ट्रांसफार्मर के महत्वपूर्ण परीक्षण
ट्रांसफार्मर के महत्वपूर्ण परीक्षण
ट्रांसफार्मर की कार्यक्षमता (Efficiency), विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर विभिन्न परीक्षण (Tests) किए जाते हैं। इन परीक्षणों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है: प्रकार परीक्षण (Type Tests), दिन-प्रतिदिन के परीक्षण (Routine Tests), और विशेष परीक्षण (Special Tests)।
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यहाँ ट्रांसफार्मर के सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर किए जाने वाले परीक्षणों की विस्तृत सूची दी जा रही है:
1. मुख्य परिचालन परीक्षण (Core Operational Tests)
यह दो सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण हैं जो ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग और कोर के नुकसान (Losses) और दक्षता का पता लगाने के लिए किए जाते हैं:
क. ओपन सर्किट परीक्षण (Open Circuit or No-Load Test)
- उद्देश्य: इस परीक्षण का मुख्य उद्देश्य ट्रांसफार्मर के कोर लॉस (Core Loss / Iron Loss) और नो-लोड करंट (I_0) का मान ज्ञात करना है।
- विधि: इसमें आमतौर पर लो-वोल्टेज (LV) साइड को सामान्य वोल्टेज और फ्रीक्वेंसी दी जाती है, जबकि हाई-वोल्टेज (HV) साइड को खुला (Open) छोड़ दिया जाता है।
ख. शॉर्ट सर्किट परीक्षण (Short Circuit or Impedance Test)
- उद्देश्य: यह परीक्षण ट्रांसफार्मर के कॉपर लॉस (Copper Loss / I^2R Loss) और समतुल्य प्रतिबाधा (Equivalent Impedance) को मापने के लिए किया जाता है।
- विधि: इसमें लो-वोल्टेज (LV) साइड को एक मोटे तार से शॉर्ट-सर्किट कर दिया जाता है और हाई-वोल्टेज (HV) साइड पर तब तक कम वोल्टेज (सामान्य का 5-10%) दिया जाता है, जब तक कि वाइंडिंग में रेटेड करंट प्रवाहित न होने लगे।
2. इंसुलेशन और सुरक्षा परीक्षण (Insulation and Safety Tests)
इंसुलेशन की विफलता ट्रांसफार्मर की खराबी का सबसे बड़ा कारण होती है। इसके लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:
- इंसुलेशन प्रतिरोध परीक्षण (Insulation Resistance or Megger Test): यह परीक्षण 'मेगर' नामक उपकरण से किया जाता है। इससे वाइंडिंग्स के बीच और वाइंडिंग तथा अर्थ (Body) के बीच का इंसुलेशन प्रतिरोध (Megohms में) मापा जाता है।
- डाईइलेक्ट्रिक स्ट्रेंथ टेस्ट (Transformer Oil BDV Test): ट्रांसफार्मर के तेल (Oil) की इंसुलेशन क्षमता की जांच करने के लिए उसके ब्रेकडाउन वोल्टेज (BDV) की जांच की जाती है। तेल का एक सैंपल लेकर उसे ऑयल टेस्टिंग किट में तब तक वोल्टेज दिया जाता है जब तक कि उसमें स्पार्क न हो जाए। एक अच्छे तेल का BDV 30 kV से अधिक होना चाहिए।
- टैन डेल्टा परीक्षण (Tan Delta / Dissipation Factor Test): यह इंसुलेशन के बिगड़ने या उसमें नमी की मात्रा का पता लगाने के लिए किया जाने वाला एक उन्नत परीक्षण है।
3. वाइंडिंग और पोलरिटी परीक्षण (Winding and Polarity Tests)
- वोल्टेज अनुपात परीक्षण (Turns Ratio Test): यह सुनिश्चित करता है कि प्राथमिक (Primary) और माध्यमिक (Secondary) वाइंडिंग के घुमावों (Turns) का अनुपात डिजाइन के अनुसार है या नहीं। इससे यह भी पता चलता है कि कहीं कोई टर्न आपस में शॉर्ट तो नहीं है।
- पोलरिटी परीक्षण (Polarity Test): यदि दो या दो से अधिक ट्रांसफार्मर को समानांतर (Parallel) में जोड़ना हो, तो उनकी पोलरिटी (ध्रुवीयता) का सही होना अनिवार्य है। यह परीक्षण एडिटिव (Additive) या सबट्रैक्टिव (Subtractive) पोलरिटी का पता लगाता है।
- वाइंडिंग प्रतिरोध परीक्षण (Winding Resistance Test): इससे वाइंडिंग के रेजिस्टेंस को मापा जाता है ताकि ढीले कनेक्शन, टूटे हुए स्ट्रैंड या अत्यधिक गर्मी के कारण आए बदलावों का पता लगाया जा सके।
4. तापमान वृद्धि परीक्षण (Temperature Rise / Sumpner's Test)
- उद्देश्य: इस परीक्षण (जिसे बैक-टू-बैक टेस्ट भी कहते हैं) का उपयोग पूर्ण लोड (Full Load) की स्थिति में ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग और तेल में होने वाली अधिकतम तापमान वृद्धि को मापने के लिए किया जाता है।
- विशेषता: इसमें दो समान (Identical) ट्रांसफार्मर की आवश्यकता होती है, और बिना वास्तविक लोड को बर्बाद किए दोनों को फुल लोड पर टेस्ट कर लिया जाता है।
संक्षेप में:
मुख्य परीक्षणों की तालिका
|
परीक्षण का नाम |
क्या मापा/जांचा जाता है? |
किस साइड सप्लाई देते हैं? |
|---|---|---|
|
ओपन सर्किट टेस्ट |
आयरन लॉस (Iron Loss) |
LV साइड (HV ओपन रहता है) |
|
शॉर्ट सर्किट टेस्ट |
कॉपर लॉस (Copper Loss) |
HV साइड (LV शॉर्ट रहता है) |
|
मेगर टेस्ट |
इंसुलेशन की मजबूती |
वाइंडिंग और अर्थ के बीच |
|
BDV टेस्ट |
ट्रांसफार्मर तेल की शुद्धता |
तेल के सैंपल पर |
|
रेश्यो टेस्ट |
टर्न्स रेशियो (N_1/N_2) |
वोल्टेज अनुपात द्वारा |
इन्सुलेशन प्रतिरोध परीक्षण क्या है?
इन्सुलेशन प्रतिरोध परीक्षण (Insulation Resistance Test), जिसे आमतौर पर मेगर टेस्ट (Megger Test) भी कहा जाता है, किसी भी इलेक्ट्रिकल उपकरण (जैसे ट्रांसफार्मर, मोटर, केबल या जनरेटर) की सुरक्षा और सेहत को जांचने का एक प्राथमिक और बेहद महत्वपूर्ण परीक्षण है।
सरल शब्दों में, यह टेस्ट यह जांचने के लिए किया जाता है कि उपकरण का इंसुलेशन (विद्युतरोधी परत) करंट को लीक होने से रोकने में कितना सक्षम है।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
इलेक्ट्रिकल उपकरणों में करंट को उसके निर्धारित रास्ते (Winding या Conductor) में ही बहना चाहिए। लेकिन समय के साथ गर्मी, नमी, धूल और उम्र बढ़ने के कारण इंसुलेशन कमजोर होने लगता है।
- यदि इंसुलेशन खराब हो जाए, तो करंट उपकरण की बॉडी में लीक हो सकता है, जिससे शॉर्ट सर्किट हो सकता है या किसी व्यक्ति को घातक बिजली का झटका (Electric Shock) लग सकता है।
- यह टेस्ट यह सुनिश्चित करता है कि उपकरण चालू (Energize) करने के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।
2. यह टेस्ट कैसे काम करता है? (Working Principle)
यह परीक्षण ओह्म के नियम (I = V/R) पर काम करता है।
- हाई वोल्टेज देना: इस टेस्ट के लिए मेगर (Megger / Insulation Tester) नामक उपकरण का उपयोग किया जाता है। यह उपकरण टेस्ट किए जाने वाले भाग पर एक उच्च डीसी वोल्टेज (High DC Voltage) पैदा करता है। यह वोल्टेज उप ट्रांसफार्मर के महत्वपूर्ण परीक्षण करण की रेटिंग के अनुसार 500V, 1000V, 2500V या 5000V हो सकता है।
- लीकेज करंट मापना: इस उच्च वोल्टेज के कारण इंसुलेशन के आर-पार बहुत ही मामूली करंट (Leakage Current) बहता है।
- प्रतिरोध की गणना: मेगर इस लीकेज करंट और दिए गए वोल्टेज के अनुपात से इंसुलेशन का प्रतिरोध (Resistance) मापता है। चूंकि एक अच्छा इंसुलेशन करंट को रोकता है, इसलिए इसका प्रतिरोध हमेशा मेगा-ओह्म (Mega-Ohms - M Omega) या गीगा-ओह्म (G Omega) जैसे बहुत उच्च मानों में आता है।
3. ट्रांसफार्मर में यह टेस्ट कैसे करते हैं?
ट्रांसफार्मर में मुख्य रूप से तीन जगहों पर इंसुलेशन की जांच की जाती है:
- HV वाइंडिंग और LV वाइंडिंग के बीच (High Voltage to Low Voltage)
- HV वाइंडिंग और अर्थ/बॉडी के बीच (High Voltage to Earth)
- LV वाइंडिंग और अर्थ/बॉडी के बीच (Low Voltage to Earth)
- उच्च प्रतिरोध (High Resistance): यदि मेगर की रीडिंग बहुत अधिक (जैसे 100 M Omega से ऊपर) आती है, तो इसका मतलब है कि इंसुलेशन की स्थिति बहुत अच्छी है और उपकरण सुरक्षित है।
- कम प्रतिरोध (Low Resistance): यदि रीडिंग बहुत कम या शून्य के करीब आती है, तो इसका मतलब है कि इंसुलेशन में नमी आ गई है, वह जल गया है या डैमेज हो चुका है। ऐसे उपकरण को चालू करना खतरनाक हो सकता है।
महत्वपूर्ण सुरक्षा नियम: इंसुलेशन प्रतिरोध परीक्षण हमेशा ट्रांसफार्मर को बिजली की मुख्य लाइन से पूरी तरह अलग (Disconnect) और डी-एनर्जाइज (De-energize) करके ही किया जाता है। लाइव या चालू लाइन पर मेगर टेस्ट कभी नहीं किया जाता।
4. टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब है?
टर्न रेशियो टेस्ट क्या है?
टर्न रेशियो टेस्ट (Turns Ratio Test) ट्रांसफार्मर के रखरखाव और कमीशनिंग (चालू करने से पहले) के दौरान किया जाने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण परीक्षण है।
सरल शब्दों में,
यह टेस्ट यह जांचने के लिए किया जाता है कि ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (Primary) और माध्यमिक (Secondary) वाइंडिंग के घुमावों (Turns) का अनुपात उसके डिजाइन और नेमप्लेट पर लिखे विनिर्देशों (Specifications) के अनुसार है या नहीं।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
एक ट्रांसफार्मर का मुख्य काम वोल्टेज को बढ़ाना (Step-up) या घटाना (Step-down) होता है, जो पूरी तरह से दोनों वाइंडिंग्स के टर्न्स रेशियो पर निर्भर करता है। इस टेस्ट के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:
- सटीक वोल्टेज आउटपुट सुनिश्चित करना: यह जांचना कि ट्रांसफार्मर ग्रिड को सही वोल्टेज देगा या नहीं।
- शॉर्ट सर्किट का पता लगाना: यदि वाइंडिंग के कुछ टर्न्स आपस में शॉर्ट (Inter-turn short circuit) हो गए हैं, तो टर्न्स रेशियो बदल जाएगा, जिसे इस टेस्ट से तुरंत पकड़ा जा सकता है।
- टैप चेंजर (Tap Changer) की जांच: ट्रांसफार्मर के टैप चेंजर के सभी पोजीशन पर टर्न्स रेशियो सही ढंग से बदल रहा है या नहीं, यह सुनिश्चित करना।
2. कार्य सिद्धांत (Working Principle)
यह परीक्षण ट्रांसफार्मर के मूल सिद्धांत यानी वोल्टेज अनुपात और टर्न्स अनुपात के संबंध पर आधारित है।
गणितीय रूप से इसे इस प्रकार समझा जाता है:
{V_1}/{V_2} = {N_1}/{N_2}
जहाँ:
- V_1 = प्राथमिक वाइंडिंग का वोल्टेज
- V_2 = माध्यमिक वाइंडिंग का वोल्टेज
- N_1 = प्राथमिक वाइंडिंग के घुमावों (Turns) की संख्या
- N_2 = माध्यमिक वाइंडिंग के घुमावों (Turns) की संख्या
यदि हम एक वाइंडिंग पर सटीक वोल्टेज (V_1) देते हैं और दूसरी वाइंडिंग का वोल्टेज (V_2) मापते हैं, तो हमें वोल्टेज का जो अनुपात मिलता है, वही वाइंडिंग के टर्न्स का अनुपात ({N_1}/{N_2}) होता है।
3. यह टेस्ट कैसे किया जाता है? (Testing Procedure)
आजकल इस टेस्ट को करने के लिए एक आधुनिक और स्वचालित उपकरण का उपयोग किया जाता है जिसे TTR (Transformer Turns Ratio) मीटर कहते हैं।
- कनेक्शन: TTR मीटर के केबल्स को ट्रांसफार्मर की हाई-वोल्टेज (HV) और लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग से जोड़ा जाता है।
- वोल्टेज देना: यह उपकरण आमतौर पर HV वाइंडिंग पर एक कम वोल्टेज (जैसे 8V, 40V या 80V AC) देता है।
- मापन: उपकरण स्वचालित रूप से LV साइड पर उत्पन्न होने वाले वोल्टेज को मापता है और दोनों के अनुपात की गणना करके सीधे डिजिटल स्क्रीन पर प्रदर्शित कर देता है।
- सभी फेज के लिए: थ्री-फेज (3-Phase) ट्रांसफार्मर में यह टेस्ट तीनों फेजों (जैसे R-N, Y-N, B-N या R-Y, Y-B, B-R) के लिए अलग-अलग या स्वचालित रूप से एक साथ किया जाता है।
4. स्वीकार्य सीमा (Acceptable Limits)
अंतर्राष्ट्रीय मानकों (जैसे IEEE और IEC) के अनुसार, टर्न रेशियो टेस्ट का परिणाम ट्रांसफार्मर के नेमप्लेट पर दिए गए अनुपात के बेहद करीब होना चाहिए।
मानक नियम: मापा गया टर्न्स रेशियो और नेमप्लेट पर दर्ज वास्तविक रेशियो के बीच का अंतर pm 0.5% से अधिक नहीं होना चाहिए।
यदि यह अंतर 0.5% से अधिक आता है, तो यह दर्शाता है कि वाइंडिंग में कोई आंतरिक खराबी (जैसे इंटर-टर्न शॉर्ट, डैमेज या वाइंडिंग का खिसकना) है, और ट्रांसफार्मर को चार्ज करना सुरक्षित नहीं है।
वाइंडिंग प्रतिरोध परीक्षण क्या है?
वाइंडिंग प्रतिरोध परीक्षण (Winding Resistance Test) ट्रांसफार्मर के स्वास्थ्य की जांच करने के लिए किया जाने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण और बुनियादी परीक्षण है।
सरल शब्दों में, यह टेस्ट यह जांचने के लिए किया जाता है कि ट्रांसफार्मर के अंदर तांबे (Copper) या एल्युमीनियम के तारों से बनी वाइंडिंग का वास्तविक प्रतिरोध (Resistance) कितना है। यह टेस्ट ट्रांसफार्मर के निर्माण के समय, चालू (Commissioning) करने से पहले और नियमित रखरखाव के दौरान किया जाता है।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
इस टेस्ट का मुख्य उद्देश्य वाइंडिंग में आई किसी भी प्रकार की भौतिक या विद्युत खराबी का पता लगाना है। इससे निम्नलिखित बातों की जांच होती है:
- ढीले कनेक्शन (Loose Connections): क्या वाइंडिंग के अंदर या बुशिंग (Bushings) के पास कोई जोड़ ढीला है?
- टूटे हुए तार (Broken Strands): यदि वाइंडिंग कई पतले तारों (Parallel strands) को मिलाकर बनी है, तो क्या उनमें से कोई तार टूट गया है?
- शॉर्ट सर्किट (Short Circuits): क्या वाइंडिंग के कुछ फेरे (Turns) आपस में चिपक या शॉर्ट हो गए हैं?
- कांटेक्ट रेजिस्टेंस (Contact Resistance): टैप चेंजर (Tap Changer) के संपर्कों (Contacts) की स्थिति कैसी है, यह जांचना।
- I^2R लॉस की गणना: ट्रांसफार्मर के कुल कॉपर लॉस की सटीक गणना करने के लिए वाइंडिंग रेजिस्टेंस का पता होना जरूरी है।
2. यह टेस्ट कैसे काम करता है? (Working Principle)
यह परीक्षण ओह्म के नियम (R = V/I) के सिद्धांत पर काम करता है।
- चूंकि ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग एक बहुत बड़ा इंडक्टर (Inductor) होती है, इसलिए इसमें एसी (AC) करंट देने पर सटीक रेजिस्टेंस नहीं मापा जा सकता।
- यही कारण है कि इस टेस्ट के लिए हमेशा सटीक डीसी करंट (Direct Current - DC) का उपयोग किया जाता है। वाइंडिंग में एक ज्ञात डीसी करंट (I) प्रवाहित किया जाता है और उसके दोनों सिरों पर उत्पन्न होने वाले वोल्टेज ड्रॉप (V) को मापा जाता है। इसके बाद उपकरण खुद ही R = V/I के फॉर्मूले से प्रतिरोध की गणना कर लेता है।
3. यह टेस्ट कैसे किया जाता है? (Testing Procedure)
इस टेस्ट को करने के लिए आजकल आधुनिक डिजिटल माइक्रो-ओह्ममीटर (Micro-Ohmmeter) या वाइंडिंग रेजिस्टेंस टेस्ट किट का उपयोग किया जाता है, क्योंकि वाइंडिंग का प्रतिरोध बहुत कम (ओह्म के कुछ सौवें या हजारवें हिस्से के बराबर) होता है।
- सुरक्षा और आइसोलेशन: ट्रांसफार्मर को मुख्य बिजली सप्लाई से पूरी तरह अलग (Isolate) कर दिया जाता है और उसकी वाइंडिंग्स को डिस्चार्ज किया जाता है।
- तापमान नोट करना: टेस्ट शुरू करने से पहले ट्रांसफार्मर के तेल और आसपास के तापमान (Winding Temperature) को नोट किया जाता है। (यह बहुत जरूरी है क्योंकि तापमान बदलने से धातु का प्रतिरोध भी बदल जाता है)।
- कनेक्शन: टेस्ट किट के लीड्स को एक-एक करके सभी फेजों (जैसे HV साइड के R-Y, Y-B, B-R और LV साइड के r-y, y-b, b-r) पर जोड़ा जाता है।
- स्थिर रीडिंग (Saturation): वाइंडिंग के बड़े इंडक्टेंस के कारण करंट को स्थिर होने में कुछ सेकंड या मिनट का समय लगता है। रीडिंग पूरी तरह स्थिर होने के बाद ही उसे रिकॉर्ड किया जाता है।
4. परिणामों का विश्लेषण कैसे करते हैं? (Acceptable Limits)
टेस्ट से मिले परिणामों की तुलना दो चीजों से की जाती है:
- फैक्ट्री टेस्ट रिपोर्ट (जब ट्रांसफार्मर नया था तब का रेजिस्टेंस)।
- बाकी के दोनों फेजों के रेजिस्टेंस से।
- तुलना हमेशा एक ही तापमान पर की जानी चाहिए। आमतौर पर सभी रीडिंग्स को गणितीय रूप से 75^circ {C} के मानक तापमान पर बदला (Convert) जाता है, और फिर उसकी तुलना फैक्ट्री डेटा से की जाती है।
मानक नियम: तीनों फेजों (R, Y, B) के आपस के वाइंडिंग प्रतिरोध में 2% से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
यदि किसी एक फेज का प्रतिरोध बाकी फेजों से काफी अलग आता है, तो यह संकेत देता है कि उस फेज की वाइंडिंग में कोई खराबी (जैसे लूज कनेक्शन या इंटर-टर्न शॉर्ट) आ चुकी है।
तेल ब्रेकडाउन वोल्टेज परीक्षण
तेल ब्रेकडाउन वोल्टेज परीक्षण (Oil Breakdown Voltage Test), जिसे आमतौर पर BDV टेस्ट भी कहा जाता है, ट्रांसफार्मर के रखरखाव में किया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है।
ट्रांसफार्मर के अंदर भरा हुआ तेल (Transformer Oil/Mineral Oil) दो मुख्य काम करता है: पहला इंसुलेशन (विद्युतरोधी) का और दूसरा कूलिंग (शीतलन) का। समय के साथ नमी, धूल और वाइंडिंग की गर्मी के कारण तेल की इंसुलेशन क्षमता कम होने लगती है। BDV टेस्ट से यह पता लगाया जाता है कि तेल अभी भी करंट को रोकने में सक्षम है या नहीं।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
इस टेस्ट का मुख्य उद्देश्य तेल की डाईइलेक्ट्रिक स्ट्रेंथ (Dielectric Strength) या विद्युत सहनशक्ति को मापन है। सरल शब्दों में, यह टेस्ट यह देखता है कि तेल कितने अधिकतम वोल्टेज को बिना स्पार्क या शॉर्ट-सर्किट हुए सहन कर सकता है। अगर तेल में नमी (Moisture) या कार्बन के कण होंगे, तो वह कम वोल्टेज पर ही फेल (Breakdown) हो जाएगा।
2. परीक्षण की विधि (Testing Procedure)
यह टेस्ट एक विशेष उपकरण ऑयल ब्रेकडाउन वोल्टेज टेस्टिंग किट (BDV Kit) द्वारा किया जाता है।
- सैंपल लेना: ट्रांसफार्मर के निचले हिस्से में लगे वाल्व से तेल का एक साफ सैंपल लिया जाता है।
- पॉट में तेल भरना: इस तेल को टेस्टिंग किट के कांच या प्लास्टिक के एक छोटे बर्तन (Pot) में भरा जाता है। इस बर्तन के अंदर दो गोलाकार या बेलनाकार इलेक्ट्रोड (Electrodes) लगे होते हैं।
- दूरी तय करना (Gap Setting): दोनों इलेक्ट्रोड के बीच की दूरी को मानकों के अनुसार सटीक 2.5 mm पर सेट किया जाता है।
- वोल्टेज बढ़ाना: किट को चालू करके दोनों इलेक्ट्रोड के बीच AC वोल्टेज को धीरे-धीरे 2 kV प्रति सेकंड की रफ्तार से बढ़ाया जाता है।
- ब्रेकडाउन नोट करना: वोल्टेज बढ़ते-बढ़ते एक ऐसी स्थिति आती है जब तेल की इंसुलेशन क्षमता खत्म हो जाती है और दोनों इलेक्ट्रोड्स के बीच एक तेज बिजली की चिंगारी (Spark/Arc) पैदा होती है। जिस सटीक वोल्टेज पर यह स्पार्क होता है, उसे ही ब्रेकडाउन वोल्टेज (BDV) कहते हैं।
- औसत निकालना: यह प्रक्रिया एक ही सैंपल पर 5 से 6 बार दोहराई जाती है (हर बार तेल को थोड़ा हिलाकर बुलबुले साफ किए जाते हैं) और अंत में सभी रीडिंग्स का औसत (Average) निकाला जाता है।
3. स्वीकार्य सीमा (Acceptable BDV Limits)
भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय मानकों (IS / IEC) के अनुसार, ट्रांसफार्मर के वोल्टेज रेटिंग के आधार पर तेल का BDV मान निम्नलिखित होना चाहिए:
|
ट्रांसफार्मर की स्थिति / वोल्टेज रेटिंग |
न्यूनतम स्वीकार्य BDV मान |
स्थिति (Status) |
|---|---|---|
|
नया अन-यूज्ड तेल (New Unused Oil) |
> 60{ kV} |
बहुत बढ़िया |
|
सर्विस में चल रहे ट्रांसफार्मर (<11{ kV}) |
> 30{ kV} |
सुरक्षित/संतोषजनक |
|
सर्विस में चल रहे ट्रांसफार्मर (11{ kV} से 72.5{ kV}) |
> 40{ kV} |
सुरक्षित/संतोषजनक |
|
बड़े पावर ट्रांसफार्मर (>72.5{ kV}) |
> 50{ kV} |
आवश्यक/अनिवार्य |
4. यदि परिणाम खराब (कम) आए तो क्या करें?
अगर तेल का BDV मान तय सीमा से कम (जैसे 30 { kV} से कम) आता है, तो इसका मतलब है कि तेल में नमी या कचरा आ चुका है। ऐसी स्थिति में दो उपाय किए जाते हैं:
- ऑयल फिल्ट्रेशन (Filtration/Centrifuging): ट्रांसफार्मर के तेल को एक ऑनलाइन फिल्ट्रेशन मशीन से गुजारा जाता है जो तेल को गर्म करके उसकी नमी को सोख लेती है और कार्बन कणों को छान देती है। इससे BDV दोबारा बढ़ जाता है।
- तेल बदलना (Oil Replacement): यदि फिल्ट्रेशन के बाद भी तेल की स्थिति में सुधार न हो, तो पुराना तेल निकालकर नया तेल भरा जाता है।
चुंबकीय संतुलन परीक्षण
चुंबकीय संतुलन परीक्षण (Magnetic Balance Test) ट्रांसफार्मर के कोर (Core) की चुंबकीय स्थिति और वाइंडिंग में आई किसी भी आंतरिक खराबी (जैसे इंटर-टर्न शॉर्ट सर्किट) का पता लगाने के लिए किया जाने वाला एक बहुत ही आसान और प्रभावी परीक्षण है।
यह परीक्षण केवल थ्री-फेज (3-Phase) ट्रांसफार्मर पर किया जाता है। इससे यह जांचा जाता है कि ट्रांसफार्मर के कोर में चुंबकीय फ्लक्स (Magnetic Flux) का वितरण (Distribution) समान और संतुलित है या नहीं।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
जब ट्रांसफार्मर के कोर में कोई यांत्रिक दोष आता है (जैसे कोर का खिसकना या ढीला होना) या फिर वाइंडिंग के अंदर कोई फॉल्ट होता है, तो कोर का चुंबकीय पथ (Magnetic Path) प्रभावित होता है। इस टेस्ट से निम्नलिखित का पता चलता है:
- कोर का विस्थापन (Core Displacement): परिवहन (Transport) के दौरान या भारी शॉर्ट सर्किट के झटके से कोर अपनी जगह से हिला तो नहीं है।
- वाइंडिंग शॉर्ट सर्किट: वाइंडिंग के कुछ फेरे आपस में शॉर्ट तो नहीं हो गए हैं।
- फ्लक्स का असंतुलन: कोर के तीनों पैरों (Limbs) में चुंबकीय फ्लक्स सही ढंग से बह रहा है या नहीं।
2. कार्य सिद्धांत (Working Principle)
थ्री-फेज ट्रांसफार्मर का कोर आमतौर पर तीन वर्टिकल पैरों (Limbs) से बना होता है, जिन्हें हम बायां (Left/U), बीच का (Center/V) और दायां (Right/W) लिम्ब कह सकते हैं।
इसका मूल सिद्धांत यह है कि यदि हम किसी एक फेज (लिम्ब) की वाइंडिंग को सिंगल फेज वोल्टेज देते हैं, तो उससे पैदा होने वाला चुंबकीय फ्लक्स बाकी के दो लिम्बों में बंट जाता है। गणितीय रूप से:
_{{Total}} = _{{Limb 1}} + _{{Limb 2}}
इसी तरह, यदि हम इन दोनों लिम्बों पर उत्पन्न होने वाले वोल्टेज को मापेंगे, तो उनका योग (Sum) पहले लिम्ब पर दिए गए वोल्टेज के लगभग बराबर होना चाहिए।
3. यह टेस्ट कैसे किया जाता है? (Testing Procedure)
यह टेस्ट आमतौर पर ट्रांसफार्मर की हाई-वोल्टेज (HV) वाइंडिंग पर किया जाता है, जबकि लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग को पूरी तरह खुला (Open Circuit) छोड़ दिया जाता है।
इसके लिए किसी विशेष भारी मशीन की जरूरत नहीं होती, केवल एक सामान्य 230V AC Single Phase सप्लाई और एक वोल्टमीटर की आवश्यकता होती है। टेस्ट को तीन चरणों में किया जाता है:
चरण 1: पहले फेज (बाएं लिम्ब - U) पर सप्लाई देना
- U और Neutral (या V) के बीच 230V AC सप्लाई दी जाती है।
- बाकी के दो फेजों (V और W) पर उत्पन्न होने वाले वोल्टेज को मापा जाता है।
- अपेक्षित परिणाम: चूंकि बीच का लिम्ब (V) पास में है, इसलिए वहां ज्यादा वोल्टेज मिलेगा और दूर वाले लिम्ब (W) पर कम वोल्टेज मिलेगा। (V_U = V_V + V_W)
चरण 2: बीच के फेज (बीच का लिम्ब - V) पर सप्लाई देना
- V और Neutral के बीच 230V AC सप्लाई दी जाती है।
- बाकी के दो फेजों (U और W) का वोल्टेज मापा जाता है।
- अपेक्षित परिणाम: चूंकि बीच वाले लिम्ब से दोनों तरफ के लिम्ब बराबर दूरी पर हैं, इसलिए U और W दोनों पर लगभग बराबर वोल्टेज (लगभग 50%-50%) मिलना चाहिए। (V_V = V_U + V_W)
चरण 3: तीसरे फेज (दाएं लिम्ब - W) पर सप्लाई देना
- W और Neutral के बीच 230V AC सप्लाई दी जाती है।
- बाकी के दो फेजों (U और V) का वोल्टेज मापा जाता है।
- अपेक्षित परिणाम: पहले चरण की तरह, पास वाले लिम्ब (V) पर ज्यादा और दूर वाले लिम्ब (U) पर कम वोल्टेज मिलेगा। (V_W = V_V + V_U)
4. परिणामों का विश्लेषण (Result Analysis)
- स्वस्थ ट्रांसफार्मर (Healthy Transformer): यदि टेस्ट के दौरान ऊपर बताए गए नियमों के अनुसार वोल्टेज का बंटवारा मिलता है (जैसे बीच में सप्लाई देने पर दोनों तरफ बराबर वोल्टेज), तो ट्रांसफार्मर का कोर और वाइंडिंग पूरी तरह सुरक्षित और संतुलित हैं।
- खराब या दोषपूर्ण ट्रांसफार्मर (Faulty Transformer): यदि किसी फेज में सप्लाई देने पर बाकी फेजों में बहुत ही कम या शून्य वोल्टेज मिले, या फिर वोल्टेज का योग दिए गए वोल्टेज से मेल न खाए, तो यह साफ संकेत है कि उस फेज की वाइंडिंग में शॉर्ट सर्किट है या कोर अंदर से डैमेज हो चुका है।
नोट: चुंबकीय संतुलन परीक्षण एक गुणात्मक (Qualitative) परीक्षण है। यदि इसमें कोई असंतुलन मिलता है, तो खराबी की सटीक जगह जानने के लिए आगे 'डायग्नोस्टिक टेस्ट' (जैसे SFRA - Sweep Frequency Response Analysis) किए जाते हैं।
ध्रुवीयता परीक्षण
सरल शब्दों में,
यह टेस्ट यह सुनिश्चित करता है कि ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (Primary) और माध्यमिक (Secondary) वाइंडिंग के सिरों (Terminals) में करंट के बहने की दिशा क्या है।
1. पोलरिटी के प्रकार (Types of Polarity)
ट्रांसफार्मर में पोलरिटी दो प्रकार की होती है:
- सबट्रैक्टिव पोलरिटी (Subtractive Polarity): इसमें प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के सिरे इस तरह जुड़े होते हैं कि उनके वोल्टेज एक-दूसरे का विरोध करते हैं (घटते हैं)। बड़े पावर ट्रांसफार्मर आमतौर पर सबट्रैक्टिव पोलरिटी के साथ डिजाइन किए जाते हैं।
- एडिटिव पोलरिटी (Additive Polarity): इसमें दोनों वाइंडिंग्स के वोल्टेज एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं। छोटे वितरण (Distribution) ट्रांसफार्मर में अक्सर यह पोलरिटी देखी जाती है।
2. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
- समानांतर संचालन (Parallel Operation): यदि गलत पोलरिटी वाले दो ट्रांसफार्मरों को समानांतर में जोड़ दिया जाए, तो यह एक बहुत बड़े डेड शॉर्ट-सर्किट (Dead Short-Circuit) की तरह काम करेगा। इससे ट्रांसफार्मर तुरंत जल सकता है और ग्रिड में भारी ब्लास्ट हो सकता है।
- सुरक्षित कनेक्शन: यह सुनिश्चित करना कि वाइंडिंग के टर्मिनल मार्किंग (जैसे H_1, H_2 और X_1, X_2) बिल्कुल सही हैं।
3. परीक्षण की विधि (Testing Procedure)
इस टेस्ट को करने के लिए एक सामान्य AC वोल्टेज सोर्स और एक वोल्टमीटर की आवश्यकता होती है।
चरण-दर-चरण प्रक्रिया:
- मान लेते हैं कि हाई-वोल्टेज (HV) वाइंडिंग के टर्मिनल H_1 और H_2 हैं, और लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग के टर्मिनल X_1 और X_2 हैं।
- HV के एक टर्मिनल (H_1) को LV के एक टर्मिनल (X_1) से एक तार के जरिए शॉर्ट (Connect) कर दिया जाता है।
- अब HV वाइंडिंग पर एक कम मूल्य का सुरक्षित AC वोल्टेज (V_1) दिया जाता है।
- इसके बाद, एक वोल्टमीटर को बाकी बचे दोनों स्वतंत्र टर्मिनलों (H_2 और X_2) के बीच जोड़ा जाता है। इस वोल्टमीटर की रीडिंग को हम V_3 मान लेते हैं।
4. परिणामों का विश्लेषण (Result Analysis)
voltmeters की रीडिंग (V_3) के आधार पर पोलरिटी का निर्धारण इस प्रकार होता है:
क. सबट्रैक्टिव पोलरिटी (Subtractive)
यदि वोल्टमीटर की रीडिंग दिए गए इनपुट वोल्टेज और सेकेंडरी वोल्टेज के अंतर के बराबर आती है:
ध्रुवीयता परीक्षण (Polarity Test) ट्रांसफार्मर के सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती परीक्षणों में से एक है। यह परीक्षण विशेष रूप से तब अनिवार्य हो जाता है जब दो या दो से अधिक ट्रांसफार्मरों को समानांतर (Parallel) में जोड़ना हो, या थ्री-फेज बैंक बनाना हो।
सरल शब्दों में,
यह टेस्ट यह सुनिश्चित करता है कि ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (Primary) और माध्यमिक (Secondary) वाइंडिंग के सिरों (Terminals) में करंट के बहने की दिशा क्या है।
1. पोलरिटी के प्रकार (Types of Polarity)
ट्रांसफार्मर में पोलरिटी दो प्रकार की होती है:
- सबट्रैक्टिव पोलरिटी (Subtractive Polarity): इसमें प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के सिरे इस तरह जुड़े होते हैं कि उनके वोल्टेज एक-दूसरे का विरोध करते हैं (घटते हैं)। बड़े पावर ट्रांसफार्मर आमतौर पर सबट्रैक्टिव पोलरिटी के साथ डिजाइन किए जाते हैं।
- एडिटिव पोलरिटी (Additive Polarity): इसमें दोनों वाइंडिंग्स के वोल्टेज एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं। छोटे वितरण (Distribution) ट्रांसफार्मर में अक्सर यह पोलरिटी देखी जाती है।
2. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
- समानांतर संचालन (Parallel Operation): यदि गलत पोलरिटी वाले दो ट्रांसफार्मरों को समानांतर में जोड़ दिया जाए, तो यह एक बहुत बड़े डेड शॉर्ट-सर्किट (Dead Short-Circuit) की तरह काम करेगा। इससे ट्रांसफार्मर तुरंत जल सकता है और ग्रिड में भारी ब्लास्ट हो सकता है।
- सुरक्षित कनेक्शन: यह सुनिश्चित करना कि वाइंडिंग के टर्मिनल मार्किंग (जैसे H_1, H_2 और X_1, X_2) बिल्कुल सही हैं।
3. परीक्षण की विधि (Testing Procedure)
इस टेस्ट को करने के लिए एक सामान्य AC वोल्टेज सोर्स और एक वोल्टमीटर की आवश्यकता होती है।
चरण-दर-चरण प्रक्रिया:
- मान लेते हैं कि हाई-वोल्टेज (HV) वाइंडिंग के टर्मिनल H_1 और H_2 हैं, और लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग के टर्मिनल X_1 और X_2 हैं।
- HV के एक टर्मिनल (H_1) को LV के एक टर्मिनल (X_1) से एक तार के जरिए शॉर्ट (Connect) कर दिया जाता है।
- अब HV वाइंडिंग पर एक कम मूल्य का सुरक्षित AC वोल्टेज (V_1) दिया जाता है।
- इसके बाद, एक वोल्टमीटर को बाकी बचे दोनों स्वतंत्र टर्मिनलों (H_2 और X_2) के बीच जोड़ा जाता है। इस वोल्टमीटर की रीडिंग को हम V_3 मान लेते हैं।
4. परिणामों का विश्लेषण (Result Analysis)
voltmeters की रीडिंग (V_3) के आधार पर पोलरिटी का निर्धारण इस प्रकार होता है:
क. सबट्रैक्टिव पोलरिटी (Subtractive)
यदि वोल्टमीटर की रीडिंग दिए गए इनपुट वोल्टेज और सेकेंडरी वोल्टेज के अंतर के बराबर आती है:
ध्रुवीयता परीक्षण (Polarity Test) ट्रांसफार्मर के सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती परीक्षणों में से एक है। यह परीक्षण विशेष रूप से तब अनिवार्य हो जाता है जब दो या दो से अधिक ट्रांसफार्मरों को समानांतर (Parallel) में जोड़ना हो, या थ्री-फेज बैंक बनाना हो।
सरल शब्दों में,
यह टेस्ट यह सुनिश्चित करता है कि ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (Primary) और माध्यमिक (Secondary) वाइंडिंग के सिरों (Terminals) में करंट के बहने की दिशा क्या है।
1. पोलरिटी के प्रकार (Types of Polarity)
ट्रांसफार्मर में पोलरिटी दो प्रकार की होती है:
- सबट्रैक्टिव पोलरिटी (Subtractive Polarity): इसमें प्राइमरी और सेकेंडरी वाइंडिंग के सिरे इस तरह जुड़े होते हैं कि उनके वोल्टेज एक-दूसरे का विरोध करते हैं (घटते हैं)। बड़े पावर ट्रांसफार्मर आमतौर पर सबट्रैक्टिव पोलरिटी के साथ डिजाइन किए जाते हैं।
- एडिटिव पोलरिटी (Additive Polarity): इसमें दोनों वाइंडिंग्स के वोल्टेज एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं। छोटे वितरण (Distribution) ट्रांसफार्मर में अक्सर यह पोलरिटी देखी जाती है।
2. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
- समानांतर संचालन (Parallel Operation): यदि गलत पोलरिटी वाले दो ट्रांसफार्मरों को समानांतर में जोड़ दिया जाए, तो यह एक बहुत बड़े डेड शॉर्ट-सर्किट (Dead Short-Circuit) की तरह काम करेगा। इससे ट्रांसफार्मर तुरंत जल सकता है और ग्रिड में भारी ब्लास्ट हो सकता है।
- सुरक्षित कनेक्शन: यह सुनिश्चित करना कि वाइंडिंग के टर्मिनल मार्किंग (जैसे H_1, H_2 और X_1, X_2) बिल्कुल सही हैं।
3. परीक्षण की विधि (Testing Procedure)
इस टेस्ट को करने के लिए एक सामान्य AC वोल्टेज सोर्स और एक वोल्टमीटर की आवश्यकता होती है।
चरण-दर-चरण प्रक्रिया:
- मान लेते हैं कि हाई-वोल्टेज (HV) वाइंडिंग के टर्मिनल H_1 और H_2 हैं, और लो-वोल्टेज (LV) वाइंडिंग के टर्मिनल X_1 और X_2 हैं।
- HV के एक टर्मिनल (H_1) को LV के एक टर्मिनल (X_1) से एक तार के जरिए शॉर्ट (Connect) कर दिया जाता है।
- अब HV वाइंडिंग पर एक कम मूल्य का सुरक्षित AC वोल्टेज (V_1) दिया जाता है।
- इसके बाद, एक वोल्टमीटर को बाकी बचे दोनों स्वतंत्र टर्मिनलों (H_2 और X_2) के बीच जोड़ा जाता है। इस वोल्टमीटर की रीडिंग को हम V_3 मान लेते हैं।
4. परिणामों का विश्लेषण (Result Analysis)
voltmeters की रीडिंग (V_3) के आधार पर पोलरिटी का निर्धारण इस प्रकार होता है:
क. सबट्रैक्टिव पोलरिटी (Subtractive)
यदि वोल्टमीटर की रीडिंग दिए गए इनपुट वोल्टेज और सेकेंडरी वोल्टेज के अंतर के बराबर आती है:
V_3 = V_1 - V_2
तो इसका मतलब है कि ट्रांसफार्मर की पोलरिटी सबट्रैक्टिव है। इसका अर्थ यह है कि आमने-सामने के टर्मिनल (H_1 और X_1) समान ध्रुवीयता (Positive-Positive) वाले हैं।
ख. एडिटिव पोलरिटी (Additive)
यदि वोल्टमीटर की रीडिंग दोनों वाइंडिंग्स के वोल्टेज के योग के बराबर आती है:
V_3 = V_1 + V_2
तो इसका मतलब है कि ट्रांसफार्मर की पोलरिटी एडिटिव है। इसका अर्थ है कि H_1 के सामने वाला टर्मिनल X_1 विपरीत ध्रुवीयता वाला है।
याद रखने योग्य नियम: हमेशा सुरक्षा और मानकों के अनुसार, ट्रांसफार्मर पर कनेक्शन करने से पहले उसके नेमप्लेट पर बनी पोलरिटी मार्किंग को इस प्रैक्टिकल टेस्ट के जरिए सत्यापित (Verify) कर लेना चाहिए।
वैक्टर समूह परीक्षण
जब दो या दो से अधिक थ्री-फेज ट्रांसफार्मरों को समानांतर (Parallel Operation) में चलाना हो, तो उनका वोल्टेज और पोलरिटी समान होने के साथ-साथ उनका वेक्टर ग्रुप भी एक समान होना अनिवार्य है।
1. वेक्टर समूह (Vector Group) क्या होता है?
एक थ्री-फेज ट्रांसफार्मर में प्राथमिक (Primary) और माध्यमिक (Secondary) वाइंडिंग को जोड़ने के कई तरीके होते हैं, जैसे स्टार-स्टार (Yy), डेल्टा-डेल्टा (Dd), डेल्टा-स्टार (Dy), या स्टार-डेल्टा (Yd)।
इन कनेक्शनों के कारण, प्राइमरी वाइंडिंग के लाइन वोल्टेज और सेकेंडरी वाइंडिंग के लाइन वोल्टेज के बीच एक फेज अंतर (Phase Displacement) पैदा हो जाता है। इस फेज अंतर को घड़ी की सुइयों (Clock Convention) के रूप में दर्शाया जाता है:
- घड़ी में 12 बजे की स्थिति को शून्य फेज अंतर (0^circ) माना जाता है।
- घड़ी का हर एक घंटा 30^circ के फेज विस्थापन को दर्शाता है।
- y = सेकेंडरी वाइंडिंग स्टार (Star) में है।
- n = सेकेंडरी में न्यूट्रल (Neutral) टर्मिनल बाहर निकाला गया है।
- 11 = सेकेंडरी वोल्टेज, प्राइमरी वोल्टेज से 30^circ आगे (Leading) है (घड़ी में 11 बजे की स्थिति)।
- समानांतर संचालन (Parallel Operation): यदि अलग-अलग वेक्टर ग्रुप (जैसे एक Dyn1 और दूसरा Dyn11) वाले ट्रांसफार्मरों को समानांतर में जोड़ दिया जाए, तो दोनों के बीच फेज अंतर होने के कारण भारी शॉर्ट-सर्किट करंट बहेगा, जिससे ट्रांसफार्मर तुरंत ब्लास्ट हो सकता है।
- कनेक्शन का सत्यापन: यह जांचना कि फैक्ट्री के अंदर वाइंडिंग के आंतरिक कनेक्शन (Internal Connections) ड्राइंग और नेमप्लेट के अनुसार सही किए गए हैं या नहीं।
- शर्त 1: 1V - 2w = 1W - 2v (यह वोल्टेज आपस में बराबर होने चाहिए)
- शर्त 2: 1V - 2v < 1V - 2w (यानी 1V और 2v के बीच का वोल्टेज, 1V और 2w के बीच के वोल्टेज से कम होना चाहिए)
- शर्त 3: 1W - 2w < 1W - 2v
उदाहरण के लिए (Dyn11): > D = प्राइमरी वाइंडिंग डेल्टा (Delta) में है।
2. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
3. परीक्षण की विधि (Testing Procedure)
इस टेस्ट को करने के लिए सामान्य 3-Phase AC सप्लाई और एक वोल्टमीटर की आवश्यकता होती है।
चरण-दर-चरण प्रक्रिया (Dyn11 के उदाहरण से):
मान लेते हैं कि प्राइमरी (HV) के टर्मिनल 1U, 1V, 1W हैं और सेकेंडरी (LV) के टर्मिनल 2u, 2v, 2w और न्यूट्रल 2n हैं।
टेस्ट के लिए प्राइमरी के एक फेज और सेकेंडरी के संबंधित फेज को आपस में जोड़ (Short) दिया जाता है—जैसे 1U और 2u को एक तार से जोड़ दिया जाता है।
अब प्राइमरी वाइंडिंग (1U, 1V, 1W) पर एक कम मूल्य की संतुलित थ्री-फेज AC सप्लाई (जैसे 415V) दी जाती है।
इसके बाद, एक वोल्टमीटर की मदद से निम्नलिखित टर्मिनलों के बीच के वोल्टेज को सावधानीपूर्वक मापा जाता है:
1V - 2v
1V - 2w
1W - 2v
1W - 2w
4. परिणामों का सत्यापन (Result Verification)
यदि ट्रांसफार्मर का वेक्टर ग्रुप वास्तव में Dyn11 है, तो मापे गए वोल्टेज को निम्नलिखित गणितीय शर्तों (Conditions) को पूरा करना होगा:
यदि वोल्टमीटर की रीडिंग्स इन शर्तों को पूरी तरह संतुष्ट करती हैं, तो यह प्रमाणित होता है कि ट्रांसफार्मर का वेक्टर ग्रुप Dyn11 ही है और इसकी मार्किंग बिल्कुल सही है। अलग-अलग वेक्टर ग्रुप (जैसे Ynd1, Yy0, Dd0) के लिए सत्यापन की यह शर्तें और कनेक्शन नियम अलग-अलग होते हैं।
ओपन सर्किट परीक्षण
ओपन सर्किट परीक्षण (Open Circuit Test), जिसे नो-लोड परीक्षण (No-Load Test) भी कहा जाता है, ट्रांसफार्मर के कोर (लोहे के ढांचे) की सेहत और उसकी दक्षता (Efficiency) जांचने के लिए किया जाने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण परीक्षण है।
यह टेस्ट मुख्य रूप से ट्रांसफार्मर में लगातार होने वाले नुकसान, यानी कोर लॉस (Core Loss) या आयरन लॉस (Iron Loss) का पता लगाने के लिए किया जाता है।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
जब ट्रांसफार्मर पर कोई लोड नहीं जुड़ा होता (यानी उपभोक्ता बिजली का उपयोग नहीं कर रहे होते), तब भी वह ग्रिड से कुछ बिजली लेता है। इस टेस्ट के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:
- कोर लॉस (Iron Loss) मापना: इसमें दो प्रकार के नुकसान शामिल होते हैं - हिस्टैरिसीस लॉस (Hysteresis Loss) और एडी करंट लॉस (Eddy Current Loss)। यह नुकसान ट्रांसफार्मर के चालू रहने तक हमेशा एक समान रहता है, चाहे लोड कितना भी हो।
- नो-लोड करंट (I_0) ज्ञात करना: यह जांचना कि बिना लोड के ट्रांसफार्मर कितना करंट ले रहा है (आमतौर पर यह फुल लोड करंट का केवल 2% से 5% होता है)।
- चुंबकन प्रतिबाधा (Magnetizing Impedance): ट्रांसफार्मर के कोर के चुंबकीय गुणों (नो-लोड सर्किट पैरामीटर्स R_0 और X_0) का मान निकालना।
2. परीक्षण का सर्किट और विधि (Testing Procedure)
इस टेस्ट को करने के लिए सुरक्षा और सुविधा के लिहाज से वाइंडिंग का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण होता है।
- वाइंडिंग का चुनाव: यह टेस्ट आमतौर पर लो-वोल्टेज (LV) साइड पर उपकरण जोड़कर किया जाता है, जबकि हाई-वोल्टेज (HV) साइड को पूरी तरह से खुला (Open Circuit) छोड़ दिया जाता है।
- कारण: HV साइड पर वोल्टेज बहुत ज्यादा होता है, जिससे वहां टेस्ट करना खतरनाक हो सकता है और उतने ऊंचे वोल्टेज के मीटर मिलना भी मुश्किल होता है। LV साइड पर सामान्य रेटेड वोल्टेज देकर सुरक्षित तरीके से रीडिंग ली जा सकती है।
- उपकरण जोड़ना: LV वाइंडिंग के साथ एक वोल्टमीटर, एक एमीटर और एक लो पावर फैक्टर वाटमीटर (Low Power Factor Wattmeter) जोड़ा जाता है।
- सप्लाई देना: ऑटो-ट्रांसफार्मर (Variac) की मदद से LV साइड पर धीरे-धीरे वोल्टेज बढ़ाया जाता है और उसे ठीक ट्रांसफार्मर के रेटेड वोल्टेज (Rated Voltage) और फ्रीक्वेंसी पर सेट कर दिया जाता है।
- रीडिंग नोट करना: वोल्टेज सेट होने के बाद वोल्टमीटर (V_0), एमीटर (I_0), और वाटमीटर (W_0) की रीडिंग्स नोट कर ली जाती हैं।
3. परिणामों का विश्लेषण (Result Analysis)
चूंकि HV साइड खुला है, इसलिए सेकेंडरी वाइंडिंग में कोई करंट नहीं बहता। इसके अलावा, नो-लोड करंट (I_0) का मान बहुत कम होने के कारण प्राइमरी वाइंडिंग में होने वाला कॉपर लॉस (I_0^2R) ना के बराबर होता है।
इसलिए, वाटमीटर की जो भी रीडिंग आती है, उसे पूरी तरह से ट्रांसफार्मर का कोर लॉस मान लिया जाता है।
- वाटमीटर की रीडिंग (W_0): कोर लॉस (यानी आयरन लॉस)।
- वोल्टमीटर की रीडिंग (V_0): रेटेड लो-वोल्टेज।
- एमीटर की रीडिंग (I_0): नो-लोड करंट।
इन रीडिंग्स की मदद से निम्नलिखित फॉर्मूलों द्वारा ट्रांसफार्मर के आंतरिक पैरामीटर्स निकाले जाते हैं:
- नो-लोड पावर फैक्टर: cos phi_0 = {W_0}/{V_0 × I_0}
- लोह-क्षय प्रतिरोध (Core Resistance): R_0 = {V_0}/{I_0 cos phi_0}
- चुंबकन प्रतिघात (Magnetizing Reactance): X_0 = {V_0}/{I_0 sin phi_0}
यह टेस्ट यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि ट्रांसफार्मर चौबीसों घंटे ग्रिड से जुड़े रहने पर कम से कम बिजली की बर्बादी (Loss) करे।
शॉर्ट-सर्किट परीक्षण
शॉर्ट-सर्किट परीक्षण (Short Circuit Test), जिसे इम्पेडेंस परीक्षण (Impedance Test) भी कहा जाता है, ट्रांसफार्मर के वाइंडिंग की क्षमता और लोड के दौरान होने वाले नुकसान को जांचने के लिए किया जाने वाला दूसरा सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट है।
यह परीक्षण मुख्य रूप से ट्रांसफार्मर में फुल-लोड (Full Load) की स्थिति में होने वाले नुकसान, यानी कॉपर लॉस (Copper Loss) या ओह्मिक लॉस (I^2R Loss) का पता लगाने के लिए किया जाता है।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
जब ट्रांसफार्मर पर कारखानों, घरों या ग्रिड का वास्तविक लोड बढ़ता है, तो उसकी वाइंडिंग्स में भारी करंट बहता है। इस टेस्ट के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:
- फुल-लोड कॉपर लॉस (I^2R Loss) मापना: यह नुकसान ट्रांसफार्मर पर जुड़े लोड के बदलने के साथ बदलता रहता है। फुल-लोड पर वाइंडिंग के तार कितना गर्म होंगे और कितनी बिजली बर्बाद करेंगे, इसका पता इसी टेस्ट से चलता है।
- समतुल्य प्रतिबाधा (Equivalent Impedance - Z_{eq}): ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग्स के कुल रेजिस्टेंस (R_{eq}) और रिएक्टेंस (X_{eq}) का मान निकालना।
- वोल्टेज रेगुलेशन (Voltage Regulation): यह गणना करना कि लोड डालने पर ट्रांसफार्मर का आउटपुट वोल्टेज कितना ड्रॉप (कम) होगा।
2. परीक्षण का सर्किट और विधि (Testing Procedure)
ओपन-सर्किट टेस्ट के ठीक उलट, इस टेस्ट में सुरक्षा और मीटर की रेटिंग को ध्यान में रखकर वाइंडिंग्स का चुनाव अलग तरीके से किया जाता है।
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- वाइंडिंग का चुनाव: यह टेस्ट आमतौर पर हाई-वोल्टेज (HV) साइड पर उपकरण जोड़कर किया जाता है, जबकि लो-वोल्टेज (LV) साइड को एक मोटे तांबे के तार या पट्टी (Strip) से शॉर्ट-सर्किट कर दिया जाता है।
- कारण: HV साइड पर फुल-लोड करंट का मान बहुत कम होता है। इसलिए सामान्य रेटिंग वाले एमीटर और वाटमीटर की मदद से HV साइड पर टेस्ट करना आसान और सुरक्षित होता है।
- उपकरण जोड़ करना: HV वाइंडिंग के साथ एक वोल्टमीटर, एक एमीटर और एक वाटमीटर जोड़ा जाता है।
- सप्लाई देना: ऑटो-ट्रांसफार्मर (Variac) की मदद से HV साइड पर वोल्टेज को शून्य (0) से धीरे-धीरे बहुत सावधानी के साथ बढ़ाया जाता है।
- रेटेड करंट पर रोकना: वोल्टेज को तब तक ही बढ़ाया जाता है जब तक कि एमीटर में दिखने वाला करंट ट्रांसफार्मर के फुल-लोड रेटेड करंट के बराबर न पहुंच जाए। (आमतौर पर सामान्य वोल्टेज का केवल 5% से 10% वोल्टेज देने पर ही फुल-लोड करंट बहने लगता है)।
- रीडिंग नोट करना: इस स्थिति पर आते ही वोल्टमीटर (V_{sc}), एमीटर (I_{sc}), और वाटमीटर (W_{sc}) की रीडिंग्स रिकॉर्ड कर ली जाती हैं।
3. परिणामों का विश्लेषण (Result Analysis)
चूंकि इस टेस्ट में दिया गया वोल्टेज (V_{sc}) बहुत कम (5-10%) होता है, इसलिए कोर के अंदर पैदा होने वाला चुंबकीय फ्लक्स भी बहुत कमजोर होता है। इस वजह से शॉर्ट-सर्किट टेस्ट के दौरान होने वाला आयरन लॉस (Core Loss) इतना कम होता है कि उसे शून्य माना जा सकता है।
अतः, वाटमीटर की जो भी रीडिंग आती है, उसे पूरी तरह से ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग का फुल-लोड कॉपर लॉस मान लिया जाता है।
- वाटमीटर की रीडिंग (W_{sc}): फुल-लोड कॉपर लॉस (P_{cu})।
- वोल्टमीटर की रीडिंग (V_{sc}): शॉर्ट-सर्किट वोल्टेज (या इम्पेडेंस वोल्टेज)।
- एमीटर की रीडिंग (I_{sc}): फुल-लोड शॉर्ट-सर्किट करंट।
इन रीडिंग्स की मदद से निम्नलिखित फॉर्मूलों द्वारा ट्रांसफार्मर के आंतरिक पैरामीटर्स (HV साइड के संदर्भ में) निकाले जाते हैं:
- समतुल्य प्रतिरोध (Equivalent Resistance): R_{eq} = {W_{sc}}/{I_{sc}^2}
- समतुल्य प्रतिबाधा (Equivalent Impedance): Z_{eq} = {V_{sc}}/{I_{sc}}
- समतुल्य प्रतिघात (Equivalent Reactance): X_{eq} = sqrt{Z_{eq}^2 - R_{eq}^2}
ओपन सर्किट टेस्ट (जो आयरन लॉस देता है) और शॉर्ट सर्किट टेस्ट (जो कॉपर लॉस देता है) दोनों के परिणामों को मिलाकर ही किसी ट्रांसफार्मर की वास्तविक दक्षता (Efficiency) की गणना की जाती है।
तापमान वृद्धि परीक्षण
तापमान वृद्धि परीक्षण (Temperature Rise Test), जिसे ट्रांसफार्मर उद्योग में सम्पनेर परीक्षण (Sumpner's Test) या बैक-टू-बैक परीक्षण (Back-to-Back Test) भी कहा जाता है, एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकार परीक्षण (Type Test) है।
जब ट्रांसफार्मर ग्रिड में लगातार काम करता है, तो उसमें होने वाले नुकसानों (आयरन लॉस और कॉपर लॉस) के कारण वाइंडिंग और इंसुलेशन ऑयल का तापमान बढ़ने लगता है। यह टेस्ट यह जांचने के लिए किया जाता है कि पूर्ण लोड (Full Load) की स्थिति में ट्रांसफार्मर का अधिकतम तापमान उसके डिजाइन और इंसुलेशन की श्रेणी (Class of Insulation) द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा के भीतर रहता है या नहीं।
1. इस टेस्ट की मुख्य चुनौती और समाधान (The Challenge & Solution)
- चुनौती: किसी बड़े पावर ट्रांसफार्मर (जैसे 50 MVA) को उसकी पूरी क्षमता पर जांचने के लिए बहुत भारी मात्रा में वास्तविक लोड (Load) की आवश्यकता होगी। इतनी बिजली को केवल टेस्ट के लिए बर्बाद करना व्यावहारिक और आर्थिक रूप से संभव नहीं है।
- समाधान (सम्पनेर की विधि): इस समस्या का समाधान करने के लिए दो बिल्कुल समान (Identical) ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है। इन्हें इस तरह आपस में जोड़ा जाता है कि बिना किसी वास्तविक लोड को जोड़े, दोनों ट्रांसफार्मर के अंदर फुल-लोड करंट और फुल-वोल्टेज (यानी कुल नुकसान) पैदा कर दिए जाते हैं। इसमें ग्रिड से बहुत ही कम मात्रा में बिजली खर्च होती है।
2. परीक्षण की सर्किट व्यवस्था और विधि (Testing Procedure)
इस टेस्ट में दो समान ट्रांसफार्मर (माना T_1 और T_2) के कनेक्शन निम्नलिखित तरीके से किए जाते हैं:
- प्राइमरी वाइंडिंग्स का कनेक्शन: दोनों ट्रांसफार्मर की प्राथमिक (Primary) वाइंडिंग्स को एक-दूसरे के समानांतर (Parallel) में जोड़ा जाता है और उन्हें रेटेड वोल्टेज और फ्रीक्वेंसी की मुख्य सप्लाई दी जाती है। यह व्यवस्था ट्रांसफार्मर के अंदर कोर लॉस (Iron Loss) पैदा करती है।
- सेकेंडरी वाइंडिंग्स का कनेक्शन: दोनों ट्रांसफार्मर की माध्यमिक (Secondary) वाइंडिंग्स को एक-दूसरे के श्रृंखला विरोध (Series Opposition) में जोड़ा जाता है। विरोध में जोड़ने का मतलब है कि दोनों के वोल्टेज एक-दूसरे को काट देते हैं, जिससे सेकेंडरी सर्किट का कुल वोल्टेज शून्य हो जाता है और कोई करंट नहीं बहता।
- करंट प्रवाहित करना: अब, सेकेंडरी सर्किट की इस बंद लूप (Closed Loop) में एक अलग रेगुलेटिंग ट्रांसफार्मर (Auxiliary Source) की मदद से एक छोटा वोल्टेज दिया जाता है। इस वोल्टेज को तब तक बढ़ाया जाता है जब तक कि दोनों ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग्स में उनका फुल-लोड रेटेड करंट न बहने लगे। यह व्यवस्था वाइंडिंग्स में कॉपर लॉस (Copper Loss) पैदा करती है।
3. तापमान का मापन (Measurement and Readings)
इस सर्किट को लगातार कई घंटों तक (आमतौर पर 8 से 12 घंटे या जब तक तापमान स्थिर न हो जाए) चालू रखा जाता है। इस दौरान दो मुख्य तापमान मापे जाते हैं:
- ऑयल तापमान (Top Oil Temperature): ट्रांसफार्मर टैंक के सबसे ऊपरी हिस्से में लगे थर्मामीटर की मदद से तेल के तापमान में होने वाली वृद्धि को लगातार नोट किया जाता है।
- वाइंडिंग तापमान (Winding Temperature): चूंकि चलते हुए ट्रांसफार्मर के अंदर सीधे वाइंडिंग का तापमान मापना मुश्किल होता है, इसलिए टेस्ट बंद करने के तुरंत बाद वाइंडिंग प्रतिरोध परीक्षण (Winding Resistance Test) किया जाता है। तांबे का प्रतिरोध तापमान के साथ बढ़ता है, इसलिए प्रतिरोध में आए बदलाव के फॉर्मूले से वाइंडिंग के सटीक तापमान की गणना कर ली जाती है।
4. स्वीकार्य सीमा और महत्व (Acceptable Limits & Importance)
अंतर्राष्ट्रीय मानकों (जैसे IEC 60076) के अनुसार, सामान्य वातावरण के तापमान (Ambient Temperature) के ऊपर अधिकतम तापमान वृद्धि निम्नलिखित सीमा में होनी चाहिए:
- टॉप ऑयल तापमान वृद्धि (Top Oil Temperature Rise): अधिकतम 60^circ {C} से 65^circ {C} (बनावट के आधार पर)।
- वाइंडिंग तापमान वृद्धि (Winding Temperature Rise): अधिकतम 65^circ {C} से 70^circ {C}।
यह टेस्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
यदि ट्रांसफार्मर का तापमान इस निर्धारित सीमा से अधिक बढ़ता है, तो ट्रांसफार्मर के अंदर भरा तेल जल्दी खराब (Sludge formation) हो जाएगा और वाइंडिंग का पेपर इंसुलेशन जल सकता है। इससे ट्रांसफार्मर की उम्र बहुत कम हो जाती है और उसमें आंतरिक ब्लास्ट का खतरा बढ़ जाता है।
टैन डेल्टा परीक्षण
यह टेस्ट यह पता लगाने के लिए किया जाता है कि समय के साथ ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग और तेल के इंसुलेशन में कितनी नमी (Moisture), गंदगी या बुढ़ापा (Aging) आ चुका है।
1. कार्य सिद्धांत (Working Principle)
यह परीक्षण इस सिद्धांत पर काम करता है कि एक आदर्श (Perfect) इंसुलेशन पूरी तरह से एक कैपेसिटर (Capacitor) की तरह व्यवहार करता है।
- आदर्श स्थिति (Ideal Insulation): यदि इंसुलेशन 100% शुद्ध और सही है, तो उसमें से बहने वाला करंट (I_c) दिए गए वोल्टेज (V) से ठीक 90^circ आगे (Lead) होना चाहिए। इस स्थिति में कोई ऊर्जा बर्बाद (Power Loss) नहीं होती।
- वास्तविक स्थिति (Imperfect Insulation): समय के साथ नमी, धूल या तेल के खराब होने के कारण इंसुलेशन में थोड़ा रेजिस्टेंस आ जाता है। इस वजह से करंट और वोल्टेज का कोण 90^circ से थोड़ा कम हो जाता है। इस कमी या झुकाव के कोण को डेल्टा (delta) कहा जाता है।
इसी कोण के स्पर्शज्या (Tangent) को टैन डेल्टा ( tan delta) कहते हैं। यह मान जितना अधिक होगा, इंसुलेशन में उतनी ही ज्यादा खराबी या लीकेज होगी।
2. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
सामान्य इंसुलेशन प्रतिरोध परीक्षण (Megger Test) केवल यह बताता है कि इंसुलेशन फेल है या सही। लेकिन टैन डेल्टा टेस्ट बहुत पहले ही इंसुलेशन में आ रही गिरावट को पकड़ लेता है। इसके मुख्य उद्देश्य हैं:
- नमी का पता लगाना: ट्रांसफार्मर के तेल और पेपर इंसुलेशन में घुसी बारीक से बारीक नमी को मापना।
- असर का पूर्वानुमान (Predicting Life): यह अनुमान लगाना कि ट्रांसफार्मर का इंसुलेशन और कितने साल सुरक्षित काम कर सकता है।
- बुशिंग (Bushings) की जांच: ट्रांसफार्मर की हाई-वोल्टेज बुशिंग्स की आंतरिक सेहत का सटीक पता लगाना।
3. यह टेस्ट कैसे किया जाता है? (Testing Procedure)
यह टेस्ट एक विशेष टैन डेल्टा टेस्ट किट (Tan Delta Bridge) द्वारा किया जाता है।
- आइसोलेशन: ट्रांसफार्मर को ग्रिड से पूरी तरह अलग करके अर्थ (Discharge) कर दिया जाता है।
- सप्लाई देना: टेस्ट किट की मदद से वाइंडिंग पर एक उच्च वोल्टेज (आमतौर पर 10 kV AC) और सामान्य फ्रीक्वेंसी (50 {Hz}) दी जाती है।
- मापन: उपकरण स्वचालित रूप से कैपेसिटिव करंट (I_c) और रेजिस्टिव लीकेज करंट (I_r) के बीच के फेज अंतर को मापता है और सीधे डिजिटल स्क्रीन पर tan delta का मान (आमतौर पर प्रतिशत या दशमलव में) प्रदर्शित कर देता है।
- तापमान नोट करना: यह टेस्ट हमेशा एक निश्चित तापमान (मानक रूप से 20^circ {C}) के संदर्भ में मापा जाता है, क्योंकि तापमान बढ़ने से टैन डेल्टा का मान भी बढ़ता है।
4. परिणामों का विश्लेषण (Result Analysis)
एक स्वस्थ और नए ट्रांसफार्मर के लिए टैन डेल्टा का मान बहुत कम होना चाहिए।
- नया ट्रांसफार्मर: tan delta का मान 0.005 (या 0.5%) से कम होना चाहिए।
- सर्विस में चल रहा ट्रांसफार्मर: यदि यह मान 0.01 (या 1%) से कम है, तो इंसुलेशन को संतोषजनक माना जाता है।
- चिंताजनक स्थिति: यदि टैन डेल्टा का मान 1% या 2% से अधिक आने लगता है, तो यह दर्शाता है कि इंसुलेशन गंभीर रूप से दूषित या बूढ़ा हो चुका है। ऐसी स्थिति में ट्रांसफार्मर के तेल को तुरंत फिल्टर करने या बदलने की सलाह दी जाती है ताकि किसी बड़े धमाके से बचा जा सके।
ट्रांसफार्मर तेल परीक्षण
समय के साथ लगातार हाई वोल्टेज, गर्मी, नमी और ऑक्सीजन के संपर्क में रहने के कारण यह तेल खराब होने लगता है। तेल की सेहत जांचने के लिए कई तरह के टेस्ट किए जाते हैं, जिन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. विद्युत परीक्षण (Electrical Tests)
ये टेस्ट यह जांचने के लिए किए जाते हैं कि तेल की करंट रोकने की क्षमता (इंसुलेशन) कैसी है:
क. ब्रेकडाउन वोल्टेज टेस्ट (BDV Test)
- क्या है: यह तेल की डाईइलेक्ट्रिक स्ट्रेंथ (विद्युत सहनशक्ति) को मापता है।
- विधि: तेल के सैंपल में 2.5 mm की दूरी पर रखे दो इलेक्ट्रोड्स के बीच तब तक AC वोल्टेज बढ़ाया जाता है जब तक कि स्पार्क न हो जाए।
- मानक: नए तेल के लिए यह >60 { kV} और सर्विस में चल रहे तेल के लिए >30 { kV} होना चाहिए।
ख. टैन डेल्टा / डिसिपेशन फैक्टर टेस्ट (\tan\delta)
- क्या है: यह तेल में मौजूद बारीक नमी और घुलनशील गंदगी के कारण होने वाले पावर लॉस को मापता है।
- मानक: 90^\circ\text{C} तापमान पर इसका मान 0.002 से 0.05 के बीच होना चाहिए। मान जितना कम होगा, तेल उतना ही शुद्ध होगा।
2. रासायनिक परीक्षण (Chemical Tests)
ये टेस्ट तेल के अंदरूनी रासायनिक बदलावों और एसिडिटी का पता लगाते हैं:
क. अम्लता परीक्षण (Acidity / Neutralization Number Test)
- क्या है: तेल के पुराना होने पर उसमें ऑक्सीकरण (Oxidation) होता है, जिससे एसिड (अम्ल) बनता है। यह एसिड ट्रांसफार्मर के पेपर इंसुलेशन और तांबे को गलाने लगता है।
- मानक: सर्विस में चल रहे तेल की एसिडिटी 0.25 { mg KOH/g} से अधिक नहीं होनी चाहिए।
ख. नमी की मात्रा (Moisture Content / Karl Fischer Test)
- क्या है: तेल में मौजूद पानी की मात्रा को PPM (Parts Per Million) में मापता है। हवा की नमी या आंतरिक लीकेज से तेल में पानी मिल सकता है।
- मानक: बड़े पावर ट्रांसफार्मर में नमी की मात्रा 20\text{ PPM} से कम होनी चाहिए।
ग. इंटरफेशियल टेंशन (IFT - Interfacial Tension)
- क्या है: यह तेल और पानी के बीच के सतही तनाव को मापता है। इससे तेल में मौजूद घुलनशील गंदगी (Sludge) के शुरुआती लक्षणों का पता चलता है।
3. उन्नत और नैदानिक परीक्षण (Advanced & Diagnostic Tests)
यह परीक्षण ट्रांसफार्मर के अंदर चल रही किसी बड़ी अंदरूनी खराबी को बिना खोले पकड़ने के लिए किए जाते हैं:
क. घुलनशील गैस विश्लेषण (DGA - Dissolved Gas Analysis)
- क्या है: यह ट्रांसफार्मर तेल का सबसे उन्नत परीक्षण है। जब ट्रांसफार्मर के अंदर कोई दोष (जैसे स्पार्किंग, ओवरहीटिंग, या आर्किंग) होता है, तो तेल के मॉलिक्यूल्स टूटकर कुछ गैसेस (जैसे हाइड्रोजन, मीथेन, एसिटिलीन, एथिलीन आदि) बनाते हैं जो तेल में ही घुल जाती हैं।
- महत्व: तेल का सैंपल लेकर क्रोमैटोग्राफी तकनीक से इन गैसों की मात्रा जांची जाती है। उदाहरण के लिए, यदि तेल में एसिटिलीन (C_2H_2) गैस मिलती है, तो यह साफ संकेत है कि ट्रांसफार्मर के अंदर कोई बहुत भारी स्पार्किंग या आर्क (High Energy Arc) हुआ है।
संक्षेप में:
मुख्य तेल परीक्षण और उनकी सीमाएं
|
परीक्षण का नाम |
क्या मापता है? |
स्वीकार्य सीमा (In-Service Oil) |
|---|---|---|
|
BDV टेस्ट |
विद्युत सहनशक्ति (Dielectric Strength) |
> 30 { kV} (न्यूनतम) |
|
नमी (Moisture) |
पानी की मात्रा (PPM में) |
< 20 - 35 { PPM} |
|
एसिडिटी (Acidity) |
अम्ल की मात्रा |
< 0.25 { mg KOH/g} |
|
टैन डेल्टा (tan delta) |
डाइइलेक्ट्रिक लॉस फैक्टर |
< 0.05 (90^circ {C} पर) |
|
DGA टेस्ट |
तेल में घुली हुई फॉल्ट गैसें |
गैस के प्रकार और मात्रा पर निर्भर |
रखरखाव का उपाय: यदि तेल इन टेस्ट्स में फेल होता है, तो ऑयल फिल्ट्रेशन (Centrifuging) प्रक्रिया द्वारा उसकी नमी और कचरे को साफ किया जाता है। यदि तेल बहुत अधिक एसिडिक हो चुका हो, तो उसे बदल दिया जाता है।
उच्च वोल्टेज परीक्षण
उच्च वोल्टेज परीक्षण (High Voltage Test), जिसे इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्री में डाईइलेक्ट्रिक टेस्ट (Dielectric Test) या विद्युतरोधी सहनशक्ति परीक्षण भी कहा जाता है, ट्रांसफार्मर पर किया जाने वाला एक बेहद गंभीर और अनिवार्य सुरक्षा परीक्षण है।
यह परीक्षण मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि ट्रांसफार्मर का इंसुलेशन ग्रिड में आने वाले अचानक हाई वोल्टेज (जैसे आसमानी बिजली गिरना या स्विचिंग सर्ज) को बिना फेल हुए सहन कर सकता है या नहीं।
1. यह परीक्षण क्यों किया जाता है? (Objective)
सामान्य परिचालन के दौरान ट्रांसफार्मर अपने रेटेड वोल्टेज पर काम करता है। लेकिन प्रणाली में दो स्थितियों के कारण अचानक बहुत भारी वोल्टेज (Voltage Surges) पैदा हो सकता है:
- आकाशीय बिजली (Lightning Strokes): जब ट्रांसफार्मर या ट्रांसमिशन लाइन पर बिजली गिरती है।
- स्विचिंग सर्ज (Switching Surges): भारी लोड को अचानक चालू या बंद करने से ग्रिड में पैदा होने वाला क्षणिक हाई वोल्टेज।
यह टेस्ट यह जांचता है कि ऐसी आपातकालीन स्थितियों में ट्रांसफार्मर का पेपर, तेल और बुशिंग इंसुलेशन पंचर (Fail) तो नहीं होगा।
2. उच्च वोल्टेज परीक्षण के प्रकार (Types of HV Tests)
ट्रांसफार्मर पर मुख्य रूप से तीन प्रकार के उच्च वोल्टेज परीक्षण किए जाते हैं:
क. पावर फ्रीक्वेंसी वोल्टेज सहनशक्ति परीक्षण (Power Frequency Withstand Test)
- विधि: इस टेस्ट में ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग और अर्थ (Body) के बीच बाहरी स्रोत से एक बहुत ही उच्च AC वोल्टेज (जो सामान्य रेटेड वोल्टेज से लगभग 2 गुना या अधिक होता है) दिया जाता है।
- अवधि: इस उच्च वोल्टेज को लगातार 1 मिनट (60 सेकंड) तक बनाए रखा जाता है।
- उद्देश्य: यदि 1 मिनट के भीतर कोई स्पार्क, फ्लैशओवर या करंट लीकेज नहीं होता, तो इंसुलेशन को पास माना जाता है। यह मुख्य रूप से मुख्य इंसुलेशन (Major Insulation) की मजबूती जांचता है।
ख. प्रेरित वोल्टेज परीक्षण (Induced Over-Voltage Test / DVDF)
- विधि: ऊपर बताए गए टेस्ट में वाइंडिंग के दो फेरों (Turns) के बीच के इंसुलेशन की जांच नहीं हो पाती। इसके लिए ट्रांसफार्मर के सामान्य वोल्टेज से दोगुना वोल्टेज (2V) और सामान्य फ्रीक्वेंसी से दोगुनी या तिगुनी फ्रीक्वेंसी (जैसे 100 { Hz} या 150 { Hz}) सीधे वाइंडिंग में दी जाती है।
- उच्च फ्रीक्वेंसी का कारण: यदि हम बिना फ्रीक्वेंसी बढ़ाए दोगुना वोल्टेज देंगे, तो कोर का चुंबकीय फ्लक्स बहुत बढ़ जाएगा और कोर सैचुरेट (जल्द गर्म) होकर जल जाएगा। इसलिए उच्च फ्रीक्वेंसी (100-150 { Hz}) का उपयोग किया जाता है।
- उद्देश्य: यह वाइंडिंग के टर्न्स के बीच के इंसुलेशन (Inter-turn Insulation) की जांच करता है। इसे आमतौर पर 40 से 60 सेकंड के लिए किया जाता है।
ग. लाइटनिंग इम्पल्स टेस्ट (Lightning Impulse Test)
- विधि: यह एक अत्यधिक उन्नत प्रकार परीक्षण (Type Test) है। इसमें एक विशेष इम्पेडेंस जनरेटर (Impulse Generator) की मदद से आसमानी बिजली की हूबहू नकल तैयार की जाती है। ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग पर बहुत ही कम समय (माइक्रो-सेकंड) के लिए एक बेहद उच्च वोल्टेज का वेवफॉर्म (जैसे 1.2/50 mu {s}) प्रहार (Strike) कराया जाता है।
- उद्देश्य: यह जांचना कि क्या ट्रांसफार्मर प्राकृतिक बिजली के भारी झटके को बिना डैमेज हुए झेल सकता है।
3. यह टेस्ट कब और कहाँ किया जाता है?
- सुरक्षित वातावरण: चूंकि इस टेस्ट में हजारों-लाखों वोल्ट की बिजली शामिल होती है, इसलिए यह टेस्ट केवल विशेष रूप से डिजाइन की गई हाई वोल्टेज लैब (HV Laboratory) में ही किया जाता है, जहाँ चारों तरफ सुरक्षा जाली (Faraday Cage) और सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल होते हैं।
- समय: यह टेस्ट ट्रांसफार्मर के निर्माण (Manufacturing) के तुरंत बाद फैक्ट्री में ही किया जाता है। फील्ड (सबस्टेशन) में आमतौर पर इतने ऊंचे स्तर का टेस्ट दोबारा नहीं किया जाता, क्योंकि यह एक विनाशकारी परीक्षण (Destructive Test) की श्रेणी में आ सकता है यदि इंसुलेशन में पहले से कोई कमजोरी हो।
4. परिणाम और निष्कर्ष (Result Analysis)
- सफलता (Pass): यदि निर्धारित समय (जैसे 1 मिनट का AC टेस्ट या इम्पल्स वेव) के दौरान वोल्टमीटर स्थिर रहता है, एमीटर में कोई अचानक करंट नहीं बढ़ता, और ट्रांसफार्मर के अंदर से किसी प्रकार की कड़कड़ाहट या स्पार्किंग की आवाज नहीं आती, तो ट्रांसफार्मर को 'हाई वोल्टेज टेस्ट सर्टिफाइड' घोषित कर दिया जाता है।
- विफलता (Fail): यदि टेस्ट के दौरान इंसुलेशन पंचर हो जाता है, तो तेल में बुलबुले या तेज आवाज आती है, और किट तुरंत ट्रिप हो जाती है। ऐसी स्थिति में ट्रांसफार्मर को दोबारा खोलकर उसकी वाइंडिंग का री-इंसुलेशन करना पड़ता है।

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