अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर ( Difference between Earthing and Neutral )

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अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर अक्सर लोग न्यूट्रल (Neutral) और अर्थिंग (Earthing) को एक ही समझ लेते हैं क्योंकि दोनों ही तार अंततः जमीन से जुड़े होते हैं, लेकिन बिजली के सर्किट में इन दोनों का काम बिल्कुल अलग होता है। https://dkrajwar.blogspot.com/2026/01/difference-between-earthing-and-neutral.html ​इसे आसान भाषा में समझने के लिए नीचे दिए गए बिंदुओं को देखें: ​1. न्यूट्रल (Neutral Wire) - "वापसी का रास्ता" ​न्यूट्रल तार का मुख्य काम बिजली के सर्किट को पूरा करना है। ​ कार्य: बिजली 'फेज' (Phase) तार से आती है और अपना काम करने के बाद 'न्यूट्रल' के जरिए वापस लौटती है। ​ स्रोत: यह मुख्य रूप से बिजली के ट्रांसफार्मर से आता है। ​ महत्व: बिना न्यूट्रल के आपका कोई भी उपकरण (जैसे बल्ब या पंखा) चालू नहीं होगा क्योंकि सर्किट अधूरा रहेगा। ​ रंग: आमतौर पर इसे काले (Black) रंग के तार से पहचाना जाता है। ​2. अर्थिंग (Earthing) - "सुरक्षा कवच" ​अर्थिंग का काम बिजली के उपकरणों को चलाना नहीं, बल्कि आपको करंट लगने से बचाना है। ​ कार्य: यदि किसी खराब...

ट्रांसमिशन टावरों के प्रकार ( Types of Transmission Towers )

ट्रांसमिशन टावरों के प्रकार 
( Types of Transmission Towers )

ट्रांसमिशन टावरों को उनके कार्य, निर्माण सामग्री और डिज़ाइन के आधार पर कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है।

​ट्रांसमिशन टावरों के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

कार्य (Function) के आधार पर टावर

​ये टावर लाइन पर लगने वाले बल और उनके स्थान के आधार पर बनाए जाते हैं:

  1. सस्पेंशन टावर (Suspension Tower) या टेंजेंट टावर (Tangent Tower):
    • ​इनका उपयोग सीधी रेखा में बिजली के तारों को सहारा देने के लिए किया जाता है।
    • ​ये टावर केवल तार के वजन (नीचे की ओर बल) और हवा के बल (पार्श्व बल) को वहन करते हैं, न कि तार के अनुदैर्ध्य (लंबाई के साथ) तनाव को।
    • ​इन्हें आमतौर पर {A} टाइप टावर कहा जाता है, जिनका विचलन कोण (Angle of Deviation) 0° से 2° तक होता है।
  2. टेंशन टावर (Tension Tower) या एंगल टावर (Angle Tower):
    • ​इनका उपयोग ट्रांसमिशन लाइन के उन स्थानों पर किया जाता है जहाँ लाइन दिशा बदलती है (कोण बनाती है) या जहाँ लाइन को समाप्त किया जाता है (जैसे सबस्टेशन पर)।
    • ​ये टावर तार के अनुदैर्ध्य तनाव (Axial Loading) को वहन करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं।
    • ​विचलन कोण के आधार पर इन्हें आगे वर्गीकृत किया जाता है:
      • B टाइप टावर: 2° से 15° विचलन के लिए।
      • C टाइप टावर: 15° से 30° विचलन के लिए।
      • D टाइप टावर: 30° से 60° विचलन के लिए।
  3. टर्मिनल टावर (Terminal Tower) या डेड-एंड टावर (Dead-end Tower):
    • ​इनका उपयोग ट्रांसमिशन लाइन के शुरुआत या अंत में, या बड़े नदी/रेलवे क्रॉसिंग से पहले किया जाता है, जहाँ सभी कंडक्टरों का पूर्ण तनाव वहन करना होता है।
  4. ट्रांसपोज़िशन टावर (Transposition Tower):
    • ​इनका उपयोग तीन-फेज AC सिस्टम में लाइन कंडक्टरों की भौतिक स्थिति को बदलने (यानी, चरणों को पलटने) के लिए किया जाता है ताकि तीनों कंडक्टरों में प्रतिबाधा को संतुलित किया जा सके।

संरचना (Structure) और सामग्री (Material) के आधार पर टावर

जालीदार स्टील टावर (Lattice Steel Towers):

ये सबसे आम प्रकार हैं, जो स्टील के कोणों और क्रॉस-सेक्शन के खुले फ्रेमवर्क से बने होते हैं।


इनमें मजबूती-से-वजन का अनुपात (Strength-to-Weight Ratio) उत्कृष्ट होता है और ये लंबी दूरी पर भारी लाइनों के लिए आदर्श होते हैं।


ट्यूबलर स्टील पोल (Tubular Steel Poles - TSP) या मोनोपोल टावर (Monopole Towers):

  • ​ये पतले, एकल पोल होते हैं जो आम तौर पर सौंदर्य की दृष्टि से अधिक आकर्षक होते हैं।
  • ​इनका उपयोग शहरी क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ जगह सीमित होती है।

गाइड टावर (Guyed Towers):

  • ​ये टावर होते हैं जिन्हें स्थिरता के लिए गाइड तारों (Guy Wires) या केबलों द्वारा अतिरिक्त सहारा दिया जाता है।

सेल्फ-सपोर्टिंग टावर (Self-Supporting Towers):

  • ​ये ऐसे टावर होते हैं जिन्हें बाहरी गाइड तारों की आवश्यकता नहीं होती है; वे अपने आधार पर ही खड़े हो जाते हैं।

सर्किट की संख्या (Number of Circuits) के आधार पर टावर

  1. सिंगल सर्किट टावर (Single Circuit Tower): एक ही टावर पर केवल एक बिजली सर्किट वहन करता है।
  2. डबल सर्किट टावर (Double Circuit Tower): एक ही टावर पर दो बिजली सर्किट वहन करता है।
  3. मल्टी-सर्किट टावर (Multi-Circuit Tower): एक ही टावर पर दो से अधिक बिजली सर्किट वहन करता है।




1. सस्पेंशन टावर्स (Suspension Tower)

सस्पेंशन टावर (Suspension Tower) ट्रांसमिशन लाइन के सबसे आम प्रकार के टावर हैं, जिन्हें टेंजेंट टावर (Tangent Tower) भी कहा जाता है।

सस्पेंशन टावर की मुख्य विशेषताएँ

  1. उपयोग (Usage):
    • ​इनका उपयोग ट्रांसमिशन लाइन के सीधे रास्तों पर कंडक्टरों को सहारा देने के लिए किया जाता है।
    • ​लाइन की कुल लंबाई में, अधिकांश टावर सस्पेंशन टावर ही होते हैं।
    • ​ये आमतौर पर {A} टाइप टावर कहलाते हैं, जो केवल 0° से 2° तक का बहुत कम विचलन कोण संभाल सकते हैं।
  2. लोड वहन (Load Bearing):
    • ​ये मुख्य रूप से नीचे की ओर बल (कंडक्टरों का वजन) और पार्श्व बल (हवा का दबाव) वहन करते हैं।
    • ​ये कंडक्टरों के कारण लगने वाले अनुदैर्ध्य तनाव (Longitudinal Tension) को वहन नहीं करते हैं।
  3. इंसुलेटर का प्रकार (Insulator Type):
    • ​सस्पेंशन टावरों में कंडक्टरों को क्रॉस-आर्म से जोड़ने के लिए सस्पेंशन इंसुलेटर स्ट्रिंग का उपयोग किया जाता है। ये इंसुलेटर स्ट्रिंग लंबवत (Vertically) लटकी होती हैं, जिससे कंडक्टर नीचे की ओर झूलते हैं।
  4. संरचना (Structure):
    • ​टेंशन टावरों की तुलना में ये आमतौर पर हल्के (Lighter) होते हैं क्योंकि इन्हें लाइन पर आने वाले तनाव को झेलने की आवश्यकता नहीं होती है।



2. तनाव टावर्स (Tension Tower)

तनाव टावर (Tension Tower) ऐसे ट्रांसमिशन टावर होते हैं जिन्हें विशेष रूप से लाइन कंडक्टरों के अनुदैर्ध्य तनाव (Longitudinal Strain) या खिंचाव बल (Pulling force) को वहन करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। इन्हें एंगल टावर (Angle Tower) या डेविएशन टावर (Deviation Tower) भी कहा जाता है।

तनाव टावर की मुख्य विशेषताएँ और उपयोग

विशेषता

विवरण

मुख्य कार्य

लाइन कंडक्टरों के पूर्ण तनाव (Full Tension) को सहन करना।

उपयोग के स्थान

1. जहाँ ट्रांसमिशन लाइन दिशा बदलती है (कोण बनाती है)।

2. लाइन के सिरे (Terminal Points) पर, जैसे सबस्टेशन या अंडरग्राउंड केबल कनेक्शन पर।

3. नदी या रेलवे क्रॉसिंग जैसी विशेष बाधाओं पर।

4. सुरक्षा के लिए लंबी सीधी लाइन के बीच में सेक्शनिंग (खंडन) बिंदु पर।

लोड वहन

ये नीचे की ओर बल, पार्श्व बल, और सबसे महत्वपूर्ण रूप से अनुदैर्ध्य बल (तारों का खिंचाव) वहन करते हैं।

इंसुलेटर का प्रकार

इनमें कंडक्टरों को सहारा देने के लिए स्ट्रेन इंसुलेटर स्ट्रिंग (Strain Insulator String) का उपयोग किया जाता है। ये इंसुलेटर स्ट्रिंग आमतौर पर क्षैतिज (Horizontally) लगाई जाती हैं ताकि तार के तनाव को झेल सकें।

संरचना

सस्पेंशन टावरों की तुलना में ये अधिक मजबूत, अधिक भारी और आधार पर चौड़े होते हैं, क्योंकि इन्हें अत्यधिक खिंचाव बलों का सामना करना पड़ता है।


विचलन कोण के आधार पर वर्गीकरण

​तनाव टावरों को लाइन में विचलन (दिशा परिवर्तन) के कोण के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है:

  • B टाइप टावर: 2° से 15° के छोटे विचलन कोणों के लिए।
  • C टाइप टावर: 15° से 30° के मध्यम विचलन कोणों के लिए।
  • D टाइप टावर: 30° से 60° के बड़े विचलन कोणों के लिए।

​सस्पेंशन टावर के विपरीत, तनाव टावर लाइन की दिशा को प्रभावी ढंग से मोड़ने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं।



3. टर्मिनल टावर्स  ( Terminal Tower)

टर्मिनल टावर (Terminal Tower), जिसे डेड-एंड टावर (Dead-end Tower) भी कहा जाता है, ट्रांसमिशन लाइन के सबसे मजबूत और सबसे भारी टावरों में से एक होता है।

​टर्मिनल टावर की मुख्य विशेषताएँ और उपयोग

​टर्मिनल टावर एक प्रकार के तनाव टावर (Tension Tower) होते हैं, लेकिन इन्हें विशेष रूप से पूर्ण, एकतरफा अनुदैर्ध्य तनाव (Full, Unbalanced Longitudinal Tension) को वहन करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।

विशेषता

विवरण

मुख्य कार्य

लाइन कंडक्टरों के अधिकतम तनाव (Maximum strain) को पूरी तरह से एक दिशा में सहन करना।

उपयोग के स्थान

1. ट्रांसमिशन लाइन का अंत: जहाँ लाइन समाप्त होती है और सबस्टेशन (Substation) के उपकरणों से जुड़ती है।

2. लाइन की शुरुआत: जहाँ लाइन पावर जनरेशन स्टेशन से निकलती है।

3. अंडरग्राउंड केबल ट्रांज़िशन: जहाँ ओवरहेड लाइनें भूमिगत केबलिंग में बदलती हैं।

4. क्रॉसिंग: लंबी नदियों, चौड़े राजमार्गों या रेलवे क्रॉसिंग से ठीक पहले और बाद में।

5. कैस्केड विफलता को रोकना: सुरक्षा के लिए लंबी सीधी लाइनों में भी समय-समय पर (पीरियडिकली) लगाए जाते हैं ताकि एक टावर की विफलता पूरी लाइन को नीचे न गिरा दे।

लोड वहन

यह टावर लाइन पर आने वाले सभी प्रकार के बलों (वजन, हवा, और सबसे महत्वपूर्ण, एक तरफ से आने वाले खींचाव/तनाव) को वहन करने के लिए बनाया जाता है।

इंसुलेटर का प्रकार

इसमें क्षैतिज रूप से (Horizontally) लगाई गई स्ट्रेन इंसुलेटर स्ट्रिंग का उपयोग किया जाता है, क्योंकि इसे कंडक्टरों के भारी तनाव का प्रतिरोध करना होता है।

संरचना

टर्मिनल टावर आमतौर पर अपनी श्रेणी के सबसे मजबूत, सबसे भारी और सबसे महंगे टावर होते हैं, क्योंकि उन्हें सबसे कठोर या असंतुलित यांत्रिक लोड (Unbalanced Mechanical Load) को झेलना पड़ता है।




4. ट्रांसपोज़िशन टावर्स  (Transposition Tower) 

ट्रांसपोज़िशन टावर (Transposition Tower) एक विशेष प्रकार का टावर है जिसका उपयोग तीन-फेज़ ट्रांसमिशन लाइन में कंडक्टरों (तारों) के भौतिक स्थान (Physical Position) को क्रमिक रूप से बदलने के लिए किया जाता है।

​यह टावर एक लाइन सेक्शन को अगले सेक्शन से जोड़ते समय कंडक्टरों को इंटरचेंज करता है, जिससे पूरी लाइन पर विद्युत समरूपता (Electrical Symmetry) सुनिश्चित होती है।

ट्रांसपोज़िशन टावर का उद्देश्य

​तीन-फेज़ ट्रांसमिशन लाइन में, तीनों फेज़ (R, Y, B) कंडक्टर एक टावर पर एक ही भौतिक व्यवस्था (जैसे, ऊपर, बीच और नीचे) में नहीं होते हैं। इस असमान दूरी के कारण निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं:

  1. असंतुलित प्रतिबाधा (Unbalanced Impedance): प्रत्येक फेज़ का ग्राउंड से या अन्य फेज़ों से दूरी अलग-अलग होती है, जिसके कारण तीनों फेज़ों में असंतुलित इंडक्टेंस और कैपेसिटेंस पैदा होता है।
  2. असंतुलित वोल्टेज और धारा: प्रतिबाधा के असंतुलन से प्रत्येक फेज़ में वोल्टेज ड्रॉप अलग-अलग होता है, जिससे लाइन के अंत में वोल्टेज असंतुलन (Voltage Imbalance) होता है।
  3. संचार हस्तक्षेप (Communication Interference): असंतुलित मैग्नेटिक फ़ील्ड आस-पास की टेलीफोन या संचार लाइनों में प्रेरित वोल्टेज (Induced Voltages) और शोर (Noise) पैदा कर सकते हैं।

समाधान: ट्रांसपोज़िशन

​इन समस्याओं को दूर करने के लिए, लंबी ट्रांसमिशन लाइनों को तीन बराबर खंडों (Sections) में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक खंड के अंत में एक ट्रांसपोज़िशन टावर का उपयोग किया जाता है।

ट्रांसपोज़िशन टावर यह सुनिश्चित करता है कि पूरी लाइन की लंबाई में:

{{1}{3}{ दूरी के लिए}: {फेज़ A, B, और C क्रमशः स्थिति 1, 2, और 3 पर रहते हैं।}}

{{अगली }{1}{3}{ दूरी के लिए}: {फेज़ A, B, और C अपनी स्थिति आपस में बदल लेते हैं।}}

{{अंतिम }{1}{3}{ दूरी के लिए}: {फेज़ फिर से स्थिति बदलते हैं ताकि प्रत्येक फेज़ ने पूरी लाइन में हर स्थिति पर समान दूरी तय की हो।}}

इस प्रक्रिया से, 

तीनों फेज़ों में औसत इंडक्टेंस और कैपेसिटेंस लगभग बराबर हो जाता है, जिससे लाइन में संतुलित वोल्टेज और धारा का प्रवाह होता है।

ट्रांसपोज़िशन टावर की विशेषताएँ

  • संरचना: ये टावर विशेष रूप से डिज़ाइन किए जाते हैं ताकि कंडक्टरों को एक स्थिति से दूसरी स्थिति में सुरक्षित रूप से क्रॉस कराया जा सके, जिसके लिए अक्सर विस्तारित क्रॉस-आर्म्स की आवश्यकता होती है।
  • लोड वहन: ट्रांसपोज़िशन के बिंदु पर कंडक्टरों की दिशा में बदलाव के कारण, ये टावर आमतौर पर एक प्रकार के तनाव टावर (Tension Tower) होते हैं और असंतुलित तनाव भार को झेलने में सक्षम होते हैं।



5. स्वयं-सहायक टावरों  (Self-Supporting Tower)

'स्वयं-सहायक टावर' (Self-Supporting Tower) एक प्रकार का संचार या प्रसारण टावर होता है जिसे बाहरी तारों (guy-wires) या अन्य समर्थन की आवश्यकता के बिना स्वयं ही खड़ा रहने के लिए डिज़ाइन और निर्मित किया जाता है।

स्वयं-सहायक टावरों की विशेषताएं:

  • संरचना: ये टावर आमतौर पर स्टील या एल्युमिनियम से बने होते हैं और अक्सर अपनी बेहतर ताकत और स्थिरता के कारण त्रिकोणीय या जाली (Lattice) संरचना में होते हैं।
  • स्थायित्व: उन्हें बड़े भार का समर्थन करने और हवा और भूकंप जैसी पर्यावरणीय ताकतों का सामना करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • नींव: इनके जीवनकाल में किसी भी विरूपण को रोकने के लिए एक ठोस नींव (आमतौर पर प्रबलित कंक्रीट) की आवश्यकता होती है।
  • उपयोग: इनका उपयोग आमतौर पर दूरसंचार (Telecom), प्रसारण (Broadcast), प्रकाश व्यवस्था और अवलोकन उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
  • फायदे: ये टावर, गाइ-वायर वाले टावरों की तुलना में कम भूमि क्षेत्र लेते हैं, जिससे वे शहरी क्षेत्रों के लिए एक आदर्श विकल्प बन जाते हैं।



6. गुएड टावर्स (Guyed Towers)

'गुएड टावर्स' (Guyed Towers) या गाइड मास्ट एक प्रकार के लंबी, पतली संचार या प्रसारण टावर होते हैं जिन्हें अपनी स्थिरता बनाए रखने के लिए गाइड वायर या स्टे केबल्स (Guy Wires or Stay Cables) की आवश्यकता होती है।

​ये तार टावर के शरीर से जुड़े होते हैं और टावर के चारों ओर के मैदान या ठोस एंकर से बंधे होते हैं, जिससे टावर को सीधा खड़ा रहने और हवा के भार का सामना करने में मदद मिलती है।

गुएड टावर्स की मुख्य विशेषताएं:

  • समर्थन की आवश्यकता: ये टावर स्वयं-सहायक टावरों (Self-Supporting Towers) के विपरीत, बिना बाहरी समर्थन के खड़े नहीं हो सकते। इन्हें स्थिरता के लिए स्टील केबल (गाइड वायर) की आवश्यकता होती है।
  • संरचना: ये आमतौर पर हल्के होते हैं और अक्सर जाली (Lattice) संरचना में होते हैं।
  • ऊंचाई: ये टावर अक्सर बहुत ऊँचे होते हैं, क्योंकि गाइ-वायर उन्हें कम सामग्री का उपयोग करके अधिक ऊँचाई तक जाने की अनुमति देते हैं।
  • भूमि क्षेत्र: गाइ-वायर को ज़मीन में एंकर करने के लिए टावर के आधार के चारों ओर अधिक भूमि क्षेत्र की आवश्यकता होती है।
  • उपयोग: इनका उपयोग आमतौर पर रेडियो और टीवी प्रसारण और कुछ दूरसंचार (Telecom) अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है।
  • स्थापना और रखरखाव: इनकी स्थापना सरल हो सकती है, लेकिन गाइड वायर को नियमित रूप से कसने और निरीक्षण करने की आवश्यकता होती है।

संक्षेप में, 

यह एक पतला मस्तूल है जो गाइ-वायर नामक तनाव वाले केबलों की एक श्रृंखला द्वारा सीधा रखा जाता है।



7. ए-प्रकार के टावर ( A-Type Towers )

टावरों को उनके उपयोग, डिज़ाइन और उन्हें खड़े रहने के लिए आवश्यक समर्थन के आधार पर कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है।

​आपके पिछले प्रश्नों के संदर्भ में, यहाँ मुख्य रूप से संचार (Communication) और विद्युत पारेषण (Power Transmission) टावरों के प्रकार दिए गए हैं:

​I. समर्थन के आधार पर संचार टावर (Communication Towers by Support Type)

​ये वे टावर हैं जिनका उपयोग मोबाइल सिग्नल, रेडियो, माइक्रोवेव और टेलीविजन प्रसारण के लिए किया जाता है:

  1. स्वयं-सहायक टावर (Self-Supporting Tower / Lattice Tower):
    • ​ये त्रिकोणीय या चौकोर जालीदार संरचनाएँ होती हैं।
    • ​इन्हें बाहरी तारों (guy wires) की आवश्यकता नहीं होती है, ये अपनी संरचना के दम पर ही खड़े रहते हैं।
    • ​इन्हें मजबूत नींव की आवश्यकता होती है।
  2. गुएड टावर्स / गाइ-मास्ट (Guyed Towers / Guyed Mast):
    • ​ये पतले मस्तूल होते हैं।
    • ​इन्हें खड़ा रहने और हवा के भार का सामना करने के लिए स्टील के तारों (guy-wires) की आवश्यकता होती है जो जमीन में एंकर किए जाते हैं।
    • ​ये अक्सर स्वयं-सहायक टावरों की तुलना में अधिक ऊँचे हो सकते हैं।
  3. मोनोपोल टावर (Monopole Tower):
    • ​ये एक ही खंभे (पाइप) से बने होते हैं।
    • ​इन्हें आमतौर पर शहरी क्षेत्रों में लगाया जाता है क्योंकि इन्हें कम जगह की आवश्यकता होती है।
    • ​इन्हें कभी-कभी "स्मार्ट टावर" भी कहा जाता है।
  4. रूफटॉप टावर (Rooftop Tower):
    • ​ये इमारतों की छतों पर स्थापित किए जाते हैं।
    • ​ये मोनोपोल, जालीदार या अन्य छोटे ढाँचों के रूप में हो सकते हैं।

​II. विद्युत पारेषण टावर (Electric Power Transmission Towers)

​ये वे टावर हैं जो बिजली की लाइनों को लंबी दूरी तक ले जाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इन्हें लाइन के झुकाव के कोण के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है:

  • A-टाइप टावर (A-Type Tower / Suspension Tower):
    • ​इनका उपयोग सीधी लाइन पर किया जाता है (0° से 2° तक के कोण के लिए)।
    • ​इन्हें सस्पेंशन टावर (निलंबन टावर) भी कहा जाता है।
  • B-टाइप टावर (B-Type Tower / Angle/Tension Tower):
    • ​इनका उपयोग तब किया जाता है जब लाइन को कम कोण पर मोड़ना होता है (आमतौर पर 2° से 15° के कोण के लिए)।
    • ​इन्हें टेंशन टावर या एंगल टावर भी कहते हैं।
  • C-टाइप टावर (C-Type Tower / Tension Tower):
    • ​इनका उपयोग तब किया जाता है जब लाइन को मध्यम कोण पर मोड़ना होता है (आमतौर पर 15° से 30° के कोण के लिए)।
  • D-टाइप टावर (D-Type Tower / Dead-End/Special Tower):
    • ​इनका उपयोग तब किया जाता है जब लाइन को बहुत बड़े कोण पर मोड़ना हो, लाइन को समाप्त करना हो, या नदी/रेलवे क्रॉसिंग जैसे विशेष स्थानों पर करना हो।
    • ​इन्हें डेड-एंड टावर भी कहा जाता है।

​III. अन्य प्रकार के टावर

  • कूलिंग टावर (Cooling Tower): औद्योगिक संयंत्रों (जैसे बिजली घर) में पानी को ठंडा करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। (उदाहरण: नेचुरल ड्राफ्ट, मैकेनिकल ड्राफ्ट कूलिंग टावर)।
  • अवलोकन टावर (Observation Tower): पर्यटकों के लिए ऊँचाई से दृश्य देखने के लिए बनाए जाते हैं (उदाहरण: एफिल टावर)।
  • प्रकाश टावर (Lighting Tower): बड़े क्षेत्रों जैसे निर्माण स्थलों या खेल के मैदानों को रोशन करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।



8. बी-प्रकार टावर ( B-Type Towers ) 

बी-प्रकार टावर (B-Type Tower) मुख्य रूप से विद्युत पारेषण (Electric Power Transmission) लाइनों में उपयोग होने वाला एक प्रकार का टेंशन या एंगल टावर है।

​यह टावर ट्रांसमिशन लाइन को दिशा बदलने या झुकाव (Angle of Deviation) देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

बी-प्रकार टावर की मुख्य विशेषताएं

विशेषता

विवरण

मुख्य उपयोग

ट्रांसमिशन लाइन को झुकाव (मोड़) देने के लिए।

झुकाव कोण (Angle of Deviation)

यह टावर आमतौर पर 2° से लेकर 15° तक के कोण पर लाइन को मोड़ने के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रकार का नाम

इसे अक्सर टेंशन टावर (Tension Tower) या एंगल टावर (Angle Tower) भी कहा जाता है, क्योंकि इसे कंडक्टरों के उच्च तनाव (Tension) को सहन करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।

बनावट/डिज़ाइन

इसकी संरचना ए-टाइप सस्पेंशन टावर की तुलना में अधिक मजबूत होती है क्योंकि इसे सीधे लाइन में लगने वाले हवा के बल के साथ-साथ दिशा बदलने के कारण उत्पन्न हुए पार्श्व तनाव (Lateral Stress) को भी संभालना पड़ता है।


संक्षेप में: 

जब पावर ट्रांसमिशन लाइन में हल्का से मध्यम मोड़ आता है, तो वहाँ सामान्य सस्पेंशन टावर (A-टाइप) के बजाय बी-प्रकार टेंशन टावर का उपयोग किया जाता है ताकि कंडक्टरों के तनाव को संतुलित किया जा सके और लाइन को स्थिर रखा जा सके।



9. सी-प्रकार टावर ( C-Type Towers )

सी-प्रकार टावर (C-Type Tower) मुख्य रूप से विद्युत पारेषण (Electric Power Transmission) लाइनों में उपयोग होने वाला एक टेंशन या एंगल टावर है। यह टावर लाइन में एक बड़ा मोड़ या झुकाव आने पर कंडक्टरों द्वारा उत्पन्न तनाव (Tension) को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

​सी-प्रकार टावर की मुख्य विशेषताएं

विशेषता

विवरण

मुख्य उपयोग

ट्रांसमिशन लाइन को मध्यम से बड़े कोण पर मोड़ने या झुकाने के लिए।

झुकाव कोण (Angle of Deviation)

इस टावर का उपयोग आमतौर पर 15° से लेकर 30° तक के कोण पर लाइन को मोड़ने के लिए किया जाता है।

प्रकार का नाम

इसे भी टेंशन टावर या एंगल टावर कहा जाता है, लेकिन यह बी-प्रकार टावर की तुलना में अधिक बल सहने के लिए बनाया जाता है।

बनावट/डिज़ाइन

इसकी संरचना बी-टाइप टावर से भी अधिक मजबूत होती है, क्योंकि यह दिशा बदलने के कारण उत्पन्न हुए बड़े पार्श्व तनाव और कंडक्टरों के उच्च तनाव को संभालता है।


संक्षेप में: 

सी-प्रकार टावर उन स्थानों पर लगाया जाता है जहाँ ट्रांसमिशन लाइन का मार्ग एक महत्वपूर्ण कोण पर मुड़ता है। यह सुनिश्चित करता है कि उच्च तनाव वाली लाइनें मोड़ पर स्थिर रहें और सुरक्षा के मानकों का पालन करें।



10. डी-प्रकार टावर ( D-Type Towers )

डी-प्रकार टावर (D-Type Tower) विद्युत पारेषण लाइनों में उपयोग होने वाला एक भारी टेंशन (Heavy Tension) या डेड-एंड (Dead-End) टावर है। यह ट्रांसमिशन लाइन के मार्ग में सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण बदलावों को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

डी-प्रकार टावर की मुख्य विशेषताएं

विशेषता

विवरण

मुख्य उपयोग

बड़े कोण पर लाइन को मोड़ने या लाइन को समाप्त (Dead-End) करने के लिए।

झुकाव कोण (Angle of Deviation)

इस टावर का उपयोग आमतौर पर 30° से लेकर 60° तक के कोण पर लाइन को मोड़ने के लिए किया जाता है।

अन्य महत्वपूर्ण उपयोग

इसका उपयोग विशेष क्रॉसिंग (जैसे, रेलवे क्रॉसिंग, राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) क्रॉसिंग, या बड़ी नदी क्रॉसिंग) के दोनों सिरों पर किया जाता है, जहाँ अधिकतम सुरक्षा और यांत्रिक स्थिरता आवश्यक होती है।

प्रकार का नाम

यह एक टेंशन टावर है जिसे डेड-एंड टावर या टर्मिनल टावर के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि इसे उच्च अक्षीय भार (Axial Load) और तनाव को सहन करने के लिए बनाया जाता है।

बनावट/डिज़ाइन

यह A, B, और C-टाइप टावरों में सबसे मजबूत होता है, क्योंकि इसे पूरी लाइन में सबसे अधिक यांत्रिक तनाव का सामना करना पड़ता है।


संक्षेप में: 

डी-प्रकार टावर ट्रांसमिशन लाइन में सबसे अधिक तनाव वाली संरचना होती है। यह लाइन की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन को संभालता है या एक खंड को समाप्त करने से पहले अंतिम सहारा प्रदान करता है, जिससे पूरी लाइन की स्थिरता सुनिश्चित होती है।



11. एकल सर्किट टावर ( Single Circuit Towers ) 

एकल सर्किट टावर (Single Circuit Tower) वह विद्युत पारेषण टावर है जो केवल एक ही विद्युत सर्किट को सहारा देता है।

​एक विद्युत सर्किट में आमतौर पर तीन चरण (Three Phases) होते हैं। इसलिए, सिंगल सर्किट टावर पर आपको आमतौर पर तीन मुख्य कंडक्टर (तार) दिखाई देंगे।

मुख्य बिंदु

विशेषता

विवरण

सर्किट की संख्या

केवल एक सर्किट।

कंडक्टरों की संख्या

एक 3-फेज (3-Phase) सिस्टम में आमतौर पर तीन कंडक्टर (या प्रति फेज बंडल किए गए कंडक्टरों के तीन समूह) होते हैं।

संरचना

कंडक्टरों को टावर के एक ही तरफ या दोनों तरफ क्षैतिज रूप से (Horizontal) व्यवस्थित किया जा सकता है, लेकिन वे मिलकर केवल एक सर्किट बनाते हैं।

उपयोग

इन टावरों का उपयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहाँ कम बिजली की मांग होती है या जहाँ भविष्य में विस्तार की आवश्यकता नहीं होती है।

पहचान

यदि आप ट्रांसमिशन लाइन टावर पर केवल तीन मुख्य इंसुलेटर स्ट्रिंग्स (Insulator Strings) और तीन कंडक्टर देखते हैं, तो यह एक सिंगल सर्किट टावर है। (ध्यान दें: 3 इंसुलेटर स्ट्रिंग्स का मतलब 3 फेज होते हैं, और एक सर्किट में 3 फेज होते हैं)।


सिंगल सर्किट (SC) टावर के उदाहरण:

  • A-टाइप SC टावर: सीधी रेखा (Tangent) के लिए उपयोग होता है।
  • B, C, D-टाइप SC टावर: विभिन्न कोणों (Angle) पर मोड़ के लिए उपयोग होता है।

इसके विपरीत,

डबल सर्किट टावर (Double Circuit Tower) एक ही टावर पर दो अलग-अलग सर्किट (अर्थात छह कंडक्टर) को सहारा देता है, जिससे कम जगह में अधिक बिजली का पारेषण किया जा सकता है।



12. डबल सर्किट टावर ( Double Circuit Towers )

डबल सर्किट टावर (Double Circuit Tower) वह विद्युत पारेषण टावर है जो एक ही संरचना पर दो स्वतंत्र विद्युत सर्किटों को सहारा देता है।

​यह टावर एक ही गलियारे (Right-of-Way) का उपयोग करके सिंगल सर्किट टावर की तुलना में दोगुना बिजली पारेषित करने की क्षमता रखता है।

मुख्य विशेषताएं और लाभ

विशेषता/लाभ

विवरण

सर्किट की संख्या

दो सर्किट।

कंडक्टरों की संख्या

एक 3-फेज सिस्टम में दो सर्किटों के लिए कुल छह कंडक्टर (तीन कंडक्टर प्रति सर्किट) होते हैं। इन छह कंडक्टरों को टावर के दोनों तरफ (तीन एक तरफ और तीन दूसरी तरफ) लंबवत (Vertically) व्यवस्थित किया जाता है।

अंतरिक्ष की बचत

शहरी या घनी आबादी वाले क्षेत्रों में यह सबसे बड़ा फायदा है, क्योंकि यह दो अलग-अलग सिंगल सर्किट लाइनों के लिए आवश्यक भूमि (Land) की बचत करता है।

विश्वसनीयता (Reliability)

अगर एक सर्किट में कोई खराबी (Fault) आती है, तो दूसरे सर्किट के माध्यम से बिजली का पारेषण जारी रखा जा सकता है। यह बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता को बढ़ाता है।

संरचना

डबल सर्किट टावर, सिंगल सर्किट टावर की तुलना में आमतौर पर ऊँचा और अधिक मजबूत (Mechanically Strong) होता है, क्योंकि इसे छह कंडक्टरों का अतिरिक्त वजन और तनाव संभालना होता है।


डबल सर्किट टावर का उपयोग उच्च वोल्टेज (जैसे 132 kV, 220 kV, 400 kV) पारेषण लाइनों में व्यापक रूप से किया जाता है।



13. मल्टी सर्किट टावर ( Multi-Circuit Towers ) 

मल्टी सर्किट टावर (Multi-Circuit Tower) वह विद्युत पारेषण टावर है जो एक ही संरचना पर दो से अधिक स्वतंत्र विद्युत सर्किटों को सहारा देता है।

​यह सिंगल सर्किट (1 सर्किट) और डबल सर्किट (2 सर्किट) टावरों का एक उन्नत रूप है, जिसे सीमित भूमि (Right-of-Way) में अधिकतम बिजली पारेषण क्षमता प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

मुख्य विशेषताएं और उद्देश्य

विशेषता/उद्देश्य

विवरण

सर्किट की संख्या

तीन या उससे अधिक सर्किट (उदाहरण के लिए, 3 सर्किट, 4 सर्किट, आदि)।

कंडक्टरों की संख्या

प्रत्येक 3-फेज सर्किट में तीन कंडक्टर होते हैं, इसलिए इसमें आमतौर पर नौ या उससे अधिक कंडक्टर होते हैं। उदाहरण के लिए, 4-सर्किट टावर में 4 × 3 = 12 कंडक्टर हो सकते हैं।

मुख्य उद्देश्य

कम भूमि का उपयोग: सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि यह कम जगह/गलियारे (Right-of-Way) में बड़ी मात्रा में बिजली पारेषित करने की अनुमति देता है, जो शहरी और घनी आबादी वाले क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।

वोल्टेज स्तर

मल्टी सर्किट टावरों का उपयोग अक्सर ऐसे मामलों में किया जाता है जहाँ एक ही टावर पर विभिन्न वोल्टेज स्तरों (Multi-Voltage) के सर्किट को ले जाना होता है (जैसे 132 kV, 220 kV, और 400 kV)।

संरचना की जटिलता

ये टावर यांत्रिक रूप से बहुत मजबूत और संरचनात्मक रूप से अधिक जटिल होते हैं, क्योंकि उन्हें अधिक भार, हवा का दबाव और कंडक्टरों को पर्याप्त रूप से अलग रखने की आवश्यकता होती है।


मल्टी सर्किट टावर एक ही इन्फ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करके उच्च पारेषण घनत्व (High Transmission Density) सुनिश्चित करते हैं।



14. नदी पार करने वाले टावर ( River Crossing Towers )

नदी पार करने वाले टावर (River Crossing Towers) विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए ऊँचे और मजबूत विद्युत पारेषण टावर होते हैं, जिनका निर्माण चौड़ी नदियों, झीलों, या जल निकायों के ऊपर से बिजली लाइनों को ले जाने के लिए किया जाता है।

मुख्य विशेषताएं

  • अत्यधिक ऊँचाई (Extreme Height): नदी पार करने वाले टावर सामान्य ट्रांसमिशन टावरों की तुलना में बहुत ऊँचे होते हैं (जैसे भारत में हुगली नदी पार करने वाले टावरों की ऊँचाई 236 मीटर है)। यह अतिरिक्त ऊँचाई इसलिए आवश्यक है ताकि कंडक्टर पानी की सतह से पर्याप्त सुरक्षित ऊँचाई (Clearance) पर रहें, खासकर अधिकतम बहाव या जहाज गुजरने के दौरान।
  • लंबी विस्तृति (Long Span): इन टावरों के बीच की दूरी (span length) बहुत अधिक होती है, अक्सर 800 मीटर से भी अधिक, क्योंकि नदी के बीच में टावर बनाना बेहद मुश्किल और महंगा होता है।
  • मजबूत नींव (Robust Foundation): इन टावरों की नींव पानी के भीतर, नदी तल पर बनाई जाती है। नींव को नदी के बहाव, कटाव (erosion), बाढ़, और भारी वजन का सामना करने के लिए पाइल फाउंडेशन (Pile Foundation) जैसी विशेष तकनीकों का उपयोग करके बहुत मजबूत बनाया जाता है।
  • तनाव और डेड एंड टावर (Tension/Dead End Towers): मुख्य नदी पारक टावर (River Crossing Tower) निलंबन (Suspension) प्रकार के हो सकते हैं, लेकिन नदी पारक के दोनों किनारों पर सहायक टावर (Balancing Towers) या तनाव टावर (Tension/Dead End Towers) होते हैं। ये टावर कंडक्टरों के भारी तनाव (Tension) को संभालते हैं जो लंबी विस्तृति के कारण उत्पन्न होता है।

डिज़ाइन के कारण और चुनौती

  1. सुरक्षा (Safety): पानी और कंडक्टरों के बीच आवश्यक ऊँचाई बनाए रखना (Maximum Sagging की स्थिति में भी)।
  2. यांत्रिक शक्ति (Mechanical Strength): लंबी विस्तृति में कंडक्टरों के उच्च तनाव और तेज हवा के दबाव (Wind Load) का सामना करना।
  3. जटिल निर्माण (Complex Construction): नदी के बीच में या किनारे पर दलदली क्षेत्र में टावर का निर्माण करना एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है, जिसके लिए विशेष उपकरण (जैसे तैरते बजरे या फेरी) और तकनीक की आवश्यकता होती है।



15. रेलवे क्रॉसिंग टावर्स (Railway Crossing Towers) 

रेलवे क्रॉसिंग टावर्स (Railway Crossing Towers) वे विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए पारेषण टावर होते हैं जिनका उपयोग उच्च वोल्टेज बिजली लाइनों को किसी सक्रिय रेलवे ट्रैक के ऊपर से सुरक्षित रूप से पार कराने के लिए किया जाता है।

​इन टावरों का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिजली के कंडक्टर रेलवे की पटरियों, ट्रेनों और रेलवे के विद्युतीकृत ओवरहेड उपकरण (OHE) से पर्याप्त और सुरक्षित ऊँचाई (Vertical Clearance) पर रहें, ताकि कोई दुर्घटना न हो।

डिज़ाइन और सुरक्षा संबंधी मुख्य नियम

​चूंकि रेलवे क्रॉसिंग एक संवेदनशील क्षेत्र होता है, इसलिए यहां इस्तेमाल होने वाले टावरों और पारेषण लाइन के डिज़ाइन के लिए कठोर सुरक्षा नियम और विनिर्देशों का पालन किया जाता है:

​1. टावर का प्रकार (Type of Tower)

  • ​रेलवे क्रॉसिंग के लिए आमतौर पर तनाव टावर (Tension Towers) या डेड-एंड टावर (Dead-End Towers) का उपयोग किया जाता है।
  • ​इन टावरों को विद्युत इंजीनियरिंग में DD/D टाइप टावर कहा जाता है, जो लाइन में उच्च तनाव (High Tension) और बड़े कोणों को संभालने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं।
  • ​क्रॉसिंग से पहले और बाद में दोनों तरफ ये मजबूत टावर लगाए जाते हैं ताकि यदि किसी कारणवश कंडक्टर टूट जाए, तो तनाव (Pull) इन टावरों तक सीमित रहे और वह रेलवे ट्रैक पर न गिरे।

​2. सुरक्षित ऊँचाई (Minimum Clearance)

  • ​कंडक्टर और रेल स्तर के बीच आवश्यक ऊर्ध्वाधर (Vertical) सुरक्षित ऊँचाई (Ground Clearance) बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।
  • ​अधिकतम शिथिलता (Maximum Sag) की स्थिति में भी, किसी भी कंडक्टर के सबसे निचले बिंदु की रेल स्तर से न्यूनतम ऊँचाई 17.90 मीटर (आधुनिक उच्च वोल्टेज लाइनों के लिए) पर बनाए रखी जाती है। यह ऊँचाई विशेष रूप से रेलवे के नियमों द्वारा निर्धारित की जाती है।

​3. टावर की दूरी और कोण (Tower Distance and Angle)

  • ​क्रॉसिंग टावरों की स्थापना निकटतम रेलवे ट्रैक के केंद्र से कम से कम टावर की ऊँचाई + 6 मीटर की दूरी पर होनी चाहिए।
  • ​पारेषण लाइन को सामान्यतः रेलवे ट्रैक के समकोण (Right Angle) पर (90 डिग्री पर) पार करना चाहिए।

​4. क्रॉसिंग का स्थान (Location Restriction)

  • ​यह सुनिश्चित किया जाता है कि पारेषण लाइन रेलवे के महत्वपूर्ण विद्युतीकृत क्षेत्रों (Electrified Area) जैसे बूस्टर ट्रांसफार्मर, ट्रैक्शन स्विचिंग स्टेशन, या ट्रैक केबिन लोकेशन के ठीक ऊपर से न गुजरे।



16. सड़क पार करने वाले टावर ( Road Crossing Towers)

सड़क पार करने वाले टावर (Road Crossing Towers) वे ट्रांसमिशन टावर होते हैं जिनका उपयोग उच्च वोल्टेज बिजली लाइनों को राष्ट्रीय राजमार्गों (NH), राज्य राजमार्गों (SH), या अन्य महत्वपूर्ण सड़कों के ऊपर से सुरक्षित रूप से ले जाने के लिए किया जाता है।

​इन टावरों का मुख्य लक्ष्य सड़क पर चलने वाले वाहनों (विशेषकर ऊँचे ट्रकों और निर्माण उपकरणों), यात्रियों और लाइनों के लिए आवश्यक सुरक्षित दूरी (Safety Clearance) बनाए रखना है।

डिज़ाइन और सुरक्षा मानक

​सड़क पार करने वाले टावरों के डिज़ाइन और स्थापना के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) द्वारा कठोर नियम निर्धारित किए गए हैं:

​1. टावर का प्रकार (Type of Tower)

  • ​सड़क क्रॉसिंग के लिए हमेशा तनाव टावर (Tension Towers) का उपयोग किया जाता है, जिन्हें अक्सर डबल सस्पेंशन (Double Suspension) या DD/D टाइप टावर कहा जाता है।
  • ​ये टावर यह सुनिश्चित करते हैं कि यदि कंडक्टर टूट जाए तो लाइन के टूटे हुए तार सड़क पर न गिरें, क्योंकि उच्च तनाव को दोनों तरफ के मजबूत टावरों द्वारा वहन किया जाता है।

​2. स्थान निर्धारण (Location & Placement)

  • टावर की स्थिति: उच्च तनाव (High Tension) वाले टावरों के पायों (Pylons) को अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) भूमि की सीमा (NH Land Boundary) से बाहर स्थापित किया जाना चाहिए।
  • संरचनाओं से दूरी: क्रॉसिंग के लिए बनाए गए टावर को सड़क पर मौजूद किसी अन्य संरचना (जैसे पुलिया, साइनबोर्ड, या स्ट्रीट लाइट) से न्यूनतम 15 मीटर की दूरी पर होना चाहिए।

​3. सुरक्षित ऊँचाई (Minimum Vertical Clearance)

  • ​लाइन के सबसे निचले कंडक्टर और सड़क की सतह (Road Crown) के बीच आवश्यक ऊर्ध्वाधर सुरक्षित दूरी बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • ​उच्च वोल्टेज (HV) लाइनों के लिए यह ऊँचाई, वोल्टेज के स्तर के अनुसार बदलती है, लेकिन यह अधिकतम तापमान और हवा रहित स्थिति में भी पर्याप्त होनी चाहिए।
  • नियम: अधिकतम शिथिलता (Maximum Sag) की स्थिति में भी, कंडक्टर की सड़क की सतह से न्यूनतम ऊँचाई इतनी रखी जानी चाहिए कि चालक के बगल में कंडक्टर के टूटने पर भी, सड़क की सतह से ऊँचाई 12.00 मीटर से कम न हो (हालांकि, वास्तविक ऊँचाई वोल्टेज के अनुसार अलग-अलग होती है, और इसे अक्सर भविष्य के सड़क स्तर को ध्यान में रखते हुए 15-25 मीटर तक रखा जाता है)।

​4. क्रॉसिंग की विस्तृति और कोण (Span and Angle)

  • ​राष्ट्रीय राजमार्गों पर, क्रॉसिंग की विस्तृति (Crossing Span) आमतौर पर 250 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • ​ओवरहेड लाइन को अधिमानतः (Preferably) सड़क के समकोण (Right Angle - 90 डिग्री) पर पार करना चाहिए।




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