआ तेल भारी होकर वापस नीचे आता है और मुख्य टैंक के निचले हिस्से में चला जाता है, जहाँ से यह फिर से वाइंडिंग को ठंडा करने के लिए ऊपर की ओर बढ़ता है।
यह चक्र लगातार चलता रहता है, जिससे ट्रांसफार्मर का तापमान एक सुरक्षित सीमा के भीतर बना रहता है। यह विधि 500 kVA तक के छोटे और मध्यम आकार के ट्रांसफार्मरों के लिए प्रभावी होती है।
ONAF का मतलब तेल प्राकृतिक, वायु बलित (Oil Natural, Air Forced) है। यह ट्रांसफार्मर को ठंडा करने की एक विधि है जो ONAN (तेल प्राकृतिक, वायु प्राकृतिक) की तुलना में अधिक प्रभावी होती है।
कार्यप्रणाली
ONAF विधि में, तेल का संचलन (movement) अभी भी प्राकृतिक संवहन द्वारा ही होता है, लेकिन वायु प्रवाह को पंखों (fans) का उपयोग करके बढ़ाया जाता है।
रेडिएटर पर लगे पंखे हवा को जबरदस्ती (forcibly) रेडिएटर की सतह पर धकेलते हैं। यह तेज हवा रेडिएटर से गर्मी को अधिक कुशलता से हटाती है।
जब ट्रांसफार्मर पर लोड बढ़ता है, तो आंतरिक गर्मी के कारण तेल गर्म होकर ऊपर उठता है और रेडिएटर से होकर गुजरता है।
तेजी से ठंडा हुआ तेल वापस मुख्य टैंक में चला जाता है, जिससे शीतलन प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती है।
यह विधि तब उपयोग की जाती है जब ट्रांसफार्मर को अधिक लोड पर चलाया जाता है और ONAN विधि पर्याप्त नहीं होती। ONAN की तुलना में, ONAF विधि ट्रांसफार्मर की लोड वहन क्षमता को लगभग 20% तक बढ़ा सकती है क्योंकि यह अधिक गर्मी को हटा सकती है। यह 500 kVA से लेकर 5000 kVA तक के मध्यम से बड़े ट्रांसफार्मरों में आम है।
OFAF और ODAF दोनों ही ट्रांसफार्मर को ठंडा करने की उन्नत विधियाँ हैं, जो बहुत बड़े ट्रांसफार्मरों में उपयोग की जाती हैं। इन दोनों में ही तेल और हवा दोनों को जबरदस्ती सर्कुलेट किया जाता है।
OFAF (तेल बलित, वायु बलित)
OFAF का मतलब है Oil Forced, Air Forced। यह बहुत बड़े और उच्च-रेटिंग वाले ट्रांसफार्मरों में उपयोग की जाती है।
- कार्यप्रणाली: इस विधि में, एक पंप का उपयोग करके ट्रांसफार्मर के तेल को जबरदस्ती मुख्य टैंक से खींचकर रेडिएटर या हीट एक्सचेंजर में प्रवाहित किया जाता है। साथ ही, रेडिएटर पर लगे पंखे हवा को रेडिएटर की सतह पर तेजी से धकेलते हैं। इससे तेल और हवा दोनों का प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे गर्मी का संचलन और शीतलन बहुत प्रभावी ढंग से होता है।
- उपयोग: यह विधि आमतौर पर 5000 kVA से अधिक रेटिंग वाले बड़े पावर ट्रांसफार्मरों में उपयोग की जाती है।
ODAF (तेल निर्देशित, वायु बलित)
ODAF का मतलब है Oil Directed, Air Forced। यह OFAF का एक उन्नत संस्करण है।
- कार्यप्रणाली: इस विधि में, OFAF की तरह ही, तेल को एक पंप द्वारा बलपूर्वक सर्कुलेट किया जाता है और हवा को पंखों द्वारा रेडिएटर पर धकेला जाता है। हालाँकि, ODAF में एक अतिरिक्त सुविधा होती है: तेल को विशेष चैनलों या डक्ट्स के माध्यम से सीधे वाइंडिंग और कोर के पास निर्देशित किया जाता है। यह निर्देशित प्रवाह गर्मी को सीधे स्रोत से हटाता है, जिससे शीतलन दक्षता बहुत बढ़ जाती है।
- उपयोग: यह सबसे उच्च-क्षमता वाले ट्रांसफार्मरों में उपयोग की जाती है, जहाँ सामान्य OFAF विधि भी पर्याप्त नहीं होती। यह ट्रांसफार्मर के गर्म स्थानों को अधिक कुशलता से ठंडा करती है।
ट्रांसफार्मर का ठंडा होना बेहद ज़रूरी है क्योंकि यह उसे ज़्यादा गरम होने से बचाता है। जब ट्रांसफार्मर काम करता है, तो उसमें से गर्मी निकलती है, खासकर उसके कोर (core) और कॉइल (coil) में। यह गर्मी मुख्य रूप से लौह हानि (iron losses) और ताम्र हानि (copper losses) के कारण उत्पन्न होती है। अगर इस गर्मी को ठीक से बाहर न निकाला जाए, तो ट्रांसफार्मर का तापमान बहुत बढ़ जाएगा।
अत्यधिक गर्मी के जोखिम
अगर ट्रांसफार्मर बहुत ज़्यादा गर्म हो जाए, तो कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं:
- इंसुलेशन का खराब होना: ट्रांसफार्मर के कॉइल पर जो इंसुलेशन लगा होता है, वह गर्मी के कारण खराब होने लगता है। इससे इंसुलेशन की डाइइलेक्ट्रिक शक्ति (dielectric strength) कम हो जाती है। अंत में, यह शॉर्ट सर्किट का कारण बन सकता है और ट्रांसफार्मर पूरी तरह से खराब हो सकता है।
- दक्षता में कमी: जब ट्रांसफार्मर गर्म होता है, तो उसके कॉइल का प्रतिरोध (resistance) बढ़ जाता है। इससे ऊर्जा की बर्बादी बढ़ जाती है और ट्रांसफार्मर की दक्षता कम हो जाती है।
- सुरक्षा जोखिम: अत्यधिक गर्मी से ट्रांसफार्मर के अंदर का तेल उबल सकता है, जिससे विस्फोट होने का खतरा बढ़ जाता है।
- जीवनकाल में कमी: लगातार ज़्यादा तापमान पर काम करने से ट्रांसफार्मर के सभी हिस्से तेजी से खराब होने लगते हैं, जिससे उसका जीवनकाल काफी कम हो जाता है।
ट्रांसफार्मर को ठंडा रखने के लिए कई तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं, जैसे तेल में डूबा हुआ ट्रांसफार्मर (oil-immersed transformer) या हवा से ठंडा होने वाला ट्रांसफार्मर (air-cooled transformer)।
क्या आप ट्रांसफार्मर के प्रकारों के बारे में जानना चाहेंगे?
विद्युत ट्रांसफार्मर में कई प्रकार के इंसुलेशन का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है: ठोस (Solid) और तरल (Liquid) इंसुलेशन। कुछ ट्रांसफार्मर में गैसीय इंसुलेशन का भी उपयोग किया जाता है।
1. तरल इंसुलेशन (Liquid Insulation)
ट्रांसफार्मर तेल (Transformer Oil): यह सबसे आम तरल इंसुलेशन है। यह एक खनिज तेल होता है जिसे विशेष रूप से ट्रांसफार्मर के लिए तैयार किया जाता है। यह इंसुलेशन के साथ-साथ शीतलन (cooling) का भी काम करता है। यह ट्रांसफार्मर के कोर और वाइंडिंग को हवा और नमी से बचाता है, जिससे उनकी सुरक्षा और जीवनकाल बढ़ता है।
2. ठोस इंसुलेशन (Solid Insulation)
ठोस इंसुलेशन का उपयोग ट्रांसफार्मर के विभिन्न भागों को एक-दूसरे से और जमीन से अलग करने के लिए किया जाता है।
- क्राफ्ट पेपर (Kraft Paper): ट्रांसफार्मर के वाइंडिंग के चारों ओर और परतों के बीच इसका इस्तेमाल किया जाता है। यह तेल के साथ मिलकर उच्च डाइइलेक्ट्रिक शक्ति (dielectric strength) प्रदान करता है।
- प्रेसबोर्ड (Pressboard): यह एक मोटी, कठोर कार्डबोर्ड जैसी सामग्री है जो लकड़ी के गूदे से बनती है। इसका उपयोग वाइंडिंग को सहारा देने और इन्सुलेट करने के लिए किया जाता है।
- मायका (Mica): यह एक प्राकृतिक खनिज है जो उच्च तापमान और वोल्टेज को सहन कर सकता है। इसका उपयोग विशेष रूप से उच्च वोल्टेज वाले ट्रांसफार्मर में किया जाता है।
- ** वार्निश (Varnish):** इसका उपयोग छोटे ट्रांसफार्मर में कॉइल्स को इंसुलेट करने और नमी से बचाने के लिए किया जाता है।
3. गैसीय इंसुलेशन (Gaseous Insulation)
कुछ उच्च वोल्टेज वाले ट्रांसफार्मर में सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF6) जैसी गैसों का उपयोग किया जाता है। इन गैसों में बहुत अच्छी डाइइलेक्ट्रिक शक्ति होती है और ये आग से सुरक्षित होती हैं।
इन सभी सामग्रियों का सही संयोजन ट्रांसफार्मर की सुरक्षा, दक्षता और लंबे जीवनकाल के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है।
ट्रांसफार्मर में मुख्य रूप से दो प्रकार के नुकसान होते हैं, जिन्हें ऊर्जा हानि (energy losses) भी कहा जाता है: कोर लॉस (Core Loss) और कॉपर लॉस (Copper Loss)।
ये हानियां ट्रांसफार्मर की दक्षता (efficiency) को कम करती हैं।
1. कोर लॉस (Core Loss)
यह ट्रांसफार्मर के कोर में होने वाली हानि है। यह तब भी होती है जब ट्रांसफार्मर पर कोई लोड नहीं होता है, इसलिए इसे नो-लोड लॉस या स्थिर हानि (Constant Loss) भी कहा जाता है। कोर लॉस दो प्रकार के होते हैं:
- हिस्टैरिसीस लॉस (Hysteresis Loss): जब ट्रांसफार्मर के कोर में प्रत्यावर्ती धारा (AC Current) बहती है, तो कोर बार-बार चुम्बकित (magnetized) और विचुम्बकित (demagnetized) होता है। इस प्रक्रिया में कुछ ऊर्जा गर्मी के रूप में नष्ट हो जाती है। इस हानि को कम करने के लिए सिलिकॉन स्टील से बने कोर का उपयोग किया जाता है, क्योंकि इसमें हिस्टैरिसीस लॉस कम होता है।
- एडी करंट लॉस (Eddy Current Loss): ट्रांसफार्मर के कोर में बदलते चुंबकीय क्षेत्र के कारण भंवर धाराएं (eddy currents) उत्पन्न होती हैं, जो कोर में घूमती हैं। इन धाराओं के कारण कोर गर्म हो जाता है, जिससे ऊर्जा की हानि होती है। इस हानि को कम करने के लिए कोर को पतली और इंसुलेटेड (laminated) सिलिकॉन स्टील की चादरों से बनाया जाता है, जिससे भंवर धाराओं का प्रवाह सीमित हो जाता है।
2. कॉपर लॉस (Copper Loss)
यह ट्रांसफार्मर की प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग (winding) के प्रतिरोध (resistance) के कारण होती है। जब वाइंडिंग से धारा प्रवाहित होती है, तो प्रतिरोध के कारण कुछ ऊर्जा I²R के रूप में गर्मी में बदल जाती है। इसे लोड लॉस या परिवर्तनीय हानि (Variable Loss) भी कहते हैं क्योंकि यह लोड करंट के साथ बदलती रहती है।
- यह हानि सीधे लोड करंट के वर्ग (I²) के अनुपात में होती है।
- इसे कम करने के लिए, उच्च-गुणवत्ता वाले तांबे या एल्यूमीनियम के तारों का उपयोग किया जाता है जिनका प्रतिरोध कम होता है।
अन्य नुकसान (Other Losses)
- स्ट्रे लॉस (Stray Loss): यह वाइंडिंग के लीकेज फ्लक्स (leakage flux) के कारण होता है, जो आसपास के धातु के हिस्सों में भंवर धाराएं उत्पन्न करता है, जिससे कुछ ऊर्जा नष्ट होती है।
- डाइइलेक्ट्रिक लॉस (Dielectric Loss): यह ट्रांसफार्मर के इंसुलेटिंग पदार्थ (जैसे ट्रांसफार्मर तेल) में होने वाली हानि है। जब इंसुलेशन एक प्रत्यावर्ती विद्युत क्षेत्र के अधीन होता है, तो इसमें कुछ ऊर्जा गर्मी के रूप में नष्ट हो जाती है।
ट्रांसफार्मर में लौह हानि (Iron Loss), जिसे कोर लॉस (Core Loss) भी कहते हैं, वह ऊर्जा हानि है जो ट्रांसफार्मर के चुंबकीय कोर (magnetic core) में होती है। यह हानि ट्रांसफार्मर पर लोड होने या न होने की स्थिति में भी होती रहती है, इसलिए इसे स्थिर हानि (Constant Loss) या नो-लोड लॉस (No-Load Loss) भी कहा जाता है।
यह हानि मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:
1. हिस्टैरिसीस लॉस (Hysteresis Loss)
कारण: यह हानि ट्रांसफार्मर कोर में प्रत्यावर्ती चुंबकीय क्षेत्र (alternating magnetic field) के कारण होती है। जब AC धारा की दिशा लगातार बदलती है, तो कोर में मौजूद चुंबकीय डोमेन (magnetic domains) बार-बार अपनी दिशा बदलते हैं। इस प्रक्रिया में, कोर के अणुओं के घर्षण के कारण कुछ ऊर्जा गर्मी के रूप में नष्ट हो जाती है। यह हानि कोर की सामग्री पर निर्भर करती है।
इसे कैसे कम करें: इस हानि को कम करने के लिए, कोर को नरम चुंबकीय सामग्री जैसे सिलिकॉन स्टील (silicon steel) से बनाया जाता है, जिसमें हिस्टैरिसीस लूप (hysteresis loop) बहुत संकीर्ण होता है।
2. एडी करंट लॉस (Eddy Current Loss)
कारण: जब ट्रांसफार्मर के कोर में बदलता हुआ चुंबकीय फ्लक्स (magnetic flux) होता है, तो फैराडे के नियम के अनुसार, कोर में छोटे-छोटे प्रेरित करंट (induced currents) उत्पन्न होते हैं। ये करंट एक भंवर (vortex) या एडी (eddy) की तरह कोर में घूमते हैं। इन भंवर धाराओं के कारण कोर गर्म हो जाता है, जिससे ऊर्जा की हानि होती है।
इसे कैसे कम करें:
इस हानि को कम करने के लिए, कोर को एक ही ठोस टुकड़े के बजाय पतली और इंसुलेटेड (laminated) सिलिकॉन स्टील की चादरों से बनाया जाता है। ये लेमिनेशन (laminations) भंवर धाराओं के मार्ग में बाधा डालते हैं, जिससे उनका प्रवाह सीमित हो जाता है और लॉस कम होता है।
कॉपर लॉस (Copper Loss) ट्रांसफार्मर के वाइंडिंग में होने वाली ऊर्जा हानि है जो वाइंडिंग के प्रतिरोध के कारण होती है। यह हानि ट्रांसफार्मर में प्रवाहित होने वाले लोड करंट के वर्ग (square) के सीधे अनुपात में होती है, इसलिए इसे लोड लॉस या परिवर्तनीय हानि (Variable Loss) भी कहते हैं।
कॉपर लॉस की व्याख्या
जब ट्रांसफार्मर पर लोड डाला जाता है, तो इसकी प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग से धारा (current) प्रवाहित होती है। वाइंडिंग तार में कुछ प्रतिरोध (resistance) होता है। जब धारा इस प्रतिरोध से होकर गुजरती है, तो प्रतिरोध के कारण कुछ विद्युत ऊर्जा ऊष्मा (गर्मी) के रूप में नष्ट हो जाती है। यह हानि जूल के हीटिंग नियम (H = I^2Rt) पर आधारित है, जहाँ:
- I वाइंडिंग से प्रवाहित होने वाली धारा है।
- R वाइंडिंग का प्रतिरोध है।
- t समय है।
चूंकि यह हानि धारा के वर्ग (I^2) के अनुपात में होती है, इसलिए जैसे-जैसे ट्रांसफार्मर पर लोड बढ़ता है, धारा का मान भी बढ़ता है और यह हानि तेज़ी से बढ़ती है।
इसे कैसे कम करें?
कॉपर लॉस को कम करने के लिए, निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं:
- कम प्रतिरोध वाले तार: वाइंडिंग बनाने के लिए कम प्रतिरोध वाले उच्च-गुणवत्ता वाले तांबे के तारों का उपयोग किया जाता है।
- तारों का मोटा होना: तारों का व्यास (diameter) बढ़ाकर उनका प्रतिरोध कम किया जाता है, जिससे यह हानि घट जाती है।
ट्रांसफार्मर में आवारा हानियाँ (Stray Losses) उन हानियों को कहते हैं जो मुख्य रूप से ट्रांसफार्मर में होने वाले लीकेज फ्लक्स (leakage flux) के कारण होती हैं। यह कोर लॉस और कॉपर लॉस के अलावा एक अलग प्रकार की हानि है।
आवारा हानियों का कारण
जब ट्रांसफार्मर में धारा प्रवाहित होती है, तो उसका कुछ चुंबकीय फ्लक्स वाइंडिंग और कोर के बजाय हवा में या ट्रांसफार्मर के अन्य धातु भागों में फैल जाता है। इस लीकेज फ्लक्स के कारण निम्नलिखित हानियाँ होती हैं:
- वाइंडिंग में एडी करंट लॉस: लीकेज फ्लक्स वाइंडिंग में ही अतिरिक्त एडी करंट (भंवर धाराएँ) उत्पन्न करता है, जिससे गर्मी पैदा होती है।
- टैंक और क्लैंप में एडी करंट लॉस: ट्रांसफार्मर के बाहर का स्टील टैंक, क्लैंप और अन्य धातु के हिस्से भी इस लीकेज फ्लक्स के संपर्क में आते हैं। इससे इन भागों में भी भंवर धाराएँ उत्पन्न होती हैं, जो ऊर्जा की बर्बादी का कारण बनती हैं।
यह हानि ट्रांसफार्मर के लोड और वाइंडिंग की ज्यामिति पर निर्भर करती है। आधुनिक ट्रांसफार्मरों में, बेहतर डिज़ाइन और शील्डिंग (shielding) तकनीकों का उपयोग करके इन हानियों को कम किया जाता है, हालांकि इन्हें पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता है।
यह वीडियो ट्रांसफार्मर में विभिन्न प्रकार के नुकसानों, जैसे आयरन लॉस, कॉपर लॉस और स्ट्रे लॉस के बारे में जानकारी देता है।
ट्रांसफार्मर में परावैद्युत हानियाँ (Dielectric Losses) वे ऊर्जा हानियाँ हैं जो ट्रांसफार्मर में उपयोग किए गए इंसुलेटिंग (विद्युतरोधी) पदार्थों में होती हैं। यह हानि ट्रांसफार्मर के कुल नुकसान का एक बहुत छोटा हिस्सा होती है, लेकिन उच्च वोल्टेज वाले ट्रांसफार्मर में यह महत्वपूर्ण हो सकती है।
परावैद्युत हानियों का कारण
परावैद्युत हानि तब होती है जब इंसुलेटिंग पदार्थ, जैसे ट्रांसफार्मर तेल या ठोस इंसुलेशन (क्राफ्ट पेपर), एक बदलते हुए विद्युत क्षेत्र के संपर्क में आता है। इस स्थिति में, इंसुलेशन का ध्रुवीकरण (polarization) होता है। जब विद्युत क्षेत्र की दिशा बदलती है, तो इंसुलेटिंग अणु अपनी स्थिति को बदलने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में, अणुओं के बीच घर्षण (friction) होता है, जिससे कुछ ऊर्जा गर्मी के रूप में नष्ट हो जाती है।
यह हानि इस बात पर निर्भर करती है कि इंसुलेटिंग पदार्थ कितना प्रभावी है और यह नमी या अशुद्धियों से कितना प्रभावित है। यदि ट्रांसफार्मर का तेल पुराना या खराब हो गया है, तो उसकी डाइइलेक्ट्रिक शक्ति कम हो जाती है और परावैद्युत हानियाँ बढ़ जाती हैं।
लोहे (कोर) की हानि को कम करने के लिए दो मुख्य रणनीतियाँ हैं, जो इसके दो घटकों पर लक्षित हैं: हिस्टैरिसीस लॉस और एडी करंट लॉस।
1. हिस्टैरिसीस लॉस को कैसे कम करें
हिस्टैरिसीस लॉस को कम करने के लिए, कोर को ऐसी सामग्री से बनाया जाता है जिसमें हिस्टैरिसीस लूप (hysteresis loop) छोटा हो।
- सिलिकॉन स्टील का उपयोग: कोर बनाने के लिए उच्च-गुणवत्ता वाले सिलिकॉन स्टील का उपयोग किया जाता है। सिलिकॉन मिलाने से सामग्री का हिस्टैरिसीस लूप संकीर्ण हो जाता है, जिससे चुंबकत्व की दिशा बदलने में कम ऊर्जा खर्च होती है।
2. एडी करंट लॉस को कैसे कम करें
एडी करंट लॉस को कम करने के लिए, कोर में भंवर धाराओं (eddy currents) के प्रवाह को बाधित किया जाता है।
- लेमिनेटेड कोर का उपयोग: ट्रांसफार्मर के कोर को एक ही ठोस टुकड़े के बजाय पतली, इन्सुलेटेड (insulated) स्टील की चादरों (लेमिनेशन) से बनाया जाता है।
- ये लेमिनेशन एक-दूसरे से विद्युत रोधी सामग्री (जैसे वार्निश) द्वारा अलग होते हैं, जिससे भंवर धाराओं के लिए प्रतिरोध बढ़ जाता है और उनका प्रवाह सीमित हो जाता है। इससे गर्मी के रूप में होने वाली ऊर्जा की हानि काफी कम हो जाती है।
ट्रांसफार्मर में तांबे के नुकसान को कम करने के लिए, मुख्य रूप से वाइंडिंग के प्रतिरोध को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, क्योंकि यह नुकसान सीधे धारा के वर्ग (I^2) और प्रतिरोध (R) पर निर्भर करता है।
तांबे के नुकसान को कम करने के तरीके
- कम प्रतिरोध वाले कंडक्टर का उपयोग: वाइंडिंग बनाने के लिए कम प्रतिरोध वाले उच्च-गुणवत्ता वाले तांबे या एल्यूमीनियम जैसे कंडक्टर का उपयोग किया जाता है।
- मोटे तारों का उपयोग: तारों का व्यास बढ़ाकर उनका अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (cross-sectional area) बढ़ाया जाता है। चूंकि प्रतिरोध लंबाई के समानुपाती और क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है (R = ρL/A), इसलिए मोटा तार प्रतिरोध को कम करता है और तांबे की हानि को घटाता है।
- लोड प्रबंधन: ट्रांसफार्मर को उसकी रेटेड क्षमता के अनुसार चलाना और ओवरलोडिंग से बचना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ओवरलोडिंग से धारा का मान बहुत बढ़ जाता है, जिससे I^2R हानि में तेज़ी से वृद्धि होती है।
- कुशल शीतलन प्रणाली: एक प्रभावी शीतलन प्रणाली ट्रांसफार्मर को इष्टतम ऑपरेटिंग तापमान पर बनाए रखती है। उच्च तापमान से वाइंडिंग का प्रतिरोध बढ़ सकता है, जिससे अतिरिक्त हानि होती है।
ट्रांसफार्मर की दक्षता बहुत अधिक होने के मुख्य कारण हैं:
- कोई घूमने वाला हिस्सा नहीं (No Moving Parts): ट्रांसफार्मर एक स्थिर (static) डिवाइस है, इसमें कोई घूमने वाला हिस्सा नहीं होता। इस वजह से इसमें यांत्रिक हानि (mechanical losses) जैसे घर्षण (friction) और वायु घर्षण (windage) बिल्कुल नहीं होती।
-
न्यूनतम हानियाँ (Minimal Losses): ट्रांसफार्मर को इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि उसमें होने वाली ऊर्जा हानियाँ (energy losses) बहुत कम हों। ये हानियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं:
- कोर लॉस (Core Losses): ये लोहे के कोर में होते हैं और इन्हें कम करने के लिए विशेष सिलिकॉन स्टील और लेमिनेटेड कोर का उपयोग किया जाता है।
- कॉपर लॉस (Copper Losses): ये वाइंडिंग में होते हैं और इन्हें कम करने के लिए कम प्रतिरोध वाले मोटे तांबे के तारों का उपयोग किया जाता है।
इन कारणों से, एक विशिष्ट ट्रांसफार्मर की दक्षता 95% से 99% के बीच होती है, जो इसे सबसे कुशल विद्युत उपकरणों में से एक बनाती है।
पूरे दिन की दक्षता (All-Day Efficiency) एक ट्रांसफार्मर की दक्षता का एक विशेष माप है जो 24 घंटे की अवधि के दौरान उसकी ऊर्जा हानि को ध्यान में रखता है। इसे 24 घंटों में दिए गए कुल kWh आउटपुट और 24 घंटों में प्राप्त कुल kWh इनपुट के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है।
यह दक्षता सामान्य या व्यावसायिक दक्षता से भिन्न होती है, जो किसी विशेष समय पर आउटपुट और इनपुट शक्ति (power) का अनुपात होती है।
इसे कहाँ माना जाता है?
पूरे दिन की दक्षता मुख्य रूप से वितरण ट्रांसफार्मर (Distribution Transformers) के लिए महत्वपूर्ण होती है। इसका कारण यह है कि:
- वितरण ट्रांसफार्मर 24 घंटे ग्रिड से जुड़े रहते हैं।
- इन पर पूरे दिन लोड बदलता रहता है।
- वे दिन के अधिकांश समय कम लोड या बिना लोड पर काम करते हैं।
चूंकि कोर लॉस (लौह हानि) पूरे दिन लगातार होते रहते हैं, जबकि कॉपर लॉस (तांबे की हानि) केवल लोड होने पर ही होते हैं, इसलिए एक वितरण ट्रांसफार्मर के प्रदर्शन का सही आकलन करने के लिए पूरे दिन की दक्षता की गणना की जाती है। यह एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कोई ट्रांसफार्मर कितना ऊर्जा-कुशल है।
ओपन सर्किट टेस्ट (खुला परिपथ परीक्षण) ट्रांसफार्मर के कोर (लौह) लॉस को निर्धारित करने के लिए किया जाता है। यह एक नो-लोड परीक्षण है, जिसका अर्थ है कि ट्रांसफार्मर पर कोई लोड नहीं होता है।
इस परीक्षण में, ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (primary) वाइंडिंग को रेटेड वोल्टेज (rated voltage) पर एक AC स्रोत से जोड़ा जाता है, जबकि द्वितीयक (secondary) वाइंडिंग को खुला छोड़ दिया जाता है। इस दौरान, एक वाटमीटर (wattmeter), एक वोल्टमीटर (voltmeter) और एक एमीटर (ammeter) की सहायता से प्राथमिक साइड में वोल्टेज, करंट और शक्ति को मापा जाता है।
प्राप्त होने वाले पैरामीटर
ओपन सर्किट टेस्ट से ट्रांसफार्मर के ये प्रमुख पैरामीटर प्राप्त होते हैं:
- कोर लॉस (Core Loss): वाटमीटर की रीडिंग सीधे कोर लॉस (यानी, हिस्टैरिसीस लॉस और एडी करंट लॉस) को दर्शाती है। चूँकि यह परीक्षण नो-लोड पर किया जाता है, इसलिए कॉपर लॉस बहुत कम होते हैं और उन्हें नगण्य (negligible) माना जाता है। कोर लॉस को स्थिर (constant) माना जाता है क्योंकि वे वोल्टेज पर निर्भर करते हैं, जो इस परीक्षण में स्थिर रहता है।
- नो-लोड करंट (No-Load Current): एमीटर की रीडिंग नो-लोड करंट को बताती है। यह करंट बहुत कम होता है (फुल-लोड करंट का 2% से 5%)।
- शंट ब्रांच के पैरामीटर (Shunt Branch Parameters): इस परीक्षण से ट्रांसफार्मर के समतुल्य सर्किट (equivalent circuit) में शंट शाखा (shunt branch) के पैरामीटर, जैसे कोर लॉस रेजिस्टेंस (Rc) और मैग्नेटाइजिंग रिएक्टेंस (Xm), की गणना की जा सकती है।
यह परीक्षण बहुत कम शक्ति का उपयोग करता है और वास्तविक लोड के बिना किया जाता है, जिससे यह बहुत ही सुविधाजनक और सटीक होता है।
शॉर्ट सर्किट टेस्ट (लघु परिपथ परीक्षण) ट्रांसफार्मर के कॉपर लॉस और इक्विवेलेंट सर्किट पैरामीटर्स का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसे इम्पीडेंस टेस्ट भी कहा जाता है।
इस परीक्षण में, ट्रांसफार्मर की लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग को एक मोटे कंडक्टर या एमीटर का उपयोग करके शॉर्ट-सर्किट कर दिया जाता है, जबकि हाई-वोल्टेज (HV) वाइंडिंग को एक वेरिएबल लो-वोल्टेज स्रोत से जोड़ा जाता है। वोल्टेज को धीरे-धीरे तब तक बढ़ाया जाता है जब तक कि वाइंडिंग में रेटेड करंट प्रवाहित न होने लगे।
इस टेस्ट के दौरान, कोर लॉस (लौह हानि) बहुत कम होती है क्योंकि लगाया गया वोल्टेज बहुत कम होता है। इसलिए, वाटमीटर की रीडिंग मुख्य रूप से कॉपर लॉस को दर्शाती है।
प्राप्त होने वाले पैरामीटर
शॉर्ट सर्किट टेस्ट से निम्नलिखित पैरामीटर प्राप्त होते हैं:
- कॉपर लॉस (Copper Loss): वाटमीटर की रीडिंग सीधे ट्रांसफार्मर के फुल-लोड कॉपर लॉस को दर्शाती है। ये लॉस लोड पर निर्भर करते हैं।
- इक्विवेलेंट इंपीडेंस (Equivalent Impedance), रेजिस्टेंस (Resistance) और रिएक्टेंस (Reactance): इस परीक्षण से प्राप्त वोल्टेज, करंट और शक्ति के मानों का उपयोग करके ट्रांसफार्मर के समतुल्य सर्किट के सीरीज़ ब्रांच पैरामीटर्स (equivalent series resistance, reactance, and impedance) की गणना की जा सकती है।
ये पैरामीटर्स ट्रांसफार्मर की दक्षता (efficiency) और वोल्टेज रेगुलेशन (voltage regulation) की गणना के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
ओपन सर्किट (OC) परीक्षण को आमतौर पर ट्रांसफार्मर के लो-वोल्टेज (LV) पक्ष पर दो मुख्य कारणों से किया जाता है:
1. सुरक्षा और सुविधा
- ओपन सर्किट टेस्ट के लिए, ट्रांसफार्मर पर रेटेड वोल्टेज लागू करना आवश्यक होता है।
- LV पक्ष में HV पक्ष की तुलना में वोल्टेज का मान बहुत कम होता है।
- कम वोल्टेज को संभालना और प्रयोगशाला में आसानी से उपलब्ध कराना सुरक्षित और सुविधाजनक होता है।
- HV पक्ष पर परीक्षण करने के लिए बहुत उच्च वोल्टेज स्रोतों और विशेष इंसुलेशन की आवश्यकता होती है, जो जोखिम भरा और महंगा हो सकता है।
2. मापन की सटीकता
- ट्रांसफार्मर का नो-लोड करंट (नो-लोड पर खींचा गया करंट) बहुत कम होता है।
- चूंकि LV वाइंडिंग में मोड़ों (turns) की संख्या कम होती है, इसलिए उसमें खींचा गया करंट HV वाइंडिंग की तुलना में अधिक होता है (I₁/I₂ = N₂/N₁)।
- इसलिए, LV पक्ष पर नो-लोड करंट का मान अधिक होता है, जिससे इसे मानक एमीटर (ammeter) से अधिक सटीकता के साथ मापना आसान हो जाता है।
- अगर यह परीक्षण HV पक्ष पर किया जाए, तो करंट का मान इतना कम होगा कि उसे सटीक रूप से मापना मुश्किल हो जाएगा।
शॉर्ट सर्किट (SC) परीक्षण को आमतौर पर ट्रांसफार्मर के हाई-वोल्टेज (HV) पक्ष पर दो मुख्य कारणों से किया जाता है:
1. कम करंट और सुरक्षा
- शॉर्ट सर्किट परीक्षण का उद्देश्य वाइंडिंग में रेटेड करंट प्रवाहित करना है।
- ट्रांसफार्मर की HV वाइंडिंग में LV वाइंडिंग की तुलना में रेटेड करंट का मान कम होता है।
- HV पक्ष पर परीक्षण करने से, कम करंट पर ही रेटेड करंट प्राप्त हो जाता है, जिससे परीक्षण को सुरक्षित रूप से किया जा सकता है।
- कम करंट से कम गर्मी उत्पन्न होती है, और यह परीक्षण उपकरण पर भी कम तनाव डालता है।
2. मापन की सटीकता
- इस परीक्षण के लिए वाटमीटर, एमीटर और वोल्टमीटर की आवश्यकता होती है।
- चूंकि HV पक्ष पर करंट का मान कम होता है, इसलिए मानक और कम-रेटिंग वाले एमीटर का उपयोग किया जा सकता है, जो अक्सर प्रयोगशालाओं में आसानी से उपलब्ध होते हैं।
- यदि यह परीक्षण LV पक्ष पर किया जाता, तो बहुत अधिक करंट प्रवाहित होता, जिसके लिए उच्च-रेटिंग वाले और अधिक महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती, और मापने में भी कठिनाई होती।
- इसलिए, सटीकता और सुविधा के लिए HV पक्ष पर परीक्षण करना बेहतर होता है।
सम्पनर्स टेस्ट (Sumpner's Test), जिसे बैक-टू-बैक टेस्ट या पुनर्योजी परीक्षण (Regenerative Test) भी कहा जाता है, एक विधि है जिसका उपयोग दो समान बड़े ट्रांसफार्मरों पर पूर्ण-लोड की स्थिति में उनके तापमान वृद्धि और दक्षता का पता लगाने के लिए किया जाता है।
यह परीक्षण बहुत ही उपयोगी है क्योंकि इसमें ट्रांसफार्मर को वास्तव में पूर्ण लोड पर चलाने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा की बर्बादी नहीं होती।
कार्यप्रणाली
इस परीक्षण में, दो समान ट्रांसफार्मरों को इस तरह से जोड़ा जाता है कि:
- दोनों ट्रांसफार्मरों की प्राथमिक वाइंडिंग को एक ही एसी (AC) स्रोत से समानांतर (parallel) में जोड़ा जाता है। यह संयोजन दोनों ट्रांसफार्मरों को उनके रेटेड वोल्टेज पर ऊर्जा देता है, जिससे उनमें कोर लॉस होता है।
- दोनों ट्रांसफार्मरों की द्वितीयक वाइंडिंग को श्रृंखला में, लेकिन विपरीत ध्रुवता (series opposition) के साथ जोड़ा जाता है।
- इसके बाद, द्वितीयक सर्किट में एक निम्न वोल्टेज स्रोत लगाया जाता है, जो दोनों ट्रांसफार्मरों में पूर्ण-लोड धारा (full-load current) को प्रवाहित करता है। यह धारा केवल वाइंडिंग में घूमती है और कॉपर लॉस को जन्म देती है।
इस सेटअप से, एक ही समय में दोनों ट्रांसफार्मरों में पूर्ण कोर लॉस और पूर्ण कॉपर लॉस उत्पन्न होते हैं, जिससे वे वास्तविक पूर्ण-लोड स्थिति के समान गर्म होते हैं।
लाभ
- कम ऊर्जा की खपत: यह विधि बहुत कम ऊर्जा खपत करती है क्योंकि वास्तविक भार के बजाय केवल हानियों (लॉसेस) को ही बाहरी स्रोत से खींचा जाता है।
- लगातार परीक्षण: यह परीक्षण लंबे समय तक चलाया जा सकता है, जिससे ट्रांसफार्मर की अधिकतम तापमान वृद्धि और थर्मल स्थिरता का सटीक आकलन किया जा सकता है।
- दोनों हानियों का मापन: यह एक ही समय में कोर और कॉपर लॉस को मापने की अनुमति देता है।
इन्सुलेशन प्रतिरोध परीक्षण (Insulation Resistance Test), जिसे अक्सर मेगर टेस्ट भी कहा जाता है, एक गैर-विनाशकारी नैदानिक परीक्षण है जिसका उपयोग किसी विद्युत उपकरण, जैसे ट्रांसफार्मर, मोटर या केबल के इन्सुलेशन की स्थिति और गुणवत्ता की जाँच करने के लिए किया जाता है।
यह परीक्षण यह सुनिश्चित करता है कि इन्सुलेशन वाइंडिंग को एक-दूसरे से और ग्राउंड से अलग रखने के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत है।
परीक्षण कैसे किया जाता है?
- इस परीक्षण के लिए एक विशेष उपकरण का उपयोग किया जाता है जिसे मेगर (Megger) कहते हैं।
- मेगर एक उच्च DC वोल्टेज (आमतौर पर 500V से 5000V) को इन्सुलेशन पर लागू करता है।
- यह वोल्टेज ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग और कोर के बीच या दो अलग-अलग वाइंडिंग के बीच लगाया जाता है।
- मेगर तब इन्सुलेशन के प्रतिरोध को मेगाओम (MΩ) या गीगाओम (GΩ) में मापता है।
परिणामों का महत्व
- उच्च प्रतिरोध मान: एक बहुत उच्च इन्सुलेशन प्रतिरोध (आमतौर पर GΩ की रेंज में) एक स्वस्थ और शुष्क इन्सुलेशन का संकेत देता है।
- कम प्रतिरोध मान: यदि प्रतिरोध कम है या समय के साथ घट रहा है, तो यह दर्शाता है कि इन्सुलेशन नमी, गंदगी, या उम्र बढ़ने के कारण कमजोर हो गया है। ऐसा इन्सुलेशन शॉर्ट सर्किट, उपकरण की विफलता और सुरक्षा जोखिम का कारण बन सकता है।
यह परीक्षण नियमित रूप से किया जाता है ताकि उपकरण के जीवनकाल में इन्सुलेशन की स्थिति पर नज़र रखी जा सके।
ट्रांसफार्मर तेल का परावैद्युत शक्ति परीक्षण (Dielectric Strength Test), जिसे BDV (Breakdown Voltage) टेस्ट भी कहते हैं, एक महत्वपूर्ण परीक्षण है जो ट्रांसफार्मर तेल की इन्सुलेटिंग (विद्युतरोधी) क्षमता को मापता है। यह परीक्षण यह निर्धारित करता है कि तेल बिना विद्युत विफलता (electrical failure) के कितने उच्च वोल्टेज का सामना कर सकता है।
परीक्षण का उद्देश्य
ट्रांसफार्मर तेल का मुख्य कार्य शीतलन (cooling) के साथ-साथ इन्सुलेशन प्रदान करना भी है। तेल को कोर और वाइंडिंग के बीच शॉर्ट सर्किट और आर्किंग को रोकने के लिए उच्च डाइइलेक्ट्रिक शक्ति की आवश्यकता होती है। नमी, धूल, या अन्य अशुद्धियों से तेल की डाइइलेक्ट्रिक शक्ति कम हो जाती है, जिससे ट्रांसफार्मर के लिए खतरा पैदा होता है।
परीक्षण कैसे किया जाता है
- तेल का एक नमूना लिया जाता है और उसे एक विशेष तेल परीक्षण सेल में रखा जाता है।
- इस सेल में दो इलेक्ट्रोड होते हैं जिनके बीच एक मानक अंतर (gap) होता है।
- इन इलेक्ट्रोडों के बीच धीरे-धीरे एक AC वोल्टेज बढ़ाया जाता है।
- जिस वोल्टेज पर तेल में एक आर्क (arc) बनता है और वह अपनी इन्सुलेटिंग क्षमता खो देता है, उस वोल्टेज को ब्रेकडाउन वोल्टेज कहा जाता है।
परिणामों का महत्व
- उच्च BDV: एक उच्च BDV मान (किलोवोल्ट-kV में मापा जाता है) यह दर्शाता है कि तेल शुद्ध और सूखा है, और उसकी इन्सुलेटिंग क्षमता अच्छी है।
- निम्न BDV: यदि BDV मान कम है, तो इसका मतलब है कि तेल नमी या अशुद्धियों से दूषित हो गया है और उसे फिल्टर करने या बदलने की आवश्यकता है।
यह परीक्षण ट्रांसफार्मर के रखरखाव का एक अनिवार्य हिस्सा है ताकि उसकी सुरक्षा और लंबे जीवनकाल को सुनिश्चित किया जा सके।
चुंबकीय संतुलन परीक्षण (Magnetic Balance Test) ट्रांसफार्मर पर एक महत्वपूर्ण परीक्षण है जिसका उपयोग यह जांचने के लिए किया जाता है कि क्या ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग सही ढंग से जुड़ी हुई हैं और क्या कोई आंतरिक खराबी तो नहीं है। यह परीक्षण चरण विस्थापन (phase displacement) और वाइंडिंग में खुले सर्किट जैसी समस्याओं का पता लगाने में मदद करता है।
परीक्षण की कार्यप्रणाली
यह परीक्षण प्रत्येक चरण (phase) में अलग-अलग किया जाता है।
- एक चरण को उत्तेजित करना: परीक्षण के दौरान, एक चरण की हाई-वोल्टेज (HV) वाइंडिंग को एक निम्न-वोल्टेज AC स्रोत से उत्तेजित (energized) किया जाता है, जबकि अन्य दो चरणों को खुला छोड़ दिया जाता है।
- प्रेरित वोल्टेज का मापन: इसके बाद, ट्रांसफार्मर के अन्य दो चरणों की HV और तीनों चरणों की लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग में प्रेरित वोल्टेज को एक वोल्टमीटर से मापा जाता है।
परिणामों का महत्व
- सही वाइंडिंग: यदि वाइंडिंग सही ढंग से जुड़ी हुई हैं, तो प्रत्येक चरण में मापे गए वोल्टेज का मान संबंधित वाइंडिंग के टर्न अनुपात (turn ratio) के अनुसार होना चाहिए।
-
त्रुटि की पहचान: यदि मापा गया वोल्टेज अपेक्षित मान से काफी भिन्न होता है, तो यह निम्नलिखित समस्याओं का संकेत हो सकता है:
- वाइंडिंग में शॉर्ट सर्किट: कुछ टर्न शॉर्ट हो गए हैं।
- गलत ध्रुवता (Wrong Polarity): वाइंडिंग को गलत तरीके से जोड़ा गया है।
- खुले सर्किट (Open Circuit): वाइंडिंग में कहीं खुला सर्किट है।
यह परीक्षण यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि ट्रांसफार्मर को उपयोग में लाने से पहले वह सही स्थिति में है।
टर्न्स अनुपात परीक्षण (Turns Ratio Test) एक महत्वपूर्ण परीक्षण है जिसका उपयोग ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (primary) और द्वितीयक (secondary) वाइंडिंग के बीच मोड़ों (turns) के अनुपात को मापने के लिए किया जाता है। इस परीक्षण का उद्देश्य ट्रांसफार्मर के नामपट्ट (nameplate) पर दिए गए वोल्टेज अनुपात की पुष्टि करना और वाइंडिंग में किसी भी खराबी का पता लगाना है।
परीक्षण की कार्यप्रणाली
यह परीक्षण एक विशेष उपकरण, जिसे ट्रांसफार्मर टर्न्स अनुपात मीटर (TTR meter) कहा जाता है, का उपयोग करके किया जाता है।
- ट्रांसफार्मर की हाई-वोल्टेज (HV) वाइंडिंग पर एक कम AC वोल्टेज लगाया जाता है।
- इसी समय, लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग में प्रेरित वोल्टेज को मापा जाता है।
- टर्न्स अनुपात को निम्नलिखित सूत्र से गणना किया जाता है: {टर्न्स अनुपात} = {प्राथमिक वाइंडिंग में मोड़ों की संख्या (N₁)}{द्वितीयक वाइंडिंग में मोड़ों की संख्या (N₂)} = {प्राथमिक वाइंडिंग का वोल्टेज (V₁)}{द्वितीयक वाइंडिंग का वोल्टेज (V₂)}
परिणामों का महत्व
- सत्यापन (Verification): यदि मापा गया अनुपात ट्रांसफार्मर के नामपट्ट पर दिए गए अनुपात के बराबर है, तो इसका मतलब है कि वाइंडिंग और कनेक्शन सही हैं।
-
दोषों की पहचान (Fault Detection): यदि मापा गया अनुपात अपेक्षित मान से काफी भिन्न है, तो यह निम्नलिखित समस्याओं का संकेत हो सकता है:
- शॉर्ट सर्किट वाले टर्न (Shorted Turns): यदि वाइंडिंग में कुछ मोड़ शॉर्ट हो गए हैं, तो मापा गया अनुपात बदल जाएगा।
- वाइंडिंग में खुला सर्किट (Open Circuit): यदि कोई वाइंडिंग खुली है, तो वोल्टेज का मापन शून्य होगा।
- गलत कनेक्शन (Incorrect Connections): गलत तरीके से किए गए वाइंडिंग कनेक्शन भी अनुपात को प्रभावित कर सकते हैं।
यह परीक्षण ट्रांसफार्मर को उपयोग में लाने से पहले और उसके रखरखाव के दौरान नियमित रूप से किया जाता है ताकि उसकी विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
पावर ट्रांसफार्मर में विभिन्न प्रकार की सुरक्षा का उपयोग किया जाता है ताकि इसे आंतरिक (internal) और बाहरी (external) दोषों (faults) से बचाया जा सके। ये सुरक्षा प्रणालियाँ ट्रांसफार्मर की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करती हैं।
आंतरिक दोषों से सुरक्षा
ये सुरक्षा प्रणालियाँ ट्रांसफार्मर के भीतर होने वाले दोषों, जैसे वाइंडिंग में शॉर्ट सर्किट या कोर में खराबी, का पता लगाती हैं।
- बुखोल्ज़ रिले (Buchholz Relay): यह गैस-संचालित रिले मुख्य रूप से ट्रांसफार्मर में होने वाले आंतरिक और धीमी गति से विकसित होने वाले दोषों का पता लगाने के लिए उपयोग किया जाता है। जब कोई आंतरिक दोष होता है, तो ट्रांसफार्मर तेल में गैसें उत्पन्न होती हैं। ये गैसें रिले में जमा हो जाती हैं, जिससे एक अलार्म बजता है। यदि दोष गंभीर हो जाता है, तो गैस का दबाव एक फ्लोट को नीचे धकेलता है, जिससे ट्रांसफार्मर को तुरंत ट्रिप कर दिया जाता है।
- अंतर संरक्षण (Differential Protection): यह एक बहुत ही संवेदनशील और तेज़ सुरक्षा प्रणाली है। यह ट्रांसफार्मर की प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग में प्रवेश करने और बाहर निकलने वाली धाराओं की तुलना करती है। यदि इन धाराओं के बीच कोई अंतर होता है, तो इसका मतलब है कि ट्रांसफार्मर के भीतर कोई दोष है। यह प्रणाली तुरंत सर्किट ब्रेकर को संकेत भेजती है और ट्रांसफार्मर को डिस्कनेक्ट कर देती है।
- दाब राहत उपकरण (Pressure Relief Device - PRD): जब कोई गंभीर आंतरिक दोष होता है, तो तेल का तापमान और दबाव तेज़ी से बढ़ता है। PRD एक वाल्व है जो इस अतिरिक्त दबाव को तुरंत बाहर निकाल देता है, जिससे ट्रांसफार्मर के टैंक को फटने से रोका जा सकता है।
बाहरी दोषों और अन्य सुरक्षा
ये सुरक्षा प्रणालियाँ ट्रांसफार्मर को बाहरी नेटवर्क में होने वाले दोषों और ओवरलोड से बचाती हैं।
- ओवरकरंट और अर्थ फॉल्ट सुरक्षा (Overcurrent and Earth Fault Protection): ये रिले ट्रांसफार्मर के माध्यम से बहने वाली धारा की निगरानी करते हैं। यदि धारा का मान एक निर्धारित सीमा से अधिक हो जाता है (जैसे कि शॉर्ट सर्किट या अर्थ फॉल्ट के कारण), तो रिले सक्रिय हो जाते हैं और ट्रांसफार्मर को पावर सप्लाई से अलग कर देते हैं।
- अचानक दबाव रिले (Sudden Pressure Relay - SPR): यह रिले ट्रांसफार्मर के अंदर तेल के दबाव में अचानक वृद्धि का पता लगाता है, जो गंभीर आंतरिक दोषों का संकेत होता है। यह बुखोल्ज़ रिले की तुलना में बहुत तेजी से काम करता है।
- तापमान संकेतक (Temperature Indicators): ट्रांसफार्मर के तेल और वाइंडिंग में तापमान सेंसर लगे होते हैं। यदि तापमान एक खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है (ओवरलोड या शीतलन प्रणाली की विफलता के कारण), तो ये सेंसर एक अलार्म ट्रिगर करते हैं या ट्रांसफार्मर को ट्रिप कर देते हैं।
ट्रांसफार्मर का विभेदक संरक्षण (Differential Protection) एक तेज और संवेदनशील सुरक्षा प्रणाली है जो ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग में आंतरिक दोषों (internal faults) से सुरक्षा प्रदान करती है। यह इस सिद्धांत पर काम करता है कि एक स्वस्थ ट्रांसफार्मर में, वाइंडिंग के अंदर और बाहर बहने वाली धाराओं का अनुपात स्थिर रहता है।
कार्यप्रणाली
विभेदक संरक्षण को लागू करने के लिए, ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (primary) और द्वितीयक (secondary) वाइंडिंग के दोनों तरफ करंट ट्रांसफार्मर (CTs) लगाए जाते हैं।
- सामान्य स्थिति में: जब ट्रांसफार्मर सामान्य रूप से काम कर रहा होता है, तो प्राथमिक और द्वितीयक CTs द्वारा मापी गई धाराओं का अनुपात ट्रांसफार्मर के टर्न्स अनुपात के बराबर होता है। इन CTs को इस तरह से जोड़ा जाता है कि उनके आउटपुट करंट का अंतर (difference) शून्य हो। इसलिए, विभेदक रिले (differential relay) में कोई करंट प्रवाहित नहीं होता है।
- आंतरिक दोष की स्थिति में: जब ट्रांसफार्मर के अंदर वाइंडिंग में कोई दोष (जैसे शॉर्ट सर्किट) होता है, तो प्राथमिक और द्वितीयक CTs द्वारा मापी गई धाराओं के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। इस असंतुलन के कारण, दोनों CTs के आउटपुट करंट के बीच एक अंतर उत्पन्न होता है। यह अंतर करंट विभेदक रिले के माध्यम से प्रवाहित होता है।
- ट्रिपिंग (Tripping): जब यह अंतर करंट एक निर्धारित सीमा से अधिक हो जाता है, तो रिले सक्रिय हो जाता है। रिले तुरंत सर्किट ब्रेकर को एक सिग्नल भेजता है, जिससे ट्रांसफार्मर को पावर सप्लाई से अलग कर दिया जाता है, जिससे आगे की क्षति को रोका जा सके।
महत्वपूर्ण पहलू
- संवेदनशीलता: यह प्रणाली बहुत संवेदनशील होती है और छोटे से छोटे आंतरिक दोषों का भी पता लगा लेती है।
- चयनशीलता (Selectivity): यह केवल उन्हीं दोषों पर प्रतिक्रिया करती है जो ट्रांसफार्मर के सुरक्षा क्षेत्र (protection zone) के भीतर होते हैं, बाहरी दोषों पर नहीं।
- ऑपरेटिंग सिद्धांत: यह किरचॉफ के करंट नियम (Kirchhoff's Current Law) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें एक नोड में प्रवेश करने और बाहर निकलने वाली धाराओं का योग शून्य होता है।
यह सुरक्षा प्रणाली बड़े और महत्वपूर्ण ट्रांसफार्मरों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आंतरिक दोषों से सबसे प्रभावी सुरक्षा प्रदान करती है।
ट्रांसफार्मर में अर्थ फॉल्ट प्रोटेक्शन की आवश्यकता कई महत्वपूर्ण कारणों से होती है, क्योंकि एक अर्थ फॉल्ट एक गंभीर प्रकार का दोष है जो ट्रांसफार्मर और उससे जुड़े सिस्टम को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
अर्थ फॉल्ट क्या है?
एक अर्थ फॉल्ट तब होता है जब एक लाइव कंडक्टर (फेज तार) गलती से ग्राउंड या अर्थेड उपकरण से संपर्क में आ जाता है। इससे एक अनियंत्रित और बहुत अधिक करंट पृथ्वी की ओर प्रवाहित होने लगता है।
सुरक्षा की आवश्यकता
- उपकरणों को नुकसान: एक अर्थ फॉल्ट के कारण बहुत अधिक फॉल्ट करंट बहता है, जो सामान्य ऑपरेटिंग करंट से कई गुना अधिक हो सकता है। यह अत्यधिक करंट ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग को गंभीर रूप से गर्म कर सकता है, जिससे वाइंडिंग और इन्सुलेशन को भारी क्षति पहुँच सकती है।
- आग और विस्फोट का खतरा: फॉल्ट करंट से उत्पन्न अत्यधिक ऊष्मा ट्रांसफार्मर के तेल को गर्म कर सकती है, जिससे आग लग सकती है या वाष्प के दबाव के कारण ट्रांसफार्मर टैंक में विस्फोट हो सकता है।
- मानवीय सुरक्षा: अर्थ फॉल्ट से ग्राउंड में खतरनाक वोल्टेज पैदा होता है, जिससे ट्रांसफार्मर के पास खड़े लोगों को बिजली का झटका लगने का खतरा होता है। अर्थ फॉल्ट प्रोटेक्शन इस खतरे को कम करता है।
- चुंबकीय और थर्मल तनाव: उच्च फॉल्ट करंट के कारण ट्रांसफार्मर का कोर संतृप्त (saturated) हो सकता है, जिससे कोर में अतिरिक्त चुंबकीय और थर्मल तनाव पैदा होता है।
अर्थ फॉल्ट प्रोटेक्शन के लिए,
ट्रांसफार्मर पर करंट ट्रांसफार्मर (CT) और ओवरकरंट रिले लगाए जाते हैं, जो अर्थ फॉल्ट करंट को महसूस करते हैं और ट्रांसफार्मर को सुरक्षित रूप से पावर सप्लाई से डिस्कनेक्ट कर देते हैं।
ओवर-करंट प्रोटेक्शन एक सुरक्षा प्रणाली है जो ट्रांसफार्मर को तब सुरक्षित करती है जब उसमें से बहने वाली विद्युत धारा (current) एक सुरक्षित सीमा से अधिक हो जाती है। यह प्रणाली ट्रांसफार्मर को ओवरलोड और शॉर्ट सर्किट जैसे दोषों से बचाती है।
आवश्यकता
ट्रांसफार्मर में ओवर-करंट कई कारणों से हो सकता है:
- शॉर्ट सर्किट (Short Circuit): जब ट्रांसफार्मर के आउटपुट (द्वितीयक पक्ष) पर शॉर्ट सर्किट होता है, तो धारा का मान अचानक और बहुत तेज़ी से बढ़ जाता है।
- ओवरलोड (Overload): जब ट्रांसफार्मर को उसकी डिज़ाइन क्षमता से अधिक लोड पर चलाया जाता है, तो धारा का मान भी बढ़ जाता है।
यह अत्यधिक धारा ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग में अत्यधिक गर्मी (I^2R लॉस) उत्पन्न करती है, जिससे इन्सुलेशन को नुकसान होता है, ट्रांसफार्मर का जीवनकाल कम होता है, और आग लगने का खतरा होता है।
कार्यप्रणाली
ओवर-करंट प्रोटेक्शन के लिए, ओवर-करंट रिले (Over-current Relay) और करंट ट्रांसफार्मर (CT) का उपयोग किया जाता है।
- करंट ट्रांसफार्मर (CT): ये उपकरण ट्रांसफार्मर के हाई-वोल्टेज और लो-वोल्टेज वाइंडिंग के पास लगाए जाते हैं। इनका काम ट्रांसफार्मर में बहने वाली उच्च धारा को एक सुरक्षित, निम्न स्तर तक कम करना है ताकि रिले उसे माप सके।
- ओवर-करंट रिले: यह रिले लगातार CT से आ रही धारा को मॉनिटर करता है। जब धारा का मान एक निर्धारित सीमा से अधिक हो जाता है, तो रिले सक्रिय हो जाता है।
- सर्किट ब्रेकर: रिले सक्रिय होने पर, यह सर्किट ब्रेकर को एक संकेत (signal) भेजता है। सर्किट ब्रेकर तुरंत खुल जाता है और ट्रांसफार्मर को पावर सप्लाई से अलग कर देता है, जिससे उसे और क्षति से बचाया जा सके।
रिले को इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि वह क्षणिक (temporary) करंट वृद्धि (जैसे इन-रश करंट) पर तुरंत प्रतिक्रिया न करे, लेकिन एक निश्चित समय तक उच्च धारा के बने रहने पर ही ट्रिप करे।
गैस चालित रिले, जिसे आमतौर पर बुखोल्ज़ रिले के नाम से जाना जाता है, ट्रांसफार्मर में इस्तेमाल होने वाला एक सुरक्षा उपकरण है। इसका उपयोग मुख्य रूप से तेल में डूबे हुए बड़े ट्रांसफार्मरों में आंतरिक दोषों का पता लगाने के लिए किया जाता है जो धीरे-धीरे विकसित होते हैं।
यह रिले ट्रांसफार्मर के मुख्य टैंक और कंजरवेटर टैंक को जोड़ने वाली पाइप में लगाया जाता है।
कार्यप्रणाली
बुखोल्ज़ रिले दो मुख्य सिद्धांतों पर काम करता है: गैस संचय (gas accumulation) और तेल के दबाव में अचानक वृद्धि (sudden pressure surge)।
1. धीमी गति से विकसित होने वाले दोष (Minor Faults)
जब ट्रांसफार्मर में छोटे-मोटे दोष (जैसे इंसुलेशन का आंशिक खराब होना या कोर का अधिक गर्म होना) होते हैं, तो वे वाइंडिंग के तेल में धीरे-धीरे गैस के बुलबुले उत्पन्न करते हैं। ये गैसें ऊपर की ओर उठकर रिले के ऊपरी हिस्से में जमा हो जाती हैं।
- जैसे-जैसे गैसें जमा होती हैं, वे तेल के स्तर को नीचे धकेलती हैं, जिससे ऊपरी फ्लोट (float) नीचे गिर जाता है।
- यह फ्लोट एक स्विच को सक्रिय करता है, जो अलार्म बजाता है। यह अलार्म ऑपरेटर को सूचित करता है कि ट्रांसफार्मर में कोई छोटी-मोटी समस्या है।
2. गंभीर दोष (Major Faults)
यदि ट्रांसफार्मर में कोई गंभीर दोष (जैसे वाइंडिंग में शॉर्ट सर्किट) होता है, तो तेल का अचानक और तेज़ी से वाष्पीकरण होता है, जिससे तेल का एक बड़ा दबाव बनता है।
- यह दबाव तेल को कंजरवेटर टैंक की ओर तेज़ी से धकेलता है।
- रिले में तेल का यह अचानक प्रवाह एक आंतरिक बफ़ल प्लेट (baffle plate) को धक्का देता है, जो एक दूसरे स्विच को सक्रिय करता है।
- यह स्विच तुरंत सर्किट ब्रेकर को एक संकेत भेजता है, जो ट्रांसफार्मर को पावर सप्लाई से ट्रिप (disconnect) कर देता है, जिससे उसे और गंभीर क्षति से बचाया जा सके।
बुखोल्ज़ रिले एक बहुत ही विश्वसनीय और संवेदनशील उपकरण है जो ट्रांसफार्मर की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सर्ज अरेस्टर को ट्रांसफार्मर से मुख्य रूप से उसे उच्च वोल्टेज सर्ज से बचाने के लिए जोड़ा जाता है। ये सर्ज (यानी वोल्टेज में अचानक वृद्धि) दो मुख्य कारणों से उत्पन्न होते हैं:
- आकाशीय बिजली (Lightning) : बिजली गिरने से पावर लाइनों पर बहुत अधिक वोल्टेज प्रेरित हो सकता है।
- स्विचिंग ऑपरेशन (Switching Operations): सिस्टम में सर्किट ब्रेकर को बंद या चालू करने से भी वोल्टेज में क्षणिक वृद्धि हो सकती है।
ये उच्च वोल्टेज सर्ज ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग और इन्सुलेशन को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट और ट्रांसफार्मर की विफलता हो सकती है।
कार्यप्रणाली
सर्ज अरेस्टर सामान्य ऑपरेटिंग वोल्टेज के तहत एक इन्सुलेटर के रूप में काम करता है और कोई धारा प्रवाहित नहीं होने देता। हालाँकि, जब एक उच्च वोल्टेज सर्ज होता है, तो अरेस्टर एक चालक (conductor) बन जाता है और सर्ज के कारण उत्पन्न अतिरिक्त ऊर्जा को सीधे जमीन में भेज देता है। इससे ट्रांसफार्मर पर पड़ने वाला वोल्टेज सीमित हो जाता है और वह सुरक्षित रहता है।
एक बार जब सर्ज बीत जाता है, तो अरेस्टर तुरंत वापस एक इन्सुलेटर की स्थिति में आ जाता है।
सर्ज अरेस्टर लगाने से ट्रांसफार्मर की सुरक्षा, विश्वसनीयता और जीवनकाल में वृद्धि होती है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें