अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर ( Difference between Earthing and Neutral )

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अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर अक्सर लोग न्यूट्रल (Neutral) और अर्थिंग (Earthing) को एक ही समझ लेते हैं क्योंकि दोनों ही तार अंततः जमीन से जुड़े होते हैं, लेकिन बिजली के सर्किट में इन दोनों का काम बिल्कुल अलग होता है। https://dkrajwar.blogspot.com/2026/01/difference-between-earthing-and-neutral.html ​इसे आसान भाषा में समझने के लिए नीचे दिए गए बिंदुओं को देखें: ​1. न्यूट्रल (Neutral Wire) - "वापसी का रास्ता" ​न्यूट्रल तार का मुख्य काम बिजली के सर्किट को पूरा करना है। ​ कार्य: बिजली 'फेज' (Phase) तार से आती है और अपना काम करने के बाद 'न्यूट्रल' के जरिए वापस लौटती है। ​ स्रोत: यह मुख्य रूप से बिजली के ट्रांसफार्मर से आता है। ​ महत्व: बिना न्यूट्रल के आपका कोई भी उपकरण (जैसे बल्ब या पंखा) चालू नहीं होगा क्योंकि सर्किट अधूरा रहेगा। ​ रंग: आमतौर पर इसे काले (Black) रंग के तार से पहचाना जाता है। ​2. अर्थिंग (Earthing) - "सुरक्षा कवच" ​अर्थिंग का काम बिजली के उपकरणों को चलाना नहीं, बल्कि आपको करंट लगने से बचाना है। ​ कार्य: यदि किसी खराब...

ट्रांसमिशन लाइन में इस्तेमाल ( Transmission Line )

 ट्रांसमिशन लाइन में कई तरह के कंडक्टर इस्तेमाल होते हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले एल्युमीनियम के कंडक्टर होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि एल्युमीनियम हल्का होता है, इसकी कीमत कम होती है, और यह बिजली का अच्छा सुचालक भी होता है।


यहाँ कुछ मुख्य प्रकार के कंडक्टर दिए गए हैं जो ट्रांसमिशन लाइन में इस्तेमाल होते हैं:

 * ACSR (Aluminum Conductor Steel Reinforced): 

यह सबसे आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला कंडक्टर है। इसमें बीच में स्टील का कोर (core) होता है जो बहुत मज़बूत होता है, और उसके चारों तरफ एल्युमीनियम के तार लिपटे होते हैं। स्टील की वजह से इसे ऊँची दूरी तक खींचने पर भी यह कम लटकता (sag) है, जबकि एल्युमीनियम बिजली को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम करता है।

 * AAAC (All Aluminum Alloy Conductor): यह कंडक्टर एल्युमीनियम के एक खास अलॉय (alloy) से बना होता है जिसमें मैग्नीशियम और सिलिकॉन जैसी धातुएँ मिलाई जाती हैं। यह ACSR जितना मज़बूत नहीं होता, लेकिन इसका वज़न हल्का होता है और इसमें जंग लगने की संभावना भी कम होती है। यह उन जगहों के लिए अच्छा है जहाँ हवा में नमी ज़्यादा होती है या प्रदूषण होता है।

 * AAC (All Aluminum Conductor): 

यह पूरी तरह से शुद्ध एल्युमीनियम से बना होता है। यह हल्का होता है और इसमें जंग लगने की संभावना बहुत कम होती है, लेकिन इसकी मज़बूती कम होती है। इसलिए इसे ज़्यादातर छोटी दूरी की लाइनों या डिस्ट्रीब्यूशन लाइनों में इस्तेमाल किया जाता है, जहाँ लाइन के खंभे पास-पास होते हैं।

ट्रांसमिशन लाइन के लिए सही कंडक्टर का चुनाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे कि लाइन की लंबाई, बिजली का वोल्टेज, और मौसम की स्थिति।



ट्रांसमिशन लाइनों में ACSR (एल्यूमीनियम कंडक्टर स्टील रीइन्फोर्स्ड) कंडक्टर का उपयोग कई महत्वपूर्ण कारणों से किया जाता है। यह कंडक्टर एल्यूमीनियम और स्टील दोनों के गुणों का एक उत्कृष्ट संयोजन है, जो इसे ओवरहेड पावर लाइनों के लिए आदर्श बनाता है।

इसके उपयोग के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
 * उच्च यांत्रिक शक्ति (High Mechanical Strength):
ACSR कंडक्टर में बीच में एक स्टील का कोर होता है जिसके चारों ओर एल्यूमीनियम के तार लिपटे होते हैं। स्टील, एल्यूमीनियम की तुलना में बहुत अधिक मजबूत होता है, जिससे कंडक्टर को आवश्यक यांत्रिक शक्ति मिलती है। यह मजबूती इसे लंबी दूरी तक फैलने और हवा, बर्फ, और अन्य बाहरी दबावों का सामना करने में मदद करती है।
 * अच्छी चालकता (Good Conductivity): 
कंडक्टर के बाहरी तार एल्यूमीनियम के बने होते हैं, जो बिजली के लिए एक अच्छा चालक है। एल्यूमीनियम, तांबे की तुलना में सस्ता और हल्का होता है, जो इसे आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाता है।
 * कम वजन (Low Weight): 
एल्यूमीनियम का वजन तांबे की तुलना में बहुत कम होता है। इससे ट्रांसमिशन टावरों पर लगने वाला भार कम हो जाता है, जिससे टावरों की लागत और निर्माण दोनों में बचत होती है।
 * कम ढीलापन (Reduced Sag):
स्टील कोर की उच्च तन्यता शक्ति (high tensile strength) के कारण, ACSR कंडक्टर गर्म होने पर यांत्रिक भार (जैसे हवा और बर्फ) के कारण कम फैलता है। इसका मतलब है कि दो पोल के बीच कंडक्टर का ढीलापन (sag) कम होता है, जिससे पोल के बीच की दूरी बढ़ाई जा सकती है। इससे कम टावरों की आवश्यकता होती है, जिससे कुल लागत कम हो जाती है।
 * लागत-प्रभावशीलता (Cost-effectiveness): एल्यूमीनियम तांबे की तुलना में सस्ता होता है। स्टील कोर का उपयोग करके एल्यूमीनियम की कमजोरी को दूर किया जाता है, जिससे एक ऐसा कंडक्टर बनता है जो न केवल मजबूत है, बल्कि किफायती भी है।
संक्षेप में, ACSR कंडक्टर एल्यूमीनियम की अच्छी चालकता और कम वजन के साथ-साथ स्टील की उच्च यांत्रिक शक्ति को जोड़ता है। यही कारण है कि यह दुनिया भर में ओवरहेड हाई-वोल्टेज पावर ट्रांसमिशन लाइनों के लिए सबसे आम और विश्वसनीय विकल्प है।




एसीएसआर (ACSR) कंडक्टर का व्यास (diameter) निकालने के लिए, आपको उसकी संरचना को समझना होगा। यह एक तार से बना हुआ कंडक्टर नहीं होता, बल्कि कई तारों को एक साथ मिलाकर बनाया जाता है। 

ACSR कंडक्टर में दो मुख्य भाग होते हैं:
 * स्टील कोर (Steel Core): 
केंद्र में स्टील के तार होते हैं जो कंडक्टर को यांत्रिक शक्ति (mechanical strength) प्रदान करते हैं।
 * एल्यूमीनियम स्ट्रैंड्स (Aluminum Strands): 
इन स्टील कोर के चारों ओर एल्यूमीनियम के तार लिपटे होते हैं, जो विद्युत धारा (electrical current) का वहन करते हैं।
एसीएसआर कंडक्टर का कुल व्यास, स्टील कोर और उसके चारों ओर लिपटे एल्यूमीनियम के तारों की परतों (layers) पर निर्भर करता है।
व्यास निकालने का सूत्र (Formula)
एक साधारण स्ट्रैंडेड कंडक्टर का कुल व्यास निकालने के लिए आप इस सूत्र का उपयोग कर सकते हैं:
यहाँ:
 * D = कंडक्टर का कुल व्यास (Overall Diameter)
 * n = एल्यूमीनियम तारों की परतों की संख्या (Number of layers of aluminum strands)
 * d = प्रत्येक व्यक्तिगत तार का व्यास (Diameter of a single strand)
उदाहरण:
मान लीजिए एक ACSR कंडक्टर में केंद्र में एक स्टील का तार है और उसके चारों ओर एल्यूमीनियम के 2 परतें (layers) हैं। यदि प्रत्येक तार का व्यास 3 मिमी है, तो:
 * n = 2 (एल्यूमीनियम की परतें)
 * d = 3 मिमी
इस तरह, कंडक्टर का कुल व्यास 15 मिमी होगा।
कुछ महत्वपूर्ण बातें:
 * मानक विनिर्देश (Standard Specifications): अधिकांश ACSR कंडक्टरों का निर्माण भारतीय मानक ब्यूरो (BIS), ASTM, IEC, आदि जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार होता है। इन मानकों में प्रत्येक कंडक्टर प्रकार (जैसे Panther, Zebra, Dog) के लिए उसके व्यास, तार की संख्या, और कुल वजन जैसे सभी विनिर्देश दिए गए होते हैं।
 * विनिर्माता की तालिका (Manufacturer's Table): सबसे आसान और सटीक तरीका यह है कि आप जिस विशिष्ट ACSR कंडक्टर का उपयोग कर रहे हैं, उसके निर्माता द्वारा प्रदान की गई तकनीकी तालिका (technical data sheet) देखें। इन तालिकाओं में कंडक्टर के व्यास, वजन, प्रतिरोध और अन्य सभी महत्वपूर्ण जानकारी स्पष्ट रूप से दी गई होती है।
 * वास्तविक मापन: 
यदि आपके पास कंडक्टर का एक नमूना है, तो आप एक वर्नियर कैलीपर या माइक्रोमीटर का उपयोग करके उसका व्यास सीधे माप सकते हैं।
संक्षेप में, 
ACSR कंडक्टर का व्यास निकालने का सबसे सटीक तरीका उसकी संरचना और प्रत्येक तार के व्यास पर निर्भर करता है। मानक तालिकाएँ या निर्माता द्वारा प्रदान किए गए डेटा का उपयोग करना सबसे विश्वसनीय विधि है।




ट्रांसमिशन लाइनों में AAAC (All Aluminium Alloy Conductor) कंडक्टर का उपयोग एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में किया जाता है, खासकर उन परिस्थितियों में जहां ACSR (Aluminum Conductor Steel Reinforced) की तुलना में कुछ विशिष्ट लाभों की आवश्यकता होती है।

AAAC कंडक्टर का निर्माण एल्यूमीनियम, 
मैग्नीशियम और सिलिकॉन के एक विशेष मिश्र धातु (alloy) से किया जाता है। इसमें कोई स्टील कोर नहीं होता। यह एल्यूमीनियम की अच्छी चालकता (conductivity) और मिश्र धातु की बेहतर यांत्रिक शक्ति का संयोजन प्रदान करता है।
इसका उपयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित तरीकों से किया जाता है:
 * वितरण लाइनें (Distribution Lines): 
AAAC कंडक्टर का उपयोग प्राथमिक और माध्यमिक वितरण लाइनों (11 kV से 33 kV तक) में व्यापक रूप से किया जाता है। इसकी उच्च शक्ति-से-वजन अनुपात (high strength-to-weight ratio) और बेहतर संक्षारण प्रतिरोध (corrosion resistance) इसे शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लिए उपयुक्त बनाता है।
 * मध्यम और उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनें: 
AAAC का उपयोग मध्यम (Medium) और उच्च (High) वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों (11 kV से 800 kV) के लिए भी किया जाता है, जहाँ इसकी विशेषताओं के कारण इसे ACSR से बेहतर माना जाता है।
ACSR की तुलना में AAAC के फायदे:
 * उत्कृष्ट संक्षारण प्रतिरोध (Excellent Corrosion Resistance): 
AAAC कंडक्टर पूरी तरह से एल्यूमीनियम मिश्र धातु से बना होता है, जिसमें स्टील नहीं होता। इससे इसमें गैल्वेनिक संक्षारण (galvanic corrosion) का कोई खतरा नहीं होता, जो ACSR में तब हो सकता है जब स्टील और एल्यूमीनियम के तार एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं। इसलिए, तटीय और अत्यधिक प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्रों में इसका उपयोग करना बहुत फायदेमंद होता है।
 * बेहतर यांत्रिक गुण (Better Mechanical Properties): 
AAAC की तन्यता शक्ति (tensile strength) ACSR के समान आकार के कंडक्टर के बराबर या उससे अधिक हो सकती है। इसमें ACSR की तुलना में बेहतर शिथिलता (sag) गुण होते हैं, जिससे दो पोल के बीच की दूरी बढ़ाई जा सकती है और टावरों की संख्या कम हो सकती है।
 * कम वजन और अधिक धारा क्षमता: 
चूंकि इसमें स्टील कोर नहीं होता, यह ACSR की तुलना में हल्का होता है। इसका कम वजन टावरों पर कम भार डालता है। साथ ही, AAAC कंडक्टर समान आकार के ACSR की तुलना में 15-20% अधिक करंट वहन कर सकता है।
 * कम कोरोना लॉस: 
AAAC की सतह की कठोरता (surface hardness) ACSR से अधिक होती है, जिससे इसे हैंडलिंग के दौरान नुकसान कम होता है। इसकी चिकनी सतह के कारण उच्च वोल्टेज पर कोरोना लॉस (corona loss) भी कम होता है।
 * अधिक परिचालन तापमान (Higher Operating Temperature): 
AAAC कंडक्टर 85°C तक के स्थिर तापमान पर काम कर सकता है, जबकि ACSR कंडक्टर आमतौर पर 75°C तक स्थिर होता है। यह अधिक तापमान पर काम करने की क्षमता इसे बेहतर प्रदर्शन करने की अनुमति देती है।
संक्षेप में, 
AAAC कंडक्टर का उपयोग ट्रांसमिशन और वितरण लाइनों में तब किया जाता है जब संक्षारण प्रतिरोध, कम वजन, और बेहतर शिथिलता गुणों की आवश्यकता होती है। यह उन क्षेत्रों में एक आदर्श विकल्प है जहां समुद्री हवा या औद्योगिक प्रदूषण के कारण संक्षारण एक बड़ी समस्या है।





ट्रांसमिशन लाइनों में एएसी (AAC - All Aluminium Conductor) कंडक्टर का उपयोग मुख्य रूप से वितरण लाइनों (distribution lines) और कम दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों में किया जाता है, जहाँ इसकी विशेषताओं के कारण इसे एक उपयुक्त विकल्प माना जाता है। एएसी कंडक्टर का निर्माण 99.5% शुद्ध एल्यूमीनियम से किया जाता है। यह एक स्ट्रैंडेड (stranded) कंडक्टर है, जिसका मतलब है कि यह कई पतले एल्यूमीनियम तारों को एक साथ मरोड़कर बनाया जाता है।

इसका उपयोग निम्नलिखित तरीकों से किया जाता है:
 * वितरण लाइनें: 
एएसी कंडक्टर का सबसे अधिक उपयोग शहरी क्षेत्रों में 11 kV तक की प्राथमिक और माध्यमिक वितरण लाइनों के लिए किया जाता है। इसकी अच्छी चालकता (conductivity) और कम वजन इसे इन अनुप्रयोगों के लिए आदर्श बनाता है।
 * बस-बार कनेक्शन (Bus-bar Connections): सबस्टेशन में बस-बार से कनेक्शन के लिए भी एएसी कंडक्टर का उपयोग किया जाता है।
 * ओवरहेड लाइनें:
शहरी क्षेत्रों में जहाँ कम दूरी की ओवरहेड लाइनें होती हैं, वहाँ एएसी कंडक्टर का उपयोग किया जाता है।
एएसी कंडक्टर की विशेषताएं:
 * कम वजन:
एएसी कंडक्टर शुद्ध एल्यूमीनियम से बना होता है, जो तांबे की तुलना में बहुत हल्का होता है। इसका कम वजन ट्रांसमिशन टावरों पर लगने वाले भार को कम करता है, जिससे टावरों की लागत और निर्माण दोनों में बचत होती है।
 * उत्कृष्ट चालकता: 
शुद्ध एल्यूमीनियम बिजली का एक बहुत अच्छा चालक है, जो इसे विद्युत ऊर्जा को कुशलतापूर्वक प्रसारित करने की अनुमति देता है।
 * उत्कृष्ट संक्षारण प्रतिरोध:
एएसी कंडक्टर में संक्षारण प्रतिरोध बहुत अच्छा होता है, खासकर जब इसे प्रदूषित या नम वातावरण में उपयोग किया जाता है।
एएसी की सीमाएं:
एएसी कंडक्टर की सबसे बड़ी सीमा इसकी कम यांत्रिक शक्ति है। क्योंकि यह पूरी तरह से शुद्ध एल्यूमीनियम से बना होता है और इसमें स्टील या किसी मिश्र धातु का उपयोग नहीं होता, इसकी तन्यता शक्ति (tensile strength) बहुत कम होती है। इस कारण से:
 * यह लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों (long-distance transmission lines) के लिए उपयुक्त नहीं है, जहाँ कंडक्टर को हवा, बर्फ और अन्य यांत्रिक भारों का सामना करना पड़ता है।
 * इसकी कम यांत्रिक शक्ति के कारण इसमें अधिक शिथिलता (sag) होती है, जिसका मतलब है कि दो पोल के बीच कंडक्टर बहुत नीचे झुक जाता है। इसे नियंत्रित करने के लिए पोल को एक दूसरे के बहुत करीब लगाना पड़ता है, जिससे कुल लागत बढ़ सकती है।
संक्षेप में:
एएसी कंडक्टर का उपयोग वहाँ किया जाता है जहाँ अच्छी चालकता और कम वजन की आवश्यकता होती है, लेकिन उच्च यांत्रिक शक्ति की नहीं। यह मुख्य रूप से कम दूरी की वितरण लाइनों और सबस्टेशन कनेक्शनों में एक किफायती और प्रभावी विकल्प है। लंबी दूरी की हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों के लिए, जहां उच्च शक्ति की आवश्यकता होती है, ACSR या AAAC जैसे कंडक्टरों को प्राथमिकता दी जाती है।



 ट्रांसमिशन लाइन के संदर्भ में "डिस्क" (disk) या "ड्रॉप" (drop) या "सैग" (sag) से हो। ये तीनों ही ट्रांसमिशन लाइनों में महत्वपूर्ण गणनाएं हैं। मैं आपको इन तीनों के बारे में जानकारी दे सकता हूँ:

1. डिस्क (Insulator Disc) की संख्या की गणना
ट्रांसमिशन लाइनों में बिजली के तारों को टावर से अलग रखने के लिए इंसुलेटर का उपयोग होता है, जो डिस्क के रूप में होते हैं। वोल्टेज जितना अधिक होता है, उतनी ही अधिक डिस्क की आवश्यकता होती है।
गणना कैसे करें:
एक सामान्य नियम के अनुसार, 11 kV के लिए एक डिस्क का उपयोग होता है। इसके बाद, हर 11 kV वोल्टेज के लिए एक अतिरिक्त डिस्क जोड़ी जाती है।
 * सूत्र: आवश्यक डिस्क की संख्या = (सिस्टम वोल्टेज / 11) + कुछ अतिरिक्त डिस्क (सुरक्षा के लिए)
 * उदाहरण:
   * 132 kV ट्रांसमिशन लाइन के लिए:
   * (132 / 11) = 12 डिस्क।
   * सुरक्षा के लिए कुछ अतिरिक्त डिस्क (जैसे 1 या 2) जोड़ी जाती हैं। तो, कुल 13 से 14 डिस्क हो सकती हैं।
   * 400 kV ट्रांसमिशन लाइन के लिए:
   * (400 / 11) \approx 36.36 डिस्क।
   * इसे 37 मानकर और सुरक्षा के लिए कुछ अतिरिक्त डिस्क जोड़कर, 400 kV लाइन में लगभग 21 से 24 डिस्क का उपयोग होता है। (यह कोरोना प्रभाव और सर्ज वोल्टेज जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है)।
2. वोल्टेज ड्रॉप (Voltage Drop) की गणना
वोल्टेज ड्रॉप का मतलब है कि ट्रांसमिशन लाइन में बिजली भेजने के दौरान वोल्टेज में कितनी कमी आती है। यह लाइन के प्रतिरोध (resistance) और प्रतिघात (reactance) के कारण होता है।
गणना कैसे करें:
 * सूत्र: वोल्टेज ड्रॉप (V_drop) = I(R \cos\phi + X \sin\phi)
   * यहाँ, I = लाइन में बहने वाली धारा (current)
   * R = लाइन का प्रतिरोध (resistance)
   * X = लाइन का प्रतिघात (reactance)
   * \cos\phi = पावर फैक्टर (power factor)
 * यह गणना ट्रांसमिशन लाइन के प्रकार (शॉर्ट, मीडियम या लॉन्ग) पर निर्भर करती है और इसमें और भी जटिल कारक शामिल हो सकते हैं।
3. सैग (Sag) की गणना
सैग का मतलब है कि दो टावरों के बीच तार का कितना झुकाव (झोल) है। यह तार के वजन और उस पर लगने वाले तनाव (tension) पर निर्भर करता है।
गणना कैसे करें:
 * सूत्र: S = \frac{WL^2}{8T}
   * यहाँ, S = सैग (झुकाव)
   * W = प्रति इकाई लंबाई में कंडक्टर का वजन (weight per unit length of conductor)
   * L = दो टावरों के बीच की दूरी (span length)
   * T = कंडक्टर में तनाव (tension)
 * तापमान, हवा और बर्फ जैसे पर्यावरणीय कारक भी सैग को प्रभावित करते हैं।
अगर आपका मतलब किसी और तकनीकी शब्द से था, तो कृपया उसे स्पष्ट करें ताकि मैं आपको सही जानकारी दे सकूं।



ट्रान्समिशन लाइन में डिस्क का कनेक्शन और डिस्क की संख्या का उपयोग वोल्टेज के आधार पर होता है। यहाँ इसका विवरण दिया गया है:

डिस्क का कनेक्शन (Connection of Discs)
ट्रान्समिशन लाइन में डिस्क को एक स्ट्रिंग में एक साथ जोड़ा जाता है, जिसे इंसुलेटर स्ट्रिंग कहा जाता है। यह स्ट्रिंग टावर से लटकी होती है और कंडक्टर को सपोर्ट करती है।
 * सस्पेंशन इंसुलेटर स्ट्रिंग (Suspension Insulator String):
   * इस प्रकार की स्ट्रिंग का उपयोग ओवरहेड ट्रान्समिशन लाइन में कंडक्टर को सपोर्ट करने के लिए किया जाता है।
   * इसमें डिस्क को एक-दूसरे के नीचे, वर्टिकल (vertical) तरीके से जोड़ा जाता है।
   * इसका उपयोग वहां किया जाता है जहां कंडक्टर सीधे (straight line) जा रहा हो।
 * स्ट्रेन इंसुलेटर स्ट्रिंग (Strain Insulator String):
   * यह स्ट्रिंग कंडक्टर को खींचने वाले बल (tension) को सहने के लिए डिज़ाइन की गई है।
   * यह आमतौर पर ट्रान्समिशन लाइन के अंत में, मोड़ों पर (corners), या नदी पार करते समय उपयोग की जाती है।
   * इसमें डिस्क को हॉरिजॉन्टल (horizontal) तरीके से एक-दूसरे के बगल में जोड़ा जाता है।
कितने kV के लिए कितने डिस्क का उपयोग होगा (Number of Discs for Different kV)
डिस्क की संख्या वोल्टेज पर निर्भर करती है। सामान्य नियम यह है कि प्रत्येक 11 kV के लिए एक डिस्क का उपयोग किया जाता है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से, कुछ अतिरिक्त डिस्क को सुरक्षा और आर्किंग (arcing) के लिए जोड़ा जाता है।
यहाँ एक सामान्य अनुमानित तालिका है:
| वोल्टेज (kV) | अनुमानित डिस्क की संख्या |
|---|---|
| 11 kV | 1 (या 2, सुरक्षा के लिए) |
| 33 kV | 3 |
| 66 kV | 5 से 6 |
| 132 kV | 9 से 11 |
| 220 kV | 15 से 17 |
| 400 kV | 25 से 30 |
| 765 kV | 40 से 50 |
कुछ महत्वपूर्ण बातें (Important Points)
 * ऊपर दी गई संख्याएँ केवल अनुमान हैं। डिस्क की वास्तविक संख्या पर्यावरणीय कारकों (जैसे प्रदूषण), लाइन के डिज़ाइन, और आर्किंग डिस्टेंस (arcing distance) पर भी निर्भर करती है।
 * आर्किंग हॉर्न (Arcing Horns): 
हाई-वोल्टेज लाइनों में, इंसुलेटर स्ट्रिंग के सिरों पर आर्किंग हॉर्न या रिंग लगाई जाती है। ये रिंग्स वोल्टेज को समान रूप से वितरित करती हैं और लाइटनिंग या ओवरवोल्टेज के कारण होने वाले फ्लैशओवर से इंसुलेटर को बचाती हैं।
 * पिन टाइप इंसुलेटर (Pin Type Insulator): 
33 kV तक की लाइनों के लिए, पिन टाइप इंसुलेटर का भी उपयोग किया जाता है, जिसमें डिस्क का उपयोग नहीं होता। 33 kV से ऊपर की लाइनों के लिए, डिस्क इंसुलेटर स्ट्रिंग ही एकमात्र विकल्प है।




ट्रान्समिशन लाइन में डिस्क की संख्या की गणना के लिए एक सामान्य सूत्र है, जो लाइन वोल्टेज (Line Voltage) और एक डिस्क की वोल्टेज रेटिंग पर आधारित होता है। 

यह सूत्र इस प्रकार है:
N = \frac{V_{L}}{\sqrt{3} \times 11} + S_{f}
जहां:
 * N = डिस्क की कुल संख्या।
 * V_{L} = लाइन वोल्टेज (kV में)।
 * 11 = एक डिस्क इंसुलेटर की वोल्टेज रेटिंग (kV में)।
 * \sqrt{3} = यह लाइन वोल्टेज को फेज वोल्टेज (Phase Voltage) में बदलने के लिए है, क्योंकि प्रत्येक डिस्क इंसुलेटर पर फेज वोल्टेज ही प्रभावी होता है।
 * S_{f} = सेफ्टी फैक्टर (Safety Factor), जो आमतौर पर 1 या 2 लिया जाता है।
इस सूत्र का उपयोग करने का कारण:
 * फेज वोल्टेज (Phase Voltage): 
ट्रान्समिशन लाइन में इंसुलेटर स्ट्रिंग का एक सिरा टावर से जुड़ा होता है (जो कि ग्राउंड पोटेंशियल पर होता है) और दूसरा सिरा कंडक्टर से। इस प्रकार, इंसुलेटर स्ट्रिंग के पार जो वोल्टेज होता है, वह लाइन वोल्टेज नहीं, बल्कि फेज वोल्टेज होता है। तीन-फेज सिस्टम में, फेज वोल्टेज (Vp) लाइन वोल्टेज (Vl) का 1/\sqrt{3} गुना होता है।
   V_{P} = \frac{V_{L}}{\sqrt{3}}
 * डिस्क की रेटिंग: 
प्रत्येक डिस्क इंसुलेटर की मानक रेटिंग 11 kV होती है।
 * सेफ्टी फैक्टर (Safety Factor):
हम हमेशा गणना की गई संख्या से कुछ अतिरिक्त डिस्क लगाते हैं। यह कई कारणों से किया जाता है:
   * वोल्टेज उतार-चढ़ाव (Voltage Fluctuation): लाइन वोल्टेज में होने वाले उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए।
   * प्रदूषण (Pollution): 
प्रदूषित वातावरण (जैसे औद्योगिक क्षेत्र या समुद्री तट) में इन्सुलेटिंग क्षमता कम हो जाती है, इसलिए अधिक डिस्क की आवश्यकता होती है।
   * यांत्रिक शक्ति (Mechanical Strength):
कंडक्टर के वजन और हवा के दबाव को सहने के लिए।
   * स्ट्रिंग दक्षता (String Efficiency): 
इंसुलेटर स्ट्रिंग की दक्षता 100% नहीं होती है, इसलिए वोल्टेज समान रूप से वितरित नहीं होता। अतिरिक्त डिस्क इस समस्या को कम करने में मदद करती है।
उदाहरण के साथ गणना (Calculation with an example):
मान लीजिए आपको 132 kV की ट्रान्समिशन लाइन के लिए डिस्क की संख्या ज्ञात करनी है।
 * लाइन वोल्टेज (V_{L}): 132 kV
 * सेफ्टी फैक्टर (S_{f}): 1 मान लेते हैं।
अब सूत्र में मान रखते हैं:
N = \frac{132}{\sqrt{3} \times 11} + 1
N = \frac{132}{1.732 \times 11} + 1
N = \frac{132}{19.052} + 1
N \approx 6.92 + 1
N \approx 7.92
चूंकि डिस्क की संख्या पूर्णांक (integer) में होनी चाहिए, इसलिए इसे अगले पूर्णांक में बदल देते हैं।
N \approx 8
अतः
132 kV की ट्रान्समिशन लाइन के लिए लगभग 8 डिस्क की आवश्यकता होगी। यदि आप सेफ्टी फैक्टर 2 लेते हैं, तो यह संख्या 9 हो जाएगी।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह एक अनुमानित सूत्र है। वास्तविक संख्या कई अन्य इंजीनियरिंग और पर्यावरणीय कारकों पर भी निर्भर करती है, जैसे कि प्रदूषण का स्तर, मौसम की स्थिति और टावर का डिज़ाइन।




कंडक्टर (चालक) के प्रकार कई अलग-अलग तरीकों से वर्गीकृत किए जा सकते हैं, जैसे कि उनके भौतिक गुण, उपयोग और बनावट के आधार पर। यहाँ कुछ मुख्य प्रकार दिए गए हैं:

सामग्री के आधार पर:
 * धात्विक कंडक्टर (Metallic Conductors): 
ये सबसे आम प्रकार के कंडक्टर हैं जिनका उपयोग बिजली के तारों और उपकरणों में होता है। इनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं जो आसानी से विद्युत प्रवाह को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं।
   * कॉपर (Copper): 
यह सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले कंडक्टर में से एक है क्योंकि इसमें उच्च चालकता, अच्छा तन्यता (ductility) और जंग के प्रति अच्छा प्रतिरोध होता है। यह घरों की वायरिंग, मोटर वाइंडिंग और केबलों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
   * एल्युमीनियम (Aluminium):
कॉपर की तुलना में हल्का और सस्ता होने के कारण, यह ट्रांसमिशन लाइनों, overhead तारों और कुछ घरेलू वायरिंग में इस्तेमाल होता है।
   * चांदी (Silver): 
यह सबसे अच्छा विद्युत कंडक्टर है, लेकिन इसकी उच्च कीमत के कारण, इसका उपयोग केवल विशेष अनुप्रयोगों में होता है, जैसे कि हाई-फ्रीक्वेंसी उपकरण या कुछ स्विच संपर्कों में।
   * सोना (Gold): 
यह भी बहुत अच्छा कंडक्टर है और जंग नहीं लगने के कारण, इसका उपयोग छोटे, संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक घटकों और कनेक्टरों में होता है।
 * अधात्विक कंडक्टर (Non-Metallic Conductors): कुछ अधातु भी बिजली का संचालन कर सकती हैं।
   * ग्रेफाइट (Graphite):
कार्बन का एक रूप होने के कारण, ग्रेफाइट एक अच्छा कंडक्टर है और इसका उपयोग बैटरी के इलेक्ट्रोड या इलेक्ट्रिक ब्रश बनाने में होता है।
 * आयनिक कंडक्टर (Ionic Conductors): 
ये वे कंडक्टर हैं जो तरल अवस्था में होते हैं और आयनों के माध्यम से बिजली का संचालन करते हैं।
   * नमकीन पानी (Saltwater): 
इसमें मौजूद आयन (जैसे, सोडियम और क्लोरीन) इसे एक अच्छा विद्युत कंडक्टर बनाते हैं।
 * सुपरकंडक्टर (Superconductors): 
ये विशेष सामग्री हैं जो बहुत कम तापमान पर बिना किसी प्रतिरोध के बिजली का संचालन करती हैं। इनका उपयोग शक्तिशाली मैग्नेट और कुछ उन्नत तकनीक में होता है।
संरचना और उपयोग के आधार पर:
 * सॉलिड कंडक्टर (Solid Conductor):
यह एक सिंगल, ठोस तार होता है। इसका उपयोग उन जगहों पर होता है जहाँ कठोरता और कम लचीलेपन की आवश्यकता होती है, जैसे अर्थिंग या कुछ बस बार में।
 * स्ट्रैंडेड कंडक्टर (Stranded Conductor): 
इसमें कई पतले तारों को एक साथ मरोड़कर (stranded) बनाया जाता है। यह सॉलिड कंडक्टर की तुलना में अधिक लचीला होता है और इसका उपयोग अधिकांश घरेलू और औद्योगिक वायरिंग में होता है।
 * बंडल कंडक्टर (Bundle Conductor):
यह एक ही फेज के लिए एक से अधिक कंडक्टरों को एक साथ बंडल करके बनाया जाता है। इसका उपयोग उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों में होता है, जिससे कोरोना लॉस (corona loss) और इंडक्टेंस को कम किया जा सके।
ट्रांसमिशन लाइनों में विशेष रूप से उपयोग होने वाले कंडक्टर:
 * ACSR (Aluminum Conductor Steel Reinforced): 
इसमें स्टील का मजबूत कोर और उसके चारों तरफ एल्युमीनियम के तार होते हैं।
 * AAAC (All-Aluminum Alloy Conductor): इसमें एल्युमीनियम के खास अलॉय का इस्तेमाल होता है, जो इसे हल्का और जंग प्रतिरोधी बनाता है।
 * AAC (All-Aluminum Conductor): 
यह शुद्ध एल्युमीनियम से बना होता है, जिसका उपयोग कम दूरी की लाइनों में होता है।
कंडक्टर का चुनाव हमेशा उसकी चालकता, लागत, वजन, मजबूती और जंग के प्रति प्रतिरोध जैसे कारकों पर निर्भर करता है।



कंडक्टर (चालक) के कई नाम और प्रकार होते हैं, जो उनकी सामग्री, बनावट और उपयोग के आधार पर तय होते हैं।

मुख्य सामग्री के आधार पर नाम:
 * तांबा (Copper): 
यह सबसे आम कंडक्टर है, जो अपनी उच्च चालकता और तन्यता के लिए जाना जाता है। इसका उपयोग घरों की वायरिंग, मोटर वाइंडिंग और केबलों में होता है।
 * एल्युमीनियम (Aluminum):
यह तांबे की तुलना में हल्का और सस्ता होता है, इसलिए यह ट्रांसमिशन लाइनों और बड़े पैमाने की बिजली वितरण प्रणालियों में बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होता है।
 * चांदी (Silver): 
यह सबसे अच्छा विद्युत कंडक्टर है, लेकिन इसकी कीमत बहुत अधिक होती है। इसका उपयोग विशेष और छोटे इलेक्ट्रॉनिक घटकों में होता है।
 * सोना (Gold): 
जंग-रोधी होने के कारण, इसका उपयोग छोटे और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के कनेक्टरों और सर्किट बोर्डों में होता है।
 * ग्रेफाइट (Graphite): 
यह कार्बन का एक रूप है और इसका उपयोग बैटरी के इलेक्ट्रोड या इलेक्ट्रिक मोटर के ब्रश बनाने में होता है।
 * स्टील (Steel): 
इसकी मज़बूती के कारण, इसका उपयोग अक्सर अन्य कंडक्टरों (जैसे एल्युमीनियम) के साथ मिलकर किया जाता है ताकि उन्हें यांत्रिक शक्ति मिल सके।
बनावट और उपयोग के आधार पर नाम:
 * सॉलिड कंडक्टर (Solid Conductor): 
एक ही ठोस तार से बना होता है, जिसका उपयोग अक्सर अर्थिंग (earthing) या कठोर वायरिंग में होता है।
 * स्ट्रैंडेड कंडक्टर (Stranded Conductor): 
कई पतले तारों को एक साथ मरोड़कर बनाया जाता है, जिससे यह अधिक लचीला होता है। यह घरेलू वायरिंग और लचीले केबलों में इस्तेमाल होता है।
 * बंडल कंडक्टर (Bundle Conductor):
इसमें एक ही फेज के लिए कई कंडक्टर एक साथ बंडल किए जाते हैं। इसका उपयोग उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों में होता है ताकि बिजली की हानि (corona loss) कम हो सके।
ट्रांसमिशन लाइनों के लिए विशेष कंडक्टर के नाम:
 * ACSR (Aluminum Conductor Steel Reinforced): 
यह सबसे ज़्यादा उपयोग होने वाला ट्रांसमिशन लाइन कंडक्टर है। इसमें स्टील का कोर होता है जो मज़बूती देता है, और चारों ओर एल्युमीनियम के तार होते हैं जो बिजली का संचालन करते हैं।
 * AAAC (All-Aluminum Alloy Conductor): यह एल्युमीनियम के एक खास अलॉय से बना होता है जो इसे हल्का और मजबूत बनाता है।
 * AAC (All-Aluminum Conductor):
यह पूरी तरह से शुद्ध एल्युमीनियम से बना होता है और कम दूरी की लाइनों में इस्तेमाल होता है।
 * ACAR (Aluminum Conductor Alloy Reinforced): 
इसमें एल्युमीनियम के अलॉय के तार और शुद्ध एल्युमीनियम के तार दोनों का उपयोग होता है, जो इसे अच्छी चालकता और मज़बूती देता है।
इसके अलावा, ACSR कंडक्टरों को उनके आकार और क्षमता के आधार पर जानवरों के नाम भी दिए जाते हैं, जैसे "Dog," "Panther," "Zebra," और "Moose" कंडक्टर। ये नाम कंडक्टर की विशिष्टताओं को दर्शाते हैं।



ट्रांसमिशन लाइन के टावर की ऊंचाई कई कारकों पर निर्भर करती है, इसलिए इसकी कोई निश्चित ऊंचाई नहीं होती। हालाँकि, एक सामान्य अनुमान के तौर पर, टावर की ऊंचाई 15 मीटर से लेकर 55 मीटर (लगभग 49 फीट से 180 फीट) तक हो सकती है।

टावर की ऊंचाई को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक इस प्रकार हैं:
 * वोल्टेज लेवल (Voltage Level): 
सबसे महत्वपूर्ण कारक वोल्टेज है। जितना ज़्यादा वोल्टेज होगा, कंडक्टरों को ज़मीन से उतना ही अधिक ऊपर रखना होगा ताकि सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
   * उदाहरण के लिए, 132 kV की लाइन के लिए टावर 6.1 मीटर की न्यूनतम ज़मीन से दूरी सुनिश्चित करेगा, जबकि 400 kV की लाइन के लिए यह दूरी 8.84 मीटर या उससे अधिक हो सकती है।
 * कंडक्टर का सैग (Conductor Sag): 
कंडक्टर दो टावरों के बीच गुरुत्वाकर्षण के कारण थोड़ा नीचे की ओर झुकता है, जिसे सैग कहते हैं। टावर की ऊंचाई इस सैग को ध्यान में रखकर तय की जाती है ताकि कंडक्टर ज़मीन से निर्धारित न्यूनतम दूरी पर बना रहे।
 * इंसुलेटर की लंबाई (Length of Insulators): 
उच्च वोल्टेज वाली लाइनों में, लंबे इंसुलेटर स्ट्रिंग (insulator string) का उपयोग किया जाता है, जिससे टावर की कुल ऊंचाई भी बढ़ जाती है।
 * ग्राउंड क्लीयरेंस (Ground Clearance):
यह कंडक्टर और ज़मीन के बीच की न्यूनतम सुरक्षित दूरी है। यह सुरक्षा मानकों द्वारा तय की जाती है और वोल्टेज के साथ बढ़ती है।
 * स्पैन की लंबाई (Span Length): 
दो टावरों के बीच की दूरी को स्पैन कहते हैं। लंबी स्पैन वाली लाइनों में सैग ज़्यादा होगा, इसलिए वहाँ ऊँचे टावरों की आवश्यकता होती है।
 * भूभाग (Terrain): 
अगर लाइन किसी नदी, घाटी, या अन्य बाधा को पार करती है, तो वहाँ विशेष रूप से ऊँचे टावर बनाए जाते हैं।
विश्व के सबसे ऊँचे ट्रांसमिशन टावरों की ऊंचाई सैकड़ों मीटर तक हो सकती है, खासकर जब उन्हें किसी बड़ी नदी या खाड़ी को पार करना होता है। लेकिन ये विशेष मामले होते हैं। आम तौर पर, टावर की ऊंचाई को ऊपर बताए गए कारकों के आधार पर ही डिज़ाइन किया जाता है।




ट्रांसमिशन लाइन में सैग (Sag) का मतलब है दो टावरों या खंभों के बीच लटके हुए कंडक्टर (तार) का सबसे निचला बिंदु और टावर के सपोर्ट पॉइंट के बीच की ऊर्ध्वाधर (vertical) दूरी।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं:

जब हम दो खंभों के बीच एक तार खींचते हैं, तो गुरुत्वाकर्षण बल (gravity) के कारण वह तार सीधा नहीं रहता बल्कि बीच से थोड़ा नीचे की तरफ झुक जाता है। इसी झुकाव को सैग कहते हैं।
सैग को प्रभावित करने वाले कारक
सैग कई बातों पर निर्भर करता है:
 * कंडक्टर का वजन (Weight of Conductor): कंडक्टर जितना भारी होगा, गुरुत्वाकर्षण के कारण उसमें उतना ही ज़्यादा झुकाव (सैग) आएगा।
 * स्पैन की लंबाई (Span Length): 
दो टावरों के बीच की दूरी को स्पैन कहते हैं। स्पैन जितना ज़्यादा होगा, सैग भी उतना ही ज़्यादा होगा।
 * टेंशन (Tension): 
कंडक्टर को जितना ज़्यादा कसा (खींचा) जाएगा, सैग उतना ही कम होगा। लेकिन बहुत ज़्यादा कसने से कंडक्टर पर तनाव बढ़ जाता है, जिससे वह टूट सकता है।
 * तापमान (Temperature): 
तापमान बढ़ने पर कंडक्टर फैलता है, जिससे उसकी लंबाई बढ़ जाती है और सैग भी बढ़ जाता है। वहीं, तापमान घटने पर कंडक्टर सिकुड़ता है और सैग कम हो जाता है।
सैग का महत्व
सैग को सही ढंग से निर्धारित करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह सीधे तौर पर सुरक्षा से जुड़ा होता है।
 * सुरक्षा (Safety):
अगर सैग बहुत ज़्यादा होगा, तो कंडक्टर ज़मीन या अन्य इमारतों से टकरा सकता है, जिससे शॉर्ट सर्किट या जान का खतरा हो सकता है। इसलिए, सैग को हमेशा एक सुरक्षित सीमा के अंदर रखा जाता है, ताकि कंडक्टर ज़मीन से न्यूनतम सुरक्षित दूरी (ग्राउंड क्लीयरेंस) पर रहे।
 * यांत्रिक तनाव (Mechanical Stress): 
अगर सैग बहुत कम होगा (यानी तार बहुत कसा होगा), तो कंडक्टर पर बहुत ज़्यादा तनाव पड़ेगा। ख़ासकर ठंडे मौसम में जब तार सिकुड़ता है, तो यह तनाव इतना बढ़ सकता है कि तार टूट जाए।
इसलिए, ट्रांसमिशन लाइन को डिज़ाइन करते समय, इंजीनियर सैग की गणना करते हैं ताकि कंडक्टर पर तनाव और सुरक्षा के बीच एक सही संतुलन बना रहे।




ट्रांसमिशन लाइन में दो टावरों के बीच सैग की गणना करने के लिए एक विशेष फ़ॉर्मूला का उपयोग किया जाता है। यह फ़ॉर्मूला भौतिकी के सिद्धांतों पर आधारित है, और यह इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों टावर एक ही स्तर पर हैं या अलग-अलग स्तरों पर।

1. जब दोनों टावर एक ही स्तर पर हों (Supports at Equal Level)
यह सबसे सरल स्थिति है। इस मामले में, सैग (S) की गणना के लिए निम्नलिखित फ़ॉर्मूला का उपयोग किया जाता है:
यहाँ,
 * S = सैग (मीटर में)
 * w = कंडक्टर का प्रति इकाई लंबाई वजन (न्यूटन प्रति मीटर या किलोग्राम प्रति मीटर में)
 * L = स्पैन की लंबाई (दो टावरों के बीच की क्षैतिज दूरी, मीटर में)
 * T = कंडक्टर पर कार्यरत तनाव (टेंशन) (न्यूटन या किलोग्राम में)
यह फ़ॉर्मूला बताता है कि सैग:
 * कंडक्टर के वजन (w) और स्पैन की लंबाई के वर्ग (L^2) के सीधे आनुपातिक होता है।
 * कंडक्टर पर कार्यरत तनाव (T) के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
2. जब दोनों टावर अलग-अलग स्तर पर हों (Supports at Unequal Level)
जब टावर अलग-अलग ऊंचाई पर होते हैं (जैसे, पहाड़ी इलाकों में), तो गणना थोड़ी जटिल हो जाती है। इस स्थिति में, सबसे पहले सबसे निचले बिंदु (lowest point) की स्थिति ज्ञात की जाती है, और फिर दोनों तरफ के टावरों के लिए अलग-अलग सैग की गणना की जाती है।
इस स्थिति के लिए फ़ॉर्मूला इस प्रकार है:
सबसे निचले बिंदु की दूरी (x) टावर के सपोर्ट से:
x = \frac{L}{2} - \frac{Th}{wL}
यहाँ,
 * h = दोनों टावरों की ऊंचाई का अंतर
 * बाकी सभी पद पहले की तरह ही हैं।
इसके बाद, दोनों टावरों के लिए अलग-अलग सैग (S1 और S2) की गणना की जाती है:
S1 = \frac{wx^2}{2T}
S2 = \frac{w(L-x)^2}{2T}
अतिरिक्त कारक
ऊपर दिए गए फ़ॉर्मूला आदर्श स्थितियों के लिए हैं। वास्तविक परिस्थितियों में, सैग की गणना करते समय कुछ अन्य महत्वपूर्ण कारकों को भी शामिल किया जाता है, जैसे:
 * बर्फ का वजन (Weight of Ice): 
ठंडे इलाकों में, कंडक्टर पर बर्फ जम सकती है, जिससे उसका वजन बढ़ जाता है।
 * हवा का दबाव (Wind Pressure): 
हवा कंडक्टर पर पार्श्व (horizontal) बल लगाती है, जिससे सैग में बदलाव आ सकता है।
इन कारकों को ध्यान में रखते हुए, प्रभावी वजन (W_{eff}) की गणना की जाती है, और फिर इसी प्रभावी वजन को ऊपर दिए गए फ़ॉर्मूला में w की जगह इस्तेमाल किया जाता है।
W_{eff} = \sqrt{(w_{conductor} + w_{ice})^2 + (w_{wind})^2}
सैग की सही गणना ट्रांसमिशन लाइन की सुरक्षा और विश्वसनीयता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यदि सैग बहुत कम हो, तो तार पर तनाव बढ़ सकता है और वह टूट सकता है। यदि सैग बहुत ज़्यादा हो, तो तार ज़मीन से टकराकर ख़तरा पैदा कर सकता है।




ट्रांसमिशन लाइन में सैग (झुकाव) होने के कई कारण होते हैं, जिनमें से मुख्य कारण गुरुत्वाकर्षण बल है। इसके अलावा भी कुछ कारक हैं जो सैग को प्रभावित करते हैं।

यहाँ कुछ मुख्य कारण दिए गए हैं जिनकी वजह से ट्रांसमिशन लाइन में सैग होता है:
1. गुरुत्वाकर्षण बल (Force of Gravity)
यह सैग का सबसे प्रमुख और प्राथमिक कारण है।
 * कंडक्टर (तार) का अपना एक वजन होता है।
 * यह वजन कंडक्टर पर नीचे की ओर एक बल लगाता है।
 * यह गुरुत्वाकर्षण बल कंडक्टर को नीचे खींचता है, जिससे दो टावरों के बीच तार सीधा नहीं रहता बल्कि बीच में झुक जाता है।
2. स्पैन की लंबाई (Span Length)
 * स्पैन का मतलब दो टावरों के बीच की दूरी।
 * जब स्पैन की लंबाई ज़्यादा होती है, तो कंडक्टर को नीचे खींचने वाले गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव भी बढ़ जाता है।
 * इस कारण, लंबी दूरी के स्पैन में सैग हमेशा ज़्यादा होता है, जबकि छोटे स्पैन में सैग कम होता है।
3. तापमान (Temperature)
तापमान में बदलाव का सैग पर सीधा असर पड़ता है।
 * तापमान में वृद्धि: 
जब मौसम गर्म होता है, तो कंडक्टर का तापमान भी बढ़ जाता है। ऊष्मा (heat) के कारण, कंडक्टर फैलता है और उसकी लंबाई बढ़ जाती है। लंबाई बढ़ने से कंडक्टर अधिक नीचे झुकता है, जिससे सैग बढ़ जाता है।
 * तापमान में कमी: 
जब मौसम ठंडा होता है, तो कंडक्टर सिकुड़ता है और उसकी लंबाई कम हो जाती है। लंबाई कम होने से सैग भी कम हो जाता है।
4. कंडक्टर पर तनाव (Tension on Conductor)
 * कंडक्टर पर टेंशन का मतलब है उसे कितना कसकर खींचा गया है।
 * यदि कंडक्टर पर टेंशन कम है, तो वह ढीला रहेगा और सैग ज़्यादा होगा।
 * यदि कंडक्टर पर टेंशन ज़्यादा है, तो वह कसा हुआ रहेगा और सैग कम होगा।
 * हालाँकि, टेंशन को बहुत ज़्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता, क्योंकि इससे कंडक्टर पर यांत्रिक तनाव (mechanical stress) बढ़ जाता है और वह टूट सकता है।
5. मौसम की स्थिति (Weather Conditions)
मौसम से जुड़ी कुछ स्थितियां भी सैग को बढ़ा सकती हैं:
 * बर्फबारी (Ice Loading):
ठंडे इलाकों में, कंडक्टर पर बर्फ या पाला जम सकता है। बर्फ के वजन से कंडक्टर का कुल वजन बढ़ जाता है, जिससे सैग में भारी वृद्धि होती है।
 * तेज हवा (Wind Pressure):
तेज हवाएं कंडक्टर पर एक क्षैतिज (horizontal) बल लगाती हैं, जिससे कंडक्टर एक तरफ झुक जाता है और सैग भी बढ़ सकता है।
संक्षेप में, सैग मुख्य रूप से गुरुत्वाकर्षण, स्पैन की लंबाई, तापमान और मौसम की स्थिति के कारण होता है। इन सभी कारकों को ध्यान में रखकर ही ट्रांसमिशन लाइन को डिज़ाइन किया जाता है ताकि सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।





ट्रांसमिशन लाइनें बिजली को एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने के लिए कई तरह के उपकरणों और सामग्रियों का उपयोग करती हैं। ये सामग्री बिजली के उच्च वोल्टेज को संभालने और इसे सुरक्षित रूप से वितरित करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

ट्रांसमिशन लाइन के लिए उपयोग होने वाले मुख्य उपकरण और सामग्री:
 * कंडक्टर (चालक): 
ये ट्रांसमिशन लाइनों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, जो बिजली को ले जाते हैं। इन्हें आमतौर पर एल्यूमीनियम या उसके मिश्र धातु से बनाया जाता है, क्योंकि यह हल्का और अच्छा चालक होता है। बंडल कंडक्टर का भी उपयोग किया जाता है, जिसमें कई तार एक साथ होते हैं, जो लाइनों को भारी होने से रोकते हैं और सिग्नल की स्थिरता को बढ़ाते हैं।
 * टावर और खंभे: 
ये कंडक्टरों को जमीन से ऊपर उठाने और उन्हें सुरक्षित दूरी पर रखने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ये आमतौर पर जालीनुमा स्टील संरचनाएं होती हैं जो बहुत मजबूत होती हैं।
 * इंसुलेटर (विद्युतरोधी):
ये कंडक्टरों को टावरों और खंभों से अलग करते हैं ताकि बिजली जमीन में न जाए। ये चीनी मिट्टी, ग्लास या पॉलिमर जैसी सामग्रियों से बने होते हैं और उच्च वोल्टेज को झेलने में सक्षम होते हैं।
 * फाउंडेशन और अर्थिंग सिस्टम: 
टावरों को जमीन पर स्थिर रखने के लिए मजबूत नींव (फाउंडेशन) की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, लाइनों को बिजली गिरने और अन्य खतरों से बचाने के लिए एक अर्थिंग सिस्टम भी लगाया जाता है।
 * हार्डवेयर फिटिंग और सहायक उपकरण: 
ट्रांसमिशन लाइनों में कई छोटे-छोटे हार्डवेयर भी उपयोग होते हैं, जैसे:
   * क्लैंप: 
कंडक्टरों को जोड़ने और टावरों पर सुरक्षित रखने के लिए।
   * स्पेसर: 
बंडल कंडक्टरों को एक-दूसरे से समान दूरी पर रखने के लिए।
   * ग्राउंडिंग डिवाइस: 
लाइन को जमीन से जोड़ने के लिए।
 * सर्किट ब्रेकर और रिले:
उच्च वोल्टेज के कारण, ट्रांसमिशन लाइनों को बहुत संवेदनशील सुरक्षा उपकरणों की आवश्यकता होती है। सर्किट ब्रेकर और रिले जैसे उपकरण लाइनों में किसी भी खराबी या असामान्य स्थिति का पता लगाते हैं और सुरक्षा के लिए बिजली की आपूर्ति को काट देते हैं।




ट्रांसमिशन लाइन में टावर और खंभे का उपयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से होता है:

 * कंडक्टरों को सहारा देना: 
इनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य कंडक्टरों (बिजली के तारों) को सहारा देना है। टावर और खंभे कंडक्टरों को हवा में एक निश्चित ऊंचाई पर रखते हैं ताकि वे जमीन या अन्य वस्तुओं के संपर्क में न आएं।
 * सुरक्षा सुनिश्चित करना: 
हाई वोल्टेज बिजली बहुत खतरनाक होती है। टावर और खंभे तारों को इतनी ऊंचाई पर रखते हैं कि लोग, जानवर और वाहन उनसे सुरक्षित दूरी पर रहें।
 * इंसुलेटर लगाना: 
टावरों पर इंसुलेटर लगाए जाते हैं, जो कंडक्टर और टावर की धातु संरचना के बीच एक अवरोध का काम करते हैं। इससे बिजली तारों से टावर में नहीं जाती और शॉर्ट सर्किट का खतरा नहीं रहता।
 * दूरी बनाए रखना: 
टावर और खंभे यह सुनिश्चित करते हैं कि अलग-अलग फेज के कंडक्टरों के बीच और कंडक्टरों व जमीन के बीच पर्याप्त दूरी बनी रहे, ताकि बिजली का प्रवाह सुरक्षित रूप से हो सके।
 * लंबी दूरी के लिए: 
ट्रांसमिशन टावर विशेष रूप से लंबी दूरी तक बिजली पहुंचाने के लिए बनाए जाते हैं, क्योंकि वे भारी कंडक्टरों और बड़े यांत्रिक तनाव को संभाल सकते हैं।




ट्रांसमिशन लाइन में इंसुलेटर का उपयोग मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कार्यों के लिए किया जाता है:

 * बिजली के प्रवाह को रोकना (इंसुलेशन): इंसुलेटर कंडक्टरों (बिजली के तारों) और टावर या खंभे की धातु संरचना के बीच एक विद्युत अवरोधक (electrical barrier) का काम करते हैं। इसका मतलब है कि वे बिजली को तारों से टावर में जाने से रोकते हैं। चूँकि टावर जमीन से जुड़ा होता है, अगर बिजली टावर में चली जाए तो यह शॉर्ट सर्किट का कारण बन सकती है और बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है।
 * कंडक्टरों को सहारा देना: इंसुलेटर मजबूत सामग्री जैसे चीनी मिट्टी (porcelain), कांच (glass), या पॉलिमर से बने होते हैं। वे न केवल बिजली को रोकते हैं, बल्कि वे कंडक्टरों को टावर से मजबूती से पकड़कर उन्हें सहारा भी देते हैं।
इंसुलेटर का उपयोग कैसे होता है:
इंसुलेटर को ट्रांसमिशन लाइन में उनकी जरूरत के अनुसार अलग-अलग तरीकों से लगाया जाता है:
 * सस्पेंशन इंसुलेटर (Suspension Insulator):
   * इनका उपयोग आमतौर पर सीधी ट्रांसमिशन लाइनों में किया जाता है।
   * इसमें कई डिस्क (चपटी गोल प्लेटें) एक चेन के रूप में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।
   * यह चेन टावर के क्रॉस-आर्म (cross-arm) से लटकी होती है, और कंडक्टर इस चेन के सबसे निचले सिरे से जुड़ा होता है।
   * इस व्यवस्था से कंडक्टर को गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर खींचने वाले बल को संभालने में मदद मिलती है।
 * स्ट्रेन इंसुलेटर (Strain Insulator):
   * इनका उपयोग ट्रांसमिशन लाइन के कोने (मोड़), डेड-एंड (लाइन का अंत), या जहाँ लाइन किसी नदी या सड़क को पार करती है, वहाँ किया जाता है।
   * इन स्थानों पर कंडक्टरों पर बहुत अधिक क्षैतिज खिंचाव (horizontal tension) पड़ता है।
   * स्ट्रेन इंसुलेटर को क्षैतिज रूप से लगाया जाता है ताकि वे इस खिंचाव को झेल सकें। ये भी सस्पेंशन इंसुलेटर की तरह डिस्क की चेन से बने होते हैं, लेकिन उनका उपयोग अलग तरीके से होता है।
 * पिन इंसुलेटर (Pin Insulator):
   * इनका उपयोग कम वोल्टेज (11 kV तक) वाली लाइनों में होता है।
   * ये एक पिन की तरह होते हैं जो टावर के क्रॉस-आर्म पर खड़े होते हैं, और कंडक्टर को ऊपर के खांचे (groove) में रखा जाता है।
संक्षेप में, 
इंसुलेटर ट्रांसमिशन लाइनों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो बिजली के सुरक्षित और निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं। वे न केवल कंडक्टरों को सहारा देते हैं बल्कि उन्हें टावर से अलग करके एक सुरक्षात्मक ढाल का काम भी करते हैं।




ट्रांसमिशन लाइन में, अर्थिंग और फाउंडेशन दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण घटक हैं, लेकिन उनके कार्य अलग-अलग होते हैं।
यहाँ बताया गया है कि इनका उपयोग कैसे किया जाता है:

1. फाउंडेशन (Foundation) का उपयोग
फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य टावर को जमीन पर मजबूती से खड़ा करना है। टावर पर कई तरह के बल काम करते हैं, जैसे:
 * कंडक्टरों का भार: 
टावर को कंडक्टरों के वजन को संभालना होता है।
 * हवा का दबाव: 
तेज हवाएं टावर को हिला सकती हैं।
 * बर्फ का भार:
ठंडे इलाकों में तारों पर जमने वाली बर्फ का भार।
 * तारों का खिंचाव:
कंडक्टरों का खिंचाव भी टावर पर दबाव डालता है।
इन सभी बलों का सामना करने के लिए, टावर का एक मजबूत फाउंडेशन होना बहुत जरूरी है।
इसका उपयोग कैसे होता है:
 * टावर को स्थापित करने से पहले, जमीन में गहरी खुदाई की जाती है।
 * इस खाई में टावर के पैरों को कंक्रीट, स्टील रॉड और अन्य मजबूत सामग्री से बनाया जाता है।
 * यह फाउंडेशन टावर के वजन को जमीन में समान रूप से वितरित करता है और उसे सीधा और स्थिर रखता है।
 * फाउंडेशन यह सुनिश्चित करता है कि टावर किसी भी मौसम की स्थिति में अपनी जगह से न हिले और न गिरे।
2. अर्थिंग (Earthing) का उपयोग
अर्थिंग का मुख्य उद्देश्य ट्रांसमिशन लाइन और उसके आसपास के क्षेत्र को बिजली के खतरों से बचाना है। यह टावर को एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
इसका उपयोग कैसे होता है:
 * बिजली गिरने से सुरक्षा: 
ट्रांसमिशन टावर बहुत ऊंचे होते हैं और बिजली गिरने की आशंका होती है। टावर के सबसे ऊपरी हिस्से पर एक या दो तार होते हैं जिन्हें ग्राउंड वायर या अर्थ वायर कहते हैं। ये तार टावर से होते हुए सीधे जमीन में गाड़े गए अर्थिंग इलेक्ट्रोड से जुड़े होते हैं। जब बिजली गिरती है, तो ये तार बिजली को सीधे जमीन में पहुंचा देते हैं, जिससे कंडक्टरों और उपकरणों को नुकसान नहीं होता।
 * फॉल्ट करंट से सुरक्षा:
कभी-कभी किसी खराबी के कारण, जैसे इंसुलेटर के टूटने पर, बिजली टावर की संरचना में प्रवाहित होने लगती है। ऐसे में, अर्थिंग सिस्टम इस अतिरिक्त करंट को जमीन में प्रवाहित होने का एक सुरक्षित रास्ता प्रदान करता है। इससे टावर के पास काम करने वाले लोगों और उपकरणों की सुरक्षा होती है।
 * इलेक्ट्रोस्टैटिक चार्ज का निपटान: 
हवा और कंडक्टरों के बीच घर्षण से पैदा होने वाले स्थिर चार्ज को भी अर्थिंग सिस्टम जमीन में भेज देता है।
संक्षेप में, फाउंडेशन टावर को भौतिक रूप से स्थिर रखता है, जबकि अर्थिंग टावर को विद्युत (electrical) खतरों से बचाता है। दोनों मिलकर ट्रांसमिशन लाइन की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं।




ट्रांसमिशन लाइन में हार्डवेयर फिटिंग और सहायक उपकरण (accessories) छोटे लेकिन बहुत महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। ये उपकरण लाइन के विभिन्न घटकों (कंडक्टर, इंसुलेटर, टावर) को आपस में जोड़ने, उन्हें सहारा देने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।

इनका उपयोग कैसे होता है, यह समझने के लिए कुछ प्रमुख हार्डवेयर फिटिंग और उनके कार्य यहाँ दिए गए हैं:
1. क्लैंप (Clamps)
क्लैंप्स का उपयोग कंडक्टरों को इंसुलेटर से जोड़ने के लिए किया जाता है। ये कंडक्टर को मजबूती से पकड़ते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि वह इंसुलेटर से अलग न हो।
 * सस्पेंशन क्लैंप (Suspension Clamps): 
ये कंडक्टर को सस्पेंशन इंसुलेटर के निचले सिरे से जोड़ते हैं, जहाँ लाइन सीधी होती है।
 * स्ट्रेन क्लैंप (Strain Clamps):
इनका उपयोग डेड-एंड (लाइन का अंत) या मोड़ पर होता है, जहाँ कंडक्टर पर बहुत अधिक खिंचाव होता है। ये क्लैंप कंडक्टर के खिंचाव को संभालने के लिए डिज़ाइन किए गए होते हैं।
2. स्पेसर (Spacers)
इनका उपयोग उन लाइनों में होता है जहाँ एक ही फेज के लिए कई कंडक्टर (बंडल कंडक्टर) का इस्तेमाल किया जाता है। स्पेसर इन कंडक्टरों को एक-दूसरे से समान दूरी पर रखते हैं।
 * लाभ:
स्पेसर कंडक्टरों को आपस में टकराने से रोकते हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट का खतरा कम होता है। साथ ही, वे हवा के दबाव के कारण कंडक्टरों के हिलने-डुलने को भी कम करते हैं।
3. वाइब्रेशन डैम्पर (Vibration Damper)
कंडक्टर पर हवा के कारण कंपन (vibration) पैदा होता है, जिससे तारों को नुकसान हो सकता है। वाइब्रेशन डैम्पर को कंडक्टर पर लगाया जाता है ताकि वे इस कंपन को अवशोषित कर सकें।
 * कार्य: 
ये छोटे, भारी उपकरण होते हैं जो कंडक्टर पर लगाए जाते हैं। ये कंपन की ऊर्जा को गर्मी में बदलकर उसे खत्म कर देते हैं, जिससे कंडक्टर की जीवन अवधि बढ़ जाती है।
4. कनेक्टर्स (Connectors)
ये अलग-अलग कंडक्टरों को आपस में जोड़ने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
 * जंपर्स (Jumpers):
ये छोटे कंडक्टर होते हैं जिनका उपयोग टावर के पास इंसुलेटर के दोनों ओर मुख्य कंडक्टरों को जोड़ने के लिए किया जाता है।
5. गार्ड रिंग (Guard Rings) और आर्मोर रॉड (Armor Rods)
 * गार्ड रिंग: 
ये इंसुलेटर के किनारों पर लगे होते हैं और बिजली के फ्लैशओवर (flashover) से सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये फ्लैशओवर के कारण होने वाले नुकसान को कम करते हैं।
 * आर्मोर रॉड: 
ये कंडक्टर के सिरे पर लगाए जाते हैं जहाँ उसे क्लैंप से जोड़ा जाता है। ये क्लैंप के कारण कंडक्टर को होने वाले नुकसान से बचाते हैं और उसकी यांत्रिक शक्ति को बढ़ाते हैं।
संक्षेप में, हार्डवेयर फिटिंग और सहायक उपकरण ट्रांसमिशन लाइन की सुरक्षा, स्थिरता और दक्षता बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि सभी घटक एक साथ सही ढंग से काम करें और लाइन किसी भी बाहरी दबाव या तनाव का सामना कर सके।




ट्रांसमिशन लाइन में सर्किट ब्रेकर और रिले का उपयोग मुख्य रूप से सुरक्षा और नियंत्रण के लिए किया जाता है। ये दोनों उपकरण एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं ताकि ट्रांसमिशन सिस्टम को किसी भी खराबी या असामान्य स्थिति से बचाया जा सके।

1. रिले (Relay) का उपयोग
रिले को ट्रांसमिशन लाइन का "मस्तिष्क" कहा जा सकता है। इसका मुख्य काम लाइन में होने वाली किसी भी खराबी (fault) को पहचानना है।
 * खराबी का पता लगाना: जब ट्रांसमिशन लाइन में कोई शॉर्ट सर्किट, ओवरलोड, या वोल्टेज में अचानक गिरावट जैसी कोई समस्या आती है, तो रिले तुरंत उस असामान्य स्थिति को महसूस करता है।
 * सिग्नल भेजना: खराबी का पता लगते ही, रिले सर्किट ब्रेकर को एक इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजता है कि लाइन में खराबी है और इसे तुरंत बंद करने की आवश्यकता है।
सरल शब्दों में, रिले एक सेंसर की तरह काम करता है जो हमेशा लाइन की निगरानी करता रहता है और समस्या आने पर सर्किट ब्रेकर को कार्रवाई करने के लिए बताता है।
2. सर्किट ब्रेकर (Circuit Breaker) का उपयोग
सर्किट ब्रेकर को "कार्यकर्ता" या "हाथ" कहा जा सकता है। इसका मुख्य काम रिले से मिले हुए सिग्नल के आधार पर सर्किट को खोलना या बंद करना है।
 * सर्किट को खोलना:
जब रिले से सिग्नल मिलता है कि लाइन में खराबी है, तो सर्किट ब्रेकर तुरंत काम करता है और लाइन में बिजली के प्रवाह को रोक देता है। यह काम मिलीसेकंड में होता है, जिससे उपकरणों को गंभीर नुकसान होने से बचाया जा सकता है।
 * खराबी दूर होने पर सर्किट को फिर से जोड़ना: 
एक बार जब खराबी को ठीक कर दिया जाता है, तो सर्किट ब्रेकर को मैन्युअल या स्वचालित रूप से चालू किया जा सकता है ताकि बिजली का प्रवाह फिर से शुरू हो सके।
दोनों एक साथ कैसे काम करते हैं?
एक उदाहरण से इसे समझ सकते हैं: मान लीजिए, ट्रांसमिशन लाइन पर एक पेड़ गिर जाता है और शॉर्ट सर्किट हो जाता है।
 * रिले: 
लाइन में करंट अचानक बहुत बढ़ जाता है। रिले इस असामान्य वृद्धि को तुरंत पहचान लेता है।
 * सर्किट ब्रेकर:
रिले तुरंत सर्किट ब्रेकर को एक ट्रिप सिग्नल भेजता है।
 * सुरक्षा:
सर्किट ब्रेकर उस सिग्नल को प्राप्त करते ही बिजली की सप्लाई को काट देता है। इससे ट्रांसफार्मर, जनरेटर और अन्य महत्वपूर्ण उपकरण जलने से बच जाते हैं।
संक्षेप में, रिले निगरानी करता है और आदेश देता है, जबकि सर्किट ब्रेकर उस आदेश का पालन करके बिजली को बंद कर देता है। ये दोनों मिलकर एक सुरक्षा प्रणाली बनाते हैं जो ट्रांसमिशन लाइन को सुरक्षित रखती है और बिजली आपूर्ति में विश्वसनीयता बनाए रखती है।



ट्रांसमिशन लाइन में कई तरह के फॉल्ट (खराबी) पाए जाते हैं। ये फॉल्ट लाइन की सुरक्षा और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। इन फॉल्ट को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

1. सिमेट्रिकल फॉल्ट (Symmetrical Faults)
ये फॉल्ट बहुत कम होते हैं, लेकिन सबसे गंभीर माने जाते हैं। इनमें तीनों फेज (R, Y, B) एक साथ प्रभावित होते हैं।
 * तीन-फेज फॉल्ट (Three-phase fault - L-L-L):
   इस फॉल्ट में तीनों फेज के कंडक्टर आपस में शॉर्ट हो जाते हैं। यह फॉल्ट सबसे कम होता है लेकिन सबसे ज्यादा करंट पैदा करता है। इसे सबसे खतरनाक माना जाता है क्योंकि इसमें पूरे सिस्टम में असंतुलन हो जाता है।
2. असिमेट्रिकल फॉल्ट (Asymmetrical Faults)
ये फॉल्ट सिमेट्रिकल फॉल्ट की तुलना में बहुत अधिक होते हैं। इनमें केवल एक या दो फेज ही प्रभावित होते हैं।
 * सिंगल लाइन-टू-ग्राउंड फॉल्ट (Single line-to-ground fault - L-G):
   यह सबसे आम प्रकार का फॉल्ट है (लगभग 70-80% फॉल्ट इसी प्रकार के होते हैं)। इसमें एक फेज का कंडक्टर टूटकर या किसी कारण से जमीन के संपर्क में आ जाता है। यह अक्सर आकाशीय बिजली, हवा से पेड़ गिरने या पक्षियों के टकराने से होता है।
 * लाइन-टू-लाइन फॉल्ट (Line-to-line fault - L-L):
   इस फॉल्ट में दो फेज के कंडक्टर आपस में शॉर्ट हो जाते हैं, लेकिन उनका जमीन से कोई संपर्क नहीं होता। यह फॉल्ट अक्सर तेज हवाओं के कारण कंडक्टरों के आपस में टकराने से होता है।
 * डबल लाइन-टू-ग्राउंड फॉल्ट (Double line-to-ground fault - L-L-G):
   यह फॉल्ट तब होता है जब दो फेज के कंडक्टर आपस में शॉर्ट होते हैं और साथ ही जमीन से भी जुड़ जाते हैं। यह सिंगल लाइन-टू-ग्राउंड फॉल्ट से कम होता है, लेकिन लाइन-टू-लाइन फॉल्ट से अधिक होता है।
ये सभी फॉल्ट लाइन में बहुत ज्यादा करंट पैदा करते हैं, जिससे उपकरणों को नुकसान हो सकता है। इन्हीं फॉल्ट से बचाव के लिए ट्रांसमिशन लाइन में रिले और सर्किट ब्रेकर जैसी सुरक्षा प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। रिले फॉल्ट को पहचानता है और सर्किट ब्रेकर तुरंत लाइन में बिजली का प्रवाह रोक देता है।




ट्रांसमिशन लाइन में सिमेट्रिकल फॉल्ट (Symmetrical Fault) वह फॉल्ट होता है जिसमें तीनों फेज (R, Y, B) एक साथ और समान रूप से प्रभावित होते हैं। इस प्रकार के फॉल्ट में, फॉल्ट करंट का परिमाण (magnitude) तीनों फेज में बराबर होता है और वे एक दूसरे से 120 डिग्री के फेज अंतर पर रहते हैं।

इसे संतुलित फॉल्ट (Balanced Fault) भी कहते हैं, क्योंकि फॉल्ट के बाद भी सिस्टम की बैलेंसिंग (संतुलन) बनी रहती है।
सिमेट्रिकल फॉल्ट की मुख्य विशेषताएं:
 * समानता: 
इस फॉल्ट में तीनों फेजों की बाधा (impedance) और फॉल्ट करंट का परिमाण समान होता है।
 * फेज अंतर: 
तीनों फेज के फॉल्ट करंट एक-दूसरे से 120° के कोण पर होते हैं।
 * दुर्लभता:
यह फॉल्ट ट्रांसमिशन लाइनों में बहुत कम होता है (कुल फॉल्ट का लगभग 2-5%)।
 * गंभीरता:
हालांकि यह दुर्लभ है, सिमेट्रिकल फॉल्ट सबसे गंभीर प्रकार का फॉल्ट माना जाता है। यह सबसे अधिक फॉल्ट करंट उत्पन्न करता है, जिससे उपकरणों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचने का खतरा होता है।
सिमेट्रिकल फॉल्ट के प्रकार:
 * तीन-फेज फॉल्ट (Three-phase fault - L-L-L): 
यह सबसे आम सिमेट्रिकल फॉल्ट है। इसमें तीनों फेज के कंडक्टर आपस में शॉर्ट हो जाते हैं। यह फॉल्ट अक्सर उपकरणों के फेल होने, इंसुलेटर के टूटने या किसी बाहरी वस्तु के कारण होता है।
 * तीन-फेज-ग्राउंड फॉल्ट (Three-phase-to-ground fault - L-L-L-G):
इस फॉल्ट में तीनों फेज के कंडक्टर आपस में शॉर्ट होने के साथ-साथ जमीन से भी जुड़ जाते हैं। यह बहुत ही दुर्लभ घटना है।
चूंकि सिमेट्रिकल फॉल्ट में सबसे ज्यादा करंट प्रवाहित होता है, इसलिए पावर सिस्टम में सुरक्षा उपकरणों (जैसे सर्किट ब्रेकर) को इसी सबसे खराब स्थिति के लिए डिज़ाइन किया जाता है ताकि वे इस भारी करंट को संभाल सकें।



ट्रांसमिशन लाइन में सिमेट्रिकल फॉल्ट को "ठीक" करने का काम मुख्य रूप से एक स्वचालित सुरक्षा प्रणाली द्वारा किया जाता है, जिसमें मानव हस्तक्षेप की आवश्यकता बहुत कम होती है। यह प्रक्रिया कुछ मिलीसेकंड में पूरी हो जाती है ताकि उपकरणों को बड़े नुकसान से बचाया जा सके।

यह प्रक्रिया इस प्रकार काम करती है:
1. फॉल्ट का पता लगाना (रिले का काम)
 * ट्रांसमिशन लाइन के हर छोर पर प्रोटेक्शन रिले (protection relay) लगे होते हैं।
 * रिले लगातार लाइन में बह रहे करंट, वोल्टेज और अन्य मापदंडों की निगरानी करते रहते हैं।
 * जब एक सिमेट्रिकल फॉल्ट (जैसे तीन-फेज शॉर्ट सर्किट) होता है, तो तीनों फेजों में करंट का स्तर बहुत तेजी से और बहुत अधिक बढ़ जाता है।
 * रिले इस असामान्य करंट वृद्धि को तुरंत पहचान लेता है।
2. सर्किट को खोलना (सर्किट ब्रेकर का काम)
 * फॉल्ट का पता चलते ही, रिले तुरंत एक ट्रिप सिग्नल (trip signal) भेजता है।
 * यह सिग्नल उसी लाइन से जुड़े सर्किट ब्रेकर (circuit breaker) को मिलता है।
 * सिग्नल मिलते ही, सर्किट ब्रेकर तुरंत अपने कॉन्टैक्ट्स को खोल देता है, जिससे फॉल्ट वाले हिस्से में बिजली का प्रवाह रुक जाता है। यह पूरे सिस्टम को और अधिक नुकसान से बचाता है।
3. फॉल्ट का क्लियर होना
 * जब सर्किट ब्रेकर लाइन में बिजली का प्रवाह रोक देता है, तो अक्सर फॉल्ट का कारण (जैसे आकाशीय बिजली से उत्पन्न हुआ फ्लैशओवर) खुद ही समाप्त हो जाता है।
 * इसके बाद, कई आधुनिक सर्किट ब्रेकर में एक ऑटो-रिक्लोज़र (auto-recloser) की सुविधा होती है। यह एक निश्चित समय (एक सेकंड से भी कम) के बाद लाइन को फिर से जोड़ने की कोशिश करता है।
 * अगर फॉल्ट अस्थायी था और अब खत्म हो गया है, तो लाइन सफलतापूर्वक फिर से चालू हो जाती है।
4. स्थायी फॉल्ट को ठीक करना
 * यदि फॉल्ट स्थायी है (जैसे कोई तार टूट गया है या इंसुलेटर टूट गया है), तो ऑटो-रिक्लोज़र का प्रयास विफल हो जाता है।
 * इस स्थिति में, सर्किट ब्रेकर दोबारा ट्रिप हो जाता है और स्थायी रूप से लाइन को बंद कर देता है।
 * इसके बाद, रखरखाव टीम को फॉल्ट के स्थान का पता लगाना होता है और मैन्युअल रूप से मरम्मत करके उस खराबी को ठीक करना होता है।
संक्षेप में, 
सिमेट्रिकल फॉल्ट को ठीक करने का पहला कदम रिले और सर्किट ब्रेकर द्वारा स्वचालित रूप से उठाया जाता है ताकि फॉल्ट करंट को तुरंत रोककर सिस्टम की सुरक्षा की जा सके। स्थायी मरम्मत का काम बाद में मैन्युअल रूप से किया जाता है।




ट्रांसमिशन लाइन में असिमेट्रिकल फॉल्ट (Asymmetrical Fault) वह फॉल्ट होता है जिसमें तीनों फेज (R, Y, B) समान रूप से प्रभावित नहीं होते हैं। इस प्रकार के फॉल्ट में, फॉल्ट करंट का परिमाण (magnitude) तीनों फेजों में अलग-अलग होता है, और उनके बीच का फेज अंतर भी 120 डिग्री नहीं होता।
इसे असंतुलित फॉल्ट (Unbalanced Fault) भी कहते हैं, क्योंकि फॉल्ट के कारण सिस्टम का संतुलन बिगड़ जाता है।

असिमेट्रिकल फॉल्ट की मुख्य विशेषताएं:
 * असमानता: 
इस फॉल्ट में, एक या दो फेज ही प्रभावित होते हैं, जिससे फॉल्ट करंट का वितरण तीनों फेजों में असमान होता है।
 * आवृत्ति: 
यह फॉल्ट ट्रांसमिशन लाइनों में सबसे अधिक होता है, जो सभी फॉल्ट का लगभग 95% से 98% हिस्सा होता है।
 * गंभीरता: 
यह सिमेट्रिकल फॉल्ट की तुलना में कम गंभीर होता है, क्योंकि इसमें फॉल्ट करंट का परिमाण आमतौर पर कम होता है।
असिमेट्रिकल फॉल्ट के मुख्य प्रकार:
 * सिंगल लाइन-टू-ग्राउंड फॉल्ट (Single line-to-ground fault - L-G):
   * यह सबसे आम प्रकार का फॉल्ट है।
   * इसमें एक फेज का कंडक्टर टूटकर या किसी अन्य कारण से जमीन के संपर्क में आ जाता है।
   * यह अक्सर आकाशीय बिजली, तेज हवा से पेड़ गिरने या पक्षियों के टकराने से होता है।
 * लाइन-टू-लाइन फॉल्ट (Line-to-line fault - L-L):
   * इस फॉल्ट में दो फेज के कंडक्टर आपस में शॉर्ट हो जाते हैं, लेकिन उनका जमीन से कोई संपर्क नहीं होता।
   * यह आमतौर पर तेज हवा के कारण कंडक्टरों के आपस में टकराने से होता है।
 * डबल लाइन-टू-ग्राउंड फॉल्ट (Double line-to-ground fault - L-L-G):
   * इस फॉल्ट में दो फेज के कंडक्टर आपस में शॉर्ट होने के साथ-साथ जमीन से भी जुड़ जाते हैं।
संक्षेप में, असिमेट्रिकल फॉल्ट ट्रांसमिशन लाइनों में सबसे अधिक पाए जाने वाले फॉल्ट हैं, और सुरक्षा प्रणालियों को इन्हीं फॉल्ट से निपटने के लिए मुख्य रूप से डिज़ाइन किया जाता है।



ट्रांसमिशन लाइन में एसिमेट्रिकल फॉल्ट को ठीक करने की प्रक्रिया सिमेट्रिकल फॉल्ट की तरह ही होती है, लेकिन इसमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर होते हैं क्योंकि ये फॉल्ट अधिक आम होते हैं और अक्सर अस्थायी होते हैं।
एसिमेट्रिकल फॉल्ट (जैसे L-G, L-L) को ठीक करने का काम भी एक स्वचालित सुरक्षा प्रणाली द्वारा किया जाता है, जिसमें रिले और सर्किट ब्रेकर मुख्य भूमिका निभाते हैं।

यहां फॉल्ट को ठीक करने की पूरी प्रक्रिया दी गई है:
1. फॉल्ट का पता लगाना (रिले का काम)
 * ट्रांसमिशन लाइन के दोनों सिरों पर लगे प्रोटेक्शन रिले लगातार लाइन की निगरानी करते रहते हैं।
 * जब एक एसिमेट्रिकल फॉल्ट होता है, तो लाइन में करंट का स्तर असामान्य हो जाता है और तीनों फेजों के बीच का संतुलन (balance) बिगड़ जाता है।
 * रिले इस असंतुलन और असामान्य करंट को तुरंत पहचान लेता है। रिले विशेष रूप से इस प्रकार के फॉल्ट का पता लगाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं।
2. सर्किट को खोलना (सर्किट ब्रेकर का काम)
 * फॉल्ट का पता चलते ही, रिले तुरंत सर्किट ब्रेकर को एक ट्रिप सिग्नल भेजता है।
 * सर्किट ब्रेकर तुरंत अपने कॉन्टैक्ट्स को खोल देता है, जिससे फॉल्ट वाले हिस्से में बिजली का प्रवाह रुक जाता है। यह काम मिलीसेकंड में होता है।
3. फॉल्ट का क्लियर होना और ऑटो-रिक्लोज़िंग
 * एसिमेट्रिकल फॉल्ट अक्सर अस्थायी होते हैं। उदाहरण के लिए, एक पेड़ की टहनी का क्षण भर के लिए तार को छूना या आकाशीय बिजली से हुआ फ्लैशओवर।
 * जब सर्किट ब्रेकर बिजली का प्रवाह रोक देता है, तो फॉल्ट का कारण अक्सर खुद ही समाप्त हो जाता है।
 * आधुनिक सर्किट ब्रेकर में एक ऑटो-रिक्लोज़र (auto-recloser) की सुविधा होती है। यह एक निश्चित समय (लगभग एक सेकंड) के बाद लाइन को स्वचालित रूप से फिर से जोड़ने की कोशिश करता है।
 * अगर फॉल्ट अस्थायी था और अब ठीक हो गया है, तो लाइन सफलतापूर्वक फिर से चालू हो जाती है, और बिजली की आपूर्ति बहाल हो जाती है। यह प्रणाली ट्रांसमिशन लाइनों में विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
4. स्थायी फॉल्ट को ठीक करना
 * यदि फॉल्ट स्थायी है (जैसे कोई तार टूट गया है या इंसुलेटर टूट गया है), तो ऑटो-रिक्लोज़र का पहला प्रयास विफल हो जाता है।
 * सर्किट ब्रेकर एक-दो बार और कोशिश कर सकता है, लेकिन अगर फॉल्ट बना रहता है, तो वह स्थायी रूप से लाइन को बंद कर देता है (लॉकआउट)।
 * इसके बाद, रखरखाव टीम को मौके पर जाकर फॉल्ट के स्थान का पता लगाना होता है।
 * फॉल्ट वाले हिस्से की भौतिक रूप से मरम्मत की जाती है (जैसे टूटा हुआ तार या इंसुलेटर बदलना)।
 * मरम्मत पूरी होने के बाद, सर्किट ब्रेकर को मैन्युअल रूप से चालू किया जाता है ताकि बिजली की आपूर्ति फिर से शुरू हो सके।
संक्षेप में, 
एसिमेट्रिकल फॉल्ट को ठीक करने का पहला कदम रिले और सर्किट ब्रेकर द्वारा स्वचालित रूप से उठाया जाता है, और चूंकि ये अक्सर अस्थायी होते हैं, इसलिए ऑटो-रिक्लोज़िंग से लाइन जल्दी ही बहाल हो जाती है। स्थायी फॉल्ट के लिए ही मैन्युअल मरम्मत की आवश्यकता होती है।



ट्रांसमिशन लाइन में कई कारणों से खराबी (फॉल्ट) आ सकती है। इन कारणों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है: आंतरिक (Internal) और बाहरी (External)।

1. बाहरी कारण (External Causes)
ये सबसे आम कारण हैं जिनसे ट्रांसमिशन लाइनों में खराबी आती है।
 * आकाशीय बिजली (Lightning Strikes): 
यह खराबी का सबसे प्रमुख कारण है। जब बिजली गिरती है, तो यह लाइन पर बहुत अधिक वोल्टेज पैदा कर सकती है, जिससे इंसुलेटर का फ्लैशओवर हो सकता है और शॉर्ट सर्किट हो सकता है।
 * तेज हवाएं और तूफान (Storms and Strong Winds): 
तेज हवाएं कंडक्टरों को बहुत जोर से हिलाती हैं, जिससे वे आपस में टकरा सकते हैं (L-L फॉल्ट) या टावर से उनका संपर्क टूट सकता है।
 * पेड़ों का गिरना (Falling Trees):
तूफान या हवा के कारण पेड़ ट्रांसमिशन लाइन पर गिर सकते हैं, जिससे कंडक्टर टूट सकते हैं या जमीन से जुड़ सकते हैं (L-G फॉल्ट)।
 * बर्फ और बारिश (Ice and Snow):
ठंडे मौसम में, कंडक्टरों पर बर्फ या भारी बर्फ जम सकती है, जिससे तारों का वजन बहुत बढ़ जाता है। इससे तार टूट सकते हैं या टावर से उनका संपर्क टूट सकता है।
 * पक्षी और जानवर (Birds and Animals):
बड़े पक्षी या जानवर गलती से एक ही समय में दो कंडक्टरों या एक कंडक्टर और टावर को छू सकते हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट हो सकता है।
 * मानवीय गतिविधियाँ (Human Activities): 
निर्माण कार्य के दौरान क्रेन या अन्य मशीनरी का गलती से लाइन को छूना, या जानबूझकर तोड़फोड़ करना भी खराबी का कारण बन सकता है।
2. आंतरिक कारण (Internal Causes)
ये कारण लाइन के घटकों की खराबी से जुड़े होते हैं।
 * इंसुलेटर की खराबी (Insulator Failure): 
समय के साथ इंसुलेटर की सतह पर गंदगी जमने, पुरानी होने, या निर्माण में दोष के कारण उनकी विद्युतरोधी क्षमता कम हो जाती है। इससे बिजली का प्रवाह इंसुलेटर से होकर टावर में चला जाता है।
 * कंडक्टर का टूटना (Conductor Failure): 
कंडक्टर पुराना होने, यांत्रिक तनाव (mechanical stress) या निर्माण दोष के कारण टूट सकता है। यह अक्सर तेज हवाओं के कारण होने वाले कंपन से भी हो सकता है।
 * सर्किट ब्रेकर या रिले की खराबी (Circuit Breaker or Relay Malfunction): 
सुरक्षा उपकरणों का सही समय पर काम न करना भी खराबी को बढ़ा सकता है या नए फॉल्ट का कारण बन सकता है।
 * टावर की संरचना में खराबी (Tower Structure Failure): 
टावर के बेस में जंग लगने, नींव में कमी या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण टावर गिर सकता है, जिससे लाइन में गंभीर खराबी आ जाती है।
ये सभी कारण मिलकर ट्रांसमिशन लाइन में सिमेट्रिकल और असिमेट्रिकल दोनों तरह के फॉल्ट पैदा करते हैं, जिनका पता लगाने और उन्हें ठीक करने के लिए सुरक्षा प्रणालियों का उपयोग किया जाता है।







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