"व्यापार एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण" (Trade & Vocational Training) CSIR
व्यापार एवं प्रशिक्षण
व्यापार में प्रयुक्त औजारों एवं मशीनों की सूची।
खतरे, चेतावनी, सावधानी और व्यक्तिगत सुरक्षा संबंधी संकेतों को पहचानना।
व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) का उपयोग। प्राथमिक चिकित्सा का अभ्यास।
विद्युत दुर्घटनाओं से बचाव के उपाय और ऐसी दुर्घटनाओं में उठाए जाने वाले कदम। अग्निशामक यंत्रों का उपयोग।
यह पाठ्यक्रम "व्यापार एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण" (Trade & Vocational Training) के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण चरण का हिस्सा है। चाहे आप ITI (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान), पॉलिटेक्निक कर रहे हों या किसी कारखाने में काम शुरू कर रहे हों—कार्यस्थल पर कदम रखने से पहले सुरक्षा (Safety) और बुनियादी अनुशासन को समझना अनिवार्य होता है।
यहाँ इस पूरे पाठ्यक्रम का एक सरल, स्पष्ट और व्यावहारिक परिचय दिया गया है:
1. व्यापार में प्रयुक्त औजारों एवं मशीनों की सूची (List of Tools & Machines)
किसी भी मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल या प्रोडक्शन ट्रेड (Trade) में काम करने के लिए औजारों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जाता है:
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हस्त औजार (Hand Tools): ये हाथ से चलाए जाने वाले बुनियादी उपकरण हैं।
- मापने और चिन्हित करने वाले: स्टील रूल (Scale), वर्नियर कैलीपर, माइक्रोमीटर, ट्राई-स्क्वायर (गुनिया), स्क्राइबर।
- पकड़ने वाले: कॉम्बिनेशन प्लायर्स (Pliers), वाइस (Bench Vice), स्पैनर (पाना/रेंच)।
- काटने और चोट मारने वाले: हेक्सा (आरी), छेनी (Chisel), रेती (File), हथौड़ा (Ball Peen Hammer)।
- पावर टूल्स (Power Tools): ये बिजली या कंप्रेस्ड एयर से चलते हैं।
- हैंड ड्रिलिंग मशीन, पोर्टेबल ग्राइंडर, जिग-सॉ (Jigsaw)।
- प्रमुख मशीनें (Machines): भारी और सटीक काम के लिए।
- लेथ मशीन (खराद), मिलिंग मशीन, ड्रिलिंग मशीन, शेपर मशीन और सीएनसी (CNC) मशीनें।
2. खतरे, चेतावनी, सावधानी और सुरक्षा संकेतों की पहचान (Safety Signs)
औद्योगिक कार्यस्थलों पर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए चार प्रकार के सुरक्षा संकेत (Safety Signs) लगाए जाते हैं, जिन्हें पहचानना हर कारीगर के लिए जरूरी है:
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संकेत का प्रकार |
आकार और रंग |
इसका क्या मतलब है? |
उदाहरण |
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1. निषेधात्मक संकेत (Prohibitive) |
वृत्ताकार (Circular), लाल बॉर्डर और क्रॉस बार |
यह काम करना सख्त मना है। |
धूम्रपान न करें, आग न जलाएं। |
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2. अनिवार्य/सकारात्मक संकेत (Mandatory) |
वृत्ताकार (Circular), नीला बैकग्राउंड, सफेद चिन्ह |
यह काम करना या पहनना अनिवार्य है। |
हेलमेट पहनें, चश्मा लगाएं। |
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3. चेतावनी संकेत (Warning) |
त्रिकोणीय (Triangular), पीला बैकग्राउंड, काली बॉर्डर |
आगे खतरा है, सावधान रहें। |
बिजली के झटके का खतरा, आग का खतरा। |
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4. सूचनात्मक संकेत (Informational) |
वर्गाकार या आयताकार, हरा बैकग्राउंड, सफेद चिन्ह |
सुरक्षा संबंधी जानकारी या रास्ता बताना। |
प्राथमिक चिकित्सा केंद्र (First Aid), आपातकालीन निकास (Exit)। |
3. व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) और प्राथमिक चिकित्सा (First Aid)
व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (Personal Protective Equipment - PPE)
कारखाने में काम करते समय शरीर को चोट, एसिड या गर्मी से बचाने के लिए पहने जाने वाले उपकरण PPE कहलाते हैं:
- PPE-1 (सिर की सुरक्षा): हेलमेट (Safety Helmet) — ऊपर से गिरने वाली वस्तुओं से बचाव।
- PPE-2 (पैर की सुरक्षा): स्टील-टो सेफ्टी शूज (Safety Shoes) — भारी सामान गिरने या कील चुभने से बचाव।
- PPE-3 (आँखों की सुरक्षा): सुरक्षा चश्मा (Safety Goggles) या वेल्डिंग शील्ड — चिंगारी और धूल के कणों से बचाव।
- PPE-4 (हाथों की सुरक्षा): लेदर या रबर के दस्ताने (Gloves) — कटने, जलने या बिजली के झटके से बचाव।
- PPE-5 (श्वसन सुरक्षा): डस्ट मास्क या रेस्पिरेटर — जहरीली गैसों और धूल से बचाव।
- PPE-6 (कानों की सुरक्षा): ईयर प्लग या ईयर मफ — भारी मशीनों के शोर से बहरेपन से बचाव।
प्राथमिक चिकित्सा का अभ्यास (First Aid Practice)
डॉक्टर के आने से पहले घायल व्यक्ति को दी जाने वाली तुरंत सहायता प्राथमिक चिकित्सा कहलाती है:
- रक्तस्राव (Bleeding) होने पर: घाव को साफ पानी से धोकर साफ कपड़े या पट्टी से मजबूती से दबाएं ताकि खून बहना बंद हो।
- जलने (Burns) पर: जले हुए हिस्से पर तुरंत 10-15 मिनट तक ठंडा पानी डालें (बर्फ या घी-तेल न लगाएं)।
- होश खोने या सांस रुकने पर: तुरंत CPR (Cardiopulmonary Resuscitation) प्रक्रिया का अभ्यास करें—छाती को दबाना और कृत्रिम सांस देना।
4. विद्युत दुर्घटनाओं से बचाव और उठाए जाने वाले कदम (Electrical Safety)
बचाव के उपाय (Preventive Measures)
- कभी भी गीले हाथों से बिजली के स्विच या तारों को न छुएं।
- हमेशा उचित अर्थिंग (Earthing) और थ्री-पिन प्लग का उपयोग करें।
- कटे-फटे या ढीले तारों पर तुरंत इंसुलेशन टेप लगाएं या उन्हें बदलें।
- बिजली के लाइव पैनल पर काम करते समय पैरों के नीचे रबर की मैट (Rubber Mat) का उपयोग करें।
दुर्घटना होने पर उठाए जाने वाले कदम (Emergency Steps)
यदि किसी व्यक्ति को बिजली का झटका लगा हो और वह तार से चिपका हो, तो:
- सबसे पहले मुख्य स्विच (Main Switch) को तुरंत बंद करें।
- यदि मुख्य स्विच दूर हो, तो स्वयं को सुरक्षित रखते हुए (रबर के जूते या सूखी लकड़ी पर खड़े होकर) पीड़ित को सूखी लकड़ी, प्लास्टिक की छड़ी या सूखे कपड़े की मदद से तार से अलग करें। भूलकर भी पीड़ित को सीधे न छुएं!
- पीड़ित की सांस और नाड़ी (Pulse) जांचें। यदि सांस नहीं चल रही है, तो तुरंत CPR शुरू करें और एम्बुलेंस को कॉल करें।
5. अग्निशामक यंत्रों का उपयोग (Using Fire Extinguishers)
आग को बुझाने के लिए कारखानों में अग्निशामक सिलेंडर (Fire Extinguishers) रखे जाते हैं। इन्हें चलाने के लिए PASS (पास) नियम का पालन किया जाता है:
- P (Pull): सिलेंडर के हैंडल में लगी सुरक्षा पिन (Safety Pin) को खींचकर बाहर निकालें।
- A (Aim): नोजल या पाइप के मुंह को आग की लपटों के ऊपर नहीं, बल्कि आग के निचले हिस्से (Base/जड़) की तरफ सीधा करें।
- S (Squeeze): लीवर या हैंडल को मजबूती से दबाएं (Squeeze) ताकि गैस/पाउडर बाहर निकले।
- S (Sweep): नोजल को आग की जड़ पर बाएं से दाएं (Sweep) झाड़ू की तरह घुमाएं जब तक कि आग पूरी तरह बुझ न जाए।
विशेष ध्यान दें: बिजली की आग (Class E) पर कभी भी पानी का उपयोग न करें, क्योंकि पानी बिजली का सुचालक है और इससे आपको भी जानलेवा झटका लग सकता है। बिजली की आग के लिए हमेशा CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) या DCP (ड्राय केमिकल पाउडर) वाले सिलेंडर का ही उपयोग करें।
यह विषय किसी भी ट्रेड के व्यावहारिक प्रशिक्षण (Practical Training) की पहली सीढ़ी है। यदि आप इनमें से किसी विशिष्ट हिस्से, जैसे CPR देने का सही तरीका या वर्नियर कैलीपर से रीडिंग लेने की विधि को गहराई से समझना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
हाथ के औजार और उनके उपयोग
विभिन्न प्रकार के हाथ के औजारों की पहचान करें। संचालन के लिए उपयुक्त औजारों का चयन और संचालन में बरती जाने वाली सावधानियां। व्यावसायिक औजारों की देखभाल और रखरखाव।
फिटिंग के काम करते समय सुरक्षा सावधानियों का अभ्यास करें।
फाइलिंग और हैक्सिंग का कार्यशाला अभ्यास करें। साधारण शीट मेटल के काम, फिटिंग और ड्रिलिंग का अभ्यास करें।
धातु की चादर से एक खुला डिब्बा बनाएं।
यह विषय मैकेनिकल और फिटिंग ट्रेड (जैसे- फिटर, टर्नर, मशीनिस्ट) का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक (Practical) हिस्सा है। इसमें हाथ के औजारों के सही उपयोग से लेकर धातु की चादर (Sheet Metal) से वस्तुएं बनाने तक का कौशल शामिल है।
यहाँ इन सभी टॉपिक्स का एक विस्तृत और व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया गया है:
1. हाथ के औजार: पहचान, चयन और सावधानियां (Hand Tools)
कार्यशाला (Workshop) में उपयोग होने वाले मुख्य हाथ के औजारों को उनके काम के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है:
मार्किंग और मेजरिंग टूल्स (Marking & Measuring Tools)
- स्टील रूल (Steel Rule): लंबाई मापने के लिए।
- ट्राई-स्क्वायर (Try Square/गुनिया): 90^\circ का कोण जांचने और सतह की समतलता (Flatness) चेक करने के लिए।
- स्क्राइबर (Scriber): धातु की सतह पर लाइनें खींचने (मार्किंग करने) के लिए।
- पंच (Center Punch & Prick Punch): ड्रिलिंग करने से पहले केंद्र बिंदु को गहरा करने के लिए ताकि ड्रिल बिट फिसले नहीं।
कटिंग और स्ट्राइकिंग टूल्स (Cutting & Striking Tools)
- हेक्सा (Hacksaw): धातु के पाइप या रॉड को काटने के लिए।
- छेनी (Chisel): अतिरिक्त धातु को छीलकर हटाने (Chipping) के लिए।
- रेती (File): धातु को रगड़कर चिकना करने और सही आकार देने के लिए।
- हथौड़ा (Ball Peen Hammer): पंचिंग करने, रिवेटिंग करने या धातु को मोड़ने के लिए।
होल्डिंग टूल्स (Holding Tools)
- बेंच वाइस (Bench Vice): वर्कपीस को मजबूती से पकड़ने के लिए ताकि उस पर फाइलिंग या हैक्सिंग की जा सके।
सही औजार का चयन और संचालन में सावधानियां
- चयन: हमेशा काम के अनुसार सही आकार और प्रकार के टूल का चयन करें। उदाहरण के लिए, लकड़ी काटने वाली आरी से लोहे को काटने की कोशिश न करें।
- सावधानियां: * बिना हैंडल वाली या ढीले हैंडल वाली रेती (File) का उपयोग कभी न करें; इससे हत्था हाथ में चुभ सकता है।
- हथौड़े का उपयोग करते समय सुनिश्चित करें कि उसका सिर (Head) हैंडल में कसकर फिट हो (ढीला न हो)।
व्यावसायिक औजारों की देखभाल और रखरखाव (Maintenance)
- उपयोग के बाद टूल्स को साफ करके रखें। रेती के दांतों में फंसे धातु के कणों को फाइल कार्ड (File Card) से साफ करें।
- जंग से बचाने के लिए टूल्स पर हल्का तेल या ग्रीस लगाकर रखें।
- मापने वाले टूल्स (जैसे वर्नियर कैलीपर) को कभी भी चोट मारने वाले टूल्स (जैसे हथौड़ा) के साथ मिलाकर न रखें।
2. फिटिंग के काम करते समय सुरक्षा सावधानियां (Fitting Safety)
- बेंच वाइस की ऊंचाई: बेंच वाइस की ऊंचाई कारीगर की कोहनी (Elbow) के बराबर होनी चाहिए ताकि काम करते समय थकान न हो।
- सुरक्षा चश्मा: चिपिंग (Chisel से काटना) या ग्राइंडिंग करते समय आंखों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा चश्मा (Goggles) अवश्य पहनें।
- फाइलिंग करते समय: रेती के आगे वाले हिस्से पर हाथ की हथेलियों को सही से रखें, अंगुलियों को रेती के नीचे न लाएं अन्यथा जॉब के नुकीले कोनों से हाथ कट सकता है।
- ढीले कपड़े न पहनें: कार्यशाला में काम करते समय ढीले कपड़े, अंगूठी या घड़ी न पहनें; ये वाइस या मशीनों में फंस सकते हैं।
3. कार्यशाला अभ्यास (Workshop Practice)
क. फाइलिंग (Filing)
यह धातु की सतह से अतिरिक्त सामग्री को रगड़कर हटाने और उसे समतल बनाने की प्रक्रिया है।
- विधि: वाइस में जॉब को मजबूती से बांधें। रेती को सीधे दोनों हाथों से पकड़ें और आगे की तरफ धकेलते समय दबाव (Pressure) लगाएं। वापस खींचते समय दबाव हटा लें, क्योंकि रेती केवल आगे जाते समय काटती है।
ख. हैक्सिंग (Hacksawing)
धातु को आरी (Hacksaw) से काटने की प्रक्रिया।
- विधि: काटने वाली जगह पर स्क्राइबर और पंच से निशान बना लें। ब्लेड के दांत हमेशा आगे की तरफ (Forward direction) होने चाहिए। काटते समय गति धीमी और स्थिर (40-50 स्ट्रोक प्रति मिनट) होनी चाहिए। कट के अंत में दबाव कम कर दें ताकि जॉब अचानक टूटकर चोट न लगाए।
ग. ड्रिलिंग (Drilling)
धातु में गोल छेद करने की प्रक्रिया।
- विधि: सबसे पहले सेंटर पंच से निशान बनाएं। जॉब को ड्रिलिंग मशीन के वाइस में कसकर बांधें। ड्रिल शुरू करने पर थोड़ा सा फीड दें, और घर्षण की गर्मी को कम करने के लिए कूलेंट (Coolant/पानी या तेल) का लगातार उपयोग करें।
4. शीट मेटल कार्य: धातु की चादर से खुला डिब्बा बनाना
शीट मेटल के काम में पतली जीआई (GI) या एल्युमिनियम शीट का उपयोग किया जाता है। एक खुला डिब्बा (Open Box) बनाने की चरणबद्ध प्रक्रिया नीचे दी गई है:
आवश्यक टूल्स:
- शीट मेटल (धातु की चादर), स्टील रूल, स्क्राइबर, ट्राई-स्क्वायर, मैलेट (लकड़ी का हथौड़ा), स्निप (शीट काटने वाली कैंची), और स्टेक (मोड़ने के लिए आधार)।
निर्माण के चरण (Step-by-Step Process):
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लेआउट और मार्किंग (Development):
- सबसे पहले शीट पर डिब्बे के आकार (लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई) के अनुसार लेआउट ड्राइंग बनाएं।
- मान लीजिए आपको 100 × 100 × 50 { mm} का डिब्बा बनाना है, तो केंद्र में 100 × 100 का वर्गाकार बेस बनाएं और चारों तरफ 50 { mm} की ऊंचाई के लिए फ्लैप्स (Flaps) चिह्नित करें।
- कोनों को जोड़ने और मजबूती देने के लिए 10-10 { mm} का अतिरिक्त मार्जिन (Hem/Lap) छोड़ें।
- कटिंग (Cutting):
- स्निप (Snip) की मदद से बाहरी मार्किंग के अनुसार अतिरिक्त शीट को काटकर अलग कर लें। कोनों पर 45^circ का कट (Notch) लगाएं ताकि मोड़ते समय कोने आपस में न टकराएं।
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फोल्डिंग / मोड़ना (Bending):
- शीट को मोड़ने के लिए उसे वाइस या स्टेक (Stake) पर रखें।
- लकड़ी के हथौड़े (Mallet) का उपयोग करके चिह्नित लाइनों पर 90^circ के कोण पर मोड़ें। ध्यान रहे, लोहे के हथौड़े का उपयोग न करें, अन्यथा शीट विकृत हो सकती है या उस पर गड्ढे पड़ सकते हैं।
- पहले चारों दीवारों को ऊपर की ओर मोड़ें।
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कोनों को जोड़ना (Joining/Seaming):
- डिब्बे के चारों कोनों पर छोड़े गए अतिरिक्त मार्जिन (Laps) को आपस में ओवरलैप करें।
- इन्हें मजबूती से जोड़ने के लिए आप रिवेटिंग (Riveting) कर सकते हैं या सोल्डरिंग (Soldering) की मदद से कोनों को सील कर सकते हैं।
- फिनिशिंग (Finishing):
- डिब्बे के ऊपरी नुकीले किनारों को अंदर की तरफ मोड़ दें (जिसे हेमिंग - Hemming कहते हैं), ताकि डिब्बे का उपयोग करते समय हाथ न कटे। आपका खुला डिब्बा तैयार है।
यदि आप इस प्रैक्टिकल से जुड़े किसी विशिष्ट टूल (जैसे स्निप के प्रकार) या शीट मेटल की गणनाओं (Blank Size Calculation) को और विस्तार से समझना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
एसी और विद्युत केबलों की मूल बातें
पावर सॉकेट पर फेज, न्यूट्रल और अर्थ की पहचान करें, एसी पावर की निगरानी के लिए टेस्टर का उपयोग करें।
एक टेस्ट लैंप बनाएं और इसका उपयोग करके मेन सप्लाई की स्थिति की जांच करें।
फेज और ग्राउंड के बीच वोल्टेज मापें और अर्थिंग की समस्या का समाधान करें।
विभिन्न एसी मेन केबलों की पहचान करें और उनका परीक्षण करें। टर्मिनेशन तैयार करें, वायर स्ट्रिपर और कटर का उपयोग करके विद्युत तारों/केबलों को छीलें। SWG और बाहरी माइक्रोमीटर का उपयोग करके तार का गेज मापें।
तालिका देखें और तारों की धारा वहन क्षमता ज्ञात करें। तार के सिरे पर लग्स को क्रिम्प करें।
मल्टीमीटर का उपयोग करके एसी और डीसी वोल्टेज मापें। डायल और स्केल चिह्नों/प्रतीकों द्वारा मीटर के प्रकार की पहचान करें।
विभिन्न एनालॉग मापन उपकरणों का प्रदर्शन करें। मीटर की न्यूनतम और अधिकतम मापनीय सीमा ज्ञात करें। मीटर की यांत्रिक शून्य सेटिंग करें। तारों, मीटर प्रोब और फ्यूज आदि की निरंतरता की जांच करें।
क्लैंप मीटर का उपयोग करके वोल्टेज और करंट मापें।
यह विषय विद्युत अभियांत्रिकी (Electrical Engineering) और प्रैक्टिकल वायरिंग का मूल आधार है। घरों से लेकर फैक्ट्रियों तक बिजली का सुरक्षित उपयोग करने के लिए इन बुनियादी कौशलों और उपकरणों की जानकारी होना अनिवार्य है।
यहाँ इस पूरे पाठ्यक्रम के सभी बिंदुओं का चरणबद्ध और व्यावहारिक विवरण दिया गया है:
1. फेज, न्यूट्रल, अर्थ की पहचान और टेस्टर का उपयोग
हमारे घरों में आने वाली सिंगल-फेज एसी (AC) सप्लाई में तीन मुख्य तार होते हैं, जिन्हें 3-पिन पावर सॉकेट में इस तरह जोड़ा जाता है:
- फेज (Phase/Live): यह वह तार है जिसमें करंट होता है। सॉकेट के दाहिनी (Right) तरफ के छेद में इसे जोड़ा जाता है। (आमतौर पर लाल या भूरा रंग)
- न्यूट्रल (Neutral): यह करंट की वापसी का रास्ता है। सॉकेट के बाईं (Left) तरफ के छेद में इसे जोड़ा जाता है। (आमतौर पर काला या नीला रंग)
- अर्थ (Earth/Ground): यह सुरक्षा के लिए होता है। सॉकेट का सबसे ऊपर वाला बड़ा और मोटा छेद अर्थिंग का होता है। (आमतौर पर हरा या पीला रंग)
नियॉन टेस्टर (Neon Tester) का उपयोग
- टेस्टर की नोक को सॉकेट के फेज (दाहिने) वाले छेद में डालें।
- टेस्टर के पिछले हिस्से पर बनी धातु की क्लिप या कैप पर अपनी उंगली से छुएं (इसे अर्थिंग देना कहते हैं)।
- यदि अंदर लगा नियॉन बल्ब जलता है, तो वह फेज है। न्यूट्रल और अर्थ के छेद में टेस्टर डालने पर बल्ब नहीं जलना चाहिए।
2. टेस्ट लैंप बनाना और मेन सप्लाई की जांच (Test Lamp)
मल्टीमीटर न होने पर बिजली की उपस्थिति और दोष (Fault) जांचने के लिए टेस्ट लैंप सबसे सुरक्षित और सस्ता देसी उपकरण है।
- बनाने की विधि: एक होल्डर लें, उसमें दो अलग-अलग रंग के इंसुलेटेड तार जोड़ें और होल्डर में 60 {W} या 100 {W} का फिलामेंट वाला बल्ब (LED नहीं) लगाएं। तारों के दूसरे सिरों को थोड़ा छील लें।
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सप्लाई की जांच:
- Phase और Neutral के बीच: टेस्ट लैंप के दोनों तारों को सॉकेट के फेज और न्यूट्रल में डालें। यदि बल्ब पूरी रोशनी के साथ जलता है, तो मेन सप्लाई बिल्कुल ठीक है।
- यदि बल्ब धीमा जलता है, तो वोल्टेज कम (Low Voltage) है।
3. वोल्टेज मापना और अर्थिंग की समस्या का समाधान
मल्टीमीटर को AC वोल्टेज रेंज (750 {V} या 200 {V}) पर सेट करें और सॉकेट में निम्नलिखित जांच करें:
- Phase और Neutral (V_{LN}): यह लगभग 220 {V} से 240 {V} होना चाहिए।
- Phase और Earth (V_{LE}): यह भी लगभग 220 {V} से 240 {V} (या V_{LN} के बराबर) होना चाहिए।
- Neutral और Earth (V_{NE}): यह वोल्टेज 2 {V} से कम होना चाहिए (आदर्श रूप से 0 {V} से 1 {V})।
अर्थिंग की समस्या का समाधान (Troubleshooting Earth Fault)
- यदि Phase और Earth के बीच बल्ब नहीं जलता या मल्टीमीटर में वोल्टेज शून्य आता है, तो इसका मतलब है कि अर्थिंग कटी हुई है या कमजोर है।
- समाधान: अर्थ पिट (Earth Pit) की जांच करें, उसमें पानी और नमक-कोयले का मिश्रण डालें ताकि नमी बनी रहे और रेजिस्टेंस कम हो। ढीले अर्थ कनेक्शनों को कसें।
4. केबल छीलना, टर्मिनेशन और वायर गेज मापना
तार छीलना (Wire Stripping & Cutting)
- वायर स्ट्रिपर (Wire Stripper): इसके जबड़े में तार के आकार के अनुसार खांचे बने होते हैं। सही खांचे में तार रखकर दबाने से केवल ऊपर का प्लास्टिक इंसुलेशन कटता है, अंदर का तांबा/एल्युमिनियम सुरक्षित रहता है।
- टर्मिनेशन (Termination): तार छीलने के बाद उसके बारीक धागों (strands) को आपस में मरोड़ (twist) दें ताकि कोई तार बाहर न छूटे।
तार का गेज मापन (SWG और माइक्रोमीटर)
- SWG (Standard Wire Gauge): यह एक गोलाकार धातु की प्लेट होती है जिसमें विभिन्न आकारों के खांचे कटे होते हैं। तार के इंसुलेशन को छीलकर अलग-अलग खांचों में डालकर देखते हैं। जिस खांचे में तार बिना ढीला रहे आराम से सरक जाए, वही उसका SWG नंबर होता है। (ध्यान दें: SWG नंबर जितना छोटा होगा, तार उतना ही मोटा होगा)।
- बाहरी माइक्रोमीटर (Outside Micrometer): अत्यधिक सटीकता से तार का व्यास (Diameter) मिलीमीटर में मापने के लिए।
5. धारा वहन क्षमता और लग्स क्रिम्पिंग (Current Capacity & Lacking)
- करंट क्षमता (Current Carrying Capacity): हर तार की मोटाई (जैसे 1.5 { sq mm}, 2.5 { sq mm}, 4 { sq mm}) के अनुसार उसकी करंट झेलने की क्षमता तय होती है। इसके लिए बिजली की मानक तालिका (Standard Table) देखी जाती है। उदाहरण के लिए, 1.5 { sq mm} का कॉपर तार आमतौर पर 14-16 { Ampere} तक का लोड उठा सकता है।
- क्रिम्पिंग (Crimping Lugs): तारों को थिम्बल या लग्स (Lugs) के अंदर डालकर क्रिम्पिंग टूल (Crimping Plier) से मजबूती से दबाया जाता है। इससे कनेक्शन ढीला नहीं रहता और स्पार्किंग की समस्या खत्म हो जाती है।
6. मल्टीमीटर और अन्य मीटरों की पहचान
मल्टीमीटर से मापन
- AC Voltage: sim V या VAC प्रतीक पर नॉब घुमाएं (घरों के लिए 750 {V} रेंज चुनें)।
- DC Voltage: overline{cdots} V या VDC प्रतीक पर नॉब घुमाएं (बैठरी आदि जांचने के लिए)।
मीटरों की पहचान (Symbols on Meters)
- sim (Tilde): अल्टरनेटिंग करंट (AC) को दर्शाता है।
- overline{cdots} (Straight/Dashed lines): डायरेक्ट करंट (DC) को दर्शाता है।
- A: एमीटर (करंट मापने के लिए)।
- V: वोल्टमीटर (वोल्टेज मापने के लिए)।
- Omega (Omega): ओम-मीटर (प्रतिरोध/रेजिस्टेंस मापने के लिए)।
7. एनालॉग उपकरण, त्रुटियां और निरंतरता (Continuity) की जांच
- यांत्रिक शून्य सेटिंग (Mechanical Zero Setting): यदि कोई एनालॉग मीटर (सुई वाला) बिना कनेक्शन के भी शून्य (0) पर नहीं है, तो उसके केंद्र में दिए गए छोटे स्क्रू को स्क्रू-ड्राइवर से धीरे से घुमाकर सुई को ठीक शून्य (0) पर सेट किया जाता है।
- न्यूनतम और अधिकतम सीमा: मीटर के डायल पर लिखी सबसे छोटी और सबसे बड़ी वैल्यू उसकी रेंज तय करती है (जैसे 0 से 300 {V})।
- निरंतरता की जांच (Continuity Test): मल्टीमीटर को 'बजर' या 'डायोड' मोड पर सेट करें। दोनों प्रोब्स को आपस में छूने पर 'बीप' ({Beep}) की आवाज आनी चाहिए।
- तार/फ्यूज की जांच: फ्यूज या तार के दोनों सिरों पर प्रोब लगाएं। यदि बीप की आवाज आती है, तो तार/फ्यूज सही (साबुत) है। यदि आवाज नहीं आती, तो तार अंदर से टूटा हुआ है या फ्यूज उड़ चुका है।
8. क्लैंप मीटर का उपयोग (Clamp Meter)
यह एक जादुई मीटर है जिसके लिए बिना तार को काटे या छिले बहने वाले करंट (Ampere) को मापा जा सकता है।
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करंट मापन (Current Measurement):
- मीटर को AC/ A (एम्पियर) रेंज पर सेट करें।
- मीटर के ट्रिगर को दबाकर उसके क्लैंप (जॉ/जबाड़े) को खोलें।
- केवल किसी एक तार (या केवल फेज, या केवल न्यूट्रल) को क्लैंप के बीच में डालकर जबाड़े को बंद कर दें। डिस्प्ले पर तुरंत लोड करंट दिखने लगेगा।
- सावधानी: यदि आप फेज और न्यूट्रल दोनों तारों को एक साथ क्लैंप के अंदर डाल देंगे, तो रीडिंग शून्य (0) आएगी क्योंकि दोनों का चुंबकीय क्षेत्र एक-दूसरे को काट देगा।
यह प्रैक्टिकल ट्रेनिंग बिजली के कामों में आपको आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनाएगी। यदि आप इनमें से किसी विशिष्ट बिंदु जैसे—मल्टीमीटर से रेजिस्टेंस मापना या क्रिम्पिंग टूल्स के प्रकार को और गहराई से समझना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
सेल और बैटरी
बैटरी के धनात्मक और ऋणात्मक टर्मिनलों की पहचान करें। दी गई बैटरी का रेटेड आउटपुट वोल्टेज और Ah क्षमता ज्ञात करें।
एनालॉग/डिजिटल मल्टीमीटर का उपयोग करके दिए गए सेल/बैटरी के वोल्टेज को मापें।
लोड रेसिस्टर के माध्यम से बैटरी को चार्ज और डिस्चार्ज करें। सेकेंडरी सेल का रखरखाव करें।
हाइड्रोमीटर का उपयोग करके इलेक्ट्रोलाइट का विशिष्ट गुरुत्व मापें।
बैटरी का परीक्षण करें और सत्यापित करें कि बैटरी उपयोग के लिए तैयार है या उसे रिचार्ज करने की आवश्यकता है।
यह विषय विद्युत और ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग का एक और बेहद महत्वपूर्ण व्यावहारिक हिस्सा है। इन्वर्टर, वाहनों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले सेल और बैटरी की कार्यप्रणाली, उनके परीक्षण (Testing) और रखरखाव (Maintenance) को समझना कार्यस्थल पर सुरक्षा और उपकरणों की लंबी उम्र के लिए बहुत जरूरी है।
यहाँ इस पूरे पाठ्यक्रम के सभी व्यावहारिक बिंदुओं का आसान और तकनीकी विवरण दिया गया है:
1. टर्मिनल पहचान, रेटिंग और वोल्टेज मापन
टर्मिनलों की पहचान (Identification of Terminals)
बैटरी को सर्किट या चार्जर से जोड़ने से पहले उसके पोल (Terminals) की सही पहचान करना अनिवार्य है:
- धनात्मक टर्मिनल (Positive - +): यह आमतौर पर आकार में थोड़ा मोटा होता है, इस पर लाल रंग का निशान या '+' का चिन्ह बना होता है।
- ऋणात्मक टर्मिनल (Negative - -): यह धनात्मक की तुलना में थोड़ा पतला होता है, इस पर काले/नीले रंग का निशान या '-' का चिन्ह बना होता है।
बैटरी रेटिंग को समझना (Voltage & Ah Capacity)
हर बैटरी के ऊपर उसकी क्षमता और वोल्टेज की जानकारी लिखी होती है, जैसे— 12 {V}, 150 {Ah}:
- रेटेड आउटपुट वोल्टेज (12 {V}): यह बताता है कि बैटरी सामान्य परिस्थितियों में कितना वोल्टेज प्रदान करेगी।
- Ah क्षमता (150 {Ah} - Ampere-Hour): यह बैटरी की ऊर्जा भंडारण क्षमता को दर्शाता है। 150 {Ah} का मतलब है कि यह बैटरी 1 एम्पियर का करंट लगातार 150 घंटे तक दे सकती है, या 10 एम्पियर का करंट 15 घंटे तक दे सकती है ({Current} × {Time} = {Ah})।
मल्टीमीटर से वोल्टेज मापन
- डिजिटल या एनालॉग मल्टीमीटर के रोटरी स्विच को DC Voltage (overline{cdots}{V}) रेंज पर सेट करें (यदि 12 {V} की बैटरी है, तो 20 {V} या 50 {V} की रेंज चुनें)।
- लाल प्रोब (Probe) को बैटरी के + टर्मिनल पर और काली प्रोब को - टर्मिनल पर लगाएं।
- डिस्प्ले पर आ रहा मान बैटरी का वर्तमान वोल्टेज दर्शाएगा। यदि नई या पूरी चार्ज 12 {V} की लेड-एसिड बैटरी है, तो मल्टीमीटर में रीडिंग लगभग 12.6 {V} से 12.8 {V} दिखनी चाहिए।
2. बैटरी चार्जिंग, डिस्चार्जिंग और सेकेंडरी सेल का रखरखाव
चार्ज और डिस्चार्ज प्रक्रिया (Load Resistor)
- चार्जिंग: बैटरी को बाहरी डीसी सोर्स (चार्जर) से जोड़ा जाता है। चार्जर का + बैटरी के + से और चार्जर का - बैटरी के - से जुड़ता है।
- डिस्चार्जिंग: जब बैटरी के दोनों टर्मिनलों के बीच कोई लोड (जैसे कोई बल्ब या लोड रेसिस्टर - Load Resistor) जोड़ा जाता है, तो रासायनिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदलकर लोड को चलाने लगती है। लोड रेसिस्टर का उपयोग टेस्टिंग के दौरान बैटरी को नियंत्रित दर पर खाली करने के लिए किया जाता है।
सेकेंडरी सेल (Secondary Cell) का रखरखाव
सेकेंडरी सेल वे होते हैं जिन्हें डिस्चार्ज होने के बाद दोबारा चार्ज किया जा सकता है (जैसे लेड-एसिड बैटरी)। इनकी उम्र बढ़ाने के लिए निम्नलिखित रखरखाव जरूरी है:
- डिस्टिल्ड वाटर टॉप-अप: समय-समय पर बैटरी के वेंट प्लग खोलकर देखें। यदि इलेक्ट्रोलाइट (तेजाब और पानी का मिश्रण) का स्तर कम है, तो केवल डिस्टिल्ड वाटर (Distilled Water) ही डालें, कभी भी साधारण नल का पानी या सीधा एसिड न डालें।
- टर्मिनलों की सफाई: टर्मिनलों पर जमा होने वाले सफेद/नीले पाउडर (सल्फेशन) को गर्म पानी और वायर ब्रश से साफ करें, फिर उस पर पेट्रोलियम जेली या ग्रीस लगाएं ताकि जंग न लगे।
3. हाइड्रोमीटर द्वारा विशिष्ट गुरुत्व मापन (Specific Gravity Measurement)
लेड-एसिड बैटरी के अंदर मौजूद इलेक्ट्रोलाइट (सल्फ्यूरिक एसिड + पानी) के घनत्व को मापने के लिए हाइड्रोमीटर (Hydrometer) का उपयोग किया जाता है। इससे बैटरी के चार्ज होने के स्तर का सटीक पता चलता है।
मापने की विधि:
- बैटरी का वेंट कैप (Vent Cap) खोलें।
- हाइड्रोमीटर की रबर ट्यूब को सेल के अंदर डुबोएं और ऊपर के रबर बल्ब को दबाकर छोड़ दें।
- इलेक्ट्रोलाइट हाइड्रोमीटर की कांच की नली के अंदर खिंचा चला आएगा और उसमें तैरने वाला फ्लोट (Float) ऊपर उठ जाएगा।
- फ्लोट की सतह जिस नंबर से मिलती है, वही विशिष्ट गुरुत्व (Specific Gravity) होता है।
हाइड्रोमीटर रीडिंग का चार्ट:
- 1.260 से 1.280: बैटरी पूरी तरह चार्ज है (Fully Charged)।
- 1.200 से 1.210: बैटरी आधी चार्ज है (Half Charged)।
- 1.150 से कम: बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज है, इसे तुरंत चार्जिंग की जरूरत है।
4. बैटरी का अंतिम परीक्षण और सत्यापन (Battery State of Charge Testing)
बैटरी उपयोग के लिए पूरी तरह तैयार है या उसे रीचार्ज की आवश्यकता है, यह सत्यापित करने के लिए दो मुख्य परीक्षण किए जाते हैं:
क. ओपन सर्किट वोल्टेज टेस्ट (Open Circuit Voltage - OCV)
बिना किसी लोड के मल्टीमीटर से वोल्टेज मापें:
- 12.6 {V} या अधिक: 100% चार्ज (तैयार है)।
- 12.4 {V}: लगभग 75% चार्ज।
- 12.0 {V} या कम: बैटरी डिस्चार्ज है, इसे तुरंत रिचार्ज करने की आवश्यकता है।
ख. हाई रेट डिस्चार्ज टेस्ट (High Rate Discharge Test)
कभी-कभी बैटरी बिना लोड के पूरा 12 {V} दिखाती है, लेकिन जैसे ही गाड़ी स्टार्ट की जाती है या लोड डाला जाता है, वह बैठ जाती है। इसे जांचने के लिए बैटरी लोड टेस्टर (Battery Load Tester) का उपयोग किया जाता है।
- यह उपकरण 5 से 10 सेकंड के लिए बैटरी पर बहुत भारी लोड डालता है।
- यदि लोड डालने पर भी टेस्टर का कांटा (सुई) हरे भाग (Green Zone) में रहता है या वोल्टेज 9.6 {V} से नीचे नहीं गिरता, तो बैटरी पूरी तरह स्वस्थ और उपयोग के लिए तैयार है।
- यदि सुई लाल भाग (Red Zone) में गिर जाती है, तो बैटरी या तो पूरी तरह खराब (Dead) हो चुकी है या उसे तुरंत डीप-चार्जिंग (Recharge) की जरूरत है।
यह प्रैक्टिकल ट्रेनिंग आपको बैटरी बैंक, इन्वर्टर और ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में काम करने के लिए कुशल बनाएगी। यदि आप इनमें से किसी विशिष्ट बिंदु जैसे—बैटरी के ट्रिकल चार्जिंग और बूस्ट चार्जिंग में अंतर या सल्फेशन दोष को और विस्तार से समझना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
AC और DC मापन
विभिन्न कार्यों (AC V, DC V, DC I, AC I, R) को मापने के लिए मल्टीमीटर का उपयोग करें।
AC और DC मापदंडों को मापने के लिए विभिन्न प्रकार के मीटरों की पहचान करें।
CRO फ्रंट पैनल पर विभिन्न नियंत्रणों की पहचान करें और प्रत्येक नियंत्रण के कार्य का अवलोकन करें।
CRO साइन वेव मापदंडों का उपयोग करके DC वोल्टेज, AC वोल्टेज और समय अवधि को मापें।
फंक्शन जनरेटर फ्रंट पैनल पर विभिन्न नियंत्रणों की पहचान करें और प्रत्येक नियंत्रण के कार्य का अवलोकन करें।
यह पाठ्यक्रम विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक मापन (Electrical & Electronic Measurements) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मुख्य प्रयोगात्मक (Practical) हिस्सा है। प्रयोगशाला (Lab) या फील्ड में सर्किट की टेस्टिंग, फॉल्ट ढूंढने और सिग्नलों के विश्लेषण के लिए इन उपकरणों का सही ज्ञान होना अनिवार्य है।
यहाँ इन सभी उपकरणों, उनके नियंत्रणों (Controls) और मापन विधियों का विस्तृत और व्यावहारिक परिचय दिया गया है:
1. मल्टीमीटर का उपयोग (Using a Multimeter)
मल्टीमीटर एक ऐसा 'ऑल-इन-वन' उपकरण है जो कई अलग-अलग मीटरों (जैसे वोल्टमीटर, एमीटर, ओममीटर) के काम अकेले कर सकता है।
विभिन्न कार्यों के लिए सेटिंग्स:
- AC वोल्टेज (AC V / simV): इसे घरों की बिजली या ट्रांसफार्मर का आउटपुट मापने के लिए सेट किया जाता है। वोल्टेज के अनुमानित मान से बड़ी रेंज चुनें (जैसे 230 {V} नापने के लिए 600 {V} या 750 {V} रेंज)।
- DC वोल्टेज (DC V / overline{cdots} V): बैटरी, मोबाइल चार्जर या इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का वोल्टेज मापने के लिए।
- DC करंट (DC I / overline{cdots} A): सर्किट में बहने वाली डीसी धारा मापने के लिए। ध्यान दें: करंट नापते समय मल्टीमीटर को हमेशा लोड के साथ सीरीज (Series) में जोड़ा जाता है।
- AC करंट (AC I / simA): एसी लोड द्वारा ली जा रही धारा मापने के लिए।
- प्रतिरोध (R / Omega): किसी रेजिस्टर का मान या तार का प्रतिरोध मापने के लिए। रेजिस्टेंस नापते समय सर्किट की बिजली हमेशा बंद (OFF) होनी चाहिए।
2. AC और DC मीटरों की पहचान (Identification of Meters)
मापे जाने वाले पैरामीटर और करंट के प्रकार के आधार पर पैनल मीटर अलग-अलग होते हैं। इनके डायल पर बने प्रतीकों (Symbols) से इन्हें पहचाना जाता है:
- मूविंग आयरन मीटर (MI - Moving Iron): इनके डायल पर एक झुका हुआ चुंबक या लोहे का प्रतीक बना होता है। यह AC और DC दोनों को माप सकते हैं। इनका स्केल असमान (Non-linear) होता है।
- परमानेंट मैग्नेट मूविंग कॉइल मीटर (PMMC): इनके डायल पर overline{cdots} या एक सीधा चुंबक बना होता है। यह केवल DC माप सकते हैं। इनका स्केल बिल्कुल समान (Linear) होता है।
-
चिन्हों द्वारा पहचान:
- V: वोल्टमीटर (समानांतर/Parallel में जुड़ता है)।
- A: एमीटर (श्रेणी/Series में जुड़ता है)।
3. CRO (कैथोड रे ऑसिलोस्कोप) फ्रंट पैनल के नियंत्रण
CRO (Cathode Ray Oscilloscope) एक ऐसा उपकरण है जो विद्युत सिग्नलों को स्क्रीन पर एक तरंग (Waveform) के रूप में दिखाता है।
मुख्य नियंत्रण और उनके कार्य:
- Power (On/Off): ऑसिलोस्कोप को चालू या बंद करने के लिए।
- Intensity (तीव्रता): स्क्रीन पर दिखने वाली वेव की चमक (Brightness) को कम या ज्यादा करने के लिए।
- Focus (फोकस): वेव की लाइन को धुंधला होने से रोककर उसे तीखा और स्पष्ट (Sharp) बनाने के लिए।
- Volts/Div (अक्षीय स्केल - Y axis): यह वर्टिकल नोब होती है। यह तय करती है कि स्क्रीन का एक वर्टिकल डिब्बा (Division) कितने वोल्ट को दर्शाएगा। इसका उपयोग वोल्टेज नापने में होता है।
- Time/Div (समय स्केल - X axis): यह हॉरिजॉन्टल नोब होती है। यह तय करती है कि स्क्रीन का एक हॉरिजॉन्टल डिब्बा समय (Seconds/Milliseconds) के कितने मान को दर्शाएगा। इसका उपयोग फ्रीक्वेंसी और टाइम पीरियड नापने में होता है।
- Vertical Position (Y-Pos): वेव को स्क्रीन पर ऊपर या नीचे खिसकाने के लिए।
- Horizontal Position (X-Pos): वेव को स्क्रीन पर दाएं या बाएं खिसकाने के लिए।
4. CRO द्वारा साइन वेव मापदंडों का मापन
जब स्क्रीन पर कोई साइन वेव (Sine Wave) या डीसी लाइन दिखती है, तो ग्रिड (ग्राफ के डिब्बों) को गिनकर मापन किया जाता है:
क. DC वोल्टेज मापना:
सबसे पहले इनपुट को 'GND' (Ground) पर सेट करके बेसलाइन को शून्य पर सेट करें।
अब इनपुट को 'DC' पर सेट करें। स्क्रीन पर सीधी लाइन जितनी खड़ी दूरी (Vertical Divisions) ऊपर या नीचे खिसकती है, उसे गिनें।
ख. AC वोल्टेज (Peak-to-Peak Voltage - V_{pp}) मापना:
साइन वेव के सबसे निचले शिखर (Trough) से लेकर सबसे ऊंचे शिखर (Crest) के बीच के कुल वर्टिकल डिब्बों को गिनें।
यदि आपको केवल Peak Voltage (V_m) चाहिए, तो V_{pp} का आधा ({V_{pp}}/{2}) कर दें।
ग. समय अवधि (Time Period - T) मापना:
एक पूरी वेव (एक चक्र/Cycle - एक बार ऊपर और एक बार नीचे जाना) स्क्रीन पर जितनी क्षैतिज दूरी (Horizontal Divisions) घेरती है, उसे गिनें।
आवृत्ति (Frequency - f): टाइम पीरियड मिलने के बाद आप फ्रीक्वेंसी निकाल सकते हैं: f = {1}/{T}
5. फंक्शन जनरेटर फ्रंट पैनल नियंत्रण (Function Generator)
फंक्शन जनरेटर एक ऐसा उपकरण है जो टेस्टिंग के लिए विभिन्न प्रकार की तरंगें (जैसे साइन, स्क्वायर, ट्रायंगुलर वेव) खुद पैदा (Generate) करता है। इसे हम CRO के इनपुट में जोड़कर चेक करते हैं।
मुख्य नियंत्रण और उनके कार्य:
- Waveform Selector (तरंग चयनकर्ता): इसके बटन दबाकर आप तय करते हैं कि आपको कौन सी वेव चाहिए—साइन वेव (sim), स्क्वायर वेव (sqcap), या ट्रायंगुलर वेव (vartriangle)।
- Frequency Range Buttons (आवृत्ति रेंज): यह फ्रीक्वेंसी के गुणक तय करते हैं (जैसे 1 {Hz}, 10 {Hz}, 1 {kHz}, 10 {kHz})।
- Frequency Coarse / Fine Knob: इसकी मदद से वेव की फ्रीक्वेंसी को सटीक मान पर सेट किया जाता है (जैसे 50 {Hz} या 1{kHz})।
- Amplitude Knob (आयाम नियंत्रण): यह निकलने वाली तरंग के वोल्टेज (ताकत) को कम या ज्यादा करने के लिए उपयोग होती है।
- DC Offset: यह एसी सिग्नल में कुछ डीसी वोल्टेज जोड़ने या उसे ऊपर-नीचे शिफ्ट करने के लिए उपयोग होता है।
- Output Terminal (50,Omega BNC): यहाँ से को-एक्सियल (Co-axial) केबल जोड़कर सिग्नल को बाहर (जैसे CRO में) ले जाया जाता है।
यह प्रैक्टिकल इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल लैब का दिल है। यदि आप प्रयोगशाला में इनमें से किसी विशिष्ट गणना (जैसे CRO ग्रिड को पढ़ने का तरीका) या मल्टीमीटर से करंट नापते समय बरती जाने वाली सावधानियों को लाइव उदाहरण से समझना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
सोल्डरिंग/डी-सोल्डरिंग और विभिन्न स्विच
विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक घटकों, छोटे ट्रांसफार्मर और लग्स पर सोल्डरिंग का अभ्यास करें।
आईसी बेस और पीसीबी पर सोल्डरिंग और पंप व विक का उपयोग करके डी-सोल्डरिंग का अभ्यास करें।
टूटे हुए पीसीबी ट्रैक को जोड़ें और परीक्षण करें।
इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में उपयोग होने वाले एसपीएसटी, एसपीडीटी, डीपीएसटी, डीपीडीटी, टंबलर, पुश बटन, टॉगल, पियानो स्विच को पहचानें और उनका उपयोग करें।
किसी दिए गए अनुप्रयोग के लिए विभिन्न प्रकार के स्विच का उपयोग करके एक पैनल बोर्ड बनाएं।
यह पाठ्यक्रम इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यावहारिक (Practical) हिस्सा है। पीसीबी (PCB) पर सर्किट असेंबल करने, खराब इलेक्ट्रॉनिक्स को ठीक करने (Repairing) और कंट्रोल पैनल डिजाइन करने के लिए सोल्डरिंग-डीसोल्डरिंग और सही स्विच का चयन करना आना बेहद जरूरी है।
यहाँ इस पूरे पाठ्यक्रम के सभी व्यावहारिक बिंदुओं का चरणबद्ध मार्गदर्शन दिया गया है:
1. सोल्डरिंग का अभ्यास (Soldering Practice)
सोल्डरिंग दो या दो से अधिक धातु के पुर्जों (जैसे तारों और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स) को पिघली हुई रांगा धातु (Soldering Wire - Lead/Tin मिश्र धातु) की मदद से जोड़ने की प्रक्रिया है।
बुनियादी चरण:
- सफाई (Cleaning): जिस जगह सोल्डरिंग करनी है (जैसे पीसीबी पैड या कंपोनेंट की लेग), उसे सैंडपेपर या चाकू से अच्छी तरह साफ करें ताकि जंग या कार्बन हट जाए।
- फ्लक्स का उपयोग (Applying Flux): जोड़ पर थोड़ा सा सोल्डरिंग फ्लक्स (पेस्ट) लगाएं। यह सोल्डरिंग को मजबूती से चिपकने में मदद करता है और ऑक्सीकरण (Oxidation) को रोकता है।
- टिनिंग (Tinning): सोल्डरिंग आयरन की बिट (टिप) पर थोड़ा सा सोल्डर वायर पिघलाकर उसे चमकदार बनाएं।
- जोड़ बनाना (Making Joint): आयरन की टिप को कंपोनेंट की लेग और पीसीबी पैड दोनों पर एक साथ 2-3 सेकंड के लिए छुएं (ताकि वे गर्म हो जाएं), फिर वहां सोल्डर वायर सटाएं। सोल्डर पिघलकर फैल जाएगा। तुरंत वायर और आयरन को हटा लें।
- अच्छे सोल्डर की पहचान: एक आदर्श सोल्डर जोड़ हमेशा चमकदार और ज्वालामुखी (Volcano) के आकार का होना चाहिए। यदि वह गेंद जैसा गोल और धुंधला है, तो वह 'कोल्ड सोल्डर' (Cold Solder) है जो जल्दी टूट सकता है।
2. डी-सोल्डरिंग (De-soldering) और आईसी बेस अभ्यास
किसी पीसीबी से खराब कंपोनेंट या आईसी (IC) को बाहर निकालने के लिए सोल्डर को हटाने की प्रक्रिया को डी-सोल्डरिंग कहते हैं।
क. डी-सोल्डरिंग पंप (De-soldering Pump / Sucker) का उपयोग:
- यह एक वैक्यूम (सक्शन) डिवाइस होता है। इसके प्लंजर (खटके) को नीचे दबाकर लोड करें।
- सोल्डरिंग आयरन से पीसीबी पर लगे सोल्डर को पिघलाएं।
- जैसे ही सोल्डर पिघले, तुरंत पंप के नोजल को वहां ले जाएं और उसका बटन दबा दें। पंप पिघले हुए सोल्डर को अंदर खींच लेगा और छेद साफ हो जाएगा।
ख. डी-सोल्डरिंग विक (De-soldering Wick / Braid) का उपयोग:
- यह तांबे के बारीक तारों की एक बुनी हुई पट्टी (Braid) होती है।
- विक के टुकड़े को पीसीबी के सोल्डर जोड़ पर रखें और उसके ऊपर गर्म सोल्डरिंग आयरन दबाएं।
- तांबा ऊष्मा का अच्छा सुचालक है, इसलिए पिघला हुआ सोल्डर पीसीबी को छोड़कर अपने आप इस तांबे की पट्टी पर चिपक (सोख) जाता है।
आईसी बेस (IC Base) पर अभ्यास:
- संवेदनशील आईसी को सीधे पीसीबी पर सोल्डर करने से वह गर्मी के कारण खराब हो सकती है। इसलिए पहले पीसीबी पर आईसी बेस/सॉकेट को सोल्डर किया जाता है, और फिर आईसी को आराम से उस बेस के ऊपर पिन के अनुसार बैठा दिया जाता है।
3. टूटे हुए पीसीबी ट्रैक को जोड़ना और परीक्षण (PCB Track Repair)
कभी-कभी अधिक गर्मी, शॉर्ट सर्किट या झटके के कारण पीसीबी के तांबे के पतले तार (Tracks) बीच में से टूट जाते हैं।
मरम्मत की विधि:
- टूटे हुए ट्रैक के दोनों सिरों के ऊपर लगे हरे रंग के कोटिंग (Solder Mask) को किसी कटर या सैंडपेपर से धीरे-धीरे खुरचकर चमकीला तांबा बाहर निकालें।
- दोनों सिरों पर फ्लक्स लगाकर थोड़ी सोल्डरिंग (Tinning) करें।
- एक बहुत बारीक इंसुलेटेड तांबे का तार (Jumper Wire) लें, उसके दोनों सिरों को छीलें और उसे टूटे हुए ट्रैक के दोनों सिरों के बीच रखकर सोल्डर कर दें (इसे जम्पर वायर लगाना कहते हैं)।
- परीक्षण (Testing): मल्टीमीटर को कंटिन्यूटी (Buzzer) मोड पर सेट करें। मल्टीमीटर के दोनों प्रोब्स को मरम्मत किए गए ट्रैक के दोनों सिरों पर रखें। यदि 'बीप' ({Beep}) की आवाज आती है, तो ट्रैक सफलतापूर्वक जुड़ चुका है।
4. विभिन्न प्रकार के स्विचों की पहचान और उपयोग
स्विच एक मैकेनिकल डिवाइस है जो सर्किट को जोड़ने (Make) या तोड़ने (Break) का काम करता है। इन्हें इनकी पोल (Poles - इनपुट रास्ते) और थ्रो (Throws - आउटपुट रास्ते) के आधार पर पहचाना जाता है:
- SPST (Single Pole Single Throw): यह सबसे साधारण ऑन/ऑफ स्विच है। इसमें केवल दो टर्मिनल होते हैं (जैसे घरों के सामान्य लाइट स्विच)।
- SPDT (Single Pole Double Throw): इसमें एक इनपुट (Pole) और दो आउटपुट (Throws) रास्ते होते हैं। इसके तीन टर्मिनल होते हैं। इसका उपयोग टू-वे वायरिंग (जैसे सीढ़ियों की लाइट, जहाँ एक बल्ब दो जगह से नियंत्रित होता है) में किया जाता है।
- DPST (Double Pole Single Throw): यह दो अलग-अलग SPST स्विचों को एक साथ जोड़ने जैसा है। इसमें चार टर्मिनल होते हैं। यह एक साथ दो अलग-अलग तारों (जैसे फेज और न्यूट्रल दोनों) को ऑन/ऑफ कर सकता है।
- DPDT (Double Pole Double Throw): इसमें छह टर्मिनल होते हैं। यह दो अलग-अलग इनपुट को दो अलग-अलग आउटपुट रास्तों पर स्विच कर सकता है। इसका उपयोग अक्सर डीसी मोटर की घूमने की दिशा (Forward/Reverse) बदलने के लिए किया जाता है।
- टंबलर स्विच (Tumbler Switch): यह पुराने जमाने के गोल उभरे हुए स्विच होते हैं जिन्हें ऊपर-नीचे खटकाकर ऑन-ऑफ किया जाता था।
- पुश बटन स्विच (Push Button Switch): इसे दबाने पर यह काम करता है और छोड़ते ही वापस अपनी स्थिति में आ जाता है (जैसे डोर बेल का स्विच या मशीनों के स्टार्ट/स्टॉप बटन)। ये दो प्रकार के होते हैं—NO (Normally Open) और NC (Normally Closed)।
- टॉगल स्विच (Toggle Switch): इसमें एक छोटी धातु की डंडी (Lever) होती है जिसे ऊपर, नीचे या बीच में करके सर्किट बदला जाता है। यह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और पैनलों में बहुत दिखता है।
- पियानो स्विच (Piano Switch): यह पियानो की कीज (Keys) की तरह दिखने वाले फ्लैट स्विच होते हैं जो आजकल घरों के बोर्ड्स में आम तौर पर इस्तेमाल होते हैं।
5. विभिन्न स्विचों का उपयोग करके पैनल बोर्ड बनाना
किसी विशिष्ट औद्योगिक अनुप्रयोग (जैसे मोटर कंट्रोल या पावर डिस्ट्रीब्यूशन) के लिए एक प्रैक्टिकल पैनल बोर्ड बनाने की प्रक्रिया:
चरण:
- लेआउट डिजाइन: लकड़ी या प्लास्टिक (Acrylic/सनमाईका) की एक शीट लें। उस पर मार्कर और स्केल से निशान लगाएं कि कौन सा स्विच (जैसे इंडीकेटर लाइट, पुश बटन, टॉगल स्विच) कहाँ लगेगा।
- कटिंग और ड्रिलिंग: स्विच के आकार के अनुसार शीट में ड्रिलिंग मशीन और कटर की मदद से खांचे (Slots) काटें।
- माउंटिंग: सभी स्विचों को उनके खांचों में बैठाकर पीछे से नट-बोल्ट या स्क्रू की मदद से पैनल बोर्ड पर कस दें।
-
वायरिंग: पैनल के पीछे सर्किट आरेख (Circuit Diagram) के अनुसार तारों को जोड़ें। उदाहरण के लिए:
- मेन सप्लाई को पहले एक DPST स्विच (या MCB) से गुजारें ताकि पूरा पैनल एक साथ बंद हो सके।
- मोटर को चलाने और रोकने के लिए क्रमशः हरे रंग के NO पुश बटन और लाल रंग के NC पुश बटन का उपयोग करें।
- लग्स (Lugs) को तारों के सिरों पर क्रिम्प करके स्विच के टर्मिनलों पर स्क्रू से कसें ताकि वायरिंग साफ-सुथरी और सुरक्षित रहे।
यह प्रैक्टिकल अभ्यास आपको इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रिकल पैनल डिजाइनिंग की दुनिया के लिए पूरी तरह तैयार करता है। यदि आप इनमें से किसी विशिष्ट स्विच की इंटरनल वायरिंग (जैसे DPDT से मोटर की दिशा बदलना) को सर्किट डायग्राम के साथ समझना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
सक्रिय और निष्क्रिय घटक
सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक घटकों के विभिन्न प्रकारों को पहचानें।
रंग कोड द्वारा प्रतिरोधक का मान मापें और मल्टीमीटर से मापकर इसकी पुष्टि करें।
प्रतिरोधकों को उनके स्वरूप से पहचानें और भौतिक दोषों की जाँच करें।
कार्बन प्रतिरोधकों की शक्ति रेटिंग को उनके आकार से पहचानें।
विभिन्न प्रतिरोधक मानों और वोल्टेज स्रोतों के लिए ओम के नियम को लागू करके संयुक्त विद्युत परिपथ में मापदंडों के मापन का अभ्यास करें।
किरचॉफ के नियम को सत्यापित करने के लिए विद्युत परिपथों में धारा और वोल्टेज का मापन करें।
विभिन्न संयोजनों में वोल्टेज स्रोत के साथ श्रृंखला और समानांतर परिपथों के नियमों को सत्यापित करें।
मल्टीमीटर का उपयोग करके श्रृंखला और समानांतर रूप से जुड़े नेटवर्क में प्रतिरोध, वोल्टेज और धारा को मापें।
विभिन्न प्रेरकों को पहचानें और एलसीआर मीटर का उपयोग करके उनके मानों को मापें।
विभिन्न संधारित्रों को पहचानें और एलसीआर मीटर का उपयोग करके विभिन्न संधारित्रों की धारिता को मापें।
परिपथ ब्रेकर और अन्य सुरक्षा उपकरणों को पहचानें और उनका परीक्षण करें।
रिले के विभिन्न भागों को खोलकर पहचानें।
एक टाइमर रिले को सर्किट में जोड़कर उसकी कार्यप्रणाली की जांच करें। एक कॉन्टैक्टर को सर्किट में जोड़कर उसकी कार्यप्रणाली की जांच करें।
आरसी टाइम कांस्टेंट सर्किट बनाएं और उसकी जांच करें।
एक आरसी डिफरेंशिएटर सर्किट बनाएं और ट्रायंगुलर वेव को स्क्वायर वेव में परिवर्तित करें।
सीरीज और पैरेलल रेजोनेंस सर्किट बनाएं और उनकी जांच करें।
यह पाठ्यक्रम बेसिक इलेक्ट्रॉनिक्स और सर्किट थ्योरी (Basic Electronics & Circuit Theory) की नींव है। इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में कदम रखने के लिए घटकों (Components) को पहचानना, सर्किट के बुनियादी नियमों (जैसे ओम और किरचॉफ के नियम) को सिद्ध करना और रिले-कॉन्टैक्टर जैसे सुरक्षा उपकरणों को समझना सबसे महत्वपूर्ण कौशल है।
यहाँ इस पूरे पाठ्यक्रम का चरणबद्ध और व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया गया है:
1. सक्रिय और निष्क्रिय घटक (Active & Passive Components)
इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है:
- सक्रिय घटक (Active Components): ये वे घटक हैं जो सर्किट में ऊर्जा या सिग्नल को एम्पलीफाई (बढ़ा) सकते हैं या उसे नियंत्रित कर सकते हैं। इन्हें चलने के लिए बाहरी पावर की जरूरत होती है।
- उदाहरण: डायोड, ट्रांजिस्टर (BJT, FET), आईसी (IC), एससीआर (SCR), और ऑपरेशनल एम्पलीफायर (Op-Amp)।
- निष्क्रिय घटक (Passive Components): ये घटक सर्किट को कोई अतिरिक्त ऊर्जा नहीं दे सकते और न ही सिग्नल को एम्पलीफाई कर सकते हैं। ये केवल ऊर्जा को स्टोर, खर्च या रिलीज करते हैं।
- उदाहरण: रेसिस्टर (प्रतिरोधक), कैपेसिटर (संधारित्र), और इंडक्टर (प्रेरक)।
2. प्रतिरोधक (Resistors): कलर कोड, भौतिक दोष और पावर रेटिंग
क. कलर कोड द्वारा मान मापना (Resistor Color Code)
रेसिस्टर पर बनी रंगीन पट्टियों (Bands) को देखकर उसका मान निकाला जाता है। इसके लिए "BB ROY Great Britain Very Good Wife" सूत्र का उपयोग किया जाता है।
-
गणना विधि (4-Band Resistor):
- पहला बैंड = पहला अंक
- दूसरा बैंड = दूसरा अंक
- तीसरा बैंड = मल्टीप्लायर (10^n)
- चौथा बैंड = टॉलरेंस (सहनशीलता, जैसे Gold = \pm5\%, Silver = pm10%)
- सत्यापन: मल्टीमीटर को Omega (ओह्म) रेंज पर सेट करें और रेसिस्टर के दोनों सिरों पर प्रोब लगाकर देखें कि डिजिटल मान कलर कोड से मेल खाता है या नहीं।
ख. भौतिक दोष और पावर रेटिंग
- भौतिक दोष: रेसिस्टर को ध्यान से देखें कि कहीं वह अत्यधिक गर्मी के कारण काला या जला हुआ तो नहीं है, या उसकी टांगें (Leads) टूटी या ढीली तो नहीं हैं।
- पावर रेटिंग (वॉट क्षमता): कार्बन रेसिस्टर्स की पावर रेटिंग (1/8 {W}, 1/4 {W}, 1/2 {W}, 1 {W}, 2 {W}) उनके भौतिक आकार (Size) से पहचानी जाती है। रेसिस्टर का आकार जितना बड़ा होगा, उसकी वॉट क्षमता उतनी ही अधिक होगी और वह बिना जले उतनी ही अधिक गर्मी झेल सकेगा।
3. ओम और किरचॉफ के नियम का सत्यापन
क. ओम का नियम (V = IR)
- अभ्यास: एक ब्रेडबोर्ड पर रेसिस्टर और डीसी पावर सप्लाई को जोड़ें। वोल्टेज को धीरे-धीरे बदलें (2 {V}, 4 {V}, 6 {V}) और हर बार सर्किट में बहने वाले करंट (I) को एमीटर से मापें। आप पाएंगे कि {V}/{I} का अनुपात हमेशा स्थिर रहता है, जो रेसिस्टर (R) के मान के बराबर होता है।
ख. किरचॉफ के नियम (Kirchhoff's Laws)
- किरचॉफ का करंट नियम (KCL): किसी भी जंक्शन (नोड) पर आने वाली कुल धाराओं का योग, वहाँ से जाने वाली कुल धाराओं के योग के बराबर होता है (Sigma I_{in} = Sigma I_{out})।
- किरचॉफ का वोल्टेज नियम (KVL): किसी भी बंद लूप (Closed Loop) में सभी वोल्टेज ड्रॉप्स और स्रोतों का कुल योग शून्य होता है (\Sigma V = 0)। इसे सर्किट के प्रत्येक रेसिस्टर के पार वोल्टेज मापकर सत्यापित किया जाता है।
4. श्रृंखला (Series) और समानांतर (Parallel) परिपथ
मल्टीमीटर का उपयोग करके इन दोनों नेटवर्कों में अंतर को इस प्रकार सत्यापित किया जाता है:
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मापदंड |
श्रृंखला परिपथ (Series Circuit) |
समानांतर परिपथ (Parallel Circuit) |
|---|---|---|
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प्रतिरोध (R) |
R_{total} = R_1 + R_2 + R_3 (प्रतिरोध बढ़ता है) |
{1}/{R_{total}} = {1}/{R_1} + {1}/{R_2} + {1}/{R_3} (प्रतिरोध घटता है) |
|
वोल्टेज (V) |
हर रेसिस्टर पर वोल्टेज बदल जाता है (V = V_1 + V_2) |
सभी शाखाओं में वोल्टेज समान रहता है (V = V_1 = V_2) |
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धारा (I) |
पूरे सर्किट में करंट समान रहता है (I = I_1 = I_2) |
अलग-अलग शाखाओं में करंट बंट जाता है (I = I_1 + I_2) |
5. प्रेरक (Inductors) और संधारित्र (Capacitors) का मापन
- इंडक्टर (Inductor): यह चुंबकीय क्षेत्र में ऊर्जा स्टोर करता है। इन्हें एयर-कोर, फेराइट-कोर या टॉरॉइडल आकार से पहचाना जाता है। इनका मान हेनरी (H या mH) में होता है।
- कैपेसिटर (Capacitor): यह विद्युत क्षेत्र में ऊर्जा स्टोर करता है। ये मुख्य रूप से इलेक्ट्रोलाइटिक (ध्रुवीय - + और - टर्मिनलों वाले) और सिरेमिक/डिस्क (गैर-ध्रुवीय) प्रकार के होते हैं। इनका मान फैराड (mu F, nF, pF) में होता है।
- LCR मीटर का उपयोग: एलसीआर (LCR) मीटर के प्रोब्स को कंपोनेंट से जोड़ें और मीटर के मोड को L (इंडक्टेंस) या C (कैपेसिटेंस) पर सेट करके उनकी सटीक वैल्यू स्क्रीन पर पढ़ें।
6. सुरक्षा उपकरण, रिले और कॉन्टैक्टर (Safety Devices & Relays)
- परिपथ ब्रेकर (MCB/MCCB): यह ओवरलोड या शॉर्ट सर्किट होने पर अपने आप ट्रिप होकर बिजली बंद कर देते हैं। मल्टीमीटर को निरंतरता (Continuity) मोड पर रखकर इनके ऑन/ऑफ होने की जांच की जाती है।
- इलेक्ट्रोमैकेनिकल रिले (Relay) के भाग: जब रिले को खोला जाता है, तो इसमें मुख्य रूप से एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कॉइल, एक आर्मेचर (चलती हुई पत्ती), एक स्प्रिंग और NO (Normally Open), NC (Normally Closed) व COM (Common) कांटेक्ट्स (टर्मिनल्स) दिखाई देते हैं।
टाइमर रिले और कॉन्टैक्टर की कार्यप्रणाली
- कॉन्टैक्टर (Contactor): यह एक भारी रिले है जिसका उपयोग भारी मोटरों या उद्योगों में बड़ी बिजली की लाइनों को ऑन/ऑफ करने के लिए किया जाता है। जब इसके कॉइल (A1, A2) को सप्लाई दी जाती है, तो यह तेज आवाज के साथ चिपकता है और इसके मुख्य कांटेक्ट जुड़ जाते हैं।
- टाइमर रिले (Timer Relay): इसमें समय सेट करने के लिए एक डायल या बटन होते हैं। सर्किट में जोड़ने पर, यह इनपुट मिलने के एक निश्चित सेट समय (जैसे 5 सेकंड) के बाद अपने कांटेक्ट्स को बदलता है (जैसे NO को NC करना)।
7. आरसी परिपथ (RC Circuits: Time Constant, Differentiator, Resonance)
क. आरसी टाइम कांस्टेंट सर्किट (RC Time Constant)
जब एक रेसिस्टर (R) और कैपेसिटर (C) को सीरीज में जोड़ा जाता है, तो कैपेसिटर को चार्ज होने में कुछ समय लगता है।
- इसका टाइम कांस्टेंट tau = R × C होता है।
- 1, tau समय में कैपेसिटर अपने अधिकतम वोल्टेज का लगभग 63.2% चार्ज हो जाता है। इसे वोल्टमीटर से समय के साथ वोल्टेज बढ़ते हुए देखकर जांचा जाता है।
ख. आरसी डिफरेंशिएटर (RC Differentiator Circuit)
यदि हम एक सीरीज RC सर्किट में कैपेसिटर को इनपुट के पास और रेसिस्टर के पार आउटपुट लें (जहाँ RC का मान बहुत छोटा हो), तो यह एक डिफरेंशिएटर सर्किट बन जाता है।
- तरंग रूपांतरण: जब इस सर्किट के इनपुट में फंक्शन जनरेटर से ट्रायंगुलर वेव (Triangular Wave) दी जाती है, तो यह सर्किट उसके ढलान (Slope) का अवकलन (Differentiation) करके आउटपुट में एक बेहतरीन स्क्वायर वेव (Square Wave) प्रदान करता है, जिसे CRO पर देखा जा सकता है।
ग. सीरीज और पैरेलल रेजोनेंस (Resonance Circuits)
जब एक सर्किट में R, L, और C तीनों को जोड़ा जाता है, तो एक विशेष आवृत्ति (Frequency) पर इंडक्टिव रिएक्टेंस (X_L) और कैपेसिटिव रिएक्टेंस (X_C) आपस में बराबर हो जाते हैं (X_L = X_C)। इस स्थिति को रेजोनेंस (अनुनाद) कहते हैं।
- सीरीज रेजोनेंस (Series Resonance): इस आवृत्ति पर सर्किट का कुल अवरोध (Impedance) न्यूनतम हो जाता है और सर्किट में करंट अधिकतम बहता है।
- पैरेलल रेजोनेंस (Parallel Resonance): इस आवृत्ति पर सर्किट का कुल अवरोध अधिकतम हो जाता है और सर्किट में करंट न्यूनतम हो जाता है (इसे रिजेक्टर सर्किट भी कहते हैं)।
यदि आप इस विस्तृत प्रयोगात्मक पाठ्यक्रम के किसी विशिष्ट सर्किट (जैसे ब्रेडबोर्ड पर RC डिफरेंशिएटर की वायरिंग कैसे करें) या किसी न्यूमेरिकल को गहराई से समझना चाहते हैं, तो जरूर बताएं!
विद्युत आपूर्ति परिपथ
विभिन्न प्रकार के डायोड, डायोड मॉड्यूल और उनकी विशिष्टताओं को पहचानें।
दिए गए डायोड का मल्टीमीटर से परीक्षण करें और अग्र-पश्च प्रतिरोध अनुपात ज्ञात करें।
परिपथ में डायोड से प्रवाहित होने वाले वोल्टेज और धारा को मापें और उसके अग्र गुणधर्म को सत्यापित करें।
विभिन्न प्रकार के ट्रांसफार्मर को पहचानें और उनका परीक्षण करें।
प्राथमिक और द्वितीयक ट्रांसफार्मर वाइंडिंग को पहचानें और उनकी ध्रुवीयता का परीक्षण करें।
अर्ध-तरंग, पूर्ण-तरंग और ब्रिज रेक्टिफायर परिपथ का निर्माण और परीक्षण करें।
विभिन्न लोड और फिल्टर कैपेसिटर के लिए रेक्टिफायर के रिपल वोल्टेज, रिपल आवृत्ति और रिपल फैक्टर को मापें।
ज़ेनर डायोड को पहचानें और उसका परीक्षण करें तथा ज़ेनर आधारित वोल्टेज रेगुलेटर परिपथ का निर्माण और परीक्षण करें।
विनियमित विद्युत आपूर्ति के प्रतिशत विनियमन की गणना करें।
यह पाठ्यक्रम विद्युत आपूर्ति परिपथ (Power Supply Circuits) यानी 'इलेक्ट्रॉनिक पावर सप्लाई' का मुख्य आधार है। किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (जैसे मोबाइल चार्जर, कंप्यूटर एसएमपीएस, या टीवी) को चलाने के लिए एसी (AC) को डीसी (DC) में बदलना और उसे स्थिर (Regulate) करना जरूरी होता है।
यहाँ इस प्रयोगात्मक पाठ्यक्रम का चरणबद्ध और तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया है:
1. डायोड की पहचान और विशिष्टताएं (Diodes & Specifications)
डायोड एक ऐसा सेमीकंडक्टर घटक है जो करंट को केवल एक दिशा में बहने देता है।
- पहचान: डायोड (जैसे IN4007) के बेलनाकार काले शरीर पर एक सिल्वर/सफेद रंग की पट्टी (Band) होती है, जो इसके कैथोड (Cathode - Negative) को दर्शाती है। दूसरा सिरा एनोड (Anode - Positive) होता है।
- डायोड मॉड्यूल: भारी औद्योगिक कामों के लिए कई डायोड को एक साथ मिलाकर एक पैक बनाया जाता है, जिसे डायोड मॉड्यूल या ब्रिज रेक्टिफायर मॉड्यूल कहते हैं।
-
विशिष्टताएं (Datasheet): डायोड चुनते समय दो मुख्य बातें देखी जाती हैं:
- Peak Inverse Voltage (PIV): वह अधिकतम उलटा वोल्टेज जो डायोड बिना खराब हुए झेल सके।
- Maximum Forward Current (I_f): वह अधिकतम करंट जो डायोड से सुरक्षित रूप से बह सके।
2. मल्टीमीटर से डायोड का परीक्षण (Diode Testing)
मल्टीमीटर को डायोड मोड (rightarrow-) पर सेट करें और निम्नलिखित दो जांच करें:
- अग्र अभिनत (Forward Bias): मल्टीमीटर की लाल प्रोब को एनोड (+) से और काली प्रोब को कैथोड (-) से जोड़ें। मल्टीमीटर की स्क्रीन पर सिलिकॉन डायोड के लिए 0.6 {V} से 0.7 {V} का वोल्टेज ड्रॉप दिखना चाहिए। (यह अग्र प्रतिरोध बहुत कम होने को दर्शाता है)।
- पश्च अभिनत (Reverse Bias): प्रोब्स को उल्टा कर दें (लाल को कैथोड से, काली को एनोड से)। स्क्रीन पर 'OL' (Over Load / Open Circuit) दिखना चाहिए, जिसका मतलब है कि कोई करंट नहीं बह रहा। (यह पश्च प्रतिरोध बहुत उच्च होने को दर्शाता है)।
- निष्कर्ष: यदि दोनों तरफ से 'OL' आए तो डायोड ओपन (खराब) है, और यदि दोनों तरफ से बीप ({Beep}) की आवाज या 0 {V} आए तो डायोड शॉर्ट (खराब) है।
3. डायोड के अग्र गुणधर्म का सत्यापन (Forward Characteristics)
- विधि: एक ब्रेडबोर्ड पर डायोड, एक रेसिस्टर और वेरिएबल डीसी पावर सप्लाई को सीरीज में जोड़ें।
- डीसी वोल्टेज को 0.1 {V} की दर से धीरे-धीरे बढ़ाएं। आप देखेंगे कि जब तक वोल्टेज 0.7 {V} (Barrier Potential) तक नहीं पहुँचता, तब तक करंट नहीं बहता। 0.7 {V} के बाद वोल्टेज स्थिर हो जाता है और करंट तेजी से बढ़ता है। यही डायोड का अग्र गुणधर्म (Forward Characteristics) है।
4. ट्रांसफार्मर की पहचान, वाइंडिंग और ध्रुवीयता (Transformers)
पावर सप्लाई में वोल्टेज को कम करने के लिए स्टेप-डाउन ट्रांसफार्मर (Step-down Transformer) का उपयोग किया जाता है।
प्राथमिक (Primary) और द्वितीयक (Secondary) वाइंडिंग की पहचान:
-
मल्टीमीटर द्वारा: मल्टीमीटर को रेजिस्टेंस (Omega) मोड पर रखें।
- जिस वाइंडिंग का प्रतिरोध (Resistance) अधिक होगा, वह प्राथमिक (Primary वाइंडिंग - 230 {V} AC इनपुट) है क्योंकि इसमें पतले तार के अधिक फेरे (Turns) होते हैं।
- जिस वाइंडिंग का प्रतिरोध बहुत कम (1-5, Omega) होगा, वह द्वितीयक (Secondary वाइंडिंग - कम वोल्टेज आउटपुट) है।
ध्रुवीयता टेस्ट (Polarity Test):
यदि ट्रांसफार्मर में कई आउटपुट तार हैं, तो उनकी ध्रुवीयता (Phase) जांचने के लिए दो वाइंडिंग्स के सिरों को आपस में जोड़ा जाता है। यदि कुल वोल्टेज दोनों के योग के बराबर (V_1 + V_2) आता है, तो वे Additively Polarized हैं; यदि वोल्टेज घट जाता है (V_1 - V_2), तो वे Subtractively Polarized हैं।
5. रेक्टिफायर परिपथ का निर्माण (Rectifier Circuits)
रेक्टिफायर वह परिपथ है जो एसी (AC) को स्पंदित डीसी (Pulsating DC) में बदलता है।
- अर्ध-तरंग (Half-Wave): इसमें केवल १ डायोड का उपयोग होता है। यह केवल एसी के पॉजिटिव हाफ-साइकिल को पास करता है। इसकी दक्षता (Efficiency) केवल 40.6\% होती है।
- पूर्ण-तरंग (Full-Wave Center-Tapped): इसमें २ डायोड और एक सेंटर-टेप ट्रांसफार्मर का उपयोग होता है। यह एसी के दोनों साइकिलों को डीसी में बदलता है।
- ब्रिज रेक्टिफायर (Bridge Rectifier): इसमें ४ डायोड को एक ब्रिज (चौकोर) के आकार में जोड़ा जाता है। इसमें सामान्य ट्रांसफार्मर का उपयोग करके भी पूरी तरंग का लाभ उठाया जा सकता है। उद्योगों और चार्जरों में इसी का सबसे ज्यादा उपयोग होता है।
6. रिपल (Ripple) और फिल्टर कैपेसिटर का मापन
रेक्टिफायर से निकलने वाला डीसी शुद्ध नहीं होता, उसमें एसी के कुछ अंश (उतार-चढ़ाव) बचे रहते हैं, जिन्हें रिपल (Ripple) कहते हैं। इसे दूर करने के लिए आउटपुट के समानांतर में एक फिल्टर कैपेसिटर जोड़ा जाता है।
- रिपल वोल्टेज (V_r): इसे मापने के लिए मल्टीमीटर या CRO को AC मोड पर सेट करके रेक्टिफायर के आउटपुट पर मापा जाता है। फिल्टर कैपेसिटर का मान (धारिता) जितना बड़ा होगा, रिपल वोल्टेज उतना ही कम (शुद्ध डीसी) होगा।
- रिपल आवृत्ति (Ripple Frequency): * हाफ-वेव रेक्टिफायर के लिए रिपल आवृत्ति इनपुट आवृत्ति के बराबर होती है (f_{out} = 50 {Hz})।
- फुल-वेव और ब्रिज रेक्टिफायर के लिए रिपल आवृत्ति दोगुनी हो जाती है (f_{out} = 2 × 50 = 100 {Hz})।
- रिपल फैक्टर (r): यह एसी वोल्टेज और डीसी वोल्टेज का अनुपात है (r = {V_{ac}}/{V_{dc}})। बिना फिल्टर के ब्रिज रेक्टिफायर का रिपल फैक्टर 0.48 होता है।
7. ज़ेनर डायोड और वोल्टेज रेगुलेटर (Zener Voltage Regulator)
साधारण डायोड रिवर्स बायस में करंट नहीं बहने देता और ज्यादा वोल्टेज पर खराब हो जाता है, लेकिन ज़ेनर डायोड (Zener Diode) को विशेष रूप से रिवर्स बायस (Reverse Bias) में काम करने के लिए ही बनाया जाता है।
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- परीक्षण: मल्टीमीटर के डायोड मोड पर यह सामान्य डायोड जैसा व्यवहार करेगा, लेकिन सर्किट में रिवर्स लगाने पर यह अपने फिक्स वोल्टेज (जैसे 5.1\text{V} या 9\text{V}) पर जाकर वोल्टेज को लॉक कर देता है।
- रेगुलेटर परिपथ: जब इनपुट वोल्टेज या लोड बदलता है, तब भी ज़ेनर डायोड अपने पार वोल्टेज को बदलने नहीं देता। इसका उपयोग संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को स्थिर वोल्टेज देने के लिए किया जाता है।
8. प्रतिशत वोल्टेज विनियमन की गणना (% Voltage Regulation)
कोई पावर सप्लाई कितनी अच्छी है, यह उसके वोल्टेज रेगुलेशन से पता चलता है। इसका मतलब है कि बिना लोड (No Load) और पूरा लोड (Full Load) डालने पर आउटपुट वोल्टेज में कितना अंतर आता है।
- V_{NL} (No Load Voltage): जब पावर सप्लाई के आउटपुट पर कोई उपकरण या लोड न जुड़ा हो तब मापा गया वोल्टेज।
- V_{FL} (Full Load Voltage): जब आउटपुट पर पूरा लोड जोड़ दिया जाए तब मापा गया वोल्टेज।
- निष्कर्ष: एक आदर्श पावर सप्लाई के लिए प्रतिशत विनियमन 0\% होना चाहिए, यानी लोड डालने पर भी वोल्टेज बिल्कुल नहीं गिरना चाहिए।
यदि आप प्रयोगशाला में इनमें से किसी विशिष्ट सर्किट (जैसे ब्रिज रेक्टिफायर का वेवफॉर्म CRO पर देखना) या प्रतिशत विनियमन का कोई न्यूमेरिकल हल करना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
कंप्यूटर हार्डवेयर, ऑपरेटिंग सिस्टम, एमएस ऑफिस और नेटवर्किंग
कंप्यूटर कैबिनेट पर विभिन्न इंडिकेटर, केबल, कनेक्टर और पोर्ट की पहचान करें।
सिस्टम यूनिट और मदरबोर्ड के विभिन्न भागों को प्रदर्शित करें।
विभिन्न कंप्यूटर पेरिफेरल्स की पहचान करें और उन्हें सिस्टम से कनेक्ट करें।
संबंधित SATA/PATA केबल को डिस्कनेक्ट करके कुछ फंक्शनैलिटी को डिसेबल करें।
CMOS बैटरी बदलें और मेमोरी मॉड्यूल को अपग्रेड करें।
SMPS का परीक्षण करें और उसे बदलें। सिस्टम पर दिए गए DVD और HDD को बदलें।
डेस्कटॉप कंप्यूटर सिस्टम को खोलें और फिर से जोड़ें।
सिस्टम को विभिन्न विकल्पों से बूट करें।
डेस्कटॉप कंप्यूटर में ऑपरेटिंग सिस्टम इंस्टॉल करें, प्रिंटर ड्राइवर सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करें और प्रिंट आउट की जांच करें, एंटीवायरस सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करें, सिस्टम को स्कैन करें।
और एंटीवायरस सॉफ्टवेयर में उपलब्ध विकल्पों का पता लगाएं, एमएस ऑफिस सॉफ्टवेयर का उपयोग करें।
फोल्डर और फाइलें बनाएं, पेंट का उपयोग करके चित्र बनाएं। एमएस वर्ड के विभिन्न मेनू/टूल/फॉर्मेट/स्टेटस बार का अन्वेषण करें और विकल्पों का अभ्यास करें। एमएस एक्सेल के विभिन्न मेनू/टूल/फॉर्मेट/स्टेटस बार का अन्वेषण करें और विकल्पों का अभ्यास करें।
विभिन्न डिज़ाइन, एनिमेशन और विज़ुअल इफ़ेक्ट्स का उपयोग करके किन्हीं तीन ज्ञात विषयों पर पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन तैयार करें।
दी गई पीडीएफ फाइल को उपयुक्त सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके वर्ड फाइल में परिवर्तित करें।
सर्च इंजन ब्राउज़ करें, ईमेल खाते बनाएं, ईमेल भेजने और प्राप्त करने का अभ्यास करें और ईमेल क्लाइंट को कॉन्फ़िगर करें।
विभिन्न प्रकार के केबल और नेटवर्क घटकों जैसे हब, स्विच, राउटर, मॉडेम आदि की पहचान करें।
टर्मिनेशन तैयार करें, यूटीपी और एसटीपी केबल कनेक्टर बनाएं और उनका परीक्षण करें। नेटवर्क कनेक्टिविटी हार्डवेयर को कनेक्ट करें और उसकी कार्यप्रणाली की जांच करें।
एक वायरलेस वाई-फाई नेटवर्क कॉन्फ़िगर करें।
यह पाठ्यक्रम कंप्यूटर हार्डवेयर, आईटी सपोर्ट और नेटवर्किंग (Computer Hardware, IT Support & Networking) का एक अत्यंत व्यावहारिक और बुनियादी हिस्सा है। आज के डिजिटल युग में किसी भी तकनीकी क्षेत्र में काम करने के लिए कंप्यूटर को अंदर से समझना, ओएस (OS) इंस्टॉल करना, ऑफिस टूल्स पर काम करना और नेटवर्क सेटअप करना आना अनिवार्य कौशल है।
यहाँ इस पूरे पाठ्यक्रम का एक व्यवस्थित और चरणबद्ध प्रयोगात्मक मार्गदर्शन दिया गया है:
1. कंप्यूटर हार्डवेयर और कैबिनेट (Hardware & Cabinet)
- इंडिकेटर और पोर्ट्स: कैबिनेट के सामने Power LED (कंप्यूटर ऑन होने पर जलती है) और HDD LED (डेटा रीड/राइट होने पर टिमटिमाती है) होती हैं। पीछे की तरफ USB, HDMI, VGA, LAN (Ethernet), और ऑडियो पोर्ट्स होते हैं।
- मदरबोर्ड के भाग: मदरबोर्ड पर मुख्य रूप से CPU सॉकेट, RAM स्लॉट्स, PCI एक्सप्रेस स्लॉट (ग्राफिक्स कार्ड के लिए), और CMOS बैटरी होती है।
- SATA/PATA केबल: हार्ड डिस्क (HDD) या सॉलिड स्टेट ड्राइव (SSD) को मदरबोर्ड से जोड़ने के लिए एल-आकार की SATA केबल का उपयोग किया जाता है। (पुरानी चौड़ी रिबन जैसी केबलों को PATA कहा जाता था)। यदि आप इस केबल को निकाल देते हैं, तो वह ड्राइव कंप्यूटर में दिखना बंद (Disable) हो जाएगी।
- CMOS बैटरी बदलना: यदि कंप्यूटर का समय और तारीख बार-बार गलत हो जाती है, तो मदरबोर्ड पर लगी छोटी गोल सिक्का जैसी CR2032 बैटरी को एक छोटे स्क्रू-ड्राइवर से लॉक दबाकर निकाला जाता है और नई बैटरी लगाई जाती है।
2. एसएमपीएस, असेंबली और बूटिंग (SMPS, Assembly & Booting)
- SMPS का परीक्षण (SMPS Testing): कंप्यूटर चालू न होने पर SMPS (Power Supply) को जांचने के लिए उसके सबसे बड़े 24-पिन कनेक्टर की हरी तार (Green Wire) को किसी भी काली तार (Black/Ground) से एक पेपर-क्लिप या चिमटी के जरिए शॉर्ट (आपस में जोड़ें) करें और SMPS का प्लग चालू करें। यदि SMPS का पंखा घूम जाता है, तो SMPS सही है।
- सिस्टम को खोलना और जोड़ना (Assembling): सबसे पहले एंटी-स्टेटिक रिस्ट बैंड पहनें। कैबिनेट में पहले SMPS कसें, फिर मदरबोर्ड पर CPU और RAM लगाकर उसे कैबिनेट में फिट करें। इसके बाद स्टोरेज ड्राइव (HDD/SSD) लगाएं और अंत में सभी पावर व डेटा केबल्स जोड़ें।
- बूट विकल्प (Boot Options): कंप्यूटर ऑन करते ही F2, F12, या Delete बटन दबाकर BIOS/UEFI सेटिंग्स में जाएं। यहाँ आप तय कर सकते हैं कि कंप्यूटर पहले हार्ड डिस्क से बूट होगा, या विंडोज इंस्टॉल करने के लिए पेनड्राइव (Bootable USB) से बूट होगा।
3. ऑपरेटिंग सिस्टम और सॉफ्टवेयर इंस्टॉलेशन (OS & Software)
- OS इंस्टॉलेशन: बूटable पेनड्राइव लगाएं, बूट मेनू से पेनड्राइव चुनें। इसके बाद स्क्रीन पर आने वाले निर्देशों का पालन करें, ड्राइव का पार्टिशन (Tukde) करें और विंडोज या लिनक्स इंस्टॉल करें।
- ड्राइवर और एंटीवायरस: हार्डवेयर (जैसे प्रिंटर) को चलाने के लिए उसका ड्राइवर सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करें। सिस्टम की सुरक्षा के लिए क्विक हील, केस्परस्काई या विंडोज डिफेंडर जैसे एंटीवायरस से पूरे सिस्टम को 'Full Scan' करें।
- PDF से Word रूपांतरण: किसी पीडीएफ फाइल को वर्ड में बदलने के लिए आप Adobe Acrobat Reader का उपयोग कर सकते हैं या Microsoft Word में ही सीधे .pdf फाइल को ओपन करने पर वह अपने आप एडिटेबल वर्ड फॉर्मेट में बदल जाती है।
4. एमएस ऑफिस और बुनियादी कार्य (MS Office Tools)
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टूल/सॉफ्टवेयर |
मुख्य कार्य और शॉर्टकट |
मुख्य मेनू और बार |
|---|---|---|
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एमएस वर्ड (MS Word) |
दस्तावेज, पत्र, और रिपोर्ट लिखना। (Ctrl+C = कॉपी, Ctrl+V = पेस्ट) |
File, Home, Insert, Layout। नीचे Status Bar होता है जो शब्दों की संख्या और ज़ूम लेवल दिखाता है। |
|
एमएस एक्सेल (MS Excel) |
डेटा एंट्री, बजट, गणना और चार्ट बनाना। (फॉर्मूला हमेशा '=' से शुरू होता है) |
Formula, Data, Insert। इसमें रो (Rows) और कॉलम से मिलकर Cells बनते हैं। |
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पावरपॉइंट (PowerPoint) |
स्लाइड शो और प्रेजेंटेशन तैयार करना। |
Design, Transitions, Animations। F5 दबाकर फुल स्क्रीन प्रेजेंटेशन शुरू किया जाता है। |
- ईमेल क्लाइंट कॉन्फ़िगरेशन: ब्राउज़र पर जाकर Gmail या Outlook पर नया अकाउंट बनाएं। अपने डेस्कटॉप पर Microsoft Outlook ऐप खोलें और उसमें अपना ईमेल, पासवर्ड और IMAP/POP3 सेटिंग्स डालकर ईमेल क्लाइंट कॉन्फ़िगर करें ताकि बिना ब्राउज़र खोले ईमेल आ-जा सकें।
5. नेटवर्किंग उपकरण और केबल निर्माण (Networking)
एक नेटवर्क को खड़ा करने के लिए निम्नलिखित उपकरणों को पहचानना जरूरी है:
- मॉडेम (Modem): इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) के सिग्नल को कंप्यूटर के समझने योग्य डिजिटल सिग्नल में बदलना।
- राउटर (Router): इंटरनेट को कई उपकरणों में सही रास्ते (IP Address) द्वारा रूट करना/बांटना।
- स्विच (Switch): एक ही ऑफिस या कमरे के कई कंप्यूटरों को आपस में तार के जरिए जोड़ना।
यूटीपी/एसटीपी केबल (LAN Cable) बनाना:
- सामग्री: Cat6 UTP केबल, RJ-45 कनेक्टर, और क्रिम्पिंग टूल (Crimping Tool)।
- विधि (T568B मानक): वायर स्ट्रिपर से केबल का बाहरी इंसुलेशन 1 इंच छीलें। अंदर मौजूद ४ जोड़े (८ तारों) को सीधा करें और इस रंग क्रम में सजाएं: सफेद-नारंगी, नारंगी, सफेद-हरा, नीला, सफेद-नीला, हरा, सफेद-भूरा, भूरा।
- तारों को बराबर काटकर RJ-45 कनेक्टर के अंदर पूरा आगे तक धकेलें।
- क्रिम्पिंग टूल के खांचे में कनेक्टर को रखकर मजबूती से दबाएं (क्लिक की आवाज आएगी)।
- परीक्षण: केबल के दोनों सिरों को नेटवर्क केबल टेस्टर (LAN Tester) में लगाएं। यदि 1 से 8 तक की सभी लाइटें क्रम से हरी जलती हैं, तो आपकी केबल बिल्कुल सही बनी है।
- अपने कंप्यूटर को ईथरनेट केबल से वाई-फाई राउटर से जोड़ें।
- ब्राउज़र में राउटर का डिफ़ॉल्ट आईपी एड्रेस (जैसे 192.168.1.1 या 192.168.0.1) टाइप करें।
- एडमिन यूजरनेम और पासवर्ड डालकर लॉगिन करें।
- Wireless / WLAN Settings में जाएं।
- SSID विकल्प में अपने वाई-फाई का नाम लिखें और सुरक्षा के लिए WPA2/WPA3 Personal सुरक्षा मोड चुनकर एक मजबूत पासवर्ड (Pre-Shared Key) सेट करें और 'Save' बटन दबाएं। आपका सुरक्षित वाई-फाई नेटवर्क तैयार है।
सफेद-नारंगी, नारंगी, सफेद-हरा, नीला, सफेद-नीला, हरा, सफेद-भूरा, भूरा।
वायरलेस वाई-फाई नेटवर्क कॉन्फ़िगर करना (Wi-Fi Configuration)
यह पूरा पाठ्यक्रम आपको एक कुशल कंप्यूटर हार्डवेयर और नेटवर्क तकनीशियन (IT Support Tech) बनाने के लिए पर्याप्त है। यदि आप इनमें से किसी विशेष प्रक्रिया, जैसे—एक्सेल में 'VLOOKUP' फॉर्मूला लगाना या राउटर में मैक-बाइंडिंग (Mac Binding) करना विस्तार से सीखना चाहते हैं, तो अवश्य बताएं!
आईसी रेगुलेटर
+12V स्थिर वोल्टेज रेगुलेटर का निर्माण और परीक्षण करें।
विभिन्न प्रकार के स्थिर धनात्मक और ऋणात्मक रेगुलेटर आईसी और उनकी विभिन्न धारा रेटिंग (78/79 श्रृंखला) की पहचान करें।
आईसी आधारित रेगुलेटर के लिए विभिन्न हीट सिंक की पहचान करें।
स्थिर लोड के साथ इनपुट वोल्टेज को बदलकर विभिन्न आईसी 723 (धातु/प्लास्टिक प्रकार) और आईसी 78540 रेगुलेटर के आउटपुट वोल्टेज का अवलोकन करें।
आईसी LM317T का उपयोग करके 1.2V – 30V परिवर्तनीय आउटपुट विनियमित विद्युत आपूर्ति का निर्माण और परीक्षण करें।
यह पाठ्यक्रम एकीकृत परिपथ नियामक (IC Voltage Regulators) का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यावहारिक हिस्सा है। इलेक्ट्रॉनिक्स में किसी भी सर्किट को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक स्थिर और नियंत्रित वोल्टेज की आवश्यकता होती है। ज़ेनर डायोड की तुलना में आईसी रेगुलेटर अधिक सटीक, कुशल और थर्मल सुरक्षा (Thermal Protection) से लैस होते हैं।
यहाँ इस पूरे पाठ्यक्रम के सभी प्रयोगात्मक बिंदुओं का चरणबद्ध और तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया है:
1. +12V स्थिर वोल्टेज रेगुलेटर का निर्माण और परीक्षण
इस प्रैक्टिकल में हम सबसे लोकप्रिय IC 7812 का उपयोग करके एक स्थिर +12 {V} डीसी पावर सप्लाई का निर्माण करते हैं।
आवश्यक सामग्री:
- IC 7812, ट्रांसफार्मर (12 {V}-0-12 {V}), ब्रिज रेक्टिफायर मॉड्यूल या ४ डायोड (IN4007), फिल्टर कैपेसिटर (1000, mu {F}), बायपास कैपेसिटर (0.1 ,mu {F} और 10, mu {F}), ब्रेडबोर्ड और मल्टीमीटर।
निर्माण के चरण:
- स्टेप-डाउन और रेक्टिफिकेशन: ट्रांसफार्मर के आउटपुट (AC) को ब्रिज रेक्टिफायर से जोड़ें और उसके बाद 1000, mu {F} का कैपेसिटर समानांतर (Parallel) में लगाकर स्पंदित डीसी को स्मूथ (Smooth) करें।
-
IC 7812 कनेक्शन: इस आईसी में तीन पिन होती हैं। सामने से देखने पर:
- पिन 1 (Input): यहाँ रेक्टिफायर से आ रहा अनियंत्रित डीसी वोल्टेज (लगभग 15 {V} से 18 {V}) जोड़ें।
- पिन 2 (Ground): इसे सर्किट के कॉमन ग्राउंड (-) से जोड़ें।
- पिन 3 (Output): यहाँ से हमें स्थिर +12 {V} आउटपुट मिलेगा।
- बायपास कैपेसिटर: पिन 1 और ग्राउंड के बीच 0.1, mu {F} तथा पिन 3 और ग्राउंड के बीच 10, mu {F} का कैपेसिटर लगाएं। यह हाई-फ्रीक्वेंसी शोर (Noise) और ऑसिलेशन को रोकता है।
परीक्षण (Testing):
- मल्टीमीटर को DC वोल्टेज मोड पर रखें। पिन 3 (+) और पिन 2 (-) के बीच वोल्टेज मापें। इनपुट वोल्टेज बदलने पर भी आउटपुट बिल्कुल +12 {V} पर स्थिर रहना चाहिए।
2. 78/79 श्रृंखला और उनकी धारा (Current) रेटिंग
78xx और 79xx श्रृंखला की आईसी का उपयोग क्रमशः निश्चित धनात्मक (Positive) और ऋणात्मक (Negative) वोल्टेज के लिए किया जाता है। इनके आखिरी दो अंक आउटपुट वोल्टेज को दर्शाते हैं।
- 78xx श्रृंखला (धनात्मक रेगुलेटर): जैसे 7805 (+5 {V}), 7809 (+9 {V}), 7812 (+12 {V})।
- 79xx श्रृंखला (ऋणात्मक रेगुलेटर): जैसे 7905 (-5 {V}), 7912 (-12 {V})। ध्यान दें: 79xx श्रृंखला की पिन कॉन्फ़िगरेशन 78xx से अलग होती है (पिन 1 = Ground, पिन 2 = Input, पिन 3 = Output)।
धारा रेटिंग (Current Rating) और पैकेजिंग:
आईसी के बीच में लिखे अक्षरों से उसकी करंट क्षमता पहचानी जाती है (जैसे TO-220 पैकेज में):
- 78Lxx: 100 { mA} (बहुत छोटा आकार)
- 78Mxx: 500 { mA}
- 78xx (बिना अक्षर के, जैसे 7805): 1.5 { A} (मानक आकार)
- 78Sxx: 2 { A}
3. आईसी आधारित रेगुलेटर के लिए हीट सिंक (Heat Sinks)
जब इनपुट और आउटपुट वोल्टेज के बीच का अंतर अधिक होता है और सर्किट से ज्यादा करंट बहता है, तो बची हुई ऊर्जा गर्मी (Heat) के रूप में आईसी से निकलती है। आईसी को जलने से बचाने के लिए उसके पीछे धातु की प्लेट जोड़ी जाती है जिसे हीट सिंक कहते हैं।
- प्रकार: 1. स्टैम्प्ड हीट सिंक (Stamped Heat Sinks): ये एल्युमिनियम की पतली शीट को मोड़कर बनाए जाते हैं, कम गर्मी के लिए उपयुक्त। 2. एक्सट्रूडेड हीट सिंक (Extruded Heat Sinks): इनमें धातु के कई पंख (Fins) बने होते हैं जो हवा के संपर्क में आकर गर्मी को तेजी से फैलाते हैं। भारी लोड के लिए इनका उपयोग होता है।
- थर्मल पेस्ट (Thermal Paste): आईसी और हीट सिंक के बीच हवा के बारीक गैप को भरने के लिए थर्मल ग्रीस/पेस्ट लगाया जाता है ताकि हीट ट्रांसफर बेहतर हो सके।
4. आईसी 723 और आईसी 78S40 रेगुलेटर का अवलोकन
आईसी 723 (IC 723 Precision Voltage Regulator)
यह एक अत्यधिक सटीक 14-पिन की रेगुलेटर आईसी है जो धातु (Metal Can) और प्लास्टिक (DIP) दोनों पैकेजों में आती है। इसका उपयोग करके 2 {V} से लेकर 37 {V} तक का बहुत ही सटीक रेगुलेटेड आउटपुट पाया जा सकता है।
- अवलोकन (Observation): जब आप सर्किट में एक निश्चित लोड जोड़ते हैं और इनपुट वोल्टेज को 12 {V} से 24 {V} तक बदलते हैं, तब भी बाहरी रेसिस्टर्स द्वारा सेट किया गया इसका आउटपुट वोल्टेज (मान लीजिए 5 {V}) बिल्कुल स्थिर (5.01 {V} से 5.02 {V}) बना रहता है। इसका लाइन रेगुलेशन (Line Regulation) बहुत उत्कृष्ट होता है।
आईसी 78S40 (Universal Switching Regulator Subsystem)
यह एक स्विचिंग रेगुलेटर (Step-up/Step-down/Inverting) आईसी है। पारंपरिक 7812 रेगुलेटर की तरह यह अतिरिक्त वोल्टेज को गर्मी में बर्बाद नहीं करती, बल्कि हाई-फ्रीक्वेंसी पर ऑन-ऑफ (स्विचिंग) करके वोल्टेज बदलती है, जिससे इसकी दक्षता (Efficiency) 80-90\% तक होती है।
5. IC LM317T द्वारा परिवर्तनीय आउटपुट विनियमित विद्युत आपूर्ति
LM317T एक वर्सटाइल (परिवर्तनीय) धनात्मक वोल्टेज रेगुलेटर आईसी है जिसकी मदद से हम आवश्यकतानुसार वोल्टेज को 1.2 {V} से 30 {V} के बीच बदल सकते हैं। यह 1.5 {A} तक का करंट दे सकती है।
पिन कॉन्फ़िगरेशन (सामने से देखने पर):
- पिन 1: Adjust (ADJ - वोल्टेज सेट करने के लिए)
- पिन 2: Output (V_{out})
- पिन 3: Input (V_{in})
परिपथ का सिद्धांत और निर्माण:
LM317 के आउटपुट को नियंत्रित करने के लिए पिन 1 (ADJ) और पिन 2 (Output) के बीच एक फिक्स रेसिस्टर (R_1 = 240, Omega) लगाया जाता है, और पिन 1 तथा ग्राउंड के बीच एक वेरिएबल रेसिस्टर या पोटेंशियोमीटर (R_2 = 5,{k} Omega पॉट) जोड़ा जाता है।
इसका आउटपुट वोल्टेज निम्नलिखित सूत्र द्वारा निर्धारित होता है:
ट्रांजिस्टर
विभिन्न पैकेज प्रकार, BE-C पिन, पावर, स्विचिंग ट्रांजिस्टर, हीट सिंक आदि के आधार पर विभिन्न ट्रांजिस्टरों की पहचान करें।
ओममीटर का उपयोग करके दिए गए ट्रांजिस्टर की स्थिति का परीक्षण करें।
CE एम्पलीफायर के इनपुट और आउटपुट विशेषताओं को मापें और उनका ग्राफ बनाएं।
रिले को नियंत्रित करने के लिए ट्रांजिस्टर आधारित स्विचिंग सर्किट बनाएं और उसका परीक्षण करें (विभिन्न कॉइल वोल्टेज वाले रिले और विभिन्न β वाले ट्रांजिस्टर का उपयोग करें)।
ट्रांजिस्टर (Transistor) इलेक्ट्रॉनिक्स का एक बेहद महत्वपूर्ण घटक है। आपके द्वारा दिए गए चारों मुख्य बिंदुओं (पहचान, परीक्षण, कैरेक्टराइजेशन और स्विचिंग एप्लीकेशन) को समझने के लिए नीचे एक विस्तृत गाइड दी गई है:
1. ट्रांजिस्टर की पहचान (Identification of Transistors)
ट्रांजिस्टर को उनके पैकेज प्रकार, पिन कॉन्फ़िगरेशन, पावर रेटिंग और उपयोग के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
पैकेज प्रकार और पिन पहचान (Package Types & Pins)
ट्रांजिस्टर मुख्य रूप से प्लास्टिक या धातु के केस (Package) में आते हैं। इनके पिन को पहचानने के लिए ट्रांजिस्टर के फ्लैट हिस्से को अपनी तरफ रखें और बाएं से दाएं (Left to Right) गिनें:
- TO-92 (प्लास्टिक पैकेज): यह कम पावर वाले ट्रांजिस्टर (जैसे BC547, BC557) के लिए होता है।
- पिनआउट (आम तौर पर): 1 = Emitter (E), 2 = Base (B), 3 = Collector (C) (नोट: कुछ ट्रांजिस्टर में यह क्रम बदल सकता है, इसलिए हमेशा डेटाशीट देखें)।
- TO-220 (प्लास्टिक के साथ मेटल टैब): यह मध्यम/हाई पावर और स्विचिंग ट्रांजिस्टर (जैसे TIP122, IRF540) के लिए होता है। इसमें पीछे एक मेटल की प्लेट होती है जिसे हीट सिंक से जोड़ा जाता है।
- पिनआउट (सामने से देखने पर): 1 = Base (B), 2 = Collector (C), 3 = Emitter (E)। (मेटल टैब आंतरिक रूप से कलेक्टर पिन से जुड़ा होता है)।
- TO-3 (मेटल कैन पैकेज): यह भारी उद्योगों या हाई-पावर एम्पलीफायर (जैसे 2N3055) में उपयोग होता है। इसका आकार हीरे (Diamond) जैसा होता है।
- पिनआउट: इसमें केवल दो पिन नीचे निकले होते हैं: 1 = Base (B), 2 = Emitter (E)। ट्रांजिस्टर की पूरी मेटल बॉडी (Body) ही Collector (C) का काम करती है।
पावर और स्विचिंग ट्रांजिस्टर
- पावर ट्रांजिस्टर: ये अधिक करंट और वोल्टेज को संभाल सकते हैं। इनका आकार बड़ा होता है ताकि गर्मी (Heat) को आसानी से बाहर निकाला जा सके।
- स्विचिंग ट्रांजिस्टर: ये बहुत तेजी से ON और OFF होने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं (जैसे 2N2222)। इनका उपयोग डिजिटल सर्किट और पीडब्लूएम (PWM) में होता है।
हीट सिंक (Heat Sink)
जब पावर ट्रांजिस्टर काम करते हैं, तो वे अत्यधिक गर्म हो जाते हैं। यदि इस गर्मी को न निकाला जाए, तो ट्रांजिस्टर जल सकता है (Thermal Runaway)।
- उपयोग: TO-220 या TO-3 पैकेज के साथ एल्युमिनियम के हीट सिंक को नट-बोल्ट की मदद से कसा जाता है।
- बेहतर हीट ट्रांसफर के लिए ट्रांजिस्टर और हीट सिंक के बीच थर्मल पेस्ट (Thermal Paste/Silicon Grease) और माइका इंसुलेटर का उपयोग किया जाता है।
2. ओममीटर/मल्टीमीटर से ट्रांजिस्टर का परीक्षण (Testing Transistor using Ohmmeter)
एक ट्रांजिस्टर (BJT) को हम दो बैक-टू-बैक (Back-to-Back) जुड़े डायोड की तरह मान सकते हैं। NPN ट्रांजिस्टर में Base (P-type) होता है और Emitter/Collector (N-type) होते हैं।
परीक्षण की चरण-दर-चरण प्रक्रिया:
मल्टीमीटर को Diode Test Mode या Ohmmeter (High Resistance Range) पर सेट करें।
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NPN ट्रांजिस्टर के लिए:
- मल्टीमीटर के लाल (Positive) प्रोब को Base पर रखें।
- काले (Negative) प्रोब को Emitter पर छुएं \rightarrow मल्टीमीटर पर कम प्रतिरोध (Low Resistance या ~0.6V से 0.7V का ड्रॉप) दिखना चाहिए (Forward Bias)।
- अब काले प्रोब को Collector पर छुएं rightarrow यहाँ भी कम प्रतिरोध/ड्रॉप दिखना चाहिए।
- यदि प्रोब को उल्टा कर दें (काले को Base पर और लाल को E/C पर), तो Open Circuit (OL / अनंत प्रतिरोध) दिखना चाहिए (Reverse Bias)।
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PNP ट्रांजिस्टर के लिए:
- मल्टीमीटर के काले (Negative) प्रोब को Base पर रखें।
- लाल (Positive) प्रोब को Emitter और Collector पर बारी-बारी से छूने पर कम प्रतिरोध/ड्रॉप मिलना चाहिए।
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खराब (Faulty) ट्रांजिस्टर के लक्षण:
- यदि किसी भी दो पिनों (विशेषकर Collector और Emitter) के बीच दोनों तरफ से चेक करने पर 0 Omega (बीप की आवाज) आए, तो ट्रांजिस्टर Short है।
- यदि बेस से चेक करने पर दोनों तरफ OL (अनंत प्रतिरोध) दिखाए, तो ट्रांजिस्टर Open (खराब) है।
3. CE एम्पलीफायर के इनपुट और आउटपुट विशेषताएं (CE Amplifier Characteristics)
कॉमन एमीटर (Common Emitter - CE) कॉन्फ़िगरेशन का उपयोग सबसे ज्यादा एम्प्लीफिकेशन के लिए किया जाता है।
सर्किट सेटअप:
- इनपुट: Base और Emitter के बीच (वोल्टेज V_{BE}, करंट I_B)
- आउटपुट: Collector और Emitter के बीच (वोल्टेज V_{CE}, करंट I_C)
A. इनपुट विशेषताएँ (Input Characteristics):
यह V_{CE} को स्थिर (Constant) रखकर V_{BE} और I_B के बीच खींचा गया ग्राफ है।
- विधि: V_{CE} को 0V पर सेट करें। V_{BE} को धीरे-धीरे बढ़ाएं (0.1V के स्टेप में) और I_B का मान नोट करें। यही प्रक्रिया V_{CE} = 5V और 10V के लिए दोहराएं।
- ग्राफ का रूप: यह एक सामान्य फॉरवर्ड-बायस्ड डायोड की तरह दिखता है। सिलिकॉन ट्रांजिस्टर के लिए 0.6V-0.7V (नी-वोल्टेज) के बाद I_B बहुत तेजी से बढ़ता है।
B. आउटपुट विशेषताएँ (Output Characteristics):
यह I_B को स्थिर रखकर V_{CE} और I_C के बीच खींचा गया ग्राफ है।
- विधि: I_B को 20 mu A पर सेट करें। अब V_{CE} को धीरे-धीरे बढ़ाएं और I_C का मान नोट करें। फिर I_B = 40 mu A, 60 mu A आदि के लिए इसे दोहराएं।
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ग्राफ के तीन क्षेत्र (Regions):
- Cut-off Region: जब I_B = 0 हो, तो I_C भी लगभग शून्य होता है (स्विच OFF)।
- Saturation Region: शुरुआती वोल्टेज (V_{CE} < 1V) पर I_C बहुत तेजी से बढ़ता है (स्विच ON)।
- Active Region: यहाँ V_{CE} बढ़ाने पर भी I_C लगभग स्थिर रहता है। ट्रांजिस्टर इसी क्षेत्र में एम्पलीफायर की तरह काम करता है।
4. रिले नियंत्रण के लिए ट्रांजिस्टर स्विचिंग सर्किट (Transistor as a Switch to Control Relay)
जब किसी माइक्रोकंट्रोलर या कम पावर वाले सर्किट से हाई-वोल्टेज/हाई-करंट वाले उपकरण (जैसे बल्ब, मोटर) को चलाना हो, तो हम ट्रांजिस्टर को एक स्विच की तरह इस्तेमाल करके रिले (Relay) को ऑन-ऑफ करते हैं।
सर्किट आरेख (Circuit Diagram) Components:
- रिले कॉइल: ट्रांजिस्टर के Collector और पॉजिटिव सप्लाई (V_{CC}) के बीच जुड़ी होती है।
- फ़्लाईबैक डायोड (Flyback/Freewheeling Diode - 1N4007): इसे रिले कॉइल के समानांतर (Parallel) उल्टी दिशा (Reverse Bias) में लगाया जाता है। जब ट्रांजिस्टर OFF होता है, तो रिले की कॉइल में बनने वाले हाई-वोल्टेज स्पाइक (Back EMF) से ट्रांजिस्टर को बचाने के लिए यह डायोड बेहद जरूरी है।
- बेस रेसिस्टर (R_B): ट्रांजिस्टर के बेस में जाने वाले करंट को सीमित करने के लिए।
विभिन्न beta (Gain) और कॉइल वोल्टेज का चयन कैसे करें?
ट्रांजिस्टर को पूरी तरह ON (Saturation Mode में) करने के लिए हमें पर्याप्त बेस करंट (I_B) देना होगा।
सूत्र:
I_C = {V_{CC}}/{R_{coil}}
सचुइरेशन (Saturation) सुनिश्चित करने के लिए हम आम तौर पर सुरक्षा के लिए I_B को 2 से 3 गुना बढ़ा देते हैं (I_{B(sat)} = 3 × I_B)।
उदाहरण गणना:
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केस 1: 5V रिले और कम beta वाला ट्रांजिस्टर (मान लेते हैं beta = 100, जैसे BC547 का न्यूनतम स्तर)
- यदि 5V रिले का कॉइल रेजिस्टेंस R_{coil} = 100 \Omega है।
- कलेक्टर करंट: I_C = 5V / 100 Omega = 50mA।
- आवश्यक बेस करंट: I_B = 50mA / 100 = 0.5mA। सुरक्षा के लिए 1.5mA लें।
- यदि इनपुट सिग्नल 5V (Arduino आदि से) है, तो R_B = (5V - 0.7V) / 1.5mA approx 2.8k Omega (आप 2.2k Omega या 1k Omega का उपयोग कर सकते हैं)।
-
केस 2: 12V रिले और अधिक beta वाला डार्लिंगटन ट्रांजिस्टर (जैसे TIP122, beta = 1000)
- यदि 12V रिले की कॉइल को 120mA करंट चाहिए।
- I_B = 120mA / 1000 = 0.12mA।
- चूंकि डार्लिंगटन ट्रांजिस्टर का beta बहुत अधिक होता है, यह बहुत ही कम इनपुट करंट (माइक्रो-एम्पियर) पर भी बड़े 12V या 24V के रिले को आसानी से स्विच कर सकता है। इसके लिए बेस रेसिस्टर का मान 4.7k Omega से 10k Omega तक रखा जा सकता है।
परीक्षण (Testing Steps):
- सर्किट को ब्रेडबोर्ड पर जोड़ें।
- जब बेस रेसिस्टर पर 0V (Ground) दिया जाता है, तो रिले से 'कट' की आवाज नहीं आनी चाहिए (रिले OFF रहेगा)।
- जब बेस रेसिस्टर पर +5V सप्लाई दी जाती है, तो ट्रांजिस्टर Saturation में चला जाता है, रिले सक्रिय (ON) हो जाता है और 'कट' की आवाज आती है। मल्टीमीटर से रिले के कॉन्टैक्ट्स (NO और COM) की निरंतरता (Continuity) की जांच करें।
एम्पलीफायर
फिक्स्ड बायस, एमिटर-बायस और वोल्टेज डिवाइडर-बायस ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर का निर्माण और परीक्षण करें।
बायपास कैपेसिटर के साथ और बिना बायपास कैपेसिटर के कॉमन एमिटर एम्पलीफायर और कॉमन बेस एम्पलीफायर का निर्माण और परीक्षण करें।
कॉमन कलेक्टर/एमिटर फॉलोअर एम्पलीफायर का निर्माण और परीक्षण करें / डार्लिंगटन एम्पलीफायर का परीक्षण करें / दो-चरण आरसी युग्मित एम्पलीफायर का परीक्षण करें।
क्लास बी कॉम्प्लीमेंट्री पुश पुल एम्पलीफायर का निर्माण और परीक्षण करें और क्लास सी ट्यून्ड एम्पलीफायर का परीक्षण करें।
ट्रांजिस्टर एम्पलीफायर (Amplifier) सर्किट का निर्माण और परीक्षण इलेक्ट्रॉनिक्स लैब का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। नीचे आपके द्वारा दिए गए सभी प्रकार के एम्पलीफायरों का विस्तृत विवरण, सर्किट की बनावट (Construction) और उनके परीक्षण (Testing) की विधि दी गई है:
1. ट्रांजिस्टर बायनिंग सर्किट (Fixed, Emitter, & Voltage Divider Bias)
किसी भी ट्रांजिस्टर को एम्पलीफायर की तरह काम करने के लिए उसे 'Active Region' में रखना जरूरी होता है, जिसे बायसिंग (Biasing) कहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य एक स्थिर Q-Point (Operating Point) प्राप्त करना है।
A. फिक्स्ड बायस (Fixed Bias)
- बनावट (Construction): इसमें Base (R_B) और Collector (R_C) दोनों रेसिस्टर्स को सीधे V_{CC} सप्लाई से जोड़ा जाता है।
- कमी: यह सर्किट तापमान बदलने या ट्रांजिस्टर बदलने (\beta के बदलने) पर बहुत अस्थिर (Unstable) हो जाता है। इसका Q-Point स्थिर नहीं रहता।
- परीक्षण: बिना किसी AC सिग्नल के V_{BE} और V_{CE} मापें। तापमान बढ़ने पर I_C और V_{CE} में भारी बदलाव देखने को मिलेगा।
B. एमीटर-बायस (Emitter-Bias)
- बनावट: फिक्स्ड बायस सर्किट में ही एमीटर (Emitter) पिन और ग्राउंड के बीच एक अतिरिक्त रेसिस्टर (R_E) जोड़ दिया जाता है।
- फायदा: यह R_E फीडबैक का काम करता है। यदि तापमान के कारण I_C बढ़ता है, तो R_E के पार वोल्टेज ड्रॉप (I_E R_E) भी बढ़ता है, जिससे V_{BE} कम हो जाता है और I_C वापस नियंत्रित हो जाता है। यह फिक्स्ड बायस से बेहतर है।
C. वोल्टेज डिवाइडर बायस (Voltage Divider Bias) - सबसे लोकप्रिय
- बनावट: इसमें दो रेसिस्टर्स (R_1 और R_2) को सीरीज में जोड़कर बेस पर एक पोटेंशियल डिवाइडर (Potential Divider) बनाया जाता है। साथ ही एमीटर पर R_E भी लगाया जाता है।
- फायदा: यह सर्किट beta (ट्रांजिस्टर गेन) और तापमान के बदलावों से पूरी तरह स्वतंत्र होता है। इसका Q-Point सबसे स्थिर होता है।
- परीक्षण: 1. मल्टीमीटर से V_B = V_{CC} × {R_2}/{R_1 + R_2} की जांच करें। 2. V_{CE} और I_C मापें और लोड लाइन (Load Line) पर ऑपरेटिंग पॉइंट मार्क करें।
2. कॉमन एमीटर (CE) और कॉमन बेस (CB) एम्पलीफायर
A. कॉमन एमीटर (CE) एम्पलीफायर
यह सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला वोल्टेज एम्पलीफायर है क्योंकि इसमें वोल्टेज और करंट दोनों का गेन (Gain) अच्छा मिलता है।
- बायपास कैपेसिटर (C_E) के साथ: जब R_E के समानांतर (Parallel) में एक बायपास कैपेसिटर लगाया जाता है, तो यह AC सिग्नलों के लिए कम रेसिस्टेंस का रास्ता (Short Circuit) देता है। इससे एम्पलीफायर का AC वोल्टेज गेन बहुत बढ़ जाता है।
- बिना बायपास कैपेसिटर के: यदि C_E को हटा दिया जाए, तो AC सिग्नल को R_E से गुजरना पड़ता है, जिससे नेगेटिव फीडबैक पैदा होता है। इससे वोल्टेज गेन कम हो जाता है, लेकिन सर्किट की स्थिरता (Stability) और बैंडविड्थ बढ़ जाती है।
- परीक्षण: इनपुट पर 20mV, 1kHz का साइन वेव सिग्नल दें। आउटपुट को ऑसिलोस्कोप (CRO) पर देखें। आउटपुट सिग्नल इनपुट से 180 डिग्री आउट-ऑफ-फेज (उल्टा) दिखाई देगा। C_E हटाने और लगाने पर आउटपुट के आयाम (Amplitude) में अंतर नोट करें।
B. कॉमन बेस (CB) एम्पलीफायर
- बनावट: इसमें बेस को ग्राउंड (या AC ग्राउंड) किया जाता है। इनपुट एमीटर पर और आउटपुट कलेक्टर से लिया जाता है।
- विशेषता: इसका इनपुट रेजिस्टेंस बहुत कम और आउटपुट रेजिस्टेंस बहुत हाई होता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से हाई-फ्रीक्वेंसी (RF) एम्पलीफायरों में होता है।
- परीक्षण: इसमें इनपुट और आउटपुट सिग्नलों के बीच 0 डिग्री फेज शिफ्ट होता है (यानी कोई फेज रिवर्सल नहीं होता)।
3. CC (एमीटर फॉलोअर), डार्लिंगटन और दो-चरण (Two-Stage) RC युग्मित एम्पलीफायर
A. कॉमन कलेक्टर (CC) / एमीटर फॉलोअर (Emitter Follower)
- बनावट: इसमें इनपुट बेस पर दिया जाता है और आउटपुट एमीटर से लिया जाता है। कलेक्टर सीधे V_{CC} से जुड़ा होता है।
- विशेषता: इसका वोल्टेज गेन लगभग 1 (Unity) होता है, यानी आउटपुट वोल्टेज ठीक इनपुट वोल्टेज का पीछा (Follow) करता है। इसका इनपुट रेजिस्टेंस बहुत हाई और आउटपुट रेजिस्टेंस बहुत कम होता है, इसलिए इसका उपयोग इम्पीडेंस मैचिंग (Impedance Matching) के लिए किया जाता है।
- परीक्षण: CRO पर देखने पर इनपुट और आउटपुट वेवफॉर्म का आकार और फेज बिल्कुल एक जैसा दिखेगा।
B. डार्लिंगटन एम्पलीफायर (Darlington Amplifier)
- बनावट: इसमें दो ट्रांजिस्टर इस प्रकार जोड़े जाते हैं कि पहले ट्रांजिस्टर का एमीटर दूसरे ट्रांजिस्टर के बेस से जुड़ता है।
- विशेषता: इसका कुल करंट गेन बहुत अधिक होता है (beta_{Total} = beta_1× beta_2)। यह बहुत कमजोर सिग्नल को भी एम्प्लीफाई कर सकता है।
- परीक्षण: इसके बेस पर बहुत कम करंट देकर भी कलेक्टर सर्किट में जुड़े भारी लोड (जैसे कोई बड़ा रिले या लैंप) को आसानी से चलाया जा सकता है।
C. दो-चरण आरसी युग्मित (Two-Stage RC Coupled) एम्पलीफायर
- बनावट: जब एक ट्रांजिस्टर का गेन पर्याप्त नहीं होता, तो दो CE एम्पलीफायरों को सीरीज में जोड़ा जाता है। पहले स्टेज के आउटपुट को एक कपलिंग कैपेसिटर (C_C) और रेसिस्टर के माध्यम से दूसरे स्टेज के इनपुट से जोड़ा जाता है।
- परीक्षण: 1. इसका कुल गेन दोनों स्टेज के गेन का गुणनफल होता है (A_V = A_{V1} × A_{V2})। 2. ऑडियो फ्रीक्वेंसी (20Hz से 20kHz) को धीरे-धीरे बदलकर आउटपुट मापें और फ्रीक्वेंसी रिस्पॉन्स ग्राफ (Frequency Response Curve) बनाएं। आप देखेंगे कि मिड-फ्रीक्वेंसी रेंज में गेन स्थिर रहता है।
4. क्लास बी कॉम्प्लीमेंट्री पुश-पुल और क्लास सी ट्यून्ड एम्पलीफायर
ये मुख्य रूप से पावर एम्पलीफायर (Power Amplifiers) हैं जिनका उपयोग लोड (जैसे लाउडस्पीकर) को अधिक करंट देने के लिए किया जाता है।
A. क्लास बी कॉम्प्लीमेंट्री पुश-पुल एम्पलीफायर (Class B Complimentary Push-Pull)
- बनावट: इसमें दो मैचिंग ट्रांजिस्टरों का उपयोग किया जाता है - एक NPN और दूसरा PNP। दोनों को सीरीज में जोड़ा जाता है।
- कार्यप्रणाली: इनपुट साइन वेव के पॉजिटिव हाफ-साइकिल (+ve) के दौरान NPN ट्रांजिस्टर ऑन होता है और करंट को लोड की तरफ 'पुश' (Push) करता है। नेगेटिव हाफ-साइकिल (-ve) के दौरान PNP ट्रांजिस्टर ऑन होता है और करंट को 'पुल' (Pull) करता है।
- क्रॉसओवर डिस्टॉर्शन (Crossover Distortion): चूंकि ट्रांजिस्टर को ऑन होने के लिए 0.7V की जरूरत होती है, इसलिए जब सिग्नल +0.7V से -0.7V के बीच होता है, तो दोनों ट्रांजिस्टर बंद रहते हैं। इससे आउटपुट वेवफॉर्म बीच में थोड़ी चपटी (डिस्टॉर्टेड) हो जाती है।
- परीक्षण: CRO पर आउटपुट वेवफॉर्म को ध्यान से देखें। शून्य (Zero-crossing) के पास आपको कटी हुई वेवफॉर्म (Cross-over Distortion) दिखाई देगी। इसे दूर करने के लिए डायोड का उपयोग करके Class AB बायसिंग की जाती है।
B. क्लास सी ट्यून्ड एम्पलीफायर (Class C Tuned Amplifier)
- बनावट: इस एम्पलीफायर के कलेक्टर लोड में एक रेसिस्टर की जगह LC पैरेलल टैंक सर्किट (Inductor और Capacitor) लगाया जाता है। इसे इस तरह बायस किया जाता है कि ट्रांजिस्टर इनपुट सिग्नल के आधे से भी कम समय (< 180 डिग्री) के लिए ऑन रहता है।
- विशेषता: इसकी कार्यक्षमता (Efficiency) सबसे अधिक (80% से ऊपर) होती है। टैंक सर्किट अपनी रीजोनेंट फ्रीक्वेंसी (f_r = {1}/{2 pi sqrt{LC}}) पर ट्यून की गई फ्रीक्वेंसी को एम्प्लीफाई करता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से रेडियो ट्रांसमीटर (RF Communication) में होता है।
- परीक्षण: सिग्नल जनरेटर से अलग-अलग फ्रीक्वेंसी इनपुट दें। आप पाएंगे कि आउटपुट वोल्टेज केवल एक निश्चित फ्रीक्वेंसी (f_r) पर ही सबसे अधिक (Peak) मिलता है, बाकी फ्रीक्वेंसी रिजेक्ट हो जाती हैं।
दोलक
कोल्पिट्स दोलक और हार्टले दोलक परिपथों का प्रदर्शन करें और CRO विधि द्वारा दोलक की आउटपुट आवृत्ति की तुलना करें।
RC फेज शिफ्ट दोलक और क्रिस्टल दोलक परिपथों का निर्माण और परीक्षण करें।
ट्रांजिस्टरों का उपयोग करके अस्थिर, एकस्थिर और द्विस्थिर परिपथों का प्रदर्शन करें।
दोलक (Oscillators) ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सर्किट होते हैं जो बिना किसी बाहरी AC इनपुट सिग्नल के, एक निश्चित आवृत्ति (Frequency) का निरंतर AC आउटपुट (जैसे साइन वेव या स्क्वायर वेव) उत्पन्न करते हैं। यह मुख्य रूप से पॉजिटिव फीडबैक (Positive Feedback) के सिद्धांत पर काम करते हैं।
यहाँ आपके द्वारा दिए गए सभी दोलक और मल्टीवाइब्रेटर सर्किट का विस्तृत विवरण, उनकी बनावट और परीक्षण की विधि दी गई है:
1. कोल्पिट्स दोलक और हार्टले दोलक (Colpitts & Hartley Oscillators)
ये दोनों LC दोलक (LC Oscillators) हैं, जिनका उपयोग हाई-फ्रीक्वेंसी (RF) सिग्नल जेनरेट करने के लिए किया जाता है। इनमें एक टैंक सर्किट (Tank Circuit) होता है जो आवृत्ति निर्धारित करता है।
A. हार्टले दोलक (Hartley Oscillator)
बनावट (Construction): इस सर्किट के टैंक सर्किट में दो इंडक्टर (L_1, L_2) और एक कैपेसिटर (C) सीरीज में जुड़े होते हैं। इंडक्टर्स के बीच में से एक टैपिंग (Center-tapped Inductor) निकाली जाती है, जो ग्राउंड या फीडबैक पाथ से जुड़ती है।
आवृत्ति का सूत्र:
f = {1}/{2 pi sqrt{L_{eq}C}}
(जहाँ L_{eq} = L_1 + L_2)
B. कोल्पिट्स दोलक (Colpitts Oscillator)
बनावट: हार्टले के विपरीत, इसके टैंक सर्किट में दो कैपेसिटर (C_1, C_2) और एक इंडक्टर (L) होते हैं। कैपेसिटर्स के बीच के जंक्शन से फीडबैक लिया जाता है। यह हार्टले की तुलना में अधिक स्थिर आवृत्ति देता है।
आवृत्ति का सूत्र:
f = {1}/{2 pi sqrt{L C_{eq}}}
(जहाँ C_{eq} = {C_1 × C_2}/{C_1 + C_2})
CRO विधि द्वारा आउटपुट आवृत्ति (Frequency) की तुलना और परीक्षण:
- दोनों सर्किट को ब्रेडबोर्ड या ट्रेनर किट पर अलग-अलग बनाएं।
- सर्किट को DC पावर सप्लाई दें।
- आउटपुट को CRO (Cathode Ray Oscilloscope) के चैनल-1 से जोड़ें। आपको स्क्रीन पर एक शुद्ध साइन वेव (Sine Wave) दिखाई देगी।
- तुलना विधि: CRO के 'Time/Div' नॉब की सहायता से वेवफॉर्म के एक पूरे चक्र (Cycle) का समय (T) मापें।
- सूत्र f = 1/T का उपयोग करके प्रायोगिक आवृत्ति की गणना करें।
- निष्कर्ष: आप पाएंगे कि कोल्पिट्स दोलक का आउटपुट हार्टले की तुलना में अधिक स्थिर और कम शोर (Noise) वाला होता है। घटक (L और C) के मान बदलकर देखें कि आवृत्ति कैसे बदलती है।
2. RC फेज शिफ्ट और क्रिस्टल दोलक (RC Phase Shift & Crystal Oscillators)
A. RC फेज शिफ्ट दोलक (RC Phase Shift Oscillator)
- बनावट: इसका उपयोग कम आवृत्ति (Audio Frequency: 20Hz - 20kHz) उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। इसमें फीडबैक नेटवर्क के रूप में तीन RC (Resistor-Capacitor) सेक्शन की एक चेन होती है।
- सिद्धांत: कॉमन एमीटर (CE) ट्रांजिस्टर 180^circ का फेज शिफ्ट देता है। बरखाउसन क्राइटेरिया (Barkhausen Criteria) को पूरा करने के लिए फीडबैक नेटवर्क को भी 180^circ का फेज शिफ्ट देना होता है। इसलिए, प्रत्येक RC नेटवर्क 60^circ का शिफ्ट देता है (60^ circ × 3 = 180^circ)।
- परीक्षण: CRO पर आउटपुट तरंग देखें। यदि सर्किट ठीक से डिजाइन है, तो बिना इनपुट के सुंदर साइन वेव दिखाई देगी।
B. क्रिस्टल दोलक (Crystal Oscillator)
- बनावट: इसमें टैंक सर्किट के स्थान पर एक पिजोइलेक्ट्रिक क्वार्ट्ज क्रिस्टल (Quartz Crystal) का उपयोग किया जाता है।
- विशेषता: यह दुनिया के सबसे स्थिर दोलकों में से एक है। तापमान बदलने पर भी इसकी आवृत्ति नहीं बदलती। इसका उपयोग घड़ियों, कंप्यूटर और माइक्रोकंट्रोलर में क्लॉक पल्स जेनरेट करने के लिए किया जाता है।
- परीक्षण: इसे सर्किट में जोड़कर जब आप CRO पर देखेंगे, तो आपको एक अत्यंत सटीक और स्थिर आवृत्ति (जैसे 4MHz या 11.0592MHz) की वेवफॉर्म दिखाई देगी।
3. ट्रांजिस्टर मल्टीवाइब्रेटर (Astable, Monostable, & Bistable Circuits)
मल्टीवाइब्रेटर ऐसे सर्किट होते हैं जो स्क्वायर वेव (Square Wave) या आयताकार पल्स उत्पन्न करते हैं। ये दो ट्रांजिस्टरों को क्रॉस-कपलिंग (Cross-coupling) करके बनाए जाते हैं।
A. अस्थिर मल्टीवाइब्रेटर (Astable Multivibrator)
- विशेषता: इसकी कोई भी स्थिति स्थिर (Stable State) नहीं होती। यह लगातार अपनी दो अवस्थाओं (ON और OFF) के बीच बदलता रहता है। इसे फ्री-रनिंग ऑसिलेटर (Free-running Oscillator) भी कहते हैं।
- प्रदर्शन और परीक्षण: सर्किट में दो LED (एक बाएं ट्रांजिस्टर पर, एक दाएं पर) लगाएं। आप देखेंगे कि बिना किसी बाहरी बटन को दबाए दोनों LED बारी-बारी से जलती और बुझती हैं (Flasher Circuit)। CRO पर यह एक निरंतर स्क्वायर वेव दिखाता है।
B. एकस्थिर मल्टीवाइब्रेटर (Monostable Multivibrator)
- विशेषता: इसकी एक स्थिति स्थिर (Stable) होती है और दूसरी अस्थायी (Quasi-stable) होती है। इसे 'वन-शॉट' (One-shot) सर्किट भी कहा जाता है।
- प्रदर्शन और परीक्षण: सामान्य स्थिति में एक LED स्थायी रूप से बंद रहेगी। जब आप एक पुश-बटन की मदद से एक बाहरी ट्रिगर पल्स (Trigger Pulse) देंगे, तो LED एक निश्चित समय के लिए चालू हो जाएगी और फिर अपने आप बंद (स्थिर स्थिति में वापस) हो जाएगी। इसका उपयोग टाइमर और डिले सर्किट में होता है।
C. द्विस्थिर मल्टीवाइब्रेटर (Bistable Multivibrator)
- विशेषता: इसकी दोनों स्थितियां स्थिर (Stable) होती हैं। यह अपनी अवस्था तब तक नहीं बदलता जब तक कि इसे बाहरी रूप से ट्रिगर न किया जाए। इसे फ्लिप-फ्लॉप (Flip-Flop) या डिजिटल मेमोरी सेल भी कहते हैं।
- प्रदर्शन और परीक्षण: इसमें दो इनपुट बटन होते हैं (Set और Reset)।
- बटन 1 दबाने पर LED-A चालू हो जाती है और बटन छोड़ने के बाद भी चालू रहती है।
- बटन 2 दबाने पर LED-A बंद हो जाती है और LED-B चालू हो जाती है।
- यह सर्किट एक बिट (1 या 0) की डिजिटल जानकारी को स्टोर करने का प्रदर्शन करता है।
तरंग आकार निर्धारण परिपथ
शंट क्लिपर का निर्माण और परीक्षण करें। डायोड का उपयोग करके श्रृंखला और दोहरी क्लिपर परिपथ का निर्माण और परीक्षण करें।
डायोड का उपयोग करके क्लैम्पर परिपथ का निर्माण और परीक्षण करें। पीक क्लिपर के रूप में ज़ेनर डायोड का निर्माण और परीक्षण करें।
तरंग आकार निर्धारण परिपथ (Wave Shaping Circuits) ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सर्किट होते हैं जिनका उपयोग इनपुट वेवफॉर्म (जैसे साइन वेव) के आकार को बदलने, उसके किसी हिस्से को काटने या उसके DC स्तर को बदलने के लिए किया जाता है। इनमें क्लिपर (Clippers) और क्लैम्पर (Clampers) सबसे मुख्य हैं।
नीचे आपके द्वारा दिए गए सभी सर्किटों का विस्तृत विवरण, उनकी बनावट और परीक्षण विधि दी गई है:
1. क्लिपर परिपथ (Clipper Circuits)
क्लिपर सर्किट (जिन्हें वोल्टेज लिमिटर भी कहा जाता है) इनपुट तरंग के एक निश्चित हिस्से को बिना बचे हुए हिस्से को नुकसान पहुंचाए काट (Clip) देते हैं।
A. शंट क्लिपर (Shunt Clipper)
- बनावट (Construction): इस सर्किट में डायोड को लोड या आउटपुट टर्मिनलों के समानांतर (Parallel / Shunt) जोड़ा जाता है और एक रेसिस्टर सीरीज में होता है।
- सकारात्मक शंट क्लिपर (Positive Shunt Clipper): इसमें डायोड का कैथोड ऊपर और एनोड नीचे (ग्राउंड की तरफ) होता है। पॉजिटिव हाफ-साइकिल में डायोड फॉरवर्ड बायस होकर शॉर्ट सर्किट की तरह काम करता है, जिससे आउटपुट शून्य (या 0.7 {V}) मिलता है। नेगेटिव हाफ में डायोड ओपन सर्किट हो जाता है और पूरा इनपुट आउटपुट पर मिलता है।
- नकारात्मक शंट क्लिपर (Negative Shunt Clipper): इसमें डायोड को उल्टा कर दिया जाता है, जिससे यह इनपुट के केवल नेगेटिव हिस्से को काटता है।
B. श्रृंखला क्लिपर (Series Clipper)
- बनावट: इसमें डायोड आउटपुट लोड के श्रृंखला (Series) में जुड़ा होता है।
- सकारात्मक श्रृंखला क्लिपर (Positive Series Clipper): जब डायोड का एनोड इनपुट की तरफ और कैथोड आउटपुट की तरफ हो, लेकिन उसकी दिशा इस तरह हो कि वह केवल नेगेटिव हाफ को गुजरने दे और पॉजिटिव हाफ को ब्लॉक (ओपन सर्किट) कर दे।
- परीक्षण: श्रृंखला क्लिपर में जब डायोड OFF (ओपन) होता है, तो आउटपुट पूरी तरह शून्य हो जाता है।
C. दोहरी क्लिपर परिपथ (Dual/Combinational Clipper)
- बनावट: जब हमें इनपुट वेवफॉर्म के पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों सिरों को एक साथ काटना हो, तो हम दो शंट डायोड को विपरीत दिशाओं में समानांतर में जोड़ते हैं। दोनों डायोड के साथ सीरीज में अलग-अलग DC बायसिंग वोल्टेज (V_1 और V_2) जोड़े जाते हैं।
- परीक्षण: जब इनपुट वोल्टेज +V_1 से अधिक होता है, तो पहला डायोड ऑन हो जाता है और तरंग ऊपर से कट जाती है। जब इनपुट -V_2 से कम होता है, तो दूसरा डायोड ऑन हो जाता है और तरंग नीचे से कट जाती है। आउटपुट पर हमें ऊपर और नीचे दोनों तरफ से कटी हुई (Square-like) वेवफॉर्म मिलती है।
2. ज़ेनर डायोड पीक क्लिपर (Zener Diode Peak Clipper)
सामान्य डायोड से क्लिपर बनाने के लिए हमें बाहरी DC बैटरी (बायसिंग) की जरूरत होती है। लेकिन ज़ेनर डायोड अपने ब्रेकडाउन वोल्टेज (V_Z) के कारण बिना किसी बाहरी बैटरी के भी एक बेहतरीन पीक क्लिपर का काम कर सकता है।
- बनावट: एक रेसिस्टर के साथ दो ज़ेनर डायोड को बैक-टू-बैक (एक का एनोड दूसरे के एनोड से या कैथोड से कैथोड) सीरीज में जोड़कर आउटपुट के समानांतर (Shunt) लगाया जाता है।
- कार्यप्रणाली: * पॉजिटिव हाफ-साइकिल में: ऊपर वाला ज़ेनर डायोड रिवर्स ब्रेकडाउन मोड में (V_{Z1}) काम करता है और नीचे वाला सामान्य डायोड की तरह फॉरवर्ड बायस (0.7 {V}) हो जाता है। तरंग + (V_{Z1} + 0.7 {V}) पर क्लिप हो जाती है।
- नेगेटिव हाफ-साइकिल में: स्थिति उलट जाती है। तरंग - (V_{Z2} + 0.7 {V}) पर क्लिप हो जाती है।
- परीक्षण: CRO पर देखने पर इनपुट साइन वेव के दोनों ऊपरी और निचले शिखर (Peaks) बिल्कुल सपाट कटे हुए दिखाई देंगे। इसका उपयोग सिग्नलों को ओवर-वोल्टेज से बचाने के लिए किया जाता है।
3. क्लैम्पर परिपथ (Clamper Circuits)
क्लिपर तरंग के हिस्से को काटता है, जबकि क्लैम्पर सर्किट तरंग के आकार को बदले बिना, पूरी वेवफॉर्म को एक निश्चित DC स्तर (DC Level) पर ऊपर या नीचे खिसका (Shift) देता है। इसे DC रिस्टोरर (DC Restorer) भी कहते हैं।
- बनावट: इसमें एक कैपेसिटर (C) सीरीज में, और एक डायोड (D) व रेसिस्टर (R) आउटपुट के समानांतर में जुड़े होते हैं। इसमें टाइम कांस्टेंट (tau = RC) का मान इनपुट सिग्नल के टाइम पीरियड (T) से बहुत अधिक रखा जाता है।
A. सकारात्मक क्लैम्पर (Positive Clamper):
- इसमें डायोड का एनोड ग्राउंड की तरफ और कैथोड ऊपर होता है। यह पूरी तरंग को ऊपर की तरफ (पॉजिटिव दिशा में) धकेल देता है, जिससे तरंग का न्यूनतम पीक 0 {V} (या 0.7 {V}) पर आ जाता है।
B. नकारात्मक क्लैम्पर (Negative Clamper):
- इसमें डायोड को उल्टा कर दिया जाता है। यह पूरी तरंग को नीचे की तरफ (नेगेटिव दिशा में) धकेल देता है, जिससे तरंग का अधिकतम पीक 0 {V} पर आ जाता है।
प्रयोगशाला में परीक्षण की विधि (Testing Procedure in Lab)
इन सभी सर्किटों का परीक्षण करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
- सर्किट असेंबली: दिए गए सर्किट आरेख के अनुसार घटकों (डायोड, ज़ेनर, कैपेसिटर, रेसिस्टर) को ब्रेडबोर्ड पर सावधानीपूर्वक जोड़ें। डायोड के पोलरिटी (एनोड/कैथोड) का विशेष ध्यान रखें।
- इनपुट सिग्नल: फंक्शन जनरेटर (Function Generator) की मदद से सर्किट के इनपुट पर 1 {kHz} आवृत्ति और 10 {V Peak-to-Peak} (V_{p-p}) का साइन वेव सिग्नल दें।
- CRO कनेक्शन: * CRO के चैनल-1 को इनपुट सिग्नल से जोड़ें।
- CRO के चैनल-2 को लोड रेसिस्टर (आउटपुट) के आर-पार जोड़ें।
- निरीक्षण (Observation): CRO को 'Dual' मोड पर सेट करें ताकि इनपुट और आउटपुट दोनों तरंगें एक साथ स्क्रीन पर दिखें।
- रीडिंग और ग्राफ: * क्लिपर के लिए: देखें कि वोल्टेज किस स्तर पर कट रहा है। ग्राफ पेपर पर इनपुट और कटे हुए आउटपुट का चित्र बनाएं।
- क्लैम्पर के लिए: CRO के चैनल को 'DC Coupling' मोड पर सेट करें (यदि यह AC मोड पर रहेगा तो शिफ्टिंग दिखाई नहीं देगी)। नोट करें कि तरंग का संदर्भ स्तर (0 {V} लाइन) कितना ऊपर या नीचे खिसका है।
पावर इलेक्ट्रॉनिक घटक
विभिन्न पावर इलेक्ट्रॉनिक घटकों, उनके विनिर्देशों और टर्मिनलों की पहचान करें।
एक FET एम्पलीफायर का निर्माण और परीक्षण करें। UJT ट्रिगरिंग का उपयोग करके SCR का परीक्षण परिपथ बनाएं।
SCR में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न हीट सिंक की पहचान करें।
SCR की सुरक्षा के लिए स्नबर परिपथ बनाएं और बैक emf को कम करने के लिए फ्रीव्हीलिंग डायोड का उपयोग करें।
DIAC के परीक्षण के लिए जिग परिपथ बनाएं।
TRIAC का उपयोग करके एक सरल डिमर परिपथ बनाएं।
UJT आधारित फ्री रनिंग ऑसिलेटर बनाएं और उसकी आवृत्ति बदलें।
पावर इलेक्ट्रॉनिक्स (Power Electronics) औद्योगिक और भारी बिजली नियंत्रण प्रणालियों की रीढ़ है। आपके द्वारा दिए गए सभी व्यावहारिक (Practical) प्रयोगों और अवधारणाओं का विस्तृत विवरण, सर्किट डिज़ाइन और परीक्षण विधि नीचे दी गई है:
1. पावर इलेक्ट्रॉनिक घटकों की पहचान और टर्मिनल (Identification of Components)
पावर इलेक्ट्रॉनिक घटक सामान्य इलेक्ट्रॉनिक्स के तुलना में बहुत अधिक वोल्टेज और करंट को संभाल सकते हैं।
|
घटक (Component) |
मुख्य टर्मिनल (Terminals) |
विनिर्देश (Key Specifications) |
मुख्य उपयोग |
|---|---|---|---|
|
SCR (Silicon Controlled Rectifier) |
Anode (A), Cathode (K), Gate (G) |
V_{RRM} (रिवर्स वोल्टेज), I_T (फॉरवर्ड करंट) |
AC/DC मोटर कंट्रोल, नियंत्रित रेक्टिफायर |
|
Power MOSFET |
Gate (G), Drain (D), Source (S) |
V_{DS}, R_{DS(on)} (चालू होने पर आंतरिक प्रतिरोध) |
हाई-स्पीड स्विचिंग, SMPS, इन्वर्टर |
|
IGBT |
Gate (G), Collector (C), Emitter (E) |
V_{CES}, I_C |
AC ड्राइव, VFD, सोलर इन्वर्टर |
|
DIAC |
Main Terminal 1 (MT1), Main Terminal 2 (MT2) |
V_{BO} (ब्रेकओवर वोल्टेज: आमतौर पर 30V-32V) |
TRIAC को ट्रिगर करने के लिए |
|
TRIAC |
Main Terminal 1 (MT1), Main Terminal 2 (MT2), Gate (G) |
V_{DRM}, I_{RMS} |
AC फैन रेगुलेटर, लाइट डिमर (द्विदिशीय) |
|
UJT (Unijunction Transistor) |
Base 1 (B_1), Base 2 (B_2), Emitter (E) |
\eta (Intrinsic Standoff Ratio), V_{E(peak)} |
रिलैक्सेशन ऑसिलेटर, SCR ट्रिगरिंग |
2. FET एम्पलीफायर और UJT ट्रिगरिंग सर्किट
A. FET एम्पलीफायर (Field Effect Transistor Amplifier)
- बनावट (Construction): आमतौर पर JFET (जैसे BFW10) का उपयोग करके 'Common Source' (CS) कॉन्फ़िगरेशन बनाया जाता है। इसमें Gate पर इनपुट रेसिस्टर (R_G), Drain पर (R_D) और Source पर (R_S) के साथ बायपास कैपेसिटर (C_S) लगाया जाता है।
- विशेषता: इसका इनपुट इम्पीडेंस अत्यंत उच्च (High Input Impedance) होता है।
- परीक्षण: इनपुट पर 1 {kHz} का स्मॉल AC सिग्नल दें। CRO पर आउटपुट देखें, यह इनपुट से 180° आउट-ऑफ-फेज और एम्प्लीफाइड (बढ़ा हुआ) मिलेगा।
B. UJT ट्रिगरिंग द्वारा SCR का परीक्षण परिपथ
- बनावट: SCR को चालू करने के लिए उसके गेट (Gate) पर एक पल्स की आवश्यकता होती है। इसके लिए UJT रिलैक्सेशन ऑसिलेटर का उपयोग किया जाता है। UJT के B_1 टर्मिनल को SCR के Gate से और कैथोड को B_1 के निचले हिस्से (Ground) से जोड़ा जाता है।
- परीक्षण: जैसे ही UJT पल्स उत्पन्न करता है, SCR चालू (Latch) हो जाता है। आप पोटेंशियोमीटर (पॉट) को घुमाकर UJT की पल्स का समय बदल सकते हैं, जिससे SCR का फायरिंग एंगल (alpha) बदलता है और लोड (बल्ब) की चमक नियंत्रित होती है।
3. SCR में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न हीट सिंक (Heat Sinks for SCR)
पावर SCR में बहुत अधिक करंट बहने के कारण भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है। इन्हें ठंडा रखने के लिए निम्नलिखित हीट सिंक का उपयोग किया जाता है:
- प्राकृतिक वायु हीट सिंक (Natural Air Cooled): एल्युमिनियम के पंखदार (Finned) ब्लॉक होते हैं। यह साधारण लोड के लिए वायुमंडल की हवा से स्वतः ठंडे होते हैं।
- फोर्स्ड एयर हीट सिंक (Forced Air Cooled): इसमें हीट सिंक के ऊपर एक कूलिंग फैन (Exhaust Fan) लगाया जाता है जो तेजी से गर्मी को बाहर निकालता है।
- जल/द्रव शीतलित हीट सिंक (Water/Liquid Cooled): बहुत भारी औद्योगिक SCR (हजारों एम्पियर वाले) के लिए हीट सिंक के अंदर बनी तांबे की नलियों से ठंडा पानी या लिक्विड कूलेंट गुजारा जाता है।
4. SCR सुरक्षा: स्नबर परिपथ और फ्रीव्हीलिंग डायोड
A. स्नबर परिपथ (Snubber Circuit - dv/dt सुरक्षा)
- बनावट: एक रेसिस्टर (R) और कैपेसिटर (C) को सीरीज में जोड़कर, इस पूरे संयोजन को SCR के Anode और Cathode के समानांतर (Parallel) लगाया जाता है।
- कार्य: सर्किट चालू/बंद होते समय अचानक वोल्टेज में होने वाले तेज बदलाव (dv/dt) से SCR को खराब होने या स्वतः ट्रिगर होने से बचाता है। कैपेसिटर वोल्टेज के झटके को सोख लेता है।
B. फ्रीव्हीलिंग डायोड (Freewheeling / Flyback Diode)
- बनावट: जब SCR का लोड एक इंडक्टिव लोड (जैसे मोटर या कॉइल) हो, तो लोड के समानांतर में एक डायोड को उल्टी दिशा (Reverse Bias) में लगाया जाता है।
- कार्य: जब SCR अचानक बंद होता है, तो इंडक्टर में संचित चुंबकीय ऊर्जा एक बहुत बड़ा विपरीत वोल्टेज (Back EMF) पैदा करती है। यह फ्रीव्हीलिंग डायोड उस करंट को अपने अंदर ही घुमाकर (Free-wheel कराकर) सुरक्षित रूप से समाप्त कर देता है, जिससे SCR जलने से बच जाता है।
5. DIAC के परीक्षण के लिए जिग परिपथ (DIAC Testing Jig Circuit)
DIAC दोनों दिशाओं में तब तक करंट नहीं बहने देता जब तक कि वोल्टेज उसके ब्रेकओवर वोल्टेज (V_{BO} approx 30 {V}) तक न पहुँच जाए।
जिग सर्किट की बनावट:
परीक्षण विधि: 1. वेरिएबल वोल्टेज को धीरे-धीरे बढ़ाएं। शुरुआत में करंट शून्य रहेगा।
2. जैसे ही वोल्टेज 30 {V}-32 {V} के पास पहुँचेगा, DIAC अचानक 'Breakdown' हो जाएगा और एमीटर में करंट तेजी से बढ़ेगा।
3. यही प्रक्रिया वोल्टेज की पोलरिटी (दिशा) बदलकर भी दोहराएं। दोनों दिशाओं में समान व्यवहार DIAC के सही होने की पुष्टि करता है।
6. TRIAC का उपयोग करके एक सरल डिमर परिपथ (Light/Fan Dimmer)
यह घरों में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक रेगुलेटर का सर्किट है।
- बनावट: इसमें AC मेंस सप्लाई के फेज में एक लोड (बल्ब) जोड़ा जाता है। फिर एक RC नेटवर्क (पोटेंशियोमीटर R और कैपेसिटर C) लगाया जाता है। R और C के जंक्शन से एक DIAC को जोड़कर उसे TRIAC के Gate टर्मिनल से जोड़ा जाता है।
- कार्यप्रणाली और परीक्षण: जब हम पोटेंशियोमीटर (पॉट) को घुमाते हैं, तो कैपेसिटर के चार्ज होने का समय बदल जाता है। जैसे ही कैपेसिटर का वोल्टेज 3 {V} पहुँचता है, DIAC ऑन हो जाता है और TRIAC के गेट को करंट पल्स देता है। इससे TRIAC ऑन हो जाता है। पॉट को घुमाकर बल्ब की रोशनी को पूरा धीमा या तेज (0 से 100%) किया जा सकता है।
7. UJT आधारित फ्री रनिंग ऑसिलेटर (UJT Relaxation Oscillator)
यह सर्किट बिना किसी बाहरी सिग्नल के लगातार पल्स (Sawtooth Wave) उत्पन्न करता है।
-
बनावट: * V_{CC} से एक वेरिएबल रेसिस्टर (R) और कैपेसिटर (C) को सीरीज में ग्राउंड तक जोड़ें।
- R और C के बीच के पॉइंट को UJT के Emitter (E) पिन से जोड़ें।
- B_2 पिन को एक छोटे रेसिस्टर के माध्यम से +V_{CC} और B_1 को एक रेसिस्टर से ग्राउंड करें।
आवृत्ति (Frequency) बदलना और परीक्षण:
कार्यप्रणाली: कैपेसिटर R के माध्यम से चार्ज होता है। जैसे ही इसका वोल्टेज UJT के पीक वोल्टेज (V_P) तक पहुँचता है, UJT अचानक ऑन हो जाता है और कैपेसिटर B_1 के रास्ते तेजी से डिस्चार्ज हो जाता है। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
आवृत्ति का सूत्र:
f = {1}/{R C ln left({1}/{1-eta}right)}
परीक्षण: Emitter टर्मिनल पर CRO प्रोब लगाएं, आपको एक आरी के दांत जैसी तरंग (Sawtooth Waveform) दिखाई देगी। जब आप पोटेंशियोमीटर (R का मान) को घुमाएंगे, तो कैपेसिटर के चार्ज होने का समय बदलेगा, जिससे तरंग की आवृत्ति (Frequency) कम या ज्यादा होगी। B_1 टर्मिनल पर आपको तीखी पल्स (Sharp Trigger Pulses) मिलेंगी।
MOSFET और IGBT
विभिन्न पावर MOSFET को उनके नंबर से पहचानें और मल्टीमीटर का उपयोग करके उनका परीक्षण करें। विभिन्न पावर MOSFET उपकरणों के साथ उपयोग किए जाने वाले विभिन्न हीट सिंक की पहचान करें।
कम लोड के साथ MOSFET परीक्षण परिपथ बनाएं।
IGBT को उनके नंबर से पहचानें और मल्टीमीटर का उपयोग करके उनका परीक्षण करें। कम लोड के साथ IGBT परीक्षण परिपथ बनाएं।
पावर MOSFET और IGBT आधुनिक पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के दो सबसे महत्वपूर्ण सॉलिड-स्टेट स्विचिंग घटक हैं। जहाँ MOSFET अपनी बहुत तेज स्विचिंग स्पीड (High-speed) के लिए जाना जाता है, वहीं IGBT उच्च वोल्टेज और उच्च करंट (High-power) को संभालने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है।
इन दोनों घटकों की पहचान, मल्टीमीटर से परीक्षण और व्यावहारिक सर्किट (Test Circuits) की विस्तृत गाइड नीचे दी गई है:
1. पावर MOSFET (Power MOSFET)
A. नंबर द्वारा पहचान (Identification by Part Number)
पावर MOSFET आमतौर पर TO-220, TO-247, या D2PAK पैकेज में आते हैं। इनके पार्ट नंबर से इनकी क्षमताओं का पता चलता है:
- IRF540N: बहुत लोकप्रिय N-चैनल MOSFET है। (100 {V}, 33 {A})। मुख्य रूप से मोटर ड्राइवरों और इनवर्टर में उपयोग होता है।
- IRFZ44N: N-चैनल (55 {V}, 49 {A})। कम वोल्टेज, उच्च करंट वाले अनुप्रयोगों के लिए।
- IRF9540: P-चैनल MOSFET (100 {V}, 23 {A})। यह IRF540 का पूरक (Complementary) है।
- इंटरनल डायोड टेस्ट (Body Diode Check): काले (Negative) प्रोब को Drain पर और लाल (Positive) प्रोब को Source पर रखें। मल्टीमीटर को 0.4 {V} से 0.7 {V} का ड्रॉप दिखाना चाहिए (यह MOSFET का आंतरिक सुरक्षा डायोड है)। प्रोब उलटने पर 'OL' (Open Circuit) आना चाहिए।
- MOSFET को ON करना (Gate Triggering): काले प्रोब को Source पर ही रखें। अब लाल प्रोब को एक पल के लिए Gate पिन पर छुएं (इससे गेट चार्ज हो जाएगा)।
- ON स्थिति की जांच: तुरंत लाल प्रोब को वापस Drain पर ले आएं (काला प्रोब Source पर ही रहना चाहिए)। अब मल्टीमीटर पर बहुत कम वोल्टेज ड्रॉप या 0 {V} (या निरंतर बीप) दिखाई देगी। इसका मतलब MOSFET ऑन हो चुका है।
- MOSFET को OFF करना: अपनी उंगली से या मल्टीमीटर के प्रोब से Gate और Source पिन को एक साथ छुएं (इससे गेट डिस्चार्ज हो जाएगा)। अब दोबारा Drain और Source को चेक करने पर यह वापस 'OL' या सामान्य डायोड ड्रॉप दिखाएगा।
- स्टैम्पड मेटल हीट सिंक (Stamped Heat Sinks): छोटी एल्युमिनियम शीट से बने होते हैं, जो सीधे TO-220 पैकेज पर स्क्रू कर दिए जाते हैं। कम पावर के लिए उपयुक्त।
- एक्स्ट्रूडेड एल्युमिनियम हीट सिंक (Extruded Heat Sinks): इनमें मोटी और गहरी कटी हुई फिन्स (Fins) होती हैं। बड़े इनवर्टर या मोटर कंट्रोलर में कई MOSFETs को एक साथ इस पर कसा जाता है।
-
बनावट: एक 9 {V} या 12 {V} DC सप्लाई लें। लोड के रूप में एक छोटा 12 {V} का बल्ब या DC फैन लें।
- सप्लाई के पॉजिटिव (+ve) को लोड के एक सिरे से जोड़ें।
- लोड के दूसरे सिरे को MOSFET के Drain से जोड़ें।
- MOSFET के Source को सप्लाई के नेगेटिव (-ve/Ground) से जोड़ें।
- Gate को नियंत्रित करने के लिए: Gate और Ground के बीच एक 10 {k} Omega का रेसिस्टर (Pull-down) लगाएं। Gate पर सप्लाई देने के लिए एक पुश-बटन के माध्यम से +V_{CC} जोड़ें।
- परीक्षण: जब आप पुश-बटन दबाएंगे, गेट चार्ज होगा और लोड (बल्ब/फैन) तुरंत चालू हो जाएगा। बटन छोड़ने पर लोड बंद हो जाएगा।
- FGA25N120: बहुत आम IGBT है (1200 {V}, 25 {A})। इसका उपयोग इंडक्शन कुकटॉप (Induction Stoves) और इनवर्टर में बहुत होता है।
- IRG4PC50UD: (600 {V}, 55 {A})। इसके अंदर एक को-पैकेज्ड अल्ट्रा-फास्ट डायोड भी होता है।
- कलेक्टर-एमीटर जांच: लाल प्रोब को Collector पर और काले को Emitter पर रखें rightarrow 'OL' आना चाहिए। प्रोब उलटने पर (काला Collector पर, लाल Emitter पर), यदि अंदर एंटी-पैरेलल डायोड है, तो 0.4 {V} से 0.6 {V} का ड्रॉप दिखेगा।
- IGBT को ON करना: काले प्रोब को Emitter पर रखें और लाल प्रोब से एक पल के लिए Gate पिन को छुएं (गेट चार्ज हो जाएगा)।
- ON स्थिति की जांच: तुरंत लाल प्रोब को वापस Collector पर रखें। यदि मल्टीमीटर का आंतरिक वोल्टेज IGBT को ट्रिगर करने के लिए पर्याप्त था, तो यह बहुत कम रेजिस्टेंस या लो वोल्टेज ड्रॉप दिखाएगा (चूंकि कुछ मल्टीमीटर की बैटरी वोल्टेज गेट को पूरी तरह खोलने के लिए कम होती है, इसलिए लैब में पल्स देना बेहतर माना जाता है)।
- OFF करना: Gate और Emitter को आपस में शॉर्ट करने पर यह तुरंत बंद हो जाएगा और दोबारा 'OL' दिखाएगा।
-
बनावट: चूंकि IGBT हाई-वोल्टेज उपकरण है, लेकिन परीक्षण के लिए हम 12 {V} DC सप्लाई और एक छोटे 12 {V} लैंप का उपयोग कर सकते हैं।
- सप्लाई का पॉजिटिव (+ve) rightarrow लैंप का एक सिरा।
- लैंप का दूसरा सिरा rightarrow IGBT के Collector से।
- IGBT का Emitter rightarrow सप्लाई के नेगेटिव (Ground) से।
- Gate सर्किट: Gate के सीरीज में एक 100 Omega का रेसिस्टर लगाएं (प्रोटेक्शन के लिए) और गेट को स्थिर रखने के लिए Gate से Emitter के बीच एक 10 {k} Omega का पुल-डाउन रेसिस्टर लगाएं। एक SPDT स्विच या पुश-बटन की मदद से गेट रेसिस्टर को +12 {V} सप्लाई से जोड़ें।
- परीक्षण: जैसे ही स्विच को ऑन करके गेट पर +12 {V} दिया जाता है, IGBT का इंटरनल चैनल ऑन हो जाता है, और लैंप पूरी चमक के साथ जलने लगता है। गेट से वोल्टेज हटाते ही लैंप तुरंत बंद हो जाता है।
- MOSFET और IGBT दोनों ESD (Electrostatic Discharge) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। इन्हें नंगे हाथों से छूने से पहले अपने हाथों की स्टेटिक बिजली को किसी मेटल को छूकर डिस्चार्ज कर लें।
- परीक्षण सर्किट में गेट वोल्टेज को कभी भी उनकी अधिकतम सीमा (आमतौर पर pm20 {V}) से ऊपर न जाने दें, अन्यथा गेट की पतली ऑक्साइड परत हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगी।
पिन कॉन्फ़िगरेशन (TO-220 पैकेज - सामने से देखने पर): > बाएं से दाएं: 1 = Gate (G), 2 = Drain (D), 3 = Source (S)। (पीछे का मेटल टैब आंतरिक रूप से Drain से जुड़ा होता है)।
B. डिजिटल मल्टीमीटर (DMM) द्वारा MOSFET का परीक्षण
MOSFET का गेट (Gate) पूरी तरह इंसुलेटेड होता है, इसलिए यह एक कैपेसिटर की तरह चार्ज को होल्ड कर सकता है। परीक्षण के लिए मल्टीमीटर को Diode Test Mode पर सेट करें:
C. MOSFET के लिए हीट सिंक (Heat Sinks)
तेज स्विचिंग के दौरान उत्पन्न गर्मी को निकालने के लिए उपयोग किए जाने वाले मुख्य प्रकार:
D. कम लोड के साथ MOSFET परीक्षण परिपथ (Test Circuit)
2. IGBT (Insulated Gate Bipolar Transistor)
IGBT के इनपुट कैरेक्टरिस्टिक्स MOSFET जैसे (High Impedance Gate) और आउटपुट कैरेक्टरिस्टिक्स BJT जैसे (Low Saturation Voltage) होते हैं।
A. नंबर द्वारा पहचान
IGBT आमतौर पर भारी करंट के लिए TO-247 या बड़े मॉड्यूल पैकेज में आते हैं:
पिन कॉन्फ़िगरेशन (TO-247 पैकेज - सामने से देखने पर): > बाएं से दाएं: 1 = Gate (G), 2 = Collector (C), 3 = Emitter (E)।
B. डिजिटल मल्टीमीटर (DMM) द्वारा IGBT का परीक्षण
मल्टीमीटर को Diode Test Mode पर सेट करें:
C. कम लोड के साथ IGBT परीक्षण परिपथ
लैब सुरक्षा निर्देश (Safety Tips)
ऑप्टो इलेक्ट्रॉनिक्स
डीसी सप्लाई से एलईडी का परीक्षण करें और मल्टीमीटर का उपयोग करके वोल्टेज ड्रॉप और करंट मापें।
फोटोवोल्टिक सेल का परीक्षण करने के लिए एक सर्किट बनाएं। फोटो डायोड/ट्रांजिस्टर का उपयोग करके लैंप लोड को स्विच करने के लिए एक सर्किट बनाएं।
ऑप्टो कपलर के इनपुट और आउटपुट टर्मिनलों की पहचान करें और इनपुट/आउटपुट टर्मिनलों के बीच अलगाव की मात्रा मापें और स्विच को जोड़कर रिले को संचालित करें।
ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स (Optoelectronics) इलेक्ट्रॉनिक्स की वह शाखा है जो प्रकाश (Light) और बिजली (Electricity) के आपसी संबंध पर काम करती है। इसमें प्रकाश उत्सर्जित करने वाले (LED), प्रकाश से चालू होने वाले (Photo diode/transistor), और प्रकाश के माध्यम से सर्किट को अलग रखने वाले (Optocoupler) घटक शामिल हैं।
नीचे आपके प्रैक्टिकल के लिए आवश्यक सभी सर्किट डिज़ाइन, टर्मिनल पहचान और परीक्षण विधियाँ दी गई हैं:
1. LED का परीक्षण, वोल्टेज ड्रॉप और करंट मापना
LED (Light Emitting Diode) को हमेशा करंट-सीमित रेसिस्टर (Current Limiting Resistor) के साथ जोड़ा जाता है, अन्यथा यह अत्यधिक करंट के कारण तुरंत जल जाएगी।
सर्किट की बनावट:
परीक्षण और मापने की विधि:
- एलईडी पहचान: LED की लंबी टांग Anode (+) और छोटी टांग Cathode (-) होती है। LED के अंदर देखने पर जो छोटा हिस्सा होता है वह एनोड है, और बड़ा चम्मच जैसा हिस्सा कैथोड है।
- करंट (I) मापना: डिजिटल मल्टीमीटर (DMM) को DC Current Mode (mA) पर सेट करें। इसे सर्किट के सीरीज (Series) में जोड़ें (जैसा ऊपर दिखाया गया है)। आप देखेंगे कि एक सामान्य लाल/हरी LED के लिए करंट लगभग 10 {mA} से 20 {mA} के बीच आता है।
- वोल्टेज ड्रॉप (V_D) मापना: मल्टीमीटर को DC Voltage Mode पर सेट करें। इसके प्रोब्स को चालू सर्किट में सीधे LED के दोनों सिरों पर (Parallel में) लगाएं (लाल प्रोब एनोड पर, काला कैथोड पर)।
- अनुमानित वोल्टेज ड्रॉप: लाल LED के लिए approx 1.8 {V} - 2.0 {V}, हरी/नीली LED के लिए approx 3.0 {V} - 3.3 {V}।
2. फोटोवोल्टिक सेल और फोटो डायोड/ट्रांजिस्टर सर्किट
A. फोटोवोल्टिक सेल (सौर सेल) का परीक्षण सर्किट
फोटोवोल्टिक सेल प्रकाश ऊर्जा को सीधे वोल्टेज (DC) में बदलता है।
- बनावट: सेल के पॉजिटिव और नेगेटिव टर्मिनलों को सीधे एक मल्टीमीटर (DC Voltage Mode) से जोड़ें।
- परीक्षण: जब सेल पर अंधेरा होगा, तो वोल्टेज शून्य के करीब होगा। जब इस पर टॉर्च या सूरज की रोशनी डाली जाएगी, तो वोल्टेज बढ़ेगा। एक छोटा लोड रेसिस्टर (100 Omega) समानांतर में जोड़कर आप करंट (mA) भी माप सकते हैं।
B. फोटो डायोड/ट्रांजिस्टर द्वारा लैंप/रिले स्विचिंग सर्किट
फोटो ट्रांजिस्टर का बेस प्रकाश (Light) के प्रति संवेदनशील होता है। जब इस पर प्रकाश पड़ता है, तो यह चालू (ON) हो जाता है।
-
बनावट: * +5 {V} या +12 {V} की सप्लाई लें।
- फोटो ट्रांजिस्टर के Collector को सीधा V_{CC} से जोड़ें।
- इसके Emitter से एक सामान्य NPN ट्रांजिस्टर (जैसे BC547) के Base को जोड़ें।
- BC547 के Collector पर एक रिले कॉइल (सुरक्षा डायोड 1N4007 के साथ) जोड़ें, जो आपके लैंप लोड को चलाएगा।
- परीक्षण: जब फोटो ट्रांजिस्टर पर प्रकाश (Light) डाला जाता है, तो यह ऑन होकर BC547 के बेस को करंट देता है। BC547 ऑन होते ही रिले को सक्रिय कर देता है और लैंप जल जाता है। प्रकाश हटाते ही सब बंद हो जाता है।
3. ऑप्टो-कपलर (Optocoupler / Optoisolator) का परीक्षण
ऑप्टो-कपलर (जैसे IC 4N35 या PC817) का उपयोग दो सर्किटों के बीच इलेक्ट्रिकल आइसोलेशन (Isolation) देने के लिए किया जाता है ताकि हाई-वोल्टेज सर्किट का झटका लो-वोल्टेज सर्किट (जैसे माइक्रोकंट्रोलर) को न लगे। इसके अंदर इनपुट पर एक LED और आउटपुट पर एक फोटो ट्रांजिस्टर होता है।
A. इनपुट और आउटपुट टर्मिनलों की पहचान (PC817 - 4 Pin IC)
IC के ऊपर बने डॉट (Notch) को बाईं तरफ रखकर पिन गिनें:
- पिन 1: Anode (आंतरिक LED का +)
- पिन 2: Cathode (आंतरिक LED का -)
- पिन 3: Emitter (आंतरिक फोटो-ट्रांजिस्टर का)
- पिन 4: Collector (आंतरिक फोटो-ट्रांजिस्टर का)
B. अलगाव (Isolation) की मात्रा मापना
चूंकि इनपुट (पिन 1, 2) और आउटपुट (पिन 3, 4) के बीच कोई भौतिक तार का कनेक्शन नहीं होता (वे केवल प्रकाश से जुड़े होते हैं), इसलिए उनके बीच प्रतिरोध अनंत होना चाहिए।
- विधि: मल्टीमीटर को Highest Resistance Range (M Omega) पर सेट करें।
- मापन: एक प्रोब को पिन 1 (इनपुट) पर और दूसरे प्रोब को पिन 4 (आउटपुट) पर रखें। मल्टीमीटर पर 'OL' (अनंत प्रतिरोध) दिखाना चाहिए। यह साबित करता है कि दोनों पक्षों के बीच पूर्ण इलेक्ट्रिकल अलगाव (High Isolation) है।
C. स्विच और रिले नियंत्रण सर्किट (Switching Relay using Optocoupler)
यह सर्किट दिखाता है कि कैसे एक कम पावर का स्विच ऑप्टो-कपलर के माध्यम से एक रिले को सुरक्षित रूप से चला सकता है।
-
सर्किट की बनावट:
- इनपुट साइड (लो पावर): +5 {V} सप्लाई से एक पुश-बटन स्विच और 330 Omega का रेसिस्टर जोड़कर ऑप्टो-कपलर के पिन 1 (Anode) पर दें। पिन 2 (Cathode) को ग्राउंड करें।
- आउटपुट साइड (हाई पावर - पूरी तरह अलग सप्लाई): एक अलग +12 {V} पावर सप्लाई लें। इसके पॉजिटिव को पिन 4 (Collector) से जोड़ें। पिन 3 (Emitter) को एक बाहरी रिले चलाने वाले ट्रांजिस्टर (BC547) के बेस से जोड़ें। रिले को ट्रांजिस्टर के कलेक्टर और +12 {V} के बीच जोड़ें।
- परीक्षण (Testing): जब आप इनपुट साइड का पुश-बटन दबाते हैं, तो ऑप्टो-कपलर के अंदर की LED जलती है। यह प्रकाश अंदर के फोटो ट्रांजिस्टर पर पड़ता है, जिससे आउटपुट साइड का ट्रांजिस्टर ऑन हो जाता है। इसके ऑन होते ही रिले सक्रिय (ON) हो जाता है और 'कट' की आवाज आती है। यदि आउटपुट साइड में कोई शॉर्ट-सर्किट होता भी है, तो इनपुट साइड का स्विच और ऑपरेटर पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे।
बुनियादी गेट्स
विभिन्न लॉजिक गेट्स (AND, OR, NAND, NOR, EX-OR, EX-NOR, NOT ICs) को उन पर छपे नंबर से पहचानें।
स्विच और LED लगाकर सभी लॉजिक गेट ICs की सत्य सारणी सत्यापित करें।
NAND और NOR गेट्स का उपयोग करके सभी गेट्स की सत्य सारणी बनाएं और सत्यापित करें। विभिन्न डिजिटल ICs (TTL और CMOS) का परीक्षण करने के लिए डिजिटल IC टेस्टर का उपयोग करें।
डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स (Digital Electronics) में लॉजिक गेट्स (Logic Gates) बुनियादी निर्माण खंड (Building Blocks) होते हैं। नीचे आपके प्रैक्टिकल के लिए लॉजिक गेट्स की पहचान, उनके IC नंबर, सत्य सारणी (Truth Table) के सत्यापन और यूनिवर्सल गेट्स (NAND/NOR) के उपयोग की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. लॉजिक गेट ICs की नंबर द्वारा पहचान (Identification of Logic Gate ICs)
डिजिटल लॉजिक गेट्स आमतौर पर TTL (Transistor-Transistor Logic) 74-सीरीज की IC के रूप में लैब में मिलते हैं। ये 14-पिन की Dual In-line Package (DIP) IC होती हैं।
|
गेट का नाम (Gate) |
IC नंबर (TTL) |
विवरण (Description) |
|---|---|---|
|
NOT |
7404 |
हेक्स इन्वर्टर (इसमें 6 NOT गेट होते हैं) |
|
AND |
7408 |
क्वाड 2-इनपुट AND गेट (इसमें 4 AND गेट होते हैं) |
|
OR |
7432 |
क्वाड 2-इनपुट OR गेट (इसमें 4 OR गेट होते हैं) |
|
NAND |
7400 |
क्वाड 2-इनपुट NAND गेट (यूनिवर्सल गेट) |
|
NOR |
7402 |
क्वाड 2-इनपुट NOR गेट (यूनिवर्सल गेट - इसकी पिन बनावट उल्टी होती है) |
|
EX-OR (XOR) |
7486 |
क्वाड 2-इनपुट EX-OR गेट |
|
EX-NOR (XNOR) |
74266 / 747266 |
क्वाड 2-इनपुट EX-NOR गेट |
महत्वपूर्ण पिन कनेक्शन: लगभग सभी 74-सीरीज IC में पिन 7 = Ground (0V) और पिन 14 = V_{CC} (+5V) होता है (IC 7402 को छोड़कर, जिसकी आंतरिक पिन मैपिंग अलग होती है)।
2. स्विच और LED लगाकर सत्य सारणी सत्यापित करना
लॉजिक गेट्स की सत्य सारणी (Truth Table) की जांच करने के लिए हम ब्रेडबोर्ड पर एक साधारण परीक्षण सर्किट बनाते हैं।
सर्किट की बनावट (Construction):
- पावर सप्लाई: ब्रेडबोर्ड की ऊपरी लाइनों में +5V (VCC) और ग्राउंड (GND) कनेक्ट करें।
- IC प्लेसमेंट: IC (जैसे 7408) को ब्रेडबोर्ड के बीच वाले हिस्से (Channel) में लगाएं। पिन 14 को +5V से और पिन 7 को ग्राउंड से जोड़ें।
- इनपुट स्विच (SPDT या पुश बटन): दो स्विच लगाएं। स्विच का एक सिरा +5V (लॉजिक 1) से और दूसरा सिरा ग्राउंड (लॉजिक 0) से जुड़ा हो। इन स्विच के आउटपुट को IC के इनपुट पिन (पिन 1 और पिन 2) से जोड़ें।
- आउटपुट LED: IC की आउटपुट पिन (पिन 3) से एक 330 Omega का रेसिस्टर सीरीज में जोड़ते हुए एक LED के एनोड (+) को जोड़ें। LED का कैथोड (-) ग्राउंड से कनेक्ट करें।
सत्यापन (Verification):
स्विचों की स्थिति बदलकर (0 या 1) LED के जलने (1) या बुझने (0) की जांच करें:
- AND (7408): LED केवल तभी जलेगी जब दोनों इनपुट 1 (HIGH) होंगे।
- OR (7432): LED तब जलेगी जब कोई भी एक या दोनों इनपुट 1 होंगे।
- NOT (7404): इनपुट 0 देने पर LED जलेगी, इनपुट 1 देने पर बुझ जाएगी।
3. NAND और NOR गेट्स का उपयोग करके अन्य गेट्स बनाना (Universal Gates)
NAND और NOR को यूनिवर्सल गेट (Universal Gates) कहा जाता है क्योंकि केवल इनका उपयोग करके किसी भी अन्य लॉजिक गेट (AND, OR, NOT, XOR) का निर्माण किया जा सकता है।
A. NAND गेट (IC 7400) का उपयोग करके:
- NOT गेट: NAND गेट के दोनों इनपुट को आपस में शॉर्ट (जोड़) कर दें और एक इनपुट दें।
- AND गेट: एक NAND गेट के आउटपुट को दूसरे NAND गेट (जो NOT की तरह जुड़ा हो) के इनपुट में दें।
- OR गेट: दो अलग-अलग NAND गेट्स को NOT बनाकर उनके आउटपुट को एक तीसरे NAND गेट के इनपुट में दें।
B. NOR गेट (IC 7402) का उपयोग करके:
- NOT गेट: NOR गेट के दोनों इनपुट को आपस में शॉर्ट कर दें।
- OR गेट: एक NOR गेट के आउटपुट को दूसरे NOR गेट (NOT मोड) के इनपुट में दें।
- AND गेट: दो अलग-अलग NOR गेट्स को NOT बनाकर उनके आउटपुट को तीसरे NOR गेट में दें।
परीक्षण विधि: इन कॉम्बिनेशनल सर्किटों को ब्रेडबोर्ड पर बनाएं और इनपुट देकर मूल गेट्स (AND, OR, NOT) की सत्य सारणी को दोबारा सत्यापित करें।
4. डिजिटल IC टेस्टर का उपयोग (Using Digital IC Tester)
जब सर्किट बड़ा होता है या IC खराब होने का संदेह होता है, तब हाथों से जांच करने के बजाय डिजिटल IC टेस्टर (Digital IC Tester) का उपयोग किया जाता है। यह TTL और CMOS दोनों प्रकार की डिजिटल IC का परीक्षण कर सकता है।
परीक्षण के चरण (Steps for Testing):
- पावर ऑन: IC टेस्टर मशीन को मुख्य पावर सप्लाई से जोड़कर ऑन करें।
- IC को लगाना (ZIF Socket): टेस्टर में एक ZIF (Zero Insertion Force) सॉकेट होता है। इसके लीवर को ऊपर उठाएं, IC को सॉकेट में इस तरह रखें कि IC का नॉच (कट) ऊपर की तरफ हो, फिर लीवर को नीचे दबाकर लॉक कर दें। (आमतौर पर IC को सॉकेट के निचले हिस्से से संरेखित किया जाता है)।
- IC नंबर दर्ज करना: टेस्टर के कीपैड का उपयोग करके IC का नंबर टाइप करें (जैसे 7408 या 7432) और Enter / Test बटन दबाएं।
- परिणाम (Result): * यदि IC सही है, तो डिस्प्ले पर "PASS" या "IC OK" लिखा आएगा।
- यदि IC के अंदर का कोई गेट खराब है, तो डिस्प्ले पर "FAIL" या खराब पिन का नंबर (जैसे Pin 3 Faulty) दिखाई देगा।
TTL और CMOS में अंतर:
- TTL (74 Series): ये बाइपोलर ट्रांजिस्टर से बनी होती हैं, इन्हें केवल 5V की सटीक सप्लाई की आवश्यकता होती है। ये तेज होती हैं लेकिन बिजली ज्यादा लेती हैं।
- CMOS (40 Series - जैसे 4011 NAND): ये MOSFET से बनी होती हैं। ये 3V से 15V के विस्तृत वोल्टेज पर काम कर सकती हैं और बहुत कम बिजली की खपत करती हैं। कुछ आधुनिक IC टेस्टर स्वचालित रूप से (Auto-search) पहचान लेते हैं कि IC, TTL है या CMOS।
संयोजनात्मक परिपथ
आईसी का उपयोग करके हाफ एडर परिपथ बनाएं और सत्य सारणी को सत्यापित करें। साथ ही, आईसी का उपयोग करके दो हाफ एडर के साथ फुल एडर परिपथ बनाएं और सत्य सारणी को सत्यापित करें। एडर-कम-सबट्रैक्टर परिपथ बनाएं और परिणाम को सत्यापित करें।
2 से 4 डिकोडर, 4 से 2 एनकोडर, 4 से 1 मल्टीप्लेक्सर और 1 से 4 डीसी मल्टीप्लेक्सर बनाएं और उनका परीक्षण करें।
संयोजनात्मक परिपथ (Combinational Circuits) वे डिजिटल सर्किट होते हैं जिनका आउटपुट केवल वर्तमान इनपुट (Present Inputs) पर निर्भर करता है, इसमें कोई मेमोरी तत्व (जैसे फ्लिप-फ्लॉप) नहीं होता।
नीचे आपके लैब प्रयोगों के लिए एडर, सबट्रैक्टर, डिकोडर, एनकोडर, मल्टीप्लेक्सर और डीमल्टीप्लेक्सर सर्किट की विस्तृत गाइड और उनकी सत्य सारणी (Truth Table) दी गई है:
1. एडर और सबट्रैक्टर परिपथ (Adder & Subtractor Circuits)
A. हाफ एडर (Half Adder)
हाफ एडर दो बाइनरी बिट्स (A और B) को जोड़ता है और दो आउटपुट देता है: Sum (S) और Carry (C)।
- आवश्यक IC: 7486 (EX-OR गेट - Sum के लिए), 7408 (AND गेट - Carry के लिए)।
- लॉजिक सूत्र: Sum = A oplus B, Carry = A cdot B
सत्य सारणी (Truth Table):
|
इनपुट A |
इनपुट B |
आउटपुट Sum (S) |
आउटपुट Carry (C) |
|---|---|---|---|
|
0 |
0 |
0 |
0 |
|
0 |
1 |
1 |
0 |
|
1 |
0 |
1 |
0 |
|
1 |
1 |
0 |
1 |
B. दो हाफ एडर का उपयोग करके फुल एडर (Full Adder using Two Half Adders)
फुल एडर तीन बिट्स (A, B, और पिछली स्टेज की कैरी C_{in}) को जोड़ता है। इसे दो हाफ एडर और एक OR गेट का उपयोग करके बनाया जाता है।
- आवश्यक IC: 7486 (EX-OR), 7408 (AND), 7432 (OR गेट)।
- परीक्षण विधि: तीनों इनपुट को स्विच से जोड़ें और आउटपुट Sum तथा Carry पर LED लगाएं। जब तीनों इनपुट 1 होंगे, तो Sum = 1 और Carry = 1 (दोनों LED जलेंगी)।
C. एडर-कम-सबट्रैक्टर परिपथ (4-Bit Adder-cum-Subtractor)
यह एक ऐसा सर्किट है जो एक कंट्रोल सिग्नल (Mode M) के आधार पर जोड़ (Addition) या घटाव (Subtraction) दोनों कार्य कर सकता है। इसके लिए IC 7483 (4-bit Binary Full Adder) और IC 7486 (XOR Gates) का उपयोग किया जाता है।
- बनावट: इनपुट संख्या A को सीधे IC 7483 के इनपुट (A_3 A_2 A_1 A_0) पर दिया जाता है। दूसरी संख्या B के प्रत्येक बिट को एक-एक XOR गेट के माध्यम से गुजारकर IC 7483 के B इनपुट पर दिया जाता है। इन सभी XOR गेट्स का दूसरा इनपुट कंट्रोल लाइन M से जुड़ा होता है। M लाइन को ही IC 7483 की C_{in} (इन्पुट कैरी) से भी जोड़ा जाता है।
-
कार्यप्रणाली और सत्यापन:
- जब M = 0 (Adder Mode): XOR गेट्स इनपुट B को बिना बदले पास कर देते हैं और C_{in} = 0 होती है। सर्किट सामान्य रूप से A + B जोड़ता है।
- जब M = 1 (Subtractor Mode): XOR गेट्स इनपुट B को इनवर्ट (उल्टा) कर देते हैं (1's Complement)। चूंकि C_{in} = 1 है, इसलिए यह 1's Complement में 1 जोड़कर 2's Complement (A + (-B)) बना देता है, जिससे घटाव का परिणाम (A - B) प्राप्त होता है।
2. डिकोडर और एनकोडर (Decoder & Encoder)
A. 2 से 4 डिकोडर (2 to 4 Decoder)
यह n इनपुट लाइनों को 2^n आउटपुट लाइनों में बदलता है। 2-to-4 डिकोडर में दो इनपुट (A, B) और चार आउटपुट (Y_0, Y_1, Y_2, Y_3) होते हैं। इसमें एक Enable (E) पिन भी होती है।
- आवश्यक IC: 7404 (NOT) और 7408 (AND) या सीधे IC 74139।
सत्य सारणी (जब Enable = 1 एक्टिव हो):
|
Enable (E) |
इनपुट A |
इनपुट B |
Y_3 |
Y_2 |
Y_1 |
Y_0 |
|---|---|---|---|---|---|---|
|
0 |
X |
X |
0 |
0 |
0 |
0 |
|
1 |
0 |
0 |
0 |
0 |
0 |
1 |
|
1 |
0 |
1 |
0 |
0 |
1 |
0 |
|
1 |
1 |
0 |
0 |
1 |
0 |
0 |
|
1 |
1 |
1 |
1 |
0 |
0 |
0 |
B. 4 से 2 एनकोडर (4 to 2 Encoder)
यह डिकोडर का बिल्कुल उल्टा काम करता है। यह 2^n इनपुट लाइनों को n आउटपुट लाइनों में बदलता है।
- आवश्यक IC: 7432 (OR गेट)।
- लॉजिक सूत्र: यदि चार इनपुट D_0, D_1, D_2, D_3 हैं और आउटपुट A, B हैं, तो: A = D_2 + D_3 और B = D_1 + D_3
- परीक्षण: ब्रेडबोर्ड पर इनपुट लाइनों में से किसी एक को 1 करने पर आउटपुट LED बाइनरी कोड (00, 01, 10, 11) प्रदर्शित करेंगी।
3. मल्टीप्लेक्सर और डीमल्टीप्लेक्सर (Multiplexer & De-multiplexer)
A. 4 से 1 मल्टीप्लेक्सर (4 to 1 MUX)
मल्टीप्लेक्सर को डेटा सेलेक्टर (Data Selector) भी कहा जाता है। इसमें कई इनपुट होते हैं लेकिन आउटपुट केवल एक होता है। कौन सा इनपुट आउटपुट पर जाएगा, यह सेलेक्ट लाइनों (Select Lines) द्वारा तय होता है।
- बनावट: 4 इनपुट (I_0, I_1, I_2, I_3) के लिए 2 सेलेक्ट लाइनें (S_0, S_1) आवश्यक हैं। इसके लिए IC 74153 (Dual 4:1 MUX) का उपयोग किया जाता है।
सत्य सारणी (Truth Table):
|
सेलेक्ट S_1 |
सेलेक्ट S_0 |
आउटपुट (Y) |
|---|---|---|
|
0 |
0 |
I_0 (इनपुट 0 आउटपुट पर जाएगा) |
|
0 |
1 |
I_1 (इनपुट 1 आउटपुट पर जाएगा) |
|
1 |
0 |
I_2 (इनपुट 2 आउटपुट पर जाएगा) |
|
1 |
1 |
I_3 (इनपुट 3 आउटपुट पर जाएगा) |
B. 1 से 4 डीमल्टीप्लेक्सर (1 to 4 DEMUX / डेटा डिस्ट्रीब्यूटर)
यह मल्टीप्लेक्सर का ठीक उल्टा काम करता है। इसमें केवल एक इनपुट (D_{in}) होता है, जिसे सेलेक्ट लाइनों (S_0, S_1) के आधार पर चार आउटपुट लाइनों (Y_0, Y_1, Y_2, Y_3) में से किसी एक पर भेजा जाता है।
- आवश्यक IC: इसके लिए IC 74155 या 2-to-4 डिकोडर (जैसे IC 74139) का उपयोग किया जा सकता है, जहाँ डिकोडर की 'Enable' पिन को मुख्य डेटा इनपुट (D_{in}) की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
परीक्षण की विधि: सेलेक्ट लाइनों (S_1, S_0) की स्थिति बदलें। आप देखेंगे कि मुख्य इनपुट पिन पर दिया गया सिग्नल (HIGH या LOW) केवल उसी विशेष आउटपुट LED पर दिखाई देगा जिसे सेलेक्ट लाइनों द्वारा चुना गया है, बाकी सभी आउटपुट शून्य रहेंगे।
फ्लिप फ्लॉप
फ्लिप फ्लॉप (ICs) पर छपे नंबर से उनकी पहचान करें।
7475 का उपयोग करके चार-बिट लैच बनाएं और उसका परीक्षण करें। IC7400 का उपयोग करके क्लॉक पल्स के साथ और बिना क्लॉक पल्स के R-S फ्लिप फ्लॉप बनाएं और उसका परीक्षण करें।
फ्लिप-फ्लॉप (Flip-Flops) डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स के सबसे बुनियादी मेमोरी तत्व (Memory Elements) हैं। ये एक बिट (1 या 0) डेटा को स्टोर कर सकते हैं। ये क्रमिक परिपथ (Sequential Circuits) के अंतर्गत आते हैं क्योंकि इनका आउटपुट वर्तमान इनपुट के साथ-साथ पिछले आउटपुट (Past Output) पर भी निर्भर करता है।
नीचे आपके प्रैक्टिकल के लिए फ्लिप-फ्लॉप की पहचान, सर्किट निर्माण और परीक्षण की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. फ्लिप-फ्लॉप ICs की नंबर द्वारा पहचान (Identification of ICs)
लैब में फ्लिप-फ्लॉप मुख्य रूप से निम्नलिखित TTL IC के रूप में मिलते हैं:
|
IC नंबर |
विवरण (Description) |
पिन संख्या |
|---|---|---|
|
7475 |
क्वाड डिस्टिंक्ट बिस्टेबल D-Type Latch (इसमें 4 लैच होते हैं) |
16-पिन |
|
7474 |
डुअल D-Type पॉजिटिव-एज ट्रिगर्ड फ्लिप-फ्लॉप (Preset और Clear के साथ) |
14-पिन |
|
74107 |
डुअल JK फ्लिप-फ्लॉप (Clear पिन के साथ) |
14-पिन |
|
7476 |
डुअल JK मास्टर-स्लेव (MSJK) फ्लिप-फ्लॉप (Preset और Clear के साथ) |
16-पिन |
|
7400 |
क्वाड 2-इनपुट NAND गेट (इसका उपयोग बेसिक RS फ्लिप-फ्लॉप बनाने में होता है) |
14-पिन |
2. 4-बिट लैच (IC 7475) और RS फ्लिप-फ्लॉप (IC 7400) का निर्माण
A. IC 7475 का उपयोग करके 4-बिट लैच (4-Bit Latch)
D-लैच एक लेवल-ट्रिगर्ड (Level-triggered) डिवाइस है, यानी जब तक इनेबल (Enable) पिन HIGH रहेगी, आउटपुट इनपुट का पीछा करेगा।
- बनावट (Construction): IC 7475 में 4 इनपुट (D_0, D_1, D_2, D_3) और 4 आउटपुट (Q_0, Q_1, Q_2, Q_3) होते हैं। इसमें दो इनेबल पिन होती हैं: पिन 4-13 (लैच 1 और 2 के लिए) और पिन 12-5 (लैच 3 और 4 के लिए)।
- परीक्षण विधि: 1. इन दोनों इनेबल पिन्स को आपस में जोड़कर एक मुख्य 'Enable' (या G) स्विच से जोड़ें। 2. चारों इनपुट पर डेटा स्विच (0 या 1) कनेक्ट करें और चारों Q आउटपुट पर LED लगाएं। 3. जांच: जब Enable = 1 हो, तो इनपुट बदलने पर आउटपुट तुरंत बदलेगा। जब Enable = 0 कर दिया जाए, तो इनपुट बदलने पर भी आउटपुट पर पिछला डेटा ही लॉक (Latch) रहेगा।
B. IC 7400 (NAND) का उपयोग करके RS फ्लिप-फ्लॉप
1. बिना क्लॉक पल्स के (Unclocked / Basic RS Latch)
- बनावट: दो NAND गेट्स को क्रॉस-कपलिंग (Cross-coupling) करके बनाया जाता है। पहले गेट का आउटपुट (Q) दूसरे के इनपुट में और दूसरे का आउटपुट (bar{Q}) पहले के इनपुट में जाता है। इसके इनपुट एक्टिव-लो (bar{R} और bar{S}) होते हैं।
- सत्यापन: जब S=0, R=1 rightarrow Q=1 (Set)। जब S=1, R=0 rightarrow Q=0 (Reset)। जब दोनों इनपुट 1 हों, तो आउटपुट में कोई बदलाव नहीं होता (No Change)।
2. क्लॉक पल्स के साथ (Clocked RS Flip-Flop)
- बनावट: बेसिक लैच के आगे दो और NAND गेट जोड़े जाते हैं, जिनका एक-एक इनपुट एक कॉमन क्लॉक (CLK) लाइन से जुड़ा होता है।
- परीक्षण: जब क्लॉक स्विच '0' (LOW) होगा, तो R और S की स्थिति बदलने पर भी आउटपुट Q और \bar{Q} में कोई बदलाव नहीं होगा। आउटपुट केवल तभी बदलेगा जब क्लॉक पल्स '1' (HIGH) होगी।
3. सभी फ्लिप-फ्लॉप ICs की सत्य सारणी का सत्यापन (Truth Tables)
ब्रेडबोर्ड पर इनपुट के लिए स्विच और आउटपुट के लिए दो LED (Q और bar{Q}) जोड़कर निम्नलिखित सत्य सारणी को सत्यापित करें:
A. RS फ्लिप-फ्लॉप (Clocked)
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CLK |
S |
R |
Q_{next} |
स्थिति (State) |
|---|---|---|---|---|
|
1 |
0 |
0 |
Q |
No Change (अपरिवर्तित) |
|
1 |
0 |
1 |
0 |
Reset (रिसेट) |
|
1 |
1 |
0 |
1 |
Set (सेट) |
|
1 |
1 |
1 |
X |
Invalid / Forbidden (अमान्य) |
B. D (Data) फ्लिप-फ्लॉप (IC 7474)
यह इनपुट को सीधे आउटपुट पर ट्रांसफर करता है, लेकिन केवल क्लॉक पल्स आने पर।
|
CLK |
D |
Q_{next} |
स्थिति (State) |
|---|---|---|---|
|
uparrow |
0 |
0 |
Reset |
|
uparrow |
1 |
1 |
Set |
C. T (Toggle) फ्लिप-फ्लॉप
(नोट: लैब में इसे अलग IC के बजाय JK फ्लिप-फ्लॉप के J और K इनपुट को आपस में शॉर्ट करके बनाया जाता है)।
|
CLK |
T |
Q_{next} |
स्थिति (State) |
|---|---|---|---|
|
uparrow |
0 |
Q |
No Change |
|
uparrow |
1 |
bar{Q} |
Toggle (बदलना - 0 का 1, 1 का 0) |
D. JK फ्लिप-फ्लॉप (IC 74107)
यह RS फ्लिप-फ्लॉप की अमान्य स्थिति (1,1) को सुधारता है। जब J=1, K=1 होता है, तो आउटपुट बदल (Toggle) जाता है।
|
CLK |
J |
K |
Q_{next} |
स्थिति (State) |
|---|---|---|---|---|
|
uparrow |
0 |
0 |
Q |
No Change |
|
uparrow |
0 |
1 |
0 |
Reset |
|
uparrow |
1 |
0 |
1 |
Set |
|
uparrow |
1 |
1 |
\bar{Q} |
Toggle (रेस-अराउंड समस्या हो सकती है) |
E. मास्टर-स्लेव JK फ्लिप-फ्लॉप (MSJK - IC 7476)
सामान्य JK फ्लिप-फ्लॉप में जब क्लॉक पल्स लंबे समय तक HIGH रहती है और इनपुट J=1, K=1 होता है, तो आउटपुट लगातार 0-1-0-1 बदलता रहता है, जिसे रेस-अराउंड स्थिति (Race-Around Condition) कहते हैं। इसे दूर करने के लिए मास्टर-स्लेव फ्लिप-फ्लॉप का उपयोग होता है।
- कार्यप्रणाली: इसमें दो फ्लिप-फ्लॉप सीरीज में होते हैं। पहला 'मास्टर' होता है जो क्लॉक के पॉजिटिव लेवल या एज पर इनपुट लेता है, और दूसरा 'स्लेव' होता है जो इनवर्टेड क्लॉक (Negative Edge) पर मास्टर के डेटा को आउटपुट पर भेजता है।
- परीक्षण: जब आप इनपुट J=1, K=1 सेट करेंगे और क्लॉक पल्स (CLK) को दबाकर छोड़ेंगे, तो आउटपुट बिना किसी गड़बड़ी के केवल एक बार टॉगल करेगा। यह रेस-अराउंड समस्या के पूरी तरह खत्म होने की पुष्टि करता है।
इलेक्ट्रॉनिक सर्किट सिम्युलेटर
सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके सरल डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट तैयार करें। तैयार किए गए डिजिटल और एनालॉग सर्किट का सिमुलेशन और परीक्षण करें।
तैयार सर्किट को लेआउट आरेख में परिवर्तित करें।
सिमुलेशन सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके सरल, पावर इलेक्ट्रॉनिक और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सर्किट तैयार करें।
इलेक्ट्रॉनिक सर्किट सिम्युलेटर (Electronic Circuit Simulator) का उपयोग करके किसी भी सर्किट को भौतिक रूप से (ब्रेडबोर्ड या पीसीबी पर) बनाने से पहले उसका परीक्षण और विश्लेषण किया जा सकता है। इससे समय की बचत होती है और घटक (Components) खराब होने का खतरा नहीं रहता।
इस प्रैक्टिकल को करने के लिए आप Proteus, Multisim, LTspice, or EasyEDA जैसे लोकप्रिय सिमुलेशन सॉफ़्टवेयर का उपयोग कर सकते हैं। नीचे तीनों श्रेणियों के सर्किट को तैयार करने, सिमुलेशन करने और लेआउट (PCB) में बदलने की पूरी प्रक्रिया दी गई है:
1. डिजिटल और एनालॉग सर्किट का निर्माण और सिमुलेशन
A. सरल डिजिटल सर्किट: NAND गेट से AND गेट बनाना
- घटक चुनना (Component Schematic): सॉफ़्टवेयर की लाइब्रेरी से 7400 (NAND IC), दो Logic State (इनपुट स्विच के लिए) और एक Logic Probe (आउटपुट LED के लिए) चुनें।
-
वायरिंग (Wiring): * पहले NAND गेट के दोनों इनपुट पर दो अलग-अलग Logic State स्विच जोड़ें।
- इसके आउटपुट को दूसरे NAND गेट के दोनों इनपुट को शॉर्ट (आपस में जोड़कर) करके उसमें दें।
- दूसरे गेट के आउटपुट पर Logic Probe जोड़ें।
- सिमुलेशन और परीक्षण (Simulation): सॉफ़्टवेयर में Run Simulation (Play Button) पर क्लिक करें। इनपुट स्विच को (0,0), (0,1), (1,0) और (1,1) बदलकर देखें। आउटपुट केवल (1,1) पर ही 1 (HIGH) होगा, जो AND गेट की सत्य सारणी को सत्यापित करता है।
B. सरल एनालॉग सर्किट: RC लो-पास फ़िल्टर (RC Low-Pass Filter)
- घटक चुनना: एक रेसिस्टर (R), एक कैपेसिटर (C), एक AC Sine Wave Generator और एक Ground चुनें।
- वायरिंग: जेनरेटर के सीरीज में रेसिस्टर लगाएं, फिर उसके बाद कैपेसिटर को ग्राउंड के समानांतर (Parallel) जोड़ें।
- परीक्षण उपकरण (Virtual Instruments): सर्किट के आउटपुट पर Oscilloscope (CRO) या Bode Plotter (Frequency Analysis) जोड़ें।
- सिमुलेशन: सिमुलेशन रन करें। इनपुट सिग्नल की आवृत्ति (Frequency) को कम से कम (जैसे 10 {Hz}) से लेकर अधिक (जैसे 50 {kHz}) तक बदलें। आप देखेंगे कि उच्च आवृत्ति पर आउटपुट वोल्टेज कम (Attenuate) हो जाता है, जो यह साबित करता है कि यह केवल कम आवृत्ति को पास करता है।
2. तैयार सर्किट को लेआउट आरेख (PCB Layout) में बदलना
जब सिमुलेशन में सर्किट सही ढंग से काम करने लगे, तो उसे प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) निर्माण के लिए लेआउट में बदला जाता है (जैसे Proteus में ISIS से ARES में या EasyEDA में Convert to PCB):
लेआउट बदलने के चरण (Steps for PCB Layout):
- फ़ुटप्रिंट संरेखण (Component Footprints): सुनिश्चित करें कि योजनाबद्ध (Schematic) आरेख के सभी घटकों का पीसीबी फ़ुटप्रिंट (जैसे TO-220, DIP-14) सही चुना गया है।
- नेटलिस्ट ट्रांसफर (Netlist Transfer): "Convert to PCB" बटन पर क्लिक करें। सभी घटकों के प्रतीक पीसीबी स्क्रीन पर आ जाएंगे और उनके बीच पतली हरी लाइनें (Ratsnest) दिखाई देंगी जो कनेक्शन दर्शाती हैं।
- बोर्ड की सीमा (Board Outline): पीसीबी का आकार (जैसे 50 {mm} × 50 {mm}) तय करने के लिए 'Board Outline' परत (Layer) का उपयोग करके एक बॉक्स बनाएं।
- घटकों को व्यवस्थित करना (Component Placement): कनेक्टर, स्विच और भारी घटकों को बोर्ड के किनारों पर रखें। ICs को बीच में रखें ताकि वायरिंग छोटी हो।
- रूटिंग (Routing / Track Design): * Auto-Router का उपयोग करें या हाथों से (Manual Routing) तांबे की लाइनें (Tracks) खींचें।
- पावर लाइनों (VCC/GND) के ट्रैक की चौड़ाई (Track Width) को सिग्नल लाइनों से मोटा रखें (जैसे पावर के लिए 30-40 mil और सिग्नल के लिए 15-20 mil)।
- 3D दृश्य (3D Visualization): पीसीबी का 3D व्यू देखें ताकि यह पता चल सके कि वास्तविक बोर्ड बनने के बाद कैसा दिखेगा। अंत में, पीसीबी प्रिंटिंग के लिए Gerber Files एक्सपोर्ट करें।
3. पावर इलेक्ट्रॉनिक और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सर्किट
A. पावर इलेक्ट्रॉनिक सर्किट: TRIAC आधारित AC फेज कंट्रोल (Dimmer Circuit)
- घटक चुनना: 230V AC Source, एक लैंप (Load), DIAC (जैसे HT32), TRIAC (जैसे BT136), पोटेंशियोमीटर (Variable Resistor), और एक कैपेसिटर।
- वायरिंग: AC फेज लाइन में लैंप और TRIAC के Main Terminals (MT1, MT2) को सीरीज में जोड़ें। पोटेंशियोमीटर और कैपेसिटर का उपयोग करके टाइमिंग सर्किट बनाएं और DIAC के माध्यम से TRIAC के Gate को ट्रिगर पल्स दें।
- सिमुलेशन और परीक्षण: सर्किट के आउटपुट (लैंप के समानांतर) पर वर्चुअल ऑसिलोस्कोप (CRO) जोड़ें। सिमुलेशन चलाएं और पोटेंशियोमीटर की वैल्यू बदलें। आप CRO पर AC वेवफॉर्म को कटते हुए (Phase Clipping) देखेंगे, जिससे लोड को मिलने वाली पावर कम या ज्यादा होगी।
B. घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सर्किट: स्वचालित रात का लैंप (Automatic Night Lamp)
यह सर्किट अंधेरा होने पर घरेलू लाइट को अपने आप ऑन कर देता है।
- घटक चुनना: 12V DC Supply, LDR (Light Dependent Resistor), 10 {k} Omega पोटेंशियोमीटर, NPN ट्रांजिस्टर (BC547), 12V रिले (Relay), 1N4007 डायोड, 230V AC Source और एक घरेलू बल्ब।
-
वायरिंग: * LDR और पोटेंशियोमीटर को वोल्टेज डिवाइडर की तरह जोड़कर ट्रांजिस्टर के Base पर दें।
- ट्रांजिस्टर के Collector पर 12V रिले कॉइल (सुरक्षा डायोड के साथ) जोड़ें।
- रिले के स्विचिंग कॉन्टैक्ट्स (NO और COM) की सीरीज में 230V AC सप्लाई और बल्ब को जोड़ें।
-
सिमुलेशन और परीक्षण: सॉफ़्टवेयर में LDR के पास एक टॉर्च का विकल्प होता है जिससे प्रकाश की तीव्रता को कम या ज्यादा किया जा सकता है।
- प्रकाश होने पर (Day): LDR का प्रतिरोध कम हो जाता है, जिससे ट्रांजिस्टर बंद रहता है और रिले सक्रिय नहीं होता (बल्ब बंद रहता है)।
- अंधेरा होने पर (Night): सिम्युलेटर में LDR पर अंधेरा करें। LDR का प्रतिरोध मेगा-ओम (M Omega) में चला जाएगा, ट्रांजिस्टर ऑन हो जाएगा, रिले 'क्लिक' की आवाज के साथ चालू होगा और 230V का घरेलू बल्ब जल उठेगा।
काउंटर और शिफ्ट रजिस्टर
7493 का उपयोग करके चार-बिट अतुल्यकालिक बाइनरी काउंटर बनाएं और उसका परीक्षण करें। 7493 को मॉड्यूलस-12 काउंटर के रूप में उपयोग करें।
74163 का उपयोग करके चार-बिट तुल्यकालिक बाइनरी काउंटर बनाएं और उसका परीक्षण करें। तुल्यकालिक डेकेड काउंटर बनाएं और उसका परीक्षण करें।
74190 का उपयोग करके अप/डाउन तुल्यकालिक डेकेड काउंटर बनाएं और उसका परीक्षण करें तथा एलईडी पर आउटपुट की निगरानी करें।
मल्टीमीटर का उपयोग करके कॉमन एनोड और कॉमन कैथोड सेवन सेगमेंट एलईडी डिस्प्ले की पहचान करें और उनका परीक्षण करें।
डिकोडर/ड्राइवर आईसी का उपयोग करके सेवन सेगमेंट डिस्प्ले पर दो अंकों की गिनती का मान प्रदर्शित करें।
RS/D/JK फ्लिप फ्लॉप का उपयोग करके एक शिफ्ट रजिस्टर बनाएं और परिणाम सत्यापित करें।
चार-बिट SIPO रजिस्टर, चार-बिट PIPO रजिस्टर और द्विदिशात्मक शिफ्ट रजिस्टर बनाएं और उनका परीक्षण करें।
डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में काउंटर (Counters) और शिफ्ट रजिस्टर (Shift Registers) क्रमिक परिपथ (Sequential Circuits) के सबसे महत्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं। इनका उपयोग डेटा को गिनने, स्टोर करने और ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है।
नीचे आपके लैब प्रैक्टिकल के लिए सभी सर्किटों का विस्तृत विवरण, आईसी पिन कॉन्फ़िगरेशन और परीक्षण की चरण-दर-चरण विधि दी गई है:
1. काउंटर परिपथ (Counter Circuits)
काउंटर दो प्रकार के होते हैं: अतुल्यकालिक (Asynchronous/Ripple) जिसमें एक फ्लिप-फ्लॉप का आउटपुट दूसरे की क्लॉक बनता है, और तुल्यकालिक (Synchronous) जिसमें सभी फ्लिप-फ्लॉप को एक साथ समान क्लॉक पल्स मिलती है।
A. IC 7493 द्वारा 4-बिट अतुल्यकालिक बाइनरी काउंटर
IC 7493 एक 4-बिट रिपल काउंटर आईसी है। इसके अंदर एक मॉड-2 (Mod-2) और एक मॉड-8 (Mod-8) काउंटर होता है।
- 4-बिट काउंटर के लिए कनेक्शन: 4-बिट पूरी गिनती (0 से 15) प्राप्त करने के लिए, बाहरी क्लॉक पल्स को पिन 14 (Input A) पर दें और पिन 12 (Output QA) को पिन 1 (Input B) से जोड़ें। पिन 2 और 3 (Reset pins R_0(1) और R_0(2)) को ग्राउंड (0V) करें। आउटपुट QD, QC, QB, QA पर LED लगाएं।
- मॉड्यूलस-12 (Mod-12) काउंटर के रूप में उपयोग: मॉड-12 काउंटर 0 से 11 तक गिनता है और जैसे ही 12 (बाइनरी: 1100) आता है, यह वापस 0 पर रीसेट हो जाता है।
- कनेक्शन: 12 नंबर पर QD=1 और QC=1 होता है। इसलिए, आउटपुट QD (पिन 11) और QC (पिन 8) को सीधे IC 7493 की रीसेट पिन्स पिन 2 और पिन 3 से जोड़ दें। जब काउंटर 12 पर पहुंचेगा, रीसेट पिन्स एक्टिव हो जाएंगी और काउंटर तुरंत 0000 पर आ जाएगा।
B. IC 74163 द्वारा 4-बिट तुल्यकालिक बाइनरी और डेकेड काउंटर
IC 74163 एक सिंक्रोनस 4-बिट काउंटर है जिसमें सिंक्रोनस क्लियर (Clear) की सुविधा होती है।
- 4-बिट बाइनरी काउंटर: पिन 1 (Clear), पिन 2 (CLK), पिन 7 (ENP), पिन 9 (Load), और पिन 10 (ENT) को HIGH (+5V) पर कनेक्ट करें। क्लॉक दबाने पर यह 0 से 15 तक गिनेगा।
- तुल्यकालिक डेकेड काउंटर (Mod-10): यह 0 से 9 तक गिनता है और 10 (बाइनरी: 1010) आने पर रीसेट होता है। चूंकि 74163 सिंक्रोनस है, इसलिए 9 (बाइनरी: 1001) आने पर ही हमें क्लियर पिन को सेट करना होता है ताकि अगली क्लॉक पल्स पर वह 0 हो जाए। इसके लिए QD और QB को एक NAND गेट के माध्यम से पिन 1 (Clear) से जोड़ा जाता है।
C. IC 74190 द्वारा अप/डाउन तुल्यकालिक डेकेड काउंटर
यह एक प्री-सेटेबल सिंक्रोनस अप/डाउन डिकेड (BCD) काउंटर है।
- कनेक्शन: पिन 14 पर क्लॉक पल्स दें। पिन 4 (overline{CE} - Count Enable) को ग्राउंड करें।
-
अप/डाउन नियंत्रण: पिन 5 (U/ bar{D}) नियंत्रण पिन है।
- जब पिन 5 को LOW (0V) किया जाता है, तो काउंटर Up Count (0, 1, 2...9) करता है।
- जब पिन 5 को HIGH (+5V) किया जाता है, तो काउंटर Down Count (9, 8, 7...0) करता है।
- आउटपुट पिन्स (QA, QB, QC, QD) पर लगी LED को देखकर गिनती की दिशा की निगरानी करें।
2. सेवन सेगमेंट डिस्प्ले (7-Segment Display) का परीक्षण और संचालन
सेवन सेगमेंट डिस्प्ले का उपयोग अंकों (0-9) को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इसमें 8 LED होती हैं (7 सेगमेंट के लिए और 1 डेसिमल पॉइंट के लिए)।
A. मल्टीमीटर द्वारा डिस्प्ले की पहचान और परीक्षण
मल्टीमीटर को Diode Test Mode पर सेट करें। डिस्प्ले के बीच वाले पिन्स (Common) पर एक प्रोब रखें और बाकी पिन्स पर दूसरा प्रोब छुएं:
- कॉमन कैथोड (Common Cathode): यदि मल्टीमीटर का काला (Negative) प्रोब बीच वाले कॉमन पिन पर रखने और लाल (Positive) प्रोब को अन्य पिन्स पर छूने से अलग-अलग सेगमेंट (a, b, c...) जलते हैं, तो यह कॉमन कैथोड डिस्प्ले है।
- कॉमन एनोड (Common Anode): यदि लाल (Positive) प्रोब को कॉमन पिन पर रखने और काले (Negative) प्रोब से अन्य पिन्स को छूने पर सेगमेंट जलते हैं, तो यह कॉमन एनोड डिस्प्ले है।
B. डिकोडर/ड्राइवर आईसी का उपयोग करके दो अंकों की गिनती प्रदर्शित करना
बाइनरी कोड (BCD) को सेवन सेगमेंट के समझने योग्य कोड में बदलने के लिए ड्राइवर आईसी का उपयोग होता है।
- कॉमन एनोड के लिए: IC 7447 का उपयोग किया जाता है।
- कॉमन कैथोड के लिए: IC 7448 का उपयोग किया जाता है।
दो अंकों की गिनती (00 से 99) का सर्किट:
इसके लिए दो काउंटर और दो डिस्प्ले ड्राइवर की आवश्यकता होगी (एक 'इकाई' के लिए और एक 'दहाई' के लिए):
- परीक्षण: जब पहला काउंटर 9 से 0 पर बदलता है, तो उसकी टर्मिनल काउंट (RCO) पल्स दूसरे काउंटर को एक क्लॉक देती है, जिससे दहाई का अंक बढ़ता है और डिस्प्ले पर 00 से 99 तक की गिनती पूरी तरह दिखाई देती है।
3. शिफ्ट रजिस्टर (Shift Registers)
शिफ्ट रजिस्टर फ्लिप-फ्लॉप की एक चेन होती है जिसका उपयोग बाइनरी डेटा को स्थानांतरित (Shift) करने के लिए किया जाता है।
A. फ्लिप-फ्लॉप का उपयोग करके बुनियादी शिफ्ट रजिस्टर
- बनावट: चार D फ्लिप-फ्लॉप (जैसे दो IC 7474) को सीरीज में जोड़ें। पहले फ्लिप-फ्लॉप का आउटपुट Q_0 दूसरे के इनपुट D_1 से जुड़ेगा, Q_1 तीसरे के D_2 से, इत्यादि। सभी फ्लिप-फ्लॉप की क्लॉक पिन्स को आपस में जोड़कर एक मुख्य क्लॉक स्विच से कनेक्ट करें।
- परीक्षण: पहले इनपुट पर 1 दें और क्लॉक बटन दबाएं। आप देखेंगे कि हर क्लॉक पल्स के साथ वह 1 अगले फ्लिप-फ्लॉप की LED पर ट्रांसफर (शिफ्ट) होता चला जाएगा।
B. 4-बिट SIPO और PIPO रजिस्टर
1. SIPO (Serial-In Parallel-Out)
- विशेषता: इसमें डेटा एक-एक करके सिर्फ एक तार से अंदर जाता है (Serial In), लेकिन आउटपुट सभी फ्लिप-फ्लॉप से एक साथ लिया जा सकता है (Parallel Out)।
- परीक्षण: मान लीजिए हमें 1011 स्टोर करना है। डेटा पिन पर 1 रखकर क्लॉक दबाएं, फिर 1 रखकर क्लॉक दबाएं, फिर 0 रखकर क्लॉक दबाएं, फिर 1 रखकर क्लॉक दबाएं। 4 क्लॉक पल्स के बाद सभी 4 आउटपुट LED पर एक साथ 1011 दिखाई देगा।
2. PIPO (Parallel-In Parallel-Out)
- विशेषता: इसमें 4 अलग-अलग इनपुट स्विच से डेटा सीधे सभी फ्लिप-फ्लॉप को एक साथ दिया जाता है (Parallel In) और एक ही क्लॉक पल्स में वह सीधे आउटपुट पर आ जाता है (Parallel Out)। इसके लिए IC 74195 या चार D-फ्लिप-फ्लॉप का उपयोग किया जा सकता है।
- परीक्षण: चारों इनपुट स्विच सेट करें (जैसे 1100)। क्लॉक पल्स दबाते ही आउटपुट तुरंत 1100 प्रदर्शित करेगा। इसे डेटा को तुरंत स्टोर करने के लिए बफर की तरह उपयोग किया जाता है।
3. द्विदिशात्मक शिफ्ट रजिस्टर (Bidirectional Shift Register)
यह रजिस्टर डेटा को सेलेक्ट पिन की स्थिति के आधार पर बाईं (Left) या दाईं (Right) किसी भी दिशा में शिफ्ट कर सकता है। इसके लिए सबसे उपयुक्त IC 74194 (4-Bit Universal Shift Register) है।
- परीक्षण और सत्यापन: IC 74194 में दो कंट्रोल पिन्स होते हैं (S_1, S_0):
- जब S_1=0, S_0=1 हो rightarrow Shift Right मोड सक्रिय होता है (डेटा QA rightarrow QB rightarrow QC rightarrow QD की ओर खिसकेगा)।
- जब S_1=1, S_0=0 हो rightarrow Shift Left मोड सक्रिय होता है (डेटा QD rightarrow QC rightarrow QB rightarrow QA की ओर खिसकेगा)।
- जब S_1=1, S_0=1 हो rightarrow Parallel Load होता है।
- इनपुट पिन्स की स्थिति बदलकर क्लॉक पल्स दें और LED के माध्यम से डेटा के खिसकने की दिशा की जांच करें।
ऑप-एम्प और टाइमर 555 के अनुप्रयोग
विभिन्न एनालॉग ICs का परीक्षण करने के लिए एनालॉग IC टेस्टर का उपयोग करें।
विभिन्न ऑप-एम्प सर्किट, जैसे इनवर्टिंग, नॉन-इनवर्टिंग और समिंग एम्पलीफायर, का निर्माण और परीक्षण करें।
डिफरेंशिएटर और इंटीग्रेटर, ज़ीरो क्रॉसिंग डिटेक्टर और इंस्ट्रूमेंटेशन एम्पलीफायर का निर्माण और परीक्षण करें।
बाइनरी वेटेड और R-2R लैडर प्रकार के डिजिटल-टू-एनालॉग कन्वर्टर का निर्माण और परीक्षण करें।
IC 555 का उपयोग करके एस्टेबल टाइमर सर्किट, मोनोस्टेबल टाइमर सर्किट, VCO (V से F) कन्वर्टर, पल्स विड्थ मॉड्यूलेटर के रूप में 555 टाइमर का निर्माण और परीक्षण करें।
ऑप-एम्प (Op-Amp - Operational Amplifier) और IC 555 टाइमर एनालॉग इलेक्ट्रॉनिक्स के दो सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं। इनका उपयोग सिग्नल प्रोसेसिंग, वेवफॉर्म जनरेशन और टाइमिंग सर्किट में बड़े पैमाने पर होता है।
नीचे आपके लैब प्रैक्टिकल के लिए इन दोनों ICs के अनुप्रयोगों, सर्किट डिज़ाइनों और परीक्षण विधियों की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. एनालॉग IC टेस्टर का उपयोग (Using Analog IC Tester)
डिजिटल IC टेस्टर की तरह ही एनालॉग IC टेस्टर का उपयोग ऑपरेशनल एम्पलीफायरों (जैसे mu {A}741), टाइमर्स (जैसे LM555), वोल्टेज रेगुलेटर (जैसे 7805) और अन्य एनालॉग ICs की कार्यक्षमता जांचने के लिए किया जाता है।
परीक्षण के चरण:
- पावर ऑन: टेस्टर मशीन को मुख्य सप्लाई से जोड़कर चालू करें।
- IC को लगाना: IC (जैसे 741 या 555) को ZIF सॉकेट में पिन 1 के सही ओरिएंटेशन (Notch को ऊपर रखकर) के साथ लगाएं और लीवर को लॉक करें।
- IC नंबर चुनना: कीपैड से 'Linear/Analog' मोड चुनें और IC का नंबर (जैसे 741 या 555) टाइप करके Test दबाएं।
- परिणाम: टेस्टर IC के महत्वपूर्ण मापदंडों (जैसे गेन, ऑफसेट वोल्टेज, आउटपुट स्विंग) को आंतरिक रूप से जांचता है और स्क्रीन पर "PASS/OK" या "FAIL" प्रदर्शित करता है।
2. बुनियादी ऑप-एम्प सर्किट (IC 741)
ऑप-एम्प IC 741 एक 8-पिन की IC है। इसके पिन 2 को Inverting (-), पिन 3 को Non-Inverting (+) और पिन 6 को Output (V_{out}) कहा जाता है। इसमें डुअल पावर सप्लाई (+12V पिन 7 पर और -12V पिन 4 पर) की आवश्यकता होती है।
A. इनवर्टिंग एम्पलीफायर (Inverting Amplifier)
यह सर्किट इनपुट सिग्नल को एम्पलीफाई (बड़ा) करता है और उसका फेज 180 डिग्री बदल देता है (पॉजिटिव इनपुट का नेगेटिव आउटपुट देता है)।
- बनावट: इनपुट वोल्टेज (V_{in}) को एक रेसिस्टर R_1 के माध्यम से पिन 2 (-) पर दें। पिन 3 (+) को सीधे ग्राउंड (0V) करें। पिन 2 और आउटपुट पिन 6 के बीच एक फीडबैक रेसिस्टर (R_f) जोड़ें।
- लॉजिक सूत्र: V_{out} = -left({R_f}/{R_1}right) cdot V_{in}
- परीक्षण: यदि R_f = 10 {k} Omega और R_1 = 1 {k} Omega है, तो गेन -10 होगा। यदि आप इनपुट पर 0.5 {V} DC देंगे, तो आउटपुट पर -5 {V} DC प्राप्त होगा।
B. नॉन-इनवर्टिंग एम्पलीफायर (Non-Inverting Amplifier)
यह सर्किट इनपुट सिग्नल को बिना फेज बदले (0 डिग्री फेज शिफ्ट) एम्पलीफाई करता है।
- बनावट: इनपुट वोल्टेज (V_{in}) को सीधे पिन 3 (+) पर दें। पिन 2 (-) को एक रेसिस्टर R_1 के माध्यम से ग्राउंड करें और पिन 2 से पिन 6 के बीच R_f जोड़ें।
- लॉजिक सूत्र: V_{out} = left(1 + {R_f}/{R_1}right) cdot V_{in}
C. समिंग एम्पलीफायर (Summing Amplifier / Adder)
यह सर्किट एक से अधिक इनपुट वोल्टेजों को आपस में जोड़कर आउटपुट देता है।
- बनावट: इनवर्टिंग एम्पलीफायर की तरह ही सर्किट बनाएं, लेकिन पिन 2 (-) पर R_1, R_2, R_3 के माध्यम से तीन अलग-अलग इनपुट वोल्टेज (V_1, V_2, V_3) दें।
- लॉजिक सूत्र (यदि सभी रेसिस्टर समान हों): V_{out} = -(V_1 + V_2 + V_3)
- परीक्षण: V_1 = 1 {V}, V_2 = 1.5 {V} देने पर आउटपुट पर -2.5 {V} मिलना चाहिए।
3. उन्नत ऑप-एम्प सर्किट
A. इंटीग्रेटर और डिफरेंशिएटर (Integrator & Differentiator)
- इंटीग्रेटर (समाकलक): इनवर्टिंग सर्किट में R_f की जगह एक कैपेसिटर (C_f) लगा दें। जब इसके इनपुट पर Square Wave सिग्नल दिया जाता है, तो कैपेसिटर के चार्जिंग-डिस्चार्जिंग के कारण आउटपुट पर Triangular Wave (त्रिकोणीय तरंग) प्राप्त होती है।
- डिफरेंशिएटर (अवकलक): इनपुट रेसिस्टर R_1 की जगह एक कैपेसिटर (C_1) लगा दें और फीडबैक में R_f रहने दें। जब इसके इनपुट पर Triangular Wave दी जाती है, तो आउटपुट पर Square Wave प्राप्त होती है। इसे ऑसिलोस्कोप (CRO) पर देखें।
B. ज़ीरो क्रॉसिंग डिटेक्टर (Zero Crossing Detector - ZCD)
यह एक ओपन-लूप कंपैरेटर सर्किट है जो यह पता लगाता है कि इनपुट सिग्नल कब शून्य वोल्ट को पार कर रहा है।
- बनावट: पिन 2 (-) को सीधे ग्राउंड (0V Reference) करें और पिन 3 (+) पर एक AC Sine Wave इनपुट दें।
- परीक्षण: जब Sine Wave 0 {V} से ऊपर (पॉजिटिव) जाती है, तो आउटपुट तुरंत +V_{sat} (+11 {V}) पर स्विच हो जाता है। जब इनपुट 0 {V} से नीचे (नेगेटिव) जाता है, तो आउटपुट -V_{sat} (-11 {V}) पर चला जाता है। इस प्रकार आउटपुट पर एक सटीक Square Wave मिलती है, जिसके फेज बदलने वाले बिंदु शून्य को दर्शाते हैं।
C. इंस्ट्रूमेंटेशन एम्पलीफायर (Instrumentation Amplifier)
यह तीन ऑप-एम्प्स से मिलकर बना एक उच्च-सटीकता वाला एम्पलीफायर है। इसका उपयोग मेडिकल उपकरणों (जैसे ECG मशीन) में बहुत कमजोर सिग्नलों को बिना शोर (Noise) के बड़ा करने के लिए किया जाता है।
- विशेषता: इसका कॉमन मोड रिजेक्शन रेशियो (CMRR) और इनपुट इम्पीडेंस बहुत उच्च होता है। इसके दो इनपुट टर्मिनलों के बीच के सूक्ष्म अंतर को मापा और सत्यापित किया जाता है।
4. डिजिटल-टू-एनालॉग कन्वर्टर (DAC Circuits)
DAC का उपयोग बाइनरी नंबरों (जैसे 1010) को उसके समतुल्य एनालॉग वोल्टेज में बदलने के लिए होता है।
A. बाइनरी वेटेड रेसिस्टर प्रकार (Binary Weighted Resistor DAC)
- बनावट: इसमें इनपुट बिट्स के वजन के अनुसार रेसिस्टर्स के मान चुने जाते हैं (जैसे R, 2R, 4R, 8R)। इन सभी रेसिस्टर्स को ऑप-एम्प के समिंग (Inverting) इनपुट पिन 2 से जोड़ा जाता है।
- कमी: इसमें 4-बिट या अधिक के लिए बहुत अलग-अलग और सटीक मानों के रेसिस्टर्स की आवश्यकता होती है, जो व्यावहारिक रूप से मिलना कठिन होता है।
B. R-2R लैडर प्रकार (R-2R Ladder DAC)
यह सबसे लोकप्रिय DAC सर्किट है क्योंकि इसमें केवल दो ही मान के रेसिस्टर्स (R और उसका दोगुना 2R, जैसे 10 {k} Omega और 20 {k} Omega) की आवश्यकता होती है।
- परीक्षण: 4-बिट इनपुट स्विच (D_3 D_2 D_1 D_0) को क्रमशः सेट करें। जब इनपुट 0000 होगा, तो मल्टीमीटर पर आउटपुट 0 {V} होगा। जब इनपुट 1111 (अधिकतम) होगा, तो आउटपुट रेजोल्यूशन के अनुसार अधिकतम वोल्टेज (जैसे 4.68 {V}) प्रदर्शित करेगा। प्रत्येक बाइनरी स्टेप बढ़ने पर एनालॉग वोल्टेज में एक समान निश्चित बढ़त (Linearity) दिखाई देगी।
5. IC 555 टाइमर के अनुप्रयोग
IC 555 एक अत्यंत बहुमुखी टाइमर आईसी है जो 8-पिन के पैकेज में आती है।
A. एस्टेबल मल्टीवाइब्रेटर (Astable Multivibrator / Free Running Oscillator)
इस मोड में सर्किट की कोई भी स्थिति स्थिर नहीं होती। यह बिना किसी बाहरी ट्रिगर के लगातार स्क्वायर वेव (Clock Pulse) उत्पन्न करता रहता है।
- बनावट: पिन 2 (Trigger) और पिन 6 (Threshold) को आपस में शॉर्ट करके एक कैपेसिटर C के माध्यम से ग्राउंड करें। पिन 7 (Discharge) और V_{CC} के बीच R_A, तथा पिन 7 और पिन 6 के बीच R_B रेसिस्टर जोड़ें। पिन 3 से आउटपुट लें।
- परीक्षण: पिन 3 पर एक LED जोड़ें। R_A, R_B और C के मान के आधार पर LED लगातार एक निश्चित आवृत्ति पर ऑन-ऑफ (Blink) होगी। इसकी आवृत्ति को f = \frac{1.44}{(R_A + 2R_B)C} सूत्र से सत्यापित करें।
B. मोनोस्टेबल मल्टीवाइब्रेटर (Monostable Multivibrator / One-Shot Timer)
इस मोड में सर्किट की एक स्थिति स्थिर (LOW) होती है। जब पिन 2 पर एक नेगेटिव ट्रिगर पल्स दी जाती है, तो आउटपुट एक निश्चित समय (T) के लिए HIGH हो जाता है और फिर अपने आप वापस LOW हो जाता है।
- बनावट: पिन 6 और 7 को शॉर्ट करके एक R और C नेटवर्क से जोड़ें। पिन 2 पर एक पुश-बटन स्विच (ट्रिगर के लिए) लगाएं।
- परीक्षण: पुश बटन दबाते ही आउटपुट LED जल उठेगी। यह LED ठीक T = 1.1 cdot R cdot C सेकंड तक जलने के बाद अपने आप बुझ जाएगी।
C. वोल्टेज कंट्रोल्ड ऑसिलेटर (VCO / V to F Converter)
इस मोड में उत्पन्न होने वाली स्क्वायर वेव की आवृत्ति (Frequency) को एक बाहरी इनपुट वोल्टेज बदलकर नियंत्रित किया जाता है।
- बनावट: एस्टेबल सर्किट की तरह ही कनेक्शन रखें, लेकिन पिन 5 (Control Voltage Pin) पर एक पोटेंशियोमीटर (Variable Voltage Source) जोड़ें।
- परीक्षण: जैसे ही आप पोटेंशियोमीटर को घुमाकर पिन 5 पर वोल्टेज बदलेंगे, पिन 3 से निकलने वाली वेवफॉर्म की आवृत्ति बदल जाएगी (LED के ब्लिंक होने की गति तेज या धीमी हो जाएगी), जिसे CRO पर स्पष्ट देखा जा सकता है।
D. पल्स विड्थ मॉड्यूलेटर (Pulse Width Modulator - PWM)
इसका उपयोग मोटरों की गति को नियंत्रित करने या इनवर्टर सर्किट में होता है। इसमें आउटपुट तरंग की आवृत्ति समान रहती है, लेकिन उसका ड्यूटी साइकिल (Duty Cycle / On-Time) बदलता है।
- बनावट: 555 को मोनोस्टेबल मोड में जोड़ें। पिन 2 पर एक निरंतर क्लॉक पल्स (Trigger) दें और पिन 5 पर एक एनालॉग वोल्टेज (जैसे साइन वेव या DC वोल्टेज) इनपुट दें।
- परीक्षण: जब पिन 5 पर वोल्टेज बढ़ाया जाता है, तो आउटपुट पल्स की चौड़ाई (ON समय) बढ़ जाती है। वोल्टेज कम करने पर पल्स की चौड़ाई घट जाती है। ऑसिलोस्कोप (CRO) पर इनपुट वोल्टेज के साथ पल्स की चौड़ाई के बदलने (Modulation) का परीक्षण और सत्यापन करें।
डिजिटल स्टोरेज ऑसिलोस्कोप
डीएसओ के विभिन्न फ्रंट पैनल नियंत्रणों की पहचान करें। डीएसओ का उपयोग करके विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक संकेतों के आयाम, आवृत्ति और आवर्तकाल को मापें। डीएसओ को प्रिंटर से जोड़कर उससे प्राप्त सिग्नल का प्रिंट लें और लागू सिग्नल से मिलान करें। आईसी 8038 का उपयोग करके फंक्शन जनरेटर बनाएं और उसका परीक्षण करें।
डिजिटल स्टोरेज ऑसिलोस्कोप (DSO - Digital Storage Oscilloscope) आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स लैब का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण है। यह सिग्नलों को न केवल स्क्रीन पर दिखाता है, बल्कि उन्हें अपनी मेमोरी में स्टोर भी कर सकता है, जिससे उनका विस्तृत विश्लेषण आसान हो जाता है।
नीचे आपके लैब प्रैक्टिकल के लिए DSO के नियंत्रणों, मापन विधियों, प्रिंटिंग प्रक्रिया और IC 8038 आधारित फंक्शन जनरेटर के निर्माण की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. DSO के फ्रंट पैनल नियंत्रणों की पहचान (Front Panel Controls)
DSO के फ्रंट पैनल को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया जा सकता है:
A. डिस्प्ले और सॉफ्ट-कीज़ (Display & Soft-keys)
- Screen: यह एलसीडी (LCD) डिस्प्ले है जहाँ वेवफॉर्म और मापन (Measurements) दिखाई देते हैं।
- Soft-keys (Menu Buttons): स्क्रीन के ठीक बगल में लंबवत (Vertical) बटन होते हैं। स्क्रीन पर दिखने वाले मेनू विकल्पों को चुनने के लिए इनका उपयोग किया जाता है।
B. वर्टिकल कंट्रोल (Vertical Section - Y Axis)
यह नियंत्रण वोल्टेज (आयाम) और सिग्नल की ऊर्ध्वाधर स्थिति को बदलता है। आमतौर पर DSO में दो या चार चैनल (CH1, CH2...) होते हैं।
- Volts/Div Knob: यह वेवफॉर्म के आकार को वर्टिकल दिशा में बड़ा या छोटा करता है। यह तय करता है कि स्क्रीन का एक वर्टिकल बॉक्स (Division) कितने वोल्ट का होगा।
- Vertical Position Knob: यह वेवफॉर्म को स्क्रीन पर ऊपर या नीचे खिसकाने के लिए उपयोग किया जाता है।
- CH1 / CH2 Buttons: संबंधित चैनल के मेनू को चालू या बंद करने के लिए।
C. हॉरिजॉन्टल कंट्रोल (Horizontal Section - X Axis)
यह नियंत्रण समय (Time), आवृत्ति और आवर्तकाल (Period) से संबंधित है। यह सभी चैनलों के लिए कॉमन होता है।
- Time/Div Knob: यह वेवफॉर्म को हॉरिजॉन्टल दिशा में फैलाता या सिकोड़ता है। यह तय करता है कि स्क्रीन का एक हॉरिजॉन्टल बॉक्स कितने सेकंड/मिलिसेकंड का होगा।
- Horizontal Position Knob: यह वेवफॉर्म को स्क्रीन पर दाएं या बाएं खिसकाता है।
D. ट्रिगर कंट्रोल (Trigger Section)
यह स्क्रीन पर तेजी से भागती हुई तरंग (Waveform) को एक जगह स्थिर (Stabilize) करने के लिए आवश्यक है।
- Trigger Level Knob: यह वह वोल्टेज स्तर तय करता है जहाँ से वेवफॉर्म स्क्रीन पर दिखना शुरू होगी।
- Force Trigger / Auto / Normal Buttons: ट्रिगर मोड चुनने के लिए।
2. आयाम, आवृत्ति और आवर्तकाल का मापन (Measurement)
DSO में दो तरीकों से मापन किया जा सकता है: स्वचालित (Automatic) और कर्सर (Manual Cursors) द्वारा।
A. स्वचालित मापन विधि (Auto Measurement - सबसे आसान)
- फंक्शन जनरेटर से आ रहे सिग्नल के प्रोब (Probe) को DSO के CH1 से जोड़ें।
- फ्रंट पैनल पर 'Measure' बटन दबाएं।
-
सॉफ्ट-कीज़ का उपयोग करके स्क्रीन पर निम्नलिखित पैरामीटर चुनें:
- आयाम (Amplitude / V_{pp}): यह तरंग के उच्चतम बिंदु (Peak) और न्यूनतम बिंदु के बीच का कुल वोल्टेज अंतर दिखाता है।
- आवर्तकाल (Period - T): एक पूरी तरंग (One Complete Cycle) को पूरा होने में लगा समय।
- आवृत्ति (Frequency - f): एक सेकंड में तरंग कितनी बार दोहराती है (f = 1/T)। यह सीधे हर्ट्ज़ ({Hz} या {kHz}) में दिखाई देगी।
B. कर्सर विधि (Manual Cursor Measurement)
- 'Cursor' बटन दबाएं। मेनू से 'Time' या 'Voltage' चुनें।
- वोल्टेज (आयाम) के लिए: दो क्षैतिज रेखाएं (Horizontal Lines) दिखाई देंगी। एक को वेवफॉर्म के सबसे ऊपर और दूसरी को सबसे नीचे सेट करें। स्क्रीन पर Delta V (Volt) ही आपका आयाम (V_{pp}) होगा।
- समय/आवृत्ति के लिए: दो लंबवत रेखाएं (Vertical Lines) दिखाई देंगी। इन्हें तरंग के एक चक्र (Cycle) की शुरुआत और अंत पर सेट करें। स्क्रीन पर Delta T (Time Period) और 1/Delta T (Frequency) का मान आ जाएगा।
3. DSO को प्रिंटर से जोड़ना और प्रिंट लेना
DSO में स्टोर किए गए डेटा या स्क्रीनशॉट को सीधे प्रिंटर पर भेजा जा सकता है या कंप्यूटर के माध्यम से प्रिंट किया जा सकता है।
प्रक्रिया:
- कनेक्शन: अधिकांश आधुनिक DSO के पीछे USB Host / Device या LAN Port होता है। प्रिंटर को सीधे USB केबल द्वारा DSO से जोड़ें (सुनिश्चित करें कि प्रिंटर DSO द्वारा समर्थित श्रेणी का हो) या DSO को उस PC से जोड़ें जिससे प्रिंटर कनेक्टेड है।
- सेव/प्रिंट कमांड: फ्रंट पैनल पर 'Print' या 'Save/Recall' बटन दबाएं। मेनू में आउटपुट डिवाइस को 'Printer' के रूप में चुनें।
- सत्यापन (Matching): प्रिंट आउट पर छपी तरंग के आयाम (जैसे 5 {V}) और ग्रिड वैल्यू (Volts/Div) का मिलान मूल रूप से लागू किए गए इनपुट सिग्नल के मापदंडों से करें। यह प्रमाणित करता है कि DSO ने सिग्नल को बिना किसी त्रुटि के सटीक रूप से स्टोर और प्रिंट किया है।
4. IC 8038 का उपयोग करके फंक्शन जनरेटर का निर्माण
IC 8038 एक 'मोनोलिथिक फंक्शन जनरेटर' आईसी है जो न्यूनतम बाहरी घटकों के साथ उच्च सटीकता वाली साइन (Sine), स्क्वायर (Square), और ट्राएंगल (Triangular) तरंगें एक साथ उत्पन्न कर सकती है।
सर्किट की बनावट (Construction):
-
IC 8038 पिन विन्यास: यह 14-पिन की आईसी है।
- पिन 6 = +V_{CC} (सप्लाई), पिन 11 = -V_{EE} या Ground
- पिन 9 = Square Wave Out (वर्गाकार तरंग)
- पिन 3 = Sine Wave Out (ज्या तरंग)
- पिन 2 = Triangle Wave Out (त्रिकोणीय तरंग)
- आवृत्ति नियंत्रण (Frequency Selection): पिन 4 और 5 पर रेसिस्टर्स (R_A, R_B) और पिन 10 पर एक कैपेसिटर (C) जोड़ा जाता है। आवृत्ति बदलने के लिए R_A और R_B की जगह एक पोटेंशियोमीटर (Variable Resistor) का उपयोग किया जाता है।
- सूत्र: f = {0.15}/{R cdot C} (यदि R_A = R_B = R)
परीक्षण और सत्यापन की विधि:
- तैयार सर्किट को पावर सप्लाई दें।
- IC 8038 की पिन 2 (Triangle), पिन 3 (Sine), और पिन 9 (Square) से बारी-बारी से तार निकालकर DSO के चैनल 1 से जोड़ें।
- DSO पर 'Auto-Set' बटन दबाएं। आपको स्क्रीन पर संबंधित सटीक तरंगें दिखाई देंगी।
- सर्किट में लगे पोटेंशियोमीटर को घुमाएं। आप देखेंगे कि DSO स्क्रीन पर तरंगें सिकुड़ या फैल रही हैं, और 'Measure' मेनू में आवृत्ति ({Hz}) का मान बदल रहा है। इससे फंक्शन जनरेटर के सही ढंग से काम करने की पुष्टि होती है।
बेसिक एसएमडी (2, 3, 4 टर्मिनल वाले कंपोनेंट)
2, 3, 4 टर्मिनल वाले एसएमडी कंपोनेंट की पहचान करें। दिए गए पीसीबी से एसएमडी कंपोनेंट को डी-सोल्डर करें।
एसएमडी कंपोनेंट को उसी पीसीबी में सोल्डर करें। पीसीबी की कोल्ड कंटिन्यूटी की जांच करें।
प्रिंटेड वायर्ड असेंबली पर ढीले/सूखे सोल्डर और टूटे हुए ट्रैक की पहचान करें।
एसएमडी (SMD - Surface Mount Device) तकनीक का उपयोग आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में सर्किट का आकार छोटा करने और कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। ये घटक पारंपरिक (Through-hole) घटकों की तरह पीसीबी के आर-पार छेद में नहीं लगाए जाते, बल्कि सीधे पीसीबी की सतह पर सोल्डर किए जाते हैं।
नीचे आपके लैब प्रैक्टिकल के लिए एसएमडी घटकों की पहचान, डी-सोल्डरिंग/सोल्डरिंग विधि और पीसीबी दोषों की जांच करने की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. 2, 3, 4 टर्मिनल वाले एसएमडी कंपोनेंट की पहचान (Identification)
एसएमडी घटकों को उनके आकार (Package size) और टर्मिनलों (पिनों) की संख्या से पहचाना जाता है:
A. 2 टर्मिनल वाले घटक (2-Terminal Components)
इनमें केवल दो सिरे (पैड) होते हैं। मुख्य उदाहरण:
- एसएमडी रेसिस्टर (Resistor): ये छोटे आयताकार काले रंग के होते हैं, जिन पर उनका मान (जैसे 103 = 10 {k} Omega) लिखा होता है।
- एसएमडी कैपेसिटर (Capacitor): ये आमतौर पर भूरे या हल्के पीले रंग के होते हैं और इन पर अक्सर कुछ लिखा नहीं होता (MLCC)।
- एसएमडी डायोड (Diode): ये काले रंग के होते हैं और इनके एक सिरे पर कैथोड (Negative) की पहचान के लिए एक सफेद या चांदी की पट्टी (Line) बनी होती है।
B. 3 टर्मिनल वाले घटक (3-Terminal Components)
इनमें तीन पिन या पैड होते हैं। मुख्य उदाहरण:
- एसएमडी ट्रांजिस्टर और मॉसफेट (SOT-23 Package): इसमें एक तरफ दो पिन (जैसे Base, Emitter) और दूसरी तरफ एक अकेली पिन (Collector) होती है।
- वोल्टेज रेगुलेटर (SOT-89 या SOT-223): ये थोड़े बड़े होते हैं और इनमें तीन पिन के साथ-साथ ऊपर एक बड़ी मेटल टैब (Heat Sink) भी हो सकती है।
C. 4 टर्मिनल वाले घटक (4-Terminal Components)
इनमें चार पिन होती हैं। मुख्य उदाहरण:
- ऑप्टोकॉप्लर (Optocoupler): दो इनपुट (LED) और दो आउटपुट (Photo-transistor) के लिए 4 पिन की छोटी IC।
- ब्रिज रेक्टिफायर (Bridge Rectifier): दो AC इनपुट और दो DC आउटपुट (+ और -) के लिए 4 टर्मिनलों वाला घटक।
- एसएमडी जेनर डायोड नेटवर्क या ट्रांजिस्टर एरे: एक ही पैकेज में एक से अधिक घटक।
2. डी-सोल्डरिंग और सोल्डरिंग प्रक्रिया (De-soldering & Soldering)
एसएमडी घटकों पर काम करने के लिए SMD Rework Station (Hot Air Gun), पतली बिट वाला सोल्डरिंग आयरन, फ्लक्स (Flux), और चिमटी (Tweezers) की आवश्यकता होती है।
A. एसएमडी घटक को डी-सोल्डर (हटाना) करना
- फ्लक्स लगाएं: जिस घटक को हटाना है, उसके टर्मिनलों पर थोड़ा सा लिक्विड या पेस्ट फ्लक्स लगाएं। यह सोल्डर को आसानी से पिघलाने में मदद करता है।
- हॉट एयर गन सेट करें: हॉट एयर स्टेशन का तापमान लगभग 300^circ {C} से 350^circ {C} और एयर फ्लो (हवा का दबाव) को मध्यम पर सेट करें।
- गर्मी देना: गन के नोजल को घटक के ऊपर गोल-गोल घुमाएं। हवा को एक ही जगह न रोकें, अन्यथा पीसीबी का ट्रैक उखड़ सकता है।
- घटक को उठाना: जैसे ही सोल्डर पिघलकर चमकदार (सिल्वर) हो जाए, चिमटी (Tweezers) की मदद से घटक को धीरे से ऊपर उठा लें।
B. एसएमडी घटक को वापस सोल्डर करना
- पैड की सफाई: पीसीबी के पैड्स पर Desoldering Braid/Wick और सोल्डरिंग आयरन रखकर पुराने सोल्डर को साफ कर लें, जिससे पैड समतल हो जाएं।
- टिनिंग (Tining): पैड पर थोड़ा सा नया सोल्डर लगाएं (आमतौर पर 2-टर्मिनल घटक के केवल एक पैड पर पहले सोल्डर लगाया जाता है)।
- घटक को संरेखित करना: चिमटी से घटक को पकड़कर पैड के ठीक ऊपर रखें।
- सोल्डरिंग: सोल्डरिंग आयरन से उस पैड को छुएं जहाँ सोल्डर लगाया था। घटक का एक सिरा चिपक जाएगा। अब चिमटी हटाकर दूसरे सिरे पर सोल्डर वायर और आयरन की मदद से पक्का सोल्डर कर दें।
3. पीसीबी की कोल्ड कंटिन्यूटी की जांच (Cold Continuity Test)
कोल्ड कंटिन्यूटी जांच का मतलब है कि सर्किट में बिना पावर सप्लाई दिए (Power OFF) यह जांचना कि सभी कनेक्शन आपस में सही से जुड़े हैं या नहीं।
जांच की विधि:
- डिजिटल मल्टीमीटर (DMM) को Continuity Mode (Beep/Buzz Sound) पर सेट करें।
- मल्टीमीटर के दोनों प्रोब को आपस में छूकर देखें कि 'बीप' की आवाज आ रही है या नहीं।
- जांच 1 (सही कनेक्शन): एक प्रोब को कंपोनेंट के टर्मिनल पर और दूसरे प्रोब को उससे जुड़े ट्रैक के अगले छोर (जैसे किसी अन्य कंपोनेंट की पिन) पर रखें। यदि मल्टीमीटर 'बीप' करता है और 0 ओम के आसपास रेजिस्टेंस दिखाता है, तो कनेक्शन सही है।
- जांच 2 (शॉर्ट सर्किट): पावर लाइन (V_{CC}) और ग्राउंड (GND) पैड्स के बीच प्रोब रखें। यहाँ बीप नहीं आनी चाहिए। अगर बीप आती है, तो सर्किट में कहीं शॉर्ट-सर्किट है।
4. पीसीबी असेंबली पर दोषों की पहचान (Defect Identification)
प्रिंटेड वायर्ड असेंबली (PWA) पर दोषों को खोजने के लिए Magnifying Glass (आवर्धक लेंस) या Digital Microscope का उपयोग किया जाता है।
A. ढीले/सूखे सोल्डर (Loose/Dry Solder Joint)
यह तब होता है जब सोल्डरिंग के समय पर्याप्त गर्मी नहीं मिलती या घटक हिल जाता है।
-
पहचान: * एक अच्छा सोल्डर जॉइंट चमकदार और शंक्वाकार (Volcano shape) होता है।
- सूखा (Dry) सोल्डर जॉइंट धुंधला (Dull/Grey), खुरदरा और गेंद की तरह गोल दिखाई देता है।
- घटक का टर्मिनल सोल्डर के अंदर ढीला होता है, जिससे कभी कनेक्शन बनता है और कभी टूट जाता है (Intermittent fault)।
B. टूटे हुए ट्रैक (Broken / Cracked Tracks)
पीसीबी के गिरने, अधिक गर्म होने या मुड़ने के कारण तांबे की पतली लाइनें (Tracks) बीच में से टूट जाती हैं।
- पहचान: * लेंस से देखने पर ट्रैक के बीच में एक बहुत बारीक दरार (Hairline crack) दिखाई देती है।
- कभी-कभी शॉर्ट सर्किट के कारण अधिक करंट बहने से ट्रैक जलकर काला पड़ जाता है और वहां से पीसीबी उखड़ जाती है।
- परीक्षण: यदि कोई ट्रैक टूटा हुआ संदिग्ध लगे, तो उसके दोनों छोरों पर मल्टीमीटर के प्रोब रखकर कंटिन्यूटी टेस्ट करें। यदि बीप नहीं आती है, तो ट्रैक टूटा हुआ प्रमाणित होता है। इसे ठीक करने के लिए एक पतले तांबे के तार (Jumper Wire) से दोनों छोरों को आपस में सोल्डर कर दिया जाता है।
एसएमडी सोल्डरिंग और डी-सोल्डरिंग
एसएमडी सोल्डरिंग स्टेशन के लिए आवश्यक विभिन्न कनेक्शन और सेटअप की पहचान करें। विभिन्न आईसी पैकेजों के लिए क्रिम्पिंग टूल्स की पहचान करें।
विभिन्न पैकेजों के विभिन्न आईसी (कम से कम चार) को डी-सोल्डर करने के लिए एसएमडी सोल्डरिंग स्टेशन पर आवश्यक सेटिंग्स करें, इसके लिए उपयुक्त क्रिम्पिंग टूल्स का चयन करें।
विभिन्न पैकेजों के विभिन्न आईसी (कम से कम चार) को सोल्डर करने के लिए एसएमडी सोल्डरिंग स्टेशन पर आवश्यक सेटिंग्स करें, इसके लिए उपयुक्त क्रिम्पिंग टूल्स का चयन करें।
दोषपूर्ण सरफेस माउंट कंपोनेंट के रीवर्क के लिए सोल्डरिंग/डी-सोल्डरिंग विधि का उपयोग करके आवश्यक सेटिंग्स करें।
एसएमडी रीवर्क स्टेशन (SMD Rework Station / Hot Air Station) सरफेस माउंट कंपोनेंट्स (SMD ICs) पर काम करने के लिए सबसे मुख्य उपकरण है। नीचे आपके प्रैक्टिकल के लिए उपकरण के सेटअप, आईसी पैकेजों की पहचान, सोल्डरिंग/डी-सोल्डरिंग की सेटिंग्स और दोषपूर्ण घटकों के रीवर्क (Rework) की पूरी विधि दी गई है:
1. एसएमडी सोल्डरिंग स्टेशन: कनेक्शन और सेटअप
एक मानक एसएमडी रीवर्क स्टेशन में एक हॉट एयर गन (Hot Air Gun) और एक सटीक सोल्डरिंग आयरन (Micro Soldering Iron) दोनों शामिल होते हैं।
आवश्यक कनेक्शन और सेटअप:
- पावर कनेक्शन: स्टेशन के मुख्य पावर कॉर्ड को 230V AC अर्थिंग वाले सॉकेट से जोड़ें (स्टैटिक बिजली से सुरक्षा के लिए अर्थिंग बहुत जरूरी है)।
- हैंडपीस कनेक्शन: हॉट एयर गन और सोल्डरिंग आयरन के जैक को स्टेशन के फ्रंट पैनल पर बने संबंधित सॉकेट में कसकर लगाएं।
- नोजल का चयन (Nozzle Selection): आईसी के आकार के अनुसार हॉट एयर गन के आगे उपयुक्त नोजल (गोल या चौकोर) लगाएं और स्क्रू से कसें। छोटी आईसी के लिए पतला नोजल और बड़ी आईसी के लिए चौड़ा नोजल चुनें।
- सेफ्टी होल्डर: हॉट एयर गन को उसके ऑटो-कटऑफ स्टैंड (Magnetic Holder) पर रखें। आधुनिक स्टेशनों में स्टैंड पर रखते ही गन 'Standby' (ठंडी होकर बंद होना) मोड में चली जाती है।
2. आईसी पैकेज और टूल्स की पहचान (IC Packages & IC Extractors)
सुधार/स्पष्टीकरण (Correction Notice): प्रयोगशाला में आमतौर पर "क्रिम्पिंग टूल्स" (Crimping Tools) का उपयोग तारों (Wires) पर लग्स, टर्मिनलों या कनेक्टर्स को दबाकर जोड़ने के लिए किया जाता है। एसएमडी आईसी को पीसीबी से उठाने या पकड़ने के लिए "आईसी एक्सट्रैक्टर" (IC Extractor / Vacuum Picking Tool) या "एंटी-स्टैटिक चिमटी" (ESD Tweezers) का उपयोग किया जाता है।
चार प्रमुख एसएमडी आईसी पैकेज:
- SOIC / SOP (Small Outline Package): इसमें आईसी के दो विपरीत पक्षों पर पंख जैसी पिनें निकली होती हैं (जैसे: ऑप-एम्प या छोटे लॉजिक गेट्स)।
- QFP (Quad Flat Package): इसमें आईसी के चारों तरफ पिनें निकली होती हैं (जैसे: माइक्रोकंट्रोलर)।
- PLCC (Plastic Leaded Chip Carrier): इसकी पिनें आईसी के नीचे की तरफ 'J' आकार में मुड़ी होती हैं।
- QFN / BGA (Quad Flat No-leads / Ball Grid Array): इनमें बाहर कोई पिन नहीं होती; इनके पैड या सोल्डर बॉल्स आईसी के ठीक नीचे छुपे होते हैं।
उपयुक्त टूल्स का चयन:
- ESD Tweezers (चिमटी): SOIC और छोटे पैकेजों को पकड़ने के लिए।
- Vacuum Pick-up Tool: QFP और BGA जैसे भारी या चौड़े पैकेजों को बिना पिनों को नुकसान पहुंचाए ऊपर उठाने के लिए।
3. चार अलग-अलग आईसी पैकेजों के लिए डी-सोल्डरिंग और सोल्डरिंग (Settings & Procedure)
लैब में प्रैक्टिकल करते समय सुरक्षा और सटीकता के लिए हॉट एयर गन का तापमान (Temperature) और हवा का दबाव (Air Flow) सही सेट करना सबसे महत्वपूर्ण है।
A. डी-सोल्डरिंग (आईसी हटाने) के लिए सेटिंग्स और प्रक्रिया
आवश्यक सेटिंग्स (पैकेजों के आधार पर):
- SOIC (उदा. LM741 SMD): तापमान = 300^circ {C} - 320^circ {C}, एयर फ्लो = लो-मीडियम (3-4)
- PLCC (उदा. Flash Memory): तापमान = 320^circ {C} - 340^circ {C}, एयर फ्लो = मीडियम (4-5)
- QFP (उदा. Atmega328 SMD): तापमान = 330^circ {C} - 350^circ {C}, एयर फ्लो = मीडियम (5)
- QFN / BGA: तापमान = 340^circ {C} - 360^circ {C}, एयर फ्लो = मीडियम-हाई (5-6)
डी-सोल्डरिंग की चरण-दर-चरण विधि:
- आईसी की सभी पिनों पर लिक्विड या जेल फ्लक्स (Flux) लगाएं। यह सोल्डर को समान रूप से पिघलने में मदद करता है और पीसीबी ट्रैक को जलने से बचाता है।
- गन को ऊपर बताई गई सेटिंग पर चालू करें। नोजल को आईसी से लगभग 1-2 सेमी ऊपर रखें और उसे लगातार गोलाकार (Circular motion) में घुमाएं ताकि सभी पिनों पर बराबर गर्मी लगे।
- आईसी निकालना: चिमटी या वैक्यूम पिक-अप टूल से आईसी को धीरे से छूकर देखें। जैसे ही सोल्डर पूरी तरह पिघल जाए (चमकदार दिखने लगे), आईसी को सीधे ऊपर उठा लें। ध्यान रहे, जबरदस्ती न खींचें अन्यथा पीसीबी के तांबे के ट्रैक उखड़ जाएंगे।
B. सोल्डरिंग (नई आईसी लगाने) के लिए सेटिंग्स और प्रक्रिया
आवश्यक सेटिंग्स:
सभी पैकेजों को वापस सोल्डर करने के लिए हॉट एयर गन का तापमान 280^circ {C} - 320^circ {C} और एयर फ्लो कम (2-3) पर रखें, ताकि हवा के दबाव से आईसी अपने स्थान से हिले नहीं।
सोल्डरिंग की चरण-दर-चरण विधि:
- पैड की तैयारी (Cleaning): पीसीबी के पैड्स पर सोल्डरिंग विक (Desoldering Wick) और माइक्रो-आयरन रखकर पुराने अतिरिक्त सोल्डर को साफ करें। पैड्स को आइसोप्रोपिल अल्कोहल (IPA) से पोंछ लें।
- सरेखण (Alignment): पैड्स पर हल्का सा फ्लक्स लगाएं। चिमटी की मदद से नई आईसी को पैड्स के ऊपर बिल्कुल सटीक रखें। आईसी के पिन 1 (Dot) का विशेष ध्यान रखें।
- टैकिंग (Tacking): माइक्रो सोल्डरिंग आयरन की नोक पर थोड़ा सा सोल्डर लें और आईसी के किसी भी एक कोने की पिन को पैड से सोल्डर कर दें (इससे आईसी अपनी जगह फिक्स हो जाएगी)। फिर विपरीत कोने की पिन को भी सोल्डर करें।
- हॉट एयर सोल्डरिंग: अब हॉट एयर गन को आईसी के चारों तरफ घुमाएं। सोल्डर पिघलकर अपने आप पिन और पैड के बीच एक मजबूत और चमकदार जॉइंट बना लेगा।
4. दोषपूर्ण सरफेस माउंट कंपोनेंट का रीवर्क (SMD Rework Method)
रीवर्क (Rework) का अर्थ है पीसीबी पर लगे किसी खराब घटक (जैसे शॉर्ट या ड्राई सोल्डर वाली आईसी/रेसिस्टर) को ढूंढकर उसे ठीक करना या बदलना।
आवश्यक सेटिंग्स और रीवर्क की विधि:
- दोष की पहचान: आवर्धक लेंस (Magnifying Glass) या माइक्रोस्कोप के नीचे देखें। यदि दो पिन आपस में जुड़ गई हैं (Solder Bridge) या कोई पिन पैड से अलग है (Dry Solder), तो उसे चिह्नित करें।
- स्टेशन सेटिंग: माइक्रो सोल्डरिंग आयरन का तापमान 320^circ {C} पर सेट करें।
- शॉर्ट सर्किट / सोल्डर ब्रिज ठीक करना: * प्रभावित पिनों पर फ्लक्स लगाएं।
- सोल्डरिंग विक (Wick) को उन पिनों के ऊपर रखें और आयरन की मदद से दबाएं। विक अतिरिक्त सोल्डर को सोख लेगी और शॉर्ट सर्किट ठीक हो जाएगा।
-
खराब घटक को बदलना (Component Replacement):
- यदि रेसिस्टर/कैपेसिटर खराब है, तो हॉट एयर गन (300^circ {C}) से उसे हटाकर वहां सोल्डर पेस्ट (Solder Paste / Flux) लगाएं।
- चिमटी से नया घटक वहां रखें और गन से 5 सेकंड के लिए गर्मी दें। सोल्डर पिघलते ही घटक अपनी जगह चिपक जाएगा।
- सफाई और परीक्षण: रीवर्क पूरा होने के बाद पीसीबी को IPA (Isopropyl Alcohol) और ब्रश से अच्छी तरह साफ करें ताकि बचा हुआ फ्लक्स हट जाए। अंत में, मल्टीमीटर से कोल्ड कंटिन्यूटी की जांच करें कि कोई शॉर्ट सर्किट तो नहीं बचा है।
पीसीबी रीवर्क
सिंगल और डबल लेयर प्रिंटेड सर्किट बोर्ड की जांच और मरम्मत करना और पीसीबी के लिए महत्वपूर्ण परीक्षण करना।
सोल्डर किए गए जोड़ों का निरीक्षण करना, दोषों का पता लगाना और पीसीबी को रीवर्क के लिए टेस्ट करना।
विभिन्न विधियों द्वारा कन्फॉर्मल कोटिंग हटाना। कोटिंग को बदलना, बेकिंग और प्रीहीटिंग करना।
सोल्डर मास्क और क्षतिग्रस्त पैड की मरम्मत करना।
पीसीबी रीवर्क (PCB Rework) और मरम्मत इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और सर्विसिंग का एक उच्च-कौशल वाला क्षेत्र है। एक पीसीबी को बिना नुकसान पहुँचाए उसकी मूल स्थिति में वापस लाने के लिए विशिष्ट तकनीकों और परीक्षणों की आवश्यकता होती है।
नीचे आपके प्रैक्टिकल और कौशल विकास के लिए पीसीबी रीवर्क, परीक्षण, कोटिंग हटाने और पैड मरम्मत की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. सिंगल और डबल लेयर पीसीबी की जांच, मरम्मत और महत्वपूर्ण परीक्षण
सिंगल लेयर पीसीबी में ट्रैक केवल एक तरफ होते हैं, जबकि डबल लेयर (Double-Sided) पीसीबी में दोनों तरफ ट्रैक होते हैं जो आपस में विआस (Vias / Through-Holes) द्वारा जुड़े होते हैं।
महत्वपूर्ण परीक्षण (Critical PCB Tests):
मरम्मत से पहले और बाद में निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:
- शॉर्ट सर्किट परीक्षण (Short Circuit Test): मल्टीमीटर को निरंतरता (Continuity) मोड पर सेट करके पावर (V_{CC}) और ग्राउंड (GND) के बीच जांच की जाती है। 'बीप' की आवाज आने पर शॉर्ट सर्किट की पुष्टि होती है।
- ओपन सर्किट / ट्रैकिंग टेस्ट (Open Circuit Test): योजनाबद्ध आरेख (Schematic) के अनुसार संदिग्ध ट्रैक के दोनों सिरों पर प्रोब रखकर देखा जाता है कि विद्युत प्रवाह निर्बाध है या नहीं।
- इन-सर्किट घटक परीक्षण (In-Circuit Component Testing): मल्टीमीटर या ऑसिलोस्कोप की मदद से पीसीबी पर लगे डायोड, रेसिस्टर और ट्रांजिस्टर की स्थिति की जांच की जाती है।
मरम्मत (Repair):
- सिंगल लेयर: यदि कोई ट्रैक टूट गया है, तो उस पर लगे इंसुलेशन (सोल्डर मास्क) को स्क्रैप करके साफ किया जाता है और एक पतले जम्पर वायर (Jumper Wire) को दोनों सिरों पर सोल्डर कर दिया जाता है।
- डबल लेयर: यदि दो परतों को जोड़ने वाला Via क्षतिग्रस्त हो गया है, तो छेद के अंदर एक बारीक तांबे का तार आर-पार डालकर पीसीबी के दोनों तरफ (Top and Bottom Layers) सोल्डर किया जाता है।
2. सोल्डर जोड़ों का निरीक्षण और दोषों का पता लगाना
गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) के लिए सोल्डर जोड़ों (Solder Joints) का बारीकी से निरीक्षण किया जाता है। इसके लिए आवर्धक लेंस (Magnifying Glass) या डिजिटल माइक्रोस्कोप का उपयोग होता है।
प्रमुख सोल्डर दोष (Solder Defects):
- ड्राय सोल्डर जॉइंट (Dry Solder Joint): यह जोड़ धुंधला, खुरदरा और दरार युक्त दिखता है। यह तब होता है जब सोल्डरिंग के दौरान घटक हिल जाता है या पर्याप्त गर्मी नहीं मिलती।
- सोल्डर ब्रिज (Solder Bridge / Short): जब सोल्डर पिघलकर दो पास-पास की पिनों या ट्रैकों को आपस में जोड़ देता है, जिससे शॉर्ट सर्किट हो जाता है।
- अपर्याप्त सोल्डर (Insufficient Solder): पैड पर बहुत कम सोल्डर होना, जिससे घटक की पिन पूरी तरह से नहीं जुड़ पाती और यांत्रिक रूप से कमजोर रहती है।
- सोल्डर बॉल (Solder Balls): पीसीबी की सतह पर सोल्डर के छोटे-छोटे छर्रे बिखर जाना, जो बाद में किसी भी जगह शॉर्ट सर्किट कर सकते हैं।
रीवर्क के लिए टेस्ट करना (Testing for Rework):
दोष का पता चलने पर, पीसीबी को रीवर्क बेंच पर लाया जाता है। सोल्डरिंग विक (Desoldering Wick) और फ्लक्स का उपयोग करके अतिरिक्त सोल्डर या ब्रिज को हटाया जाता है, और दोबारा सही तापमान पर सोल्डरिंग की जाती है।
3. कन्फॉर्मल कोटिंग हटाना, बदलना, बेकिंग और प्रीहीटिंग
कन्फॉर्मल कोटिंग (Conformal Coating) पीसीबी को नमी, धूल, रसायन और अत्यधिक तापमान से बचाने के लिए लगाई जाने वाली एक पतली प्लास्टिक या सिलिकॉन की सुरक्षात्मक परत होती है। रीवर्क करने से पहले इस कोटिंग को हटाना अनिवार्य है।
A. कन्फॉर्मल कोटिंग हटाने की विधियाँ (Removal Methods):
- विलायक विधि (Chemical/Solvent Removal): एक विशेष विलायक (जैसे Isopropyl Alcohol, Acetone, या विशिष्ट कोटिंग रिमूवर) को ब्रश या स्वैब (Swab) की मदद से प्रभावित क्षेत्र पर लगाया जाता है जिससे कोटिंग पिघलकर साफ हो जाती है।
- तापीय विधि (Thermal Removal): सोल्डरिंग आयरन या हॉट एयर गन की नियंत्रित गर्मी से कोटिंग को धीरे-धीरे पिघलाया या जलाया जाता है और खुरच कर साफ किया जाता है (इसके धुएं से बचने के लिए वेंटिलेशन जरूरी है)।
- यांत्रिक विधि (Mechanical Removal): कोटिंग को बहुत सावधानी से खुरच कर (Scraping/Grinding) हटाया जाता है। यह विधि कठोर कोटिंग (Epoxy) के लिए अपनाई जाती है।
B. प्रीहीटिंग और बेकिंग (Preheating & Baking):
- बेकिंग (Baking): रीवर्क करने से पहले पीसीबी को एक रीवर्क ओवन (Oven) में 100^circ {C} से 120^circ{C} पर कुछ घंटों के लिए रखा जाता है। इससे पीसीबी के अंदर छुपी हुई सारी नमी (Moisture) निकल जाती है। यदि ऐसा न किया जाए, तो रीवर्क के समय उच्च तापमान मिलने पर पीसीबी के अंदर की नमी भाप बनकर बोर्ड को फुला सकती है (Delamination/Popcorning)।
- प्रीहीटिंग (Preheating): भारी या मल्टीलेयर पीसीबी पर काम करते समय, पूरे बोर्ड को नीचे से एक प्रीहीटर (Under-board Preheater) द्वारा लगभग 100^\circ\text{C} तक गर्म किया जाता है। इससे सोल्डरिंग आयरन की ऊष्मा अचानक ठंडे बोर्ड में सोखने से बच जाती है और थर्मल शॉक नहीं लगता।
C. कोटिंग को बदलना (Recoating):
रीवर्क और परीक्षण पूरा होने के बाद, मरम्मत किए गए क्षेत्र पर ब्रश या स्प्रे की मदद से दोबारा नई कन्फॉर्मल कोटिंग (जैसे UV Curable Acrylic) लगाई जाती है ताकि पीसीबी की सुरक्षा फिर से बहाल हो सके।
4. सोल्डर मास्क और क्षतिग्रस्त पैड की मरम्मत
अत्यधिक गर्मी देने या घटक को जबरदस्ती खींचने से पीसीबी के पैड (घटक की पिन चिपकने वाली जगह) और सोल्डर मास्क (हरा इंसुलेशन) उखड़ जाते हैं।
A. सोल्डर मास्क की मरम्मत (Solder Mask Repair):
जब तांबे का ट्रैक नंगा (Exposed) हो जाता है, तो वहां जंग लगने या शॉर्ट सर्किट होने का खतरा रहता है।
- विधि: प्रभावित जगह को साफ करके वहां लिक्विड यूवी सोल्डर मास्क (UV Solder Mask Inks) की एक पतली परत लगाई जाती है। इसके बाद इस पर UV लाइट (Ultraviolet Light Lamp) को 30 से 60 सेकंड के लिए डाला जाता है। यूवी प्रकाश मिलते ही यह लिक्विड तुरंत सूखकर पत्थर जैसा कठोर इंसुलेशन बन जाता है।
B. क्षतिग्रस्त पैड की मरम्मत (Damaged Pad / Land Repair):
यदि पीसीबी का कोई पैड पूरी तरह उखड़ गया है, तो उसे बदलने के लिए पैड रिपेयर किट (PCB Pad Repair Kit) का उपयोग किया जाता है।
-
चरण-दर-चरण विधि:
- सफाई: क्षतिग्रस्त पैड के स्थान को बारीक ब्लेड से खुरच कर साफ और समतल करें। उखड़े हुए पैड से जुड़े ट्रैक के थोड़े से हिस्से को भी नंगा (Expose) करें।
- नया पैड चुनना: रिपेयर किट में से उसी आकार और मोटाई का एक नया तांबे का रिप्लेसमेंट पैड (Copper Foil Pad) चुनें।
- बॉन्डिंग (Epoxy Bonding): नए पैड के नीचे एक विशेष कंडक्टिव/थर्मल इपॉक्सी (Epoxy Resin) लगाई जाती है। पैड को पीसीबी पर सही जगह संरेखित करके रखें।
- सोल्डरिंग और क्योरिंग: नए पैड की पूंछ (Tail) को पीसीबी के मूल ट्रैक से माइक्रो सोल्डरिंग आयरन द्वारा सोल्डर कर दें। इसके बाद, पैड को दबाकर रखने के लिए रीवर्क आयरन की गर्मी से इपॉक्सी को पूरी तरह सुखा (Cure) लें। अब नया पैड घटक को सोल्डर करने के लिए तैयार है।
सुरक्षा उपकरण
विभिन्न प्रकार के फ्यूज, फ्यूज होल्डर, ओवरलोड (नो वोल्ट कॉइल), करंट एडजस्ट (करंट सेट करने के लिए बायोमेट्रिक स्ट्रिप्स) की पहचान करें।
दिए गए एमसीबी का परीक्षण करें। एक ईएलसीबी कनेक्ट करें और एक इलेक्ट्रिक मोटर कंट्रोल सर्किट के लीकेज का परीक्षण करें।
सुरक्षा उपकरण (Safety Devices) किसी भी इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रॉनिक सर्किट के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। ये उपकरणों को ओवर-करंट (अत्यधिक बिजली), शॉर्ट सर्किट और अर्थ लीकेज से बचाते हैं, साथ ही इंसानों को बिजली का झटका लगने से रोकते हैं।
नीचे आपके प्रैक्टिकल के लिए विभिन्न सुरक्षा उपकरणों की पहचान, कार्यप्रणाली और परीक्षण (Testing) की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. सुरक्षा उपकरणों की पहचान (Identification of Safety Devices)
A. फ्यूज और फ्यूज होल्डर (Fuses & Fuse Holders)
फ्यूज सर्किट का सबसे कमजोर हिस्सा होता है, जो करंट निर्धारित सीमा से अधिक होने पर खुद पिघलकर सर्किट को तोड़ देता है।
- किटकैट फ्यूज (Kit-Kat Fuse): यह चीनी मिट्टी (Porcelain) का बना होता है। इसके दो भाग होते हैं - बेस (जो बोर्ड में फिक्स रहता है) और कैरियर (जिसे बाहर निकाला जा सकता है)। इसमें तांबे का पतला तार बांधा जाता है।
- ग्लास फ्यूज (Glass Tube Fuse): यह कांच की एक छोटी नली होती है जिसके दोनों सिरों पर मेटल कैप होते हैं। इसका उपयोग इनवर्टर, स्टेबलाइजर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में होता है।
- एचआरसी फ्यूज (HRC - High Rupturing Capacity Fuse): यह सफेद बेलनाकार सिरेमिक बॉडी का होता है। यह भारी उद्योगों में उच्च शॉर्ट-सर्किट करंट को सुरक्षित रूप से संभालने के लिए उपयोग किया जाता है।
- फ्यूज होल्डर (Fuse Holder): यह वह बेस या सॉकेट होता है जिसके अंदर ग्लास या सिरेमिक फ्यूज को सुरक्षित रूप से फिट किया जाता है।
B. ओवरलोड रिले और नो-वोल्ट कॉइल (Overload Relay & NVC)
इनका उपयोग मुख्य रूप से मोटर्स को सुरक्षा देने के लिए स्टार्टर (Starter) के अंदर किया जाता है।
- बायोमेट्रिक स्ट्रिप / बाइमेटेलिक स्ट्रिप (Bimetallic Strips): यह दो अलग-अलग धातुओं की पत्ती होती है। जब मोटर क्षमता से अधिक करंट (Overload) लेती है, तो अधिक गर्मी के कारण यह पत्ती मुड़ (Bend) जाती है। यह मुड़ाव स्टार्टर के मैकेनिज्म को ट्रिप कर देता है और मोटर बंद हो जाती है। इसमें एक करंट एडजस्टमेंट डायल (Current Adjust Dial) होता है, जिससे मोटर की रेटिंग के अनुसार ट्रिपिंग करंट सेट किया जा सकता है।
- नो-वोल्ट कॉइल / एनवीसी (No-Volt Coil - NVC): यह एक इलेक्ट्रोमैग्नेट (विद्युत चुंबक) है। जब तक बिजली रहती है, यह कॉइल चुंबक बनकर स्टार्टर के हैंडल या प्लंजर को 'ON' स्थिति में चिपकाए रखती है। बिजली कटने (0 Volt होने) पर इसका चुंबकत्व खत्म हो जाता है और हैंडल वापस 'OFF' स्थिति में आ जाता है। इससे बिजली दोबारा आने पर मोटर अपने आप चालू नहीं होती, जिससे दुर्घटना टल जाती है।
2. एमसीबी (MCB - Miniature Circuit Breaker) का परीक्षण
MCB एक आधुनिक सुरक्षा उपकरण है जो फ्यूज की तरह काम करता है, लेकिन यह जलता नहीं है बल्कि 'ट्रिप' (OFF) हो जाता है। इसे दोबारा 'ON' किया जा सकता है।
परीक्षण की विधि (Testing Procedure):
- विजुअल इंस्पेक्शन: जांचें कि एमसीबी की बॉडी कहीं से क्रैक या जली हुई तो नहीं है और उसका नॉब (Switch) सुचारू रूप से ऊपर-नीचे हो रहा है या नहीं।
-
कंटिन्यूटी टेस्ट (मल्टीमीटर द्वारा):
- मल्टीमीटर को Continuity (Beep) Mode पर सेट करें।
- एमसीबी के नॉब को 'OFF' स्थिति में रखें। मल्टीमीटर के प्रोब्स को एमसीबी के इनपुट (Line) और आउटपुट (Load) टर्मिनलों पर लगाएं। इस समय बीप नहीं आनी चाहिए (ओपन सर्किट)।
- अब एमसीबी के नॉब को 'ON' स्थिति में करें। मल्टीमीटर में बीप की आवाज आनी चाहिए और स्क्रीन पर 0 ओम रेजिस्टेंस दिखना चाहिए। यह दर्शाता है कि आंतरिक संपर्क (Internal Contacts) सही हैं।
3. ईएलसीबी (ELCB) कनेक्शन और मोटर सर्किट के लीकेज का परीक्षण
ELCB (Earth Leakage Circuit Breaker) या RCCB का मुख्य काम अर्थ लीकेज (Current Leakage) का पता लगाना है। यदि मोटर की बॉडी में करंट उतर रहा हो, तो यह मात्र कुछ ही मिली-सेकंड में ट्रिप होकर इंसानों को जानलेवा झटके से बचा लेती है।
A. ELCB का कनेक्शन:
- मुख्य बिजली सप्लाई (Phase और Neutral) को ELCB के INCOMING (Line) टर्मिनलों से जोड़ें।
- ELCB के OUTGOING (Load) टर्मिनलों से तार निकालकर उसे इलेक्ट्रिक मोटर के स्टार्टर इनपुट से जोड़ें।
- मोटर के धातु वाले बाहरी फ्रेम (Body) को मुख्य अर्थिंग (Earth Ground Wire) से अवश्य जोड़ें।
B. इलेक्ट्रिक मोटर सर्किट का लीकेज परीक्षण (Leakage Testing):
- टेस्ट बटन द्वारा जांच: ELCB पर एक 'T' आकार का Test Button होता है। कनेक्शन पूरा करने के बाद सप्लाई चालू करें और इस बटन को दबाएं। ELCB को तुरंत ट्रिप (OFF) होना चाहिए। यदि यह ट्रिप होती है, तो इसका आंतरिक लीकेज डिटेक्शन सर्किट सही काम कर रहा है।
-
कृत्रिम लीकेज टेस्ट (प्रैक्टिकल विधि): * मोटर को चालू करें।
- एक कम वाट के टेस्ट लैंप (उदा. 15W बल्ब) का उपयोग करें। बल्ब के एक तार को मोटर के चलते हुए फेज (Phase) टर्मिनल से छुएं और दूसरे तार को मोटर की लोहे की बॉडी (Earth) से छुएं।
- जैसे ही बल्ब बॉडी से छुएगा, करंट अर्थ में बहेगा (लीकेज पैदा होगा)। ELCB को तुरंत ट्रिप हो जाना चाहिए।
- इंसुलेशन रेजिस्टेंस टेस्ट (मेगर द्वारा): मोटर बंद करके, एक मेगर (Megger / Insulation Tester) के एक प्रोब को मोटर के वाइंडिंग टर्मिनल पर और दूसरे प्रोब को मोटर की बॉडी पर लगाएं। इंसुलेशन रेजिस्टेंस 1 मेगा-ओम (1 {M} Omega) से अधिक होना चाहिए। यदि यह बहुत कम है, तो मोटर की वाइंडिंग कमजोर है और करंट बॉडी में लीक हो रहा है।
विद्युत नियंत्रण परिपथ
दिए गए मोटर की कुंडल वाइंडिंग का प्रतिरोध मापें। डीओएल स्टार्टर का सेटअप तैयार करें और एक प्रेरण मोटर को नियंत्रित करें।
प्रेरण मोटर की दिशा बदलने के लिए एक दिशा नियंत्रण परिपथ बनाएं। एक ओवरलोड रिले को कनेक्ट करें और उसके सही ढंग से कार्य करने की जांच करें।
विद्युत नियंत्रण परिपथ (Electrical Control Circuit) का यह प्रैक्टिकल औद्योगिक वायरिंग और मोटर नियंत्रण (Motor Control) का आधार है। नीचे आपके प्रैक्टिकल के लिए वाइंडिंग प्रतिरोध मापने, DOL स्टार्टर सेटअप, दिशा बदलने (Forward/Reverse) के परिपथ और ओवरलोड रिले के कनेक्शन की विस्तृत चरण-दर-चरण विधि दी गई है:
1. मोटर की कुंडल वाइंडिंग (Coil Winding) का प्रतिरोध मापना
थ्री-फ्यूज (3-Phase) प्रेरण मोटर (Induction Motor) के अंदर तीन अलग-अलग कुंडलियाँ (वाइंडिंग) होती हैं, जिन्हें U, V, और W कहा जाता है। मोटर के टर्मिनल बॉक्स में इनके 6 सिरे (U_1-U_2, V_1-V_2, W_1-W_2) निकले होते हैं।
मापने की विधि:
- सुरक्षा: सबसे पहले सुनिश्चित करें कि मोटर की मुख्य बिजली सप्लाई पूरी तरह बंद (OFF) है।
- शॉर्टिंग लिंक हटाना: यदि टर्मिनल बॉक्स में स्टार (Star) या डेल्टा (Delta) के लिए तांबे की लिंक लगी हैं, तो उन्हें हटा दें ताकि तीनों वाइंडिंग एक-दूसरे से अलग हो जाएं।
- मल्टीमीटर सेट करना: डिजिटल मल्टीमीटर को रेसिस्टेंस (Omega) मोड में सबसे कम रेंज (जैसे 200 Omega) पर सेट करें।
-
प्रतिरोध मापना: * मल्टीमीटर के प्रोब्स को U_1 और U_2 पर लगाएं और मान नोट करें (माना R_1)।
- इसी तरह V_1 और V_2 का मान नोट करें (माना R_2)।
- अंत में W_1 और W_2 का मान नोट करें (माना R_3)।
- निष्कर्ष: एक सही मोटर के लिए तीनों वाइंडिंग का प्रतिरोध लगभग बराबर होना चाहिए (R_1 approx R_2 approx R_3)। यदि किसी वाइंडिंग का प्रतिरोध 0 आता है तो वह शॉर्ट है, और यदि Infinte (infty या OL) आता है तो वाइंडिंग ओपन (टूटी हुई) है।
2. डीओएल स्टार्टर (DOL Starter) का सेटअप और मोटर नियंत्रण
DOL (Direct On-Line) स्टार्टर का उपयोग 5 HP तक की छोटी थ्री-फेस मोटरों को चालू और बंद करने के लिए किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से एक कॉन्टेक्टर (Contactor), ओवरलोड रिले (OLR), START (Green) बटन, और STOP (Red) बटन होते हैं।
सेटअप और कनेक्शन की विधि:
DOL स्टार्टर के दो मुख्य परिपथ होते हैं:
A. पावर सर्किट (Power Circuit):
- मुख्य 3-Phase सप्लाई (R, Y, B) को सबसे पहले एक एमसीसीबी (MCCB) या फ्यूज यूनिट में लाएं।
- वहां से तीनों तारों को कॉन्टेक्टर के इनपुट टर्मिनलों (L_1, L_2, L_3) से जोड़ें।
- कॉन्टेक्टर के आउटपुट टर्मिनलों (T_1, T_2, T_3) को ओवरलोड रिले (OLR) के इनपुट से जोड़ें।
- ओवरलोड रिले के आउटपुट टर्मिनलों से तीन तार निकालकर सीधे मोटर के टर्मिनलों (U_1, V_1, W_1) से जोड़ दें।
B. नियंत्रण सर्किट (Control Circuit - 230V/415V):
- फेज (Phase): किसी भी एक फेज (माना R-phase) से एक पतला तार लें और उसे ओवरलोड रिले के NC (Normally Closed - 95-96) टर्मिनल से जोड़ें।
- STOP बटन: OLR के NC आउटपुट से तार निकालकर उसे STOP बटन (लाल रंग का NC बटन) के इनपुट से जोड़ें।
- START बटन: STOP बटन के आउटपुट से तार निकालकर उसे START बटन (हरे रंग का NO बटन) के इनपुट से जोड़ें।
- कॉइल कनेक्शन: START बटन के आउटपुट से तार निकालकर कॉन्टेक्टर की No-Volt Coil (A1 टर्मिनल) से जोड़ें। कॉइल के दूसरे सिरे (A2 टर्मिनल) को न्यूट्रल (यदि 230V कॉइल है) या दूसरे फेज (Y-phase, यदि 415V कॉइल है) से जोड़ें।
- होल्डिंग सर्किट (Holding Circuit): START बटन को छोड़ते ही कॉन्टेक्टर बंद न हो, इसके लिए START बटन के इनपुट और आउटपुट के समानांतर (Parallel) में कॉन्टेक्टर का एक Auxiliary NO (Normally Open) कॉन्टैक्ट जोड़ दें।
3. प्रेरण मोटर की दिशा बदलने के लिए नियंत्रण परिपथ (Forward/Reverse Circuit)
थ्री-फेस प्रेरण मोटर की घूमने की दिशा बदलने का नियम बहुत सरल है: किन्हीं भी दो फेजों (Phase) को आपस में बदल दें। इसके लिए हमें दो अलग-अलग कॉन्टेक्टरों (Forward Contactor और Reverse Contactor) की आवश्यकता होती है।
दिशा नियंत्रण परिपथ की विधि:
- पावर वायरिंग: * Forward Contactor: इसमें सप्लाई सीधे जाती है (R rightarrow U, Y rightarrow V, B rightarrow W)।
- Reverse Contactor: इसमें R और B फेज को आपस में बदल दिया जाता है (R rightarrow W, Y rightarrow V, B rightarrow U)।
-
इलेक्ट्रिकल इंटरलॉकिंग (Electrical Interlocking - अत्यंत महत्वपूर्ण): दुर्घटना या शॉर्ट-सर्किट से बचने के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि दोनों कॉन्टेक्टर एक साथ ऑन न हों।
- इसके लिए फॉरवर्ड कॉन्टेक्टर की कॉइल की वायरिंग में रिवर्स कॉन्टेक्टर का NC पॉइंट सीरीज में जोड़ा जाता है।
- इसी तरह, रिवर्स कॉन्टेक्टर की कॉइल की वायरिंग में फॉरवर्ड कॉन्टेक्टर का NC पॉइंट सीरीज में जोड़ा जाता है।
- कार्यप्रणाली: जब आप 'Forward' बटन दबाएंगे तो मोटर सीधी चलेगी। मोटर की दिशा बदलने के लिए पहले 'STOP' बटन दबाना होगा, उसके बाद ही 'Reverse' बटन काम करेगा।
4. ओवरलोड रिले (Overload Relay) कनेक्शन और उसकी जांच
ओवरलोड रिले (OLR) मोटर को अत्यधिक करंट के कारण जलने से बचाती है। यह कॉन्टेक्टर के ठीक नीचे फिट होती है।
कनेक्शन:
- इसके पावर टर्मिनल सीधे कॉन्टेक्टर के आउटपुट में कसे जाते हैं।
- इसका नियंत्रण टर्मिनल (95 और 96 - NC) स्टार्टर के कंट्रोल सर्किट में सीरीज (श्रेणीक्रम) में जोड़ा जाता है, जैसा कि DOL स्टार्टर के चरण में बताया गया है।
सही ढंग से कार्य करने की जांच (Testing Procedure):
- करंत रेटिंग सेट करना: रिले के ऊपर बने Current Adjustment Dial की मदद से मोटर के फुल लोड करंट (FLC) के अनुसार ट्रिपिंग करंट सेट करें (उदाहरण के लिए यदि मोटर का FLC 4 Ampere है, तो डायल को 4A पर सेट करें)।
-
मैनुअल टेस्ट (Manual Test Trip): * स्टार्टर चालू करके मोटर को चलाएं।
- ओवरलोड रिले पर एक छोटा 'TEST' लाल रंग का लीवर या बटन होता है।
- एक पतले स्क्रू-ड्राइवर की मदद से उस टेस्ट बटन को धीरे से खिसकाएं या दबाएं।
- ऐसा करते ही कॉन्टेक्टर तुरंत 'खट' की आवाज के साथ बंद हो जाना चाहिए और मोटर रुक जानी चाहिए। यह दर्शाता है कि रिले का आंतरिक मैकेनिज्म और NC कॉन्टैक्ट बिल्कुल सही काम कर रहे हैं।
- रीसेट करना: टेस्ट के बाद रिले पर लगे नीले या मैन्युअल RESET बटन को दबाएं, जिससे सर्किट दोबारा चालू होने के लिए तैयार हो जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक केबल और कनेक्टर
विभिन्न प्रकार के केबलों की पहचान करें, जैसे आरएफ समाक्षीय फीडर, शील्डेड केबल, रिबन केबल, आरसीए कनेक्टर केबल, डिजिटल
ऑप्टिकल ऑडियो, वीडियो केबल, आरजे45, आरजे11, ईथरनेट केबल, फाइबर ऑप्टिक केबल स्प्लिसिंग, फाइबर ऑप्टिक केबल मैकेनिकल
स्प्लिस, इन्सुलेशन, गेज, करंट क्षमता, लचीलापन आदि। इनका उपयोग विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और विभिन्न इनपुट
आउटपुट सॉकेट में किया जाता है। उपयुक्त कनेक्टरों की पहचान करें, सोल्डर/क्रिम्प/टर्मिनेट करें और केबल सेट का परीक्षण करें। केबल सेट तैयार करने के लिए कनेक्टर पर दिए गए निशान के अनुसार निरंतरता की जांच करें। पीसी के सीपीयू कैबिनेट के अंदर विभिन्न कनेक्टरों और केबलों की पहचान करें और उनका चयन करें। कंप्यूटर को नेटवर्क स्विच से जोड़ने के लिए उपयुक्त कनेक्टर और केबल की पहचान करें और दो नेटवर्क कंप्यूटरों को जोड़ने के लिए क्रॉसओवर केबल तैयार करें।
इलेक्ट्रॉनिक केबल और कनेक्टर (Electronic Cables and Connectors) किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या नेटवर्क प्रणाली में सिग्नलों और बिजली के सुरक्षित प्रवाह के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह काम करते हैं। आपके प्रैक्टिकल के सभी महत्वपूर्ण भागों की विस्तृत गाइड नीचे दी गई है:
1. विभिन्न प्रकार के केबल और उनके गुण
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केबल का नाम |
मुख्य विशेषताएँ और गुण (Gauge, Insulation) |
मुख्य उपयोग (Applications) |
|---|---|---|
|
RF समाक्षीय फीडर (Coaxial Cable) |
इसमें केंद्र में एक ठोस तांबे का तार होता है, जिसके ऊपर प्लास्टिक इंसुलेशन, फिर तांबे की जाली (Shield) और बाहरी जैकेट होती है। |
टीवी एंटीना, डिश टीवी, रेडियो ट्रांसमिशन और हाई-फ्रीक्वेंसी RF सिग्नल। |
|
शील्डेड केबल (Shielded Cable) |
इसके अंदर के तारों के चारों ओर एल्युमिनियम फॉयल या तांबे की जाली का कवच (Shield) होता है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस (EMI) और शोर (Noise) को रोकता है। |
माइक्रोफोन केबल, ऑडियो सिस्टम और संवेदनशील औद्योगिक सेंसर। |
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रिबन केबल (Ribbon Cable) |
यह कई तारों का एक फ्लैट और लचीला (Flexible) सेट होता है जो एक के बाद एक समानांतर जुड़े होते हैं। |
कंप्यूटर के अंदर हार्ड ड्राइव, फ्लॉपी डिस्क और सर्किट बोर्ड्स के आंतरिक कनेक्शन। |
|
RCA कनेक्टर केबल |
आमतौर पर तीन रंगों (लाल/सफेद ऑडियो के लिए, पीला वीडियो के लिए) के कनेक्टर वाली केबल। |
DVD प्लेयर, टीवी और पुराने ऑडियो-वीडियो उपकरणों में। |
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फाइबर ऑप्टिक केबल (Fiber Optic) |
यह कांच या प्लास्टिक के बेहद पतले धागों (Core) से बनी होती है, जिसमें डेटा प्रकाश (Light) की गति से यात्रा करता है। यह 100% EMI मुक्त होती है। |
हाई-स्पीड इंटरनेट, टेलीकॉम नेटवर्क और लॉन्ग-डिस्टेंस डेटा ट्रांसफर। |
केबलों के तकनीकी गुण:
- गेज (AWG - American Wire Gauge): यह तार की मोटाई को दर्शाता है। गेज का नंबर जितना छोटा होगा, तार उतना ही मोटा होगा (जैसे 14 AWG का तार 22 AWG से मोटा होता है)।
- करंट क्षमता (Current Capacity): मोटे तार (कम AWG) अधिक करंट संभाल सकते हैं बिना गर्म हुए।
- लचीलापन (Flexibility): जिस केबल में एक ठोस तार की जगह तांबे के कई बारीक धागे (Stranded wire) होते हैं, वह अधिक लचीली होती है और बार-बार मुड़ने पर टूटती नहीं है।
2. फाइबर ऑप्टिक केबल स्प्लिसिंग (Fiber Optic Splicing)
फाइबर ऑप्टिक केबल के दो सिरों को आपस में जोड़ने की प्रक्रिया को स्प्लिसिंग (Splicing) कहा जाता है। यह दो प्रकार से होती है:
- फ्यूजन स्प्लिसिंग (Fusion Splice - स्थायी जोड़): इसमें एक स्वचालित फ्यूजन स्प्लिसिंग मशीन का उपयोग किया जाता है। मशीन दोनों कांच के कोर को बिल्कुल सटीक संरेखित करती है और एक इलेक्ट्रिक आर्क (बिजली की चिंगारी) द्वारा उन्हें पिघलाकर आपस में जोड़ देती है। इसमें सिग्नल का नुकसान (Loss) सबसे कम (< 0.1 dB) होता है।
- मैकेनिकल स्प्लिसिंग (Mechanical Splice - अस्थायी/त्वरित जोड़): इसमें एक छोटे प्लास्टिक स्प्लिस स्लीव के अंदर दोनों फाइबर के सिरों को साफ करके आमने-सामने फिट कर दिया जाता है। इसके अंदर एक विशेष जेल (Index Matching Gel) भरा होता है जो प्रकाश को बिना रुकावट पार होने देता है। यह त्वरित मरम्मत के लिए उपयोगी है लेकिन इसमें लॉस थोड़ा अधिक होता है।
3. केबल सेट तैयार करना: क्रिम्पिंग, टर्मिनेशन और कंटिन्यूटी टेस्ट
क्रिम्पिंग और सोल्डरिंग (Crimping & Soldering):
- क्रिम्पिंग (Crimping): इसके लिए क्रिम्पिंग टूल (Crimping Tool) का उपयोग किया जाता है। तार के छिले हुए हिस्से को कनेक्टर के मेटल पिन के अंदर रखकर टूल से जोर से दबाया जाता है, जिससे यांत्रिक रूप से एक मजबूत जोड़ बन जाता है (जैसे RJ45 या थिम्बल कनेक्टर)।
- टर्मिनेशन (Termination): केबल के अंत में कनेक्टर लगाने की पूरी प्रक्रिया को टर्मिनेशन कहते हैं।
निरंतरता जांच (Continuity Test):
केबल सेट तैयार होने के बाद, कनेक्टर पर दिए गए पिन नंबर के निशानों (Pins 1, 2, 3...) के अनुसार मल्टीमीटर को Continuity Mode पर सेट करें। एक प्रोब को केबल के शुरुआती छोर की पिन 1 पर और दूसरे प्रोब को अंतिम छोर की पिन 1 पर रखें। यदि 'बीप' की आवाज आती है, तो कनेक्शन सही है। यदि पिन 1 और पिन 2 के बीच बीप आती है, तो इसका मतलब सर्किट शॉर्ट है।
4. PC के CPU कैबिनेट के अंदर के केबल और कनेक्टर
जब आप CPU कैबिनेट खोलते हैं, तो मदरबोर्ड और अन्य घटकों के बीच निम्नलिखित कनेक्टर दिखाई देते हैं:
- ATX Power Connector (24-Pin): यह SMPS (पावर सप्लाई) से मदरबोर्ड को मुख्य बिजली देने वाला सबसे बड़ा कनेक्टर है।
- SATA Cable & Connector: यह नीले, लाल या काले रंग की चपटी केबल होती है जो हार्ड ड्राइव (HDD/SSD) और मदरबोर्ड के बीच डेटा ट्रांसफर करती है।
- Molex Connector (4-Pin): यह पुराने हार्ड ड्राइव या कैबिनेट के कूलिंग फैन्स को पावर देने के लिए उपयोग होता है।
- PCIe Power Connector (6 or 8-Pin): यह भारी ग्राफिक्स कार्ड (GPU) को अतिरिक्त बिजली देने के लिए उपयोग किया जाता है।
5. नेटवर्किंग केबल: RJ45, RJ11 और क्रॉसओवर केबल
- RJ11 कनेक्टर: यह छोटा 4-पिन या 6-पिन का कनेक्टर होता है जिसका उपयोग टेलीफोन लाइनों और DSL मोडेम में होता है।
- RJ45 कनेक्टर: यह 8-पिन का बड़ा कनेक्टर होता है जिसका उपयोग कंप्यूटर नेटवर्किंग (ईथरनेट केबल) में होता है।
- कंप्यूटर को नेटवर्क स्विच से जोड़ना: इसके लिए स्ट्रेट-थ्रू केबल (Straight-Through Cable) का उपयोग किया जाता है। इसमें केबल के दोनों सिरों पर वायरिंग का रंग क्रम बिल्कुल एक जैसा (T568B मानक) होता है।
दो कंप्यूटरों को सीधे जोड़ने के लिए क्रॉसओवर केबल (Crossover Cable) तैयार करना:
जब दो समान उपकरणों (जैसे दो कंप्यूटरों या दो स्विचों) को बिना किसी नेटवर्क स्विच के सीधे आपस में जोड़ना हो, तो क्रॉसओवर केबल की आवश्यकता होती है। इसके एक सिरे पर T568B मानक और दूसरे सिरे पर T568A मानक के अनुसार क्रिम्पिंग की जाती है।
वायरिंग का रंग क्रम (Color Coding):
|
पिन नंबर |
सिरा 1 (Side A - T568B Standard) |
सिरा 2 (Side B - T568A Standard) |
|---|---|---|
|
1 |
White-Orange (सफेद-नारंगी) |
White-Green (सफेद-हरा) (पिन 3 पर जाएगा) |
|
2 |
Orange (नारंगी) |
Green (हरा) (पिन 6 पर जाएगा) |
|
3 |
White-Green (सफेद-हरा) |
White-Orange (सफेद-नारंगी) (पिन 1 पर जाएगा) |
|
4 |
Blue (नीला) |
Blue (नीला) |
|
5 |
White-Blue (सफेद-नीला) |
White-Blue (सफेद-नीला) |
|
6 |
Green (हरा) |
Orange (नारंगी) (पिन 2 पर जाएगा) |
|
7 |
White-Brown (सफेद-भूरा) |
White-Brown (सफेद-भूra) |
|
8 |
Brown (भूरा) |
Brown (भूरा) |
बनाने की विधि:
- कैट-5e या कैट-6 (LAN केबल) के बाहरी इंसुलेशन को स्ट्रिपर की मदद से लगभग 1.5 सेमी छीलें।
- अंदर के ट्विस्टेड तारों को खोलकर सीधा करें और ऊपर दी गई तालिका के अनुसार Side A का रंग क्रम सेट करें।
- तारों को एक कटर से बिल्कुल बराबर काटें और उन्हें RJ45 कनेक्टर के अंदर पूरा आगे तक धकेलें।
- क्रिम्पिंग टूल में कनेक्टर को रखकर जोर से दबाएं।
- केबल के दूसरे छोर पर Side B (T568A) का रंग क्रम सेट करें और दोबारा क्रिम्प करें।
- अंत में, LAN Cable Tester में केबल के दोनों सिरों को लगाएं। टेस्टर की LED लाइट्स का क्रम (1-3, 2-6, 3-1, 6-2) क्रॉसओवर केबल के सही होने की पुष्टि करेगा।
संचार इलेक्ट्रॉनिक्स
ट्रेनर किट पर AM और FM का उपयोग करके विभिन्न संकेतों को मॉड्युलेट और डीमॉड्युलेट करें और तरंगों का अवलोकन करें।
IC आधारित AM रिसीवर और FM ट्रांसमीटर का निर्माण और परीक्षण करें।
IC आधारित AM ट्रांसमीटर का निर्माण और परीक्षण करें और ट्रांसमीटर की शक्ति का परीक्षण करें। मॉड्युलेशन इंडेक्स की गणना करें। दिए गए FM रिसीवर सेट को खोलें और विभिन्न चरणों (AM सेक्शन, ऑडियो एम्पलीफायर सेक्शन आदि) की पहचान करें।
AM किट का उपयोग करके दो संकेतों को मॉड्युलेट करें, तरंग पथ बनाएं और मॉड्युलेशन का प्रतिशत (%) ज्ञात करें।
PAM, PPM, PWM तकनीकों का उपयोग करके एक संकेत को मॉड्युलेट और डीमॉड्युलेट करें।
संचार इलेक्ट्रॉनिक्स (Communication Electronics) आधुनिक वायरलेस और वायर्ड संचार प्रणालियों का आधार है। इसमें सिग्नलों को लंबी दूरी तक भेजने के लिए मॉड्युलेशन (Modulation) और उन्हें वापस प्राप्त करने के लिए डीमॉड्युलेशन (Demodulation) की प्रक्रिया की जाती है।
नीचे आपके लैब प्रैक्टिकल के लिए एनालॉग मॉड्युलेशन (AM, FM) और पल्स मॉड्युलेशन (PAM, PPM, PWM) की विस्तृत प्रायोगिक गाइड दी गई है:
1. AM और FM मॉड्युलेशन तथा डीमॉड्युलेशन (AM & FM Techniques)
A. आयाम मॉड्युलेशन (Amplitude Modulation - AM)
AM में कैरियर तरंग (Carrier Wave) का आयाम, सूचना सिग्नल (Modulating Signal) के अनुसार बदलता है।
- ट्रेनर किट पर कनेक्शन: 1. फंक्शन जनरेटर से कम आवृत्ति का ऑडियो सिग्नल (1 {kHz} साइन वेव) लें और उसे AM मॉड्युलेटर किट के 'Modulating Input' पर दें। 2. किट के आंतरिक हाई-फ्रीक्वेंसी कैरियर जनरेटर (100 {kHz} से 1 {MHz}) को कैरियर इनपुट से जोड़ें। 3. मॉड्युलेटर के आउटपुट को CRO/DSO के चैनल-1 से जोड़ें। आपको स्क्रीन पर एक लिफाफे (Envelope) के आकार की तरंग दिखाई देगी।
- डीमॉड्युलेशन: AM आउटपुट को सीधे डायोड डिटेक्टर (Diode Detector) सर्किट में इनपुट करें। डायोड के बाद लगे लो-पास फ़िल्टर (RC नेटवर्क) के आउटपुट को CRO पर देखें; आपको आपका मूल 1 {kHz} का ऑडियो सिग्नल वापस मिल जाएगा।
B. आवृत्ति मॉड्युलेशन (Frequency Modulation - FM)
FM में कैरियर तरंग की आवृत्ति (Frequency), सूचना सिग्नल के अनुसार बदलती है, जबकि उसका आयाम स्थिर रहता है। यह शोर (Noise) से मुक्त होता है।
- ट्रेनर किट पर कनेक्शन: 1. ऑडियो सिग्नल को VCO (Voltage Controlled Oscillator) या FM मॉड्युलेटर के इनपुट पर दें। 2. आउटपुट को CRO पर देखने पर आप पाएंगे कि जब इनपुट वोल्टेज बढ़ता है, तो कैरियर के चक्र पास-पास (High Frequency) आ जाते हैं, और वोल्टेज घटने पर दूर-दूर (Low Frequency) हो जाते हैं।
- डीमॉड्युलेशन: FM सिग्नल को रेशियो डिटेक्टर (Ratio Detector) या PLL (Phase Locked Loop - IC 565) सर्किट में देकर मूल सिग्नल प्राप्त किया जाता है।
2. IC आधारित AM/FM ट्रांसमीटर और रिसीवर
A. IC आधारित AM ट्रांसमीटर और शक्ति (Power) परीक्षण
बनावट (Construction): इसके लिए IC 1496 (Balanced Modulator/Demodulator) का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ट्यून्ड LC सर्किट जोड़कर एंटीना के माध्यम से सिग्नल प्रसारित किया जाता है।
शक्ति का परीक्षण (Power Testing): ट्रांसमीटर के आउटपुट को एक RF पावर मीटर या 50 Omega के डमी लोड से जोड़कर आउटपुट करंट (I_{rms}) मापा जाता है। पावर का सूत्र है:
P = I_{rms}^2 × R
B. IC आधारित FM ट्रांसमीटर
- बनावट: इसमें एक छोटे एफएम माइक (Condenser Mic) के सिग्नल को IC 741 से एम्पलीफाई करके ट्रांजिस्टर (जैसे BF494) या IC MAX2606 आधारित ऑसिलेटर को दिया जाता है। यह 88 {MHz} - 108 {MHz} (FM कमर्शियल बैंड) पर सिग्नल ट्रांसमिट करता है।
C. IC आधारित AM रिसीवर
- बनावट: इसके लिए IC TDA1220 या IC ZN414 का उपयोग किया जाता है। एंटीना द्वारा पकड़े गए सिग्नल को ट्यूनिंग कैपेसिटर (Gang Condenser) से सिलेक्ट करके सीधे IC के इनपुट पर दिया जाता है, जो अंदर ही डीमॉड्युलेट होकर ईयरफोन या स्पीकर पर सुनाई देता है।
3. मॉड्युलेशन इंडेक्स और मॉड्युलेशन का प्रतिशत (%) ज्ञात करना
जब दो सिग्नलों (सूचना और कैरियर) को AM किट में मिलाकर मॉड्युलेट किया जाता है, तो स्क्रीन पर बनी तरंग के अधिकतम और न्यूनतम आयाम को मापकर मॉड्युलेशन इंडेक्स (m) निकाला जाता है।
गणना की विधि:
CRO की ग्रिड (Divisions) की सहायता से तरंग का अधिकतम वोल्टेज (V_{max}) और न्यूनतम वोल्टेज (V_{min}) मापें।
मॉड्युलेशन इंडेक्स (m) का सूत्र:
m = {V_{max} - V_{min}}/{V_{max} + V_{min}}
मॉड्युलेशन का प्रतिशत (% Modulation):
% { Modulation} = m × 100
- निष्कर्ष: यदि % { Modulation} = 100% है, तो यह क्रिटिकल मॉड्युलेशन है। यदि यह 100% से अधिक हो जाता है, तो उसे Over-modulation कहते हैं, जिससे सिग्नल खराब (Distort) हो जाता है।
4. FM रिसीवर सेट के विभिन्न चरणों (Stages) की पहचान
एक व्यावसायिक FM रिसीवर रेडियो को खोलने पर उसमें निम्नलिखित मुख्य खंड (Sections) दिखाई देते हैं, जिनका क्रम इस प्रकार होता है:
- पहचान की विधि: * AM/FM गैंग कंडेनसर (Tuning Knob): यह प्लास्टिक का बड़ा चौकोर कंपोनेंट होता है जिससे स्टेशन ट्यून होता है।
- IF ट्रांसफार्मर (IFT): ये छोटी धातु की डिब्बियां (शील्डेड कैन) होती हैं जो पीले, सफेद या काले रंग के स्क्रू कोर के साथ होती हैं। FM के लिए यह 10.7 {MHz} पर सेट होती हैं।
- ऑडियो एम्पलीफायर सेक्शन: यह हमेशा लाउडस्पीकर के तारों के पास होता है, जिसमें एक छोटी ऑडियो आईसी (जैसे LM386) और कुछ इलेक्ट्रोलाइटिक कैपेसिटर लगे होते हैं।
5. पल्स मॉड्युलेशन तकनीकें (PAM, PPM, PWM)
ये तकनीकें डिजिटल संचार का आधार हैं, जहाँ एक निरंतर एनालॉग सिग्नल को पल्स (Pulses) के रूप में बदला जाता है। इसके लिए IC 555 या IC 4016 आधारित किट का उपयोग होता है।
A. पल्स एम्पलीट्यूड मॉड्युलेशन (PAM)
- सिद्धांत: इसमें पल्स ट्रेन (कैरियर) का आयाम (Amplitude), सूचना सिग्नल के वोल्टेज के अनुसार बदलता है।
- परीक्षण: CRO पर देखने पर पल्स की ऊँचाई इनपुट साइन वेव के आकार की तरह ऊपर-नीचे होती दिखाई देगी। डीमॉड्युलेशन के लिए इसे केवल एक लो-पास फ़िल्टर से गुजारा जाता है।
B. पल्स विड्थ मॉड्युलेशन (PWM)
- सिद्धांत: इसमें पल्स का आयाम स्थिर रहता है, लेकिन पल्स की चौड़ाई (Width / Duration) सूचना सिग्नल के अनुसार बदलती है। इसे 'पल्स ड्यूरेशन मॉड्युलेशन' (PDM) भी कहते हैं।
- परीक्षण: इनपुट वोल्टेज के पीक पर पल्स सबसे चौड़ी और शून्य वोल्टेज पर सबसे पतली दिखाई देगी।
C. पल्स पोजीशन मॉड्युलेशन (PPM)
- सिद्धांत: इसमें पल्स का आयाम और चौड़ाई दोनों स्थिर रहते हैं, लेकिन पल्स के शुरू होने का स्थान (Position) सूचना सिग्नल के अनुसार आगे या पीछे खिसकता है।
- परीक्षण: आमतौर पर PWM सिग्नल को एक डिफरेंशिएटर सर्किट और मोनोस्टेबल मल्टीवाइब्रेटर से गुजारकर ही PPM सिग्नल बनाया जाता है। CRO पर पल्स अपनी जगह से हॉरिजॉन्टल दिशा में हिलती (Jitter होती) हुई दिखाई देती है।
माइक्रोकंट्रोलर (8051)
दिए गए माइक्रोकंट्रोलर किट पर विभिन्न ICs और उनके कार्यों की पहचान करें।
RAM और ROM की एड्रेस रेंज की पहचान करें। क्रिस्टल फ्रीक्वेंसी मापें और इसे कंट्रोलर से कनेक्ट करें।
कंट्रोलर के पोर्ट पिन की पहचान करें और इनपुट और आउटपुट ऑपरेशन के लिए पोर्ट कॉन्फ़िगर करें।
8051 माइक्रोकंट्रोलर का उपयोग करके, 8 LED को पोर्ट से कनेक्ट करें और स्विच से LED को ब्लिंक करें।
टाइमर का उपयोग करके LED को विलंब के साथ इनिशियलाइज़ करें, लोड करें और ऑन करें। बाहरी इवेंट्स को गिनने के लिए टाइमर का उपयोग इवेंट काउंटर के रूप में करें। सरल प्रोग्राम दर्ज करना, चलाना और परिणामों की निगरानी करना प्रदर्शित करें।
8051 माइक्रोकंट्रोलर के साथ असेंबलिंग लैंग्वेज प्रोग्राम चलाएं, इनपुट पोर्ट की रीडिंग की जांच करें और प्राप्त बाइट्स को माइक्रोकंट्रोलर के आउटपुट पोर्ट पर भेजें। इनपुट और आउटपुट के लिए स्विच और LCD का उपयोग करें।
8051 माइक्रोकंट्रोलर एक बेहद लोकप्रिय 8-बिट हार्वर्ड आर्किटेक्चर आधारित माइक्रोकंट्रोलर है। इसका उपयोग एम्बेडेड सिस्टम (Embedded Systems) और औद्योगिक स्वचालन में बुनियादी नियंत्रण कार्यों के लिए किया जाता है।
आपके माइक्रोकंट्रोलर लैब प्रैक्टिकल के लिए आवश्यक सभी चरणों, सर्किट कॉन्फ़िगरेशन और कोड लॉजिक की विस्तृत गाइड नीचे दी गई है:
1. 8051 माइक्रोकंट्रोलर किट और आंतरिक संरचना की पहचान
एक मानक 8051 ट्रेनर किट या डेवलपमेंट बोर्ड पर निम्नलिखित मुख्य भाग होते हैं:
- मुख्य IC (8051/89S52): यह 40-पिन की मुख्य माइक्रोकंट्रोलर आईसी होती है।
- MAX232 IC: इसका उपयोग माइक्रोकंट्रोलर (TTL लॉजिक) और कंप्यूटर (RS232 लॉजिक) के बीच सीरियल कम्युनिकेशन (UART) के लिए वोल्टेज स्तर को सुसंगत बनाने में होता है।
- 7805 वोल्टेज रेगुलेटर: यह बोर्ड को मिलने वाली बाहरी बिजली को सटीक +5V DC में बदलता है, जो 8051 को चालू रखने के लिए आवश्यक है।
RAM और ROM की एड्रेस रेंज
8051 में डेटा और प्रोग्राम के लिए अलग-अलग मेमोरी स्पेस (Harvard Architecture) होता है:
- आंतरिक RAM (Internal RAM): इसकी क्षमता 128 बाइट्स होती है। इसकी एड्रेस रेंज 00H से 7FH तक होती है। (इसमें कार्यशील रजिस्टर बैंक, बिट-एड्रेसेबल एरिया और सामान्य स्क्रैचपैड शामिल हैं)।
- आंतरिक ROM (Internal ROM/Flash): इसकी क्षमता आमतौर पर 4 KB होती है। इसकी एड्रेस रेंज 0000H से 0FFFH तक होती है। यहाँ आपका असेंबली या सी-प्रोग्राम स्टोर होता है।
क्रिस्टल ऑसिलेटर (Crystal Oscillator) और फ्रीक्वेंसी
8051 को काम करने के लिए एक सटीक क्लॉक सिग्नल की आवश्यकता होती है। इसके लिए माइक्रोकंट्रोलर के पिन 18 (XTAL2) और पिन 19 (XTAL1) के बीच एक क्वार्ट्ज क्रिस्टल ऑसिलेटर जोड़ा जाता है, जिसके साथ दो 33pF के सिरेमिक कैपेसिटर ग्राउंड से जुड़े होते हैं।
- सामान्य आवृत्ति (Frequency): लैब में आमतौर पर 11.0592 MHz आवृत्ति के क्रिस्टल का उपयोग किया जाता है। यह विशिष्ट आवृत्ति इसलिए चुनी जाती है ताकि सीरियल कम्युनिकेशन के दौरान सटीक बॉड रेट (Baud Rate, जैसे 9600) प्राप्त किया जा सके।
2. पोर्ट पिन की पहचान और इनपुट/आउटपुट कॉन्फ़िगरेशन
8051 माइक्रोकंट्रोलर में कुल 40 पिन होती हैं, जिनमें से 32 पिन आई/ओ (Input/Output) ऑपरेशन्स के लिए होती हैं। ये 32 पिन 8-8 के चार पोर्ट्स में बंटी होती हैं:
- Port 0 (पिन 32 से 39): यह एक ओपन-ड्रेन पोर्ट है। इसे सामान्य I/O की तरह इस्तेमाल करने के लिए बाहरी पुल-अप रेसिस्टर्स (Pull-up Resistors) लगाना अनिवार्य है।
- Port 1 (पिन 1 से 8): यह पूरी तरह से सामान्य उद्देश्य (General Purpose) I/O पोर्ट है, जिसमें आंतरिक पुल-अप रेसिस्टर्स होते हैं।
- Port 2 (पिन 21 से 28): सामान्य I/O के अलावा, यह उच्च-बाइट मेमोरी एड्रेस (A_8 - A_{15}) ले जाता है।
- Port 3 (पिन 10 से 17): यह पोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके सभी पिन्स के पास विशेष वैकल्पिक कार्य (जैसे Interrupts, Timers, Serial Tx/Rx) होते हैं।
पोर्ट को इनपुट या आउटपुट के रूप में कॉन्फ़िगर करना (Assembly Rule):
8051 में रीसेट के बाद सभी पोर्ट स्वतः आउटपुट (HIGH) मोड में होते हैं।
- आउटपुट ऑपरेशन: किसी पोर्ट से डेटा बाहर भेजने के लिए सीधे उस पर मान लिख दें (जैसे: MOV P1, #00H पोर्ट 1 के सभी पिन्स को LOW कर देगा)।
- इनपुट ऑपरेशन: किसी पोर्ट पिन से बाहरी स्विच या सेंसर का डेटा पढ़ने से पहले, उस पिन पर लॉजिक '1' (HIGH) लिखना अनिवार्य है।
- उदाहरण: SETB P1.0 या MOV P1, #0FFH करने पर पोर्ट इनपुट मोड में आ जाता है। इसके बाद ही MOV A, P1 कमांड काम करेगी।
3. 8 LED और स्विच इंटरफेसिंग (प्रोग्राम दर्ज करना और चलाना)
सर्किट कनेक्शन:
- 8 LED के कैथोड को 330 Omega के रेसिस्टर्स के माध्यम से ग्राउंड करें और उनके एनोड को Port 1 (P_1.0 से P_1.7) से जोड़ें।
- एक पुश-बटन स्विच को Port 2 की पिन 0 (P_2.0) और ग्राउंड के बीच जोड़ें। पिन P_2.0 पर एक 10 {k} Omega का पुल-अप रेसिस्टर +5 {V} से जोड़ें।
असेंबली लैंग्वेज प्रोग्राम (Program):
यह प्रोग्राम जांच करेगा कि क्या स्विच दबाया गया है। यदि हाँ, तो पोर्ट 1 पर लगी सभी 8 LED ब्लिंक (चालू-बंद) होने लगेंगी।
किट पर प्रोग्राम चलाने की विधि:
- किट को PC से RS232 केबल द्वारा जोड़ें और Keil uVision सॉफ्टवेयर में कोड लिखकर कंपाइल करें और .hex फ़ाइल बनाएं।
- किट के बूटलोडर सॉफ्टवेयर (जैसे ISP Programmer) को खोलें, सही COM पोर्ट चुनें।
- .hex फाइल को लोड करके 'Write/Program' बटन दबाएं। प्रोग्राम माइक्रोकंट्रोलर की ROM में लोड हो जाएगा।
- किट पर लगे 'RESET' बटन को दबाएं और परिणाम की निगरानी करें।
4. टाइमर और काउंटर के रूप में 555/8051 टाइमर का उपयोग
8051 में दो 16-बिट टाइमर होते हैं: Timer 0 और Timer 1। इनका नियंत्रण TMOD (Timer Mode) और TCON (Timer Control) रजिस्टरों द्वारा होता है।
A. सटीक विलंब (Delay) के लिए टाइमर का उपयोग
जब टाइमर को टाइमिंग मोड में सेट किया जाता है, तो यह आंतरिक क्रिस्टल आवृत्ति से चलता है।
- लॉजिक: हमें 50 {ms} का विलंब उत्पन्न करना है। इसके लिए Timer 0 को Mode 1 (16-बिट) में इनिशियलाइज करेंगे।
- TMOD सेट करना: TMOD = 01H (Timer 0, Mode 1)
- रजिस्टर लोड करना: 11.0592 { MHz} क्रिस्टल के लिए 50 {ms} की काउंट वैल्यू निकालने पर रजिस्टरों में TH0 = 3CH और TL0 = B0H लोड करना होता है।
B. बाहरी इवेंट्स को गिनने के लिए इवेंट काउंटर (Event Counter)
जब TMOD रजिस्टर की C/bar{T} बिट को '1' सेट किया जाता है, तो टाइमर एक काउंटर बन जाता है। यह आंतरिक क्लॉक के बजाय बाहरी पिन पर आने वाली पल्स को गिनता है।
- Timer 0 काउंटर इनपुट: पिन 14 (P_3.4)
- TMOD सेट करना: TMOD = 05H (Timer 0, Mode 1, Counter Mode)
- परीक्षण: जब आप पिन 14 (P_3.4) पर जुड़े किसी बाहरी स्विच को दबाएंगे, तो हर बार बटन दबाने पर TL0 का मान 1 अंक बढ़ जाएगा और आउटपुट पोर्ट 1 की LED पर बाइनरी रूप में बदलता हुआ दिखेगा।
5. इनपुट पोर्ट पढ़ना, आउटपुट पोर्ट पर भेजना और LCD इंटरफेसिंग
यह प्रयोग एक पूर्ण डेटा ट्रांसफर और विजुअल डिस्प्ले प्रणाली को दर्शाता है।
सर्किट सेटअप:
- इनपुट: पोर्ट 0 (P_0) पर 8-डिप स्विच (Dip Switches) का एक सेट जोड़ें (पुल-अप रेसिस्टर्स के साथ)।
- आउटपुट 1: पोर्ट 1 (P_1) पर 8 LED जोड़ें।
-
आउटपुट 2 (16x2 LCD Display):
- LCD की डेटा पिन्स (D_0 - D_7) rightarrow Port 2 (P_2)
- LCD की नियंत्रण पिन्स: RS rightarrow P_3.5, RW rightarrow P_3.6, E (Enable) rightarrow P_3.7
असेंबली लैंग्वेज प्रोग्राम (Data Transfer & LCD Character Display):
सत्यापन और परिणाम की जांच (Testing):
- कोड को कंपोनेंट ट्रेनर किट पर फ्लैश (डाउनलोड) करें।
- पोर्ट 0 पर लगे स्विचों का कोई संयोजन सेट करें (जैसे: 01010101 - एक स्विच ऑन, एक ऑफ)।
- आप देखेंगे कि पोर्ट 1 पर लगी LED भी ठीक इसी क्रम (01010101) में जल उठेंगी।
- साथ ही, LCD स्क्रीन पर उस बाइनरी कोड के समतुल्य ASCII कैकेक्टर (जैसे इस केस में अक्षर 'U') स्क्रीन पर दिखाई देगा। यह इनपुट रीडिंग और आउटपुट रूटिंग के पूरी तरह सफल होने की पुष्टि करता है।
सेंसर, ट्रांसड्यूसर और अनुप्रयोग
प्रक्रिया उद्योगों में उपयोग होने वाले सेंसरों की पहचान करें, जैसे कि आरटीडी, तापमान आईसी, थर्मोकपल, प्रॉक्सिमिटी स्विच (प्रेरक, संधारित्र और फोटोइलेक्ट्रिक), लोड सेल, स्ट्रेन गेज, एलवीडीटी पीटी 100 (प्लैटिनम प्रतिरोध सेंसर), जल स्तर सेंसर, थर्मोस्टेट फ्लोट स्विच, फ्लोट वाल्व आदि।
इन सेंसरों को उनके स्वरूप के आधार पर पहचानें।
थर्मोकपल का उपयोग करके जलती हुई आग का तापमान मापें और डेटा चार्ट के संदर्भ में रीडिंग रिकॉर्ड करें।
आरटीडी का उपयोग करके जलती हुई आग का तापमान मापें और डेटा चार्ट के संदर्भ में रीडिंग रिकॉर्ड करें। एलवीडीटी का डीसी वोल्टेज मापें।
संधारित्र, प्रेरक और फोटोइलेक्ट्रिक प्रॉक्सिमिटी सेंसरों का उपयोग करके विभिन्न उद्देश्यों का पता लगाएं।
सेंसर और ट्रांसड्यूसर (Sensors and Transducers) आधुनिक औद्योगिक स्वचालन (Industrial Automation) और प्रक्रिया उद्योगों (Process Industries) की आंख और कान होते हैं। ये भौतिक राशियों (जैसे तापमान, दबाव, दूरी, स्तर) को विद्युत सिग्नलों में बदलते हैं।
आपके प्रैक्टिकल के सभी भागों की विस्तृत मार्गदर्शिका और डेटा रिकॉर्ड करने की विधि नीचे दी गई है:
1. प्रक्रिया उद्योगों में उपयोग होने वाले सेंसरों की पहचान
औद्योगिक सेंसरों को उनके भौतिक स्वरूप, बनावट और टर्मिनलों के आधार पर आसानी से पहचाना जा सकता है:
|
सेंसर का नाम |
स्वरूप और बनावट (Physical Appearance) |
मुख्य अनुप्रयोग (Application) |
|---|---|---|
|
थर्मोकपल (Thermocouple) |
इसके सिरे पर दो अलग-अलग धातुओं के तारों को आपस में वेल्ड (Twist) किया जाता है। इसके ऊपर अक्सर एक सुरक्षात्मक धातु की नली (Sheath) और सिरे पर एक सिरेमिक ब्लॉक होता है। |
भट्टियों (Furnaces) और बॉयलर का बहुत उच्च तापमान मापने में। |
|
RTD / PT100 |
यह आमतौर पर एक चमकदार स्टील प्रोब (Probe) के रूप में होता है। PT100 का मतलब है कि 0^circ {C} पर इसका प्रतिरोध सटीक 100, Omega होता है। इसके टर्मिनल बॉक्स से 2, 3 या 4 तार बाहर निकलते हैं। |
उद्योगों में अत्यधिक सटीक तापमान नियंत्रण के लिए। |
|
तापमान IC (जैसे LM35) |
यह दिखने में एक छोटे काले ट्रांजिस्टर (TO-92 पैकेज) जैसी होती है, जिसमें तीन पिन (VCC, Output, GND) होते हैं। |
इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और कम तापमान वाले उपकरणों में। |
|
प्रॉक्सिमिटी स्विच (Proximity Switches) |
ये बेलनाकार (Cylindrical) थ्रेडेड प्लास्टिक या धातु की बॉडी में होते हैं। इनके आगे एक एलईडी लाइट होती है जो ऑब्जेक्ट पास आने पर जलती है। |
बिना छुए किसी वस्तु की उपस्थिति का पता लगाने में। |
|
LVDT |
यह एक खोखली बेलनाकार नली होती है जिसके अंदर एक जंग-रोधी लोहे की रॉड (Core) स्वतंत्र रूप से आगे-पीछे सरक सकती है। इसमें 5 या 6 कनेक्टिंग तार होते हैं। |
अत्यंत बारीक विस्थापन या दूरी (Displacement) मापने में। |
|
लोड सेल और स्ट्रेन गेज (Load Cell & Strain Gauge) |
लोड सेल धातु (एल्युमिनियम या स्टील) का एक मजबूत ब्लॉक होता है, जिस पर बारीक तारों का नेटवर्क (स्ट्रेन गेज) चिपका होता है। |
वेइंग मशीन (वजन मापने) और क्रेन में। |
|
फ्लोट स्विच / फ्लोट वाल्व (Float Switch) |
यह एक तैरने वाली खोखली प्लास्टिक की गेंद या ड्रम होता है, जो पानी का स्तर बदलने पर ऊपर-नीचे होता है और इसके अंदर का स्विच ऑन/ऑफ होता है। |
पानी की टंकियों में ऑटो-कटऑफ के लिए। |
2. थर्मोकपल और RTD द्वारा तापमान मापन (प्रायोगिक विधि)
A. थर्मोकपल (Thermocouple) से मापन:
- सिद्धांत: यह सीबैक प्रभाव (Seebeck Effect) पर काम करता है। जब इसके जंक्शन को गर्म किया जाता है, तो यह मिलीवोल्ट ({mV}) में बहुत छोटा वोल्टेज उत्पन्न करता है।
- विधि: थर्मोकपल के सिरों को एक डिजिटल टेम्परेचर इंडिकेटर से जोड़ें। इसके प्रोब को जलती हुई आग (आंच) के पास ले जाएं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, उत्पन्न \text{mV} बढ़ेगा और इंडिकेटर पर तापमान दिखाई देगा।
B. RTD (PT100) से मापन:
- सिद्धांत: यह सकारात्मक तापमान गुणांक (PTC) पर काम करता है। तापमान बढ़ने पर इसका प्रतिरोध ({Resistance}) बढ़ता है।
- विधि: PT100 के तारों को मल्टीमीटर (Ohm मोड) या RTD इंडिकेटर से जोड़ें। आग के संपर्क में आने पर इसका प्रतिरोध 100, Omega से ऊपर बढ़ने लगेगा (जैसे 100^circ {C} पर लगभग 138.5, Omega).
प्रयोगात्मक डेटा चार्ट (Observation Table):
|
समय (सेकंड) |
थर्मोकपल रीडिंग (^circ{C}) |
RTD (PT100) प्रतिरोध (Omega) |
|
|---|---|---|---|
|
0 (सामान्य) |
30^circ {C} |
111.6, Omega |
30^circ {C} |
|
30 |
150^circ {C} |
157.3, Omega |
150^circ {C} |
|
60 |
320^circ {C} |
219.1, Omega |
320^circ {C} |
|
90 |
450^circ {C} |
264.2, Omega |
450^circ {C} |
नोट: थर्मोकपल बहुत तेजी से प्रतिक्रिया (Fast Response) देता है और बहुत उच्च तापमान माप सकता है, जबकि RTD थोड़ा धीमा होता है लेकिन अधिक सटीक होता है।
3. LVDT का DC वोल्टेज मापन (Linear Variable Differential Transformer)
LVDT एक एसी (AC) आधारित ट्रांसड्यूसर है, लेकिन आधुनिक किट में इसके साथ एक फेज-सेंसिटिव डिटेक्टर (PSD) सर्किट जुड़ा होता है जो आउटपुट को DC वोल्टेज में बदल देता है।
मापन की विधि:
- LVDT के मुख्य भाग (Core) को बिल्कुल बीच में (Central/Null Position) रखें।
- इस स्थिति पर आउटपुट टर्मिनलों पर मल्टीमीटर (DC Volt मोड) से वोल्टेज मापें। आउटपुट 0 {V} होना चाहिए।
- अब कोर को धीरे-धीरे दाईं ओर (Positive Direction) खिसकाएं और वोल्टेज नोट करें (वोल्टेज धनात्मक + बढ़ेगा)।
- इसके बाद कोर को बाईं ओर (Negative Direction) खिसकाएं (वोल्टेज ऋणात्मक - बढ़ेगा)।
LVDT डेटा चार्ट:
|
कोर का विस्थापन (Displacement in mm) |
आउटपुट DC वोल्टेज (Volts) |
|---|---|
|
-5 mm |
-2.5 V |
|
-2 mm |
-1.0 V |
|
0 mm (Null Position) |
0.0 V |
|
+2 mm |
+1.0 V |
|
+5 mm |
+2.5 V |
4. प्रॉक्सिमिटी सेंसरों का उपयोग करके विभिन्न वस्तुओं (Objects) का पता लगाना
सेंसर किट पर तीनों प्रॉक्सिमिटी सेंसरों को 24 {V DC} बिजली की सप्लाई से जोड़ें और उनके आउटपुट पर एक छोटी LED या बजर लगाएं। अब अलग-अलग वस्तुओं को सेंसर के सामने लाकर परीक्षण करें:
A. इंडक्टिव प्रॉक्सिमिटी सेंसर (Inductive - प्रेरक):
- कार्य: यह केवल चुंबकीय/धातु (Metallic) वस्तुओं का पता लगाता है।
- परीक्षण: जब आप इसके सामने लोहे की कील, तांबे का तार या एल्युमिनियम लाएंगे, तो यह ऑन (LED चालू) हो जाएगा। लेकिन प्लास्टिक, लकड़ी या कांच लाने पर यह कोई प्रतिक्रिया नहीं देगा।
B. कैपेसिटिव प्रॉक्सिमिटी सेंसर (Capacitive - संधारित्र):
- कार्य: यह धातु और गैर-धातु (Non-metallic) दोनों प्रकार की वस्तुओं का पता लगा सकता है (जैसे तरल पदार्थ, प्लास्टिक, कांच, लकड़ी)। यह वस्तु के डाइइलेक्ट्रिक स्थिरांक पर काम करता है।
- परीक्षण: इसके सामने हाथ ले जाने पर, पानी से भरा ग्लास लाने पर या प्लास्टिक का डिब्बा लाने पर भी यह तुरंत डिटेक्ट (LED ऑन) कर लेता है।
C. फोटोइलेक्ट्रिक प्रॉक्सिमिटी सेंसर (Photoelectric):
- कार्य: यह प्रकाश तरंगों (Infrared Light Beam) के अवरोध या परावर्तन (Reflection) के सिद्धांत पर काम करता है। इसकी रेंज सबसे अधिक होती है।
- परीक्षण: इसके सामने कोई भी अपारदर्शी (Opaque) वस्तु (जैसे कार्डबोर्ड, कपड़ा, कोई भी बॉडी) आने पर यह प्रकाश किरण को रोक देता है, जिससे ऑब्जेक्ट की उपस्थिति का पता चल जाता है। इसका उपयोग कंवेयर बेल्ट पर सामान की गिनती करने में होता है।
एनालॉग आईसी अनुप्रयोग
आईसी 741, 723, 555, 7106, 7107 का उपयोग करके लैपटॉप प्रोटेक्टर, मोबाइल फोन चार्जर,
बैटरी मॉनिटर, मेटल डिटेक्टर, मेन डिटेक्टर, लेड एसिड बैटरी चार्जर, स्मोक डिटेक्टर, सोलर चार्जर,
इमरजेंसी लाइट, वाटर लेवल कंट्रोलर, डोर वॉचर जैसे अनुप्रयोग बनाएं।
एनालॉग आईसी (Analog ICs) जैसे IC 741 (ऑप-एम्प), IC 555 (टाइमर), और IC 723 (वोल्टेज रेगुलेटर) एम्बेडेड और पावर इलेक्ट्रॉनिक सर्किट की रीढ़ हैं। इन आईसी का उपयोग करके विभिन्न व्यावहारिक अनुप्रयोगों (Applications) के सर्किट लॉजिक और उनके ब्लॉक आरेख को नीचे समझाया गया है:
1. मुख्य आईसी और उनके कार्य (Key ICs & Functions)
- IC 741 (Operational Amplifier): यह एक बहुमुखी ऑप-एम्प है जो तुलना करने (Comparator), प्रवर्धन (Amplifier) और सिग्नल कंडीशनिंग का कार्य करता है।
- IC 555 (Timer IC): यह सटीक समय विलंब (Time Delay), पल्स जनरेशन (PWM) और ऑसिलेटर (Astable/Monostable) के रूप में काम करती है।
- IC 723 (Precision Voltage Regulator): यह एक समायोज्य (Adjustable) वोल्टेज रेगुलेटर आईसी है जो स्थिर आउटपुट और करंट लिमिट प्रोटेक्शन देती है।
- IC 7106 / 7107 (A/D Converters & Display Drivers): यह एनालॉग सिग्नल को डिजिटल में बदलकर सीधे LCD (7106) या LED (7107) डिस्प्ले को ड्राइव करती है (जैसे डिजिटल वोल्टमीटर में)।
2. व्यावहारिक अनुप्रयोग और सर्किट डिज़ाइन (Applications & Circuit Design)
A. लेड एसिड बैटरी चार्जर (Lead Acid Battery Charger)
- मुख्य आईसी: IC 723 और IC 741
- सिद्धांत: लेड एसिड बैटरी को चार्ज करने के लिए निरंतर वोल्टेज (Constant Voltage) और करंट लिमिटिंग की आवश्यकता होती है।
- कार्यप्रणाली: IC 723 का उपयोग मुख्य रेगुलेटर के रूप में किया जाता है जो सटीक 13.8V आउटपुट देता है। IC 741 को एक कम्पेरेटर की तरह जोड़ा जाता है; यह बैटरी के वोल्टेज की निगरानी करता है। जैसे ही बैटरी का वोल्टेज 13.8V (फुल चार्ज) तक पहुँचता है, IC 741 एक रिले (Relay) या ट्रांजिस्टर को ट्रिप कर देता है, जिससे ओवरचार्जिंग रुक जाती है।
B. वाटर लेवल कंट्रोलर (Water Level Controller)
- मुख्य आईसी: IC 555
- सिद्धांत: पानी की चालकता (Conductivity) का उपयोग करके पानी के स्तर का पता लगाया जाता है।
-
कार्यप्रणाली: IC 555 को Bistable Multivibrator मोड में कॉन्फ़िगर किया जाता है। पानी की टंकी में तीन प्रोब (Common, Low, High) डाले जाते हैं।
- जब पानी 'Low' स्तर से नीचे जाता है, तो IC 555 की पिन 2 (Trigger) एक्टिव होती है और रिले के माध्यम से मोटर चालू हो जाती है।
- जब पानी 'High' स्तर तक पहुँचता है, तो पिन 6 (Threshold) एक्टिव होती है, जिससे आउटपुट लो (LOW) हो जाता है और मोटर बंद हो जाती है।
C. मेटल डिटेक्टर (Metal Detector)
- मुख्य आईसी: IC 555
- सिद्धांत: यह एड़ी करंट (Eddy Current) और इंडक्टेंस (Inductance) में बदलाव के सिद्धांत पर काम करता है।
- कार्यप्रणाली: IC 555 को Astable Multivibrator के रूप में जोड़ा जाता है, जहाँ इसकी फ्रीक्वेंसी-निर्धारक शाखा में एक सर्च कॉइल (Search Coil) लगाई जाती है। सामान्य स्थिति में इससे एक निश्चित फ्रीक्वेंसी की आवाज (Buzzer) आती है। जैसे ही कोई धातु (Metal) कॉइल के पास आती है, कॉइल का इंडक्टेंस बदल जाता है, जिससे IC 555 की आउटपुट फ्रीक्वेंसी बदल जाती है और बजर की आवाज में बदलाव से धातु का पता चल जाता है।
D. बैटरी मॉनिटर / डिजिटल वोल्टमीटर (Battery Monitor)
- मुख्य आईसी: IC 7107 (LED डिस्प्ले के लिए) या IC 741 (सिंपल इंडिकेटर के लिए)
- सिद्धांत: एनालॉग वोल्टेज को मापना और उसे प्रदर्शित करना।
- कार्यप्रणाली: यदि साधारण इंडिकेटर बनाना हो, तो IC 741 को कम्पेरेटर मोड में लगाकर वोल्टेज स्तर कम होने पर रेड LED ऑन की जा सकती है। एक सटीक डिजिटल मॉनिटर के लिए, बैटरी का वोल्टेज IC 7107 के इनपुट पर दिया जाता है। यह आईसी आंतरिक रूप से एनालॉग-टू-डिजिटल कनवर्टर (ADC) का उपयोग करती है और 7-सेगमेंट LED डिस्प्ले पर सटीक वोल्टेज (जैसे 12.6V) प्रदर्शित करती है।
E. स्मोक डिटेक्टर (Smoke Detector)
- मुख्य आईसी: IC 741
- सिद्धांत: धुएं के कारण प्रकाश की तीव्रता में आने वाली कमी को मापना।
- कार्यप्रणाली: इसमें एक IR LED और एक फोटोडायोड (LDR/Photodiode) को एक कश (Chamber) में आमने-सामने लगाया जाता है। फोटोडायोड को IC 741 के इनपुट (Inverting Terminal) से जोड़ा जाता है। सामान्य स्थिति में प्रकाश सीधा पड़ता है। धुंआ आने पर प्रकाश बाधित होता है, जिससे फोटोडायोड का प्रतिरोध बदल जाता है। IC 741 इस बदलाव को तुरंत पकड़ लेता है और इसके आउटपुट पिन 6 से जुड़ा अलार्म बज उठता है।
F. ऑटोमैटिक इमरजेंसी लाइट (Emergency Light)
- मुख्य आईसी: IC 741 या सरल ट्रांजिस्टर स्विच
- सिद्धांत: मुख्य बिजली (Mains) कटने पर बैटरी सप्लाई को लोड (LEDs) से जोड़ना।
- कार्यप्रणाली: एक स्टेप-डाउन ट्रांसफार्मर से आने वाले DC वोल्टेज को कम्पेरेटर IC 741 की पिन 3 (Non-inverting) पर दिया जाता है। जब तक मेन्स सप्लाई चालू रहती है, आउटपुट हाई रहता है जो एक ट्रांजिस्टर के माध्यम से इमरजेंसी LEDs को बंद रखता है और बैटरी को चार्ज करता है। जैसे ही मेन्स सप्लाई कटती है, कम्पेरेटर का आउटपुट बदल जाता है और रिले/ट्रांजिस्टर तुरंत बैटरी की पावर को आपातकालीन LED लैंप से जोड़ देता है।
G. मोबाइल फोन चार्जर (Mobile Phone Charger)
- मुख्य आईसी: IC 723
- सिद्धांत: मोबाइल चार्जिंग के लिए स्थिर +5V DC और सुरक्षित करंट (जैसे 1A) की जरूरत होती है।
- कार्यप्रणाली: 230V AC को ट्रांसफार्मर और रेक्टिफायर की मदद से 9V DC में बदला जाता है। इस वोल्टेज को IC 723 रेगुलेटर में इनपुट किया जाता है। बाहरी रेसिस्टर्स को इस तरह सेट किया जाता है कि आउटपुट सटीक 5V मिले। IC 723 की Current Sensing (CS) और Current Limit (CL) पिन्स का उपयोग करके करंट को 1A पर लॉक कर दिया जाता है, जिससे शॉर्ट सर्किट होने पर भी मोबाइल सुरक्षित रहता है।
3. प्रयोगात्मक परीक्षण गाइड (Testing and Troubleshooting)
जब आप इन सर्किट को ब्रेडबोर्ड या लैब ट्रेनर किट पर असेंबल करें, तो इन बातों का ध्यान रखें:
- IC 741 परीक्षण: इनपुट बदलने पर पिन 6 का वोल्टेज संतृप्ति (Saturation Volts, लगभग +V_{cc} या -V_{cc}) की ओर स्विच होना चाहिए।
- IC 555 टाइमिंग: पिन 3 पर आउटपुट पल्स देखने के लिए ऑसिलोस्कोप (CRO) का उपयोग करें। थ्रेशोल्ड (पिन 6) और ट्रिगर (पिन 2) पर कैपेसिटर के चार्जिंग कर्व की जांच करें।
- IC 723 रेगुलेशन: बिना लोड (No-load) और लोड (Full-load) की स्थिति में वोल्टेज मापें। वोल्टेज स्थिर रहना चाहिए।
डिजिटल आईसी अनुप्रयोग
विभिन्न डिजिटल आईसी (डिजिटल डिस्प्ले, इवेंट काउंटर, स्टेपर मोटर ड्राइवर आदि) का उपयोग करके एप्लिकेशन बनाएं, जैसे कि ड्यूटी
साइकिल सेलेक्टर, फ्रीक्वेंसी मल्टीप्लायर, डिजिटल मेन्स रिजम्पशन अलार्म, डिजिटल लकी रैंडम नंबर जनरेटर,
डांसिंग एलईडी, काउंट डाउन टाइमर, क्लैप स्विच, स्टेपर मोटर कंट्रोल, डिजिटल क्लॉक, इवेंट काउंटर,
रिमोट जैमर।
डिजिटल आईसी (Digital ICs) जैसे कि 555 टाइमर, 7490 डिकेड काउंटर, 4017 जॉनसन काउंटर, और 7447 डिस्प्ले ड्राइवर का उपयोग करके कई बेहतरीन और व्यावहारिक प्रोजेक्ट्स (Applications) बनाए जा सकते हैं।
यहाँ आपके द्वारा उल्लेखित प्रमुख डिजिटल आईसी एप्लिकेशन्स की कार्यप्रणाली और उनमें उपयोग होने वाली मुख्य आईसी की सूची दी गई है:
1. क्लैप स्विच (Clap Switch)
यह सर्किट ताली की आवाज़ सुनकर किसी भी उपकरण (जैसे एलईडी या बल्ब) को ऑन या ऑफ कर देता है।
- मुख्य आईसी: 555 टाइमर और 7474 (Flip-Flop IC) या 4017 डिकेड काउंटर।
- कार्यप्रणाली: एक कंडेंसर माइक ताली की आवाज़ को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलता है। यह सिग्नल 555 टाइमर को ट्रिगर करता है, और आईसी 4017 आउटपुट की स्थिति को बदल देती है, जिससे रिले के माध्यम से उपकरण ऑन/ऑफ होता है।
2. डिजिटल घड़ी और इवेंट काउंटर (Digital Clock & Event Counter)
समय को डिजिटल रूप में दिखाना या किसी घटना (जैसे लोगों की संख्या) को गिनना।
- मुख्य आईसी: 7490 (Decade Counter), 7447 (BCD to 7-Segment Decoder), और 555 टाइमर।
- कार्यप्रणाली: 555 टाइमर से 1 हर्ट्ज (1Hz) की क्लॉक पल्स बनाई जाती है। 7490 आईसी इस पल्स को गिनता है और 7447 आईसी उस गिनती को 7-सेगमेंट डिस्प्ले पर इंसानों के पढ़ने योग्य अंकों (0-9) में बदल देती है।
3. डांसिंग एलईडी (Dancing LED / LED Chaser)
इस सर्किट में एलईडी एक के बाद एक क्रम में जलती हैं, जिससे "डांसिंग" या दौड़ती हुई लाइट का प्रभाव पैदा होता है।
- मुख्य आईसी: 555 टाइमर और CD4017 (Decade Counter)।
- कार्यप्रणाली: 555 टाइमर एक क्लॉक पल्स उत्पन्न करता है। CD4017 आईसी हर पल्स पर अपने 10 आउटपुट पिन्स को एक-एक करके हाई (High) करती है, जिससे उससे जुड़ी एलईडी क्रम में चमकती हैं।
4. डिजिटल लकी रैंडम नंबर जनरेटर (Digital Lucky Random Number Generator)
बटन दबाने पर यह सर्किट पूरी तरह से रैंडम (अचानक कोई भी) नंबर 0 से 9 के बीच डिस्प्ले करता है, जिसका उपयोग खेलों (जैसे लूडो या पासा) में होता है।
- मुख्य आईसी: 555 टाइमर, 7490 काउंटर, और 7447 ड्राइवर।
- कार्यप्रणाली: 555 टाइमर बहुत तेज गति से (High Frequency) पल्स बनाता है। जब आप बटन दबाते हैं, तो काउंटर तेजी से चलता है। बटन छोड़ते ही काउंटर जिस नंबर पर रुकता है, वही स्क्रीन पर दिख जाता है, जिससे यह पूरी तरह निष्पक्ष और रैंडम लगता है।
5. स्टेपर मोटर कंट्रोल (Stepper Motor Control)
रोबोटिक्स या प्रिंटर में स्टेपर मोटर को सटीक कोण (Angle) पर घुमाने के लिए।
- मुख्य आईसी: 555 टाइमर, CD4017, और ULN2003 (डार्लिंगटन एरे ड्राइवर)।
- कार्यप्रणाली: CD4017 आईसी मोटर की वाइंडिंग्स को एक निश्चित क्रम में पल्स भेजती है। ULN2003 आईसी मोटर को चलने के लिए पर्याप्त करंट प्रदान करती है।
अन्य महत्वपूर्ण एप्लिकेशन्स और उनकी आईसी:
|
एप्लिकेशन (Application) |
मुख्य डिजिटल आईसी (Key ICs Used) |
मुख्य उपयोग (Purpose) |
|---|---|---|
|
ड्यूटी साइकिल सेलेक्टर |
555 टाइमर, 74151 (Multiplexer) |
पीडब्लूएम (PWM) सिग्नल की चौड़ाई को नियंत्रित करने के लिए। |
|
फ्रीक्वेंसी मल्टीप्लायर |
CD4046 (Phase Locked Loop - PLL) |
इनपुट फ्रीक्वेंसी को दोगुना या कई गुना बढ़ाने के लिए। |
|
डिजिटल मेन्स रिजम्पशन अलार्म |
555 टाइमर, CD4011 (NAND Gate) |
बिजली (Light) कटने के बाद दोबारा आने पर अलार्म बजाकर सूचित करना। |
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काउंट डाउन टाइमर |
74192 (Up/Down Counter), 555 टाइमर |
सेट किए गए समय से उल्टी गिनती (जैसे 10, 9, 8...) शुरू करने के लिए। |
|
रिमोट जैमर |
555 टाइमर (High Frequency) |
टीवी रिमोट के इंफ्रारेड (IR) सिग्नल को ब्लॉक या डिस्टर्ब करने के लिए। |
नोट: इन सभी प्रोजेक्ट्स को ब्रेडबोर्ड या पीसीबी (PCB) पर आसानी से बनाया जा सकता है। इन्हें ठीक से काम करने के लिए आमतौर पर +5V या +9V की स्थिर डीसी (DC) बिजली आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
क्या आप इनमें से किसी एक विशेष सर्किट का पिन डायग्राम या विस्तृत वर्किंग मैकेनिज्म समझना चाहते हैं?
फाइबर ऑप्टिक संचार
दिए गए फाइबर ऑप्टिक ट्रेनर किट पर संसाधनों और उनकी आवश्यकता की पहचान करें। एनालॉग और डिजिटल डेटा संचारित और प्राप्त करने के लिए ऑप्टिकल फाइबर सेटअप तैयार करें।
AM, FM, PWM मॉड्यूलेशन और डीमॉड्यूलेशन का अध्ययन करने के लिए OFC ट्रेनर किट स्थापित करें।
ऑडियो सिग्नल और वॉइस लिंक का उपयोग करके OFC ट्रेनर किट के माध्यम से FM/PWM/PPM मॉड्यूलेशन और डीमॉड्यूलेशन का प्रदर्शन करें।
फाइबर ऑप्टिक संचार (Fiber Optic Communication - OFC) आधुनिक टेलीकॉम प्रणाली की रीढ़ है, जो प्रकाश (Light) के रूप में डेटा को बहुत तेज गति से लंबी दूरी तक भेजता है। आपके द्वारा दिए गए प्रायोगिक (Practical) उद्देश्यों के आधार पर, यहाँ OFC ट्रेनर किट के संसाधनों, सेटअप और विभिन्न मॉड्यूलेशन तकनीकों की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. OFC ट्रेनर किट के मुख्य संसाधन और उनकी आवश्यकता
OFC ट्रेनर किट पर काम शुरू करने से पहले उसके प्रमुख ब्लॉकों (Resources) को समझना जरूरी है:
- ऑप्टिकल ट्रांसमीटर (Optical Transmitter): इसमें आमतौर पर एक 660nm/850nm LED या लेजर डायोड होता है। इसका काम इलेक्ट्रिकल सिग्नल (एनालॉग/डिजिटल) को लाइट सिग्नल में बदलना है।
- ऑप्टिकल रिसीवर (Optical Receiver): इसमें एक फोटोडायोड (Photo-diode) या फोटोट्रांजिस्टर होता है, जो प्राप्त लाइट सिग्नल को वापस इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलता है।
- फाइबर ऑप्टिक केबल (OFC Cable): आमतौर पर किट के साथ 1 मीटर या 3 मीटर की प्लास्टिक ऑप्टिकल फाइबर (POF) केबल दी जाती है, जो ट्रांसमीटर और रिसीवर को जोड़ती है।
- सिग्नल जेनरेटर (Signal Generator): यह किट के अंदर ही मौजूद होता है, जो परीक्षण के लिए साइन वेव (Sine Wave), स्क्वायर वेव (Square Wave) या ऑडियो सिग्नल उत्पन्न करता है।
- मॉड्यूलेटर और डीमॉड्यूलेटर सर्किट: AM, FM, PWM, और PPM सिग्नलों को प्रोसेस करने के लिए इन-बिल्ट आईसी (ICs) और सर्किट।
2. एनालॉग और डिजिटल डेटा ट्रांसमिशन सेटअप
क) एनालॉग डेटा सेटअप (Analog Setup)
- कनेक्शन: फंक्शन जेनरेटर के साइन वेव आउटपुट को ट्रांसमीटर ब्लॉक के एनालॉग इनपुट से जोड़ें।
- फाइबर लिंक: ऑप्टिकल फाइबर केबल के एक सिरे को ट्रांसमीटर LED से और दूसरे सिरे को रिसीवर फोटोडायोड से जोड़ें।
- रिसेप्शन: रिसीवर के एनालॉग आउटपुट को सीआरओ (CRO/Oscilloscope) के चैनल-1 पर कनेक्ट करें।
- अवलोकन: फंक्शन जेनरेटर की फ्रीक्वेंसी और आयाम (Amplitude) बदलें और देखें कि रिसीवर पर वही एनालॉग सिग्नल बिना किसी विकृति (Distortion) के प्राप्त हो रहा है या नहीं।
ख) डिजिटल डेटा सेटअप (Digital Setup)
- कनेक्शन: फंक्शन जेनरेटर के स्क्वायर वेव आउटपुट (TTL सिग्नल) को ट्रांसमीटर के डिजिटल इनपुट से जोड़ें।
- फाइबर लिंक: फाइबर केबल को ट्रांसमीटर और रिसीवर के बीच कसकर जोड़ें।
- रिसेप्शन: रिसीवर के डिजिटल आउटपुट को CRO के चैनल-2 पर देखें।
- अवलोकन: डिजिटल सिग्नल (0 और 1) के राइज टाइम (Rise Time) और फॉल टाइम (Fall Time) की जांच करें ताकि डेटा लॉस का पता चल सके।
3. AM, FM, और PWM मॉड्यूलेशन व डीमॉड्यूलेशन का अध्ययन
OFC किट पर इन तकनीकों का परीक्षण करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
[इन्फॉर्मेशन सिग्नल] ---> [मॉड्यूलेटर सर्किट] ---> [OFC ट्रांसमीटर (LED)]
|
(फाइबर ऑप्टिक केबल)
|
[CRO / आउटपुट] <--- [डीमॉड्यूलेटर सर्किट] <--- [OFC रिसीवर (Photo-diode)]
Amplitude Modulation (AM)
- सिद्धान्त: इसमें प्रकाश की तीव्रता (Intensity) को इनपुट सिग्नल के अनुसार बदला जाता है।
- सेटअप: इनपुट साइन वेव को AM मॉड्यूलेटर में दें। इसके आउटपुट को फाइबर के जरिए भेजें। रिसीवर पर लगे डायोड डिटेक्टर (Envelope Detector) सर्किट से सिग्नल को डीमॉड्यूलेट करें और CRO पर मूल साइन वेव वापस प्राप्त करें।
Frequency Modulation (FM)
- सिद्धान्त: इसमें इनपुट सिग्नल के अनुसार कैरियर वेव की फ्रीक्वेंसी बदलती है। OFC में इसके लिए आमतौर पर VCO (Voltage Controlled Oscillator) IC 566 का उपयोग होता है।
- सेटअप: एनालॉग सिग्नल को VCO इनपुट पर दें। प्राप्त FM सिग्नल को फाइबर के जरिए ट्रांसमिट करें। रिसीवर साइड पर PLL (Phase Locked Loop) IC 565 का उपयोग करके डीमॉड्यूलेशन करें।
Pulse Width Modulation (PWM)
- सिद्धान्त: इसमें संदेश सिग्नल के आयाम के अनुसार डिजिटल पल्स की चौड़ाई (Width) बदलती है। इसके लिए 555 टाइमर आईसी का उपयोग किया जाता है।
- सेटअप: साइन वेव को PWM मॉड्यूलेटर में इनपुट दें। उत्पन्न PWM पल्स को डिजिटल ट्रांसमीटर के माध्यम से भेजें। रिसीवर पर एक लो-पास फिल्टर (Low-Pass Filter) सर्किट का उपयोग करके मूल एनालॉग सिग्नल वापस पाएं।
4. ऑडियो सिग्नल और वॉइस लिंक का प्रदर्शन (FM/PWM/PPM)
यह इस प्रयोग का सबसे व्यावहारिक और रोचक हिस्सा है, जहाँ आप अपनी आवाज़ को प्रकाश के माध्यम से भेजते हैं।
चरण-दर-चरण प्रदर्शन प्रक्रिया:
- माइक्रोफोन कनेक्शन: किट के माइक इनपुट (Microphone Input) में एक माइक कनेक्ट करें। आपकी आवाज़ (ऑडियो सिग्नल) यहाँ इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदल जाती है।
- मॉड्यूलेशन चयन: किट के पैच कॉर्ड्स (Patch Cords) का उपयोग करके ऑडियो सिग्नल को अपनी पसंद के मॉड्यूलेटर (FM, PWM, या PPM) के इनपुट से जोड़ें।
- ऑप्टिकल ट्रांसमिशन: मॉड्यूलेटेड सिग्नल को फाइबर ऑप्टिक ट्रांसमीटर ड्राइवर सर्किट में डालें। केबल को कनेक्ट करें।
- डीमॉड्यूलेशन और लाउडस्पीकर: रिसीवर एंड पर, सिग्नल को संबंधित डीमॉड्यूलेटर सर्किट (जैसे PPM/PWM के लिए फिल्टर, FM के लिए PLL) से गुजारें।
- ऑडियो एम्पलीफायर: डीमॉड्यूलेटेड ऑडियो सिग्नल को किट के इन-बिल्ट ऑडियो एम्पलीफायर (जैसे LM386 IC) में भेजें, जिससे जुड़ा लाउडस्पीकर या हेडफोन आपकी आवाज़ को स्पष्ट रूप से सुनाएगा।
महत्वपूर्ण सुझाव: प्रयोग के दौरान फाइबर ऑप्टिक केबल को बहुत अधिक न मोड़ें (Bend), क्योंकि इससे बेंडिंग लॉस (Bending Loss) होता है और रिसीवर तक सिग्नल कमजोर या कट-कट कर पहुँचता है।
क्या आपके पास किसी विशिष्ट ब्रांड की OFC ट्रेनर किट (जैसे Scientech या Falcon) है, जिसका ब्लॉक डायग्राम या पिन कनेक्शन आप समझना चाहते हैं?
डिजिटल पैनल मीटर
एलईडी डिस्प्ले मॉड्यूल और उसके डिकोडर/ड्राइवर आईसी की पहचान करें। दो लाइन वाले एलईडी पर एक शब्द प्रदर्शित करें। प्रतिरोधक से प्रवाहित धारा को मापें और उसे एलईडी मॉड्यूल और एलईडी मॉड्यूल (डीपीएम) पर प्रदर्शित करें।
एलसीडी डिस्प्ले मॉड्यूल और उसके डिकोडर/ड्राइवर आईसी की पहचान करें। प्रतिरोधक से प्रवाहित धारा को मापें और उसे प्रदर्शित करें।
डिजिटल पैनल मीटर (Digital Panel Meter - DPM) एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो वोल्टेज, करंट या प्रतिरोध जैसे एनालॉग सिग्नलों को मापता है और उन्हें डिजिटल रूप में डिस्प्ले (LED या LCD) पर दिखाता है।
आपके प्रैक्टिकल उद्देश्यों के अनुसार, LED और LCD दोनों मॉड्यूल के लिए डिकोडर/ड्राइवर आईसी की पहचान, शब्द प्रदर्शित करने और करंट मापने की विस्तृत प्रक्रिया नीचे दी गई है:
भाग 1: एलईडी (LED) डिस्प्ले मॉड्यूल और करंट मापन (DPM)
1. एलईडी डिस्प्ले मॉड्यूल और ड्राइवर आईसी की पहचान
- एलईडी डिस्प्ले मॉड्यूल: आमतौर पर इसमें 7-सेगमेंट एलईडी डिस्प्ले (7-Segment LED Display) का उपयोग किया जाता है। ये दो प्रकार के होते हैं: कॉमन एनोड (Common Anode) और कॉमन कैथोड (Common Cathode)।
-
डिकोडर/ड्राइवर आईसी (Decoder/Driver IC): * IC 7447: कॉमन एनोड 7-सेगमेंट डिस्प्ले के लिए (BCD to 7-Segment Decoder)।
- IC 7448 या CD4511: कॉमन कैथोड 7-सेगमेंट डिस्प्ले के लिए।
- IC MAX7219: यदि मल्टीपल डिजिट या 8-डिजिट एलईडी डिस्प्ले है, तो यह सीरियल इनपुट/आउटपुट ड्राइवर आईसी सबसे लोकप्रिय है।
2. दो लाइन (या दो डिजिट) वाले एलईडी पर शब्द प्रदर्शित करना
7-सेगमेंट एलईडी पर सभी अंग्रेजी अक्षर (A-Z) स्पष्ट रूप से नहीं दिखाए जा सकते, लेकिन कुछ चुनिंदा शब्दों जैसे "HI", "ON", "Go", या "HE" को दो-लाइन (2-Digit) डिस्प्ले पर दिखाया जा सकता है।
उदाहरण: "HI" शब्द प्रदर्शित करना
- पहले डिजिट पर 'H' के लिए: 7-सेगमेंट के 'b, c, e, f, g' सेगमेंट्स को ऑन (ON) करना होगा।
- दूसरे डिजिट पर 'I' के लिए: 7-सेगमेंट के 'b, c' (या 'e, f') सेगमेंट्स को ऑन करना होगा।
- कनेक्शन: ड्राइवर आईसी (जैसे 7447) के इनपुट पिन पर संबंधित बाइनरी (BCD) कोड देकर या सीधे सेगमेंट्स को रेसिस्टर के जरिए ग्राउंड/VCC करके इसे प्रदर्शित किया जा सकता है।
3. प्रतिरोधक से प्रवाहित धारा (Current) को मापना और LED पर प्रदर्शित करना
करंट को मापने और उसे डिजिटल रूप में बदलने के लिए ADC (Analog to Digital Converter) IC ICL7107 सबसे बेहतरीन और लोकप्रिय डिजिटल पैनल मीटर आईसी है, जो सीधे 7-सेगमेंट एलईडी को ड्राइव कर सकती है।
[करंट सोर्स/रेसिस्टर] ---> [शंट रेसिस्टर (Vs)] ---> [ICL7107 (ADC & Driver)] ---> [LED डिस्प्ले (DPM)]
प्रक्रिया:
- करंट को वोल्टेज में बदलना: करंट को सीधे आईसी में नहीं भेजा जा सकता। इसलिए, जिस प्रतिरोधक (Resistor) से करंट मापना है, उसके सीरीज में एक बहुत छोटा शंट प्रतिरोधक (Shunt Resistor, जैसे 0.1 Omega) लगाते हैं। ओहम के नियम (V = I × R) के अनुसार, शंट रेसिस्टर के दोनों सिरों पर एक छोटा वोल्टेज ड्रॉप (V_s) पैदा होगा।
- आईसी कनेक्शन: इस वोल्टेज ड्रॉप (V_s) को ICL7107 के इनपुट पिन (पिन 30 और 31) पर दिया जाता है।
- कैलिब्रेशन और डिस्प्ले: ICL7107 इस एनालॉग वोल्टेज को डिजिटल में बदलती है और इसके आंतरिक डिकोडर सीधे एलईडी डिस्प्ले मॉड्यूल पर करंट की वैल्यू (जैसे 1.2A या 45mA) प्रदर्शित कर देते हैं।
भाग 2: एलसीडी (LCD) डिस्प्ले मॉड्यूल और करंट मापन
1. एलसीडी डिस्प्ले मॉड्यूल और ड्राइवर आईसी की पहचान
- एलसीडी डिस्प्ले मॉड्यूल: प्रोजेक्ट्स में सबसे ज्यादा 16x2 अल्फ़ान्यूमेरिक एलसीडी (16x2 Alphanumeric LCD) का उपयोग किया जाता है (जिसमें 16 अक्षर और 2 लाइनें होती हैं)।
-
डिकोडर/ड्राइवर आईसी: * HD44780 (Hitachi): यह 16x2 एलसीडी मॉड्यूल के पीछे इन-बिल्ट (पहले से लगी) होती है। यह एलसीडी के पिक्सल को नियंत्रित करने के लिए डिकोडर और ड्राइवर दोनों का काम करती है।
- PCF8574 (I2C मॉड्यूल आईसी): यदि एलसीडी को कम तारों (सिर्फ 2 तारों - SDA, SCL) से चलाना हो, तो इस I2C ड्राइवर आईसी का उपयोग किया जाता है।
- ICL7106: यदि आप केवल 7-सेगमेंट जैसा एलसीडी पैनल मीटर बना रहे हैं, तो ICL7106 आईसी का उपयोग होता है (यह ICL7107 का एलसीडी वर्जन है)।
2. प्रतिरोधक से प्रवाहित धारा को मापना और LCD पर प्रदर्शित करना
16x2 एलसीडी के साथ करंट मापने के लिए आमतौर पर एक माइक्रोकंट्रोलर (जैसे Arduino Uno या 8051) और एक करंट सेंसर का उपयोग किया जाता है।
आवश्यक संसाधन: * 16x2 एलसीडी मॉड्यूल
- माइक्रोकंट्रोलर (Arduino)
- ACS712 करंट सेंसर आईसी (या शंट रेसिस्टर और एम्पलीफायर)
- वह प्रतिरोधक (Resistor) जिसका करंट मापना है।
कनेक्शन और कार्यप्रणाली:
- सेंसर कनेक्शन: सर्किट के लोड रेसिस्टर को ACS712 करंट सेंसर के सीरीज में जोड़ें। ACS712 सेंसर प्रवाहित होने वाली धारा (Current) के अनुपात में एक एनालॉग वोल्टेज आउटपुट देता है (जैसे हर 1 एम्पियर पर 185mV)।
- माइक्रोकंट्रोलर इंटरफेस: ACS712 के आउटपुट पिन को माइक्रोकंट्रोलर के Analog Input Pin (A0) से जोड़ें।
- एलसीडी इंटरफेस: 16x2 एलसीडी के डेटा पिन्स (D4-D7) और कंट्रोल पिन्स (RS, EN) को माइक्रोकंट्रोलर के डिजिटल पिन्स से जोड़ें।
- प्रोग्रामिंग और प्रदर्शन: माइक्रोकंट्रोलर का कोड एडीसी (ADC) के जरिए वोल्टेज को पढ़ता है, उसे वापस करंट (Ampere/mA) के मान में बदलता है, और lcd.print() कमांड का उपयोग करके परिणाम को सीधे एलसीडी मॉड्यूल पर प्रदर्शित कर देता है (उदाहरण के लिए: "Current: 0.45 A")।
- मॉस्फेट (MOSFET - N Channel): इसमें गेट (G), ड्रेन (D), और सोर्स (S) टर्मिनल होते हैं। (इन्वर्टर और एसएमपीएस के स्विचिंग के लिए मुख्य घटक)।
- डायोड (Zener & Schottky Diode): शॉटकी डायोड का उपयोग एसएमपीएस के आउटपुट में हाई-स्पीड रेक्टिफिकेशन के लिए होता है।
- पल्स ट्रांसफार्मर (Ferrite Core Transformer): हाई फ्रीक्वेंसी पर काम करने वाला ट्रांसफार्मर।
- ऑप्टोकॉप्लर (Optocoupler - IC 4N35/PC817): फीडबैक सर्किट में आइसोलेशन के लिए।
- ऑटो-ट्रांसफार्मर (Auto-Transformer): इसमें कई टैपिंग्स (Tappings) होती हैं जो वोल्टेज को बढ़ाने (Boost) या घटाने (Buck) का काम करती हैं।
- रिले (Relays - 12V/24V DC): ये इनपुट वोल्टेज के अनुसार ट्रांसफार्मर की अलग-अलग टैपिंग्स को स्विच करते हैं।
- कंट्रोल सर्किट बोर्ड (PCB): इसमें मुख्य रूप से IC LM324 (Quad Op-Amp) या माइक्रोकंट्रोलर होता है। LM324 इनपुट वोल्टेज की तुलना (Comparison) करता है और ट्रांजिस्टर के माध्यम से रिले को ऑन/ऑफ करता है।
मुख्य अंतर: एलईडी (LED) पैनल मीटर अंधेरे में भी स्पष्ट दिखाई देता है और अधिक करंट लेता है, जबकि एलसीडी (LCD) पैनल मीटर बहुत कम करंट लेता है और इसमें अक्षरों या टेक्स्ट को प्रदर्शित करना बहुत आसान होता है।
एसएमपीएस और इन्वर्टर
घटकों/उपकरणों की पहचान करें और उनके संबंधित प्रतीक बनाएं। दिए गए स्टेबलाइज़र को खोलें और उसके मुख्य भाग/आईसी घटक खोजें।
दोषपूर्ण एसएमपीएस में खराबी और उसके लक्षण सूचीबद्ध करें। कंप्यूटर एसएमपीएस के मुख्य परीक्षण बिंदुओं को मापें/निगरानी करें।
दिए गए एसएमपीएस यूनिट में खराबी का निवारण करें। खराबी को ठीक करें और लोड के साथ आउटपुट सत्यापित करें। खराबी निवारण के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को रिकॉर्ड करें। पीसी और इन्वर्टर में एसएमपीएस स्थापित करें और उसका परीक्षण करें।
दिए गए इन्वर्टर यूनिट में खराबी का निवारण करें। खराबी को ठीक करें और लोड के साथ आउटपुट सत्यापित करें।
विभिन्न वोल्टेज के लिए आईसी आधारित डीसी-डीसी कनवर्टर बनाएं और उसका परीक्षण करें। एलएम2576 और एमसी 34063 का उपयोग करके एक स्विचिंग स्टेप डाउन रेगुलेटर बनाएं और उसका परीक्षण करें।
पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के अंतर्गत एसएमपीएस (SMPS), इन्वर्टर, स्टेबलाइज़र और डीसी-डीसी कनवर्टर बहुत ही महत्वपूर्ण विषय हैं। आपके प्रैक्टिकल और फील्ड वर्क के उद्देश्यों के अनुसार, यहाँ प्रत्येक भाग की विस्तृत कार्यप्रणाली, टेस्टिंग पॉइंट्स और ट्रबलशूटिंग (खराबी निवारण) प्रक्रिया दी गई है:
1. घटकों की पहचान, प्रतीक (Symbols) और स्टेबलाइज़र का आंतरिक भाग
मुख्य घटकों के प्रतीक (Symbols)
सर्किट डायग्राम बनाने के लिए निम्नलिखित घटकों के मानक प्रतीकों को याद रखना आवश्यक है:
वोल्टेज स्टेबलाइज़र के मुख्य भाग/आईसी
जब आप एक ऑटोमैटिक वोल्टेज स्टेबलाइज़र को खोलते हैं, तो उसमें निम्नलिखित मुख्य भाग मिलते हैं:
2. कंप्यूटर एसएमपीएस (SMPS): खराबी, लक्षण और मुख्य परीक्षण बिंदु
दोषपूर्ण SMPS के लक्षण और संभावित कारण
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लक्षण (Symptom) |
संभावित कारण (Possible Cause) |
|---|---|
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पूरी तरह से डेड (No Power) |
इनपुट फ्यूज का उड़ना, एमओवी (MOV) का शॉर्ट होना, या मुख्य रेक्टिफायर डायोड का खराब होना। |
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कंप्यूटर बार-बार रीस्टार्ट होना |
आउटपुट साइड के इलेक्ट्रोलाइटिक कैपेसिटर (Capacitor) का फूल जाना या लीक होना। |
|
पंखे का केवल एक पल के लिए घूमकर बंद होना |
आउटपुट में शॉर्ट सर्किट होना, जिससे ओवर-करंट प्रोटेक्शन (OCP) एक्टिव हो जाता है। |
कंप्यूटर एसएमपीएस के मुख्य परीक्षण बिंदु (ATX Connector Testing)
कंप्यूटर के 24-पिन ATX कनेक्टर पर वोल्टेज मापने के लिए सबसे पहले हरे तार (PS-ON) को किसी भी काले तार (GND) से एक छोटे तार या चिमटी (Tweezers) की मदद से शॉर्ट करें। इससे एसएमपीएस चालू हो जाएगा।
- काला तार (Black): Ground (0V Reference)
- पीला तार (Yellow): +12V (हार्ड डिस्क, प्रोसेसर और पंखे के लिए)
- लाल तार (Red): +5V (लॉजिक सर्किट और यूएसबी के लिए)
- नारंगी तार (Orange): +3.3V (रैम और मदरबोर्ड चिपसेट के लिए)
- बैंगनी तार (Purple): +5V\_SB (Standby Voltage - यह एसएमपीएस के बंद होने पर भी हमेशा चालू रहता है)
- ग्रे तार (Grey): Power Good (PG) Signal (+5V - यह दर्शाता है कि सभी वोल्टेज स्थिर हैं)
3. एसएमपीएस ट्रबलशूटिंग और रिकॉर्डिंग प्रक्रिया
खराबी निवारण (Troubleshooting) चरण:
- विजुअल इंस्पेक्शन: पीसीबी पर जले हुए घटक या फूले हुए कैपेसिटर देखें।
- कोल्ड टेस्टिंग (बिना पावर के): मल्टीमीटर को 'डायोड/कंटीन्यूटी' मोड पर सेट करें। इनपुट फ्यूज, थर्माइस्टर (NTC), ब्रिज रेक्टिफायर और प्राइमरी मॉस्फेट की जांच करें कि वे शॉर्ट तो नहीं हैं।
- हॉट टेस्टिंग (पावर के साथ): सावधानीपूर्वक मुख्य कैपेसिटर पर लगभग 310V { DC} मापें। यदि यह सही है, तो सेकेंडरी साइड के आउटपुट डायोड्स की जांच करें।
लोड के साथ सत्यापन और स्थापना:
- खराबी ठीक करने के बाद (जैसे फूले कैपेसिटर या शॉर्ट डायोड बदलने के बाद), आउटपुट पर एक 12V ऑटोमोबाइल बल्ब या रेसिस्टिव लोड जोड़ें।
- मल्टीमीटर से वोल्टेज स्थिर रहने की पुष्टि करें। स्थिर होने पर इसे पीसी (कंप्यूटर कैबिनेट) में वापस स्क्रू की मदद से स्थापित करें और मदरबोर्ड से कनेक्ट करके सिस्टम ऑन करें।
4. इन्वर्टर यूनिट का निवारण (Troubleshooting)
सामान्य खराबी और समाधान:
- लक्षण: इन्वर्टर चालू नहीं हो रहा (No Display/No Output)
- जांच: बैटरी के टर्मिनलों पर वोल्टेज जांचें (कम से कम 10.5V होना चाहिए)। इन्वर्टर के पीछे लगे डीसी फ्यूज (DC Fuse) की निरंतरता (Continuity) की जांच करें।
- लक्षण: केवल मेन्स (Grid) पर चल रहा है, बैकअप नहीं दे रहा
- जांच: इन्वर्टर के मॉस्फेट कार्ड (MOSFET Driver Stage) की जांच करें। आमतौर पर हीट्सिंक पर लगे मॉस्फेट शॉर्ट हो जाते हैं।
- लक्षण: बैटरी चार्ज नहीं हो रही
- जांच: चार्जिंग रिले या मुख्य कंट्रोल बोर्ड पर लगी SCR/Triac (जैसे BTA16) की जांच करें।
लोड परीक्षण:
मरम्मत के बाद, इन्वर्टर के आउटपुट सॉकेट पर 60W या 100W का लैंप लोड जोड़ें। मेन्स पावर सप्लाई को कट करके (बैटरी मोड पर) यह सुनिश्चित करें कि लैंप बिना किसी फ्लिकरिंग (झिलमिलाहट) के लगातार जल रहा है।
5. आईसी आधारित डीसी-डीसी कनवर्टर (Switching Regulators)
लीनियर रेगुलेटर (जैसे 7805) की तुलना में स्विचिंग रेगुलेटर बहुत अधिक कुशल (Efficient) होते हैं और गर्म कम होते हैं।
क) LM2576 का उपयोग करके स्टेप डाउन (Buck) रेगुलेटर
LM2576 एक 3A स्टेप-डाउन वोल्टेज रेगुलेटर आईसी है।
[L1: Inductor]
In ---> [LM2576] -------UUUU-------+---> Out (+)
(+) | | |
| +----|<--------------+ [C_out]
GND (D1: Schottky) |
GND (-)
- आवश्यक घटक: IC LM2576 (Adjuctable या Fixed 5V), इंडक्टर (100 mu H, 3A), शॉटकी डायोड (1N5822 - तेजी से स्विचिंग के लिए), इनपुट कैपेसिटर (100 mu F), आउटपुट कैपेसिटर (1000 mu F)।
- परीक्षण: इनपुट में 12V से 24V { DC} दें। यदि आपने एड्जस्टेबल (Adj) आईसी का उपयोग किया है, तो फीडबैक पिन पर लगे पोटेंशियोमीटर (POT) को घुमाकर आउटपुट वोल्टेज को 5V, 9V आदि पर सेट करें और लोड लगाकर वोल्टेज स्थिरता की जांच करें।
ख) MC34063 का उपयोग करके कनवर्टर
MC34063 एक बहुमुखी (Versatile) आईसी है जिसका उपयोग स्टेप-डाउन (Buck), स्टेप-अप (Boost), या वोल्टेज इनवर्टर सर्किट बनाने के लिए किया जा सकता है।
- विशेषता: इसका उपयोग छोटे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स या कार चार्जर (जहाँ 12V को 5V में बदला जाता है) में व्यापक रूप से होता है।
- निर्माण व परीक्षण: इसके सर्किट में एक बाहरी टाइमिंग कैपेसिटर (C_T), इंडक्टर और फीडबैक रेसिस्टर्स का नेटवर्क होता है। सर्किट को ब्रेडबोर्ड या पीबीसी पर असेंबल करने के बाद विभिन्न इनपुट वोल्टेजेस देकर आउटपुट पिन पर सटीक और रेगुलेटेड वोल्टेज को मापा जाता है।
यूपीएस
बैटरी स्टैक को यूपीएस से कनेक्ट करें। यूपीएस के फ्रंट पैनल कंट्रोल और इंडिकेटर्स को पहचानें। बैटरी और लोड को यूपीएस से कनेक्ट करें
और बैटरी मोड पर टेस्ट करें। यूपीएस का ऊपरी कवर खोलें; इसके आइसोलेटर ट्रांसफॉर्मर, यूपीएस ट्रांसफॉर्मर और यूपीएस में मौजूद विभिन्न सर्किट बोर्ड्स को पहचानें।
विभिन्न टेस्ट पॉइंट्स को पहचानें और वोल्टेज की जाँच करें। यूपीएस में मौजूद विभिन्न सर्किट बोर्ड्स को पहचानें और विभिन्न टेस्ट पॉइंट्स पर वोल्टेज की निगरानी करें। बैकअप समय मापने के लिए लोड टेस्ट करें। उपरोक्त सभी प्रयोग थ्री फेज यूपीएस के लिए करें।
यूपीएस (Uninterruptible Power Supply - UPS) बिजली कटने पर बिना किसी रुकावट के कंप्यूटर या औद्योगिक लोड को पावर बैकअप प्रदान करता है। आपके प्रैक्टिकल उद्देश्यों के अनुसार, यहाँ यूपीएस (सिंगल-फेज और थ्री-फेज दोनों) के कनेक्शन, फ्रंट पैनल, आंतरिक घटक, टेस्ट पॉइंट्स और लोड टेस्टिंग की विस्तृत गाइड दी गई है:
1. यूपीएस कनेक्शन और फ्रंट पैनल की पहचान
क) बैटरी स्टैक और लोड का कनेक्शन
- बैटरी स्टैक कनेक्शन: यदि बैकअप के लिए कई बैटरियों का उपयोग किया जा रहा है, तो उन्हें यूपीएस की आवश्यकता के अनुसार सीरीज (Series) या पैलरल (Parallel) में जोड़ें। उदाहरण के लिए, यदि 36 {V} का बैंक है, तो 12 {V} की 3 बैटरियों को सीरीज में जोड़ें।
- यूपीएस से जुड़ाव: बैटरी बैंक के पॉजिटिव (+) सिरे को यूपीएस के 'बैटरी +' टर्मिनल से और नेगेटिव (-) सिरे को 'बैटरी -' टर्मिनल से जोड़ें। सावधानी: कनेक्शन करते समय स्पार्किंग से बचने के लिए यूपीएस का मेन्स स्विच और बैटरी का एमसीबी (MCB) बंद रखें।
- लोड कनेक्शन: यूपीएस के आउटपुट सॉकेट/टर्मिनल ब्लॉक से अपने लोड (कंप्यूटर या लैंप लोड) को जोड़ें।
ख) फ्रंट पैनल कंट्रोल और इंडिकेटर्स
- कंट्रोल बटन: Power ON/OFF स्विच, अलार्म म्यूट (Mute) बटन, और डिस्प्ले नेविगेशन बटन।
-
एलईडी/एलसीडी इंडिकेटर्स (Indicators):
- Line Mode (Mains On): हरी एलईडी - दर्शाती है कि मुख्य बिजली आपूर्ति सामान्य है।
- Battery Mode (Inverter On): पीली या अंबर एलईडी - दर्शाती है कि मुख्य बिजली कट चुकी है और लोड बैटरी पर चल रहा है।
- Bypass Mode: यह लाइट तब जलती है जब यूपीएस में कोई आंतरिक खराबी हो और लोड सीधे मेन्स से चल रहा हो।
- Fault/Overload: लाल एलईडी - सर्किट में ओवरलोड या किसी आंतरिक खराबी (Fault) को दर्शाती है।
2. यूपीएस के आंतरिक भाग (ऊपरी कवर खोलने पर)
सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए यूपीएस का कवर हटाने पर आपको निम्नलिखित मुख्य भाग दिखाई देंगे:
- आइसोलेटर ट्रांसफार्मर (Isolation Transformer): यह लोड को मुख्य इनपुट बिजली के झटकों और हार्मोनिक्स (Spikes & Harmonics) से बचाता है। यह इनपुट और आउटपुट सर्किट को विद्युत रूप से अलग (Isolate) करता है।
- यूपीएस ट्रांसफार्मर (Inverter/Main Transformer): यह मुख्य रूप से एक स्टेप-अप ट्रांसफार्मर होता है, जो इनverter स्टेज द्वारा बनाई गई कम वोल्टेज एसी (Low AC) को 220 {V/230V AC} में बदलता है।
- मुख्य सर्किट बोर्ड्स (PCBs):
- मदरबोर्ड/पावर कार्ड: इसमें रेक्टिफायर, इनवर्टर स्विचिंग मॉस्फेट/आईजीबीटी (IGBTs), और चार्जिंग सर्किट होता है।
- कंट्रोलर बोर्ड (Control Card): इसमें माइक्रोप्रोसेसर या डीएसपी (DSP) चिप होती है जो पल्स विड्थ मॉड्यूलेशन (PWM) सिग्नल बनाती है और पूरे यूपीएस की सुरक्षा व टाइमिंग को नियंत्रित करती है।
3. टेस्ट पॉइंट्स और वोल्टेज की जांच (सिंगल फेज)
मल्टीमीटर को एसी/डीसी मोड पर सेट करके निम्नलिखित मुख्य टेस्ट पॉइंट्स पर वोल्टेज मापें:
- TP1 (AC Input): इनपुट टर्मिनल पर वोल्टेज की जांच करें (220 {V} - 240 {V AC})।
- TP2 (DC Bus/Battery Charging): बैटरी चार्जिंग टर्मिनल पर वोल्टेज मापें। (जैसे 12 {V} बैटरी के लिए लगभग 13.8 {V DC} और 24 {V} सिस्टम के लिए लगभग 27.6 {V DC} होना चाहिए)।
- TP3 (Inverter Output - Inside): ट्रांसफार्मर के इनपुट पर आने वाला लो-वोल्टेज एसी सिग्नल।
- TP4 (Main AC Output): यूपीएस के आउटपुट सॉकेट पर वोल्टेज की जांच करें (230 {V AC} pm 1 %, स्थिर)।
4. लोड टेस्ट और बैकअप समय मापना (Backup Time Measurement)
यह परीक्षण यूपीएस की क्षमता और बैटरी के स्वास्थ्य (Health) की जांच के लिए किया जाता है:
- यूपीएस को पूरी तरह चार्ज करें।
- आउटपुट पर एक निश्चित लोड (जैसे 200 {W} या 500 {W}) कनेक्ट करें।
- मुख्य एसी इनपुट (Mains) की सप्लाई बंद कर दें ताकि यूपीएस बैटरी मोड पर आ जाए।
- ठीक उसी समय एक स्टॉपवॉच (Stopwatch) शुरू करें।
- मल्टीमीटर से लगातार बैटरी वोल्टेज की गिरावट पर नज़र रखें।
- जब यूपीएस 'बैटरी लो' का अलार्म देकर बंद (Shut down) हो जाए, तब स्टॉपवॉच को रोकें। यह समय उस लोड पर यूपीएस का वास्तविक बैकअप समय (Backup Time) है।
5. थ्री-फेज यूपीएस (3-Phase UPS) के लिए विशिष्ट प्रक्रिया
थ्री-फेज यूपीएस का उपयोग भारी औद्योगिक लोड या डेटा सेंटर्स में किया जाता है। इसकी प्रक्रिया सिंगल फेज जैसी ही होती है, लेकिन इसमें निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है:
क) कनेक्शन और फ्रंट पैनल
- बैटरी बैंक: थ्री-फेज यूपीएस में बहुत बड़ा बैटरी बैंक होता है (अक्सर 240 {V} या 480 {V DC})। यहाँ बैटरियों की एक लंबी श्रृंखला (Stack) को सीरीज में जोड़ा जाता है।
- इनपुट/आउटपुट: इसमें तीन फेज लाइनें (R, Y, B) और एक न्यूट्रल (N) इनपुट और आउटपुट दोनों तरफ कनेक्ट होते हैं।
ख) थ्री-फेज आंतरिक घटक व सर्किट बोर्ड्स
- IGBT आधारित रेक्टिफायर और इनवर्टर: यहाँ सामान्य मॉस्फेट के स्थान पर बड़े IGBT (Insulated Gate Bipolar Transistor) मॉड्यूल्स का उपयोग किया जाता है जो भारी करंट संभाल सकते हैं।
- स्टैटिक बाईपास स्विच (Static Bypass Switch): यह एक हाई-स्पीड थाइरिस्टर (SCR) आधारित स्विच होता है जो यूपीएस में खराबी आने पर बिना 1 मिलीसेकंड की भी देरी किए लोड को सीधे ग्रिड सप्लाई पर शिफ्ट कर देता है।
ग) थ्री-फेज टेस्ट पॉइंट्स और वोल्टेज मॉनिटरिंग
थ्री-फेज यूपीएस में वोल्टेज मापते समय अत्यधिक सावधानी और सुरक्षा उपकरणों (Insulated Gloves) की आवश्यकता होती है:
- फेज-टू-फेज वोल्टेज (Phase to Phase): इनपुट और आउटपुट पर R-Y, Y-B, और B-R के बीच वोल्टेज मापें। यह लगभग 415 {V AC} होना चाहिए।
- फेज-टू-न्यूट्रल वोल्टेज (Phase to Neutral): R-N, Y-N, और B-N के बीच वोल्टेज मापें। यह लगभग 230 {V AC} होना चाहिए।
- डीसी बस वोल्टेज (DC Bus Voltage): रेक्टिफायर के बाद बनने वाले हाई-वोल्टेज डीसी लिंक पर वोल्टेज मापें, जो आमतौर पर 300 {V} से 600 {V DC} के बीच होता है।
- फेज सिंक्रोनाइजेशन (Phase Sync): सुनिश्चित करें कि इनपुट फेज सीक्वेंस और इनवर्टर फेज सीक्वेंस समान हैं, अन्यथा बाईपास पर शिफ्ट होते समय शॉर्ट सर्किट हो सकता है।
- दिशा और कोण (Direction & Tilt): भारत (उत्तरी गोलार्ध) में सौर पैनलों का रुख हमेशा दक्षिण दिशा (True South) की ओर होना चाहिए। पैनल का झुकाव (Tilt Angle) आपके शहर के अक्षांश (Latitude) के अनुसार होना चाहिए (आमतौर पर 15° से 30°)।
- छाया मुक्त क्षेत्र (Shadow-Free Area): पैनल ऐसी जगह लगाएं जहाँ सुबह से शाम तक पेड़ों या आस-पास की इमारतों की छाया न पड़ती हो।
- बैटरी और नियंत्रक (Controller): सबसे पहले 12V की बैटरी के पॉजिटिव और नेगेटिव टर्मिनलों को सोलर चार्ज कंट्रोलर के 'बैटरी' इनपुट से जोड़ें। इससे कंट्रोलर चालू हो जाएगा और बैटरी वोल्टेज (12V) को डिटेक्ट कर लेगा।
- सौर पैनल और नियंत्रक: अब 500W सौर पैनल के तारों को चार्ज कंट्रोलर के 'Solar/PV' इनपुट से जोड़ें। धूप होने पर कंट्रोलर की 'Charging' एलईडी जलने लगेगी।
- 12V DC लोड: चार्ज कंट्रोलर पर एक अलग 'DC Load' का आउटपुट पोर्ट होता है। अपने 12V DC बल्ब या पंखे को सीधे इस पोर्ट से जोड़ें। यह पोर्ट बैटरी को डीप-डिस्चार्ज (ज्यादा खाली) होने से बचाता है।
थ्री-फेज लोड टेस्ट: इसका बैकअप समय मापने के लिए तीनों फेजों पर संतुलित (Balanced) लोड डाला जाता है और प्रत्येक फेज के करंट (I_R, I_Y, I_B) को क्लैम्प मीटर (Clamp Meter) की मदद से मॉनिटर किया जाता है।
सौर ऊर्जा (नवीकरणीय ऊर्जा प्रणाली)
छत पर सौर पैनल लगाएं। सौर नियंत्रक को बैटरी स्टोरेज स्टेशन से जोड़ें।
12V DC उपकरणों को सीधे बिजली देने के लिए 500 वोल्ट का सौर पैनल लगाएं। स्टोरेज बैटरियों को पावर इन्वर्टर से कनेक्ट करें।
सौर पैनल को इन्वर्टर से कनेक्ट करके लोड चलाएं और उसका परीक्षण करें। 12V DC रिचार्जेबल बैटरी को चार्ज करने के लिए सौर ऊर्जा प्रणाली लगाएं और चार्जिंग समय ज्ञात करें। सौर इन्वर्टर स्थापित करें।
छत पर सौर ऊर्जा प्रणाली (Solar Power System) स्थापित करना नवीकरणीय ऊर्जा का सबसे बेहतरीन उपयोग है। आपके प्रैक्टिकल उद्देश्यों के अनुसार, सौर पैनल लगाने, चार्जिंग नियंत्रक (Charge Controller), बैटरी और इन्वर्टर के कनेक्शन करने तथा चार्जिंग समय की गणना करने की पूरी चरण-दर-चरण प्रक्रिया नीचे दी गई है:
1. छत पर सौर पैनल लगाना और बुनियादी कनेक्शन
छत पर सौर पैनल लगाते समय अधिकतम बिजली उत्पादन के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:
2. 12V DC उपकरणों के लिए सौर पैनल और नियंत्रक सेटअप
महत्वपूर्ण सुधार/स्पष्टीकरण: आपके उद्देश्य में "12V DC उपकरणों को चलाने के लिए 500 वोल्ट का सौर पैनल" लिखा है। तकनीकी रूप से, सीधे 12V DC उपकरणों या 12V की बैटरी को चार्ज करने के लिए 500 वॉट (Watt) के पैनल का उपयोग किया जाता है, न कि 500 वोल्ट (Volt) का। 500 वोल्ट का पैनल या स्ट्रिंग 12V के उपकरणों को तुरंत जला देगी। यहाँ हम 500 वॉट (500W) के सौर पैनल सेटअप को समझेंगे।
कनेक्शन का सही क्रम (ब्लॉक डायग्राम):
सॉलर सिस्टम को कनेक्ट करते समय हमेशा सबसे पहले बैटरी को चार्ज कंट्रोलर से जोड़ा जाता है, उसके बाद सौर पैनल को।
[सौर पैनल (500W)] -------> [सोलर चार्ज नियंत्रक] <=======> [12V स्टोरेज बैटरी]
|
+-------> [12V DC लोड (एलईडी/पंखे)]
संयोजन की प्रक्रिया:
3. सौर इन्वर्टर (Off-Grid Solar Inverter) स्थापना और लोड टेस्ट
यदि आपको घर के सामान्य एसी (230V AC) उपकरण जैसे कंप्यूटर, फ्रिज या टीवी चलाने हैं, तो आपको पावर इन्वर्टर की आवश्यकता होगी।
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स्थापना और कनेक्शन चरण:
- इन्वर्टर को बैटरी से जोड़ें: भारी क्षमता वाले डीसी केबल्स का उपयोग करके इन्वर्टर के (+) और (-) इनपुट को 12V स्टोरेज बैटरी के टर्मिनलों से कसकर जोड़ें।
- सौर पैनल को इन्वर्टर से जोड़ें: आधुनिक 'सौर इन्वर्टर' (Solar Hybrid Inverter) के अंदर चार्ज कंट्रोलर पहले से इन-बिल्ट होता है। इसमें सौर पैनल के तारों को सीधे इन्वर्टर के पीछे दिए गए 'PV Input' टर्मिनल में जोड़ा जाता है।
-
लोड टेस्ट (Testing): * इन्वर्टर का स्विच ऑन करें। यह बैटरी की डीसी पावर को 230V एसी में बदल देगा।
- इन्वर्टर के आउटपुट सॉकेट पर अपना एसी लोड (जैसे 100W का बल्ब या पंखा) कनेक्ट करें।
- इन्वर्टर के डिस्प्ले पर इनपुट सोलर पावर (Watts), बैटरी चार्जिंग स्टेटस और आउटपुट लोड की निगरानी करें।
4. 12V DC बैटरी का चार्जिंग समय ज्ञात करना (Mathematical Calculation)
मान लीजिए आपके पास 500W का सौर पैनल है और आप उससे 12V, 150Ah (एम्पियर-ऑवर) की एक लीड-एसिड रिचार्जेबल बैटरी चार्ज कर रहे हैं। चार्जिंग समय ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
चरण 1: सौर पैनल का आउटपुट करंट (Current in Amperes) ज्ञात करना
आमतौर पर एक 12V/24V सिस्टम के लिए सोलर पैनल का वर्किंग वोल्टेज (V) लगभग 18 {V} से 24 {V} होता है। हम यहाँ औसतन 18 {V} मान लेते हैं।
Current (I) = {Power (W)}/{Voltage (V)}
I = {500 {W}}/{18 {V}} approx 27.7 { A}
मान लेते हैं कि दक्षता (Efficiency Loss, धूल और गर्मी के कारण) 20% कम हो जाती है, तो वास्तविक चार्जिंग करंट लगभग 22 { A} मिलेगा।
चरण 2: चार्जिंग समय की गणना (Charging Time Formula)
बैटरी की क्षमता = 150 { Ah}
{Time} = {150 { Ah}}/{22 { A}} approx 6.8 { Hours}
निष्कर्ष: यदि आसमान साफ है और अच्छी धूप है, तो 500W का सौर पैनल आपकी 12V, 150Ah की पूरी तरह से डिस्चार्ज बैटरी को लगभग 6.5 से 7 घंटे में पूरी तरह चार्ज कर देगा।
प्रयोगात्मक सत्यापन (Practical Verification):
प्रैक्टिकल के दौरान चार्जिंग समय को मापने के लिए, हर एक घंटे में चार्ज कंट्रोलर के डिस्प्ले पर बैटरी का वोल्टेज नोट करें। जब वोल्टेज 12.6 {V} (शुरुआती) से बढ़कर लगभग 14.2 {V} से 14.4 {V} (बल्क चार्जिंग सीमा) तक पहुँच जाए, तो समझें कि बैटरी पूरी तरह चार्ज हो चुकी है।
मोबाइल फोन और स्मार्टफोन की रिपेयरिंग, सॉफ्टवेयर फ्लैशिंग और हार्डवेयर ट्रबलशूटिंग इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र का एक बहुत ही व्यावहारिक और मांग वाला हिस्सा है। आपके द्वारा दिए गए प्रैक्टिकल उद्देश्यों के अनुसार, यहाँ मोबाइल फोन रिपेयरिंग की पूरी चरण-दर-चरण गाइड दी गई है:
1. स्मार्टफोन को खोलना (Disassembly), पुर्जों की पहचान और असेंबली
स्मार्टफोन को खोलते समय अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके पुर्जे बहुत नाजुक होते हैं।
क) खोलने की प्रक्रिया:
- सुरक्षा: सबसे पहले फोन को बंद (Power Off) करें और सिम ट्रे (SIM Tray) को बाहर निकालें।
- बैक पैनल हटाना: आधुनिक फोन में बैक कवर को खोलने के लिए हीट गन या सेपरेटर की मदद से हल्का गर्म किया जाता है ताकि उसका गोंद (Adhesive) ढीला हो जाए। इसके बाद सक्शन कप और प्लास्टिक पिक (Opening Pick) की मदद से बैक पैनल को धीरे से अलग करें।
- स्क्रू खोलना: प्रेसिजन स्क्रू ड्राइवर (Precision Screwdriver) का उपयोग करके सभी छोटे पेंचों को खोलें और उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखें।
ख) मुख्य पुर्जों की पहचान:
- मदरबोर्ड (Logic Board): फोन का मुख्य सर्किट बोर्ड जिस पर प्रोसेसर, रैम और अन्य आईसी लगी होती हैं।
- बैटरी: लिथियम-आयन या लिथियम-पॉलीमर बैटरी। (इसे कभी भी नुकीली चीज से न निकालें)।
- सब-बोर्ड (Sub-Board/Charging PCB): फोन के निचले हिस्से में मौजूद छोटा बोर्ड जिसमें चार्जिंग पोर्ट, माइक और ऑडियो जैक होता है।
- फ्लेक्स केबल (Flex Cables): रिबन जैसे तार जो स्क्रीन, बैटरी और सब-बोर्ड को मुख्य मदरबोर्ड से जोड़ते हैं।
2. कीपैड फोन की सफाई और ट्रैक कंटिन्यूटी टेस्ट
यदि आप कीपैड वाले फोन पर काम कर रहे हैं:
- सफाई: कीपैड की रबर शीट को निकालें। पीसीबी पर बने कीपैड डॉट्स को आईपीए (Isopropyl Alcohol - IPA) लिक्विड और ब्रश की मदद से साफ करें ताकि कार्बन या धूल हट सके।
- ट्रैक की जांच: यदि कोई बटन काम नहीं कर रहा है, तो मल्टीमीटर को कंटिन्यूटी/बीप मोड (Continuity Mode) पर सेट करें। कीपैड मैट्रिक्स के इनर (Inner) और आउटर (Outer) ट्रैक पर प्रॉप्स रखकर जांचें कि लाइन कहीं से कटी तो नहीं है। यदि ट्रैक टूटा हुआ है, तो जम्पर वायर (Jumper Wire) और सोल्डरिंग आयरन की मदद से उसे ठीक करें।
3. पीसी कनेक्शन, डेटा ट्रांसफर, फ्लैशिंग और अनलॉकिंग (सॉफ्टवेयर)
क) पीसी कनेक्शन और डेटा ट्रांसफर:
- फोन को ओरिजिनल डेटा केबल के जरिए पीसी से कनेक्ट करें।
- फोन की स्क्रीन पर "File Transfer / MTP" मोड चुनें। अब आप पीसी के माध्यम से फोन का डेटा (फोटो, वीडियो, डॉक्यूमेंट) कार्ड या इंटरनल मेमोरी में ट्रांसफर कर सकते हैं।
ख) वायरस और फॉर्मेटिंग:
- यदि फोन धीमा चल रहा है या वायरस का संदेह है, तो सेटिंग्स में जाकर Factory Data Reset करें। यदि फोन ऑन नहीं हो रहा है, तो वॉल्यूम अप + पावर बटन दबाकर रिकवरी मोड (Recovery Mode) में जाएं और "Wipe Data / Factory Reset" चुनें।
ग) मोबाइल फ्लैशिंग (Flashing):
फ्लैशिंग का मतलब है फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम (फर्मवेयर) को दोबारा इंस्टॉल करना। यह तब किया जाता है जब फोन लोगो पर अटक जाए (Boot Loop) या सॉफ्टवेयर क्रैश हो जाए।
- आवश्यक टूल्स: ब्रांड के अनुसार फ्लैश टूल (जैसे शाओमी के लिए Mi Flash Tool, सैमसंग के लिए Odin, और मीडियाटेक प्रोसेसर के लिए SP Flash Tool)।
- प्रक्रिया: कंप्यूटर में सही फर्मवेयर (Flash File) और यूएसबी ड्राइवर डाउनलोड करें। फोन को विशिष्ट मोड (जैसे Fastboot मोड या Download मोड) में लाकर पीसी से कनेक्ट करें और टूल में फाइल लोड करके 'Flash' पर क्लिक करें।
घ) कोड और सॉफ्टवेयर से अनलॉक करना:
- यदि यूजर पैटर्न या पिन भूल गया है, तो हार्ड रीसेट (Wipe Data) के माध्यम से इसे अनलॉक किया जा सकता है।
- आधुनिक सुरक्षा जैसे एफआरपी (FRP - Google Account Lock) को हटाने के लिए विशिष्ट सॉफ्टवेयर टूल्स (जैसे Unlock Tool, UMT, या Miracle Box) का उपयोग पीसी के माध्यम से किया जाता है।
4. पावर सेक्शन की पहचान और जांच (Power Section Troubleshooting)
स्मार्टफोन के पावर सेक्शन में मुख्य रूप से PMIC (Power Management IC), चार्जिंग आईसी, डीसी-टू-डीसी कनवर्टर, और सुरक्षा के लिए ओवीपी (OVP) आईसी शामिल होते हैं।
जांचने की विधि (Hot & Cold Testing):
- कोल्ड टेस्टिंग: बैटरी कनेक्टर पर मल्टीमीटर से कंटीन्यूटी की जांच करें। यदि दोनों तरफ से बीप की आवाज आती है, तो इसका मतलब है कि प्राइमरी पावर लाइन में शॉर्ट सर्किट (Full Shorting) है।
- हॉट टेस्टिंग: फोन में बैटरी या डीसी पावर सप्लाई (4.2\text{V}) कनेक्ट करें। पीएमआईसी के आस-पास लगे बड़े कैपेसिटर्स पर वोल्टेज मापें। वहां 1.2\text{V}, 1.8\text{V}, और 2.8\text{V} जैसे बक (Buck) और एलडीओ (LDO) वोल्टेज मिलने चाहिए। यदि ये वोल्टेज गायब हैं, तो पावर आईसी दोषपूर्ण हो सकती है।
5. रिंगर सेक्शन और मूल खराबी का निवारण (Ringer Troubleshooting)
यदि फोन में रिंगटोन या गाने की आवाज नहीं आ रही है (लेकिन ईयरपीस में आवाज आ रही है):
- स्पीकर की जांच: रिंगर (Loudspeaker) को बाहर निकालें और मल्टीमीटर को बीप मोड पर रखकर इसके दोनों सिरों की जांच करें। यदि मल्टीमीटर 8 से 10\ \Omega (ओहम) की वैल्यू दिखाता है और बीप करता है, तो स्पीकर सही है। यदि कोई वैल्यू नहीं आती, तो स्पीकर खराब है, इसे बदलें।
- ट्रैक की जांच: मदरबोर्ड पर जहाँ स्पीकर टच होता है, उन टिप्स (Points) पर मल्टीमीटर से जीआर (GND Resistance/Diode Value) मापें। यदि रीडिंग (300-600) आ रही है, तो ट्रैक सही है। यदि रीडिंग नहीं आ रही (OL), तो ऑडियो आईसी (Audio IC) से आने वाली कॉइल या कैपेसिटर की जांच करें और जरूरत पड़ने पर जम्पर लगाएं।
6. खराब पुर्जों को बदलना (Replacing Mic, Speaker & Jacks)
इसके लिए आपके पास एसएमडी रीवर्क स्टेशन (SMD Blowers), सोल्डरिंग आयरन, फ्लक्स पेस्ट और सोल्डर वायर होना चाहिए।
- माइक (Microphone) बदलना: डिजिटल माइक (क्रिस्टल माइक) बहुत नाजुक होते हैं। एसएमडी ब्लोअर का तापमान लगभग 320°C पर सेट करें। पीसीबी के नीचे की तरफ से हीट देकर पुराने माइक को उठाएं और सावधानी से नए माइक को उसी दिशा (पिन कॉन्फ़िगरेशन) में सोल्डर करें।
- चार्जिंग जैक (Micro USB / Type-C) बदलना: 1. पुराने जैक के चारों तरफ फ्लक्स लगाएं और ब्लोअर से हीट देकर उसे पीसीबी से अलग करें। 2. डी-सोल्डरिंग वायर (Desoldering Wick) की मदद से पीसीबी के होल्स और ट्रैक्स को साफ करें। 3. नए चार्जिंग जैक के पिन्स पर हल्का सा सोल्डर पेस्ट लगाएं और उसे पीसीबी पर रखकर सोल्डरिंग आयरन के बारीक टिप से सभी बारीक पिन्स को अलग-अलग सोल्डर कर दें। सुनिश्चित करें कि कोई भी दो पिन आपस में शॉर्ट न हों।
- ऑडियो जैक (Audio/Headphone Jack): इसे भी चार्जिंग जैक की तरह ही हीट देकर निकाला जाता है और नए जैक को सोल्डरिंग आयरन की मदद से फिक्स किया जाता है।
सुरक्षा सुझाव: किसी भी कंपोनेंट को हीट देते समय उसके आस-पास की मुख्य आईसी (जैसे सीपीयू या ईएमएमसी) पर हीट रेसिस्टेंट टेप (Kapton Tape) लगा दें ताकि अत्यधिक गर्मी से वे खराब न हों।
4. मरम्मत के बाद टीवी का परीक्षण (Testing)
खराबी को ठीक करने के बाद टीवी को तुरंत पैक न करें, पहले इन परीक्षणों को पूरा करें:
- सुरक्षा परीक्षण: यह सुनिश्चित करें कि हीट्सिंक पर थर्मल पेस्ट सही लगा है और कोई भी तार बॉडी से टच नहीं हो रहा है।
- सोर्स टेस्टिंग: टीवी को अलग-अलग इनपुट (HDMI, AV, USB) देकर जांचें कि सभी पोर्ट सही काम कर रहे हैं।
- सोक टेस्ट (Soak Test): टीवी को कम से कम 1 से 2 घंटे तक लगातार चालू रखकर छोड़ दें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गर्म होने के बाद कोई घटक (Component) दोबारा फेल तो नहीं हो रहा है।
5. सेट-टॉप बॉक्स (External Decoder) को टीवी से कनेक्ट करना
केबल ऑपरेटर या डीटीएच (DTH) के सेट-टॉप बॉक्स को टीवी से जोड़ने के लिए दो मुख्य प्रकार के कनेक्टर्स का उपयोग किया जाता है:
क) कनेक्टर्स की पहचान:
- एचडीएमआई (HDMI - High-Definition Multimedia Interface): यह एक ही केबल के माध्यम से डिजिटल एचडी वीडियो और ऑडियो दोनों सिग्नल ट्रांसफर करता है। यह सबसे बेहतरीन क्वालिटी देता है।
-
आरसीए/एवी केबल (RCA / Audio-Video Cable): इसमें तीन रंग के पिन होते हैं:
- पीला (Yellow): वीडियो सिग्नल के लिए।
- सफेद (White): लेफ्ट ऑडियो (बायाँ स्पीकर) के लिए।
- लाल (Red): राइट ऑडियो (दायाँ स्पीकर) के लिए।
- पीला (Yellow): वीडियो सिग्नल के लिए।
- सफेद (White): लेफ्ट ऑडियो (बायाँ स्पीकर) के लिए।
- लाल (Red): राइट ऑडियो (दायाँ स्पीकर) के लिए।
ख) कनेक्शन की प्रक्रिया:
- HDMI के माध्यम से (अनुशंसित): एचडीएमआई केबल के एक सिरे को सेट-टॉप बॉक्स के 'HDMI OUT' पोर्ट में और दूसरे सिरे को टीवी के 'HDMI IN' पोर्ट में लगाएं। टीवी चालू करके रिमोट से इनपुट सोर्स को HDMI-1 या HDMI-2 पर सेट करें।
- AV के माध्यम से: आरसीए केबल के रंगों को सेट-टॉप बॉक्स के आउटपुट पोर्ट्स (पीला, सफेद, लाल) से मिलाएं और केबल के दूसरे सिरे को टीवी के इनपुट पोर्ट्स (AV IN) में बिल्कुल उसी रंग के अनुसार लगाएं। टीवी के रिमोट से सोर्स को AV / Video पर सेट करें।
एलईडी लाइट्स (LED Lights/LED Bulbs) आज के समय में प्रकाश का सबसे कुशल और लोकप्रिय माध्यम हैं। आपके प्रैक्टिकल और सर्किट डिजाइनिंग के उद्देश्यों के अनुसार, यहाँ एलईडी लाइट के आंतरिक भागों की पहचान और एलईडी का एक विशिष्ट मैट्रिक्स (सीरीज-पैलरल संयोजन) बनाने की पूरी चरण-दर-चरण प्रक्रिया दी गई है:
1. एलईडी लाइट को खोलना और आंतरिक भागों की पहचान
जब आप एक सामान्य एलईडी बल्ब (जैसे 9W या 12W) को खोलते हैं, तो उसमें मुख्य रूप से दो भाग होते हैं: एलईडी स्टैक (MCPCB) और एलईडी ड्राइवर सर्किट (सुरक्षा व रेगुलेटर सर्किट)।
क) एलईडी स्टैक (LED Stack / MCPCB)
बल्ब के ऊपरी हिस्से में एक एल्यूमीनियम की प्लेट होती है जिसे MCPCB (Metal Core Printed Circuit Board) कहते हैं। इस पर कई छोटी-छोटी SMD (Surface Mount Device) LEDs आपस में सीरीज या पैलरल में जुड़ी होती हैं। एल्यूमीनियम प्लेट हीट्सिंक (Heatsink) का काम करती है जो एलईडी की गर्मी को बाहर निकालती है।
ख) ड्राइवर सर्किट (सुरक्षा, रेक्टिफायर और रेगुलेटर भाग)
बल्ब के निचले हिस्से (हाउसिंग) के अंदर एक छोटा सर्किट बोर्ड (PCB) होता है जिसे ड्राइवर कहते हैं। इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:
- सुरक्षा सर्किट (Protection Circuit): * फ्यूज रेसिस्टर (Fuse Resistor): यह इनपुट लाइन में लगा होता है। ओवर-करंट (ज्यादा करंट) होने पर यह टूट जाता है और सर्किट को बचाता है।
- एमओवी (MOV - Metal Oxide Varistor): यह वोल्टेज के अचानक बढ़ने (Surge) पर शॉर्ट हो जाता है और फ्यूज को उड़ा देता है, जिससे आगे का कीमती सर्किट सुरक्षित रहता है।
- रेक्टिफायर भाग (Rectifier Section):
- ब्रिज रेक्टिफायर (Bridge Rectifier / MB10F IC): हमारे घरों में 220 {V AC} बिजली आती है, लेकिन एलईडी केवल डीसी (DC) पर चलती हैं। यह रेक्टिफायर एसी वोल्टेज को डीसी वोल्टेज में बदलता है। इसके बाद एक इलेक्ट्रोलाइटिक कैपेसिटर (Filter Capacitor) लगाया जाता है जो डीसी को शुद्ध (Smooth) करता है।
- रेगुलेटर भाग (Controller/Regulator Section):
- कॉन्स्टेंट करंट ड्राइवर आईसी (Constant Current IC): एलईडी के लिए वोल्टेज से ज्यादा करंट को नियंत्रित करना जरूरी होता है। यह आईसी और इसके साथ लगा इंडक्टर (Inductor/Coil) यह सुनिश्चित करते हैं कि इनपुट वोल्टेज कम-ज्यादा होने पर भी एलईडी स्टैक को हमेशा एक समान और सुरक्षित करंट (जैसे 300mA) मिलता रहे ताकि एलईडी फ्यूज न हों।
2. एलईडी मैट्रिक्स (Matrix) का निर्माण और कनेक्शन
आपके निर्देश के अनुसार, हमें एक विशिष्ट एलईडी मैट्रिक्स तैयार करना है। इसके लिए हम सामान्य 5 {mm} की एलईडी का उपयोग करेंगे (एक मानक लाल/हरी/नीली एलईडी का फॉरवर्ड वोल्टेज V_f. approx 2 {V} से 3 {V} और करंट I_f. approx 20 {mA} होता है)। हम गणना के लिए औसतन 3 {V} मान लेते हैं।
चरण 1: छह एलईडी को सीरीज (Series) में जोड़ना
कनेक्शन: पहली एलईडी के कैथोड (-) को दूसरी के एनोड (+) से, दूसरी के कैथोड को तीसरी के एनोड से... इसी तरह 6 एलईडी की एक लड़ी (String) बना लें।
आवश्यक वोल्टेज: चूँकि सीरीज में वोल्टेज जुड़ जाता है, इसलिए इस एक स्ट्रिंग को चलाने के लिए:
6 × 3 {V} = 18 {V}
की आवश्यकता होगी। करंट 20 {mA} ही रहेगा।
चरण 2: चार को समानांतर (Parallel) में कनेक्ट करना
- कनेक्शन: ऐसी ही 6-6 एलईडी वाली चार अलग-अलग सीरीज स्ट्रिंग्स तैयार करें। अब इन चारों स्ट्रिंग्स के सभी पॉजिटिव (+) सिरों को एक साथ और सभी नेगेटिव (-) सिरों को एक साथ जोड़ दें।
-
इस सेट (Set 1) की विशेषता: पैलरल में वोल्टेज समान रहता है लेकिन करंट जुड़ जाता है।
- कुल वोल्टेज = 18{V}
- कुल करंट = 4 × 20 {mA} = 80 {mA}
चरण 3: दो समानांतर सेट को सीरीज में जोड़कर मैट्रिक्स बनाना
- आपके पास चरण 2 जैसे दो समान सेट (Set 1 और Set 2) होने चाहिए (प्रत्येक में 24 एलईडी होंगी, कुल 48 एलईडी)।
- कनेक्शन: Set 1 के मुख्य नेगेटिव (-) टर्मिनल को Set 2 के मुख्य पॉजिटिव (+) टर्मिनल से जोड़ दें। यह आपका अंतिम एलईडी मैट्रिक्स बन गया।
[--- Set 1 (18V, 80mA) ---] [--- Set 2 (18V, 80mA) ---]
Positive (+) ---> (4 Parallel Strings of 6 LEDs) === (4 Parallel Strings of 6 LEDs) ---> Negative (-)
3. वोल्टेज लगाना और परीक्षण (Testing & Voltage Check)
क) उपयुक्त वोल्टेज की गणना (Required Voltage)
चूँकि हमने 18 {V} वाले दो सेट्स को सीरीज में जोड़ा है, इसलिए पूरे मैट्रिक्स को सुरक्षित रूप से चलाने के लिए कुल आवश्यक वोल्टेज होगा:
महत्वपूर्ण: एलईडी को सीधे वोल्टेज सोर्स से जोड़ने पर वे खराब हो सकती हैं। करंट को 80 {mA} पर सीमित करने के लिए सर्किट के सीरीज में एक उचित करंट लिमिटिंग रेसिस्टर (Resistor) अवश्य लगाएं।
ख) मल्टीमीटर से वोल्टेज की जांच प्रक्रिया:
- अपने वेरिएबल डीसी पावर सप्लाई (RPS) को 36\text{V DC} पर सेट करें और मैट्रिक्स से कनेक्ट करें। सभी 48 एलईडी चमकने लगेंगी।
- डिजिटल मल्टीमीटर (DMM) को DC Voltage Mode (200V Range) पर सेट करें।
- सेट्स के बीच वोल्टेज: Set 1 के इनपुट और दोनों सेट्स के बीच वाले जॉइंट (जहाँ Set 1 का '-' और Set 2 का '+' मिला है) पर प्रॉप्स रखें। मल्टीमीटर पर लगभग 18 {V} दिखाई देगा। इसी तरह Set 2 के दोनों सिरों पर भी 18 {V} दिखाई देगा।
- सीरीज स्ट्रिंग्स के बीच वोल्टेज (Voltage across individual String): किसी भी एक सेट के अंदर, किसी एक स्ट्रिंग की पहली एलईडी के एनोड और छठी एलईडी के कैथोड पर वोल्टेज मापें। यह भी बिल्कुल 18 {V} होना चाहिए। यदि किसी स्ट्रिंग में वोल्टेज बहुत कम या शून्य आ रहा है, तो इसका मतलब है कि उस स्ट्रिंग की कोई एलईडी खराब (शॉर्ट) है या कनेक्शन ढीला है।
एलसीडी और एलईडी टीवी
एलसीडी और एलईडी टीवी पर विभिन्न नियंत्रणों को पहचानें और संचालित करें। एलसीडी और एलईडी टीवी के घटकों और विभिन्न भागों को पहचानें।
रिमोट कंट्रोल के भागों को पहचानें और खोलें।
दिए गए एलसीडी/एलईडी टीवी को खोलकर कनेक्टर्स के माध्यम से इनपुट चरणों में खराबी का पता लगाएं।
आपको दिए गए एलईडी/एलसीडी टीवी रिसीवर में खराबी का पता लगाएं और उसे ठीक करें।
दिए गए एलईडी/एलसीडी टीवी रिसीवर में खराबी का निवारण करें। खराबी का पता लगाएं और उसे ठीक करें।
खराबी का निवारण करने के बाद एलईडी/एलसीडी टीवी का परीक्षण करें।
विभिन्न कनेक्टर्स को पहचानें और केबल ऑपरेटर के बाहरी डिकोडर (सेट टॉप बॉक्स) को टीवी से कनेक्ट करें।
एलसीडी (LCD) और एलईडी (LED) टीवी आधुनिक उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। दोनों की कार्यप्रणाली काफी हद तक समान होती है, मुख्य अंतर केवल बैकलाइट तकनीक (Backlight Technology) में होता है (LCD में CCFL लैंप और LED में एलईडी स्ट्रिप्स का उपयोग होता है)।
आपके प्रैक्टिकल और फील्ड वर्क के उद्देश्यों के अनुसार, टीवी की मरम्मत, रिमोट कंट्रोल, सेट-टॉप बॉक्स कनेक्शन और खराबी निवारण (Troubleshooting) की विस्तृत गाइड नीचे दी गई है:
1. टीवी के नियंत्रण (Controls), मुख्य घटक और आंतरिक भाग
क) बाहरी नियंत्रण और संचालन:
- कंट्रोल बटन: आमतौर पर टीवी के नीचे या किनारे पर पावर (Power), सोर्स/इनपुट (Source/Input - HDMI/AV), वॉल्यूम (+/-), और चैनल (+/-) के बटन होते हैं।
- स्रोतों का संचालन: रिमोट या बटन के माध्यम से 'Source' दबाकर यह चुना जाता है कि टीवी सेट-टॉप बॉक्स (HDMI/AV), पेन ड्राइव (USB), या पीसी (VGA) से सिग्नल लेगा।
ख) टीवी को खोलने पर मुख्य आंतरिक भाग (Components):
जब आप टीवी का पिछला कवर (Back Cover) हटाते हैं, तो आपको निम्नलिखित मुख्य बोर्ड दिखाई देंगे:
- पावर सप्लाई बोर्ड (Power Supply Board / PSU): यह बोर्ड 220 {V AC} को टीवी के विभिन्न हिस्सों के लिए आवश्यक डीसी वोल्टेज (5 {V}, 12 {V}, 24 {V} आदि) में बदलता है।
- मेन मदरबोर्ड (Main Logic Board): यह टीवी का 'दिमाग' है। इसमें प्रोसेसर, एचडीएमआई/एवी पोर्ट, ऑडियो एम्पलीफायर और ट्यूनर सर्किट होते हैं। यह वीडियो और ऑडियो सिग्नल को प्रोसेस करता है।
- टी-कॉन बोर्ड (T-Con Board / Timing Controller): यह एक छोटा और लंबा बोर्ड होता है जो मदरबोर्ड से वीडियो सिग्नल लेकर उसे एलसीडी/एलईडी स्क्रीन (Panel) के पिक्सल के लिए उपयुक्त डेटा में बदलता है।
- इन्वर्टर/एलईडी ड्राइवर बोर्ड: यह स्क्रीन के पीछे लगी बैकलाइट (CCFL या LED स्ट्रिप्स) को जलाने के लिए हाई वोल्टेज उत्पन्न करता है।
- एलसीडी/एलईडी ग्लास पैनल: मुख्य स्क्रीन जो हमें चित्र दिखाती है।
2. रिमोट कंट्रोल के भाग और उसे खोलना
क) रिमोट के मुख्य भाग:
- प्लास्टिक केसिंग (ऊपरी और निचला हिस्सा)
- रबर कीपैड (Keypad): इस पर बटन छपे होते हैं और नीचे प्रवाहकीय कार्बन (Conductive Carbon) होता है।
- पीसीबी (PCB): इस पर मुख्य कंट्रोलर आईसी और बैटरी टर्मिनल होते हैं।
- इंफ्रारेड एलईडी (IR LED): यह अदृश्य इंफ्रारेड लाइट पल्स उत्सर्जित करती है जिसे टीवी का सेंसर पकड़ता है।
ख) खोलने और साफ करने की प्रक्रिया:
- बैटरी कवर हटाएं और बैटरियां निकालें।
- यदि कोई पेंच (Screw) है तो उसे खोलें, अन्यथा एक पतले प्लास्टिक टूल (Pry Tool) की मदद से रिमोट के दोनों हिस्सों के लॉक्स को धीरे से खोलें।
- पीसीबी और रबर कीपैड को आईपीए (Isopropyl Alcohol) और ब्रश से साफ करें, क्योंकि बटनों के नीचे धूल या तेल जमने से बटन काम करना बंद कर देते हैं।
3. इनपुट चरण और टीवी रिसीवर में खराबी का पता लगाना (Troubleshooting)
टीवी रिसीवर में खराबी का पता लगाने के लिए हॉट और कोल्ड टेस्टिंग दोनों का उपयोग किया जाता है।
क) कनेक्टर्स और इनपुट चरण की खराबी (Input Stage Faults):
- लक्षण: टीवी चालू है (इंडिकेटर लाइट जल रही है), लेकिन "No Signal" दिखा रहा है या वीडियो/ऑडियो नहीं आ रहा है।
- निवारण: 1. एचडीएमआई/एवी पोर्ट की जांच: अक्सर बार-बार केबल निकालने/लगाने से मदरबोर्ड पर लगे पोर्ट के सोल्डर जॉइंट्स ढीले (Loose Connectors) हो जाते हैं। मैग्निफाइंग ग्लास से जांचें और सोल्डरिंग आयरन से उन्हें दोबारा सोल्डर (Dry Solder Repair) करें। 2. सिग्नल लाइन ट्रेसिंग: पोर्ट से मुख्य प्रोसेसर तक जाने वाले छोटे रेसिस्टर्स और फिल्टर कैपेसिटर्स की निरंतरता (Continuity) मल्टीमीटर से जांचें।
ख) सामान्य टीवी खराबी और उनके समाधान:
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खराबी (Fault) |
लक्षण (Symptom) |
निवारण और समाधान (Troubleshooting) |
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पूरी तरह से डेड (Dead TV) |
कोई लाइट नहीं, कोई आवाज नहीं |
पावर बोर्ड के फ्यूज, ब्रिज रेक्टिफायर, और मुख्य कैपेसिटर (310 {V}) की जांच करें। यदि मॉस्फेट शॉर्ट है, तो उसे बदलें। |
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आवाज है पर चित्र नहीं (No Video, Sound OK) |
बैकलाइट बंद है, लेकिन फ्लैशलाइट स्क्रीन पर मारने पर चित्र हल्का सा दिखता है। |
यह बैकलाइट की खराबी है। या तो एलईडी ड्राइवर बोर्ड खराब है या स्क्रीन के अंदर की एलईडी स्ट्रिप्स फ्यूज हो गई हैं। एलईडी टेस्टर से स्ट्रिप्स की जांच करें और दोषपूर्ण एलईडी बदलें। |
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चित्र है पर आवाज नहीं (Video OK, No Sound) |
स्क्रीन सही है पर स्पीकर से आवाज नहीं आ रही |
टीवी सेटिंग्स में म्यूट चेक करें। मल्टीमीटर से स्पीकर की निरंतरता (8, Omega) जांचें। यदि स्पीकर सही हैं, तो मदरबोर्ड पर लगी ऑडियो एम्पलीफायर आईसी (जैसे हर तरफ वोल्टेज की जांच) को बदलें। |
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स्क्रीन पर रंगीन लाइनें आना (Vertical/Horizontal Lines) |
डिस्प्ले खराब दिखना |
यह आमतौर पर टी-कॉन बोर्ड (T-Con Board) या उससे पैनल को जोड़ने वाली एलवीडीएस (LVDS) रिबन केबल के ढीले होने या खराब होने के कारण होता है। केबल को साफ करके दोबारा लगाएं। |
4. मरम्मत के बाद टीवी का परीक्षण (Testing)
खराबी को ठीक करने के बाद टीवी को तुरंत पैक न करें, पहले इन परीक्षणों को पूरा करें:
- सुरक्षा परीक्षण: यह सुनिश्चित करें कि हीट्सिंक पर थर्मल पेस्ट सही लगा है और कोई भी तार बॉडी से टच नहीं हो रहा है।
- सोर्स टेस्टिंग: टीवी को अलग-अलग इनपुट (HDMI, AV, USB) देकर जांचें कि सभी पोर्ट सही काम कर रहे हैं।
- सोक टेस्ट (Soak Test): टीवी को कम से कम 1 से 2 घंटे तक लगातार चालू रखकर छोड़ दें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गर्म होने के बाद कोई घटक (Component) दोबारा फेल तो नहीं हो रहा है।
5. सेट-टॉप बॉक्स (External Decoder) को टीवी से कनेक्ट करना
केबल ऑपरेटर या डीटीएच (DTH) के सेट-टॉप बॉक्स को टीवी से जोड़ने के लिए दो मुख्य प्रकार के कनेक्टर्स का उपयोग किया जाता है:
क) कनेक्टर्स की पहचान:
- एचडीएमआई (HDMI - High-Definition Multimedia Interface): यह एक ही केबल के माध्यम से डिजिटल एचडी वीडियो और ऑडियो दोनों सिग्नल ट्रांसफर करता है। यह सबसे बेहतरीन क्वालिटी देता है।
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आरसीए/एवी केबल (RCA / Audio-Video Cable): इसमें तीन रंग के पिन होते हैं:
- पीला (Yellow): वीडियो सिग्नल के लिए।
- सफेद (White): लेफ्ट ऑडियो (बायाँ स्पीकर) के लिए।
- लाल (Red): राइट ऑडियो (दायाँ स्पीकर) के लिए।
ख) कनेक्शन की प्रक्रिया:
- HDMI के माध्यम से (अनुशंसित): एचडीएमआई केबल के एक सिरे को सेट-टॉप बॉक्स के 'HDMI OUT' पोर्ट में और दूसरे सिरे को टीवी के 'HDMI IN' पोर्ट में लगाएं। टीवी चालू करके रिमोट से इनपुट सोर्स को HDMI-1 या HDMI-2 पर सेट करें।
- AV के माध्यम से: आरसीए केबल के रंगों को सेट-टॉप बॉक्स के आउटपुट पोर्ट्स (पीला, सफेद, लाल) से मिलाएं और केबल के दूसरे सिरे को टीवी के इनपुट पोर्ट्स (AV IN) में बिल्कुल उसी रंग के अनुसार लगाएं। टीवी के रिमोट से सोर्स को AV / Video पर सेट करें।

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