सहायक फोरमैन (इलेक्ट्रिकल) (प्रशिक्षु), टी एंड एस जीआर-सी (ई एंड एम) तकनीशियन (इलेक्ट्रीशियन) (प्रशिक्षु), श्रेणी-III (ई एंड एम)

विद्युत के सिद्धांत - विद्युत वोल्टेज, धारा और प्रतिरोध,
ओम का नियम - विशिष्ट प्रतिरोध, प्रतिरोध के नियम और उनका अनुप्रयोग
वोल्टेज में गिरावट की गणना, श्रृंखला और समानांतर परिपथों के लिए,
वोल्टेज, धारा, प्रतिरोध, शक्ति और ऊर्जा की व्यावहारिक इकाइयाँ।
विद्युत शक्ति इकाई (किलोवाट) और यांत्रिक शक्ति इकाई (एचपी) के बीच संबंध।



विद्युत अभियांत्रिकी (Electrical Engineering) के ये मूल सिद्धांत किसी भी परिपथ (circuit) को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। यहाँ इन सभी विषयों की संक्षिप्त और स्पष्ट व्याख्या दी गई है:

​1. बुनियादी विद्युत परिभाषाएँ

  • वोल्टेज (Voltage - V): इसे विद्युत दाब (Electrical Pressure) भी कहते हैं। यह दो बिंदुओं के बीच विभव का अंतर है जो इलेक्ट्रॉनों को प्रवाहित करने के लिए बल प्रदान करता है। इसकी इकाई वोल्ट (Volt) है।
  • धारा (Current - I): आवेश (Electrons) के प्रवाह की दर को धारा कहते हैं। इसकी इकाई एम्पीयर (Ampere) है।
  • प्रतिरोध (Resistance - R): यह धारा के प्रवाह में आने वाली रुकावट है। इसकी इकाई ओम (Omega) है।

​2. ओम का नियम और प्रतिरोध के नियम

ओम का नियम (Ohm's Law):

स्थिर भौतिक परिस्थितियों में, किसी चालक से प्रवाहित होने वाली धारा (I) उसके सिरों पर लगाए गए वोल्टेज (V) के समानुपाती होती है।

V = I × R


प्रतिरोध के नियम (Laws of Resistance):

किसी चालक का प्रतिरोध निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:

  1. ​लम्बाई (L) के समानुपाती (R propto L)
  2. ​अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल (A) के व्युत्क्रमानुपाती (R propto 1/A)
  3. ​पदार्थ की प्रकृति पर।
  4. ​तापमान पर।

विशिष्ट प्रतिरोध (Specific Resistance/Resistivity - rho):

यह किसी पदार्थ के इकाई घन (unit cube) का प्रतिरोध होता है। इसका सूत्र है:


R = rho {L}/{A}


इसकी इकाई ओम-मीटर (Omega m) होती है।

​3. श्रृंखला (Series) और समानांतर (Parallel) परिपथ

श्रृंखला परिपथ (Series Circuit): इसमें धारा का केवल एक ही रास्ता होता है। कुल प्रतिरोध (R_t) बढ़ जाता है।

R_t = R_1 + R_2 + R_3...


इसमें वोल्टेज हर प्रतिरोध पर बँट जाता है (Voltage Drop), लेकिन धारा समान रहती है।

समानांतर परिपथ (Parallel Circuit): इसमें धारा के एक से अधिक रास्ते होते हैं। कुल प्रतिरोध घट जाता है।

1/R_t = 1/R_1 + 1/R_2 + 1/R_3...

इसमें वोल्टेज समान रहता है, लेकिन धारा अलग-अलग शाखाओं में बँट जाती है।

4. व्यावहारिक इकाइयाँ (Practical Units)

​दैनिक जीवन और गणनाओं में हम निम्नलिखित इकाइयों का उपयोग करते हैं:

  • वोल्टेज: वोल्ट (V), किलोवोल्ट (kV)
  • धारा: एम्पीयर (A), मिली-एम्पीयर (mA)
  • प्रतिरोध: ओम (Omega), किलो-ओम (k Omega)
  • शक्ति (Power): वाट (W), किलोवाट (kW) - यह P = V×I द्वारा निकाली जाती है।
  • ऊर्जा (Energy): किलोवाट-घंटा (kWh) - इसे 'यूनिट' भी कहते हैं।

​5. विद्युत शक्ति (kW) और यांत्रिक शक्ति (HP) में संबंध

​मोटरों और इंजनों की शक्ति मापने के लिए इन दोनों इकाइयों का परस्पर उपयोग किया जाता है।

यांत्रिक शक्ति (Horse Power - HP) और विद्युत शक्ति (Kilowatt - kW) के बीच संबंध इस प्रकार है:

मीट्रिक प्रणाली (Metric HP):

1 { HP} = 735.5 { Watts}

1 { kW} = 1.36 { HP}

ब्रिटिश प्रणाली (Imperial HP):

1 { HP} = 746 { Watts} (सामान्यतः गणना के लिए यही उपयोग होता है)

1 { kW} = 1.34 { HP}

याद रखने का आसान तरीका:

यदि आपके पास 1 किलोवाट की मोटर है, तो वह लगभग 1.34 या 1.36 हॉर्सपावर के बराबर काम करेगी। इसके विपरीत, एक 5 HP की मोटर लगभग 3.73 { kW} (यदि 746 से गुणा करें) बिजली की खपत करती है।




विद्युत चुंबकत्व - विद्युत चुंबकीय बल (ईएमएफ) की अवधारणा,
ईएमएफ का उत्पादन, फ्लेमिंग के दाएं और बाएं हाथ के नियम,
विद्युत धारा के चुंबकीय, रासायनिक और तापीय प्रभाव,
पदार्थों के चुंबकीय गुण, विद्युत चुंबक और उनके विभिन्न अनुप्रयोग।


विद्युत चुंबकत्व (Electromagnetism) भौतिकी की वह शाखा है जो विद्युत धाराओं और चुंबकीय क्षेत्रों के बीच के अंतर्संबंधों को समझाती है। आइए इन विषयों को विस्तार से समझते हैं:

​1. विद्युत चुंबकीय बल (EMF) की अवधारणा

विद्युत वाहक बल (Electromotive Force - EMF):

ईएमएफ वह बाहरी बल या ऊर्जा है जो किसी परिपथ में इलेक्ट्रॉनों को प्रवाहित करने के लिए आवश्यक होती है। यह वास्तव में कोई 'बल' नहीं है, बल्कि एक विभवांतर (Potential Difference) है जो किसी ऊर्जा स्रोत (जैसे बैटरी या जनरेटर) द्वारा प्रदान किया जाता है। इसकी इकाई वोल्ट (Volt) है।

EMF का उत्पादन:

ईएमएफ मुख्य रूप से दो तरीकों से उत्पन्न होता है:

  1. रासायनिक क्रिया द्वारा: जैसे कि सेल या बैटरी में।
  2. चुंबकीय प्रेरण (Induction) द्वारा: जब कोई चालक (conductor) किसी चुंबकीय क्षेत्र को काटता है या चुंबकीय क्षेत्र समय के साथ बदलता है (फैराडे का नियम)।


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2. फ्लेमिंग के नियम (Fleming's Rules)

​ये नियम विद्युत मशीनों में दिशा निर्धारित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं:

  • दाएं हाथ का नियम (Right Hand Rule - जनरेटर के लिए): यह नियम प्रेरित धारा (Induced Current) की दिशा बताता है। यदि अंगूठा चालक की गति की दिशा और तर्जनी (Index finger) चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दर्शाए, तो मध्यमा (Middle finger) प्रेरित धारा की दिशा बताएगी।
  • बाएं हाथ का नियम (Left Hand Rule - मोटर के लिए): यह नियम चालक पर लगने वाले बल की दिशा बताता है। यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र और मध्यमा धारा की दिशा दर्शाए, तो अंगूठा चालक पर लगने वाले बल (Motion) की दिशा बताएगा।


3. विद्युत धारा के प्रभाव

​जब किसी चालक से धारा प्रवाहित होती है, तो वह मुख्य रूप से तीन प्रभाव उत्पन्न करती है:

  1. चुंबकीय प्रभाव (Magnetic Effect): धारा प्रवाहित होने पर चालक के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र बन जाता है। (उदाहरण: विद्युत मोटर, घंटी)।
  2. रासायनिक प्रभाव (Chemical Effect): जब धारा किसी तरल (Electrolyte) से गुजरती है, तो वह रासायनिक परिवर्तन पैदा करती है। (उदाहरण: इलेक्ट्रोप्लेटिंग, बैटरी चार्जिंग)।
  3. तापीय प्रभाव (Heating Effect): धारा के मार्ग में प्रतिरोध होने पर ऊर्जा ऊष्मा के रूप में निकलती है (H = I^2Rt)। (उदाहरण: हीटर, इलेक्ट्रिक प्रेस, बल्ब)।

​4. पदार्थों के चुंबकीय गुण

​पदार्थों को उनके चुंबकीय व्यवहार के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है:

  • प्रति-चुंबकीय (Diamagnetic): जो चुंबकीय क्षेत्र द्वारा थोड़े प्रतिकर्षित (repel) होते हैं। (जैसे: तांबा, सोना, पानी)।
  • अनु-चुंबकीय (Paramagnetic): जो चुंबकीय क्षेत्र की ओर थोड़े आकर्षित होते हैं। (जैसे: एल्यूमीनियम, ऑक्सीजन)।
  • लौह-चुंबकीय (Ferromagnetic): जो चुंबकीय क्षेत्र की ओर बहुत मजबूती से आकर्षित होते हैं और स्थायी चुंबक बना सकते हैं। (जैसे: लोहा, कोबाल्ट, निकेल)।

​5. विद्युत चुंबक (Electromagnet) और अनुप्रयोग

​जब किसी लोहे की कोर पर लिपटी हुई कुंडली (coil) से धारा प्रवाहित की जाती है, तो वह एक चुंबक की तरह व्यवहार करने लगती है। इसे विद्युत चुंबक कहते हैं। धारा बंद करते ही इसका चुंबकत्व समाप्त हो जाता है।

विभिन्न अनुप्रयोग (Applications):

  • भारी मशीनों में: कबाड़खानों में भारी लोहे को उठाने के लिए क्रेनों में।
  • संचार उपकरणों में: टेलीफोन रिसीवर, लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन में।
  • चिकित्सा में: MRI (Magnetic Resonance Imaging) मशीनों में।
  • विद्युत उपकरणों में: इलेक्ट्रिक रिले, सर्किट ब्रेकर और घंटी में।
  • परिवहन में: मैग्लेव (Maglev) ट्रेनों में, जो चुंबकीय शक्ति से पटरी से ऊपर उठकर चलती हैं।





पदार्थ - चालक, अर्धचालक और कुचालक पदार्थ
और उनके सापेक्ष गुण। ट्रांसफार्मर तेल, ऊष्मा और
नमी का इन्सुलेशन पर प्रभाव। स्नेहक और उनके उपयोग।
विभिन्न प्रकार के तार, केबल, स्विच, सर्किट ब्रेकर, कटआउट।


पदार्थों के गुण और विद्युत उपकरणों की समझ एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर या तकनीशियन के लिए अनिवार्य है। यहाँ आपके द्वारा पूछे गए विषयों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

​1. चालक, अर्धचालक और कुचालक (Materials)

​विद्युत धारा के प्रवाह के आधार पर पदार्थों को तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है:

गुण

चालक (Conductor)

अर्धचालक (Semiconductor)

कुचालक (Insulator)

परिभाषा

जिनमें धारा आसानी से बहती है।

जिनकी चालकता चालक और कुचालक के बीच होती है।

जो धारा के प्रवाह को पूरी तरह रोकते हैं।

मुक्त इलेक्ट्रॉन

बहुत अधिक संख्या में।

कम संख्या में (तापमान बढ़ने पर बढ़ते हैं)।

न के बराबर।

तापमान गुणांक

धनात्मक (ताप बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है)।

ऋणात्मक (ताप बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है)।

ऋणात्मक।

उदाहरण

तांबा, एल्युमिनियम, चांदी।

सिलिकॉन, जर्मेनियम।

रबर, कांच, पीवीसी, सूखी लकड़ी।


2. ट्रांसफार्मर तेल और इन्सुलेशन पर प्रभाव

ट्रांसफार्मर तेल (Transformer Oil):

यह एक खनिज तेल (Mineral Oil) होता है जिसके दो मुख्य कार्य हैं:

  1. इन्सुलेशन: वाइंडिंग के बीच शॉर्ट सर्किट को रोकना।
  2. शीतलन (Cooling): वाइंडिंग की गर्मी को सोखकर उसे ठंडा रखना।

इन्सुलेशन पर बाहरी प्रभाव:

  • ऊष्मा (Heat): अत्यधिक गर्मी इन्सुलेशन को भंगुर (brittle) बना देती है, जिससे वह टूट सकता है और शॉर्ट सर्किट हो सकता है।
  • नमी (Moisture): यह सबसे खतरनाक है। तेल या इन्सुलेशन में नमी आने से उसकी डाइइलेक्ट्रिक स्ट्रेंथ (Dielectric Strength) कम हो जाती है, जिससे स्पार्किंग का खतरा बढ़ जाता है। इसके बचाव के लिए 'ब्रीदर' (Breather) में सिलिका जेल का उपयोग किया जाता है।

​3. स्नेहक (Lubricants) और उनके उपयोग

​स्नेहक वे पदार्थ हैं जो दो सतहों के बीच घर्षण (friction) को कम करते हैं।

  • प्रकार: तेल (तरल), ग्रीस (अर्ध-ठोस), और ग्रेफाइट (ठोस)।
  • उपयोग:
    • ​मोटर और पंखों के बेयरिंग में घर्षण कम करने के लिए।
    • ​मशीनों के पुर्जों को घिसने से बचाने और जंग से सुरक्षा के लिए।
    • ​मशीनों की कार्यक्षमता (Efficiency) बढ़ाने के लिए।

​4. तार, केबल और स्विचिंग उपकरण

तार और केबल (Wires & Cables)

  • तार: एक अकेला नंगा या इंसुलेटेड कंडक्टर।
  • केबल: जब दो या दो से अधिक इंसुलेटेड तारों को एक सुरक्षात्मक कवच (sheath) में रखा जाता है।
  • प्रकार: वी.आई.आर (VIR), पी.वी.सी (PVC), और आर्मर्ड केबल (भूमिगत उपयोग के लिए)।

स्विच और सुरक्षा उपकरण

  1. स्विच (Switch): परिपथ को 'ऑन' या 'ऑफ' करने के लिए उपयोग किया जाता है। (उदा: वन-वे, टू-वे, इंटरमीडिएट स्विच)।
  2. सर्किट ब्रेकर (Circuit Breaker - CB): यह एक स्वचालित स्विच है जो खराबी (ओवरलोड या शॉर्ट सर्किट) होने पर परिपथ को अपने आप काट देता है। (उदा: MCB, MCCB, ACB)।
  3. कटआउट (Cut-out/Fuse): यह सुरक्षा का सबसे पहला स्तर है। अत्यधिक धारा बहने पर इसका तार पिघल जाता है और पूरे सिस्टम को जलने से बचाता है। इसे हमेशा 'फेज' (Phase) तार में लगाया जाता है।

​क्या आप इनमें से किसी विशेष उपकरण, जैसे MCB के कार्य करने के तरीके या भूमिगत केबल की संरचना के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?




विद्युत उत्पादन - प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोत। नवीकरणीय
और गैर-नवीकरणीय स्रोत विद्युत उत्पादन विधियाँ
प्रत्यावर्ती धारा और प्रत्यक्ष धारा दोनों।

विद्युत उत्पादन आधुनिक दुनिया की रीढ़ है। ऊर्जा के स्रोतों को उनकी उपलब्धता और पुनर्चक्रण की क्षमता के आधार पर दो मुख्य भागों में बाँटा गया है:


​1. ऊर्जा के स्रोत (Sources of Energy)

अ) नवीकरणीय स्रोत (Renewable Sources)

​ये ऊर्जा के वे स्रोत हैं जो कभी समाप्त नहीं होते और प्रकृति में निरंतर बनते रहते हैं। इन्हें "स्वच्छ ऊर्जा" भी कहा जाता है क्योंकि ये प्रदूषण कम फैलाते हैं।

सौर ऊर्जा (Solar Energy): सूर्य की किरणों से प्राप्त।

 



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पवन ऊर्जा (Wind Energy): हवा की गति का उपयोग करके टर्बाइन घुमाना।


 


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जल विद्युत (Hydroelectric): बहते पानी या बांधों में जमा पानी की स्थितिज ऊर्जा से।

भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal): पृथ्वी के अंदर की गर्मी का उपयोग।

ब) गैर-नवीकरणीय स्रोत (Non-Renewable Sources)

​ये स्रोत सीमित हैं और एक बार समाप्त होने पर इन्हें दोबारा बनने में लाखों वर्ष लगते हैं।

जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels): कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।


 


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परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy): यूरेनियम जैसे तत्वों के विखंडन (fission) से।

2. विद्युत उत्पादन की विधियाँ (Generation Methods)

​बिजली पैदा करने के लिए आमतौर पर किसी प्राथमिक ऊर्जा स्रोत का उपयोग करके अल्टरनेटर (Generator) को घुमाया जाता है:

थर्मल पावर प्लांट (Thermal): यहाँ कोयला जलाकर पानी को भाप में बदला जाता है, जो टर्बाइन को घुमाती है।

हाइड्रो पावर प्लांट (Hydro): पानी की ऊंचाई से गिरती धारा टर्बाइन के पंखों को घुमाती है।

सौर फोटोवोल्टिक (Solar PV): यह बिना टर्बाइन के, सीधे प्रकाश को बिजली में बदलता है।


 

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न्यूक्लियर पावर प्लांट: परमाणु प्रतिक्रिया से उत्पन्न ऊष्मा का उपयोग भाप बनाने के लिए किया जाता है।

3. प्रत्यावर्ती धारा (AC) और प्रत्यक्ष धारा (DC)

​उत्पादित बिजली दो रूपों में हो सकती है:

प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - AC)

  • परिभाषा: वह धारा जो एक निश्चित समय अंतराल के बाद अपनी दिशा और मान (magnitude) बदलती रहती है।
  • उत्पादन: इसे 'अल्टरनेटर' द्वारा उत्पादित किया जाता है।
  • उपयोग: घरों, उद्योगों और लंबी दूरी के ट्रांसमिशन में इसका उपयोग होता है क्योंकि इसे ट्रांसफार्मर की मदद से आसानी से घटाया या बढ़ाया जा सकता है।
  • आवृत्ति (Frequency): भारत में इसकी मानक आवृत्ति 50 Hz है।

प्रत्यक्ष धारा (Direct Current - DC)

परिभाषा: वह धारा जो हमेशा एक ही दिशा में बहती है और जिसका मान स्थिर रहता है।

 

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उत्पादन: इसे बैटरी, सोलर सेल या DC जनरेटर द्वारा प्राप्त किया जाता है।

उपयोग: मोबाइल चार्जिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), और इलेक्ट्रोप्लेटिंग में।

भंडारण: इसे बैटरी में स्टोर किया जा सकता है (AC को सीधे स्टोर नहीं किया जा सकता)।

तुलनात्मक चार्ट

विशेषता

प्रत्यावर्ती धारा (AC)

प्रत्यक्ष धारा (DC)

दिशा

समय के साथ बदलती है

एक समान रहती है

दूरी

लंबी दूरी के लिए बेहतर (कम नुकसान)

कम दूरी के लिए उपयुक्त

स्रोत

AC जनरेटर, मेंस पावर

बैटरी, सोलर सेल

ट्रांसफार्मर

उपयोग किया जा सकता है

उपयोग नहीं किया जा सकता


क्या आप किसी विशेष बिजली संयंत्र (जैसे Solar या Thermal) की कार्यप्रणाली को गहराई से समझना चाहेंगे?





जनरेटर (अल्टरनेटर) - आवश्यक घटक और
संरचनात्मक विशेषताएँ। वोल्टेज और आवृत्ति नियंत्रण के तरीके
सिंक्रनाइज़ेशन की स्थितियाँ और विधियाँ, सरल संबद्ध
स्विचबोर्ड और उसके सहायक उपकरण।


जनरेटर या अल्टरनेटर (Alternator) यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा (AC) में बदलने वाली सबसे महत्वपूर्ण मशीन है। आइए इसकी संरचना और संचालन की बारीकियों को समझते हैं:

​1. मुख्य घटक और संरचनात्मक विशेषताएँ

​एक अल्टरनेटर के दो मुख्य भाग होते हैं:

  • स्टेटर (Stator): यह मशीन का स्थिर भाग है। बड़े अल्टरनेटरों में 'आर्मेचर वाइंडिंग' स्टेटर पर ही रखी जाती है ताकि उच्च वोल्टेज को आसानी से इन्सुलेट किया जा सके।
  • रोटर (Rotor): यह घूमने वाला भाग है जिस पर 'फील्ड वाइंडिंग' होती है। रोटर दो प्रकार के होते हैं:
    • सेलियंट पोल (Salient Pole): इनका व्यास बड़ा और लंबाई कम होती है (कम गति वाले हाइड्रोलिक प्लांट के लिए)।
    • बेलनाकार (Cylindrical): इनका व्यास कम और लंबाई अधिक होती है (उच्च गति वाले थर्मल प्लांट के लिए)।
  • एक्साइटर (Exciter): रोटर के चुंबकीय क्षेत्र को बनाने के लिए दी जाने वाली DC सप्लाई।
  • स्लिप रिंग्स (Slip Rings): रोटर को DC करंट प्रदान करने के लिए उपयोग किए जाने वाले धातु के छल्ले।

​2. वोल्टेज और आवृत्ति (Frequency) नियंत्रण

​अल्टरनेटर के आउटपुट को स्थिर रखना अनिवार्य है:

  • वोल्टेज नियंत्रण: यह रोटर की एक्साइटेशन करंट (DC) को बदलकर किया जाता है। यदि आउटपुट वोल्टेज गिरता है, तो 'ऑटोमैटिक वोल्टेज रेगुलेटर' (AVR) फील्ड करंट बढ़ा देता है, जिससे चुंबकीय क्षेत्र मजबूत होता है और वोल्टेज बढ़ जाता है।
  • आवृत्ति नियंत्रण: आवृत्ति (f) सीधे रोटर की गति (N) पर निर्भर करती है (f = {PN}/{120})। इसे नियंत्रित करने के लिए प्राइम मूवर (जैसे टर्बाइन) की गति को 'गवर्नर' के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है।

​3. सिंक्रनाइज़ेशन (Synchronization)

​जब दो या दो से अधिक अल्टरनेटरों को एक साथ (Parallel) जोड़ा जाता है, तो उसे सिंक्रनाइज़ेशन कहते हैं। इसके लिए चार शर्तें पूरी होनी चाहिए:

  1. वोल्टेज: आने वाले अल्टरनेटर का वोल्टेज बस-बार के बराबर होना चाहिए।
  2. आवृत्ति: दोनों की फ्रीक्वेंसी समान होनी चाहिए।
  3. फेज सीक्वेंस: फेज का क्रम (R-Y-B) एक जैसा होना चाहिए।
  4. फेज कोण (Phase Angle): दोनों के फेज के बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए।

विधियाँ:

  • लैम्प विधि (Dark/Bright Lamp Method): बल्बों के जलने और बुझने के पैटर्न से फेज और वोल्टेज की जांच।
  • सिंक्रोनोस्कोप (Synchroscope): यह एक उपकरण है जो सुई के माध्यम से सटीक समय बताता है कि कब स्विच को बंद (Close) करना है।

​4. स्विचबोर्ड और सहायक उपकरण

​स्विचबोर्ड वह नियंत्रण केंद्र है जहाँ से बिजली के वितरण और सुरक्षा का प्रबंधन किया जाता है।

मुख्य सहायक उपकरण (Accessories):

  • बस-बार (Bus-bars): तांबे या एल्युमिनियम की पट्टियाँ जहाँ से कई सर्किट जुड़े होते हैं।
  • उपकरण ट्रांसफार्मर (Instrument Transformers):
    • CT (Current Transformer): उच्च धारा मापने के लिए।
    • PT (Potential Transformer): उच्च वोल्टेज मापने के लिए।
  • सर्किट ब्रेकर (Circuit Breaker): आपात स्थिति में बिजली काटने के लिए (जैसे VCB या ACB)।
  • रिले (Relays): दोष (Fault) को पहचानने और ब्रेकर को सिग्नल देने के लिए।
  • मापक यंत्र: एम्पीयर मीटर, वोल्टमीटर, वाटमीटर और पावर फैक्टर मीटर।
  • आइसोलेटर: रखरखाव के समय परिपथ को पूरी तरह अलग करने के लिए उपयोग किया जाने वाला मैकेनिकल स्विच।

​क्या आप सिंक्रनाइज़ेशन की लैम्प विधि के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे कि बल्ब किस स्थिति में जलने पर स्विच ऑन किया जाता है?





डी.सी. जनरेटर - आवश्यक घटक और संरचनात्मक विशेषताएं
शंट, श्रृंखला और संयुक्त डायनेमो और उनकी विशेषताएं
स्पार्किंग के कारण। कम्यूटेटर और उनका रखरखाव

कार्बन ब्रश, उनका समायोजन और देखभाल। वोल्टेज विनियमन की विधियाँ

80

प्रश्न

80

अंक समानांतर संचालन की शर्तें, सरल स्विच बोर्ड और उसके सहायक उपकरण।


डी.सी. जनरेटर (D.C. Generator) यांत्रिक ऊर्जा को दिष्ट धारा (Direct Current) में बदलने वाली मशीन है। यह फैराडे के विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।

​1. आवश्यक घटक और संरचनात्मक विशेषताएँ

​डी.सी. जनरेटर के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:

  • योक (Yoke): यह जनरेटर का बाहरी ढांचा है जो आंतरिक भागों की रक्षा करता है और चुंबकीय फ्लक्स के लिए रास्ता प्रदान करता है।
  • आर्मेचर (Armature): यह घूमने वाला भाग है जिसमें चालक (conductors) रखे जाते हैं और ईएमएफ (EMF) उत्पन्न होता है।
  • फील्ड पोल और वाइंडिंग (Field Poles & Winding): ये चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने का कार्य करते हैं।
  • कम्यूटेटर (Commutator): यह आर्मेचर में उत्पन्न AC को DC में बदलता है।
  • ब्रश (Brushes): ये कम्यूटेटर से करंट इकट्ठा करके बाहरी सर्किट तक पहुँचाते हैं।

​2. डायनेमो के प्रकार और उनकी विशेषताएँ

​क्षेत्र वाइंडिंग (Field Winding) के जुड़ाव के आधार पर डी.सी. जनरेटर तीन प्रकार के होते हैं:

  1. शंट जनरेटर (Shunt Generator): इसमें फील्ड वाइंडिंग आर्मेचर के समानांतर (Parallel) जुड़ी होती है। इसकी विशेषता स्थिर वोल्टेज प्रदान करना है। इसका उपयोग बैटरी चार्जिंग और साधारण लाइटिंग के लिए होता है।
  2. श्रृंखला जनरेटर (Series Generator): इसमें फील्ड वाइंडिंग आर्मेचर के श्रेणीक्रम (Series) में होती है। लोड बढ़ने पर इसका वोल्टेज बढ़ता है। इसका उपयोग 'बूस्टर' के रूप में किया जाता है।
  3. संयुक्त जनरेटर (Compound Generator): इसमें शंट और सीरीज दोनों वाइंडिंग होती हैं। यह स्थिर वोल्टेज और लोड की जरूरतों के अनुसार बेहतर नियंत्रण प्रदान करता है।

​3. कम्यूटेटर, कार्बन ब्रश और रखरखाव

कम्यूटेटर और स्पार्किंग के कारण:

स्पार्किंग तब होती है जब ब्रश और कम्यूटेटर के बीच संपर्क सही न हो। इसके मुख्य कारण हैं:

  • ​ब्रशों का गलत स्थान पर होना (MNA पर न होना)।
  • ​कम्यूटेटर की सतह का गंदा या असमान होना।
  • ​ब्रशों का घिस जाना या स्प्रिंग का दबाव कम होना।
  • ​आर्मेचर में शॉर्ट सर्किट।

ब्रशों का समायोजन और देखभाल:

  • कार्बन ब्रश: ये स्वयं चिकने (Self-lubricating) होते हैं, जिससे कम्यूटेटर कम घिसता है।
  • समायोजन: ब्रशों का दबाव 0.1 से 0.25 किग्रा/वर्ग सेमी के बीच होना चाहिए। यदि ब्रश अपनी लंबाई का 2/3 भाग घिस जाएं, तो उन्हें बदल देना चाहिए।

​4. वोल्टेज विनियमन (Voltage Regulation) की विधियाँ

​वोल्टेज को स्थिर रखने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए जाते हैं:

  • फील्ड रेगुलेटर द्वारा: फील्ड सर्किट में रेजिस्टेंस (R) को बढ़ाकर या घटाकर चुंबकीय क्षेत्र को नियंत्रित करना।
  • प्राइम मूवर की गति बदलकर: जनरेटर की घूमने की गति को नियंत्रित करके।
  • कंपाउंडिंग: सीरीज वाइंडिंग का उपयोग करके लोड बढ़ने पर होने वाली वोल्टेज गिरावट की भरपाई करना।

​5. समानांतर संचालन (Parallel Operation) की शर्तें

​दो या दो से अधिक डी.सी. जनरेटरों को एक साथ जोड़ने के लिए ये शर्तें अनिवार्य हैं:

  1. समान ध्रुवता (Polarity): आने वाले जनरेटर के पॉजिटिव (+) और नेगेटिव (-) टर्मिनल बस-बार के टर्मिनलों के समान होने चाहिए।
  2. समान वोल्टेज: दोनों जनरेटरों का टर्मिनल वोल्टेज बराबर होना चाहिए।
  3. समान विशेषता: शंट जनरेटर को समानांतर में जोड़ना सबसे आसान और सुरक्षित होता है।

​6. स्विचबोर्ड और सहायक उपकरण (Switchboard & Accessories)

​स्विचबोर्ड से जनरेटर के आउटपुट को नियंत्रित किया जाता है। इसके मुख्य भाग हैं:

  • वोल्टमीटर और एम्पीयर मीटर: वोल्टेज और करंट मापने के लिए।
  • सर्किट ब्रेकर/फ्यूज: ओवरलोड से सुरक्षा के लिए।
  • मेन स्विच: लोड को जोड़ने या हटाने के लिए।
  • इक्वलाइजर बस-बार (Equalizer Bus-bar): विशेष रूप से कंपाउंड जनरेटरों के समानांतर संचालन में लोड को बराबर बांटने के लिए उपयोग किया जाता है।

​यदि आप किसी विशिष्ट भाग जैसे "कम्यूटेशन प्रक्रिया" या "आर्मेचर रिएक्शन" के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो कृपया पूछें।




बैटरियां - प्राथमिक सेल, ड्राई सेल, लेड एसिड सेल, निकेल, आयरन या
अल्कलाइन सेल। बैटरियों की प्रारंभिक और बाद की चार्जिंग। चार्जिंग सर्किट और उनकी गणना। सीरीज और पैरेलल सर्किट।
बैटरी का रखरखाव। हाइड्रोमीटर का उपयोग।

बैटरी एक ऐसा उपकरण है जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में संचित करता है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सेल और बैटरी के प्रकार और उनके रखरखाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है।

​1. सेलों के प्रकार (Types of Cells)

अ) प्राथमिक सेल (Primary Cells)

​ये वे सेल हैं जिन्हें एक बार डिस्चार्ज होने के बाद दोबारा चार्ज नहीं किया जा सकता।

ड्राई सेल (Dry Cell): इसका उपयोग टॉर्च, रिमोट और घड़ियों में होता है। इसमें इलेक्ट्रोलाइट तरल के बजाय पेस्ट (Ammonium Chloride) के रूप में होता है।

 


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उपयोग: कम शक्ति वाले उपकरणों में।

ब) द्वितीयक सेल (Secondary Cells)

​इन्हें बार-बार चार्ज और डिस्चार्ज किया जा सकता है।


लेड एसिड सेल (Lead Acid Cell): यह सबसे अधिक उपयोग होने वाली बैटरी है (वाहनों और इनवर्टर में)। इसमें लेड पेरोक्साइड (PbO_2) और स्पंजी लेड (Pb) के इलेक्ट्रोड होते हैं और सल्फ्यूरिक एसिड (H_2SO_4) इलेक्ट्रोलाइट के रूप में होता है।

 

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निकेल-आयरन / अल्कलाइन सेल: इन्हें 'एडिसन सेल' भी कहते हैं। ये लेड एसिड की तुलना में अधिक मजबूत होते हैं और लंबे समय तक चलते हैं, लेकिन इनका वोल्टेज थोड़ा कम होता है।

2. बैटरी चार्जिंग और गणना

​बैटरी को चार्ज करने के लिए DC सप्लाई की आवश्यकता होती है।

प्रारंभिक चार्जिंग (Initial Charging): जब नई बैटरी में इलेक्ट्रोलाइट डाला जाता है, तो उसे पहली बार बहुत धीमी गति से लंबे समय तक चार्ज किया जाता है।

बाद की चार्जिंग: उपयोग के दौरान डिस्चार्ज होने पर सामान्य चार्जिंग।

चार्जिंग सर्किट गणना:

चार्जिंग करंट (I) निकालने का सूत्र:

I = {V_{supply} - V_{battery}}/{R_{total}}


जहाँ V वोल्टेज है और R सर्किट का कुल प्रतिरोध है।

3. सीरीज और पैरेलल सर्किट (Series & Parallel)

सीरीज (Series) कनेक्शन: अधिक वोल्टेज प्राप्त करने के लिए सेलों को श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है। 

(कुल वोल्टेज = V_1 + V_2 + V_3...)

पैरेलल (Parallel) कनेक्शन: अधिक करंट (Ah क्षमता) प्राप्त करने के लिए सेलों को समानांतर जोड़ा जाता है। इसमें वोल्टेज समान रहता है।

 

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4. हाइड्रोमीटर और विशिष्ट घनत्व (Hydrometer)

​लेड एसिड बैटरी की चार्जिंग स्थिति (State of Charge) जांचने के लिए हाइड्रोमीटर का उपयोग किया जाता है। यह इलेक्ट्रोलाइट के विशिष्ट घनत्व (Specific Gravity) को मापता है।


बैटरी की स्थिति

विशिष्ट घनत्व (Specific Gravity)

पूर्ण चार्ज (Full Charge)

1.250 – 1.280

आधी चार्ज (Half Charge)

1.200 – 1.220

डिस्चार्ज (Discharged)

1.150 से नीचे


5. बैटरी का रखरखाव (Maintenance Tips)

​बैटरी की लंबी उम्र के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं:

  1. टर्मिनल की सफाई: टर्मिनलों पर जमा 'सल्फेशन' (सफेद पाउडर) को गर्म पानी और पेट्रोलियम जेली से साफ करना चाहिए।
  2. डिस्टिल्ड वाटर: इलेक्ट्रोलाइट का स्तर कम होने पर केवल डिस्टिल्ड वाटर (आसुत जल) ही डालें, साधारण पानी नहीं।
  3. वेंट प्लग: चार्जिंग के दौरान वेंट प्लग को ढीला रखना चाहिए ताकि गैसें बाहर निकल सकें।
  4. ओवरचार्जिंग से बचाव: बैटरी को जरूरत से ज्यादा चार्ज न करें, इससे प्लेटें मुड़ सकती हैं (Buckling)।
  5. ट्रिकल चार्जिंग: यदि बैटरी लंबे समय तक उपयोग न करनी हो, तो उसे बहुत कम करंट पर चार्ज पर लगा देना चाहिए।

​क्या आप लेड एसिड बैटरी की रासायनिक क्रियाओं (Chemical Reactions) के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?




ए.सी. मोटर्स - प्रेरण का सिद्धांत (स्क्विरल केज और स्लिप-रिंग प्रकार)
सिंक्रोनस और कम्यूटेटर मोटर्स, उनके उपयोग, स्थापना,
प्रारंभ करने की विधि, गति नियंत्रण और दिशा परिवर्तन।

1. ए.सी. मोटर्स: प्रेरण का सिद्धांत (Induction Principle)

​ए.सी. इंडक्शन (प्रेरण) मोटर विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर काम करती है। जब मोटर के स्टैटोर (Stator - स्थिर भाग) को थ्री-फेज ए.सी. सप्लाई दी जाती है, तो वहां एक घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र (Rotating Magnetic Field - RMF) पैदा होता है। यह क्षेत्र सिंक्रोनस गति (N_s) पर घूमता है।

​यह घूमता हुआ चुंबकीय क्षेत्र रोटर (Rotor - घूमने वाला भाग) के चालकों (Conductors) को काटता है, जिससे फैराडे के नियम के अनुसार रोटर में विद्युत वाहक बल (emf) प्रेरित होता है। चूंकि रोटर का सर्किट बंद होता है, इसलिए उसमें धारा (Current) बहने लगती है। लेंज के नियम के अनुसार, यह रोटर धारा उसी कारण का विरोध करती है जिसने इसे पैदा किया है (यानी स्टैटोर और रोटर के बीच की सापेक्ष गति)। इस गति को कम करने के लिए रोटर, आर.एम.एफ. (RMF) की दिशा में ही घूमने लगता है।

​प्रेरण मोटर्स मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं:

​क) स्क्विरल केज इंडक्शन मोटर (Squirrel Cage Induction Motor)

  • संरचना: इसका रोटर एक पिंजरे (गिहरी के पिंजरे) जैसा दिखता है। इसमें तांबे या एल्यूमीनियम के मोटे छड़ (Bars) होते हैं, जिन्हें दोनों सिरों पर 'एंड रिंग्स' (End Rings) द्वारा स्थायी रूप से शॉर्ट-सर्किट कर दिया जाता है। इसमें कोई बाहरी वाइंडिंग या स्लिप-रिंग नहीं होती।
  • विशेषताएं: यह बेहद मजबूत, सस्ती और कम रखरखाव वाली मोटर है। इसका शुरुआती टॉर्क (Starting Torque) मध्यम होता है।

​ख) स्लिप-रिंग / वाउंड रोटर इंडक्शन मोटर (Slip-Ring / Wound Rotor Motor)

  • संरचना: इसके रोटर पर थ्री-फेज वाइंडिंग की जाती है (ठीक स्टैटोर की तरह)। इस वाइंडिंग के तीनों सिरों को रोटर शाफ्ट पर लगी तीन स्लिप-रिंग्स (Slip-Rings) से जोड़ा जाता है। कार्बन ब्रश की मदद से इन स्लिप-रिंग्स के माध्यम से बाहरी प्रतिरोध (External Resistance) जोड़ा जा सकता है।
  • विशेषताएं: बाहरी प्रतिरोध जोड़ने के कारण इसका शुरुआती टॉर्क बहुत उच्च (High Starting Torque) होता है और शुरुआती करंट को नियंत्रित किया जा सकता है।

​2. सिंक्रोनस और कम्यूटेटर मोटर्स

​क) सिंक्रोनस मोटर (Synchronous Motor)

​यह मोटर केवल सिंक्रोनस गति (N_s) पर चलती है, जो सप्लाई फ्रीक्वेंसी (f) और पोल की संख्या (P) पर निर्भर करती है:

N_s = {120f}/{P}

इसके स्टैटोर को थ्री-फेज ए.सी. और रोटर को डी.सी. एक्साइटेशन (DC Excitation) दिया जाता है। चुंबकीय लॉकिंग (Magnetic Locking) के कारण यह लोड बदलने पर भी अपनी गति नहीं बदलती।

  • उपयोग: निरंतर गति वाले उद्योगों (जैसे कागज मिल, टेक्सटाइल मिल) में, और पावर फैक्टर को सुधारने के लिए (इसे सिंक्रोनस कंडेनसर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है)।

​ख) कम्यूटेटर मोटर्स (जैसे- यूनिवर्सल मोटर)

​ये मोटरें ए.सी. और डी.सी. दोनों पर चल सकती हैं। इनमें डी.सी. मोटर की तरह ही आर्मेचर, कम्यूटेटर और ब्रश गियर की व्यवस्था होती है।

  • उपयोग: घरेलू उपकरणों जैसे मिक्सी, वैक्यूम क्लीनर, पोर्टेबल ड्रिल मशीन आदि में।

​3. स्थापना (Installation)

​मोटर की सुरक्षित और सही स्थापना के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाते हैं:

  • फाउंडेशन (नींव): मोटर को एक मजबूत कंक्रीट के बेस पर नट-बोल्ट (Foundation Bolts) की मदद से कसना चाहिए ताकि कंपन (Vibrations) न हो।
  • अलाइनमेंट (Alignment): मोटर की शाफ्ट और चलाए जाने वाले लोड की शाफ्ट का अलाइनमेंट बिल्कुल सीधा होना चाहिए, अन्यथा बियरिंग्स जल्दी खराब हो सकते हैं।
  • अर्थिंग (Earthing): सुरक्षा के लिए मोटर की बॉडी को दो अलग-अलग जगहों से मजबूती से अर्थ (Earthing) किया जाना चाहिए।
  • वेंटिलेशन: मोटर के आसपास हवा आने-जाने की पर्याप्त जगह होनी चाहिए ताकि मोटर गर्म न हो।

​4. प्रारंभ करने की विधियां (Starting Methods)

​बड़ी इंडक्शन मोटरें शुरू होने समय बहुत अधिक करंट (5 से 7 गुना) लेती हैं, जिससे वोल्टेज ड्रॉप हो सकता है। इसे रोकने के लिए निम्नलिखित स्टार्टर्स का उपयोग किया जाता है:

मोटर का प्रकार

शुरुआती विधि / स्टार्टर

विवरण

स्क्विरल केज

DOL (Direct On Line) स्टार्टर

5 HP तक की छोटी मोटर्स के लिए। पूरी वोल्टेज सीधे दी जाती है।

स्टार-डेल्टा स्टार्टर (Star-Delta)

5 HP से बड़ी मोटर्स के लिए। पहले स्टार में चलाकर वोल्टेज कम की जाती है, फिर डेल्टा में।

ऑटो-ट्रांसफार्मर स्टार्टर

बहुत बड़ी मोटर्स के लिए। टैपिंग्स के जरिए शुरुआती वोल्टेज को कम किया जाता है।

स्लिप-रिंग

रोटर रियोस्टेट स्टार्टर

रोटर सर्किट में बाहरी प्रतिरोध जोड़कर करंट कम किया जाता है और टॉर्क बढ़ाया जाता है।


5. गति नियंत्रण (Speed Control)

​थ्री-फेज इंडक्शन मोटर की गति को नियंत्रित करने के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं:

  • V/F नियंत्रण (Variable Voltage Variable Frequency - VVVF): यह आधुनिक और सबसे प्रभावी तरीका है। इसमें इनवर्टर (VFD) की मदद से वोल्टेज और फ्रीक्वेंसी दोनों को अनुपात में बदला जाता है, जिससे टॉर्क स्थिर रहता है।
  • पोल बदलकर (Pole Changing Method): स्टैटोर वाइंडिंग के कनेक्शन बदलकर पोल की संख्या (P) को बदला जाता है (गति N_s propto 1/P होती है)।
  • स्टैटोर वोल्टेज नियंत्रण: वोल्टेज कम करने से गति थोड़ी कम होती है, लेकिन इससे टॉर्क भी घट जाता है (कम क्षमता के पंखों आदि में उपयोगी)।
  • रोटर रियोस्टेट नियंत्रण (केवल स्लिप-रिंग के लिए): रोटर सर्किट में प्रतिरोध बढ़ाकर गति को कम किया जा सकता है।

​6. दिशा परिवर्तन (Direction Reversal)

​थ्री-फेज मोटर्स और सिंगल-फेज/कम्यूटेटर मोटर्स की घूमने की दिशा बदलने के नियम अलग-अलग हैं:

  • थ्री-फेज मोटर्स (इंडक्शन और सिंक्रोनस): इसकी दिशा बदलना सबसे आसान है। सप्लाई के किन्हीं भी दो फेज़ (Phase) को आपस में बदल देने पर (जैसे R-Y-B को R-B-Y करने पर) चुंबकीय क्षेत्र (RMF) के घूमने की दिशा बदल जाती है, जिससे मोटर उल्टी घूमने लगती है।
  • यूनिवर्सल/कम्यूटेटर मोटर: इसकी दिशा बदलने के लिए या तो आर्मेचर वाइंडिंग के कनेक्शन बदले जाते हैं या फिर फील्ड वाइंडिंग के कनेक्शन बदले जाते हैं (दोनों के एक साथ बदलने से दिशा नहीं बदलेगी)।





डी.सी. मोटर्स - श्रृंखला, शट वाउंड और कंपाउंड वाउंड प्रकार की मोटर्स का सिद्धांत
, इनके उपयोग, स्थापना, आरंभ करने की विधि, गति नियंत्रण
और दिशा परिवर्तन।

1. डी.सी. मोटर का कार्य सिद्धांत (Working Principle of DC Motor)

​डी.सी. मोटर विद्युत चुंबकीय खिंचाव या बल (Electromagnetic Force) के सिद्धांत पर कार्य करती है। जब किसी करंट ले जाने वाले चालक (Current-carrying Conductor) को किसी चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) में रखा जाता है, तो उस चालक पर एक मैकेनिकल बल (यांत्रिक बल) काम करता है।

​इस बल की दिशा फ्लेमिंग के बाएं हाथ के नियम (Fleming's Left-Hand Rule) द्वारा निर्धारित की जाती है। मोटर में मुख्य दो भाग होते हैं: फील्ड वाइंडिंग (जो चुंबकीय क्षेत्र बनाती है) और आर्मेचर वाइंडिंग (जो घूमती है और जिसमें करंट भेजा जाता है)।

​क्षेत्र के आधार पर डी.सी. मोटर्स तीन मुख्य प्रकार की होती हैं:

​क) शंट वाउंड मोटर (Shunt Wound Motor)

  • संरचना: इस मोटर में फील्ड वाइंडिंग को आर्मेचर वाइंडिंग के समानांतर (Parallel या Shunt) जोड़ा जाता है। शंट फील्ड वाइंडिंग पतले तार और अधिक घुमावों (Turns) की बनाई जाती है ताकि इसका प्रतिरोध अधिक हो।
  • विशेषता: यह एक स्थिर गति (Constant Speed) वाली मोटर है। लोड बढ़ने या घटने पर भी इसकी गति में बहुत कम बदलाव होता है।

​ख) सीरीज़ (श्रृंखला) वाउंड मोटर (Series Wound Motor)

  • संरचना: इसमें फील्ड वाइंडिंग को आर्मेचर वाइंडिंग के साथ श्रेणीक्रम (Series) में जोड़ा जाता है। इसलिए, आर्मेचर का पूरा करंट फील्ड वाइंडिंग से होकर गुजरता है। यह मोटे तार और कम घुमावों की बनाई जाती है।
  • विशेषता: इसका शुरुआती टॉर्क (Starting Torque) बहुत उच्च होता है। इस मोटर को कभी भी बिना लोड के (No-load पर) नहीं चलाना चाहिए, अन्यथा इसकी गति इतनी भयानक रूप से बढ़ सकती है कि मोटर टूट जाए।

​ग) कंपाउंड वाउंड मोटर (Compound Wound Motor)

  • संरचना: इसमें शंट और सीरीज़ दोनों प्रकार की फील्ड वाइंडिंग होती हैं। यह दो प्रकार की होती है:
    1. कम्युलेटिव कंपाउंड (Cumulative Compound): इसमें सीरीज़ फील्ड, शंट फील्ड की मदद करती है (दोनों का चुंबकीय क्षेत्र जुड़ता है)।
    2. डिफरेंशियल कंपाउंड (Differential Compound): इसमें सीरीज़ फील्ड, शंट फील्ड का विरोध करती है (गति नियंत्रण के लिए इसका उपयोग बहुत कम होता है)।

​2. डी.सी. मोटर्स के उपयोग (Applications)

  • शंट मोटर: खराद मशीन (Lathe Machines), सेंट्रीफ्यूगल पंप (Centrifugal Pumps), ब्लोअर, पंखे, और मशीन टूल्स जहां स्थिर गति की आवश्यकता होती है।
  • सीरीज़ मोटर: इलेक्ट्रिक ट्रेन (Electric Traction), क्रेन (Cranes), होइस्ट (Hoists), और ट्रॉली कार जहां भारी लोड को शुरू करने के लिए उच्च टॉर्क चाहिए होता है।
  • कम्पैंड मोटर (कम्युलेटिव): रोलिंग मिल्स, भारी योजनाकार (Planners), पंचिंग मशीनें, और एलिवेटर्स (Elevators)।

​3. स्थापना (Installation)

​डी.सी. मोटर स्थापित करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है:

  • फाउंडेशन और संरेखण: मोटर को कंक्रीट की मजबूत नींव पर स्थापित करें। आर्मेचर शाफ्ट और लोड शाफ्ट का संरेखण (Alignment) बिल्कुल सटीक होना चाहिए ताकि कम्यूटर और बेयरिंग पर अनुचित दबाव न पड़े।
  • कम्यूटेटर और ब्रश की जांच: स्थापना के समय यह सुनिश्चित करें कि कार्बन ब्रश, कम्यूटेटर की सतह पर सही दबाव (आमतौर पर 0.1 से 0.25 kg/cm²) के साथ फिट बैठे हों। कम्यूटेटर साफ और गड्ढों रहित होना चाहिए।
  • अर्थिंग: सुरक्षा नियमों के अनुसार मोटर फ्रेम को दो अलग-अलग बिंदुओं से प्रभावी ढंग से अर्थ किया जाना चाहिए।

​4. प्रारंभ करने की विधि (Starting Methods)

​डी.सी. मोटर को सीधे चालू करने पर आर्मेचर का प्रतिरोध (R_a) बहुत कम होने के कारण वह शुरुआत में अत्यधिक करंट (खतरनाक स्तर तक) खींच सकती है, क्योंकि शुरुआत में कोई बैक ई.एम.एफ. (E_b) पैदा नहीं होता। इस शुरुआती करंट को सुरक्षित सीमा में रखने के लिए डी.सी. स्टार्टर्स का उपयोग किया जाता है:

स्टार्टर का प्रकार

उपयुक्त मोटर

मुख्य विशेषता

3-पॉइंट स्टार्टर (3-Point Starter)

शंट और कंपाउंड मोटर

इसमें एक 'नो-वोल्ट कॉइल' (NVC) होती है जो फील्ड सर्किट के साथ सीरीज़ में होती है। फील्ड कमजोर होने पर हैंडल छूट जाता है।

4-पॉइंट स्टार्टर (4-Point Starter)

गति नियंत्रण वाली शंट/कंपाउंड मोटर

इसमें NVC को फील्ड से अलग एक स्वतंत्र सर्किट में लगाया जाता है, जिससे फील्ड रेगुलेटर का असर स्टार्टर के हैंडल पर नहीं पड़ता।

2-पॉइंट स्टार्टर (2-Point Starter)

सीरीज़ मोटर

यह मुख्य रूप से सीरीज़ मोटर्स के लिए होता है ताकि शुरुआती करंट को नियंत्रित किया जा सके।


5. गति नियंत्रण (Speed Control)

​डी.सी. मोटर की गति (N) का समीकरण इस प्रकार है: 

N propto {E_b}/{phi} या 

N propto {V - I_aR_a}/{phi}

​इसके आधार पर गति नियंत्रण की तीन मुख्य विधियां हैं:

​क) फ्लक्स नियंत्रण विधि (Flux Control Method)

  • ​इसमें फील्ड सर्किट में एक वेरिएबल रेजिस्टेंस (रियोस्टेट) जोड़ा जाता है।
  • ​प्रतिरोध बढ़ाने से फील्ड करंट कम होता है, जिससे फ्लक्स (\phi) घटता है और मोटर की गति सामान्य से अधिक हो जाती है।

​ख) आर्मेचर नियंत्रण विधि (Armature Control Method)

  • ​इसमें आर्मेचर के श्रेणीक्रम में एक रियोस्टेट जोड़ा जाता है।
  • ​इससे आर्मेचर को मिलने वाला वोल्टेज कम हो जाता है, जिससे मोटर की गति सामान्य से कम हो जाती है। (यह विधि ऊर्जा की अधिक खपत करती है)।

​ग) वार्ड-लियोनार्ड विधि (Ward-Leonard Method / Voltage Control)

  • ​इसमें एक अलग डी.सी. जनरेटर की मदद से आर्मेचर को मिलने वाले वोल्टेज को पूरी तरह नियंत्रित किया जाता है।
  • ​इससे मोटर को दोनों दिशाओं में शून्य से लेकर अधिकतम गति तक बहुत ही सुचारू रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।

​6. दिशा परिवर्तन (Direction Reversal)

​डी.सी. मोटर के घूमने की दिशा बदलने के लिए टॉर्क (बलआघूर्ण) की दिशा बदलनी होती है। इसके लिए दो तरीके अपनाए जा सकते हैं:

  1. आर्मेचर के टर्मिनल बदलकर (By reversing Armature Connections): आर्मेचर वाइंडिंग (A_1, A_2) में जाने वाले करंट की दिशा बदल दी जाती है। (यह सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक तरीका माना जाता है)।
  2. फील्ड के टर्मिनल बदलकर (By reversing Field Connections): फील्ड वाइंडिंग (F_1, F_2 या Y_1, Y_2) के कनेक्शन आपस में बदल दिए जाते हैं।
  3. महत्वपूर्ण नोट: यदि आप मेन सप्लाई के दोनों तारों (+ और -) को आपस में बदल देंगे, तो आर्मेचर और फील्ड दोनों का करंट एक साथ बदल जाएगा, जिससे मोटर की दिशा नहीं बदलेगी। दिशा बदलने के लिए केवल किसी एक (आर्मेचर या फील्ड) के कनेक्शन को ही बदलना अनिवार्य है।




    ए.सी. परिपथ - सदिशों का ज्ञान। कला और कला अंतर।
    ए.सी. परिपथ में प्रतिरोध, प्रेरकत्व और धारिता।
    आवर्तता या आवृत्ति। शक्ति और शक्ति गुणक। एकल कला
    और त्रिकलास प्रणाली, तारा और डेल्टा कनेक्शन, कला
    क्रम।

    1. ए.सी. परिपथ और सदिशों का ज्ञान (Phasors & Vectors)

    ​अल्टरनेटिंग करंट (A.C.) और वोल्टेज का मान समय के साथ लगातार बदलता रहता है। इन्हें गणितीय रूप से आसानी से समझने के लिए हम फेजर (Phasor) या सदिश का उपयोग करते हैं।

    • फेजर (Phasor): फेजर एक ऐसा सदिश (Vector) है जो समय के साथ एक निश्चित कोणीय वेग (Angular Velocity, \omega) से वामावर्त (Anti-clockwise) दिशा में घूमता है।
    • ​इसकी लंबाई तरंग के अधिकतम मान (Peak Value) को दर्शाती है, और इसका झुकाव किसी समय पर उसके कोण (Phase) को प्रदर्शित करता है।

    ​2. कला और कला अंतर (Phase and Phase Difference)

    ​क) कला (Phase)

    ​किसी प्रत्यावर्ती राशि (Current या Voltage) की किसी निश्चित समय पर स्थिति और गति की दिशा को उसकी कला (Phase) कहते हैं। इसे आमतौर पर कोण (\theta = \omega t) के रूप में व्यक्त किया जाता है।

    ​ख) कला अंतर (Phase Difference)

    ​जब दो ए.सी. राशियां (जैसे वोल्टेज और करंट) एक ही समय पर अपने अधिकतम या न्यूनतम मान पर नहीं पहुँचती हैं, तो उनके बीच के कोणीय अंतर को कला अंतर (Phase Difference - phi) कहते हैं। इसके आधार पर तीन स्थितियां बनती हैं:

    1. इन-फेज (In-Phase): जब वोल्टेज और करंट दोनों एक साथ शून्य और एक साथ अधिकतम मान पर पहुँचते हैं (phi = 0^circ)।
    2. अग्रगामी (Leading): यदि कोई राशि दूसरी राशि से समय या कोण में आगे चल रही हो।
    3. पश्चगामी (Lagging): यदि कोई राशि दूसरी राशि से समय या कोण में पीछे चल रही हो।

    ​3. ए.सी. परिपथ में प्रतिरोध, प्रेरकत्व और धारिता

    ​ए.सी. परिपथ में इन तीनों घटकों का व्यवहार अलग-अलग होता है:

    ​क) शुद्ध प्रतिरोधी परिपथ (Pure Resistive Circuit - R)

    • ​इस परिपथ में वोल्टेज (V) और करंट (I) दोनों इन-फेज (In-Phase) होते हैं। इनके बीच कला अंतर phi = 0^circ होता है।
    • ​यह परिपथ केवल प्रतिरोध (R) द्वारा करंट का विरोध करता है।

    ​ख) शुद्ध प्रेरकत्व परिपथ (Pure Inductive Circuit - L)

    इस परिपथ में करंट (I), वोल्टेज (V) से 90^circ पश्चगामी (Lagging) होता है (अर्थात वोल्टेज आगे और करंट पीछे रहता है)।

    इसके द्वारा उत्पन्न अवरोध को प्रेरणिक प्रतिघात (Inductive Reactance - X_L) कहते हैं।

    X_L = 2pi fL

    ग) शुद्ध धारिता परिपथ (Pure Capacitive Circuit - C)

    इस परिपथ में करंट (I), वोल्टेज (V) से 90^circ अग्रगामी (Leading) होता है (अर्थात करंट आगे और वोल्टेज पीछे रहता है)।

    इसके द्वारा उत्पन्न अवरोध को धारितिय प्रतिघात (Capacitive Reactance - X_C) कहते हैं।

    X_C = {1}/{2pi fC}

    प्रतिबाधा (Impedance - Z): जब R, L और C तीनों या कोई दो एक साथ जुड़े हों, तो परिपथ के कुल अवरोध को प्रतिबाधा (Z) कहते हैं। इसे ओम (Omega) में मापा जाता है।


    ​4. आवर्तता या आवृत्ति (Frequency & Time Period)

    आवृत्ति (Frequency - f): एक प्रत्यावर्ती राशि (Current/Voltage) एक सेकंड में जितने चक्र (Cycles) पूरे करती है, उसे उसकी आवृत्ति कहते हैं। इसका मात्रक हर्ट्ज़ (Hz) है। भारत में घरेलू सप्लाई की आवृत्ति 50 Hz होती है।

    आवर्तकाल (Time Period - T): एक पूरे चक्र (Cycle) को पूरा करने में जो समय लगता है, उसे आवर्तकाल कहते हैं। यह आवृत्ति का उल्टा होता है:

    T = {1}/{f}

    5. शक्ति और शक्ति गुणक (Power and Power Factor)

    ​क) ए.सी. परिपथ में शक्तियां (Types of Power)

    1. आभासी शक्ति (Apparent Power - S): वोल्टेज और करंट का सीधा गुणनफल। इसका मात्रक Volt-Ampere (VA या kVA) है। (S = VI)
    2. वास्तविक शक्ति (True/Active Power - P): परिपथ में वास्तव में खपत होने वाली शक्ति। इसका मात्रक Watt (W या kW) है। (P = VI cos phi)
    3. प्रतिघाती शक्ति (Reactive Power - Q): वह शक्ति जो चुंबकीय या विद्युत क्षेत्र बनाने में उपयोग होती है और वापस लौट आती है। इसका मात्रक VAR या kVAR है। (Q = VI \sin\phi)

    ​ख) शक्ति गुणक (Power Factor - cos phi)

    ​वास्तविक शक्ति (P) और आभासी शक्ति (S) के अनुपात को पावर फैक्टर कहते हैं।

    {Power Factor} = cos phi = {R}/{Z} = {{True Power}}/{{Apparent Power}}


    इसका मान हमेशा 0 और 1 के बीच होता है। उद्योगों में 1 के करीब (जैसे 0.95) पावर फैक्टर को आदर्श माना जाता है।

    ​6. एकल कला (Single Phase) और त्रिकला (Three Phase) प्रणालियाँ

    • एकर कला प्रणाली (Single Phase System): इसमें ऊर्जा की आपूर्ति के लिए केवल दो तारों (एक फेज और एक न्यूट्रल) का उपयोग किया जाता है। घरेलू उपकरणों के लिए आमतौर पर 230V, 50Hz की सिंगल फेज सप्लाई का उपयोग होता है।
    • त्रिकला प्रणाली (Three Phase System): इसमें तीन अलग-अलग वाइंडिंग्स का उपयोग किया जाता है, जो एक दूसरे से 120^circ के कोणीय अंतर पर होती हैं। इसमें तीन फेज के तार (R, Y, B) और आवश्यकतानुसार एक न्यूट्रल तार होता है। औद्योगिक भारी लोड और मोटरों के लिए 415V की थ्री-फेज सप्लाई का उपयोग होता है।

    ​7. तारा (Star) और डेल्टा (Delta) कनेक्शन

    ​थ्री-फेज प्रणालियों में वाइंडिंग्स या लोड को जोड़ने के दो मुख्य तरीके होते हैं:

    ​क) तारा कनेक्शन (Star Connection / Y-Connection)

    • ​इसमें तीनों वाइंडिंग्स के एक-एक सिरे को आपस में जोड़कर एक सामान्य बिंदु बनाया जाता है, जिसे न्यूट्रल बिंदु (Neutral Point) कहते हैं। इसमें कुल 4 तार (R, Y, B और N) निकाले जा सकते हैं।
    • संबंध:
      • ​लाइन वोल्टेज (V_L) = sqrt{3} × फेज वोल्टेज (V_ph)
      • ​लाइन करंट (I_L) = फेज करंट (I_ph)

    ​ख) डेल्टा कनेक्शन (Delta Connection / Delta-Connection)

    • ​इसमें तीनों वाइंडिंग्स को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि वे एक बंद लूप या त्रिकोण बनाती हैं (एक का अंत दूसरे के शुरू से)। इसमें कोई न्यूट्रल बिंदु नहीं होता, इसलिए इसमें केवल 3 तार (R, Y, B) होते हैं।
    • संबंध:
      • ​लाइन वोल्टेज (V_L) = फेज वोल्टेज (V_ph)
      • ​लाइन करंट (I_L) = sqrt{3} × फेज करंट (I_ph)

    ​8. कला अनुक्रम (Phase Sequence)

    ​थ्री-फेज प्रणाली में तीनों फेजों (R, Y, B) के अपने अधिकतम धनात्मक मान (Maximum Positive Value) पर पहुँचने के क्रम को कला अनुक्रम (Phase Sequence) कहते हैं।

    • ​मानक फेज अनुक्रम R-Y-B होता है। इसका मतलब है कि पहले R-फेज, फिर 120^circ बाद Y-फेज और उसके 120^circ बाद B-फेज अपने अधिकतम मान पर पहुंचेगा।
    • ​यदि फेज अनुक्रम को बदल दिया जाए (जैसे R-B-Y), तो थ्री-फेज इंडक्शन मोटर के घूमने की दिशा उलट जाती है। इसलिए समानांतर संचालन (Parallel Operation) और मोटरों को जोड़ने के लिए सही फेज अनुक्रम का होना अत्यंत आवश्यक है।




नियंत्रण एवं विनियमन उपकरण - विभिन्न प्रकार के स्विच, सर्किट ब्रेकर, कटआउट, स्टार्टर, रेगुलेटर और सुरक्षा उपकरणों का ज्ञान
जो एसी और डीसी दोनों मोटरों के लिए उपयुक्त हैं और मोटरों के साथ उनकी वायरिंग का ज्ञान।


विद्युत प्रणालियों में मोटरों की सुरक्षा, उन्हें सुचारू रूप से चालू/बंद करने और उनकी गति को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न नियंत्रण और विनियमन उपकरणों (Control and Regulation Devices) का उपयोग किया जाता है। नीचे ए.सी. (AC) और डी.सी. (DC) मोटरों के लिए उपयोगी प्रमुख उपकरणों और उनकी वायरिंग का विस्तृत विवरण दिया गया है:

​1. विभिन्न प्रकार के स्विच (Switches)

​स्विच का मुख्य कार्य परिपथ (Circuit) को सामान्य स्थिति में ऑन (ON) या ऑफ (OFF) करना है।

  • आईसीडीपी (ICDP - Iron Clad Double Pole) स्विच: यह सिंगल-फेज ए.सी. और डी.सी. दो-तार वाले परिपथों में मुख्य स्विच (Main Switch) के रूप में उपयोग होता है। इसमें एक साथ फेज और न्यूट्रल (या पॉजिटिव और नेगेटिव) को काटने के लिए दो पोल होते हैं।
  • आईसीटीपी (ICTP - Iron Clad Triple Pole) स्विच: यह थ्री-फेज ए.सी. मोटरों के मुख्य नियंत्रण के लिए उपयोग किया जाता है। यह तीनों फेजों (R, Y, B) को एक साथ ऑन/ऑफ करता है। इसमें सुरक्षा के लिए लोहे का आवरण (Iron Clad) होता है।
  • चाकू स्विच (Knife Switch): यह एक पुराना और खुला स्विच है, जिसमें तांबे के ब्लेड होते हैं जिन्हें हाथ से हत्थे (Lever) की मदद से जबड़ों (Jaws) में फंसाया जाता है। आजकल सुरक्षा कारणों से इसका उपयोग केवल कम वोल्टेज या प्रयोगशालाओं (डी.सी. पैनलों) में होता है।
  • पुश बटन स्विच (Push Button Switches): स्टार्टर्स में इनका सबसे अधिक उपयोग होता है। ये दो प्रकार के होते हैं:
    • NO (Normally Open): इसे दबाने पर सर्किट चालू होता है (स्टार्ट बटन - हरे रंग का)।
    • NC (Normally Closed): इसे दबाने पर सर्किट टूट जाता है (स्टॉप बटन - लाल रंग का)।

​2. सर्किट ब्रेकर (Circuit Breakers - CB)

​सर्किट ब्रेकर एक स्वचालित (Automatic) स्विच है जो शॉर्ट-सर्किट या ओवरलोड जैसी असामान्य स्थिति में परिपथ को अपने आप बंद कर देता है। इन्हें मैन्युअली भी ऑपरेट किया जा सकता है।

  • एमसीबी (MCB - Miniature Circuit Breaker): यह कम क्षमता (आमतौर पर 100A तक) के घरेलू और छोटे औद्योगिक ए.सी./डी.सी. मोटरों के लिए उपयोग होता है। यह ओवरलोड और शॉर्ट-सर्किट दोनों से सुरक्षा देता है।
  • एमसीसीबी (MCCB - Molded Case Circuit Breaker): यह भारी औद्योगिक मोटरों (100A से 1600A तक) के लिए उपयुक्त है। इसके ट्रिपिंग करंट की सीमा को आवश्यकतानुसार सेट (Adjust) किया जा सकता है।
  • आरसीसीबी / ईएलसीबी (RCCB / ELCB): यह करंट लीकेज (Earth Leakage) या इंसुलेशन खराब होने पर मोटर और ऑपरेटर को बिजली के झटके (Shock) से बचाने के लिए तुरंत सर्किट को ट्रिप कर देता है।
  • एसीबी (ACB - Air Circuit Breaker): बहुत बड़ी मोटरों और सब-स्टेशनों के मुख्य ए.सी./डी.सी. पैनलों में उच्च क्षमता के करंट को सुरक्षित रूप से काटने के लिए उपयोग होता है।

​3. कटआउट और सुरक्षा उपकरण (Cutouts and Safety Devices)

  • फ्यूज और फ्यूज कटआउट: यह परिपथ का सबसे कमजोर हिस्सा होता है। अत्यधिक करंट बहने पर इसका तार (Fuse Wire) गर्म होकर पिघल जाता है और मोटर सुरक्षित बच जाती है। किट-कैट (Kit-Kat) फ्यूज और एचआरसी (HRC - High Rupturing Capacity) फ्यूज इसके प्रमुख उदाहरण हैं। एचआरसी फ्यूज का उपयोग मोटरों के बैकअप प्रोटेक्शन के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।
  • ओवरलोड रिले (Overload Relay - OLR): यह मोटर के स्टार्टर के साथ जुड़ा होता है। यदि मोटर क्षमता से अधिक लोड खींच रही है और गर्म हो रही है, तो यह रिले थर्मल (द्वि-धातु पट्टी) या इलेक्ट्रॉनिक सिद्धांत पर काम करके स्टार्टर के कंट्रोल सर्किट को बंद कर देता है।
  • सिंगल फेज प्रिवेंटर (Single Phase Preventer): यह थ्री-फेज ए.सी. मोटरों के लिए एक अत्यंत आवश्यक सुरक्षा उपकरण है। यदि सप्लाई के तीन फेजों में से कोई एक फेज उड़ जाता है (Single Phasing), तो मोटर गर्म होकर जल सकती है। यह उपकरण ऐसे समय में मोटर को तुरंत बंद कर देता है।

​4. स्टार्टर और रेगुलेटर (Starters and Regulators)

​मोटर को शुरू करते समय अत्यधिक शुरुआती करंट (Starting Current) को रोकने और सुरक्षा देने के लिए स्टार्टर्स का उपयोग किया जाता है।

​क) ए.सी. मोटर स्टार्टर्स

  • डीओएल स्टार्टर (DOL - Direct On Line Starter): 5 HP तक की छोटी स्क्विरल केज मोटरों के लिए। इसमें कांटेक्टर, नो-वोल्ट कॉइल (NVC) और ओवरलोड रिले होती है।
  • स्टार-डेल्टा स्टार्टर (Star-Delta Starter): 5 HP से बड़ी मोटरों के लिए। यह शुरुआत में मोटर वाइंडिंग को 'स्टार' में जोड़कर वोल्टेज कम करता है और गति पकड़ने पर स्वचालित या मैन्युअली 'डेल्टा' में बदल देता है।
  • रोटर रियोस्टेट स्टार्टर: यह केवल स्लिप-रिंग इंडक्शन मोटर के लिए उपयोग होता है, जो रोटर सर्किट में बाहरी प्रतिरोध जोड़कर शुरुआती टॉर्क बढ़ाता है।

​ख) डी.सी. मोटर स्टार्टर्स

  • 3-पॉइंट और 4-पॉइंट स्टार्टर: ये डी.सी. शंट और कंपाउंड मोटरों को सुरक्षित रूप से स्टार्ट करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनमें लगे प्रतिरोधक शुरुआत में आर्मेचर करंट को सीमित करते हैं।
  • 2-पॉइंट स्टार्टर: यह विशेष रूप से डी.सी. सीरीज़ मोटर्स को चालू करने के लिए उपयोग किया जाता है।

​ग) रेगुलेटर (स्पीड कंट्रोलर)

  • ए.सी. के लिए - वीएफडी (VFD - Variable Frequency Drive): यह ए.सी. मोटर की वोल्टेज और फ्रीक्वेंसी दोनों को नियंत्रित करके उसकी गति को बहुत सटीक रूप से नियंत्रित करता है।
  • डी.सी. के लिए - रियोस्टैटिक और थाइरिस्टर कंट्रोलर: डी.सी. मोटर के फील्ड या आर्मेचर सर्किट में प्रतिरोध बदलकर या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (SCR) द्वारा वोल्टेज नियंत्रित करके गति बदली जाती है।

​5. मोटरों के साथ उपकरणों की वायरिंग का ज्ञान (Wiring Layout)

​किसी भी मोटर (चाहे ए.सी. हो या डी.सी.) की वायरिंग करते समय उपकरणों को एक निश्चित और सुरक्षित क्रम में लगाया जाता है।

वायरिंग का मानक क्रम (Standard Sequence of Wiring)

  1. मुख्य आपूर्ति (Main Power Supply Source)
  2. मुख्य स्विच (Main Switch - ICTP/ICDP): यह पूरे सिस्टम की बिजली एक जगह से काटने के लिए सबसे पहले लगाया जाता है। इसके साथ ही बैकअप सुरक्षा के लिए फ्यूज या MCCB/MCB जोड़े जाते हैं।
  3. कंट्रोल और रेगुलेशन यूनिट (Start / Stop Control): मुख्य स्विच के बाद बिजली स्टार्टर (जैसे DOL, स्टार-डेल्टा या 3-पॉइंट स्टार्टर) में जाती है।
  4. सुरक्षात्मक जुड़ाव (Protective Interlocking): स्टार्टर के भीतर ही ओवरलोड रिले (OLR) और नो-वोल्ट कॉइल (NVC) की वायरिंग की जाती है। थ्री-फेज में इसी स्तर पर सिंगल फेज प्रिवेंटर भी जोड़ा जाता है।
  5. मोटर टर्मिनल्स (Motor Terminals): स्टार्टर के आउटपुट से तार सीधे मोटर के टर्मिनल बॉक्स (U_1, V_1, W_1 आदि ए.सी. के लिए, और A_1, A_2, F_1, F_2 डी.सी. के लिए) में जाते हैं।

वायरिंग के महत्वपूर्ण नियम (IE Rules):

  • कंडक्टर का चयन: मोटर के तारों (Cables) का आकार मोटर के फुल-लोड करंट (Full Load Current) से कम से कम 1.25 गुना (125%) अधिक क्षमता का होना चाहिए, क्योंकि मोटरें शुरू होते समय अधिक करंट लेती हैं।
  • कंड्यूट पाइप: तारों को यांत्रिक क्षति (Mechanical Damage) और नमी से बचाने के लिए उन्हें मजबूत जी.आई. (GI) या पीवीसी (PVC) हैवी-ड्यूटी कंड्यूट पाइप के भीतर से ले जाना चाहिए। मोटर के पास का हिस्सा लचीला (Flexible Conduit) होना चाहिए ताकि कंपन से तार न टूटें।
  • दोहरी अर्थिंग (Double Earthing): मोटर के धात्विक आवरण (Metal Body) और सभी आयरन-क्लैड स्विच/स्टार्टर के बक्सों को दो अलग-अलग स्वतंत्र अर्थ इलेक्ट्रोड से मजबूती से जोड़ा जाना अनिवार्य है।





रूपांतरण - एकल चरण और त्रि चरण ट्रांसफार्मरों का ज्ञान
उनकी संरचना, उपयोग और रखरखाव। चरणबद्ध समाप्ति, समानांतर कार्य, स्वचालित ट्रांसफार्मर, ट्रांसफार्मर टैपिंग, तापमान वृद्धि, उपकरण ट्रांसफार्मर।

1. ट्रांसफार्मर का मूल सिद्धांत (Basic Principle)

​ट्रांसफार्मर एक स्थिर विद्युत उपकरण (Static Device) है, जो फैराडे के विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत (Faraday's Law of Electromagnetic Induction) और विशेष रूप से अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction) पर कार्य करता है। यह आवृत्ति (Frequency) को बदले बिना, प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) के वोल्टेज को कम (Step-Down) या अधिक (Step-Up) करने का कार्य करता है।

​2. एकल चरण (Single Phase) और त्रि चरण (Three Phase) ट्रांसफार्मर

​क) एकल चरण ट्रांसफार्मर (Single Phase Transformer)

  • संरचना: इसमें केवल एक कोर और दो वाइंडिंग (प्राथमिक - Primary और द्वितीयक - Secondary) होती हैं। यह घरेलू और कम क्षमता के उपकरणों के लिए उपयुक्त है।
  • उपयोग: वोल्टेज स्टेबलाइजर, घरेलू इन्वर्टर, वेल्डिंग मशीन और छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में।

​ख) त्रि चरण ट्रांसफार्मर (Three Phase Transformer)

  • संरचना: इसमें तीन कोर लिम्ब्स (Limbs) होते हैं, जिन पर तीन फेज की प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग्स लपेटी जाती हैं। इनकी वाइंडिंग्स को आवश्यकतानुसार स्टार (Star) या डेल्टा (Delta) कनेक्शन में जोड़ा जाता है।
  • उपयोग: पावर जनरेशन स्टेशनों, बड़े सब-स्टेशनों और औद्योगिक बिजली वितरण (Distribution System) में।

​3. ट्रांसफार्मर की संरचना (Construction)

​एक बड़े पावर या डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर के मुख्य भाग निम्नलिखित होते हैं:

  • कोर (Core): यह सिलिकॉन स्टील की पतली-पतली पत्तियों (Laminations) को मिलाकर बनाया जाता है, ताकि एडी करंट (Eddy Current) और हिस्टेरेसिस (Hysteresis) हानियों को कम किया जा सके। इसका मुख्य कार्य चुंबकीय फ्लक्स को कम प्रतिरोध वाला रास्ता देना है।
  • वाइंडिंग (Windings): इंसुलेटेड तांबे (Copper) के तारों से बनी वाइंडिंग्स कोर पर लपेटी जाती हैं। जिस तरफ सप्लाई दी जाती है उसे 'प्राइमरी' और जहां से लोड जोड़ा जाता है उसे 'सेकेंडरी' कहते हैं।
  • मुख्य टैंक (Main Tank): इसमें कोर और वाइंडिंग को रखा जाता है और यह ट्रांसफार्मर तेल (Mineral Oil) से भरा होता है, जो इंसुलेशन और कूलिंग (शीतलन) दोनों का काम करता है।
  • कंज़र्वेटर टैंक (Conservator Tank): यह मुख्य टैंक के ऊपर लगा एक छोटा ड्रम होता है। जब लोड बढ़ने पर तेल गर्म होकर फैलता है या सिकुड़ता है, तो यह तेल के स्तर को बनाए रखने के लिए जगह देता है।
  • ब्रीदर (Breather): कंज़र्वेटर टैंक में हवा के आने-जाने के रास्ते में यह लगा होता है। इसमें सिलिका जेल (Silica Gel) भरा होता है, जो हवा की नमी को सोख लेता है। सूखा सिलिका जेल नीले रंग का होता है और नमी सोखने के बाद यह गुलाबी हो जाता है।
  • बुखोलज़ रिले (Buchholz Relay): यह मुख्य टैंक और कंज़र्वेटर टैंक को जोड़ने वाले पाइप के बीच लगी एक सुरक्षा रिले है। यह ट्रांसफार्मर के अंदरूनी दोषों (Internal Faults) जैसे शॉर्ट-सर्किट या गैस बनने पर अलार्म बजाती है या सर्किट को ट्रिप करती है।
  • बुशिंग (Bushings): ये पोर्सलीन (चीनी मिट्टी) के बने इंसुलेटर होते हैं, जिनकी मदद से बाहरी तारों को बिना बॉडी से छुए आंतरिक वाइंडिंग से जोड़ा जाता है।

​4. ध्रुवीयता और चरणबद्ध समाप्ति (Polarity & Phasing Out)

  • ध्रुवीयता परीक्षण (Polarity Test): समानांतर क्रम में जोड़ने से पहले यह जानना जरूरी है कि प्राथमिक और द्वितीयक वाइंडिंग्स में प्रेरित वोल्टेज की दिशा क्या है। यह टेस्ट सुनिश्चित करता है कि वाइंडिंग्स को समान दिशा वाले टर्मिनलों के साथ जोड़ा जाए (Additive or Subtractive Polarity)।
  • फेजिंग आउट (Phasing Out): थ्री-फेज ट्रांसफार्मरों में यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि समानांतर में जोड़े जाने वाले दोनों ट्रांसफार्मरों का फेज अनुक्रम (Phase Sequence - R-Y-B) और फेज विस्थापन (Phase Displacement/Vector Group) बिल्कुल एक समान हो। गलत फेजिंग आउट से भयंकर शॉर्ट-सर्किट हो सकता है।

​5. समानांतर कार्य (Parallel Operation)

​जब बिजली की मांग (Load) एक ट्रांसफार्मर की क्षमता से अधिक हो जाती है, तो दो या दो से अधिक ट्रांसफार्मरों को समानांतर (Parallel) में जोड़ा जाता है। इसके लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है:

  1. ​दोनों ट्रांसफार्मरों का वोल्टेज अनुपात (Voltage Ratio) समान होना चाहिए।
  2. ​दोनों की ध्रुवीयता (Polarity) समान होनी चाहिए।
  3. ​प्रतिशत प्रतिबाधा (Percentage Impedance - %Z) समान होनी चाहिए (ताकि वे लोड को अपनी क्षमता के अनुसार साझा कर सकें)।
  4. ​थ्री-फेज ट्रांसफार्मर के मामले में फेज अनुक्रम (Phase Sequence) एक समान होना चाहिए।

​6. स्वचालित ट्रांसफार्मर (Auto-Transformer)

​यह एक विशेष प्रकार का ट्रांसफार्मर है जिसमें दो अलग-अलग वाइंडिंग के बजाय केवल एक ही वाइंडिंग होती है। यही वाइंडिंग प्राथमिक और द्वितीयक दोनों का कार्य करती है।

  • सिद्धांत: यह स्व-प्रेरण (Self-Induction) के सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • लाभ: इसमें तांबे (Copper) की भारी बचत होती है, यह आकार में छोटा और अधिक कुशल होता है।
  • हानि: प्राथमिक और द्वितीयक सर्किट के बीच कोई विद्युत अलगाव (Electrical Isolation) नहीं होता।
  • उपयोग: वोल्टेज स्टेबलाइजर में, प्रयोगशालाओं में (Variac के रूप में वोल्टेज बदलने के लिए), और इंडक्शन मोटर्स के स्टार्टर में।

​7. ट्रांसफार्मर टैपिंग (Transformer Tapping / Tap Changer)

​सप्लाई वोल्टेज में होने वाले उतार-चढ़ाव को संतुलित करने और आउटपुट वोल्टेज को स्थिर रखने के लिए ट्रांसफार्मर की वाइंडिंग (आमतौर पर हाई-वोल्टेज वाइंडिंग) से कई टर्मिनल बाहर निकाले जाते हैं, जिन्हें टैप्स (Taps) कहते हैं।

  • नो-लोड टैप चेंजर (NLTC): इसमें टैप बदलने के लिए ट्रांसफार्मर को लोड से अलग (Off) करना पड़ता है।
  • ऑन-लोड टैप चेंजर (OLTC): इसमें बिना बिजली काटे, चालू लाइन (On-Load) पर ही स्वचालित या मैन्युअली वोल्टेज के अनुसार टैप बदले जा सकते हैं।

​8. तापमान वृद्धि (Temperature Rise)

​ट्रांसफार्मर में होने वाली हानियों (Copper Loss और Iron Loss) के कारण इसके कोर और वाइंडिंग में गर्मी पैदा होती है।

  • ​यदि तापमान एक निश्चित सीमा (जैसे 90^circ {C} से 110^circ {C}) से ऊपर जाता है, तो वाइंडिंग का इंसुलेशन खराब हो सकता है और ट्रांसफार्मर जल सकता है।
  • ​तापमान को नियंत्रित रखने के लिए कूलिंग विधियों (जैसे ONAN - Oil Natural Air Natural, ONAF - Oil Natural Air Forced) का उपयोग किया जाता है। इसकी निगरानी के लिए ट्रांसफार्मर में OTI (Oil Temperature Indicator) और WTI (Winding Temperature Indicator) मीटर लगे होते हैं।

​9. उपकरण ट्रांसफार्मर (Instrument Transformers)

​उच्च वोल्टेज (High Voltage) और भारी करंट (High Current) को सामान्य एमीटर और वोल्टमीटर से सीधे नहीं मापा जा सकता। इसके लिए इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर्स का उपयोग किया जाता है। ये दो प्रकार के होते हैं:

​क) करंट ट्रांसफार्मर (Current Transformer - CT)

  • ​यह एक स्टेप-अप ट्रांसफार्मर होता है जो भारी करंट को कम करके मापने योग्य बनाता है।
  • ​इसकी सेकेंडरी वाइंडिंग का मानक रेटिंग आमतौर पर 1A या 5A होता है।
  • चेतावनी: चालू लाइन में सी.टी. (CT) की सेकेंडरी वाइंडिंग को कभी भी खुला (Open Circuit) नहीं छोड़ना चाहिए, अन्यथा इसमें अत्यधिक उच्च वोल्टेज पैदा हो सकता है जो जानलेवा साबित हो सकता है।

​ख) पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (Potential Transformer - PT)

  • ​यह एक शुद्ध स्टेप-डाउन ट्रांसफार्मर होता है, जो उच्च वोल्टेज (जैसे 11kV, 33kV) को सुरक्षित कम वोल्टेज में बदलता है।
  • ​इसकी सेकेंडरी वाइंडिंग का मानक आउटपुट आमतौर पर 110V होता है, जिससे वोल्टमीटर जोड़कर वोल्टेज मापा जाता है।

​10. रखरखाव (Maintenance & Testing)

​ट्रांसफार्मर की लंबी उम्र और बिना रुकावट कार्य के लिए नियमित रखरखाव जरूरी है:

  • दैनिक (Daily): तेल के स्तर (Oil Level), सिलिका जेल के रंग, और किसी भी प्रकार के तेल रिसाव (Leakage) की जांच करें।
  • मासिक (Monthly): ब्रीदर के नीचे लगे ऑयल कप (Oil Cup) की सफाई और सिलिका जेल की स्थिति देखें।
  • छमाही/वार्षिक (Half-Yearly/Annually): ट्रांसफार्मर तेल का BDV (Break Down Voltage) टेस्ट या डाइइलेक्ट्रिक स्ट्रेंथ टेस्ट करें। एक अच्छे तेल का BDV मान 30 kV से अधिक होना चाहिए। यदि यह कम है, तो तेल को 'फिल्ट्रेशन' (Purification) की आवश्यकता होती है। वाइंडिंग के इंसुलेशन रेजिस्टेंस की जांच मेगर (Megger) उपकरण से करें।




ओवरहेड लाइनें - सरल गणनाएँ और सामान्य सिद्धांत
कम, मध्यम और उच्च वोल्टेज लाइनों के निर्माण के लिए।
चालकों का आकार, स्पैन की लंबाई, झुकाव, खंभों की मजबूती, चालकों के बीच की दूरी,
क्रॉस आर्म्स, तापमान का प्रभाव, हवा का दबाव, बर्फ और हिमपात, तार पर तनाव। इंसुलेटर, ब्रैकेट, स्टे, स्ट्रट, गार्ड तार और अन्य सुरक्षात्मक उपकरण।
अर्थिंग, लाइटनिंग अरेस्टर,
लाइटनिंग कंडक्टर और उनका परीक्षण और दोष का पता लगाना।


1. ओवरहेड लाइनों के सामान्य सिद्धांत और निर्माण

​ओवरहेड (Overhead - सिरोपरि) लाइनों का उपयोग विद्युत ऊर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ट्रांसमिशन (पारेषण) और डिस्ट्रीब्यूशन (वितरण) के लिए किया जाता है। वोल्टेज के स्तर के आधार पर लाइनों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है:

  • निम्न वोल्टेज (LV): 250 V तक (घरेलू उपयोग)
  • मध्यम वोल्टेज (MV): 250 V से 650 V तक (थ्री-फेज घरेलू और लघु उद्योग)
  • उच्च वोल्टेज (HV): 650 V से 33 kV तक (मुख्य वितरण और औद्योगिक लोड)
  • अति उच्च वोल्टेज (EHV/UHV): 33 kV से ऊपर (सब्स्टेशनों के बीच लॉन्ग-डिस्टेंस ट्रांसमिशन)

​2. यांत्रिक और संरचनात्मक कारक (Mechanical Factors)

​क) चालकों का आकार (Size of Conductors)

​चालक का चयन उसकी धारा वहन क्षमता (Current Carrying Capacity) और यांत्रिक मजबूती के आधार पर किया जाता है।

  • ​शहरी और कम दूरी की वितरण लाइनों में AAC (All Aluminum Conductor) का उपयोग होता है।
  • ​लंबी दूरी और उच्च यांत्रिक मजबूती के लिए ACSR (Aluminum Conductor Steel Reinforced) चालकों का उपयोग किया जाता है, जिसमें बीच में स्टील का तार (मजबूती के लिए) और चारों ओर एल्यूमीनियम के तार (चालकता के लिए) होते हैं।

​ख) स्पैन की लंबाई (Span Length)

​दो लगातार खंभों या टावरों के बीच की क्षैतिज (Horizontal) दूरी को स्पैन की लंबाई कहते हैं। यह खंभों के प्रकार पर निर्भर करती है:

  • ​लकड़ी/आरसीसी (RCC) पोल: 40 - 80 मीटर
  • ​स्टील ट्यूबलर पोल: 50 - 100 मीटर
  • ​स्टील लैटिस टावर (उच्च वोल्टेज): 200 - 400 मीटर या अधिक

​ग) झुकाव और तार पर तनाव (Sag and Tension)

​जब दो खंभों के बीच किसी तार को बांधा जाता है, तो वह अपने स्वयं के वजन के कारण थोड़ा नीचे लटक जाता है। खंभों के सहायक बिंदुओं को जोड़ने वाली काल्पनिक सीधी रेखा और तार के सबसे निचले बिंदु के बीच की ऊर्ध्वाधर (Vertical) दूरी को झुकाव (Sag) कहते हैं।

सरल गणना सूत्र:

यदि स्पैन की लंबाई L (मीटर), तार का प्रति मीटर भार w (किग्रा/मीटर), और तार का तनाव T (किग्रा) है, तो झुकाव (S) की गणना इस प्रकार की जाती है:

S = {w l^2}/{8 × T}

कहाँ:

  • ​S = झुकाव (Sag) मीटर में
  • ​w = चालक का प्रति इकाई लंबाई वजन (kg/m)
  • ​l = स्पैन की लंबाई (m)
  • ​T = तार पर तनाव (Tension) न्यूटन या किलोग्राम में
  • नियम: यदि स्पैन बढ़ता है, तो झुकाव (Sag) तेजी से बढ़ता है। इसलिए खंभों की ऊंचाई और दूरी का संतुलन जरूरी है।


    तापमान, हवा, बर्फ और हिमपात का प्रभाव

    • तापमान (Temperature): तापमान बढ़ने पर चालक फैलता है, जिससे झुकाव (Sag) बढ़ता है और तनाव (Tension) कम होता है। सर्दियों में तार सिकुड़ता है, जिससे तनाव बढ़ जाता है।
    • हवा का दबाव (Wind Pressure): हवा तार पर क्षैतिज (Horizontal) बल लगाती है।
    • बर्फ और हिमपात (Ice Loading): ठंडे इलाकों में तार पर बर्फ जमने से उसका वजन (w) बढ़ जाता है, जिससे झुकाव और तनाव दोनों बढ़ जाते हैं।

    ​कुल संशोधित वजन (w_t) की गणना:

    w_t = sqrt{(w + w_i)^2 + w_w^2}


    (यहाँ w_i = बर्फ का वजन, w_w = हवा का बल है)

    खंभों की मजबूती (Pole Strength) और तनाव

    ​खंभों को हवा के थपेड़ों और तारों के कुल खिंचाव (Tension) को सहने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। लाइनों के अंत में या मोड़ पर खंभों पर सबसे ज्यादा तनाव होता है। सुरक्षा गुणांक (Safety Factor) आमतौर पर 2 से 3 रखा जाता है।

    ​2. लाइन के पुर्जे और सुरक्षा उपकरण (Line Components)

    चालकों के बीच की दूरी (Spacing) और क्रॉस आर्म्स

    • दूरी (Spacing): चालकों के बीच पर्याप्त दूरी होनी चाहिए ताकि तेज हवा में वे आपस में न टकराएं (शॉर्ट सर्किट से बचाव)। उच्च वोल्टेज के लिए यह दूरी अधिक होती है।
    • क्रॉस आर्म्स (Cross Arms): ये खंभे के ऊपर लगे लकड़ी, कंक्रीट या स्टील के ढांचे होते हैं जो इंसुलेटर और चालकों को खंभे से दूर रखते हैं।

    इंसुलेटर (Insulators)

    ​चालक से करंट को खंभे या जमीन में जाने से रोकने के लिए इनका उपयोग होता है:

    • पिन इंसुलेटर (Pin Insulator): 33 kV तक की सीधी लाइनों के लिए।
    • सस्पेंशन इंसुलेटर (Suspension Insulator): 33 kV से ऊपर की उच्च वोल्टेज लाइनों के लिए (डिस्क की लड़ियाँ)।
    • शैकल इंसुलेटर (Shackle Insulator): कम वोल्टेज (LV) लाइनों के मोड़ों या अंत में।
    • स्ट्रेन इंसुलेटर (Strain Insulator): उच्च वोल्टेज लाइनों के तीखे मोड़ों या डेड-एंड पर।

    ब्रैकेट, स्टे (Stay) और स्ट्रट (Strut)

    • स्टे वायर (Stay Wire / Guy Wire): खंभे के विपरीत दिशा में जमीन से बांधा जाने वाला झुका हुआ तार, जो तारों के खिंचाव को संतुलित करता है (विशेषकर अंतिम खंभों या मोड़ों पर)।
    • स्ट्रट (Strut): यह एक तरह का सहायक खंभा होता है जो मुख्य खंभे को सहारा देने के लिए कोणीय स्थिति में लगाया जाता है (जहाँ स्टे लगाने की जगह न हो)।

    गार्ड तार (Guard Wires)

    ​यदि ओवरहेड लाइन किसी सड़क, रेलवे या टेलीफोन लाइन के ऊपर से गुजरती है, तो उसके नीचे एक सुरक्षा जाली या गार्ड तार लगाया जाता है। यदि मुख्य तार टूटता है, तो वह पहले गार्ड तार पर गिरेगा (जो अर्थ होता है), जिससे तुरंत ट्रिपिंग हो जाएगी और नीचे जान-माल का नुकसान नहीं होगा।

    ​3. अर्थिंग और आसमानी बिजली से सुरक्षा (Earthing & Lightning Protection)

    अर्थिंग (Earthing / Grounding)

    ​सुरक्षा के लिए हर खंभे, धातु के हिस्सों और उपकरणों को कम प्रतिरोध वाले अर्थ इलेक्ट्रोड (रोड या प्लेट) के माध्यम से जमीन से जोड़ा जाता है। इसका प्रतिरोध हमेशा बहुत कम (आदर्श रूप से 1 से 5 ओह्म) होना चाहिए।

    लाइटनिंग अरेस्टर (Lightning Arresters - LA)

    ​यह सबस्टेशन और मुख्य उपकरणों (जैसे ट्रांसफार्मर) के पास लगाया जाता है। सामान्य वोल्टेज पर यह इंसुलेटर की तरह काम करता है, लेकिन जब आसमानी बिजली (High Voltage Surge) गिरती है, तो यह तुरंत चालू (Conducting) हो जाता है और उस भारी करंट को सुरक्षित रूप से जमीन में भेज देता है।

    ​लाइटनिंग कंडक्टर / अर्थ वायर (Lightning Conductor / Shield Wire)

    ​यह ट्रांसमिशन टावरों के सबसे ऊपरी हिस्से पर चलने वाला एक नंगा (Bare) तार होता है। यह नीचे के मुख्य फेज तारों (Phase Wires) को आसमानी बिजली की सीधी मार से बचाता है और बिजली को टावर के जरिए सीधे जमीन में डाल देता है।

    ​4. परीक्षण और दोष का पता लगाना (Testing and Fault Detection)

    ​लाइन चालू करने से पहले और खराबी आने पर निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:

    ​परीक्षण (Testing)

    1. इंसुलेशन प्रतिरोध परीक्षण (Insulation Resistance Test): मेगर (Megger) उपकरण की मदद से चालकों और अर्थ/खंभे के बीच का इंसुलेशन स्तर जांचा जाता है।
    2. निरंतरता परीक्षण (Continuity Test): यह सुनिश्चित करने के लिए कि तार कहीं से टूटा तो नहीं है।

    दोष का पता लगाना (Fault Detection)

    ​ओवरहेड लाइनों में मुख्य रूप से तीन प्रकार के दोष (Faults) होते हैं:

    • शॉर्ट सर्किट (Line to Line Fault): दो फेज का आपस में टकरा जाना।
    • अर्थ फॉल्ट (Line to Ground Fault): तार का टूटकर जमीन या खंभे से छू जाना (सबसे आम दोष)।
    • ओपन सर्किट (Open Circuit Fault): तार का बीच से टूट जाना।

    पता लगाने के तरीके:

    • विजुअल इंस्पेक्शन (Visual Inspection): गश्त (Patrolling) करके टूटे तार, गिरे पेड़ या क्षतिग्रस्त इंसुलेटर को देखना।
    • दूरी का अनुमान (Distance Relay / Fault Locator): आधुनिक सबस्टेशनों में लगे रिले रिले फॉल्ट के समय वोल्टेज और करंट के अनुपात (Impedance) को मापकर यह बता देते हैं कि सबस्टेशन से कितनी किलोमीटर की दूरी पर फॉल्ट हुआ है।
    • TDR (Time Domain Reflectometry): भूमिगत केबल या लंबी लाइनों के लिए पल्स भेजकर फॉल्ट की सटीक जगह का पता लगाया जाता है।




भूमिगत केबल - भूमिगत केबल, सरल गणनाएँ और
जमीन में, नालियों में और
पाइपों में केबल बिछाने के सामान्य सिद्धांत।
केबल को संभालना, मोड़ना, जोड़ना, प्लंबिंग। भूमिगत और
जमीन के ऊपर जंक्शन बॉक्स। वितरण बोर्ड, जॉइंट बॉक्स कंपाउंड, कंपाउंड को पिघलाना और बॉक्स में कंपाउंड भरना।
परीक्षण और दोष का पता लगाना।


भूमिगत केबल (Underground Cables) प्रणाली का उपयोग घनी आबादी वाले क्षेत्रों, शहरों और वहाँ किया जाता है जहाँ ओवरहेड लाइनें बिछाना असुरक्षित या असंभव होता है। यह प्रणाली मौसम (आंधी, पानी) से सुरक्षित रहती है, लेकिन इसका निर्माण और फॉल्ट ढूंढना अधिक खर्चीला और जटिल होता है।

​1. केबल बिछाने के सामान्य सिद्धांत (Cable Laying Methods)

​केबल बिछाने के मुख्य रूप से तीन तरीके उपयोग किए जाते हैं:

​क. सीधे जमीन में बिछाना (Direct Laying)

​यह सबसे सरल और सस्ती विधि है।

  • खिंचाव (Trench): आमतौर पर 0.9 {मीटर} से 1.2 {मीटर} गहरी और 0.45 { मीटर} चौड़ी खाई खोदी जाती है।
  • प्रक्रिया: खाई के तल पर 10 {cm} साफ रेत (Sand cushioning) बिछाई जाती है। केबल को इसके ऊपर रखकर फिर से 10 {cm} रेत से ढक दिया जाता है।
  • सुरक्षा: रेत के ऊपर ईंटें या कंक्रीट की टाइलें रखी जाती हैं ताकि भविष्य में होने वाली खुदाई से केबल सुरक्षित रहे।

​ख. नालियों/ड्रॉ-इन सिस्टम में बिछाना (Draw-in System)

​इस विधि में कंक्रीट, कंकड़ या क्ले के ब्लॉक (Ducts) जमीन में पहले ही दबा दिए जाते हैं, जिनमें मैनहोल (Manholes) बने होते हैं।

  • ​केबल को बिना खुदाई किए इन मैनहोल के जरिए नालियों के अंदर खींचा जाता है।
  • ​यह विधि व्यस्त सड़कों और उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहाँ बार-बार खुदाई करना संभव नहीं है।

​ग. पाइपों में बिछाने के सिद्धांत (Laying in Pipes/Conduits)

​सड़क पार करते समय, रेलवे ट्रैक के नीचे या भारी ट्रैफिक वाले क्षेत्रों में केबलों को GI (Galvanized Iron), सॉलिड कंक्रीट, या HDPE पाइपों के अंदर से गुजारा जाता है।

  • सिद्धांत: पाइप का आंतरिक व्यास (Diameter) केबल के बाहरी व्यास से कम से कम 1.5 से 2 गुना बड़ा होना चाहिए ताकि केबल आसानी से खिंच सके।

सरल गणना (Current Carrying Capacity & Derating Factor)

​भूमिगत केबल की धारा वहन क्षमता हवा में खुली केबल से कम होती है क्योंकि जमीन में गर्मी (Heat) जल्दी बाहर नहीं निकल पाती।

I_{{actual}} = I_{{rated}} × K


(यहाँ K = डिरेटिंग फैक्टर है, जो मिट्टी के तापमान, गहराई और पास में मौजूद अन्य केबलों की संख्या पर निर्भर करता है। आमतौर पर K < 1 होता है।)

​2. केबल को संभालना, मोड़ना और जोड़ना (Handling & Jointing)

​केबल को संभालना (Handling)

  • ​केबल ड्रम को हमेशा रोल करके ले जाना चाहिए, उसे कभी भी जमीन पर फ्लैट नहीं गिराना चाहिए।
  • ​केबल को ड्रम से निकालते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसमें कोई बल (Kink) न पड़े, अन्यथा इंसुलेशन खराब हो सकता है।

मोड़ना (Bending Radius)

​केबल को कभी भी तीखे कोण (Sharp angle) पर नहीं मोड़ना चाहिए। इसका न्यूनतम बेंडिंग रेडियस (Minimum Bending Radius) तय होता है:

  • सिंगल कोर केबल: बाहरी व्यास का कम से कम 12 से 15 गुना।
  • मल्टी-कोर केबल: बाहरी व्यास का कम से कम 10 से 12 गुना।
  • ​यदि मोड़ इससे छोटा होगा, तो केबल की आर्मरिंग (Metal Armour) और इंसुलेशन टूट सकते हैं।


    जोड़ना (Jointing) और प्लंबिंग (Plumbing)

    • केबल जॉइंट्स: दो केबलों को जोड़ने के लिए स्ट्रेट-थ्रू जॉइंट्स (Straight-through joints) का उपयोग होता है। चालकों को फेरूल (Ferrule) या क्रिम्पिंग टूल की मदद से जोड़ा जाता है।
    • प्लंबिंग (Plumbing/Wiping): पेपर इंसुलेटेड लीड-शीथेड (PILC) केबलों में नमी को रोकने के लिए, मेटल शीथ और जॉइंट स्लीव के बीच पिघले हुए सीसे (Lead) की मदद से सोल्डरिंग/प्लंबिंग की जाती है ताकि जोड़ पूरी तरह से वॉटरप्रूफ (Waterproof) हो जाए।

    ​3. जंक्शन बॉक्स, डिस्ट्रीब्यूशन बोर्ड और कंपाउंड फिलिंग

    जंक्शन बॉक्स (Junction Boxes)

    • भूमिगत (Underground): ये पूरी तरह से सीलबंद और वॉटरप्रूफ होते हैं। इन्हें पिट (Pit) के अंदर रखा जाता है।
    • जमीन के ऊपर (Feeder Pillars / Above-ground): ये सड़क के किनारे लगे लोहे या फाइबर के डिब्बे होते हैं जहाँ मुख्य केबल आकर उप-केबलों (Sub-cables) में विभाजित होती है। यहाँ फ्यूज या स्विच गियर लगे होते हैं।

    वितरण बोर्ड (Distribution Boards)

    ​उपभोक्ताओं को बिजली बांटने के लिए इनका उपयोग होता है। इनमें बसबार (Busbars), सर्किट ब्रेकर (MCB/MCCB) और फ्यूज लगे होते हैं ताकि किसी एक लाइन में फॉल्ट होने पर पूरी बिजली बंद न हो।

    जॉइंट बॉक्स कंपाउंड (Joint Box Compound)

    ​जोड़ को नमी और यांत्रिक झटकों से बचाने के लिए जॉइंट बॉक्स के खाली स्थान में एक इंसुलेटिंग कंपाउंड (जैसे बिटुमेन या इपॉक्सी रेजिन - Epoxy Resin) भरा जाता है।

    कंपाउंड को पिघलाना और भरना:

    1. ​बिटुमेन आधारित कंपाउंड को एक साफ केतली में तय तापमान तक गर्म करके पिघलाया जाता है (अधिक गर्म करने से इसके गुण नष्ट हो सकते हैं)।
    2. ​पिघले हुए कंपाउंड को जॉइंट बॉक्स के फिलिंग होल से धीरे-धीरे भरा जाता है ताकि अंदर कोई हवा का बुलबुला (Air pocket) न रहे।
    3. ​ठंडा होने पर कंपाउंड सिकुड़ता है, इसलिए थोड़ी देर बाद इसे दोबारा ऊपर तक टॉप-अप (Top-up) किया जाता है। आधुनिक समय में रेजिन-किट्स (Resin Kits) का उपयोग होता है जिन्हें गर्म करने की आवश्यकता नहीं होती (Cold-pour)।

    ​4. परीक्षण और दोष का पता लगाना (Testing and Fault Detection)

    ​परीक्षण (Testing)

    1. इंसुलेशन रेजिस्टेंस टेस्ट (IR Test): केबल चालू करने से पहले 'मेगर' (500 {V} से 5000 {V}) द्वारा कोर-टू-कोर और कोर-टू-अर्थ इंसुलेशन मापा जाता है।
    2. हाई वोल्टेज टेस्ट (HV Test): यह जांचने के लिए कि केबल हाई वोल्टेज सर्ज सह सकती है या नहीं।

    दोष का पता लगाना (Fault Detection)

    ​भूमिगत केबलों में मुख्य दोष हैं: ग्राउंड फॉल्ट (तार का शीथ से छूना), शॉर्ट-सर्किट (दो तारों का मिलना), और ओपन-सर्किट (तार का टूटना)।

    ​फॉल्ट की सटीक दूरी जानने के लिए निम्नलिखित सरल और उन्नत परीक्षण किए जाते हैं:

    परीक्षण का नाम

    प्रकार / उपयोग

    कार्य सिद्धांत

    मुरे लूप टेस्ट (Murray Loop Test)

    ग्राउंड और शॉर्ट-सर्किट फॉल्ट

    यह व्हीटस्टोन ब्रिज (Wheatstone Bridge) के सिद्धांत पर काम करता है। इसमें एक अच्छी केबल और फॉल्ट वाली केबल का लूप बनाया जाता है। रेजिस्टेंस के अनुपात से दूरी ({Distance} = {R_2}/{R_1+R_2} × 2L) निकाली जाती है।

    वर्ले लूप टेस्ट (Varley Loop Test)

    ग्राउंड और शॉर्ट-सर्किट फॉल्ट

    यह भी व्हीटस्टोन ब्रिज पर आधारित है, लेकिन इसमें केबल का सटीक प्रतिरोध अलग से मापने की सुविधा होती है।

    टाइम डोमेन रिफ्लेक्टोमीटर (TDR / Cable Radar)

    ओपन सर्किट और शॉर्ट सर्किट

    केबल में एक हाई-फ्रीक्वेंसी पल्स भेजी जाती है। जहाँ फॉल्ट होता है, वहाँ से पल्स टकराकर वापस आती है। समय के आधार पर मीटर फॉल्ट की दूरी सीधे स्क्रीन पर दिखा देता है।

    थम्पर टेस्ट (Thumper Test / Acoustic Method)

    सटीक स्थान ढूंढना (Pinpointing)

    केबल में हाई वोल्टेज पल्स भेजी जाती है जिससे फॉल्ट वाली जगह पर स्पार्क (Spark) होता है और ज़मीन के अंदर 'ठक-ठक' (Thumping) की आवाज़ आती है। इसे ज़मीन के ऊपर ग्राउंड माइक्रोफोन द्वारा सुनकर सटीक जगह ढूंढ ली जाती है।





प्रकाश व्यवस्था - धातु तंतु वाले लैंप, फ्लोरोसेंट लैंप सर्किट,
फोटोमेट्रिक इकाइयाँ और सरल मापन।
कुशल प्रकाश व्यवस्था की सामान्य आवश्यकताएँ और प्राथमिक गणनाएँ।
स्ट्रीट लाइटिंग। टाइम स्विच।

प्रकाश व्यवस्था (Illumination या Lighting System) का उद्देश्य कार्यक्षेत्र या वातावरण के अनुसार पर्याप्त, आरामदायक और कुशल रोशनी प्रदान करना है। इसके विद्युत और प्रकाशीय सिद्धांतों को नीचे विस्तार से समझाया गया है:

​1. लैंप के प्रकार (Types of Lamps)

​धातु तंतु वाले लैंप (Metal Filament / Incandescent Lamps)

​ये पारंपरिक बल्ब हैं जो गर्म होकर रोशनी देते हैं।

  • सिद्धांत: जब टंगस्टन (Tungsten) से बने धातु के तंतु (Filament) में से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो अत्यधिक प्रतिरोध के कारण वह अत्यधिक गर्म (2000^circ {C} से 2500^circ {C}) होकर चमकने लगता है और प्रकाश उत्सर्जित करता है।
  • गैस: तंतु को जलने (Oxidation) से बचाने के लिए बल्ब के अंदर नाइट्रोजन या आर्गन जैसी निष्क्रिय गैसें भरी जाती हैं।
  • दक्षता: इनकी दक्षता बहुत कम (लगभग 10 {--}15 { lumens/Watt}) होती है, क्योंकि अधिकांश विद्युत ऊर्जा प्रकाश के बजाय गर्मी (Heat) में बदल जाती है।

​फ्लोरोसेंट लैंप सर्किट (Fluorescent Tube Light Circuit)

​यह एक कम दबाव वाला मर्करी-वेपर (Mercury Vapour) लैंप होता है।


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  •  मुख्य भाग:
    1. चोक (Choke/Ballast): यह शुरू में गैस के आयोनाइजेशन के लिए एक उच्च वोल्टेज सर्ज (High Voltage Surge) पैदा करता है और लैंप चालू होने के बाद करंट को नियंत्रित रखता है।
    2. स्टार्टर (Starter): यह एक ग्लो-डिस्चार्ज स्विच है जो शुरुआत में फिलामेंट्स को गर्म करने के लिए सर्किट को अचानक खोलता और बंद करता है।
  • कार्यप्रणाली: जब वोल्टेज लगाया जाता है, तो स्टार्टर सर्किट को ऑन-ऑफ करता है जिससे चोक एक हाई वोल्टेज झटका देता है। इससे ट्यूब के अंदर की मर्करी गैस आयोनाइज हो जाती है और अल्ट्रावायलेट (UV) किरणें निकलती हैं। ट्यूब के अंदर की दीवारों पर लगा फॉस्फर पाउडर (Phosphor Powder) इन UV किरणों को सोखकर दृश्य प्रकाश (Visible Light) में बदल देता है।

​2. फोटोमेट्रिक इकाइयाँ और सरल मापन (Photometric Units)

​प्रकाश को मापने के लिए कुछ मानक इकाइयों का उपयोग किया जाता है:

भौतिक राशि (Quantity)

परिभाषा

इकाई (Unit)

ल्यूमिनस फ्लक्स (Luminous Flux)

किसी प्रकाश स्रोत द्वारा प्रति सेकंड उत्सर्जित होने वाली कुल प्रकाश ऊर्जा।

ल्यूमेन (Lumen - lm)

ल्यूमिनस इंटेंसिटी (Luminous Intensity)

किसी विशेष दिशा में प्रति इकाई ठोस कोण (Solid Angle) पर निकलने वाला प्रकाश।

कैंडेला (Candela - cd)

इल्यूमिनेशन / इल्यूमिनेन्स (Illuminance - E)

प्रति इकाई सतह क्षेत्र पर गिरने वाला ल्यूमिनस फ्लक्स।

लक्स (Lux) या lm/m^2


सरल मापन (Measurement)

​प्रकाश की तीव्रता या लक्स स्तर को मापने के लिए लक्स मीटर (Lux Meter) या फोटोइलेक्ट्रिक फोटोमीटर का उपयोग किया जाता है। इसमें एक फोटोसेल होता है, जो प्रकाश पड़ने पर उसे विद्युत चालू (Current) में बदल देता है, जिसे डिजिटल स्क्रीन पर 'लक्स' में पढ़ा जाता है।

​3. कुशल प्रकाश व्यवस्था की आवश्यकताएँ और गणनाएँ

​एक अच्छी प्रकाश व्यवस्था (Good Lighting System) में निम्नलिखित गुण होने चाहिए:

  • ​पर्याप्त रोशनी (Adequate Luminance) होनी चाहिए ताकि आंखों पर जोर न पड़े।
  • ​चकाचौंध (Glare) नहीं होनी चाहिए।
  • ​रोशनी का वितरण हर जगह समान (Uniform distribution) होना चाहिए।
  • ​परछाइयाँ (Shadows) गहरी नहीं होनी चाहिए।

​प्राथमिक गणनाएँ (Illumination Calculations)

​किसी कमरे के लिए आवश्यक लैंपों की संख्या निकालने के लिए ल्यूमेन विधि (Lumen Method) का उपयोग किया जाता है:

E = {N × F × UF × MF}/{A}


जहाँ:

  • ​E = आवश्यक इल्यूमिनेशन (Lux में)
  • ​N = लैंपों की संख्या
  • ​F = प्रत्येक लैंप का ल्यूमेन आउटपुट (lm)
  • ​UF = यूटिलाइजेशन फैक्टर (Utilization Factor - कमरे के रंग और दीवारों पर निर्भर करता है, आमतौर पर 0.4 से 0.6)
  • ​MF = मेंटेनेंस फैक्टर (Maintenance Factor - धूल-मिट्टी के कारण प्रकाश में आने वाली कमी, आमतौर पर 0.8)
  • ​A = फर्श का क्षेत्रफल (Area in m^2)

सरल सूत्र (लैंपों की संख्या निकालने के लिए):

N = {E × A}/{F × UF × MF}

4. स्ट्रीट लाइटिंग और टाइम स्विच (Street Lighting & Time Switches)

​स्ट्रीट लाइटिंग (Street Lighting)

​सड़कों पर रोशनी का मुख्य उद्देश्य रात के समय दुर्घटनाओं को रोकना और सुरक्षा प्रदान करना है।

  • सिद्धांत: इसमें खंभों की ऊंचाई (Height) और उनके बीच की दूरी (Span) का अनुपात इस तरह रखा जाता है कि सड़क पर कोई अंधेरा क्षेत्र (Dark Spot) न रहे। आमतौर पर लैंप की ऊंचाई खंभों के बीच की दूरी का 1/3 से 1/4 रखी जाती है।
  • लैंप के प्रकार: आजकल ऊर्जा की बचत के लिए मुख्य रूप से LED स्ट्रीट लाइट का उपयोग होता है। पुराने समय में सोडियम वेपर (पीली रोशनी) या मर्करी वेपर लैंप का उपयोग किया जाता था।

​टाइम स्विच (Time Switch)

​स्ट्रीट लाइटों को स्वचालित रूप से (Automatically) चालू और बंद करने के लिए टाइम स्विच या कंट्रोलर का उपयोग किया जाता है ताकि बिजली की बर्बादी न हो।

  1. मैकेनिकल / डिजिटल टाइम स्विच (Digital Time Switch): इसमें 24 घंटे की घड़ी होती है। इसमें समय सेट कर दिया जाता है (जैसे शाम 6:00 बजे ON और सुबह 5:30 बजे OFF)। यह समय के अनुसार रिले को चालू/बंद करता है।
  2. एस्ट्रोनॉमिकल टाइम स्विच (Astronomical Time Switch): यह भौगोलिक स्थिति (Latitude और Longitude) के आधार पर सूर्योदय और सूर्यास्त के सटीक समय की गणना खुद करता है और साल भर मौसम के बदलने के साथ अपने समय को स्वचालित रूप से बदल लेता है।
  3. फोटोइलेक्ट्रिक स्विच (LDR / Photocell): यह प्रकाश की तीव्रता पर काम करता है। जैसे ही शाम को अंधेरा होता है, सेंसर (Light Dependent Resistor - LDR) सर्किट को चालू कर देता है, और सुबह उजाला होते ही लाइट बंद कर देता है।




सहायक उपकरणों के लिए डीसी और एसी विद्युत आपूर्ति, यूनिट सहायक और स्टेशन सेवा बोर्डों की व्यवस्था, स्टेशन प्रकाश व्यवस्था
और स्वचालित परिवर्तन। स्टेशन बैटरियां और
चार्जिंग विधियां। स्टैंडबाय और आपातकालीन बिजली और
प्रकाश व्यवस्था।

पावर सबस्टेशनों और जनरेटिंग स्टेशनों (Power Stations) के सुचारू, सुरक्षित और निरंतर संचालन के लिए एक मजबूत और विश्वसनीय आंतरिक विद्युत आपूर्ति (Auxiliary Power Supply) प्रणाली का होना अनिवार्य है। इस व्यवस्था को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है: AC आपूर्ति और DC आपूर्ति

​1. AC और DC विद्युत आपूर्ति (AC and DC Auxiliary Supply)

​क. DC विद्युत आपूर्ति (DC Supply)

​सबस्टेशन में DC आपूर्ति को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह मुख्य पावर फेलियर (ब्लैकआउट) के दौरान भी चालू रहती है।

  • उपयोग: रिले प्रोटेक्शन सर्किट, सर्किट ब्रेकर के ट्रिप/क्लोज कॉइल्स, आपातकालीन लाइटिंग (Emergency Lighting), पीएलसीसी (PLCC) संचार प्रणाली, और इंटरलॉकिंग सर्किट के लिए।
  • वोल्टेज स्तर: आमतौर पर 110V DC या 220V DC (बड़े सबस्टेशनों में) और संचार के लिए 48V DC का उपयोग किया जाता है।

​ख. AC विद्युत आपूर्ति (AC Supply)

​यह सबस्टेशन के सामान्य यांत्रिक और सहायक कार्यों के लिए आवश्यक है।

  • उपयोग: ट्रांसफार्मर के कूलिंग फैन और ऑयल पंप, सर्किट ब्रेकर के स्प्रिंग चार्जिंग मोटर, बैटरी चार्जर, आइसोलेटर मोटर्स, और सामान्य स्टेशन प्रकाश (Station Lighting) व्यवस्था के लिए।
  • वोल्टेज स्तर: 3-फेज 415V AC और 1-फेज 240V AC, 50 { Hz}।

​2. यूनिट सहायक और स्टेशन सेवा बोर्ड (UAB & SSB) की व्यवस्था

​किसी बड़े पावर प्लांट या सबस्टेशन में AC सहायक बिजली को मुख्य रूप से दो प्रकार के बोर्डों में विभाजित किया जाता है:

​यूनिट सहायक बोर्ड (Unit Auxiliary Board - UAB)

  • ​यह सीधे किसी विशेष जनरेटर या ट्रांसफार्मर यूनिट से जुड़ा होता है।
  • ​यह केवल उस विशिष्ट यूनिट के लिए आवश्यक उपकरणों (जैसे उस यूनिट के कूलिंग पंप, वेंटिलेशन आदि) को बिजली देता है। यदि वह यूनिट बंद होती है, तो यह बोर्ड भी बंद हो जाता है।

​स्टेशन सेवा बोर्ड / स्टेशन सहायक बोर्ड (Station Service Board - SSB)

  • ​यह पूरे स्टेशन की सामान्य सेवाओं के लिए होता है जो किसी एक यूनिट पर निर्भर नहीं होतीं।
  • उपयोग: स्टेशन लाइटिंग, क्रेन, वेल्डिंग सॉकेट, वॉटर पंप हाउस, और बैटरी चार्जर को बिजली देना।
  • ​यह आमतौर पर दो अलग-अलग बाहरी ग्रिड स्रोतों (Station Transformers) से जुड़ा होता है ताकि उच्च विश्वसनीयता बनी रहे।

​3. स्वचालित परिवर्तन व्यवस्था (Automatic Changeover / ATS)

​सबस्टेशन में बिजली की निरंतरता बनाए रखने के लिए एक स्वचालित परिवर्तन स्विच (Automatic Transfer Switch - ATS) का उपयोग किया जाता है।


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कार्य सिद्धांत:

  • सामान्य स्थिति (Normal Condition): स्टेशन सर्विस बोर्ड (SSB) मुख्य ग्रिड स्रोत (Source 1) से बिजली लेता रहता है।
  • फाल्ट की स्थिति (Fault Condition): यदि मुख्य स्रोत में वोल्टेज अचानक गिर जाता है या बिजली चली जाती है, तो ATS का वोल्टेज सेंसिंग रिले इसे तुरंत पकड़ लेता है।
  • ​यह रिले मुख्य इनकमर सर्किट ब्रेकर को ट्रिप (OFF) करता है और कुछ ही मिलीसेकंड के भीतर दूसरे वैकल्पिक स्रोत (Source 2 या स्टैंडबाय डीजल जनरेटर) के ब्रेकर को स्वचालित रूप से बंद (ON) कर देता है।
  • ​इससे सबस्टेशन के महत्वपूर्ण उपकरणों की बिजली बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के तुरंत बहाल हो जाती है।

​4. स्टेशन बैटरियां और चार्जिंग विधियां (Station Batteries)

​चूंकि ग्रिड फेल होने पर भी रिले और सर्किट ब्रेकर को काम करना होता है, इसलिए सबस्टेशन में स्टेशन बैटरियों (Station Batteries) का बैकअप रखा जाता है। आमतौर पर इसके लिए लेड-एसिड (Lead-Acid) या निकेल-कैडमियम (Ni-Cd) बैटरियों के बैंक का उपयोग किया जाता है।

​चार्जिंग विधियाँ (Charging Methods)

​बैटरी बैंक को हमेशा चार्ज और कार्यशील स्थिति में रखने के लिए दोहरे मोड वाले चार्जर का उपयोग किया जाता है:

  1. फ्लोट चार्जिंग (Float Charging):
    • ​यह सामान्य संचालन के दौरान उपयोग होने वाली विधि है।
    • ​चार्जर को इस तरह सेट किया जाता है कि वह सबस्टेशन के निरंतर लगे रहने वाले DC लोड (जैसे इंडिकेशन लैंप, रिले) को सीधे बिजली देता रहता है, और साथ ही बैटरी को बहुत कम करंट पर पूरी तरह चार्ज (Trickle Charge) रखता है। इससे बैटरी की लाइफ बढ़ती है।
  2. बूस्ट चार्जिंग (Boost Charging):
    • ​जब कभी ग्रिड फेलियर के कारण बैटरी का उपयोग होता है और वह डिस्चार्ज हो जाती है, तब इस मोड का उपयोग किया जाता है।
    • ​इसमें बैटरी को कम समय में दोबारा पूरी तरह चार्ज करने के लिए उच्च वोल्टेज और अधिक करंट (High Current) दिया जाता है। एक बार फुल चार्ज होने पर चार्जर स्वचालित रूप से वापस फ्लोट मोड पर आ जाता है।

​5. स्टैंडबाय/आपातकालीन बिजली और स्टेशन प्रकाश व्यवस्था

​स्टैंडबाय और आपातकालीन बिजली (Standby / Emergency Power)

​जब सबस्टेशन में पूर्ण ब्लैकआउट (AC सप्लाई का पूरी तरह बंद होना) हो जाता है, तब आपातकालीन बिजली व्यवस्था काम में आती है:

  • डीजल जनरेटर (DG Set): इसे आपातकालीन AC बिजली के मुख्य स्टैंडबाय स्रोत के रूप में स्थापित किया जाता है। मुख्य बिजली कटने के 10 से 15 सेकंड के भीतर DG सेट स्वचालित रूप से चालू हो जाता है और ATS के माध्यम से आपातकालीन बसबार (Emergency Busbar) को बिजली देने लगता है।

​स्टेशन प्रकाश व्यवस्था (Station Lighting)

​सबस्टेशन की प्रकाश व्यवस्था को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है ताकि किसी भी परिस्थिति में अंधेरा न हो:


प्रकाश व्यवस्था का प्रकार

सामान्य स्थिति में स्रोत

आपातकालीन स्थिति में स्रोत (ब्लैकआउट)

सामान्य AC लाइटिंग

मुख्य ग्रिड (AC)

पूरी तरह बंद हो जाती है।

आपातकालीन AC लाइटिंग

मुख्य ग्रिड (AC)

डीजल जनरेटर (DG Set) चालू होने पर इसे दोबारा AC बिजली मिलती है।

आपातकालीन DC लाइटिंग

मुख्य ग्रिड (AC)

स्टेशन बैटरी बैंक (DC) से तुरंत और सीधे बिजली मिलती है (बिना किसी देरी के महत्वपूर्ण स्थानों जैसे कंट्रोल रूम में लाइट जल उठती है)।


यह त्रिकोणीय सुरक्षा घेरा यह सुनिश्चित करता है कि अत्यधिक गंभीर ग्रिड खराबी या आपातकाल के समय भी सबस्टेशन का कंट्रोल रूम पूरी तरह से सक्रिय और नियंत्रित रहे, जिससे ऑपरेटर स्थिति को संभाल सकें।




परीक्षण एवं मापन - उपकरण एवं मापन का कार्य सिद्धांत एवं आधार।
दबाव, प्रवाह, तापमान, स्तर,
संरेखण एवं धारा, वोल्टेज, शक्ति, प्रतिक्रियाशील शक्ति,
आवृत्ति, ऊर्जा, वाइंडिंग तापमान मापने वाले उपकरणों का विवरण।
स्वचालित नियंत्रक, रिकॉर्डर, इन्सुलेशन, परीक्षक, इनका उपयोग।
दोषों का प्राथमिक पता लगाना, डेटा अधिग्रहण प्रणाली,
डिजिटल वितरित नियंत्रण, यूपीएस आदि। विद्युत
और यांत्रिक उपकरणों का परीक्षण।

पावर प्लांट, सबस्टेशन और औद्योगिक संयंत्रों में प्रक्रियाओं को सुरक्षित, कुशल और नियंत्रित रखने के लिए विभिन्न विद्युत (Electrical) और यांत्रिक (Mechanical) मापदंडों का सटीक परीक्षण और मापन अनिवार्य है। नीचे इन उपकरणों के कार्य सिद्धांत, विवरण और उपयोग की विस्तृत जानकारी दी गई है:

​1. यांत्रिक मापदंडों का मापन (Mechanical Parameters Measurement)

​दबाव (Pressure)

  • उपकरण: बॉर्डन ट्यूब (Bourdon Tube), डायफ्राम (Diaphragm), पीजोइलेक्ट्रिक सेंसर।
  • कार्य सिद्धांत: जब किसी घुमावदार या सी-शेप की बॉर्डन ट्यूब में दबाव वाली गैस या तरल प्रवेश करता है, तो ट्यूब सीधी होने की कोशिश करती है। इस यांत्रिक गति को गियर और पॉइंटर की मदद से स्केल पर दबाव के रूप में मापा जाता है। डिजिटल प्रणालियों में, दबाव के कारण पैदा हुए तनाव (Strain) को स्ट्रेन गेज या पीजोइलेक्ट्रिक क्रिस्टल द्वारा विद्युत सिग्नल (4-20mA) में बदला जाता है।

​प्रवाह (Flow)

  • उपकरण: ओरिफिस प्लेट (Orifice Plate), वेंचुरी मीटर (Venturi Meter), इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फ्लोमीटर।
  • कार्य सिद्धांत: ओरिफिस और वेंचुरी मीटर बर्नौली के सिद्धांत (Bernoulli's Principle) पर काम करते हैं; ये पाइप के बीच में रुकावट पैदा कर के दबाव का अंतर (Differential Pressure) मापते हैं, जो प्रवाह दर के समानुपाती होता है। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फ्लोमीटर फैराडे के विद्युत चुंबकीय प्रेरण के नियम पर काम करता है, जहाँ बहता हुआ तरल (जो सुचालक हो) एक चुंबकीय क्षेत्र से गुजरते समय वोल्टेज पैदा करता है।

​तापमान (Temperature)

  • उपकरण: RTD (Pt 100), थर्मोकपल (Thermocouple), पाइरोमीटर।
  • कार्य सिद्धांत:
    • RTD: यह इस सिद्धांत पर काम करता है कि तापमान बढ़ने पर धातु (जैसे प्लैटिनम) का विद्युत प्रतिरोध बढ़ता है।
    • थर्मोकपल: यह सीबेक प्रभाव (Seebeck Effect) पर काम करता है, जहाँ दो अलग-अलग धातुओं के जोड़ों को अलग-अलग तापमान पर रखने पर उनके बीच एक छोटा वोल्टेज (mV) पैदा होता है।
    • पाइरोमीटर: यह बिना छुए दूर से ही वस्तु द्वारा उत्सर्जित इन्फ्रारेड विकिरण (Infrared Radiation) को मापकर उच्च तापमान बताता है।

​स्तर (Level)

  • उपकरण: फ्लोट टाइप गेज, अल्ट्रासोनिक और राडार लेवल सेंसर।
  • कार्य सिद्धांत: अल्ट्रासोनिक/राडार सेंसर टैंक के ऊपर से तरंगें (Waves) नीचे भेजते हैं। यह तरंगें तरल की सतह से टकराकर वापस आती हैं। तरंग के आने-जाने में लगे समय (Time of Flight) के आधार पर स्तर की गणना की जाती है।

संरेखण (Alignment)

  • उपकरण: डायल गेज (Dial Gauge), लेजर एलाइनमेंट टूल।
  • कार्य सिद्धांत: मोटर और पंप जैसी घूमने वाली मशीनों के शाफ्ट के बीच की सीध (Alignment) जांचने के लिए इसका उपयोग होता है। लेजर टूल दोनों शाफ्टों पर लेजर बीम भेजकर उनके बीच के सूक्ष्म कोणीय (Angular) और समानांतर (Parallel) विचलन को सटीक रूप से मापता है।

​2. विद्युत मापदंडों का मापन (Electrical Parameters Measurement)

​धारा (Current) और वोल्टेज (Voltage)

  • उपकरण: एमीटर (Ameter), वोल्टमीटर (Voltmeter), करंट ट्रांसफार्मर (CT), पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (PT)।
  • कार्य सिद्धांत: कम रेंज के लिए मूविंग आयरन (MI) या परमानेंट मैग्नेट मूविंग कॉयल (PMMC) उपकरणों का उपयोग होता है जो चुंबकीय बल के सिद्धांत पर काम करते हैं। उच्च वोल्टेज लाइनों में, CT (धारा को घटाने के लिए) और PT (वोल्टेज को घटाने के लिए) का उपयोग करके सुरक्षित रूप से मापन किया जाता है।

शक्ति (Active Power) और प्रतिक्रियाशील शक्ति (Reactive Power)

  • उपकरण: वाटमीटर (Wattmeter) और VAR-मीटर।
  • कार्य सिद्धांत: ये इलेक्ट्रोडायनामोमीटर सिद्धांत पर काम करते हैं। इसमें दो कॉयल होती हैं—एक फिक्स्ड कॉयल (करंट कॉयल) और एक मूविंग कॉयल (पोटेंशियल कॉयल)। दोनों के चुंबकीय क्षेत्रों की पारस्परिक क्रिया से पॉइंटर घूमता है, जो वास्तविक शक्ति (P = VI cos phi) या प्रतिक्रियाशील शक्ति (Q = VI sin phi) दर्शाता है।

​आवृत्ति (Frequency)

  • उपकरण: डिजिटल फ्रीक्वेंसी मीटर, रेजोनेंट रीड फ्रीक्वेंसी मीटर।
  • कार्य सिद्धांत: डिजिटल मीटर एक निश्चित समय अंतराल (जैसे 1 सेकंड) में वोल्टेज वेव के शून्य को पार करने (Zero Crossing) की संख्या को गिनकर आवृत्ति (Hz) की गणना करता है।

​ऊर्जा (Energy)

  • उपकरण: एनर्जी मीटर (kWh Meter)।
  • कार्य सिद्धांत: आधुनिक डिजिटल एनर्जी मीटर सॉलिड-स्टेट इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और माइक्रोप्रोसेसर का उपयोग करते हैं। ये लगातार वोल्टेज और करंट के तात्कालिक मानों को गुणा (Multiply) करके समय के साथ उसका एकीकरण (Integration) करते हैं, जिससे खपत की गई कुल ऊर्जा (यूनिट) निकलती है।

​वाइंडिंग तापमान (Winding Temperature Instrument - WTI)

  • उपकरण: थर्मामीटर पॉकेट के साथ RTD या कैपिलरी ट्यूब।
  • कार्य सिद्धांत: ट्रांसफार्मर जैसी मशीनों में, यह ट्रांसफार्मर के तेल के तापमान (Top Oil Temperature) को मापता है और साथ ही CT के माध्यम से आ रहे लोड करंट के अनुपात में एक हीटिंग एलिमेंट द्वारा अतिरिक्त तापमान जोड़ता है। यह वाइंडिंग के आंतरिक सबसे गर्म हिस्से (Hot Spot) के तापमान का सटीक अनुमान देता है।

​3. स्वचालन, नियंत्रण और रिकॉर्डिंग उपकरण (Automation & Control)

​स्वचालित नियंत्रक (Automatic Controllers - PID)

  • उपयोग: यह सेटपॉइंट और वास्तविक मान के बीच के अंतर (Error) को लगातार मापता है और Proportional (P), Integral (I), और Derivative (D) गणनाओं के आधार पर कंट्रोल वाल्व या मोटर की गति को स्वचालित रूप से बदलता है ताकि प्रक्रिया स्थिर रहे।

​रिकॉर्डर (Recorders)

  • उपयोग: पहले चार्ट पेपर पर स्याही वाले पेन से डेटा रिकॉर्ड होता था, लेकिन अब डिजिटल डेटा लॉगर (Data Loggers) का उपयोग होता है जो कंप्यूटर मेमोरी में समय के साथ तापमान, दबाव और करंट का ग्राफ और रिकॉर्ड सुरक्षित रखते हैं।

​इन्सुलेशन परीक्षक (Insulation Tester - Megger)

  • उपयोग: यह उच्च वोल्टेज (500 {V} से 5000 {V} या अधिक) उत्पन्न करके मोटरों, केबलों और ट्रांसफार्मर के इंसुलेशन प्रतिरोध (मेगा-ओह्म में) को मापता है ताकि यह पता चल सके कि इंसुलेशन कमजोर या डैमेज तो नहीं है।

​4. नियंत्रण प्रणालियाँ और आधुनिक प्रणालियाँ

​डेटा अधिग्रहण प्रणाली (Data Acquisition System - DAS)

​यह विभिन्न सेंसरों से आ रहे एनालॉग सिग्नलों (जैसे तापमान, दबाव) को कलेक्ट करती है, उन्हें डिजिटल सिग्नल में बदलती है (ADC - Analog to Digital Converter) और विश्लेषण के लिए कंप्यूटर स्क्रीन पर प्रदर्शित करती है।

​डिजिटल वितरित नियंत्रण (Distributed Control System - DCS)

​यह पूरे प्लांट (जैसे पावर प्लांट) को नियंत्रित करने वाली एक कंप्यूटर प्रणाली है। इसमें नियंत्रण का काम किसी एक केंद्रीय कंप्यूटर के बजाय पूरे प्लांट में फैले कई छोटे-छोटे नियंत्रकों (Controllers) में 'वितरित' (Distributed) होता है। यदि एक हिस्सा फेल भी हो जाए, तो बाकी प्लांट चलता रहता है।

​यूपीएस (Uninterruptible Power Supply - UPS)

  • उपयोग: नियंत्रण कक्ष के कंप्यूटरों, DCS, और सुरक्षा प्रणालियों को बिना किसी रुकावट के बिजली देने के लिए। ग्रिड फेल होने पर यह बैटरी बैंक की DC बिजली को इन्वर्टर के जरिए तुरंत शुद्ध AC बिजली में बदलकर नाजुक उपकरणों को बंद होने से बचाता है।

​5. दोषों का प्राथमिक पता लगाना और परीक्षण (Fault Detection & Testing)

​दोषों का प्राथमिक पता लगाना (Primary Fault Detection)

  • विद्युत दोष: शॉर्ट सर्किट, अर्थ फॉल्ट या ओपन सर्किट होने पर प्रोटेक्शन रिले (Relays) वोल्टेज और करंट की विसंगति को भांप लेते हैं और सर्किट ब्रेकर को ट्रिपिंग सिग्नल भेजते हैं।
  • यांत्रिक दोष: मशीनों में अत्यधिक आवाज या कंपन होने पर कंपन विश्लेषक (Vibration Analyzer) का उपयोग करके बेयरिंग की खराबी या शाफ्ट के असंतुलन का प्राथमिक स्तर पर पता लगाया जाता है।

​विद्युत और यांत्रिक उपकरणों का परीक्षण (Testing of Equipment)

  1. रूटीन और प्री-कमिशनिंग टेस्ट: किसी भी उपकरण को चार्ज करने से पहले उसके इंसुलेशन (Megger Test), निरंतरता (Continuity) और अर्थिंग रेजिस्टेंस की जांच की जाती है।
  2. ट्रांसफार्मर टेस्ट: इसके तेल की डाई-इलेक्ट्रिक स्ट्रेंथ (BDV Test), वाइंडिंग रेजिस्टेंस और टर्न रेश्यो (Turn Ratio) टेस्ट किया जाता है।
  3. मोटर नो-लोड और लोड टेस्ट: मोटर के चालू होने पर उसके करंट, आरपीएम (RPM), तापमान वृद्धि और कंपन स्तर को मापा जाता है ताकि उसकी यांत्रिक और विद्युत सुदृढ़ता सुनिश्चित की जा सके।




नियंत्रण और सुरक्षा - अनुक्रमिक संचालन और
इंटरलॉक, सामान्य मशीन चालू/बंद करना, संचालन का क्रम

औद्योगिक स्वचालन (Industrial Automation), पावर प्लांट और सबस्टेशनों में मशीनों को सुरक्षित और सही तरीके से संचालित करने के लिए अनुक्रमिक संचालन (Sequential Operation) और इंटरलॉक (Interlocks) का उपयोग किया जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य मानवीय भूलों को रोकना, उपकरणों को नुकसान से बचाना और ऑपरेटरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

​नीचे इसके सिद्धांतों, कार्यप्रणाली और संचालन के क्रम का विस्तृत विवरण दिया गया है:

​1. अनुक्रमिक संचालन (Sequential Operation)

​अनुक्रमिक संचालन का अर्थ है कि किसी भी प्रणाली या मशीनरी को एक निश्चित और पूर्व-निर्धारित क्रम (Step-by-Step Sequence) में ही चालू या बंद किया जाना चाहिए। यदि इस क्रम का पालन नहीं किया जाता, तो सिस्टम चालू नहीं होगा या दुर्घटना हो सकती है।

​उदाहरण: थर्मल पावर प्लांट में बॉयलर और टरबाइन चालू करना

​आप सीधे टरबाइन में भाप (Steam) नहीं भेज सकते। इसके लिए एक निश्चित अनुक्रम होता है:

  1. ​पहले वाटर पंप चालू करके बॉयलर में पानी भरा जाता है।
  2. ​फिर ड्राफ्ट फैन (ID/FD Fans) चालू करके वेंटिलेशन सुनिश्चित किया जाता है।
  3. ​इसके बाद बॉयलर में आग (Ignition) जलाई जाती है।
  4. ​जब भाप का दबाव और तापमान तय स्तर पर पहुँच जाता है, तब ही टरबाइन के वाल्व खोले जाते हैं।

​2. इंटरलॉक और उनके प्रकार (Interlocks and Their Types)

​इन्टरलॉक एक प्रकार का सुरक्षा तंत्र (Safety Mechanism) है जो दो या दो से अधिक उपकरणों की स्थिति (Status) को आपस में जोड़ता है। यह सुनिश्चित करता है कि जब तक 'स्थिति A' सुरक्षित नहीं होगी, तब तक 'स्थिति B' को संचालित नहीं किया जा सकता।

​इंटरलाकिंग मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

​क. इलेक्ट्रिकल इंटरलॉक (Electrical Interlock)

​यह सर्किट ब्रेकर, कॉन्टैक्टर (Contactors) और रिले के सहायक संपर्कों (Auxiliary Contacts - NO/NC) का उपयोग करके बनाया जाता है।

  • उदाहरण (मोटर की दिशा बदलना): एक मोटर को फॉरवर्ड (Forward) और रिवर्स (Reverse) दोनों दिशाओं में चलाने के लिए दो अलग कॉन्टैक्टर होते हैं। यहाँ इलेक्ट्रिकल इंटरलॉकिंग की जाती है ताकि अगर फॉरवर्ड कॉन्टैक्टर ऑन (ON) हो, तो रिवर्स कॉन्टैक्टर किसी भी स्थिति में ऑन न हो सके (अन्यथा फेज-टू-फेज शॉर्ट सर्किट हो जाएगा)।

​ख. मैकेनिकल इंटरलॉक (Mechanical Interlock)

​इसमें दो उपकरणों के बीच भौतिक रूप से लीवर, गियर या चाबियों (जैसे कैसल की - Castle Key) का उपयोग किया जाता है।

  • उदाहरण (सबस्टेशन में): एक आइसोलेटर (Isolator) और एक अर्थ स्विच (Earth Switch) के बीच मैकेनिकल इंटरलॉक होता है। जब तक आइसोलेटर पूरी तरह से खुल (Open) नहीं जाता, तब तक अर्थ स्विच का हैंडल अपनी जगह से हिलेगा भी नहीं और उसे बंद (Close) नहीं किया जा सकता।

​3. सामान्य मशीन चालू/बंद करना (General Machine Start/Stop Control)

​मशीनों को सुरक्षित रूप से चालू और बंद करने के लिए आमतौर पर लैचिंग सर्किट (Latching Circuit) का उपयोग किया जाता है, जिसे 'स्टार्ट/स्टॉप लॉजिक' भी कहते हैं। इसे आज के समय में PLC (Programmable Logic Controller) प्रोग्रामिंग या पारंपरिक रिले लॉजिक से नियंत्रित किया जाता है।

​चालू (Start) करने का लॉजिक:

  1. सुरक्षा शर्तें (Permissives): मशीन चालू करने से पहले सिस्टम जांचता है कि—क्या आपातकालीन स्टॉप (Emergency Stop) खुला है? क्या लुब्रिकेशन ऑयल का दबाव ठीक है? क्या तापमान सामान्य है? यदि सभी शर्तें 'हाँ' हैं, तभी स्टार्ट कमांड काम करेगी।
  2. स्टार्ट बटन (NO - Normally Open): जब ऑपरेटर स्टार्ट बटन दबाता है, तो कंट्रोल कॉयल में बिजली जाती है और मशीन चालू हो जाती है। बटन छोड़ देने के बाद भी एक सहायक कांटेक्ट (Auxiliary Contact) के जरिए बिजली का रास्ता चालू रहता है, जिसे होल्डिंग या लैचिंग (Latching) कहते हैं।

​बंद (Stop) करने का लॉजिक:

  • स्टॉप बटन (NC - Normally Closed): यह बटन हमेशा सर्किट को बंद रखता है। जैसे ही इसे दबाया जाता है, सर्किट टूट जाता है (Open Circuit), लैचिंग खत्म हो जाती है और मशीन तुरंत बंद हो जाती है।

​4. संचालन का क्रम (Sequence of Operation)

​किसी भी औद्योगिक संयंत्र में संचालन के क्रम को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया जाता है:

[प्री-चेक / परमिसिव्स] ──> [स्टार्ट अनुक्रम (Step-by-Step)] ──> [रनिंग और शटडाउन सुरक्षा]


चरण 1: प्री-चेक और परमिसिव्स (Pre-checks & Permissives)

​यह मशीन चालू करने से ठीक पहले की स्वचालित या मैन्युअल जांच है।

  • ​सभी सुरक्षा गार्ड अपनी जगह पर होने चाहिए।
  • ​सप्लाई वोल्टेज सीमा के भीतर होना चाहिए।
  • ​ओवरलोड रिले (Overload Relay) रीसेट स्थिति में होनी चाहिए।

​चरण 2: स्टार्ट अनुक्रम (Start Sequence)

​मशीनरी को हमेशा 'लो-लोड' से 'हाई-लोड' या 'सपोर्टिंग सिस्टम' से 'मेन सिस्टम' के क्रम में चालू किया जाता है।

  • स्टेप 1: सहायक उपकरण (Auxiliary Systems) जैसे कूलिंग फैन, ऑयल पंप चालू करें।
  • स्टेप 2: सेंसर से फीडबैक लें कि ऑयल प्रेशर और कूलिंग फ्लो सही है।
  • स्टेप 3: मुख्य मोटर या मशीन (Main Drive) को चालू करें।
  • स्टेप 4: धीरे-धीरे मशीन पर लोड (जैसे कन्वेयर बेल्ट पर माल या पंप का वाल्व खोलना) बढ़ाएं।

​चरण 3: सामान्य और आपातकालीन शटडाउन (Shutdown Sequence)

  • सामान्य शटडाउन (Normal Stop): पहले मुख्य लोड को हटाया जाता है, फिर मुख्य मशीन बंद की जाती है, और अंत में कूलिंग या लुब्रिकेशन सिस्टम को कुछ समय बाद बंद किया जाता है ताकि मशीन की गर्मी धीरे-धीरे निकल सके।
  • आपातकालीन शटडाउन (Emergency Stop): इसमें इंटरलॉक इस तरह काम करता है कि इमरजेंसी बटन दबाते ही बिना किसी अनुक्रम के, मुख्य और सहायक सभी प्रणालियों की बिजली तुरंत कट जाती है ताकि किसी बड़े नुकसान या मानवीय क्षति को रोका जा सके।




वायरिंग - आवासीय परिसरों में प्रकाश और बिजली के विभिन्न प्रकार के इंस्टॉलेशन के लिए वायरिंग लेआउट, आवश्यक स्विचगियर, सामग्री का अनुमान और विभिन्न प्रकार के इंस्टॉलेशन की लागत।

अस्थायी इंस्टॉलेशन और पोर्टेबल उपकरणों की वायरिंग।

आवासीय परिसरों (Residential Buildings) में बिजली की वायरिंग का डिज़ाइन सुरक्षा, स्थायित्व और लोड की आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया जाता है। एक सुरक्षित और कुशल वायरिंग प्रणाली के लिए लेआउट, आवश्यक उपकरण और लागत का सही अनुमान होना जरूरी है।

​1. वायरिंग लेआउट और प्रकार (Wiring Layout & Types)

​आवासीय परिसरों में मुख्य रूप से दो प्रकार की वायरिंग प्रणालियों का उपयोग किया जाता है:

  • कंसील्ड कंडक्ट वायरिंग (Concealed Conduit Wiring): इसमें पीवीसी (PVC) पाइपों को दीवारों के प्लास्टर के अंदर छुपाकर डाला जाता है। यह आजकल सबसे लोकप्रिय है क्योंकि यह दिखने में सुंदर और पूरी तरह सुरक्षित होती है।
  • सरफेस कंडक्ट वायरिंग (Surface Conduit Wiring): इसमें पाइप दीवारों के ऊपर स्थापित किए जाते हैं। इसका उपयोग अस्थायी निर्माण या गैरेज/दुकानों में किया जाता है।

​लेआउट के सामान्य सिद्धांत:

  1. लाइटिंग सर्किट (Light Circuit): पंखे, बल्ब और 5A के सॉकेट के लिए अलग सर्किट होता है। एक सर्किट पर अधिकतम 800 वॉट (W) का लोड या 10 पॉइंट्स से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
  2. पावर सर्किट (Power Circuit): गीजर, एसी, फ्रिज और वाशिंग मशीन जैसे भारी उपकरणों (15A/16A सॉकेट) के लिए अलग सर्किट होता है। एक पावर सर्किट पर अधिकतम लोड 3000 वॉट (W) या अधिकतम 2 पॉइंट्स होने चाहिए।

​2. आवश्यक स्विचगियर और सामग्री (Required Switchgear & Materials)

​सुरक्षा और बिजली नियंत्रण के लिए मुख्य बिजली बोर्ड (Main Distribution Board) से लेकर कमरों के स्विच बोर्ड तक निम्नलिखित घटकों की आवश्यकता होती है:

  • MCB (Miniature Circuit Breaker): यह ओवरलोड (Overload) और शॉर्ट सर्किट से बचाता है। लाइटिंग के लिए 6A–10A और पावर के लिए 16A–32A की MCB लगती है।
  • RCCB / ELCD (Residual Current Circuit Breaker): यह करंट लीक होने या किसी व्यक्ति को करंट लगने (Shock) पर पूरी बिजली को मात्र 30 मिलीसेकंड में ट्रिप कर देता है। घर की सुरक्षा के लिए 30mA संवेदनशीलता वाली RCCB अनिवार्य है।
  • ऊर्जा मीटर (Energy Meter): मुख्य बिजली की खपत मापने के लिए।
  • सामग्री: आईएसआई (ISI) मार्क वाले फायर रिटार्डेंट (FR) कॉपर वायर, पीवीसी हैवी-ड्यूटी पाइप, कंक्रीट बॉक्स, मॉड्युलर स्विच और सॉकेट।

​3. सामग्री का अनुमान और लागत (Estimation and Costing)

​एक मानक 2 BHK (लगभग 1000 वर्ग फुट) के घर के लिए वायरिंग का एक अनुमानित खाका (Estimation) नीचे तालिका में दिया गया है:

​आवश्यक सामग्री का अनुमान:

सामग्री का विवरण

विशिष्टता (Specification)

अनुमानित मात्रा

पीवीसी कंडक्ट पाइप

25 mm (हैवी ड्यूटी)

60–80 मीटर

लाइटिंग वायर (कॉपर)

1.5 sq. mm (फेज और न्यूट्रल)

3–4 कॉइल (90m प्रत्येक)

पावर वायर (कॉपर)

4.0 sq. mm (एसी/गीजर के लिए)

2 कॉइल

अर्थिंग वायर (कॉपर)

1.0 sq. mm (हरे रंग का)

2 कॉइल

मुख्य वितरण बोर्ड (MDB)

8-वे (Double Door)

1 नग

RCCB

40A, 30mA (Double Pole)

1 नग

MCB

10A (4 नग), 16A/20A (4 नग)

8 नग

मॉड्युलर स्विच और सॉकेट

6A स्विच, 6A सॉकेट, 16A कॉम्बो

आवश्यकतानुसार (लगभग 40–50 कुल)

अर्थिंग किट

कॉपर/जीआई रॉड और चारकोल/नमक

1 सेट


विभिन्न प्रकार के इंस्टॉलेशन की लागत (अनुमानित):

  • किफायती/सामान्य वायरिंग: ₹100 से ₹150 प्रति पॉइंट (श्रम लागत) + सामग्री। कुल खर्च लगभग ₹40,000 – ₹60,000 (2 BHK के लिए)।
  • प्रीमियम मॉड्युलर वायरिंग: ₹200 से ₹300 प्रति पॉइंट (श्रम लागत) + प्रीमियम ऑटोमेशन/स्विच। कुल खर्च ₹90,000 से ₹1,50,000 तक जा सकता है।

​4. अस्थायी इंस्टॉलेशन और पोर्टेबल उपकरण (Temporary & Portable Wiring)

​धार्मिक आयोजनों, शादियों, निर्माण स्थलों (Construction Sites) या प्रदर्शनियों में अस्थायी वायरिंग का उपयोग किया जाता है। इसकी सुरक्षा के नियम सामान्य वायरिंग से अधिक सख्त होने चाहिए क्योंकि इनके क्षतिग्रस्त होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

अस्थायी इंस्टॉलेशन के सिद्धांत:

  1. केबल का चयन: लचीली और मजबूत इंसुलेशन वाली टीआरएस (TRS) या पीवीसी शीथेड केबल्स का ही उपयोग करना चाहिए। तारों में बीच में कहीं भी खुला जोड़ (Open Joint) नहीं होना चाहिए।
  2. ऊंचाई और सुरक्षा: तारों को जमीन पर खुला नहीं छोड़ना चाहिए। इन्हें इंसुलेटर की मदद से कम से कम 3 मीटर की ऊंचाई पर लकड़ी के खंभों के सहारे ले जाना चाहिए।
  3. अनिवार्य RCCB: अस्थायी पैनलों में RCCB का होना बेहद जरूरी है क्योंकि गीली जमीन या खुले तारों के कारण करंट फैलने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

​पोर्टेबल उपकरणों की वायरिंग (Portable Equipment Wiring):

​पोर्टेबल उपकरण जैसे—हाथ की ड्रिल मशीन, ग्राइंडर, पोर्टेबल वेल्डिंग मशीन या टेबल फैन:

  • थ्री-कोर फ्लेक्सिबल कॉर्ड (3-Core Cable): इन उपकरणों में हमेशा तीन तारों वाला (फेज, न्यूट्रल और अर्थ) लचीला तार होना चाहिए।
  • मेटल बॉडी की अर्थिंग: उपकरण का जो हिस्सा धातु (Metal) का है, वह प्लग के मोटे अर्थिंग पिन से सीधे जुड़ा होना चाहिए। आजकल डबल-इंसुलेटेड (Double Insulated - Class II) उपकरण भी आते हैं, जिनमें प्लास्टिक बॉडी होने के कारण अर्थिंग पिन की आवश्यकता नहीं होती (इन पर square का चिन्ह होता है)।
  • प्लग टॉप: कभी भी सॉकेट के अंदर नंगे तार सीधे नहीं डालने चाहिए; हमेशा उपयुक्त रेटिंग (5A या 15A) के प्लग टॉप का उपयोग करना चाहिए।




सर्किट आरेख - विभिन्न सर्किटों के विद्युत कनेक्शन (i) 
घर की वायरिंग, जिसमें मुख्य और उप-वितरण बोर्ड, 
स्विच और कटआउट आदि शामिल हैं।

घर की वायरिंग (House Wiring) का सर्किट आरेख (Circuit Diagram) बिजली के सुरक्षित और सुव्यवस्थित प्रवाह को दर्शाता है। इसमें बिजली खंभे से लेकर घर के कमरों के स्विच बोर्ड तक करंट कैसे पहुँचता है, इसका पूरा अनुक्रम होता है।

​नीचे संपूर्ण घरेलू वायरिंग के कनेक्शन का चरण-दर-चरण विवरण और उसका सर्किट आरेख का लेआउट दिया गया है:

​1. घर की वायरिंग का संचालन अनुक्रम (Sequence of Connections)

​बिजली का प्रवाह हमेशा निम्नलिखित क्रम में होता है:

{Service Pole} => {Energy Meter} => {Main Cutout/MCB} => {MDB} => {SDB} => {Switch Board}

2. सर्किट आरेख का योजनाबद्ध लेआउट (Schematic Layout)

​एक मानक और सुरक्षित घरेलू वायरिंग का कनेक्शन आरेख नीचे दिए गए विवरण के अनुसार काम करता है:

​क. इनकमिंग ब्लॉक (Incomer Section)

  1. सर्विस पोल (Service Pole): यहाँ से सिंगल फेज के लिए दो तार—फेज (Phase - लाल/ब्राउन) और न्यूट्रल (Neutral - काला/नीला) घर में आते हैं।
  2. ऊर्जा मीटर (Energy Meter): पोल के दोनों तार सबसे पहले बिजली बोर्ड के एनर्जी मीटर के इनकमिंग टर्मिनलों (1 और 2) से जुड़ते हैं। मीटर के आउटगोइंग टर्मिनलों (3 और 4) से फेज और न्यूट्रल बाहर निकलते हैं।
  3. मुख्य कटआउट / मेन फ्यूज (Main Cutout / Fuse): सुरक्षा के लिए मीटर के तुरंत बाद फेज तार में एक हैवी-ड्यूटी कटआउट (किट-कैट फ्यूज) या DP MCB (Double Pole MCB) लगाया जाता है, जो पूरे घर की बिजली को एक साथ काटने का काम करता है।

​ख. मुख्य वितरण बोर्ड (Main Distribution Board - MDB)

​मेन कटआउट से निकलने के बाद तार मुख्य वितरण बोर्ड (MDB) में जाते हैं जहाँ निम्नलिखित उपकरण क्रम से जुड़े होते हैं:

  • RCCB / ELCB: फेज और न्यूट्रल सबसे पहले RCCB (Residual Current Circuit Breaker) में जाते हैं। यह करंट लीक होने या किसी को झटका लगने पर तुरंत ट्रिप होती है।
  • बसबार (Busbar): RCCB से निकलने के बाद फेज तार को एक धात्विक पट्टी (Phase Busbar) से जोड़ दिया जाता है, जिससे कई उप-सर्किट के लिए बिजली बांटी जा सके। न्यूट्रल को न्यूट्रल लिंक (Neutral Link) से जोड़ा जाता है।

​ग. उप-वितरण बोर्ड (Sub-Distribution Board - SDB)

​बड़े घरों या बहुमंजिला इमारतों में हर मंजिल या अलग हिस्से (जैसे किचन, बेडरूम) के लिए एक SDB होता है।

  • ​MDB की बसबार से एक-एक तार निकलकर SDB की अलग-अलग SP MCB (Single Pole MCB) में जाता है।
  • ​प्रत्येक कमरे के लिए एक समर्पित MCB (जैसे लाइटिंग के लिए 6A-10A और पावर के लिए 16A) लगाई जाती है।

​घ. कमरे का स्विच बोर्ड (Switch Board Connections)

​SDB की किसी एक MCB से निकला फेज तार सीधे कमरे के स्विच बोर्ड में पहुँचता है। स्विच बोर्ड के अंदर का कनेक्शन इस प्रकार होता है:

  1. फेज (Phase) का कनेक्शन: कमरे में आने वाला फेज तार स्विच बोर्ड में लगे सभी स्विचों के नीचे वाले टर्मिनल से लूप (Connect) कर दिया जाता है।
  2. उपकरणों (Load) का कनेक्शन:
    • बल्ब/पंखा: स्विच के ऊपर वाले टर्मिनल से एक हाफ-वायर (Half-wire) निकलकर सीधे बल्ब या रेगुलेटर के जरिए पंखे के एक पॉइंट से जुड़ती है।
    • सॉकेट: एक स्विच के ऊपर वाले टर्मिनल से तार निकलकर पास के 3-पिन सॉकेट के 'L' (Live) वाले हिस्से से जुड़ती है।
  3. न्यूट्रल (Neutral) का कनेक्शन: न्यूट्रल तार स्विचों में नहीं जाता। यह सीधे सॉकेट के 'N' (Neutral) टर्मिनल से जुड़ता है और यहीं से कॉमन होकर सीधे बल्ब और पंखे के दूसरे टर्मिनल तक पहुँचता है।
  4. अर्थिंग (Earthing - हरा तार): यह सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण तार है। यह सीधे जमीन (Earth Pit) से आता है और स्विच बोर्ड में लगे 3-पिन सॉकेट के सबसे ऊपर वाले मोटे पिन (Earth Terminal) से जुड़ता है।

​3. सर्किट की मुख्य सुरक्षा शर्तें (Crucial Safety Rules)

  • स्विच हमेशा फेज पर: नियम के अनुसार, स्विच को हमेशा फेज (Phase) तार पर ही लगाया जाना चाहिए, न्यूट्रल पर कभी नहीं। यदि स्विच न्यूट्रल पर होगा, तो स्विच बंद होने के बाद भी उपकरण में करंट मौजूद रहेगा, जो जानलेवा हो सकता है।
  • फ्यूज और कटआउट: इन्हें हमेशा फेज तार के सीरीज (Series) में जोड़ा जाता है ताकि शॉर्ट सर्किट होने पर ये पिघलकर सर्किट को तोड़ सकें।
  • कलर कोडिंग का पालन: वायरिंग करते समय फेज के लिए लाल/ब्राउन, न्यूट्रल के लिए काला/नीला और अर्थिंग के लिए हमेशा हरे/पीले रंग के आईएसआई (ISI) मार्क वाले तारों का ही उपयोग करना चाहिए।




घरेलू उपकरण - हीटर, कुकर, रेफ्रिजरेटर और अन्य घरेलू उपकरणों की स्थापना और रखरखाव।
इलेक्ट्रिक घंटियाँ और
सूचक। पंप और इलेक्ट्रिक लिफ्ट के लिए छोटे मोटर।

घरेलू उपकरणों (Domestic Appliances) का सही संस्थापन (Installation) और नियमित रखरखाव (Maintenance) न केवल उनकी कार्यक्षमता और उम्र बढ़ाता है, बल्कि बिजली की बचत और सुरक्षा के लिए भी बेहद जरूरी है। नीचे मुख्य घरेलू उपकरणों, घंटी प्रणालियों और घरेलू मोटरों की स्थापना, रखरखाव व उनके सिद्धांतों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

​1. हीटिंग उपकरण (Heaters & Cookers)

​ये उपकरण मुख्य रूप से जूल के हीटिंग प्रभाव (H = I^2Rt) पर काम करते हैं, जहाँ उच्च प्रतिरोध (High Resistance) वाले नाइक्रोम (Nichrome) तत्व से धारा प्रवाहित होने पर गर्मी पैदा होती है।

​क. इलेक्ट्रिक हीटर और गीजर (Heaters & Geysers)

  • संस्थापन (Installation):
    • ​गीजर और रूम हीटर भारी लोड वाले उपकरण हैं, इसलिए इन्हें हमेशा 16A के पावर सॉकेट से ही जोड़ना चाहिए।
    • ​गीजर में वाटर इनलेट (Inlet) और आउटलेट (Outlet) पाइप के कनेक्शन को वाटर-प्रूफ टेप से अच्छी तरह कसना चाहिए। गीजर में सेफ्टी वाल्व (Safety Valve) लगाना अनिवार्य है ताकि अत्यधिक दबाव होने पर वह फट न जाए।
    • अनिवार्य शर्त: उपकरण की मेटल बॉडी को मुख्य डिस्ट्रीब्यूशन बोर्ड के अर्थिंग (Earthing) तार से मजबूती से जोड़ा जाना चाहिए।
  • रखराव (Maintenance):
    • ​सर्दियों के बाद गीजर के अंदर जमे कड़े पानी के स्केल्स (Scale/Sedimentation) को साफ करें, अन्यथा हीटिंग एलिमेंट जल्दी जल जाएगा।
    • ​थर्मोस्टेट (Thermostat) की जांच करें कि वह तय तापमान (आमतौर पर 60^circ {C}) पर पहुँचने के बाद बिजली काट रहा है या नहीं।

​ख. इलेक्ट्रिक कुकर / इंडक्शन चूल्हा (Induction Cooker)

  • संस्थापन: इसे समतल और सूखी सतह पर रखें। इसके पीछे या नीचे बने वेंटिलेशन फैन (Cooling Fan) के रास्ते में रुकावट नहीं होनी चाहिए।
  • रखराव: इसके ग्लास टॉप को केवल नम कपड़े से साफ करें। भारी बर्तन को इस पर झटके से न रखें।

​2. रेफ्रिजरेटर (Refrigerator / Fridge)

​रेफ्रिजरेटर वाष्प संपीड़न प्रशीतन चक्र (Vapour Compression Refrigeration Cycle) पर काम करता है, जिसमें कंप्रेसर, कंडेनसर, इवेपोरेटर और रेफ्रिजरेंट गैस शामिल होते हैं।


https://dkrajwar.blogspot.com/2026/05/iii_01507247364.html

  •  संस्थापन (Installation):
    • ​फ्रिज को दीवार से कम से कम 10 से 15 सेमी दूर रखें ताकि कंडेनसर कॉइल्स से गर्मी आसानी से बाहर निकल सके।
    • ​इसे सीधे धूप या चूल्हे के पास न रखें।
    • ​सुनिश्चित करें कि फ्रिज का स्तर (Level) सही हो ताकि उसका दरवाजा अपने आप ठीक से बंद हो सके।
  • रखराव (Maintenance):
    • ​फ्रिज के पीछे लगी कंडेनसर जाली (Coils) पर जमी धूल को साल में दो बार साफ करें। धूल जमा होने पर कंप्रेसर पर लोड बढ़ता है और बिजली की खपत ज्यादा होती है।
    • ​दरवाजे की रबड़ की पट्टी (Gasket) की जांच करें। यदि यह ढीली होगी, तो ठंडी हवा बाहर निकलेगी और फ्रिज कूलिंग नहीं करेगा।
    • ​फ्रीजर में अत्यधिक बर्फ जमने पर उसे नियमित रूप से डिफ्रॉस्ट (Defrost) करें।

​3. इलेक्ट्रिक घंटियाँ और सूचक (Electric Bells & Indicators)

इलेक्ट्रिक घंटी (Electric Bell)

​यह विद्युत चुंबकीय प्रभाव (Electromagnetism) के सिद्धांत पर काम करती है।



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  • कार्य प्रणाली: जब कोई बाहर से बेल स्विच दबाता है, तो सर्किट पूरा होता है और घंटी के अंदर लगे इलेक्ट्रोमैग्नेट (Electromagnet) में चुंबकीय क्षेत्र बनता है। यह चुम्बक आर्मेचर को अपनी ओर खींचता है, जिससे उससे जुड़ा हैमर (Gong) बजता है। जैसे ही आर्मेचर खिंचता है, उसका संपर्क बिंदु (Contact point) टूट जाता है, चुम्बकत्व खत्म होता है और हैमर वापस आ जाता है। यह प्रक्रिया बहुत तेजी से बार-बार दोहराई जाती है।
  • सुरक्षा नियम: घरों में घंटी के सर्किट को सुरक्षित बनाने के लिए बेल ट्रांसफार्मर (Bell Transformer) का उपयोग किया जाता है जो मुख्य 230 {V} को सुरक्षित 6 {V} या 12 {V} AC में बदल देता है, जिससे बाहर लगे स्विच में करंट आने का खतरा खत्म हो जाता है।

सूचक (Indicators)

​यह मुख्य स्विच बोर्ड या रिसेप्शन पैनल पर लगे छोटे नियॉन लैंप (Neon Lamps) या LED होते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि सर्किट में बिजली उपलब्ध है या कोई विशिष्ट स्विच ऑन है।

​4. पंप और इलेक्ट्रिक लिफ्ट के लिए छोटे मोटर (Small Motors for Pumps & Lifts)

​घरेलू पानी के पंपों और छोटी लिफ्टों (Elevators) में मुख्य रूप से सिंगल-फेज या थ्री-फेज इंडक्शन मोटर्स (Induction Motors) का उपयोग किया जाता है।

​क. पानी के पंप (Water Pumps / Monoblock & Submersible)

  • संस्थापन:
    • ​मोनोब्लॉक पंप को हमेशा सूखे और हवादार स्थान पर कंक्रीट के फाउंडेशन पर नट-बोल्ट से कसना चाहिए ताकि कंपन (Vibration) न हो।
    • ​पंप के सक्शन पाइप (Suction Pipe) में एयर लॉक नहीं होना चाहिए और अंत में एक फुट-वाल्व (Foot Valve) लगा होना चाहिए।
    • ​पंप की सुरक्षा के लिए DOL (Direct On Line) स्टार्टर का उपयोग करें जिसमें ओवरलोड रिले लगी हो।
  • रखराव:
    • ​पंप को कभी भी बिना पानी के (Dry Run) न चलाएं, इससे उसका वाटर सील (Gland Seal) जल जाएगा।
    • ​मोटर के बेयरिंग में समय-समय पर ग्रीसिंग करें।

​ख. इलेक्ट्रिक लिफ्ट के लिए मोटर (Motors for Lifts/Elevators)

​छोटी या घरेलू लिफ्टों में भारी स्टार्टिंग टॉर्क (High Starting Torque) की आवश्यकता होती है। इसके लिए थ्री-फेज इंडक्शन मोटर या आधुनिक PMSM (Permanent Magnet Synchronous Motor) का उपयोग किया जाता है, जिसे VFD (Variable Frequency Drive) द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

  • संस्थापन और सुरक्षा: लिफ्ट मोटर को मशीन रूम में पूरी तरह से संरेखित (Align) करके स्थापित किया जाता है। इसमें मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल ब्रेकिंग सिस्टम सीधे मोटर शाफ्ट से जुड़ा होता है ताकि बिजली कटने पर लिफ्ट तुरंत वहीं रुक जाए।
  • रखराव: लिफ्ट मोटर और उसकी गियरिंग प्रणाली का रखरखाव बेहद संवेदनशील होता है। इसके तेल के स्तर (Gear Oil), ब्रेक शू के घिसाव और कंट्रोल पैनल के कॉन्टैक्टर्स की हर महीने तकनीकी जांच (Monthly Maintenance) अनिवार्य है।





ऊर्जा मापन और शुल्क - घरेलू सेवा के लिए डीसी और एसी दोनों प्रकार के ऊर्जा मीटर।

बिजली की खपत को मापने और उसके अनुसार बिल (शुल्क/Tariff) तैयार करने के लिए ऊर्जा मीटर (Energy Meters) का उपयोग किया जाता है। घरेलू सेवा (Domestic Service) में उपयोग होने वाले AC और DC दोनों प्रकार के ऊर्जा मीटरों के कार्य सिद्धांत और उनकी व्यवस्था को नीचे विस्तार से समझाया गया है:

​1. DC ऊर्जा मीटर (DC Energy Meter)

​यद्यपि आधुनिक घरेलू आपूर्ति मुख्य रूप से AC है, लेकिन कुछ विशेष प्रणालियों (जैसे घरेलू सौर ऊर्जा प्लांट, बैटरी स्टोरेज ग्रिड या पुराने DC वितरण क्षेत्रों) में DC ऊर्जा मीटर का उपयोग किया जाता है।

प्रकार और कार्य सिद्धांत:

​घरेलू स्तर पर मुख्य रूप से एम्पीयर-आवर मीटर (Ampere-Hour Meter) या इलेक्ट्रोडायनामोमीटर वाट-आवर मीटर का उपयोग होता है। इसमें सबसे लोकप्रिय मर्करी मोटर मीटर (Mercury Motor Meter) है।

  • सिद्धांत: यह मीटर एक छोटी DC मोटर की तरह काम करता है। इसमें एक तांबे की डिस्क (Disks) होती है जो मर्करी (पारे) के कप में तैरती है। जब लोड करंट इस डिस्क से गुजरता है और स्थायी चुंबक (Permanent Magnet) के चुंबकीय क्षेत्र के साथ क्रिया करता है, तो लोरेंट्ज़ बल (Lorentz Force) के कारण डिस्क घूमने लगती है।
  • मापन: डिस्क के घूमने की गति (RPM) सीधे लोड करंट के समानुपाती होती है। यह मीटर समय के साथ करंट का एकीकरण (Integration) करता है। चूंकि घरेलू DC वोल्टेज लगभग स्थिर (V) रहता है, इसलिए एम्पीयर-आवर (\int I \cdot dt) को वोल्टेज से गुणा करके सीधे वाट-आवर (Wh या kWh) में रिकॉर्ड कर लिया जाता है।

​2. AC ऊर्जा मीटर (AC Energy Meter)

​घरेलू सेवा में उपयोग होने वाले AC ऊर्जा मीटरों को विकास के आधार पर दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता है:

​क. प्रेरण प्रकार का ऊर्जा मीटर (Induction Type Energy Meter - पारंपरिक)

​यह पुराने समय में उपयोग होने वाला एल्युमिनियम डिस्क वाला यांत्रिक मीटर है।

  • कार्य सिद्धांत: यह विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) पर काम करता है। इसमें दो इलेक्ट्रोमैग्नेट होते हैं:
    1. शंट मैग्नेट (Shunt Magnet): यह वोल्टेज के सीरीज में जुड़ा होता है और वोल्टेज के समानुपाती चुंबकीय फ्लक्स पैदा करता है।
    2. सीरीज मैग्नेट (Series Magnet): यह लोड करंट के सीरीज में जुड़ा होता है और करंट के समानुपाती फ्लक्स पैदा करता है।
  • रोटेशन: इन दोनों मैग्नेट के कारण एल्युमिनियम की डिस्क में भँवर धाराएँ (Eddy Currents) पैदा होती हैं। इन धाराओं और चुंबकीय क्षेत्र की आपसी क्रिया से एक टॉर्क (घूर्णन बल) पैदा होता है, जिससे डिस्क घूमने लगती है। डिस्क की गति वास्तविक शक्ति (VI cos phi) के समानुपाती होती है। गियर सिस्टम इस रोटेशन को काउंट करके डायल पर रीडिंग (kWh) दिखाता है।

​ख. इलेक्ट्रॉनिक/डिजिटल ऊर्जा मीटर (Static/Electronic Energy Meter - आधुनिक)

​आजकल सभी घरों में इसी मीटर का उपयोग किया जाता है।

  • कार्य सिद्धांत: इसमें कोई घूमने वाला हिस्सा (No Moving Parts) नहीं होता।
  • मापन: इसमें करंट को मापने के लिए एक करंत ट्रांसफार्मर (CT) या शंट रेजिस्टेंस और वोल्टेज को मापने के लिए एक पोटेंशियल डिवाइडर सर्किट लगा होता है। इन सिग्नलों को एक संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक चिप (Asic) को भेजा जाता है, जो लगातार वोल्टेज और करंट के तात्कालिक मानों को गुणा करके वास्तविक ऊर्जा खपत की गणना डिजिटल रूप से करती है। यह डेटा LCD स्क्रीन पर दिखाई देता है और फ्लैशिंग LED (Impulse/kWh) के रूप में भी दिखता है।

​3. घरेलू बिजली शुल्क / टैरिफ (Domestic Electricity Tariff)

​ऊर्जा मीटर द्वारा रिकॉर्ड की गई रीडिंग (1 { Unit} = 1 { kWh}) के आधार पर उपभोक्ताओं से शुल्क लिया जाता है। घरेलू सेवा के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित शुल्क प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं:

​1. ब्लॉक रेट टैरिफ (Block Rate Tariff - सबसे आम)

​इसमें बिजली की खपत (यूनिट) को अलग-अलग ब्लॉकों में बांटा जाता है। जैसे-जैसे खपत बढ़ती है, प्रति यूनिट की दर भी बढ़ती जाती है ताकि लोग बिजली की बचत करें।

  • उदाहरण:
    • ​पहले 100 यूनिट तक: ₹4.00 प्रति यूनिट
    • ​101 से 300 यूनिट तक: ₹6.50 प्रति यूनिट
    • ​300 यूनिट से ऊपर: ₹8.00 प्रति यूनिट

​2. फ्लैट डिमांड रेट टैरिफ (Two-Part Tariff)

​घरेलू बिल में कुल शुल्क को दो भागों में जोड़ा जाता है:

{Total Bill} = {Fixed Charge} + {Running Charge}

  • फिक्स्ड चार्ज (Fixed Charge): यह आपके घर के स्वीकृत लोड (Sanctioned Load, जैसे 2 { kW} या 5 { kW}) के आधार पर तय होता है, चाहे आप बिजली का उपयोग करें या न करें।
  • रनिंग चार्ज (Running Charge): यह ऊर्जा मीटर द्वारा मापी गई वास्तविक खपत (kWh) के अनुसार लिया जाता है।

​3. समय के आधार पर शुल्क (Time of Day - ToD Tariff)

​यह आधुनिक स्मार्ट मीटरों (Smart Meters) के आने के बाद घरेलू स्तर पर भी लागू किया जा रहा है। इसमें दिन के अलग-अलग समय पर बिजली की दरें अलग होती हैं:

  • ऑफ-पीक आवर्स (रात के समय): शुल्क कम होता है।
  • पीक आवर्स (शाम 6 से रात 10 बजे तक): जब ग्रिड पर सबसे ज्यादा लोड होता है, तब शुल्क अधिक लिया जाता है ताकि लोग भारी उपकरणों का उपयोग उस समय टाल सकें।




सरल गणना - ऊर्जा की लागत से संबंधित सरल गणनाएँ, ऊर्जा के लिए शुल्क लेने के तरीकों का बुनियादी ज्ञान।

घरेलू या औद्योगिक स्तर पर बिजली के बिल की गणना करना बेहद आसान है। बिजली का बिल इस बात पर निर्भर करता है कि आपने कितनी ऊर्जा (Energy) खर्च की है और आपकी बिजली वितरण कंपनी (DISCOM) किस शुल्क प्रणाली (Tariff Method) से बिल तैयार कर रही है।

​नीचे ऊर्जा की लागत निकालने की सरल गणनाएँ और शुल्क लेने के तरीकों का बुनियादी ज्ञान दिया गया है:

​1. ऊर्जा मापन और लागत की सरल गणनाएँ

​बिजली के बिल में 1 यूनिट का मतलब होता है 1 kWh (किलोवाट-ऑवर)

मूल सूत्र (Basic Formulas):

{ऊर्जा (Units)} = {{उपकरण की शक्ति (Watts)} × {समय (Hours)}}/{1000}

ऊर्जा की कुल लागत (Cost of Energy):

{कुल लागत (₹)} = {कुल यूनिट (Units)} × {प्रति यूनिट दर (Rate per Unit)}

उदाहरण के साथ समझें (Practical Examples):

उदाहरण 1: एक उपकरण की लागत निकालना

​आपके घर में 200 { वॉट (W)} का एक रेफ्रिजरेटर है जो दिन में 24 घंटे लगातार चलता है। यदि बिजली की दर ₹6 प्रति यूनिट है, तो 30 दिन का बिल कितना आएगा?

स्टेप 1: वाट को किलोवाट (kW) में बदलें

​चूंकि बिजली की यूनिट किलोवाट में मापी जाती है, इसलिए हम 200 वाट को 1000 से भाग देंगे:

{किलोवाट (kW)} = {200}/{1000} = 0.2 { kW}

स्टेप 2: कुल घंटे (Total Hours) निकालें

​उपकरण दिन के 24 घंटे और पूरे 30 दिन लगातार चलता है:

{कुल घंटे} = 24 { घंटे} × 30 { दिन} = 720 { घंटे}

स्टेप 3: कुल खपत या यूनिट (kWh) निकालें

​अब किलोवाट को कुल घंटों से गुणा करेंगे ताकि कुल यूनिट्स का पता चल सके:

{कुल यूनिट (kWh)} = 0.2 { kW} × 720 { घंटे} = 144 { यूनिट}

स्टेप 4: कुल बिल की लागत (Cost) निकालें

​बिजली की दर ₹6 प्रति यूनिट है, इसलिए:

{कुल बिल} = 144 { यूनिट} × ₹6 = {₹864}

संक्षिप्त उत्तर:

​उस 200 वाट के उपकरण के लगातार चलने से 30 दिन में 144 यूनिट बिजली खर्च होगी और आपका बिल ₹864 आएगा।




ऊर्जा की लागत (Cost of Energy) और बिजली के बिल को समझना बेहद सरल है। जब हम बिजली के उपयोग और उसके बिल की बात करते हैं, तो सारा खेल उपकरण की शक्ति (Watt), समय (Hours) और बिजली की दर (Tariff) का होता है।

​यहाँ इसके गणित और शुल्क लेने के तरीकों को बुनियादी रूप से समझाया गया है:

​1. बुनियादी शब्दावली (Basic Terms)

​गणना सीखने से पहले इन तीन शब्दों को जानना जरूरी है:

  • वाट (Watt - W): यह किसी उपकरण की शक्ति (Power) दिखाता है। जैसे 9W का LED बल्ब कम बिजली लेता है और 2000W (या 2kW) का गीजर बहुत ज्यादा।
  • किलोवाट (Kilowatt - kW): 1000 वाट को मिलाकर 1 किलोवाट बनता है (1 { kW} = 1000 { W})।
  • यूनिट (Unit / kWh): बिजली बोर्ड इसी के आधार पर बिल बनाता है। 1 यूनिट का मतलब होता है 1 किलोवाट-घंटा (1 Kilowatt-Hour)। यानी अगर 1000 वाट का कोई उपकरण 1 घंटे तक लगातार चले, तो 1 यूनिट बिजली खर्च होती है।

​2. लागत निकालने का सरल सूत्र (The Formula)

​बिजली का खर्च या यूनिट निकालने का सीधा फॉर्मूला है:

{कुल यूनिट (kWh)} = {{उपकरण के वाट (W)} × {चालू रहने के घंटे (Hours)}}/{1000}

{कुल लागत (Cost)} = {कुल यूनिट} × {प्रति यूनिट की दर (₹)}

एक आसान उदाहरण:

​मान लीजिए आपके घर में 500 वाट की एक वाशिंग मशीन है, जो रोज 2 घंटे चलती है। यदि बिजली की दर ₹5 प्रति यूनिट है, तो 30 दिन का खर्च क्या होगा?

  1. 1 दिन की यूनिट: {500 { वाट} × 2 { घंटे}}/{1000} = 1 { यूनिट}
  2. 30 दिन की कुल यूनिट: 1 { यूनिट} × 30 { दिन} = 30 { यूनिट}
  3. 30 दिन का कुल खर्च: 30 { यूनिट} × ₹5 = {₹150}

​3. ऊर्जा के लिए शुल्क (बिल) लेने के तरीके

​बिजली कंपनियां उपभोक्ताओं से पैसे लेने के लिए अलग-अलग तरीकों (Tariffs) का उपयोग करती हैं। इसके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

​क) दो-भाग शुल्क प्रणाली (Two-Part Tariff)

​यह आपके घरों में आने वाले सामान्य बिजली बिल का तरीका है। इसमें दो तरह के चार्ज जुड़े होते हैं:

  • नियत शुल्क (Fixed Charge): यह एक फिक्स राशि है जो आपको हर महीने देनी ही पड़ती है, चाहे आप घर का ताला बंद करके बाहर चले जाएं और शून्य यूनिट का उपयोग करें। यह आपके घर के स्वीकृत लोड (जैसे 2kW या 5kW) पर तय होता है।
  • ऊर्जा शुल्क (Energy Charge): यह आपके द्वारा इस्तेमाल की गई वास्तविक यूनिटों (kWh) का खर्च होता है (जैसे ऊपर के उदाहरण में ₹150 आया)।

​ख) ब्लॉक रेट शुल्क (Block Rate Tariff)

​इसमें खपत के हिसाब से अलग-अलग 'स्लैब' या ब्लॉक बने होते हैं। सरकार या कंपनियां कम बिजली खर्च करने वालों को इनाम और ज्यादा खर्च करने वालों पर जुर्माना लगाने के लिए ऐसा करती हैं।

  • उदाहरण:
    • ​पहली 0 से 100 यूनिट तक: ₹4.00 प्रति यूनिट
    • ​अगली 101 से 300 यूनिट तक: ₹6.50 प्रति यूनिट
    • ​300 यूनिट से अधिक होने पर: ₹8.00 प्रति यूनिट

​ग) फ्लैट रेट शुल्क (Flat Rate Tariff)

​इसमें सभी तरह की खपत के लिए एक ही समान दर होती है। उदाहरण के लिए, चाहे आप 10 यूनिट इस्तेमाल करें या 1000 यूनिट, दर हमेशा ₹6 प्रति यूनिट ही रहेगी। यह आमतौर पर छोटे उद्योगों या व्यावसायिक दुकानों में देखा जाता है।

​घ) समय के अनुसार शुल्क (Time of Day - ToD Tariff)

​इस आधुनिक प्रणाली में इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस समय बिजली का उपयोग कर रहे हैं।

  • पीक ऑवर्स (Peak Hours): सुबह और शाम के समय जब ग्रिड पर सबसे ज्यादा लोड होता है, तब बिजली की दरें महंगी कर दी जाती हैं।
  • ऑफ-पीक ऑवर्स (Off-Peak Hours): देर रात या दोपहर के समय जब बिजली की मांग कम होती है, तब दरें सस्ती होती हैं। ताकि लोग भारी उपकरण (जैसे फैक्ट्रियां या मशीनें) रात में चलाएं।





परीक्षण और दोष निवारण - घरेलू उपकरणों और वायरिंग इंस्टॉलेशन में दोषों का पता लगाना और उनका स्थान निर्धारित करना।
इंसुलेशन और निरंतरता परीक्षण। दोषों का निवारण। इन्सुलेशन के पृथ्वी के प्रति प्रतिरोध का परीक्षण। अर्थिंग परीक्षण।

घरेलू वायरिंग और उपकरणों में आने वाले दोषों (Faults) को समय पर ढूंढना और उन्हें ठीक करना सुरक्षा और बिजली की बचत दोनों के लिए बेहद जरूरी है। इसके लिए विभिन्न प्रकार के परीक्षण (Testing) और दोष निवारण (Troubleshooting) तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

​यहाँ इन सभी परीक्षणों और दोष निवारण की प्रक्रियाओं को सरल शब्दों में समझाया गया है:

​1. घरेलू वायरिंग और उपकरणों में दोषों का पता लगाना (Fault Finding)

​वायरिंग या उपकरणों में मुख्य रूप से तीन प्रकार के दोष आते हैं:

  • शॉर्ट सर्किट (Short Circuit): जब फेज़ (Phase) और न्यूट्रल (Neutral) तार आपस में सीधे जुड़ जाते हैं। इसमें करंट बहुत तेजी से बढ़ता है और फ्यूज उड़ जाता है या MCB ट्रिप हो जाती है।
  • ओपन सर्किट (Open Circuit): जब कोई तार बीच में से टूट जाता है या जॉइंट खुल जाता है, जिससे करंट का बहना बंद हो जाता है और उपकरण काम नहीं करता।
  • अर्थ फॉल्ट / लीकेज (Earth Fault / Leakage): जब कोई लाइव (फेज़) तार किसी उपकरण के धातु वाले शरीर (Metal Body) या दीवार को छू जाता है। इससे करंट जमीन में जाने लगता है और छूने पर करंट लगता है।

​2. निरंतरता परीक्षण (Continuity Test)

​यह परीक्षण यह जांचने के लिए किया जाता है कि बिजली का रास्ता (Circuit) कहीं से टूटा तो नहीं है (यानी सर्किट पूरा है या ओपन है)।

  • कैसे करते हैं: इसके लिए मल्टीमीटर (Multimeter) को 'कंटिन्यूटी' या 'बज़र (Buzzer)' मोड पर सेट किया जाता है।
  • जांच की विधि: तार या उपकरण के दोनों सिरों पर मल्टीमीटर की प्रोब्स (Probs) को लगाया जाता है।
  • परिणाम:
    • ​यदि बीप (Beep) की आवाज आती है, तो इसका मतलब है कि रास्ता साफ है (तार जुड़ा हुआ है)।
    • ​यदि कोई आवाज नहीं आती या स्क्रीन पर 'OL' (Open Loop) दिखता है, तो रास्ता टूटा हुआ है (Open Circuit फॉल्ट है)।

​3. इन्सुलेशन परीक्षण (Insulation Resistance Test)

​तारों के ऊपर चढ़ा प्लास्टिक या रबर का कवर (Insulation) समय के साथ गर्मी, नमी या पुराने होने के कारण कमजोर हो जाता है। इन्सुलेशन टेस्ट से यह पता चलता है कि तारों की सुरक्षा परत कितनी मजबूत है।

  • उपकरण: इसके लिए मेगर (Megger / Insulation Tester) नाम के उपकरण का उपयोग किया जाता है, जो सर्किट में उच्च वोल्टेज (जैसे 500V DC) भेजकर जांच करता है।
  • नियम: इन्सुलेशन प्रतिरोध का मान 1 मेगा-ओम (1 { M} Omega) से अधिक होना चाहिए। यदि यह इससे कम है, तो इन्सुलेशन कमजोर है और शॉर्ट सर्किट या लीकेज का खतरा है।

​4. इन्सुलेशन के पृथ्वी के प्रति प्रतिरोध का परीक्षण (Insulation Resistance to Earth)

​यह टेस्ट यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि तारों के अंदर बहने वाला करंट लीक होकर जमीन (Earth) या घर की दीवारों में तो नहीं जा रहा है।

  • कैसे करते हैं:
    1. ​मुख्य बिजली सप्लाई (Main Switch) को पूरी तरह बंद कर दें और फ्यूज निकाल दें।
    2. ​घर के सभी स्विच को 'ON' स्थिति में रखें और सभी बल्ब/उपकरणों को सॉकेट से हटा दें।
    3. ​मेगर का एक सिरा फेज़/न्यूट्रल तारों (जिन्हें आपस में जोड़ दिया जाता है) से कनेक्ट करें और दूसरा सिरा मुख्य अर्थ टर्मिनल (Earth Pin) से कनेक्ट करें।
    4. ​मेगर को घुमाएं या बटन दबाएं।
  • परिणाम: यदि रीडिंग 1{ M} Omega से अधिक है, तो वायरिंग सुरक्षित है। यदि रीडिंग बहुत कम या शून्य आती है, तो इसका मतलब है कि कोई तार सीधे जमीन या गीली दीवार के संपर्क में आ रहा है।

​5. अर्थिंग परीक्षण (Earthing Test / Earth Resistance Test)

​हमारे घरों में अर्थिंग इसलिए की जाती है ताकि किसी उपकरण में करंट आने पर वह अतिरिक्त करंट जमीन में चला जाए और हमें झटका न लगे। एक अच्छी अर्थिंग का प्रतिरोध (Resistance) बहुत कम होना चाहिए।

  • उपकरण: इसके लिए अर्थ टेस्टर (Earth Tester) का उपयोग किया जाता है।
  • जांच की विधि: मुख्य अर्थ इलेक्ट्रोड (गड्ढे) के पास जमीन में दो सहायक कीलें (Spikes) गाड़कर उनके बीच प्रतिरोध मापा जाता है।
  • परिणाम: घरेलू वायरिंग के लिए अर्थिंग का प्रतिरोध 5 ओम (5 Omega) से कम होना चाहिए (आदर्श रूप से 1 से 2 ओम)। यदि प्रतिरोध ज्यादा है, तो अर्थिंग के गड्ढे में पानी और नमक-कोयला डालकर उसे सुधारा जाता है।

​6. दोषों का निवारण (Troubleshooting Guide)

​यदि आपके घर की MCB बार-बार ट्रिप हो रही है या करंट लग रहा है, तो इन स्टेप्स से समस्या का पता लगाएं:

समस्या

संभावित कारण

निवारण (Solution)

MCB बार-बार ट्रिप होना

शॉर्ट सर्किट या ओवरलोड (ज्यादा उपकरण चलना)

सभी उपकरण बंद करें। एक-एक करके चालू करें। जिस उपकरण को चलाते ही MCB गिरे, उस उपकरण या उसके सॉकेट में खराबी है।

उपकरण छूने पर झटका लगना

अर्थ फॉल्ट (तार का बॉडी से छूना)

उपकरण का प्लग निकालें। मल्टीमीटर से उसकी बॉडी और प्लग के पिन के बीच कंटिन्यूटी चेक करें। तार खराब हो तो बदलें।

स्विच ऑन करने पर भी उपकरण न चलना

ओपन सर्किट (फ्यूज उड़ना या ढीला कनेक्शन)

टेस्टर से सॉकेट में करंट चेक करें। यदि करंट नहीं आ रहा, तो स्विचबोर्ड खोलकर ढीले तार (Loose Connections) को कसें।



सुरक्षा चेतावनी: बिजली से जुड़ा कोई भी परीक्षण या मरम्मत करते समय मुख्य पावर सप्लाई (Main Switch) को हमेशा बंद रखें, पैरों में रबर की चप्पल पहनें और इंसुलेटेड टूल्स (प्लास, स्क्रूड्राइवर) का ही उपयोग करें।





सुरक्षा उपकरण - फ्यूज और कटआउट के उपयोग का बुनियादी ज्ञान
घरेलू उपकरणों, मोटरों आदि की अर्थिंग,
बिजली रोधक यंत्रों का उपयोग।

घरेलू और औद्योगिक विद्युत प्रणालियों में दुर्घटनाओं, आग और उपकरणों को जलने से बचाने के लिए सुरक्षा उपकरणों (Safety Devices) का उपयोग किया जाता है। यहाँ फ्यूज, अर्थिंग और बिजली रोधक यंत्रों (Insulators) के बुनियादी ज्ञान को सरल शब्दों में समझाया गया है:

​1. फ्यूज और कटआउट (Fuse and Cutout)

​फ्यूज बिजली के सर्किट का सबसे पहला और सबसे वफादार 'सुरक्षा गार्ड' है। इसका मुख्य काम सर्किट में ओवरलोड (Overload) या शॉर्ट सर्किट (Short Circuit) होने पर खुद पिघलकर बिजली की सप्लाई को बंद करना है।

फ्यूज कैसे काम करता है?

  • ​फ्यूज के अंदर एक कम गलनांक (Low Melting Point) वाला पतला तार होता है।
  • ​जब सर्किट में जरूरत से ज्यादा करंट बहता है, तो यह तार गर्म होकर टूट जाता है (पिघल जाता है)।
  • ​तार टूटने से सर्किट अधूरा (Open Circuit) हो जाता है और महंगे उपकरण जलने से बच जाते हैं।

कटआउट (Cutout) क्या है?

​कटआउट वह ढांचा या होल्डर (आमतौर पर पोरसलीन/चीनी मिट्टी का बना) होता है जिसके अंदर फ्यूज वायर को बांधकर फिट किया जाता है। इसे किट-कैट फ्यूज (Kit-Kat Fuse) भी कहते हैं। इसे आसानी से बाहर निकाला और दोबारा तार बांधकर लगाया जा सकता है।

याद रखें: फ्यूज को हमेशा फेज़ (Phase / Live) तार के सीरीज (श्रेणीक्रम) में जोड़ा जाता है, न्यूट्रल में कभी नहीं।


​2. घरेलू उपकरणों और मोटरों की अर्थिंग (Earthing)

​जब किसी उपकरण (जैसे- फ्रिज, वाशिंग मशीन, कूलर, या पानी की मोटर) के अंदर का बिजली का तार पुराना होकर या कटकर उसकी धातु की बॉडी (Metal Body) से छू जाता है, तो पूरी बॉडी में करंट आ जाता है। यदि कोई इंसान उसे छुए, तो उसे गंभीर झटका लग सकता है। इसी से बचने के लिए अर्थिंग की जाती है।

अर्थिंग कैसे काम करती है?

  • ​अर्थिंग के तहत उपकरणों के धातु वाले हिस्से को एक हरे रंग के तार के जरिए सीधे जमीन (Earth) के अंदर दबे तांबे या लोहे की प्लेट से जोड़ दिया जाता है।
  • ​बिजली का एक नियम है: करंट हमेशा सबसे आसान और कम प्रतिरोध (Low Resistance) वाला रास्ता चुनता है।
  • ​मानव शरीर का प्रतिरोध जमीन में दबे अर्थिंग तार की तुलना में बहुत अधिक होता है। इसलिए, लीक हुआ करंट इंसान के शरीर में जाने के बजाय सीधे अर्थिंग तार से होता हुआ जमीन में चला जाता है और हम सुरक्षित बच जाते हैं।
  • मोटरों में अर्थिंग: मोटरें लगातार चलती हैं और उनमें कंपन (Vibration) होता है, जिससे अंदर के इंसुलेशन कटने का डर ज्यादा रहता है। इसलिए मोटरों की बॉडी को डबल अर्थिंग (दो अलग-अलग जगह से अर्थ) करना अनिवार्य होता है।

​3. बिजली रोधक यंत्र (Insulators)

​बिजली रोधक (इंसुलेटर) वे पदार्थ या उपकरण होते हैं जिनमें से होकर करंट बिल्कुल नहीं बह सकता। इनका मुख्य काम करंट को अपने तय रास्ते (तारों) से बाहर भटकने से रोकना है।

प्रमुख उपयोग:

  • ओवरहेड लाइनों (खंभों) पर: आपने सड़कों पर बिजली के खंभों या टावरों पर चीनी मिट्टी (Porcelain) या डिस्क के आकार के जो उपकरण देखे होंगे, वे इंसुलेटर ही हैं। ये नंगे तारों को लोहे के खंभे से छूने से रोकते हैं, जिससे खंभे में करंट नहीं उतरता।
  • उपकरणों के हैंडल: पेचकश (Screwdriver), प्लास (Pliers) और घरेलू प्रेस (Iron) के हैंडल प्लास्टिक, रबर या बेकेलाइट के बनाए जाते हैं ताकि काम करते समय ऑपरेटर को करंट न लगे।
  • तारों की कोटिंग: घरों में इस्तेमाल होने वाले कॉपर के तारों के ऊपर PVC (Polyvinyl Chloride) का प्लास्टिक कवर चढ़ा होता है, जो एक बेहतरीन इंसुलेटर है। इसके कारण दो तार पास होने पर भी आपस में शॉर्ट नहीं होते।

एक नजर में सुरक्षा चक्र:

सुरक्षा उपकरण

मुख्य कार्य

सुरक्षा किससे?

फ्यूज / कटआउट

खुद पिघलकर सर्किट तोड़ना।

ओवरलोड और शॉर्ट सर्किट से (उपकरणों की सुरक्षा)।

अर्थिंग (Earthing)

लीकेज करंट को जमीन में भेजना।

इंसानी जान को बिजली के झटके (Shock) से बचाना।

बिजली रोधक (Insulator)

करंट को बाहर फैलने से रोकना।

शॉर्ट सर्किट और खंभों/बॉडी में करंट उतरने से रोकना।







IRING - औद्योगिक परिसरों में प्रकाश और बिजली के लिए विभिन्न प्रकार के वायरिंग लेआउट, आवश्यक स्विचगियर सहित।
विभिन्न प्रकार के इंस्टॉलेशन के लिए सामग्री और लागत का अनुमान।
अस्थायी इंस्टॉलेशन और पोर्टेबल उपकरणों की वायरिंग।

औद्योगिक परिसरों (Industrial Premises) में वायरिंग घरेलू वायरिंग से काफी अलग और जटिल होती है। यहाँ भारी मशीनें, उच्च वोल्टेज (3-Phase) और लगातार चलने वाला लोड होता है। इसलिए, यहाँ सुरक्षा, मजबूती और भविष्य में विस्तार (Expansion) की गुंजाइश को ध्यान में रखकर लेआउट तैयार किया जाता है।

​1. औद्योगिक परिसरों में वायरिंग लेआउट और स्विचगियर

​औद्योगिक परिसरों में बिजली को मुख्य सप्लाई से मशीनों तक पहुँचाने के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार के लेआउट और प्रणालियों का उपयोग किया जाता है:

​क) वितरण बोर्ड प्रणाली (Distribution Board - DB System)

​इस लेआउट में मुख्य बिजली सप्लाई सबसे पहले एक मुख्य वितरण बोर्ड (Main Distribution Board - MDB) में आती है। वहाँ से यह अलग-अलग उप-वितरण बोर्डों (Sub-Distribution Boards - SDB) में जाती है और फिर वहां से व्यक्तिगत मशीनों या लाइटिंग सर्किट को सप्लाई दी जाती है।

  • फायदा: यदि किसी एक मशीन या हिस्से में खराबी आती है, तो केवल उसी हिस्से की सप्लाई बंद होती है, पूरी फैक्ट्री ठप नहीं होती।

​ख) बसबार ट्रंकिंग प्रणाली (Busbar Trunking System - BBT)

​बड़ी फैक्ट्रियों में जहां मशीनें बहुत भारी होती हैं और समय-समय पर उनकी जगह बदलनी पड़ती है, वहाँ तारों की जगह तांबे (Copper) या एल्युमिनियम की मोटी पट्टियों (Busbars) का एक डक्ट (Enclosure) पूरी फैक्ट्री में दौड़ा दिया जाता है। मशीनों को जोड़ने के लिए इस डक्ट में से कहीं से भी प्लग-इन बॉक्स के जरिए सीधे कनेक्शन ले लिया जाता है।

  • फायदा: तारों का जाल नहीं बिछता और नई मशीन लगाना बेहद आसान होता है।

आवश्यक स्विचगियर (Required Switchgear)

​औद्योगिक वायरिंग में सुरक्षा और नियंत्रण के लिए निम्नलिखित हैवी-ड्यूटी स्विचगियर का उपयोग किया जाता है:

  • SFU (Switch Fuse Unit): मुख्य इनपुट पर ऑन/ऑफ करने और ओवरकरंट से सुरक्षा के लिए।
  • MCCB (Molded Case Circuit Breaker): यह घरेलू MCB का बड़ा रूप है। यह 100A से 1600A या उससे अधिक के भारी लोड और शॉर्ट सर्किट को संभालने के लिए उपयोग होती है।
  • ACB (Air Circuit Breaker): मुख्य पावर ट्रांसफार्मर के ठीक बाद बहुत बड़े करंट (जैसे 800A से 10000A) को नियंत्रित और ट्रिप करने के लिए।
  • VFD (Variable Frequency Drive): औद्योगिक मोटरों की गति (Speed) को नियंत्रित करने और उन्हें सुरक्षा देने के लिए।

​2. सामग्री और लागत का अनुमान (Material and Cost Estimation)

​किसी भी औद्योगिक इंस्टॉलेशन से पहले एक विस्तृत योजना बनाई जाती है, जिसे BOM (Bill of Materials) कहते हैं।

आवश्यक मुख्य सामग्री (Materials Needed):

  1. कंड्यूट और केबल ट्रे (Conduits & Cable Trays): तारों को ले जाने के लिए हैवी-ड्यूटी गैल्वनाइज्ड आयरन (GI) कंड्यूट पाइप या जालीदार केबल ट्रे।
  2. केबल्स (Cables): आर्मर्ड केबल्स (Armoured Cables - जिन पर लोहे की सुरक्षा परत होती है) ताकि चूहे या गाड़ियां उन्हें काट न सकें।
  3. अर्थिंग सामग्री: तांबे की प्लेट/रॉड, नमक, कोयला या केमिकल अर्थिंग पाउडर।

लागत अनुमान के मुख्य चरण (Cost Estimation Steps):

​लागत का अनुमान लगाने के लिए नीचे दी गई तालिका के अनुसार गणना की जाती है:

​{कुल लागत} = {सामग्री की कुल लागत} + {मजदूरी (Labor Cost)} + {आकस्मिक व्यय (Contingencies - 5% से 10%)} 

क्र.सं.

सामग्री / कार्य का विवरण

मात्रा (Quantity)

दर (Rate)

कुल राशि (₹)

1.

4-कोर आर्मर्ड एल्युमिनियम केबल (50 sq.mm)

150 मीटर

₹250/मीटर

₹37,500

2.

MCCB (250A, 3-Phase)

2 नग

₹12,000/नग

₹24,000

3.

GI केबल ट्रे (300mm चौड़ाई)

50 मीटर

₹400/मीटर

₹20,000

4.

पाइप अर्थिंग सेट (कॉपर इलेक्ट्रोड सहित)

3 सेट

₹5,000/सेट

₹15,000

5.

मजदूरी और इंस्टॉलेशन चार्ज (अनुमानित)

लम्प-सम

--

₹25,000

कुल

अनुमानित बजटीय लागत

₹1,21,500



3. अस्थायी इंस्टॉलेशन और पोर्टेबल उपकरणों की वायरिंग

​औद्योगिक परिसरों में कई बार निर्माण कार्य (Construction) या मरम्मत के लिए अस्थायी (Temporary) बिजली सप्लाई की जरूरत होती है। इसके अलावा पोर्टेबल उपकरण (जैसे वेल्डिंग मशीन, ग्राइंडर, ड्रिल मशीन) लगातार एक से दूसरी जगह ले जाए जाते हैं। इनके लिए वायरिंग के नियम बहुत कड़े होते हैं क्योंकि यहाँ दुर्घटना का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

अस्थायी इंस्टॉलेशन के नियम (Temporary Installation Rules):

  • मजबूत इंसुलेशन: अस्थायी तारों को कभी भी जमीन पर खुला नहीं छोड़ना चाहिए। उन्हें हमेशा ऊंचाई पर इंसुलेटर के सहारे या सुरक्षित केंट्री (Gantry) के ऊपर से ले जाना चाहिए।
  • मौसम से सुरक्षा: अस्थायी स्विचबोर्ड वॉटरप्रूफ (IP55 या IP65 रेटिंग) होने चाहिए ताकि बारिश या नमी से शॉर्ट सर्किट न हो।
  • समय सीमा: काम खत्म होते ही अस्थायी वायरिंग को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।

पोर्टेबल उपकरणों के लिए वायरिंग (Wiring for Portable Equipment):

  • लचीली केबल्स (Flexible Cables): पोर्टेबल उपकरणों के लिए सामान्य सख्त तारों के बजाय मल्टी-स्ट्रैंड लचीली (Flexible PVC Sheathed) केबलों का उपयोग किया जाता है, जो बार-बार मुड़ने पर भी टूटती नहीं हैं।
  • थ्री-पिन प्लग और अर्थिंग अनिवार्य: सभी पोर्टेबल उपकरण थ्री-पिन प्लग के साथ ही चलने चाहिए, जिसमें अर्थ पिन (मोटा पिन) का जुड़ा होना अनिवार्य है ताकि ऑपरेटर को झटका न लगे।
  • RCCB / ELCB का उपयोग: औद्योगिक क्षेत्रों में पोर्टेबल उपकरणों को जिस भी सॉकेट बोर्ड से सप्लाई दी जाती है, उसमें 30mA (मिली-एम्पियर) की RCCB (Residual Current Circuit Breaker) लगी होनी चाहिए। यदि किसी उपकरण में जरा सा भी लीकेज करंट आता है, तो यह माइक्रोसेकंड में बिजली बंद कर देती है और जान बचा लेती है।




सर्किट आरेख - डीसी और एसी मोटरों के लिए विद्युत कनेक्शन,
उनके स्टार्टर और रेगुलेटर। मुख्य और उप-वितरण बोर्ड,
सर्किट ब्रेकर, स्विच, फ्यूज यूनिट, प्रत्येक सर्किट के लिए लोड विवरण सहित।
डीसी और एसी मोटरें, उनके स्टार्टर और रेगुलेटर, बैटरी
चार्जिंग उपकरण, कन्वर्टिंग मशीनरी, लिफ्ट और उनके सुरक्षा उपकरण।

औद्योगिक और व्यावसायिक विद्युत प्रणालियों में डीसी (DC) और एसी (AC) मोटरों का संचालन, उनके स्टार्टर, वितरण बोर्ड और सुरक्षा उपकरणों का सही कनेक्शन (Circuit Diagram) रीढ़ की हड्डी की तरह काम करता है।

​नीचे इन सभी प्रणालियों के विद्युत कनेक्शन, लोड वितरण और उनके सुरक्षा उपकरणों को विस्तार से समझाया गया है:

​1. डीसी और एसी मोटरों के लिए विद्युत कनेक्शन और स्टार्टर

​मोटर को शुरू करते समय वह अपने सामान्य करंट से 4 से 6 गुना अधिक करंट (Starting Current) लेती है। इस भारी करंट से वाइंडिंग को जलने से बचाने के लिए स्टार्टर (Starter) का उपयोग किया जाता है।

​क) डीसी मोटर और उसका स्टार्टर (3-पॉइंट स्टार्टर)

​डीसी शंट मोटर को चालू करने के लिए मुख्य रूप से 3-पॉइंट स्टार्टर (3-Point Starter) का उपयोग किया जाता है।

  • कनेक्शन टर्मिनल: इसमें तीन मुख्य टर्मिनल होते हैं: L (Line), A (Armature), और F (Field)।
  • कार्यप्रणाली: जैसे-जैसे स्टार्टर के हैंडल (Handle) को धीरे-धीरे घुमाया जाता है, इसके अंदर लगा हुआ प्रतिरोध (Resistance) कम होता जाता है और मोटर सुरक्षित रूप से गति पकड़ लेती है। अंत में, एक NVC (No Volt Coil) हैंडल को चुम्बकीय बल से 'ON' स्थिति में जकड़ कर रखती है।
  • रेगुलेटर (गति नियंत्रण): मोटर की फील्ड वाइंडिंग के सीरीज में एक रियोस्टेट (Field Rheostat) लगाया जाता है। इसके प्रतिरोध को बढ़ाकर या घटाकर डीसी मोटर की स्पीड को रेगुलेट (नियंत्रित) किया जाता है।

​ख) एसी मोटर और उसके स्टार्टर (DOL और स्टार-डेल्टा)

​लघु और मध्यम उद्योगों में 3-फेज एसी इंडक्शन मोटर सबसे ज्यादा उपयोग होती है।

  1. डीओएल स्टार्टर (Direct On Line - DOL): यह 5 HP तक की छोटी मोटरों के लिए उपयोग होता है। यह मोटर को सीधे पूरी वोल्टेज देता है। इसमें एक कॉन्टैक्टर, NO (Normally Open) स्टार्ट बटन, NC (Normally Closed) स्टॉप बटन और एक ओवरलोड रिले (OLR) सुरक्षा के लिए लगी होती है।
  2. स्टार-डेल्टा स्टार्टर (Star-Delta Starter): यह 5 HP से बड़ी मोटरों के लिए अनिवार्य है।
    • शुरुआत (Star Mode): स्टार्टर पहले मोटर को 'स्टार कनेक्शन' में चलाता है, जिससे प्रत्येक वाइंडिंग को केवल 58% ({1}/{sqrt{3}}) वोल्टेज मिलती है और स्टार्टिंग करंट कम हो जाता है।
    • रनिंग (Delta Mode): कुछ सेकंड बाद (टाइमर के जरिए), स्टार्टर कनेक्शन को बदलकर 'डेल्टा' कर देता है, जिससे मोटर को पूरी वोल्टेज मिलने लगती है और वह पूरी ताकत से चलती है।



2. मुख्य और उप-वितरण बोर्ड (MDB & SDB) तथा सर्किट लोड विवरण

​फैक्ट्री या परिसर में बिजली का सुरक्षित बंटवारा करने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन पैनल का एक पदानुक्रम (Hierarchy) बनाया जाता है:


[मुख्य पावर इनपुट] ──> [मुख्य वितरण बोर्ड (MDB)] ──> [उप-वितरण बोर्ड (SDB)] ──> [अंतिम लोड/मशीनें]


सर्किट लोड विवरण (Sample Load Schedule)

​प्रत्येक सर्किट ब्रेकर और फ्यूज यूनिट का चयन उस सर्किट पर जुड़े कुल लोड के आधार पर किया जाता है। नीचे एक औद्योगिक सब-डिस्ट्रीब्यूशन बोर्ड (SDB) का लोड विवरण दिया गया है:

सर्किट नंबर

लोड का विवरण

कुल लोड (Watts/HP)

स्विचगियर / सुरक्षा उपकरण

अनुशंसित फ्यूज/MCB रेटिंग

Circuit 1

3-Phase एसी मोटर (लेथ मशीन)

7.5 HP (~5.6 kW)

MCCB + स्टार-डेल्टा स्टार्टर

16 Amps (Type C)

Circuit 2

डीसी शंट मोटर (कन्वेयर बेल्ट)

3 HP (~2.2 kW)

SFU + 3-पॉइंट स्टार्टर + फ्यूज

10 Amps (HRC Fuse)

Circuit 3

प्लांट लाइटिंग (LED लैम्प्स)

2000 W

MCB (Single Phase)

16 Amps (Type B)

Circuit 4

पोर्टेबल उपकरण (प्लग सॉकेट्स)

3000 W

RCCB (30mA) + MCB

20 Amps


3. बैटरी चार्जिंग और कन्वर्टिंग मशीनरी

  • बैटरी चार्जिंग उपकरण (Battery Chargers): उद्योगों में बैकअप के लिए बड़ी डीसी बैटरी बैंक होते हैं। चार्जर मुख्य एसी (AC) सप्लाई को रेक्टिफायर (Rectifier Circuit) के जरिए डीसी (DC) में बदलता है। इसमें करंट को नियंत्रित करने के लिए रियोस्टेट और सुरक्षा के लिए रिवर्स-करंट ब्रेकर लगे होते हैं ताकि लाइट जाने पर बैटरी का करंट वापस चार्जर में न आए।
  • कन्वर्टिंग मशीनरी (Converting Machinery): जब बड़े पैमाने पर एसी को डीसी में या डीसी को एसी में बदलना हो, तो रोटरी कनवर्टर (Rotary Converter) या आधुनिक इनवर्टर/वीएफडी (VFD) ड्राइव्स का उपयोग किया जाता है। इनमें ओवर-वोल्टेज और ओवर-हीटिंग से सुरक्षा के लिए इलेक्ट्रॉनिक सेंसिंग सर्किट लगे होते हैं।

​4. लिफ्ट (Elevators) और उनके सुरक्षा उपकरण

​लिफ्ट या एलीवेटर एक संवेदनशील प्रणाली है जिसमें मोटर के साथ-साथ कड़े सुरक्षा उपकरणों (Safety Devices) का सर्किट जुड़ा होता है।

लिफ्ट के मुख्य विद्युत और सुरक्षा उपकरण:

  1. होइस्ट मोटर (Hoist Motor): आमतौर पर उच्च टॉर्क वाली 3-फेज स्लिप रिंग इंडक्शन मोटर या आधुनिक गियरलेस पीएमएसएम (PMSM) मोटर, जो वीएफडी (VFD) द्वारा नियंत्रित होती है।
  2. इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक ब्रेक (Electro-magnetic Brake): यह सुरक्षा के लिए हमेशा 'Fail-Safe' मोड में काम करता है। यानी जब लिफ्ट को बिजली मिलती है, तो ब्रेक खुलता है। यदि अचानक बिजली कट जाए, तो स्प्रिंग के दबाव से ब्रेक तुरंत मोटर की शाफ्ट को जकड़ लेता है और लिफ्ट वहीं रुक जाती है।
  3. लिमिट स्विच (Limit Switches): लिफ्ट के शाफ्ट में सबसे ऊपर और सबसे नीचे 'अंतिम लिमिट स्विच' लगे होते हैं। यदि लिफ्ट नियंत्रण खोकर तय सीमा से ऊपर या नीचे जाने की कोशिश करती है, तो यह स्विच दब जाता है और मुख्य पावर सप्लाई को काट देता है।
  4. ओवरलोड सेंसर (Overload Sensor): यदि लिफ्ट में क्षमता से अधिक वजन लादा जाता है, तो यह सेंसर सर्किट को ब्लॉक कर देता है और लिफ्ट का दरवाजा बंद नहीं होता।
  5. आपातकालीन स्टॉप बटन (Emergency Stop Switch): यह लिफ्ट के केबिन के अंदर होता है, जिसे दबाने पर सीधे सेफ्टी सर्किट ब्रेक हो जाता है।





पंप इंस्टॉलेशन - सामान्य सिद्धांत और बुनियादी गणनाएँ
हेड, पावर और ऊर्जा आवश्यकताओं की गणना


पंप इंस्टॉलेशन (Pump Installation) जल आपूर्ति, कृषि, और औद्योगिक प्रक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक कुशल पंपिंग सिस्टम डिजाइन करने के लिए उसके सामान्य सिद्धांतों को जानना और हेड (Head), पावर (Power) तथा ऊर्जा (Energy) की सही गणना करना अनिवार्य है।

​यहाँ इन सभी सिद्धांतों और गणनाओं को सरल सूत्रों और उदाहरणों के साथ समझाया गया है:

​1. पंप इंस्टॉलेशन के सामान्य सिद्धांत (General Principles)

​पंप को स्थापित करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है ताकि पंप बिना किसी रुकावट के लंबे समय तक काम कर सके:

  • सक्शन लिफ्ट को कम रखना (Minimize Suction Lift): पंप को पानी के स्रोत (कुएं या टैंक) के जितना संभव हो सके पास स्थापित किया जाना चाहिए। सक्शन पाइप (पानी खींचने वाला पाइप) जितना छोटा और सीधा होगा, पंप पर उतना ही कम दबाव पड़ेगा।
  • पाइप का व्यास (Pipe Diameter): सक्शन पाइप का व्यास कभी भी पंप के इनलेट (Inलेट साइज) से छोटा नहीं होना चाहिए। छोटा पाइप होने से पानी के घर्षण (Friction) के कारण ऊर्जा का नुकसान होता है।
  • फुट वाल्व और स्ट्रेनर (Foot Valve & Strainer): सक्शन पाइप के निचले सिरे पर एक फुट वाल्व (कचरा रोकने वाली जाली के साथ) होना चाहिए। यह पानी को वापस नीचे बहने से रोकता है, जिससे पंप में हमेशा पानी भरा रहता है (Priming बनी रहती है)।
  • कैविटेशन से बचाव (Avoid Cavitation): यदि सक्शन साइड में दबाव बहुत कम हो जाए, तो पानी के बुलबुले बनने लगते हैं जो पंप के इम्पेलर (Impeller) को नुकसान पहुँचाते हैं। इससे बचने के लिए पंप को सही ऊंचाई पर स्थापित करना जरूरी है।

​2. हेड की बुनियादी गणना (Calculation of Head)

​पंपिंग सिस्टम में 'हेड (Head)' का मतलब उस कुल ऊंचाई या दबाव से है, जिसके विरुद्ध पंप को पानी धकेलना पड़ता है। इसे आमतौर पर मीटर (meters) में मापा जाता है।

​कुल हेड को टोटल डायनेमिक हेड (Total Dynamic Head - TDH) कहा जाता है:

{TDH} = H_s + H_d + H_f


जहाँ:

  • ​H_s (Static Suction Head): पानी के स्रोत के स्तर से लेकर पंप के केंद्र तक की ऊर्ध्वाधर (Vertical) ऊंचाई।
  • ​H_d (Static Delivery Head): पंप के केंद्र से लेकर उस उच्चतम बिंदु तक की ऊंचाई जहां पानी पहुंचाना है।
  • ​H_f (Friction Head Loss): पाइपों, मोड़ों (Elbows) और वाल्वों में पानी के रगड़ खाने (घर्षण) के कारण होने वाला नुकसान।

उदाहरण:

​यदि एक पंप को कुएं से पंप तक 3 मीटर (H_s) पानी खींचना है, और पंप से छत की टंकी तक 12 मीटर (H_d) ऊपर भेजना है, और पाइप के घर्षण के कारण 2 मीटर (H_f) का नुकसान होता है, तो:

{TDH} = 3 + 12 + 2 = {17 { मीटर}}

3. पावर (शक्ति) की गणना (Power Requirement)

​पंप को चलाने के लिए मोटर को कितनी शक्ति की आवश्यकता होगी, इसकी गणना दो चरणों में की जाती है:

​क) हाइड्रोलिक पावर (Hydraulic / Water Power - P_w)

​यह वह वास्तविक शक्ति है जो पानी को एक निश्चित ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए आवश्यक होती है।

P_w = {rho × g ×Q × H}/{1000} { (kW में)}

या गणना को सरल बनाने के लिए मीट्रिक प्रणाली में इस व्यावहारिक सूत्र का उपयोग करें:

P_w = {Q × H}{367}/{ (kW में)}

जहाँ:

  • ​Q = प्रवाह दर (Flow Rate) मशीन घन प्रति घंटा (m^3/hr) में
  • ​H = कुल हेड (TDH) मीटर में
  • ​367 = एक स्थिरांक (Constant) है जो इकाइयों को संतुलित करता है।

​ख) ब्रेक पावर (Brake Power / Motor Power - P_b)

​चूंकि कोई भी पंप 100% कुशल नहीं होता (कुछ ऊर्जा घर्षण और गर्मी में नष्ट हो जाती है), इसलिए मोटर को हाइड्रोलिक पावर से अधिक पावर देनी पड़ती है।

P_b = {P_w}/{eta}

जहाँ eta (Eta) = पंप की दक्षता (Efficiency) है (आमतौर पर यह 0.6 से 0.8 यानी 60% से 80% के बीच होती है)।

पावर गणना का व्यावहारिक उदाहरण:

​आपको एक पंप स्थापित करना है जो 36 m^3/hr की दर से पानी को 20 मीटर के कुल हेड पर फेंकेगा। यदि पंप की दक्षता 70% (0.70) है, तो मोटर की पावर क्या होगी?

हाइड्रोलिक पावर (P_w):

P_w = {36 × 20}/{367} = {720}/{367} approx 1.96 { kW}


मोटर पावर (P_b):

P_b = {1.96}/{0.70} approx {2.8 { kW}}

यदि इसे हॉर्सपावर (HP) में बदलना हो (1 { kW} = 1.34 { HP}):

{Motor HP} = 2.8 × 1.34 \approx {3.75{ HP}}


(यानी बाजार से हमें इसके लिए कम से कम 4 HP की मोटर चुननी होगी।)

​4. ऊर्जा आवश्यकताओं की गणना (Energy Consumption)

​ऊर्जा (Energy) की गणना से हमें यह पता चलता है कि पंप को चलाने में कुल कितनी बिजली खर्च होगी और उसका बिल कितना आएगा।

{ऊर्जा की खपत (kWh)} = {मोटर की पावर (kW)} × {चलने के घंटे (Hours)}

उदाहरण:

​यदि ऊपर दिया गया 2.8 kW का पंप रोज 5 घंटे चलता है और बिजली की दर ₹7 प्रति यूनिट (kWh) है, तो 30 दिन की ऊर्जा लागत क्या होगी?

  1. 1 दिन की ऊर्जा खपत: 2.8 { kW} × 5 { घंटे} = 14 { kWh (यूनिट)}
  2. 30 दिन की कुल यूनिट: 14 × 30 = 420 { यूनिट}
  3. 30 दिन का कुल बिल: 420 { यूनिट} × ₹7 = {₹2,940}






उपकरण - जनरेटर, इलेक्ट्रिक मोटर, इलेक्ट्रिक वेल्डिंग मशीन, ढुलाई और वाइंडिंग मशीन,
शीतलन और तापन उपकरणों की स्थापना और रखरखाव।

यह सूची इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उपयोग होने वाले प्रमुख भारी उपकरणों (Heavy Equipment) और उनकी स्थापना (Installation)रखरखाव (Maintenance) से संबंधित है। औद्योगिक (Industrial) और वाणिज्यिक (Commercial) क्षेत्रों में इन उपकरणों को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक कुशल कार्यप्रणाली की आवश्यकता होती है।

​यहाँ इन सभी उपकरणों की स्थापना और रखरखाव के मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में समझाया गया है:

​1. जनरेटर (Generator) और इलेक्ट्रिक मोटर (Electric Motor)

​ये किसी भी उद्योग की रीढ़ होते हैं—जनरेटर बिजली बनाता है और मोटर उस बिजली से मशीनें चलाती है।

स्थापना (Installation):

  • मजबूत नींव (Foundation): इन्हें कंक्रीट के मजबूत बेस पर स्थापित किया जा सकता है ताकि चलते समय कंपन (Vibration) कम से कम हो।
  • अलाइनमेंट (Alignment): मोटर और उसके द्वारा चलाई जाने वाले लोड (जैसे पंप या फैन) का अलाइनमेंट बिल्कुल सटीक होना चाहिए, नहीं तो बेयरिंग जल्दी खराब हो जाएंगे।
  • वेंटिलेशन: इन्हें ऐसे स्थान पर रखें जहाँ हवा का प्रवाह अच्छा हो ताकि ये गर्म न हों।

रखरखाव (Maintenance):

  • नियमित लुब्रिकेशन (Lubrication): बेयरिंग्स में समय पर ग्रीस या तेल डालना।
  • इंसुलेशन रेजिस्टेंस टेस्ट (Megger Test): मोटर की वाइंडिंग का इंसुलेशन चेक करना ताकि शॉर्ट सर्किट न हो।
  • कार्बन ब्रश की जांच: यदि डीसी मोटर या सिंक्रोनस जनरेटर है, तो कार्बन ब्रश के घिसने की जांच करना और उन्हें बदलना।

​2. इलेक्ट्रिक वेल्डिंग मशीन (Electric Welding Machine)

​धातुओं को जोड़ने के लिए इसका बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। इसमें उच्च करंट (High Current) का खेल होता है, इसलिए सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।

स्थापना (Installation):

  • सुरक्षित अर्थिंग (Earthing/Grounding): वेल्डिंग मशीन के फ्रेम की उचित अर्थिंग अनिवार्य है ताकि ऑपरेटर को बिजली का झटका न लगे।
  • पावर सोर्स: इनपुट वोल्टेज (Single Phase या Three Phase) के अनुसार सही रेटिंग के एमसीबी (MCB) और केबल का उपयोग।

रखरखाव (Maintenance):

  • केबल और होल्डर की जांच: वेल्डिंग लीड और अर्थ क्लैंप के ढीले कनेक्शन या कटे-फटे इंसुलेशन को तुरंत ठीक करना।
  • धूल की सफाई: मशीन के अंदर जमी धातु की धूल (Metallic Dust) को ब्लोअर से साफ करना, क्योंकि इससे आंतरिक शॉर्ट-सर्किट हो सकता है।

​3. ढुलाई और वाइंडिंग मशीन (Haulage and Winding Machines)

​इनका उपयोग आमतौर पर खदानों (Mining), निर्माण स्थलों और भारी उद्योगों में सामान या क्रेन/लिफ्ट के तारों को खींचने और लपेटने के लिए होता है।

स्थापना (Installation):

  • एंकरिंग (Anchoring): इन मशीनों पर भारी खिंचाव (Tension) पड़ता है, इसलिए इनकी एंकरिंग बहुत मजबूत होनी चाहिए।
  • ब्रेकिंग सिस्टम की स्थापना: सुरक्षा के लिए इनके मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल ब्रेक्स का इंस्टॉलेशन सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

रखरखाव (Maintenance):

  • वायर रोप (Wire Rope) की जांच: केबल या तार की रस्सी में जंग, टूट-फूट या ढीलेपन की बारीकी से जांच करना।
  • गियरबॉक्स का रखरखाव: गियर ऑयल के स्तर की जांच करना और आवाज (Noise) या अत्यधिक गर्मी की निगरानी करना।
  • लिमिट स्विच टेस्ट: यह सुनिश्चित करना कि मशीन तय सीमा से आगे न जाए (Safety Limit Switches की टेस्टिंग)।

​4. शीतलन और तापन उपकरण (Cooling and Heating Equipment - HVAC)

​इसमें औद्योगिक चिलर, एयर कंडीशनर, ब्लोअर, हीटर और भट्टियां (Furnaces) शामिल हैं।

स्थापना (Installation):

  • थर्मल इंसुलेशन: हीटिंग या कूलिंग की बर्बादी रोकने के लिए पाइपलाइन और डक्ट्स का सही इंसुलेशन।
  • सेंसर और थर्मोस्टेट: तापमान को नियंत्रित करने के लिए सेंसर्स को सही जगह पर लगाना।

रखरखाव (Maintenance):

  • फिल्टर की सफाई: एयर फिल्टर को नियमित रूप से साफ करना या बदलना ताकि हवा का दबाव और शुद्धता बनी रहे।
  • रेफ्रिजरेंट गैस लीक की जांच: कूलिंग सिस्टम में गैस का प्रेशर चेक करना।
  • हीटिंग एलीमेंट की जांच: हीटर के कॉइल्स या बर्नर की जांच करना कि कहीं वे जल या टूट तो नहीं गए हैं।

रखरखाव के सामान्य प्रकार (General Maintenance Types):

  1. निवारक रखरखाव (Preventive Maintenance): किसी खराबी के आने से पहले ही तय समय (साप्ताहिक/मासिक) पर जांच और सर्विसिंग करना।
  2. सुधारात्मक रखरखाव (Corrective/Breakdown Maintenance): उपकरण के अचानक खराब होने पर उसे ठीक करना।

​क्या आप इनमें से किसी विशेष उपकरण (जैसे मोटर वाइंडिंग या जनरेटर सिंक्रोनाइजेशन) के इंस्टॉलेशन या ट्रबलशूटिंग के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं?




शक्ति एवं ऊर्जा मापन एवं आवेश
शक्ति का मापन, वाट मीटर, ऊर्जा मीटर (डीसी और एसी दोनों)
संधारित्रों द्वारा शक्ति गुणनखंड का सुधार।

विद्युत प्रणाली (Power Systems) में शक्ति (Power), ऊर्जा (Energy) का मापन और शक्ति गुणांक (Power Factor) का सुधार, सिस्टम की दक्षता (Efficiency) बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं।

​यहाँ इन तीनों विषयों को तकनीकी और व्यावहारिक रूप से विस्तार से समझाया गया है:

​1. शक्ति एवं ऊर्जा मापन एवं आवेश (Power, Energy, and Charge)

आवेश (Electric Charge - Q): विद्युत आवेश पदार्थ का वह गुण है जिसके कारण वह विद्युत और चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करता है। इसका मात्रक कूलाम (Coulomb) है।

Q = I × t


(जहाँ I = {Current}, t = {Time})

शक्ति (Power - P): कार्य करने की दर या ऊर्जा की खपत की दर को शक्ति कहते हैं। इसका मात्रक वाट (Watt) है।

  • DC सर्किट में: P = V × I
  • AC सर्किट (Single Phase) में: P = V × I × cos phi (जहाँ cos phi पावर फैक्टर है)

ऊर्जा (Energy - E): एक निश्चित समय में कुल उपभोग की गई शक्ति को ऊर्जा कहते हैं। इसका मात्रक जूल (Joule) या किलोवाट-घंटा (kWh) होता है, जिसे हम सामान्य भाषा में 'यूनिट' कहते हैं।

E = P × t

2. शक्ति का मापन और वाटमीटर (Power Measurement & Wattmeter)

​DC सर्किट में शक्ति को एमीटर और वोल्टमीटर की रीडिंग को गुणा करके मापा जा सकता है, लेकिन AC सर्किट में पावर फैक्टर (cos phi) के कारण वाटमीटर का उपयोग अनिवार्य हो जाता है।

वाटमीटर (Wattmeter):

​सबसे अधिक उपयोग होने वाला वाटमीटर डायनेमोमीटर प्रकार (Electrodynamometer Wattmeter) का होता है। इसमें दो मुख्य कॉइल्स होती हैं:

  1. करंट कॉइल (Current Coil - CC): यह मोटी तार और कम टर्न की बनी होती है। इसे लोड के साथ श्रेणीक्रम (Series) में जोड़ा जाता है ताकि इससे मुख्य करंट प्रवाहित हो सके।
  2. पोटेंशियल कॉइल या प्रेशर कॉइल (Pressure Coil - PC): यह पतली तार और अधिक टर्न की बनी होती है। इसे लोड के साथ समांतर क्रम (Parallel) में जोड़ा जाता है ताकि यह वोल्टेज को माप सके।
  3. कार्य सिद्धांत: जब दोनों कॉइल्स में करंट बहता है, तो उनके बीच एक विक्षेपण बल (Deflecting Torque) पैदा होता है, जो वोल्टेज, करंट और उनके बीच के कोण के गुणनफल (V I cos phi) के समानुपाती होता है। सुई (Pointer) सीधे वाट में शक्ति दर्शाती है।


    ​3. ऊर्जा मीटर: डीसी और एसी (Energy Meter: DC and AC)

    ​ऊर्जा मीटर एक इंटीग्रेटिंग इंस्ट्रूमेंट (Integrating Instrument) है, जो समय के साथ खपत की गई कुल बिजली को लगातार जोड़ता और रिकॉर्ड करता रहता है।

    ​A. डीसी ऊर्जा मीटर (DC Energy Meter):

    • प्रकार: मुख्य रूप से मर्करी मोटर मीटर (Mercury Motor Meter) या कम्यूटेटर मोटर मीटर (Commutator Motor Meter) का उपयोग होता है।
    • सिद्धांत: यह एक छोटी डीसी मोटर की तरह काम करता है। इसकी गति लोड करंट के समानुपाती होती है। मोटर के घूमने से जुड़े गियर चक्र (Dials) रीडिंग को रिकॉर्ड करते हैं।

    ​B. एसी ऊर्जा मीटर (AC Energy Meter - Induction Type):

    ​यह हमारे घरों के बाहर लगने वाला पारंपरिक मीटर है (हालांकि अब डिजिटल/स्मार्ट मीटर आ गए हैं, लेकिन बुनियादी सिद्धांत इंडक्शन का ही था)।

    • मुख्य भाग:
      • शंट मैग्नेट (Shunt Magnet): इस पर प्रेशर कॉइल लिपटी होती है (वोल्टेज के समानांतर)।
      • सीरीज मैग्नेट (Series Magnet): इस पर करंट कॉइल होती है (लोड के श्रेणीक्रम में)।
      • एल्युमिनियम डिस्क (Aluminum Disc): दोनों मैग्नेट के बीच एक पतली एल्युमिनियम की डिस्क होती है जो घूमने के लिए स्वतंत्र होती है।
      • ब्रेकिंग मैग्नेट: डिस्क की गति को नियंत्रित करने के लिए एक स्थायी चुंबक (Permanent Magnet) होता है।
    • कार्य सिद्धांत: दोनों मैग्नेट द्वारा उत्पन्न अल्टरनेटिंग चुंबकीय फ्लक्स के कारण एल्युमिनियम डिस्क में एडी करंट (Eddy Current) पैदा होता है। इन फ्लक्स और एडी करंट की आपसी क्रिया से डिस्क पर एक टॉर्क (बलघूर्ण) लगता है, जिससे डिस्क घूमने लगती है। डिस्क के चक्करों की संख्या सीधे किलोवाट-घंटा (kWh) में ऊर्जा को दर्शाती है।

    ​4. संधारित्रों द्वारा शक्ति गुणनखंड का सुधार (Power Factor Correction by Capacitors)

    ​पावर फैक्टर (cos phi) क्या है?

    ​AC सर्किट में वास्तविक शक्ति (Active Power - kW) और आभासी शक्ति (Apparent Power - kVA) के अनुपात को पावर फैक्टर कहते हैं।

    • ​उद्योगों में इंडक्शन मोटर्स और ट्रांसफॉर्मर जैसे प्रेरक लोड (Inductive Load) के कारण करंट, वोल्टेज से पीछे छूट जाता है (Lagging Power Factor)।
    • ​कम पावर फैक्टर होने से सिस्टम में करंट बढ़ जाता है, जिससे तारों में भारी नुकसान (I^2R Losses) होता है और वोल्टेज ड्रॉप बढ़ जाता है। बिजली कंपनियां इस पर जुर्माना भी लगाती हैं।

    ​संधारित्र (Capacitors) द्वारा सुधार कैसे होता है?

    ​कैपेसिटर का स्वभाव अग्रगामी (Leading Power Factor) होता है, यानी इसमें करंट, वोल्टेज से आगे चलता है।

    1. समांतर कनेक्शन: पावर फैक्टर को सुधारने के लिए कैपेसिटर बैंक (Capacitor Bank) को इंडक्टिव लोड के समांतर (Parallel) में जोड़ा जाता है।
    2. प्रभाव: इंडक्टिव लोड को काम करने के लिए जो लैगिंग रिएक्टिव पावर (Reactive Power - kVAR) चाहिए होती है, कैपेसिटर खुद लीडिंग kVAR सप्लाई करके उसे सर्किट के अंदर ही संतुलित (Neutralize) कर देता है।
    3. परिणाम: पावर ग्रिड या मुख्य लाइन से ली जाने वाली कुल आभासी शक्ति (kVA) कम हो जाती है, करंट का मान घट जाता है, और पावर फैक्टर बढ़कर 1 (Unit) के करीब पहुँच जाता है। इससे बिजली के बिल में बचत होती है और सिस्टम की क्षमता बढ़ जाती है।

    ​क्या आप पावर फैक्टर सुधार के लिए आवश्यक कैपेसिटर की रेटिंग (kVAR गणना) के गणितीय सूत्र और उदाहरण को समझना चाहते हैं?





सरल गणना - बिजली और ऊर्जा की लागत से संबंधित सरल गणनाएँ,
मांग और ऊर्जा के लिए शुल्क लगाने की विधियों का प्रारंभिक ज्ञान।

विद्युत प्रणाली में बिजली के बिल की गणना और उस पर लगने वाले शुल्क (Tariff) को समझना उपभोक्ताओं और इंजीनियरों दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसे सरल भाषा और उदाहरणों के साथ समझते हैं:

​1. सरल गणना - बिजली और ऊर्जा की लागत (Electricity and Energy Cost Calculation)

​बिजली का बिल हमेशा ऊर्जा (Energy) की खपत पर आधारित होता है, जिसे किलोवाट-घंटा (kWh) या सामान्य भाषा में 'यूनिट' (Unit) कहा जाता है।

मुख्य सूत्र (Key Formulas):

  1. ऊर्जा (kWh) = {{शक्ति (Watts)} × {समय (Hours)}}/{1000}
  2. कुल लागत (Cost) = कुल यूनिट (kWh) × प्रति यूनिट दर (Rate per Unit)

उदाहरण से समझें:

​मान लीजिए एक घर में निम्नलिखित उपकरण रोज चलते हैं:

  • ​4 एलईडी बल्ब (9 Watts प्रत्येक) — 10 घंटे रोज
  • ​2 पंखे (75 Watts प्रत्येक) — 12 घंटे रोज
  • ​1 रेफ्रिजरेटर (200 Watts) — 24 घंटे रोज

स्टेप 1: कुल दैनिक शक्ति और ऊर्जा निकालें:

  • ​बल्बों की ऊर्जा: {(4 × 9) × 10}/{1000} = 0.36 { kWh}
  • ​पंखों की ऊर्जा: {(2 × 75) × 12}/{1000} = 1.80 { kWh}
  • ​रेफ्रिजरेटर की ऊर्जा: {200 × 24}/{1000} = 4.80 { kWh}

दैनिक कुल खपत = 0.36 + 1.80 + 4.80 = 6.96 { यूनिट (kWh)}

स्टेप 2: 30 दिन का बिल निकालें (यदि दर ₹7 प्रति यूनिट है):

  • ​महीने की कुल यूनिट = 6.96 × 30 = 208.8 { यूनिट}
  • कुल लागत = 208.8 × ₹7 = {₹1461.60}

​2. मांग और ऊर्जा के लिए शुल्क लगाने की विधियाँ (Electricity Tariff Methods)

​बिजली कंपनियों (Discoms) द्वारा ग्राहकों से बिजली का बिल वसूलने के लिए तय की गई दरों को टैरिफ (Tariff) कहते हैं। उद्योगों और बड़े उपभोक्ताओं के लिए शुल्क केवल यूनिट पर नहीं, बल्कि उनकी अधिकतम मांग (Maximum Demand) पर भी निर्भर करता है।

​यहाँ शुल्क लगाने की कुछ प्रारंभिक और प्रमुख विधियाँ दी गई हैं:

​A. फ्लैट रेट टैरिफ (Flat Rate Tariff)

​इसमें अलग-अलग प्रकार के लोड के लिए प्रति यूनिट की दर निश्चित (Fixed) होती है।

  • उदाहरण: प्रकाश (Lighting) के लिए ₹6/यूनिट और पावर लोड (जैसे हीटर या मोटर) के लिए ₹8/यूनिट।
  • फायदा: गणना बहुत सरल होती है।

​B. ब्लॉक रेट टैरिफ (Block Rate Tariff)

​इसमें ऊर्जा की खपत को अलग-अलग 'ब्लॉक्स' (Blocks) में बांटा जाता है। जैसे-जैसे उपभोक्ता अधिक बिजली का उपयोग करता है, अगली ब्लॉक की दर कम होती जाती है (या कुछ राज्यों में उपभोक्ताओं को हतोत्साहित करने के लिए दर बढ़ा दी जाती है)।

  • उदाहरण:
    • ​पहले 100 यूनिट के लिए: ₹5.00 प्रति यूनिट
    • ​अगले 100 यूनिट के लिए: ₹6.50 प्रति यूनिट
    • ​200 यूनिट से अधिक के लिए: ₹8.00 प्रति यूनिट

​C. द्वि-भाग टैरिफ (Two-Part Tariff)

​यह उद्योगों और वाणिज्यिक (Commercial) उपभोक्ताओं पर लागू होता है। इसमें बिल को दो भागों में विभाजित किया जाता है:

  1. नियत शुल्क (Fixed Charge): यह उपभोक्ता की अधिकतम मांग (Maximum Demand - kW या kVA) पर निर्भर करता है, चाहे वह बिजली का उपयोग करे या न करे। (यह कंपनी द्वारा उनके लिए ब्लॉक की गई क्षमता का किराया है)।
  2. रनिंग शुल्क (Running Charge): यह उपभोक्ता द्वारा वास्तव में खपत की गई ऊर्जा (kWh) पर निर्भर करता है।

{कुल बिल} = (A × {kW}) + (B × {kWh})


(जहाँ A = प्रति kW मांग की दर, और B = प्रति kWh ऊर्जा की दर)

​D. अधिकतम मांग टैरिफ (Maximum Demand Tariff)

​यह काफी हद तक टू-पार्ट टैरिफ जैसा ही है, लेकिन इसमें अधिकतम मांग को मापने के लिए उपभोक्ता के परिसर में एक विशेष मैक्सिमम डिमांड इंडिकेटर (MDI) मीटर लगाया जाता है। यदि उपभोक्ता अपनी स्वीकृत लोड सीमा (Sanctioned Load) से अधिक बिजली एक साथ खींचता है, तो भारी जुर्माना लगाया जाता है।

​E. समय के अनुसार टैरिफ (Time of Day - TOD Tariff)

​आधुनिक ग्रिड में इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसमें 24 घंटों को अलग-अलग समय (Peak, Off-Peak, और Normal hours) में बांटा जाता है।

  • पीक ऑवर्स (Peak Hours - जैसे शाम 6 से रात 10 बजे): इस समय बिजली की मांग सबसे ज्यादा होती है, इसलिए दरें महंगी होती हैं।
  • ऑफ-पीक ऑवर्स (Off-Peak Hours - जैसे रात 11 से सुबह 5 बजे): इस समय मांग बहुत कम होती है, इसलिए दरें काफी सस्ती होती हैं ताकि फैक्ट्रियां रात में काम करने के लिए प्रोत्साहित हों।

​क्या आप द्वि-भाग टैरिफ (Two-Part Tariff) के किसी औद्योगिक बिल की गणना को एक लाइव उदाहरण के साथ समझना चाहते हैं?




परीक्षण और दोष निवारण - डी.सी. और ए.सी. जनरेटर, मोटर, ओवरहेड वितरण लाइनें, भूमिगत केबल, विद्युत उपकरण और वायरिंग इंस्टॉलेशन में दोषों का पता लगाना और उनका स्थान निर्धारित करना।

दोषों का निवारण, इन्सुलेशन और निरंतरता परीक्षण। प्रत्येक अर्थिंग परीक्षण के लिए इन्सुलेशन प्रतिरोध का परीक्षण।

विद्युत प्रणालियों (Electrical Systems) में दोषों का पता लगाना (Fault Diagnosis), परीक्षण (Testing) और निवारण (Troubleshooting) करना एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर या तकनीशियन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इससे न केवल उपकरणों की उम्र बढ़ती है बल्कि गंभीर दुर्घटनाओं से भी बचाव होता है।

​यहाँ आपके द्वारा पूछे गए सभी विषयों का विस्तृत और व्यावहारिक विवरण दिया गया है:

​1. डी.सी. और ए.सी. मशीनें (जनरेटर और मोटर) में दोष निवारण

​मशीनों में मुख्य रूप से दो प्रकार के दोष आते हैं: इलेक्ट्रिकल (Electrical) और मैकेनिकल (Mechanical)

मुख्य दोष और उनका पता लगाना:

  1. शॉर्ट सर्किट और ओपन सर्किट (Short & Open Circuit): वाइंडिंग के तारों का आपस में जुड़ जाना या टूट जाना। इसे मल्टीमीटर या ग्रोलर (Growler) से टेस्ट किया जाता है।
  2. अर्थ फॉल्ट (Earth Fault): जब वाइंडिंग का कोई हिस्सा मोटर की बॉडी (मेटल फ्रेम) से छू जाता है। इसे मेगर (Megger) से चेक करते हैं।
  3. अत्यधिक गर्म होना (Overheating): ओवरलोडिंग, बेयरिंग में घर्षण या वेंटिलेशन ब्लॉक होने के कारण। इसके लिए थर्मल इमेजर या तापमान सेंसर का उपयोग होता है।
  4. कम्यूटेटर पर स्पार्किंग (केवल DC मशीनों में): कार्बन ब्रश के घिस जाने या गलत पोजीशन (MNA से हटने) के कारण।

निवारण (Troubleshooting):

  • ​यदि अर्थ फॉल्ट है, तो वाइंडिंग को दोबारा इंसुलेट (Rewinding/Varnishing) करें।
  • ​घिसे हुए कार्बन ब्रश और खराब बेयरिंग्स को तुरंत बदलें।

​2. ओवरहेड वितरण लाइनें (Overhead Distribution Lines)

​खुले आसमान में होने के कारण ये लाइनें मौसम और बाहरी कारकों से सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं।

मुख्य दोष:

  • शॉर्ट सर्किट फॉल्ट (Phase-to-Phase): तेज हवा के कारण तारों का आपस में टकराना या पेड़ की डाली गिरना।
  • ग्राउंड फॉल्ट (Phase-to-Earth): तार का टूटकर जमीन पर गिर जाना या इंसुलेटर का पंचर (Fail) हो जाना।
  • ओपन सर्किट: अत्यधिक खिंचाव या शॉर्ट सर्किट के कारण तार का बीच से टूट जाना।

दोष का स्थान निर्धारित करना (Fault Location):

  • दृश्य जांच (Visual Inspection): लाइन के साथ पेट्रोलिंग (गश्त) करके टूटे तार या इंसुलेटर को देखना।
  • दूरी रिले (Distance Relays): सबस्टेशन पर लगे आधुनिक रिले फॉल्ट की दूरी (Impedance के आधार पर) किलोमीटर में बता देते हैं।

​3. भूमिगत केबल (Underground Cables) में दोष खोजना

​चूंकि केबल जमीन के अंदर दबी होती है, इसलिए इसमें दोष को आंख से देखकर नहीं खोजा जा सकता। इसके लिए विशेष इलेक्ट्रिकल लूप टेस्ट किए जाते हैं।

दोष का स्थान निर्धारित करने की विधियाँ:

  1. मरे लूप टेस्ट (Murray Loop Test): यह व्हीटस्टोन ब्रिज (Wheatstone Bridge) के सिद्धांत पर काम करता है। इसका उपयोग केबल में 'अर्थ फॉल्ट' और 'शॉर्ट सर्किट फॉल्ट' की सटीक दूरी मापने के लिए किया जाता है। इसमें एक अच्छी केबल और दोषपूर्ण केबल को लूप बनाकर जोड़ा जाता है।
  2. वार्ले लूप टेस्ट (Varley Loop Test): यह भी व्हीटस्टोन ब्रिज पर आधारित है, लेकिन इसमें केबल का सटीक प्रतिरोध अलग से मापने की सुविधा होती है, जिससे फॉल्ट की दूरी अधिक सटीकता से मिलती है।
  3. टाइम डोमेन रिफ्लेक्टोमीटर (TDR - Cable Thumper): इसमें केबल के अंदर एक हाई-वोल्टेज पल्स (तरंग) भेजी जाती है। जहाँ दोष (Fault) होता है, वहाँ से तरंग टकराकर वापस आती है। तरंग के आने-जाने के समय से फॉल्ट की सटीक दूरी स्क्रीन पर दिख जाती है।

​4. विद्युत उपकरण और वायरिंग इंस्टॉलेशन

​घरेलू और औद्योगिक वायरिंग में सुरक्षा सबसे पहले आती है।

मुख्य दोष:

  • शॉर्ट सर्किट: फेज (Phase) और न्यूट्रल (Neutral) का आपस में मिल जाना (भारी करंट बहता है और MCB ट्रिप होती है)।
  • लीकेज करंट (Leakage Current): फेज वायर का दीवार की नमी या उपकरण की बॉडी से छूना (झटका लगना)।

निवारण:

  • ​दोषपूर्ण उपकरण को लाइन से अलग करें।
  • ​सही रेटिंग के फ्यूज, MCB और RCCB (Residual Current Circuit Breaker) का उपयोग करें।

​5. निरंतरता और इन्सुलेशन परीक्षण (Continuity & Insulation Testing)

​किसी भी नई वायरिंग या मरम्मत के बाद चार्ज करने से पहले ये दो टेस्ट अनिवार्य हैं:

​A. निरंतरता परीक्षण (Continuity Test):

  • उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि तार बीच में कहीं से टूटा तो नहीं है और कनेक्शन मजबूत है।
  • विधि: सर्किट की पावर बंद करके मल्टीमीटर को 'बजर' या ओह्म (Omega) मोड पर सेट करें। तार के दोनों सिरों पर प्रोब रखें। यदि बीप (Beep) की आवाज आती है, तो निरंतरता (Continuity) सही है।

​B. इन्सुलेशन प्रतिरोध परीक्षण (Insulation Resistance Test):

  • उद्देश्य: यह जांचना कि तारों के ऊपर चढ़ा प्लास्टिक/रबर का इंसुलेशन कमजोर तो नहीं हुआ है, जिससे करंट लीक हो सके।
  • उपकरण: इसके लिए मेगर (Megger - Insulation Tester) का उपयोग किया जाता है, जो उच्च डीसी वोल्टेज (500V या 1000V) उत्पन्न करता है।

​6. प्रत्येक अर्थिंग परीक्षण के लिए इन्सुलेशन प्रतिरोध का परीक्षण

​इंसुलेशन टेस्ट के दो मुख्य चरण होते हैं जो अर्थ (जमीन) के संदर्भ में लिए जाते हैं:

​1. कंडक्टरों और अर्थ के बीच परीक्षण (Testing between Conductors and Earth):

  • विधि: मुख्य स्विच को बंद (OFF) कर दिया जाता है, सभी फ्यूज लगा दिए जाते हैं और सभी स्विच चालू (ON) रखे जाते हैं। मेगर के एक टर्मिनल को 'अर्थ वायर' (E) से और दूसरे टर्मिनल को 'फेज/न्यूट्रल' (L/N) से जोड़ा जाता है।
  • मानक: भारतीय विद्युत नियमों (IE Rules) के अनुसार, इंसुलेशन प्रतिरोध का मान 1 मेगा-ओह्म (1{ M} Omega) से कम नहीं होना चाहिए।
  • गणितीय सूत्र: {इंसुलेशन प्रतिरोध} = {50}/{{आउटलेट की कुल संख्या}} { M} Omega

​2. कंडक्टरों के आपस के बीच परीक्षण (Testing between Conductors):

  • विधि: इस परीक्षण में सभी लैंप/बल्ब और उपकरण हटा दिए जाते हैं और सभी स्विच ON रखे जाते हैं। मेगर के दो टर्मिनलों को फेज (Phase) और न्यूट्रल (Neutral) तारों के बीच जोड़ा जाता है।
  • उद्देश्य: यह देखना कि दोनों तारों के बीच का इंसुलेशन आपस में लीक तो नहीं कर रहा है। इसका मान भी 1 { M} Omega से अधिक होना चाहिए।

​3. अर्थ इलेक्ट्रोड प्रतिरोध परीक्षण (Earth Electrode Resistance Test):

  • ​इंसुलेशन के अलावा, स्वयं अर्थ पिट (Earth Pit) का प्रतिरोध मापना भी जरूरी है। इसके लिए अर्थ टेस्टर (Earth Tester - 3 Point Method) का उपयोग होता है।
  • ​एक अच्छे अर्थिंग सिस्टम का प्रतिरोध बहुत कम होना चाहिए:
    • ​बड़े सबस्टेशन के लिए: < 0.5 Omega
    • ​घरेलू वायरिंग के लिए: < 1.0 Omega से 5.0 Omega तक।

​क्या आप भूमिगत केबल के मरे लूप टेस्ट (Murray Loop Test) के गणितीय सूत्र और उसकी गणना की विधि को विस्तार से समझना चाहते हैं?




सुरक्षा उपकरण - जनरेटर, मोटर, मशीन, इंस्टॉलेशन और उपकरणों की अर्थिंग का बुनियादी ज्ञान।
बिजली रोधक, उच्च टूटने की क्षमता वाले फ्यूज सहित फ्यूज,
कटआउट, सर्किट ब्रेकर, ओवरलोड और नो वोल्ट सुरक्षा,
थर्मल ट्रिप, फील्ड ब्रेकिंग स्विच और ओवर स्पीड सुरक्षा का उपयोग।

विद्युत प्रणालियों (Electrical Systems) में दुर्घटनाओं, आग और उपकरणों को जलने से बचाने के लिए सुरक्षा उपकरण (Protective Devices) सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हें विद्युत प्रणाली के "रक्षक" कहा जा सकता है।

​यहाँ आपके द्वारा पूछे गए सभी सुरक्षा उपकरणों और अर्थिंग का बुनियादी ज्ञान विस्तार से दिया गया है:

​1. अर्थिंग का बुनियादी ज्ञान (Basics of Earthing)

अर्थिंग (Earthing/Grounding) का अर्थ है—विद्युत उपकरणों के धातु वाले बाहरी आवरण (Metallic Body) को एक मोटे तांबे या जीआई (GI) तार के जरिए जमीन के अंदर दबी हुई धातु की प्लेट या रॉड से जोड़ना।

  • उद्देश्य: यदि किसी खराबी के कारण उपकरण की बॉडी में 'फेज का तार' छू जाता है, तो लीक होने वाला करंट सीधे जमीन में चला जाता है। इससे उस उपकरण को छूने वाले व्यक्ति को बिजली का झटका (Electric Shock) नहीं लगता
  • प्रकार: मुख्य रूप से प्लेट अर्थिंग (Plate Earthing) और पाइप अर्थिंग (Pipe Earthing) का उपयोग किया जाता है।
  • नियम: जनरेटर, मोटर, ट्रांसफार्मर और सभी घरेलू उपकरणों (जैसे रेफ्रिजरेटर, प्रेस) की धात्विक बॉडी की अर्थिंग अनिवार्य है।

​2. बिजली रोधक (Lightning Arrester - LA)

​यह एक ऐसा सुरक्षा उपकरण है जो ऊंची इमारतों, सबस्टेशनों और ओवरहेड लाइनों को आकाशीय बिजली (Lightning Strike) से बचाता है।

  • उपयोग: इसे बिजली की लाइन और जमीन के बीच जोड़ा जाता है। सामान्य स्थिति में यह करंट को जमीन में नहीं जाने देता (High Resistance)। लेकिन जैसे ही आकाशीय बिजली गिरती है, यह तुरंत एक शॉर्टकट रास्ता (Low Resistance Path) प्रदान करता है, जिससे लाखों वोल्ट का करंट बिना नुकसान पहुँचाए सीधे जमीन में समा जाता है।

​3. फ्यूज (Fuse) और उच्च टूटने की क्षमता वाले फ्यूज (HRC Fuse)

​फ्यूज विद्युत सर्किट का सबसे कमजोर हिस्सा होता है, जो ओवरकरंट (Overcurrent) और शॉर्ट सर्किट होने पर खुद पिघलकर सर्किट को तोड़ देता है।

  • साधारण फ्यूज (Kit-Kat / Rewireable Fuse): इसमें तांबे या सीसे (Lead-Tin) का पतला तार होता है। तार जलने पर इसे दोबारा बांधा जा सकता है। यह कम वोल्टेज और घरों के लिए ठीक है।
  • HRC फ्यूज (High Rupturing Capacity Fuse): यह एक बंद सेरामिक कारतूस (Cartridge) जैसा होता है, जिसके अंदर चांदी का फ्यूज वायर और चारों तरफ क्वार्ट्ज सैंड (Quartz Sand) भरी होती है।
    • उपयोग: इसका उपयोग भारी उद्योगों और सबस्टेशनों में होता है। यह बिना कोई चिंगारी (Arc) छोड़े बहुत भारी शॉर्ट-सर्किट करंट को बहुत तेजी से और सुरक्षित रूप से सुरक्षित रूप से काट देता है।

​4. कटआउट (Cut-out)

  • उपयोग: यह मूल रूप से एक भारी क्षमता वाला फ्यूज होल्डर या लिंक होता है जो बिजली कंपनी के खंभे से आने वाले सर्विस वायर और उपभोक्ता के मुख्य एनर्जी मीटर के बीच लगाया जाता है। यदि उपभोक्ता के घर में कोई बड़ा शॉर्ट सर्किट होता है या वह तय सीमा से बहुत ज्यादा लोड लेता है, तो यह कटआउट उड़ जाता है और पूरे घर की सप्लाई कट जाती है।

​5. सर्किट ब्रेकर (Circuit Breaker - CB)

​सर्किट ब्रेकर एक स्विचिंग डिवाइस है जो सामान्य स्थिति में करंट को चालू/बंद कर सकता है और फॉल्ट (जैसे शॉर्ट सर्किट) की स्थिति में अपने आप ट्रिप (OFF) हो जाता है। फ्यूज की तरह इसे बदलना नहीं पड़ता, इसे दोबारा 'रिसेट' (ON) किया जा सकता है।

  • प्रकार: MCB (Miniature CB - घरों के लिए), MCCB (Molded Case CB - उद्योगों के लिए), ACB (Air CB), और VCB (Vacuum CB - हाई वोल्टेज के लिए)।

​6. ओवरलोड और नो-वोल्ट सुरक्षा (Overload & No-Volt Protection)

​यह सुरक्षा मुख्य रूप से मोटर स्टार्टर्स (जैसे DOL या स्टार-डेल्टा स्टार्टर) में पाई जाती है।

  • ओवरलोड रिले (Overload Protection): जब मोटर अपनी क्षमता से अधिक लोड खींचती है, तो करंट बढ़ जाता है। ओवरलोड रिले इस बढ़े हुए करंट को भांप लेती है और मोटर के जलने से पहले ही स्टार्टर को ट्रिप कर देती है।
  • नो-वोल्ट कॉइल (No-Volt Coil / NVC): यदि चलती मोटर के दौरान अचानक बिजली चली जाए, तो यह सुरक्षा मोटर को बंद स्थिति में लॉक कर देती है। बिजली दोबारा आने पर मोटर अपने आप चालू नहीं होती, जब तक कि कोई दोबारा 'Start' बटन न दबाए। यह ऑपरेटर की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।

​7. थर्मल ट्रिप (Thermal Trip)

​यह ओवरलोड सुरक्षा का ही एक हिस्सा है जो गर्मी (Heat) के सिद्धांत पर काम करता है।

  • उपयोग: MCB और ओवरलोड रिले के अंदर एक द्वि-धात्विक पट्टी (Bi-metallic Strip) होती है। जब सर्किट में तय सीमा से अधिक करंट बहता है, तो गर्मी के कारण यह पट्टी मुड़ (Bend) जाती है। पट्टी के मुड़ते ही ट्रिपिंग मैकेनिज्म एक्टिवेट हो जाता है और स्विच तुरंत बंद (OFF) हो जाता है।

​8. फील्ड ब्रेकिंग स्विच (Field Breaking Switch)

​यह सुरक्षा विशेष रूप से डी.सी. जनरेटर और अल्टरनेटर (AC Generator) के लिए होती है।

  • उपयोग: जनरेटर के रोटर या फील्ड वाइंडिंग में बहुत भारी चुंबकीय ऊर्जा जमा होती है। यदि फील्ड सर्किट को अचानक सामान्य स्विच से बंद कर दिया जाए, तो भारी स्पार्किंग होगी और इंसुलेशन जल जाएगा। फील्ड ब्रेकिंग स्विच को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि सर्किट टूटने से ठीक पहले, यह फील्ड वाइंडिंग को एक 'डिस्चार्ज रेजिस्टेंस' (Discharge Resistor) से जोड़ देता है, जिससे चुंबकीय ऊर्जा सुरक्षित रूप से शांत हो जाती है।

​9. ओवर स्पीड सुरक्षा (Over-speed Protection)

​यदि कोई जनरेटर या मोटर अपनी तय मानक गति (Rated Speed / RPM) से बहुत तेज घूमने लगे, तो अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force) के कारण उसके घूमने वाले भाग (Rotor/Armature) के परखच्चे उड़ सकते हैं।

  • उपयोग: बड़े टर्बाइन, जनरेटर और मोटर्स में एक मैकेनिकल गवर्नर या इलेक्ट्रॉनिक सेंसर (Tachometer) लगा होता है। जैसे ही गति सुरक्षित सीमा (मान लीजिए 115%) से ऊपर जाती है, यह सुरक्षा उपकरण तुरंत मुख्य इनपुट (जैसे स्टीम/पानी का वाल्व या बिजली की सप्लाई) को बंद कर देता है और मशीन रुक जाती है।

​क्या आप इनमें से किसी विशिष्ट सुरक्षा उपकरण (जैसे MCB का आंतरिक कार्य सिद्धांत या HRC फ्यूज की संरचना) के बारे में और गहराई से जानना चाहते हैं?




ओवरहेड लाइनें
• सर्वेक्षण, डिज़ाइन, निर्माण मानक, नींव
स्थापना, तार बिछाना और निर्माण उपकरण।
• परीक्षण, दोष का पता लगाना, चालू करना, रखरखाव
और सुरक्षा उपाय, जिनमें सुरक्षा उपकरण और परीक्षण उपकरण शामिल हैं।
• सपोर्ट, क्रॉस आर्म, ब्रैकेट, स्टे, स्ट्रट, इंसुलेटर और संबंधित हार्डवेयर का चयन।
• कंडक्टरों के प्रकार और आकार, स्पैन की लंबाई, सैग,
कंडक्टरों के बीच की दूरी, तापमान, हवा का दबाव, बर्फ और हिमपात का कंडक्टरों पर तनाव पर प्रभाव,
कंडक्टरों पर बिजली गिरने का प्रभाव।
• अर्थिंग, लाइटनिंग अरेस्टर, गार्ड वायर, रिले और
अन्य सुरक्षा उपकरण।

यह खंड ओवरहेड विद्युत वितरण और पारेषण लाइनों (Overhead Transmission & Distribution Lines) के इंजीनियरिंग, निर्माण, संचालन और सुरक्षा का संपूर्ण ब्लूप्रिंट है। ग्रिड से बिजली को उपभोक्ताओं तक सुरक्षित पहुँचाने के लिए इन सभी चरणों का कड़ाई से पालन किया जाता है।

​यहाँ प्रत्येक बिंदु को विस्तार से समझाया गया है:

​1. सर्वेक्षण, डिज़ाइन, निर्माण मानक और नींव (Survey, Design & Foundation)

​किसी भी ओवरहेड लाइन को बिछाने से पहले की तैयारी और सिविल कार्य इस चरण में आते हैं:

  • सर्वेक्षण (Survey): सबसे छोटा, सीधा और सुरक्षित रास्ता चुनने के लिए रूट सर्वे किया जाता है। इसमें नदियों, सड़कों, रेलवे लाइनों और पेड़ों जैसे अवरोधों (Obstacles) को चिन्हित किया जाता है।
  • डिज़ाइन और निर्माण मानक (Design Standards): भारतीय विद्युत नियम (IE Rules) और CEA (Central Electricity Authority) के मानकों के अनुसार खंभों की ऊंचाई, दो खंभों के बीच की दूरी (Span) और जमीन से तारों की न्यूनतम ऊंचाई (Clearance) तय की जाती है।
  • नींव (Foundation): खंभों या टावरों को हवा के भारी दबाव और तारों के वजन को झेलने के लिए कंक्रीट की मजबूत नींव में गाड़ा जाता है। रेतीली या दलदली जमीन में विशेष 'मड-फाउंडेशन' या गहरी पाइलिंग की जाती है।
  • निर्माण उपकरण: खंभे खड़े करने के लिए क्रेन, डिगर्स (Digger Derricks) और तारों को खींचने के लिए विंच मशीन (Winch)टेंशनर (Tensioner) का उपयोग होता है।

​2. सपोर्ट, क्रॉस आर्म, इंसुलेटर और संबंधित हार्डवेयर

​ये ओवरहेड लाइन के यांत्रिक (Mechanical) सुरक्षा कवच हैं:

  • सपोर्ट (Supports/Poles): वोल्टेज के अनुसार आरसीसी (RCC) पोल, स्टील ट्यूबलर पोल या बड़े स्टील लैटिस टावर (Lattice Towers) का चयन किया जाता है।
  • क्रॉस आर्म और ब्रैकेट (Cross Arms): ये खंभे के शीर्ष पर लगी लोहे की चैनल (Channel) होती हैं, जो इंसुलेटर और तारों को खंभे की मुख्य बॉडी से दूर रखती हैं ताकि करंट खंभे में न उतरे।
  • स्टे और स्ट्रट (Stay & Strut):
    • स्टे (Stay Wire): लाइन के अंत में या मोड़ों (Corners) पर खंभे को पीछे की तरफ खींचकर रखने वाला मजबूत स्टील का तार।
    • स्ट्रट (Strut): खंभे को झुकने से रोकने के लिए आगे से लगाया गया एक अतिरिक्त सपोर्ट पोल।
  • इंसुलेटर (Insulators): ये करंट को खंभे में जाने से रोकते हैं। चीनी मिट्टी (Porcelain) या पॉलीमर के बने होते हैं:
    • पिन इंसुलेटर (Pin Insulator): कम वोल्टेज (33kV तक) के लिए सीधे खड़े लगाए जाते हैं।
    • सस्पेंशन/डिस्क इंसुलेटर (Suspension): हाई वोल्टेज लाइनों में लटकते हुए डिस्क की लड़ (String) के रूप में।
    • शैकल इंसुलेटर (Shackle): मोड़ों या तीखे अंत पर तारों का भारी खिंचाव झेलने के लिए।

​3. कंडक्टर: प्रकार, आकार, सैग (Sag) और मौसम का प्रभाव

​तारों का चयन और उन पर प्रकृति का प्रभाव लाइन के जीवनकाल को तय करता है:

  • कंडक्टरों के प्रकार: आजकल शुद्ध तांबे या एल्युमिनियम की जगह ACSR (Aluminum Conductor Steel Reinforced) तारों का उपयोग होता है। इसमें बीच में स्टील का तार (मजबूती के लिए) और चारों तरफ एल्युमिनियम के तार (बिजली ले जाने के लिए) लिपटे होते हैं।
  • सैग (Sag): दो खंभों के बीच बंधे तार के सबसे निचले बिंदु और सीधे काल्पनिक स्तर के बीच के झुकाव या झोल को सैग (Sag) कहते हैं।

मौसम और तनाव का प्रभाव (Environmental Impact):

  • तापमान: गर्मी में तार फैलते हैं, जिससे सैग (झोल) बढ़ जाता है। ठंड में तार सिकुड़ते हैं, जिससे सैग कम होता है लेकिन तार पर तनाव (Tension) बहुत बढ़ जाता है।
  • हवा का दबाव: तेज हवा तारों को एक तरफ धकेलती है, जिससे इंसुलेटर और खंभों पर तिरछा (Lateral) लोड बढ़ जाता है।
  • बर्फ और हिमपात: ठंडे इलाकों में तारों पर बर्फ जमने से उनका वजन भारी हो जाता है, जिससे तार टूटने या खंभे गिरने का खतरा रहता है।

​4. कंडक्टरों पर बिजली गिरने का प्रभाव और आकाशीय बिजली

  • प्रभाव: जब ओवरहेड लाइन पर आकाशीय बिजली (Lightning) गिरती है, तो लाइन में अचानक लाखों वोल्ट का सर्ज वोल्टेज (Surge Voltage) पैदा हो जाता है। यह हाई-वोल्टेज तरंग सीधे सबस्टेशन की तरफ भागती है और वहाँ लगे महंगे ट्रांसफार्मर और उपकरणों को पल भर में फूंक सकती है।

​5. अर्थिंग, लाइटनिंग अरेस्टर, गार्ड वायर और रिले (Protection)

​बिजली और अन्य फॉल्ट्स के प्रभाव को निष्क्रिय करने के लिए सुरक्षा प्रणालियाँ:

  • लाइटनिंग अरेस्टर (Lightning Arrester - LA): इन्हें सबस्टेशन के प्रवेश द्वार पर और मुख्य लाइनों पर लगाया जाता है ताकि बिजली के हाई-वोल्टेज सर्ज को तुरंत जमीन में डिस्चार्ज किया जा सके।
  • गार्ड वायर (Guard Wire / Earth Wire): टावरों के सबसे शीर्ष (Top) पर एक पतला गैल्वेनाइज्ड स्टील का तार दौड़ता है। यह कोई बिजली प्रवाहित नहीं करता, बल्कि इसका काम आकाशीय बिजली को सीधे अपने ऊपर झेलकर टावर की बॉडी के रास्ते जमीन में भेजना है, ताकि नीचे के मुख्य फेज वायर सुरक्षित रहें। खंभों के नीचे (रोड क्रॉसिंग पर) नेट गार्डिंग भी की जाती है ताकि तार टूटने पर जमीन पर न गिरे।
  • रिले (Relays): ओवरहेड लाइन में शॉर्ट सर्किट या अर्थ फॉल्ट होने पर डिस्टेंस रिले या ओवरकरंट रिले फॉल्ट को तुरंत पहचानकर सर्किट ब्रेकर को ट्रिप होने का सिग्नल भेजती हैं।

​6. परीक्षण, दोष खोजना, चालू करना और रखरखाव (Testing & Commissioning)

​लाइन को चालू करने और जिंदा रखने की प्रक्रिया:

  • चालू करने से पहले के परीक्षण (Pre-commissioning Tests):
    • इंसुलेशन रेजिस्टेंस टेस्ट: मेगर से जांचना कि कोई फेज तार पोल से शॉर्ट तो नहीं है।
    • कंटिन्यूटी टेस्ट: यह जांचना कि पूरी लाइन में करंट का रास्ता साफ है।
    • क्लियरेंस चेक: यह मापना कि तार जमीन या पेड़ों से सुरक्षित दूरी पर हैं।
  • दोष का पता लगाना (Fault Detection): जैसा कि पिछले उत्तर में चर्चा की गई, दृश्य गश्त (Visual Patrol) और सबस्टेशन के दूरी रिले (Distance Relays) से फॉल्ट का स्थान और दूरी खोजी जाती है।
  • सुरक्षा उपाय और रखरखाव: लाइन पर काम करने से पहले 'परमिट टू वर्क' (PTW) लिया जाता है। लाइन को दोनों तरफ से बंद करके डिटैचेबल अर्थ रॉड (Discharge Rods) से अस्थाई रूप से ग्राउंड (Earth) किया जाता है ताकि यदि गलती से कोई ग्रिड चालू भी कर दे, तो तकनीशियन को झटका न लगे।

​क्या आप ACSR कंडक्टर के अंदर सैग (Sag) और तनाव (Tension) की गणना करने के गणितीय सूत्र को समझना चाहते हैं?





केबल
• केबलों का वर्गीकरण, चयन के मानदंड
बिजली केबल, पीवीसी और एक्सएलपीई भूमिगत केबल।
केबल बिछाने के लिए परीक्षणों का वर्गीकरण, केबल ड्रमों का सुरक्षित संचालन, केबल जोड़, केबल टर्मिनेशन, क्रिम्प कनेक्शन, विद्युत केबल का रखरखाव, लचीली केबल, पोर्टेबल मशीनों के लिए लचीली केबल, भूमिगत केबल प्रणाली में खराबी, भूमिगत केबल प्रणाली में खराबी का पता लगाने के तरीके

भूमिगत केबल (Underground Cables) आधुनिक विद्युत प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। घनी आबादी वाले शहरों, सबस्टेशनों और उद्योगों में जहां ओवरहेड लाइनें ले जाना असुरक्षित या असंभव होता है, वहां केबलों का उपयोग किया जाता है।

​यहाँ केबल इंजीनियरिंग से जुड़े आपके सभी बिंदुओं का विस्तृत और व्यवस्थित विवरण दिया गया है:

​1. केबलों का वर्गीकरण (Classification of Cables)

​केबलों को उनकी वोल्टेज वहन क्षमता (Voltage Capacity) के आधार पर मुख्य रूप से वर्गीकृत किया जाता है:

केबल का प्रकार

वोल्टेज रेंज (Voltage Range)

लो टेंशन (L.T. Cables)

1 { kV} (1000 Volts) तक

हाई टेंशन (H.T. Cables)

11 { kV} तक

सुपर टेंशन (S.T. Cables)

22 { kV} से 33 { kV} तक

एक्स्ट्रा हाई टेंशन (E.H.T. Cables)

33 { kV} से 66 { kV} तक

ऑयल फील्ड और गैस केबल्स

66 { kV} से ऊपर



2. चयन के मानदंड (Criteria for Cable Selection)

​किसी भी प्रोजेक्ट के लिए सही केबल चुनते समय निम्नलिखित कारकों को देखा जाता है:

  • सिस्टम वोल्टेज: केबल का इंसुलेशन सिस्टम के वोल्टेज (L.T. या H.T.) को झेलने लायक होना चाहिए।
  • करंट वहन क्षमता (Current Carrying Capacity): लोड के अनुसार तार की मोटाई (Cross-sectional Area) तय की जाती है ताकि केबल गर्म होकर न जले।
  • वोल्टेज ड्रॉप (Voltage Drop): लंबी दूरी के लिए केबल के प्रतिरोध के कारण होने वाले वोल्टेज ड्रॉप को सीमा के भीतर (3% से 5%) रखना।
  • पर्यावरणीय स्थिति: मिट्टी की प्रकृति (नमी, रासायनिक सक्रियता), तापमान और गहराई।

​3. पीवीसी (PVC) और एक्सएलपीई (XLPE) भूमिगत केबल

​ये आज के समय में उपयोग होने वाले दो सबसे प्रमुख पावर केबल्स हैं:

​A. पीवीसी केबल (Polyvinyl Chloride Cables):

  • विशेषता: इसका इंसुलेशन सिंथेटिक प्लास्टिक (PVC) का होता है।
  • तापमान सीमा: यह अधिकतम 70^circ {C} के ऑपरेटिंग तापमान को झेल सकता है।
  • उपयोग: मुख्य रूप से घरेलू वायरिंग, कंट्रोल पैनल्स और लो-टेंशन (1{ kV} तक) औद्योगिक कार्यों में।

​B. एक्सएलपीई केबल (Cross-Linked Polyethylene Cables):

  • विशेषता: इसका इंसुलेशन पॉलीथीन के अणुओं को क्रॉस-लिंक करके बनाया जाता है, जिससे इसकी यांत्रिक और थर्मल मजबूती बहुत बढ़ जाती है।
  • तापमान सीमा: यह अधिकतम 90^circ {C} (और शॉर्ट सर्किट में 250^circ {C} तक) का तापमान झेल सकता है।
  • उपयोग: यह आज के समय में 11 { kV}, 33 { kV} और उससे ऊपर की हाई-टेंशन (H.T.) भूमिगत प्रणालियों के लिए मानक (Standard) केबल है।

​4. केबल बिछाने के लिए परीक्षण (Classification of Cable Tests)

​केबल के निर्माण से लेकर उसे जमीन में बिछाने (Laying) और चालू करने तक तीन प्रकार के टेस्ट होते हैं:

  1. टाइप टेस्ट (Type Tests): केबल के डिजाइन और गुणवत्ता को प्रमाणित करने के लिए निर्माता की लैब में किए जाने वाले विनाशकारी परीक्षण (जैसे मेल्टिंग टेस्ट, टेंसाइल स्ट्रेंथ टेस्ट)।
  2. रूटीन टेस्ट (Routine Tests): फैक्ट्री से निकलने से पहले प्रत्येक केबल ड्रम पर किए जाने वाले टेस्ट (जैसे- इंसुलेशन रेजिस्टेंस टेस्ट, हाई वोल्टेज टेस्ट)।
  3. कमीशनिंग/साइट टेस्ट (Site/Pre-commissioning Tests): केबल को जमीन में बिछाने के बाद और बिजली चालू करने से पहले साइट पर किए जाने वाले टेस्ट (जैसे मेगर टेस्ट और एचवी डीसी टेस्ट), ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बिछाते समय केबल कहीं से कटी या डैमेज नहीं हुई है।

​5. केबल ड्रमों का सुरक्षित संचालन (Safe Handling of Cable Drums)

​भारी केबल ड्रमों के साथ लापरवाही बरतने से केबल अंदर से डैमेज हो सकती है। सुरक्षित संचालन के नियम निम्नलिखित हैं:

  • रोलिंग की दिशा: ड्रम पर हमेशा एक तीर (Arrow) का निशान होता है। ड्रम को हमेशा उसी तीर की दिशा में ही रोल (लुढ़काना) चाहिए, नहीं तो केबल ढीली होकर आपस में उलझ जाएगी।
  • उठाना (Lifting): क्रेन से उठाते समय ड्रम के बीच के छेद में एक मजबूत स्टील की शाफ्ट (रॉड) डालनी चाहिए और स्प्रेडर बार का उपयोग करना चाहिए ताकि केबल के किनारों पर दबाव न पड़े।
  • भंडारण (Storage): ड्रमों को हमेशा समतल जमीन पर सीधा (Flanges पर खड़ा) रखना चाहिए, उन्हें कभी भी जमीन पर चपटा (Flat/Horizontal) नहीं लेटाना चाहिए।

​6. केबल जोड़, टर्मिनेशन और क्रिम्प कनेक्शन (Joints, Terminations & Crimping)

  • केबल जोड़ (Cable Joints): जब दो केबलों की लंबाई को आपस में जोड़ना हो, तो स्ट्रेट-थ्रू जॉइंट्स (Straight-Through Joints) का उपयोग होता है। आजकल इसके लिए हीट श्रिंक केबल जॉइंटिंग किट (Heat Shrink Kits) का उपयोग किया जाता है, जो जोड़ को पूरी तरह से वॉटरप्रूफ और इंसुलेटेड बना देती है।
  • केबल टर्मिनेशन (Cable Termination): केबल के अंतिम सिरे को जब किसी सबस्टेशन, ट्रांसफार्मर या स्विचगियर से जोड़ना होता है, तो उसे बाहरी वातावरण (नमी, धूल) से बचाने के लिए 'इंडोर' या 'आउटडोर' टर्मिनेशन किट लगाई जाती है। इसमें केबल ग्लैंड (Cable Gland) का उपयोग करके केबल को कसकर लॉक किया जाता है।
  • क्रिम्प कनेक्शन (Crimp Connection / Lugging): केबल के कोर (कंडक्टर) को किसी नट-बोल्ट से जोड़ने के लिए उसके सिरे पर तांबे या एल्युमिनियम का लग्ज (Lug) लगाया जाता है। एक विशेष क्रिम्पिंग टूल (Crimping Tool) की मदद से भारी दबाव डालकर लग्ज़ को तार के ऊपर मजबूती से दबा दिया जाता है। इससे ढीले कनेक्शन (Loose Connections) और स्पार्किंग की समस्या खत्म हो जाती है।

​7. लचीली और पोर्टेबल केबल (Flexible and Portable Cables)

  • लचीली केबल (Flexible Cables): इन केबलों में एक मोटा ठोस तार होने के बजाय, पतले-पतले तांबे के दर्जनों तारों को आपस में गूंथकर (Stranded Conductor) बनाया जाता है। इसके ऊपर लचीला रबर या पीवीसी इंसुलेशन होता है, जिससे केबल आसानी से मुड़ सकती है।
  • पोर्टेबल मशीनों के लिए लचीली केबल: क्रेन, वेल्डिंग मशीन, कोयला खदानों की ड्रिल मशीनों और पोर्टेबल पावर टूल्स में इनका उपयोग होता है। इन्हें बार-बार मुड़ना, खिंचना और घिसना पड़ता है, इसलिए इनके ऊपर एक अतिरिक्त भारी रबर कवच जिसे Tough Rubber Sheathed (TRS) या टायर ट्यूब शेथ (TTS) कहते हैं, चढ़ा होता है।

​8. विद्युत केबल का रखरखाव (Maintenance of Electrical Cables)

​चूंकि केबल जमीन के नीचे होती हैं, इसलिए इनका रखरखाव मुख्य रूप से प्रिवेंटिव (Preventive) होता है:

  • रूट पेट्रोलिंग: केबल के रूट पर नियमित गश्त करना ताकि कोई अन्य एजेंसी (जैसे जेसीबी या नगर निगम) वहां बिना अनुमति के खुदाई करके केबल को न काट दे।
  • केबल इंडिकेटर की जांच: जमीन पर लगे केबल मार्ग के पत्थरों/बोर्ड्स (Route Indicators) का रखरखाव।
  • सालाना इंसुलेशन टेस्ट: वर्ष में एक बार (विशेषकर मानसून से पहले) मेगर के जरिए इंसुलेशन प्रतिरोध मापकर रिकॉर्ड रखना ताकि खराबी आने से पहले ही उसका पता चल सके।

​9. भूमिगत केबल प्रणाली में खराबी और उसका पता लगाने के तरीके

​जमीन के नीचे दबी केबलों में मुख्य रूप से तीन प्रकार के दोष (Faults) आते हैं:

  1. ओपन सर्किट फॉल्ट (Open Circuit Fault): केबल का कंडक्टर अंदर से टूट जाना।
  2. शॉर्ट सर्किट फॉल्ट (Short Circuit Fault): दो या दो से अधिक फेजों के इंसुलेशन फेल होने के कारण उनका आपस में जुड़ जाना।
  3. अर्थ फॉल्ट / ग्राउंड फॉल्ट (Earth Fault): केबल के फेज वायर का इंसुलेशन कटकर उसके बाहरी धात्विक कवच (Armour) या जमीन से छू जाना।

खराबी का पता लगाने और स्थान निर्धारित करने के तरीके (Fault Location Methods):

  • ब्लंट/विजुअल गश्त (यदि केबल ट्रेंच में है): खुली केबल ट्रेंच में डैमेज या जले हुए हिस्से को आंख से देखना।
  • लूप टेस्ट (Loop Tests): जैसा कि पिछले खंड में बताया गया, मरे लूप टेस्ट (Murray Loop Test) और वार्ले लूप टेस्ट (Varley Loop Test) व्हीटस्टोन ब्रिज के सिद्धांत पर अर्थ फॉल्ट और शॉर्ट सर्किट की दूरी सटीक रूप से (प्रतिरोध की गणना करके) मीटर में बता देते हैं।
  • टाइम डोमेन रिफ्लेक्टोमीटर (TDR / Cable Thumper): आधुनिक और सबसे सटीक तरीका। यह केबल में एक हाई-वोल्टेज पल्स भेजता है। जहां केबल टूटी या शॉर्ट होती है, वहां से पल्स परावर्तित (Reflect) होकर वापस आती है। पल्स के आने-जाने के समय को मापकर मीटर स्क्रीन पर फॉल्ट की दूरी का सटीक ग्राफ (Waveform) दिखा देता है।

​क्या आप हीट श्रिंक टर्मिनेशन किट को स्थापित करने के व्यावहारिक चरणों या TDR मीटर के ग्राफ को पढ़ने के तरीके के बारे में जानना चाहते हैं?





सबस्टेशन और कंट्रोल रूम:
• एचटी ट्रांसफार्मर और संबंधित उपकरणों (जैसे सीबी, आइसोलेटर, लास, कैपेसिटर, सीटी, पीटी आदि) का लेआउट, डिजाइन और निर्माण मानक
• पावर और डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर - उनकी स्थापना, कमीशनिंग, फॉल्ट लोकेशन और रखरखाव
• प्रोटेक्टिव रिले और मापन उपकरण और उनका नेटवर्क
ट्रांसफार्मर सुरक्षा, जनरेटर, डीजल जनरेटर सुरक्षा
• केबल और परीक्षण उपकरणों का परीक्षण, कमीशनिंग, फॉल्ट लोकेशन, रखरखाव और सुरक्षा

• कैपेसिटर बैंकों का डिजाइन और स्थापना और उनका रखरखाव
• स्टेशन बैटरी और संचार प्रणाली सहित कंट्रोल रूम उपकरणों की स्थापना, परीक्षण, कमीशनिंग और रखरखाव

यह खंड इलेक्ट्रिकल सबस्टेशन (Substation) और कंट्रोल रूम (Control Room) की इंजीनियरिंग, डिजाइन, सुरक्षा और परिचालन (Operations) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सबस्टेशन ग्रिड का वह केंद्र बिंदु है जो वोल्टेज को बदलने (Step-up/Step-down) और बिजली के सुरक्षित वितरण को नियंत्रित करता है।

​यहाँ आपके द्वारा पूछे गए सभी मुख्य बिंदुओं का विस्तृत और व्यवस्थित तकनीकी विवरण दिया गया है:

​1. HT सबस्टेशन का लेआउट, डिजाइन और निर्माण मानक

​एक हाई-टेंशन (HT) सबस्टेशन (जैसे 33kV/11kV या 132kV) में उपकरणों को एक निश्चित क्रम में लगाया जाता है ताकि बिजली का प्रवाह सुरक्षित और नियंत्रित रहे।

मुख्य उपकरण और उनका कार्य:

  • लाइटनिंग अरेस्टर (LA): सबस्टेशन के प्रवेश द्वार (Incomer) पर सबसे पहले लगाया जाता है ताकि आकाशीय बिजली को ग्रिड में घुसने से पहले जमीन में डिस्चार्ज किया जा सके।
  • आइसोलेटर (Isolator): यह एक मैकेनिकल स्विच है जो 'नो-लोड' (No-Load) स्थिति में सर्किट को शारीरिक रूप से अलग करता है। यह रखरखाव के समय दृश्य सुरक्षा (Visual Isolation) प्रदान करता है।
  • करंट ट्रांसफार्मर (CT) और पोटेंशियल ट्रांसफार्मर (PT): इन्हें इंस्ट्रूमेंट ट्रांसफार्मर कहते हैं। ये हाई वोल्टेज और भारी करंट को कम करके (जैसे 5A या 110V) सुरक्षा रिले और मापन मीटरों (Ammeter/Voltmeter) को इनपुट देते हैं।
  • सर्किट ब्रेकर (CB): यह सबस्टेशन का मुख्य 'हार्ट' है जो लोड की स्थिति में और फॉल्ट होने पर भारी शॉर्ट-सर्किट करंट को बिना नुकसान पहुँचाए स्वचालित रूप से (Automatically) काट देता है। (जैसे- SF6 या वैक्यूम सर्किट ब्रेकर)।
  • बसबार (Busbar): तांबे या एल्युमिनियम की भारी छड़ें जहाँ से कई लाइनें (Feeders) आपस में जुड़ती और विभाजित होती हैं।

​2. पावर और डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर (Installation, Commissioning & Maintenance)

स्थापना और चालू करना (Installation & Commissioning):

  • नींव और अलाइनमेंट: भारी ट्रांसफार्मर को कंक्रीट के मजबूत पैड पर स्थापित किया जाता है। इसके नीचे ऑयल ड्रेनेज पिट (Oil Drainage Pit) बनाया जाता है ताकि आग लगने की स्थिति में तेल जमीन के अंदर चला जाए।
  • कमीशनिंग टेस्ट (चालू करने से पहले):
    • इंसुलेशन रेजिस्टेंस (IR) टेस्ट: मेगर द्वारा वाइंडिंग के बीच का इंसुलेशन मापना।
    • वोल्टेज टर्न रेशियो टेस्ट (Turns Ratio): यह जांचना कि वोल्टेज का अनुपात डिजाइन के अनुसार है या नहीं।
    • मैग्नेटिक बैलेंस टेस्ट: कोर की चुंबकीय स्थिति की जांच।
    • BDV (Breakdown Voltage) टेस्ट: ट्रांसफार्मर के तेल (Transformer Oil) की इंसुलेशन क्षमता की जांच। मानक के अनुसार यह 30 { kV} से ऊपर होना चाहिए।

रखरखाव (Maintenance):

  • नियमित (Daily/Monthly): सिलिका जेल (Silica Gel) के रंग की जांच करना (नीला होना चाहिए, गुलाबी होने पर नमी सोख चुका होता है और इसे बदलना पड़ता है)। तेल का स्तर (Oil Level) चेक करना।
  • सालाना (Annual): तेल का फिल्ट्रेशन (Dehydration), बुशिंग्स की सफाई और अर्थिंग पिट्स के प्रतिरोध की जांच।

​3. सुरक्षा रिले, मापन उपकरण और नेटवर्क (Protection & Metering)

​सबस्टेशन का कंट्रोल रूम सुरक्षा रिले का दिमाग होता है।

  • सुरक्षा रिले (Protective Relays): आज के समय में न्यूमेरिकल रिले (Microprocessor-based) का उपयोग होता है। ये CT/PT से सिग्नल लेती हैं और फॉल्ट की स्थिति में मिलीसेकंड के भीतर सर्किट ब्रेकर को ट्रिपिंग सिग्नल भेजती हैं।
  • नेटवर्क (SCADA/EMS): आधुनिक सबस्टेशनों में सभी रिले और ब्रेकर्स SCADA (Supervisory Control and Data Acquisition) प्रणाली के माध्यम से कंप्यूटर स्क्रीन से जुड़े होते हैं, जहाँ से पूरे सबस्टेशन को दूर बैठकर भी मॉनिटर और कंट्रोल किया जा सकता है।

​4. ट्रांसफार्मर, जनरेटर और डीजल जनरेटर (DG) सुरक्षा

​भारी और महंगे जनरेटिंग सेट और ट्रांसफार्मर को बचाने के लिए विशेष सुरक्षा प्रणालियाँ लगाई जाती हैं:

​A. ट्रांसफार्मर सुरक्षा:

  • बुखोलज रिले (Buchholz Relay): यह केवल ऑयल-इमर्स्ड ट्रांसफार्मर के मुख्य टैंक और कंजर्वेटर के बीच पाइप में लगती है। यह ट्रांसफार्मर के अंदरूनी छोटे फॉल्ट्स (जैसे इंसुलेशन का धीमा जलना) से बनने वाली गैस और तेल के दबाव को भांपकर अलार्म बजाती है या ट्रिप करती है।
  • डिफरेंशियल प्रोटेक्शन (Differential Protection): यह ट्रांसफार्मर के अंदर आने और बाहर जाने वाले करंट के अंतर को मापती है। यदि अंदरूनी शॉर्ट सर्किट होता है, तो यह तुरंत बिना किसी देरी के ट्रांसफार्मर को ट्रिप कर देती है।
  • WTI और OTI: वाइंडिंग टेम्परेचर इंडिकेटर (WTI) और ऑयल टेम्परेचर इंडिकेटर (OTI) जो अत्यधिक गर्म होने पर सुरक्षा प्रदान करते हैं।

​B. जनरेटर और डीजल जनरेटर (DG) सुरक्षा:

  • डिफरेंशियल रिले (Merz-Price Protection): जनरेटर की स्टेटर वाइंडिंग के आंतरिक शॉर्ट सर्किट के खिलाफ मुख्य सुरक्षा।
  • रिवर्स पावर प्रोटेक्शन (Reverse Power): यदि इंजन/डीजल इंजन फेल हो जाए, तो जनरेटर ग्रिड से बिजली लेकर खुद मोटर की तरह घूमने न लगे, इससे बचाने के लिए।
  • ओवर-स्पीड और ओवर-फ्लेक्सिंग सुरक्षा।
  • असंतुलित लोड सुरक्षा (Negative Phase Sequence): तीनों फेजों पर लोड का अंतर बहुत ज्यादा होने से रोकने के लिए।

​5. कैपेसिटर बैंक: डिजाइन, स्थापना और रखरखाव

​पावर फैक्टर को 0.95 से 1.00 के बीच बनाए रखने के लिए सबस्टेशन में बसबार के समांतर कैपेसिटर बैंक (Capacitor Bank) लगाए जाते हैं।

  • स्थापना: इन्हें स्वचालित APFC (Automatic Power Factor Controller) पैनल के साथ स्थापित किया जाता है, जो लोड के अनुसार कैपेसिटर की इकाइयों को अपने आप ऑन/ऑफ करता रहता है।
  • ररखाव और सुरक्षा:
    • ​कैपेसिटर बंद होने के बाद भी उसमें भारी चार्ज जमा रहता है। इसलिए इसमें डिस्चार्ज रेजिस्टेंस (Discharge Resistors) लगे होने चाहिए जो बंद होने के 5 मिनट के भीतर वोल्टेज को सुरक्षित स्तर (50\text{V} से नीचे) पर ले आएं।
    • ​नियमित रूप से कैपेसिटर के डिब्बे के फूलने (Bulging) या तेल लीक होने की जांच करनी चाहिए।

​6. कंट्रोल रूम उपकरण: स्टेशन बैटरी और संचार प्रणाली

​यदि पूरे सबस्टेशन की बिजली ग्रिड फेल होने के कारण चली जाए, तब भी सबस्टेशन के सर्किट ब्रेकर्स और सुरक्षा रिले को काम करने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। इसके लिए स्टेशन बैटरी सबसे महत्वपूर्ण बैकअप है।

  • स्टेशन बैटरी (DC Power System): कंट्रोल रूम में 110{V} या 220 {V} की लेड-एसिड (Lead-Acid) या निकेल-कैडमियम (Ni-Cd) बैटरियों का एक बड़ा बैंक होता है। यह सबस्टेशन को 'डिसी कंट्रोल पावर' (DC Control Power) देता है जो कभी बंद नहीं होनी चाहिए।
    • रखरखाव: बैटरी के पानी (Electrolyte) का विशिष्ट गुरुत्व (Specific Gravity) और वोल्टेज रोज मापना। बैटरी टर्मिनल्स पर पेट्रोलियम जेली लगाना ताकि जंग (Sulphation) न लगे।
  • संचार प्रणाली (Communication System): सबस्टेशनों के बीच आपसी बातचीत और डेटा भेजने के लिए PLCC (Power Line Carrier Communication) या आधुनिक ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC - OPGW तार जो ओवरहेड लाइन के सबसे ऊपर होता है) का उपयोग किया जाता है। इससे ग्रिड ट्रिपिंग की स्थिति में दूसरे छोर के ब्रेकर को तुरंत संदेश (Inter-tripping) भेजा जाता है।

​क्या आप सबस्टेशन के किसी विशिष्ट सुरक्षा सर्किट जैसे 'डिफरेंशियल प्रोटेक्शन' के वर्किंग डायग्राम को गहराई से समझना चाहते हैं?




मोटर और जनरेटर (डीसी और एसी):
• औद्योगिक मोटरों की स्थापना, परीक्षण, चालू करना, सुरक्षा और नियंत्रण एवं रखरखाव

औद्योगिक क्षेत्र में इलेक्ट्रिक मोटर्स (AC और DC दोनों) को "काम का घोड़ा" (Workhorse) कहा जाता है। उद्योगों की 70% से अधिक बिजली की खपत इन्हीं मोटरों को चलाने में होती है। इसलिए इनकी सही स्थापना, नियंत्रण और सुरक्षा पर पूरे प्लांट की उत्पादकता निर्भर करती है।

​यहाँ औद्योगिक मोटरों के प्रबंधन के सभी चरणों को विस्तार से समझाया गया है:

​1. स्थापना (Installation)

​मोटर की लंबी उम्र और बिना किसी रुकावट के चलने के लिए उसका सही इंस्टॉलेशन सबसे बुनियादी कदम है।

  • फाउंडेशन (Foundation): मोटर को कंक्रीट के एक मजबूत और समतल बेस पर स्थापित किया जाता है। यदि बेस सही नहीं होगा, तो मोटर में कंपन (Vibrations) पैदा होंगे जिससे उसके बेयरिंग्स जल्दी टूट जाएंगे।
  • अलाइनमेंट (Mechanical Alignment): मोटर की शाफ्ट (Shaft) और उसके द्वारा चलाई जाने वाली मशीन (जैसे पंप, फैन, या कंप्रेसर) की शाफ्ट का अलाइनमेंट बिल्कुल एक सीध में होना चाहिए। इसके लिए लेजर अलाइनमेंट टूल्स (Laser Alignment Tools) या डायल गेज का उपयोग किया जाता है।
  • वेंटिलेशन और परिवेश: मोटर के पीछे लगे कूलिंग फैन को हवा खींचने के लिए पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए। अत्यधिक धूल वाले स्थानों पर TEFC (Totally Enclosed Fan Cooled) मोटरों का चयन किया जाता है।

​2. परीक्षण और चालू करना (Testing & Commissioning)

​मोटर को पहली बार बिजली की सप्लाई देने से पहले (Pre-commissioning) निम्नलिखित परीक्षण अनिवार्य हैं:

  • इंसुलेशन रेजिस्टेंस टेस्ट (Megger Test):
    • विधि: 500 {V} या 1000 {V} के मेगर (Megger) द्वारा वाइंडिंग और मोटर की बॉडी (अर्थ) के बीच का प्रतिरोध मापा जाता है।
    • मानक: यह मान कम से कम 1 { M} Omega + 1 { M} Omega प्रति kV होना चाहिए। (यदि मोटर 415 {V} की है, तो न्यूनतम 1.4 { M} Omega होना ही चाहिए, आदर्श रूप से यह 100 { M} Omega से ऊपर होता है)।
  • वाइंडिंग रेजिस्टेंस टेस्ट: तीनों फेजों (U, V, W) के आंतरिक प्रतिरोध की जांच मल्टीमीटर या ओह्म-मीटर से की जाती है। तीनों फेजों का रेजिस्टेंस लगभग बराबर होना चाहिए।
  • दिशा की जांच (Direction of Rotation - No Load Run): मोटर को लोड से अलग करके कुछ सेकंड के लिए चालू किया जाता है ताकि यह देखा जा सके कि वह सही दिशा (Clockwise/Counter-clockwise) में घूम रही है या नहीं। यदि दिशा बदलनी हो, तो AC मोटर के कोई भी दो फेज आपस में बदल दिए जाते हैं।

​3. नियंत्रण प्रणाली (Control Systems & Starters)

​औद्योगिक मोटरों को सीधे बिजली से जोड़ने पर वे अपनी क्षमता से 5 से 7 गुना अधिक शुरुआती करंट (Starting Current) खींचती हैं, जिससे वोल्टेज ड्रॉप हो सकता है और वाइंडिंग जल सकती है। इसे रोकने के लिए स्टार्टर्स का उपयोग होता है:

​A. डीओएल स्टार्टर (Direct On-Line - DOL Starter):

  • ​इसका उपयोग छोटी मोटरों (5 { HP} तक) के लिए किया जाता है। यह मोटर को सीधे पूरी वोल्टेज देता है। इसमें सुरक्षा के लिए कांटेक्टर (Contactor) और ओवरलोड रिले होती है।

​B. स्टार-डेल्टा स्टार्टर (Star-Delta Starter):

  • ​इसका उपयोग मध्यम मोटरों (5 { HP} से 25 { HP} तक) में होता है।
  • सिद्धांत: चालू होते समय यह मोटर की वाइंडिंग को 'स्टार' में जोड़ता है जिससे वोल्टेज {1}/{sqrt{3}} (लगभग 58%) कम हो जाती है और स्टार्टिंग करंट घट जाता है। मोटर के गति पकड़ते ही टाइमर इसे स्वचालित रूप से 'डेल्टा' (पूरी वोल्टेज) में बदल देता है।

​C. सॉफ्ट स्टार्टर (Soft Starter):

  • ​यह एक इलेक्ट्रॉनिक स्टार्टर है जो थाइरिस्टर (SCRs) का उपयोग करके वोल्टेज को धीरे-धीरे बढ़ाता है, जिससे मोटर बिना किसी झटके के बहुत आसानी से स्मूथ स्टार्ट लेती है।

​D. वीएफडी (Variable Frequency Drive - VFD):

  • ​यह आधुनिक उद्योगों का सबसे लोकप्रिय कंट्रोलर है। यह न केवल मोटर के स्टार्टिंग करंट को नियंत्रित करता है, बल्कि बिजली की आवृत्ति (Frequency) और वोल्टेज को बदलकर मोटर की गति (Speed/RPM) को इच्छानुसार कम या ज्यादा करने की सुविधा देता है। इससे भारी मात्रा में बिजली की बचत होती है।

​4. सुरक्षा प्रणालियाँ (Motor Protection)

​औद्योगिक मोटरों को किसी भी असामान्य स्थिति से बचाने के लिए निम्नलिखित रिले और सुरक्षा उपकरण पैनल में लगाए जाते हैं:

  • ओवरलोड सुरक्षा (Overload Protection): मोटर पर मैकेनिकल लोड बढ़ने से जब वह तय सीमा (Rated Current) से अधिक करंट लेती है, तो थर्मल ओवरलोड रिले (Bi-metallic strip आधारित) या इलेक्ट्रॉनिक रिले मोटर को ट्रिप कर देती है।
  • शॉर्ट सर्किट सुरक्षा: इसके लिए MPCB (Motor Protection Circuit Breaker) या हाई-स्पीड HRC फ्यूज का उपयोग किया जाता है जो फॉल्ट होते ही मिलीसेकंड में सर्किट काट देते हैं।
  • सिंगल फेजिंग प्रिवेंटर (Single Phasing Preventer): यदि थ्री-फेज सप्लाई में से कोई एक फेज पीछे से कट जाए (जैसे फ्यूज उड़ने पर), तो मोटर बाकी बचे दो फेजों पर चलने की कोशिश करती है और बहुत भारी करंट खींचकर कुछ ही मिनटों में जल सकती है। यह प्रिवेंटर फेज गायब होते ही मोटर को तुरंत बंद कर देता है।
  • फेज अनबैलेंस और रिवर्सल सुरक्षा: तीनों फेजों का वोल्टेज बराबर न होने पर या फेज का क्रम (Sequence) बदल जाने पर सुरक्षा देना।
  • अंडर-वोल्टेज और ओवर-वोल्टेज सुरक्षा।

​5. रखरखाव (Maintenance Strategies)

​औद्योगिक मोटरों के लिए तीन सूत्रीय रखरखाव रणनीति अपनाई जाती है:

​A. दैनिक जांच (Daily Inspection):

  • ​मोटर की असामान्य आवाज (Humming/Noise) और अत्यधिक कंपन की जांच।
  • ​हाथ या इन्फ्रारेड थर्मल गन से मोटर के तापमान को मापना।
  • ​मोटर के बॉडी अर्थिंग कनेक्शन का टाइट होना सुनिश्चित करना।

​B. निवारक रखरखाव (Preventive Maintenance - मासिक/छमाही):

  • लुब्रिकेशन (Greasing): मोटर के बेयरिंग्स में निर्माता के निर्देशानुसार सही ग्रेड की ग्रीस डालना (अत्यधिक ग्रीसिंग भी हानिकारक है)।
  • सफाई: कूलिंग फिन्स (Fins) पर जमी धूल और कार्बन को साफ करना ताकि मोटर का हीट एक्सचेंज सही रहे।
  • डीसी मोटर विशेष: यदि डीसी मोटर है, तो कम्यूटेटर की सतह को साफ करना, कार्बन ब्रश के घिसने की जांच करना और सही स्प्रिंग टेंशन बनाए रखना।

​C. प्रेडिक्टिव रखरखाव (Predictive Maintenance):

  • कंपन विश्लेषण (Vibration Analysis): विशेष सेंसरों द्वारा मोटर के वाइब्रेशन का ग्राफ लिया जाता है, जिससे बेयरिंग के खराब होने या अलाइनमेंट बिगड़ने का पता वह खराब होने से हफ्तों पहले ही चल जाता है।

​क्या आप स्टार-डेल्टा स्टार्टर के पावर और कंट्रोल वायरिंग सर्किट को या VFD के कार्य सिद्धांत को और अधिक विस्तार से समझना चाहते हैं?




निम्नलिखित के लिए परिचालन संबंधी ज्ञान:-
मापन यंत्रों का परिचालन संबंधी ज्ञान, जैसे कि एमीटर,
वोल्टमीटर, मल्टीमीटर, टंग टेस्टर, मेगर, एचवी टेस्टिंग किट
आदि।
प्रकाश व्यवस्था, अग्निशमन और अर्थिंग सिस्टम सहित
रखरखाव।
विद्युत आरेखों का निर्माण, प्रस्तुतिकरण, व्याख्या
और विद्युत कार्य का निष्पादन। भूमिगत स्विच बोर्ड, पैनल, ब्रेकर आदि के लिए ज्वालारोधी/आंतरिक रूप से सुरक्षित उपकरण
भूमिगत उपयोग के लिए।

यह खंड एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर या तकनीशियन के लिए व्यावहारिक और फील्ड-स्तरीय संचालन (Field-level Operations) से संबंधित है। इसमें उपकरणों को चलाने, सुरक्षा प्रणालियों के रखरखाव, इंजीनियरिंग ड्राइंग को पढ़ने और विशेष रूप से भूमिगत खदानों (Underground Mines) व खतरनाक क्षेत्रों (Hazardous Areas) में उपयोग होने वाले सुरक्षित उपकरणों का परिचालन ज्ञान शामिल है।

​1. मापन यंत्रों का परिचालन संबंधी ज्ञान (Operation of Measuring Instruments)

​विद्युत दोषों को खोजने और रीडिंग लेने के लिए इन उपकरणों का सही और सुरक्षित उपयोग आना अनिवार्य है:

  • एमीटर (Ammeter):
    • परिचालन: यह सर्किट में बहने वाले करंट (Ampere) को मापता है। इसे हमेशा सर्किट के श्रेणीक्रम (Series) में जोड़ा जाता है।
    • सावधानी: इसे कभी भी सीधे फेज और न्यूट्रल (Parallel) के बीच न जोड़ें, अन्यथा भारी शॉर्ट सर्किट होगा और मीटर जल जाएगा।
  • वोल्टमीटर (Voltmeter):
    • परिचालन: यह दो बिंदुओं के बीच के विभवांतर (Voltage) को मापता है। इसे हमेशा सर्किट के समांतर क्रम (Parallel) में जोड़ा जाता है।
  • मल्टीमीटर (Digital Multimeter - DMM):
    • परिचालन: यह एक ऑल-इन-वन उपकरण है जिससे वोल्टेज, करंट, प्रतिरोध (Resistance) और निरंतरता (Continuity) मापी जा सकती है।
    • सावधानी: माप शुरू करने से पहले 'नॉब' (Rotary Switch) को सही पैरामीटर (जैसे AC वोल्टेज या DC करंट) और सही रेंज पर सेट करना जरूरी है।
  • टोंग टेस्टर / क्लैंप मीटर (Tong Tester / Clamp Meter):
    • परिचालन: बिना तार को काटे या सर्किट को बंद किए, चलती लाइन का करंट मापने के लिए इसका उपयोग होता है। इसके 'जबड़े' (Jaws) को खोलकर केवल किसी एक फेज के तार को इसके बीच में डाला जाता है। यह तार के चारों ओर बनने वाले चुंबकीय क्षेत्र (Mutual Induction) के आधार पर करंट की सटीक रीडिंग स्क्रीन पर दिखा देता है।
  • मेगर / इन्सुलेशन टेस्टर (Megger):
    • परिचालन: यह उच्च प्रतिरोध (Mega-ohms) मापता है, जिससे वाइंडिंग या केबल के इंसुलेशन की मजबूती जांची जाती है। टेस्ट करने से पहले सर्किट की पावर पूरी तरह बंद (OFF) होनी चाहिए। इसके दो टर्मिनलों को कंडक्टर और अर्थ के बीच जोड़कर टेस्ट बटन दबाया जाता है, जिससे यह 500V या 1000V DC जनरेट करके इंसुलेशन की स्थिति बताता है।
  • एचवी टेस्टिंग किट (High Voltage Testing Kit):
    • परिचालन: इसका उपयोग भारी उपकरणों और केबलों की 'विद्युत सहनशक्ति' (Dielectric Strength) जांचने के लिए किया जाता है। यह उपकरण पर उसकी क्षमता से दोगुना या ढाई गुना अधिक वोल्टेज (जैसे 11kV की केबल पर 22kV या 33kV) कुछ समय के लिए डालता है। यदि उपकरण बिना पंचर या शॉर्ट हुए इसे झेल जाता है, तो टेस्ट पास माना जाता है। इसे अत्यंत कड़े सुरक्षा घेरे में चलाया जाता है।

​2. प्रकाश व्यवस्था, अग्निशमन और अर्थिंग सिस्टम का रखरखाव

  • प्रकाश व्यवस्था (Lighting System): कारखानों और कार्यालयों में 'लक्स मीटर' (Lux Meter) द्वारा रोशनी के स्तर की जांच करना। खराब एलईडी लाइट्स, ब्लास्ट (चोक) और ढीले कनेक्शनों को ठीक करना। इमरजेंसी लाइटिंग और यूपीएस बैकअप को हमेशा चालू स्थिति में रखना।
  • अग्निशमन (Fire Fighting Systems): विद्युत पैनलों के पास {CO}_2 (कार्बन डाइऑक्साइड) या DCP (Dry Chemical Powder) प्रकार के अग्निशामक सिलेंडर रखना। विद्युत की आग पर कभी भी पानी नहीं डाला जाता। स्वचालित फायर स्प्रिंकलर और स्मोक डिटेक्टर अलार्म पैनल का साप्ताहिक टेस्ट करना।
  • अर्थिंग सिस्टम (Earthing Maintenance): साल में दो बार (विशेषकर गर्मी और ठंड में) अर्थ टेस्टर से प्रत्येक अर्थ पिट का रेजिस्टेंस मापना। अर्थ पिट में नमी बनाए रखने के लिए समय-समय पर नमक, कोयला या चारकोल पाउडर और पानी डालना ताकि अर्थ का प्रतिरोध 1 से 5 ओह्म के भीतर बना रहे।

​3. विद्युत आरेखों का निर्माण, व्याख्या और कार्य निष्पादन (Electrical Diagrams & Execution)

  • व्याख्या और पढ़ना (Interpretation): किसी भी साइट पर काम करने से पहले SLD (Single Line Diagram), स्कीमैटिक आरेख (Schematic Circuit Diagrams) और वायरिंग लेआउट को पढ़ा जाता है। इससे यह समझ आता है कि पावर कहाँ से आ रही है (Incomer), कहाँ जा रही है (Outgoing), और सुरक्षा के लिए कौन सा ब्रेकर या रिले लगा है।
  • कार्य का निष्पादन (Execution): ड्राइंग के अनुसार सही साइज के केबल ट्रे, केबल्स, स्विचगियर और पैनलों को स्थापित करना। भारतीय विद्युत नियमों (IE Rules) के रंग कोड (जैसे- 3 Phase के लिए Red, Yellow, Blue; Neutral के लिए Black; Earth के लिए Green) का कड़ाई से पालन करना।

​4. भूमिगत उपयोग के लिए ज्वालारोधी (Flameproof) और आंतरिक रूप से सुरक्षित (Intrinsically Safe) उपकरण

​भूमिगत कोयला खदानों (Underground Mines) या पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों में हवा में ज्वलनशील गैसें (जैसे मीथेन या कोल डस्ट) मौजूद होती हैं। वहाँ सामान्य स्विच या पैनल का उपयोग करने पर होने वाली हल्की सी स्पार्किंग भी पूरी खदान में भयानक विस्फोट कर सकती है। इसलिए वहाँ दो विशेष प्रकार के उपकरणों का उपयोग होता है:

​A. ज्वालारोधी उपकरण (Flameproof / Explosion-Proof Enclosure - FLP):

  • सिद्धांत: इस तकनीक में यह मान लिया जाता है कि उपकरण के अंदर गैस घुस सकती है और अंदर शॉर्ट-सर्किट या स्पार्किंग से छोटा धमाका हो सकता है। लेकिन इस उपकरण का बाहरी बॉक्स (Enclosure) इतना मजबूत और भारी (Cast Iron या स्टील का) बनाया जाता है कि वह अंदर के विस्फोट को झेल लेता है और उसकी आग या चिंगारी को बाहर की खदान की हवा में फैलने नहीं देता।
  • उपयोग: भूमिगत खदानों के बड़े स्विच बोर्ड, मोटर्स, जंक्शन बॉक्स और सर्किट ब्रेकर्स हमेशा FLP प्रकार के होते हैं। इनके फ्लैंज (जोड़) बहुत बारीक और नट-बोल्ट से पूरी तरह सील होते हैं।

​B. आंतरिक रूप से सुरक्षित उपकरण (Intrinsically Safe Equipment - IS):

  • सिद्धांत: यह तकनीक 'कंट्रोल सर्किट' और कम पावर वाले उपकरणों पर लागू होती है। इसके सर्किट को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि इसमें बहने वाला करंट और वोल्टेज का स्तर इतना कम होता है कि यदि तार आपस में शॉर्ट भी हो जाएं, तो भी चिंगारी (Spark) पैदा ही नहीं होती जो गैस को आग लगा सके। यानी यह सर्किट अपने स्वभाव से ही सुरक्षित होता है।
  • उपयोग: खदानों के अंदर उपयोग होने वाले वॉकी-टॉकी (संचार उपकरण), गैस डिटेक्टर सेंसर, डिजिटल थर्मामीटर, और रिमोट कंट्रोल सर्किट आंतरिक रूप से सुरक्षित (IS) बनाए जाते हैं। इन सर्किटों में 'जेनर बैरियर' (Zener Barriers) का उपयोग किया जाता है जो करंट और वोल्टेज को एक सुरक्षित सीमा से ऊपर बढ़ने नहीं देते।

​क्या आप इनमें से किसी विशिष्ट उपकरण (जैसे टोंग टेस्टर से करंट मापने के व्यावहारिक चरण या FLP पैनल के रखरखाव के सुरक्षा नियम) के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं?




सुरक्षा नियम - व्यावहारिक ज्ञान -
• सीईए का सुरक्षा विनियमन-2023 (सुरक्षा और विद्युत आपूर्ति से संबंधित उपाय)
खनन प्रतिष्ठानों के लिए विनियमों सहित सभी विनियम।
• अग्नि सुरक्षा प्रक्रियाएं, जनरेटर और ट्रांसफार्मर की अग्नि सुरक्षा,
और आग बुझाने एवं बचाव।
• विद्युत आघात से पीड़ित व्यक्ति की सुरक्षा और पुनर्वास।

विद्युत क्षेत्र और विशेष रूप से खनन (Mining) जैसे जोखिम भरे वातावरण में काम करते समय सुरक्षा नियम केवल कागजी कानून नहीं हैं, बल्कि यह जीवन बचाने वाले व्यावहारिक दिशा-निर्देश हैं।

​यहाँ आपके द्वारा पूछे गए सभी सुरक्षा नियमों और प्रक्रियाओं का व्यावहारिक व तकनीकी विवरण दिया गया है:

​1. CEA सुरक्षा विनियमन-2023 (Central Electricity Authority Regulation-2023)

​केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) का 'सुरक्षा और विद्युत आपूर्ति से संबंधित उपाय' विनियमन-2023, विद्युत प्रणालियों के सुरक्षित संचालन के लिए भारत का मुख्य कानूनी ढांचा है।

सामान्य प्रतिष्ठानों के लिए मुख्य व्यावहारिक नियम:

  • अनुज्ञप्ति (Licensing): कोई भी विद्युत कार्य केवल सरकार द्वारा प्रमाणित सक्षम व्यक्ति (Licensed Electrical Contractor/Wireman) द्वारा ही किया जाएगा।
  • नियमित निरीक्षण (Periodic Inspection): सभी उच्च और अतिरिक्त उच्च वोल्टेज (HT/EHT) प्रतिष्ठानों का साल में कम से कम एक बार विद्युत निरीक्षक (Electrical Inspector) द्वारा ऑडिट अनिवार्य है।
  • स्पष्ट पहचान (Identification): प्रत्येक मुख्य स्विच, पैनल और सर्किट ब्रेकर पर स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए कि वह किस उपकरण को नियंत्रित करता है। खतरे के संकेत (Danger Boards) हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में होने चाहिए।
  • अर्थिंग की दोहरी सुरक्षा: सभी भारी उपकरणों (जैसे मोटर, ट्रांसफार्मर) की बॉडी को दो अलग-अलग अर्थ पिट्स (Double Earthing) से जोड़ा जाना अनिवार्य है।

खनन प्रतिष्ठानों (Mining Installations) के लिए विशेष विनियम:

​भूमिगत और ओपनकास्ट खदानों में अत्यधिक नमी, गैस और गिरती छतों के कारण विद्युत सुरक्षा के नियम बहुत कड़े हैं:

  • वोल्टेज की सीमा: भूमिगत खदानों में हाथ से पकड़े जाने वाले उपकरणों (जैसे पोर्टेबल ड्रिल मशीन) के लिए वोल्टेज 125 Volts से अधिक नहीं होनी चाहिए। रिमोट कंट्रोल और सिग्नलिंग सर्किट के लिए यह सीमा 30 Volts है।
  • ज्वालारोधी (FLP) अनिवार्य: खदान के उन हिस्सों में जहाँ मीथेन गैस या कोयले की धूल का खतरा (Gassy Mines) होता है, वहाँ केवल Flameproof (FLP) या Intrinsically Safe (IS) उपकरणों का ही उपयोग किया जा सकता है।
  • स्वचालित ट्रिपिंग (Earth Leakage Protection): खदान में उपयोग होने वाले प्रत्येक आपूर्ति सर्किट में एक संवेदनशील अर्थ लीकेज रिले होना चाहिए, जो लीक करंट का मान 500 milliamperes (mA) से अधिक होते ही बिजली को तुरंत (मिलीसेकंड के भीतर) काट दे।
  • लचीली केबल्स की सुरक्षा: खदान की पोर्टेबल मशीनों को बिजली देने वाली फ्लेक्सिबल केबल्स के ऊपर धातु का सुरक्षा कवच (Screening) होना चाहिए, जो सीधे अर्थ से जुड़ा हो।

​2. अग्नि सुरक्षा प्रक्रियाएं (Fire Safety Procedures)

​विद्युत के कारण लगने वाली आग (Class E Fire) सामान्य आग से अलग होती है क्योंकि इसमें लाइव करंट का खतरा होता है।

सामान्य अग्नि सुरक्षा नियम:

  1. पहला कदम: आग दिखने पर सबसे पहले मुख्य बिजली की आपूर्ति (Main Power Supply) को बंद (OFF) करें।
  2. पानी का निषेध: बिजली की आग पर कभी भी पानी या झाग (Foam) वाले अग्निशामक का उपयोग न करें, क्योंकि पानी बिजली का सुचालक है और बुझाने वाले को गंभीर झटका लग सकता है।
  3. सही बुझाने वाले का चयन: केवल \text{CO}_2 (कार्बन डाइऑक्साइड) या DCP (Dry Chemical Powder) प्रकार के अग्निशामक सिलेंडर का उपयोग करें।

जनरेटर और ट्रांसफार्मर की अग्नि सुरक्षा:

​ये उपकरण भारी मात्रा में तेल (इंसुलेटिंग/डीजल) और उच्च तापमान पर काम करते हैं, इसलिए यहाँ आग का खतरा सबसे अधिक होता है।

  • नाइट्रोजन इंजेक्शन फायर प्रिवेंशन सिस्टम (NIFPS): आधुनिक बड़े ट्रांसफार्मरों में यह प्रणाली लगी होती है। ट्रांसफार्मर के अंदर आंतरिक फॉल्ट के कारण आग लगते ही यह सिस्टम सक्रिय हो जाता है। यह ट्रांसफार्मर के ज्वलनशील तेल को नीचे ड्रेन टैंक में भेज देता है और टैंक के अंदर नाइट्रोजन गैस भर देता है, जिससे ऑक्सीजन कट जाती है और आग तुरंत बुझ जाती है।
  • एमल्सीफायर / वॉटर स्प्रे सिस्टम (High Velocity Water Spray): ट्रांसफार्मर के चारों ओर पाइपों का एक जाल होता है। आग लगने पर ये नोजल पानी की बहुत महीन बौछार (Mist/Fog) छोड़ते हैं। यह पानी की भाप आग को ठंडा कर देती है और करंट भी प्रवाहित नहीं होने देती।
  • सॉकेवे / ऑयल पिट (Soak Pit): ट्रांसफार्मर के नीचे पत्थरों (Pebbles) से भरा एक गहरा गड्ढा होता है। यदि ट्रांसफार्मर फट जाए, तो सारा जलता हुआ तेल इस गड्ढे में चला जाता है, जिससे आग बाहर नहीं फैलती।

​3. विद्युत आघात (Electric Shock) से पीड़ित व्यक्ति की सुरक्षा और पुनर्वास

​यदि कोई व्यक्ति बिजली के सीधे संपर्क में आ गया है (उसे करंट लग गया है), तो बचावकर्मी को बहुत सूझबूझ से काम लेना होता है:

आपातकालीन बचाव प्रक्रिया (Rescue):

  1. स्वयं को सुरक्षित रखें: पीड़ित को सीधे अपने नंगे हाथों से छूने की गलती कभी न करें, अन्यथा आप भी करंट की चपेट में आ जाएंगे।
  2. सप्लाई काटें: तुरंत मुख्य स्विच बंद करें या प्लग निकालें।
  3. अलग करना (Insolation): यदि स्विच दूर हो, तो किसी सूखी लकड़ी के डंडे, प्लास्टिक की कुर्सी, रबर की चटाई या सूखे कपड़े की मदद से पीड़ित को लाइव तार से दूर धकेलें। खुद सूखी लकड़ी या रबर की चप्पल पर खड़े रहें।

प्राथमिक चिकित्सा और सीपीआर (First Aid & CPR):

​एक बार जब पीड़ित बिजली के स्रोत से सुरक्षित अलग हो जाए, तो निम्नलिखित कदम उठाएं:

  • होश की जांच: व्यक्ति को थपथपाएं और पूछें "क्या आप ठीक हैं?"। यदि कोई जवाब नहीं मिलता, तो तुरंत एम्बुलेंस को कॉल करें।
  • सांस और नाड़ी (Pulse) की जांच: पीड़ित की छाती को उठते-गिरते देखें और गले की नसों (Carotid Artery) से पल्स चेक करें।
  • सीपीआर (CPR - Cardiopulmonary Resuscitation): यदि सांस और धड़कन बंद है, तो तुरंत सीपीआर शुरू करें:
    • ​अपनी हथेलियों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर पीड़ित की छाती के बीच में (Breastbone पर) रखें।
    • 30 बार तेजी से छाती को दबाएं (दबाव की गहराई लगभग 2 इंच और गति 100-120 प्रति मिनट होनी चाहिए)।
    • ​इसके बाद पीड़ित के मुंह को खोलकर नाक बंद करें और 2 बार कृत्रिम सांस (Rescue Breaths) दें।
    • ​यह चक्र (30:2) तब तक जारी रखें जब तक कि एम्बुलेंस न आ जाए या व्यक्ति होश में न आ जाए।

पुनर्वास (Rehabilitation):

  • ​करंट लगने के बाद व्यक्ति ठीक दिखने पर भी उसे अस्पताल ले जाना जरूरी है, क्योंकि बिजली के झटके से हृदय की गति (Arrhythmia) कुछ घंटों बाद भी बिगड़ सकती है।
  • ​बिजली से जले हुए घावों (Electrical Burns) का विशेष बर्न वार्ड में इलाज करवाएं, क्योंकि ये घाव बाहर से छोटे दिखते हैं लेकिन मांसपेशियों को अंदर तक नुकसान पहुँचाते हैं।

​क्या आप CEA-2023 विनियमन के तहत 'लॉकआउट-टैगआउट' (LOTO) की व्यावहारिक प्रक्रिया को समझना चाहते हैं जो सबस्टेशन में काम करते समय तकनीशियनों की जान बचाती है?




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