अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर ( Difference between Earthing and Neutral )

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अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर अक्सर लोग न्यूट्रल (Neutral) और अर्थिंग (Earthing) को एक ही समझ लेते हैं क्योंकि दोनों ही तार अंततः जमीन से जुड़े होते हैं, लेकिन बिजली के सर्किट में इन दोनों का काम बिल्कुल अलग होता है। https://dkrajwar.blogspot.com/2026/01/difference-between-earthing-and-neutral.html ​इसे आसान भाषा में समझने के लिए नीचे दिए गए बिंदुओं को देखें: ​1. न्यूट्रल (Neutral Wire) - "वापसी का रास्ता" ​न्यूट्रल तार का मुख्य काम बिजली के सर्किट को पूरा करना है। ​ कार्य: बिजली 'फेज' (Phase) तार से आती है और अपना काम करने के बाद 'न्यूट्रल' के जरिए वापस लौटती है। ​ स्रोत: यह मुख्य रूप से बिजली के ट्रांसफार्मर से आता है। ​ महत्व: बिना न्यूट्रल के आपका कोई भी उपकरण (जैसे बल्ब या पंखा) चालू नहीं होगा क्योंकि सर्किट अधूरा रहेगा। ​ रंग: आमतौर पर इसे काले (Black) रंग के तार से पहचाना जाता है। ​2. अर्थिंग (Earthing) - "सुरक्षा कवच" ​अर्थिंग का काम बिजली के उपकरणों को चलाना नहीं, बल्कि आपको करंट लगने से बचाना है। ​ कार्य: यदि किसी खराब...

प्रतिरोध क्या है? ( What is Resistance )

प्रतिरोध क्या है?

प्रतिरोध (Resistance) भौतिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण गुण है, खासकर विद्युत (electricity) के संदर्भ में।

https://dkrajwar.blogspot.com/2026/01/what-is-resistance.html

​प्रतिरोध (Resistance) क्या है?

​प्रतिरोध किसी चालक पदार्थ का वह गुण है, जिसके कारण वह अपने में से होकर विद्युत धारा (Electric Current) के प्रवाह का विरोध करता है। इसे सरल शब्दों में विद्युत धारा के रास्ते में आने वाली रुकावट या अवरोध कह सकते हैं।

  • ​यह गुण चालक के परमाणुओं और इलेक्ट्रॉनों के बीच की टक्करों के कारण उत्पन्न होता है।
  • ​इसे अक्षर R से दर्शाया जाता है।

​सूत्र और मात्रक

​ओम के नियम (Ohm's Law) के अनुसार, प्रतिरोध (R) किसी चालक के दो सिरों के बीच के विभवांतर (V) और उसमें बह रही विद्युत धारा (I) के अनुपात के बराबर होता है:

R = {V}/{I}


  • मात्रक (SI Unit): प्रतिरोध का SI मात्रक ओम (Ohm) होता है, जिसे ग्रीक अक्षर /Omega (ओमेगा) से दर्शाया जाता है।

​यह किस पर निर्भर करता है?

​किसी चालक का प्रतिरोध मुख्य रूप से निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:

  1. चालक की लम्बाई (l): लम्बाई बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है।
  2. चालक का अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A): क्षेत्रफल बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है (मोटे तार का प्रतिरोध कम होता है)।
  3. चालक की प्रकृति (rho): यह पदार्थ की अपनी प्रकृति पर निर्भर करता है (जैसे तांबे का प्रतिरोध लोहे से कम होता है)।
  4. तापमान: आमतौर पर, तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है।



प्रतिरोध किन कारकों पर निर्भर करता है?

ज़रूर, प्रतिरोध (Resistance) को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक चार हैं, जिन्हें एक सूत्र में भी व्यक्त किया जाता है।

​प्रतिरोध को प्रभावित करने वाले कारक

​किसी चालक (Conductor) का प्रतिरोध (R) निम्नलिखित चार कारकों पर निर्भर करता है:

​1. चालक की लम्बाई (l)

​प्रतिरोध चालक की लम्बाई के सीधे समानुपाती (Directly Proportional) होता है।

  • अर्थ: यदि तार की लम्बाई बढ़ती है, तो प्रतिरोध भी बढ़ता है (और इसके विपरीत)।
  • कारण: लम्बी दूरी तय करने पर इलेक्ट्रॉनों को परमाणुओं से अधिक बार टकराना पड़ता है, जिससे रुकावट बढ़ जाती है।
  • संबंध: R = l

​2. अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A)

​प्रतिरोध चालक के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल (मोटाई) के व्युत्क्रमानुपाती (Inversely Proportional) होता है।

  • अर्थ: यदि तार का क्षेत्रफल (या मोटाई) बढ़ता है, तो प्रतिरोध घटता है (जैसे मोटा तार)।
  • कारण: अधिक क्षेत्रफल होने पर इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के लिए अधिक रास्ता उपलब्ध होता है, जिससे रुकावट कम हो जाती है।
  • संबंध: R = {1}/{A}

​3. पदार्थ की प्रकृति (Resistivity /rho)

​प्रतिरोध चालक बनाने के लिए उपयोग किए गए पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है, जिसे प्रतिरोधकता (Resistivity, rho) कहते हैं।

  • अर्थ: विभिन्न पदार्थों की प्रतिरोधकता अलग-अलग होती है।
    • सुचालक (जैसे तांबा, चांदी): इनकी प्रतिरोधकता बहुत कम होती है, इसलिए प्रतिरोध भी कम होता है।
    • कुचालक (जैसे रबर, कांच): इनकी प्रतिरोधकता बहुत अधिक होती है।
  • संबंध: R = rho

​4. तापमान (Temperature)

​तापमान का प्रभाव पदार्थ के प्रकार पर निर्भर करता है:

  • धातु चालक: अधिकांश धातुओं में, तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है
    • कारण: उच्च तापमान पर, परमाणु तेज़ी से कंपन करते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉनों के लिए प्रवाह करना कठिन हो जाता है।
  • अर्धचालक: इनमें तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है

​संयुक्त सूत्र

​उपर्युक्त पहले तीन कारकों को मिलाकर प्रतिरोध का सूत्र (Formula) इस प्रकार बनता है:

R = rho {l}/{A}


जहाँ:

  • ​R = प्रतिरोध (Resistance)
  • ​rho = प्रतिरोधकता (Resistivity)
  • ​l = लम्बाई (Length)
  • ​A = अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (Area of Cross-section)




प्रतिरोधकता (विशिष्ट प्रतिरोध) क्या है?

प्रतिरोधकता, जिसे विशिष्ट प्रतिरोध (Specific Resistance) भी कहते हैं, पदार्थ का एक बहुत ही महत्वपूर्ण आंतरिक गुण है।

​यह गुण हमें बताता है कि कोई पदार्थ विद्युत धारा के प्रवाह का कितना दृढ़ता से विरोध करता है, चाहे वह पदार्थ कितना भी लम्बा या मोटा क्यों न हो।

​प्रतिरोधकता (rho) क्या है?

​प्रतिरोधकता (rho, जिसे ग्रीक अक्षर 'रो' से दर्शाते हैं) किसी पदार्थ का वह मूल गुण है जो केवल पदार्थ की प्रकृति (Material) और तापमान पर निर्भर करता है, न कि उसकी लम्बाई या अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर।

​परिभाषा

​तकनीकी रूप से, प्रतिरोधकता किसी पदार्थ के एक एकांक लम्बाई (1 मीटर) और एकांक अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (1 वर्ग मीटर) वाले चालक तार के प्रतिरोध के बराबर होती है।

  • कम प्रतिरोधकता: जिन पदार्थों की प्रतिरोधकता कम होती है (जैसे तांबा, चांदी), वे अच्छे चालक (Good Conductors) होते हैं और विद्युत धारा को आसानी से बहने देते हैं।
  • उच्च प्रतिरोधकता: जिनकी प्रतिरोधकता अधिक होती है (जैसे रबर, कांच), वे खराब चालक या कुचालक (Insulators) होते हैं।

​सूत्र (Formula)

​हम जानते हैं कि प्रतिरोध (R) का सूत्र है:

R = rho {l}/{A}

जहाँ:

  • ​R = प्रतिरोध (Resistance)
  • ​rho = प्रतिरोधकता (Resistivity)
  • ​l = लम्बाई (Length)
  • ​A = अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (Area of Cross-section)

​इस सूत्र को पुनर्व्यवस्थित (Rearrange) करने पर हमें प्रतिरोधकता का सूत्र मिलता है:

rho = {R × A}/{l}

मात्रक (SI Unit)

​प्रतिरोधकता का SI मात्रक ओम-मीटर होता है, जिसे Omega cdot m से दर्शाया जाता है।

मात्रक की व्युत्पत्ति:

  • ​R का मात्रक = ओम (Omega)
  • ​A का मात्रक = मीटर ^{2} (m^2)
  • ​l का मात्रक = मीटर (m)

rho = {Omega × m^2}/{m} = Omega cdot m







तापमान प्रतिरोध को कैसे प्रभावित करता है?

प्रतिरोध पर तापमान का प्रभाव पदार्थ की प्रकृति (Nature of Material) पर निर्भर करता है। मुख्य रूप से इसे तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:

तापमान का प्रतिरोध पर प्रभाव

​1. धातुएँ (धातु चालक) - प्रतिरोध बढ़ता है

​धातुओं में धनात्मक तापमान गुणांक (Positive Temperature Coefficient) होता है। इसका अर्थ है:

  • कारण (Mechanism):
    • ​धातुओं में विद्युत चालन मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा होता है।
    • ​जब तापमान बढ़ता है, तो धातु के परमाणु (Lattice Ions) अधिक तीव्रता से कंपन (Vibrate) करने लगते हैं।
    • ​इन तीव्र कंपनों के कारण, मुक्त इलेक्ट्रॉनों और परमाणुओं के बीच टकरावों (Collisions) की संख्या और आवृत्ति बढ़ जाती है।
    • ​टकराव बढ़ने से इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह में रुकावट (विरोध) बढ़ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिरोध बढ़ जाता है

​2. अर्धचालक (Semiconductors) - प्रतिरोध घटता है

​अर्धचालकों (जैसे सिलिकॉन, जर्मेनियम) में ऋणात्मक तापमान गुणांक (Negative Temperature Coefficient) होता है। इसका अर्थ है:

  • कारण (Mechanism):
    • ​अर्धचालकों में, विद्युत चालन के लिए इलेक्ट्रॉनों की संख्या तापमान पर बहुत अधिक निर्भर करती है।
    • ​जब तापमान बढ़ता है, तो तापीय ऊर्जा के कारण सहसंयोजक बंध (Covalent Bonds) टूटते हैं और बड़ी संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन और विवर (Holes) उत्पन्न होते हैं।
    • ​मुक्त आवेश वाहकों (Charge Carriers) की संख्या में यह भारी वृद्धि प्रतिरोध को कम कर देती है, भले ही परमाणुओं के कंपन से थोड़ी रुकावट उत्पन्न हो रही हो। वाहकों की संख्या में वृद्धि का प्रभाव कंपन से अधिक होता है।

​3. मिश्र धातुएँ (Alloys) - प्रभाव बहुत कम होता है

​मिश्र धातुओं (जैसे नाइक्रोम, मैंगनीन) का उपयोग अक्सर हीटिंग तत्वों में किया जाता है क्योंकि उनका प्रतिरोध तापमान परिवर्तन के साथ बहुत कम बदलता है।

  • ​इनका प्रतिरोध ताप गुणांक (α) बहुत छोटा (Low) होता है, जिससे वे तापमान में व्यापक बदलाव के बावजूद स्थिर प्रतिरोध बनाए रखते हैं।



ओम का नियम क्या है?

ओम का नियम (Ohm's Law) विद्युत परिपथों (Electric Circuits) के सबसे मूलभूत और महत्वपूर्ण नियमों में से एक है।

​ओम का नियम (Ohm's Law)

​यह नियम किसी चालक (Conductor) में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा, चालक के सिरों के बीच के विभवांतर (वोल्टेज) और उसके प्रतिरोध के बीच संबंध स्थापित करता है।

​नियम की परिभाषा

​जर्मन भौतिक विज्ञानी जॉर्ज साइमन ओम (Georg Simon Ohm) द्वारा दिए गए इस नियम के अनुसार:

​"यदि किसी चालक की भौतिक अवस्थाएँ (जैसे- तापमान, दाब, लम्बाई, क्षेत्रफल) स्थिर (अपरिवर्तित) रहें, तो चालक के सिरों के बीच उत्पन्न विभवांतर (Voltage, V) उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा (Current, I) के सीधे समानुपाती (Directly Proportional) होता है।"


​गणितीय सूत्र

​परिभाषा के अनुसार, हम इसे इस प्रकार लिख सकते हैं:

{V}/{I}


समानुपाती (proportionality) के चिह्न को हटाने पर, एक स्थिरांक (Constant) आता है, जिसे प्रतिरोध (Resistance, R) कहते हैं।


V = I × R


इस सूत्र को निम्नलिखित तीन रूपों में लिखा जा सकता है, जो विद्युत परिपथों की गणना में बहुत उपयोगी होते हैं:

भौतिक राशि 

सूत्र मात्रक

विभवांतर (Voltage, V)

V = I × R वोल्ट (Volt, V)

धारा (Current, I)

 I = {V}/{R} एम्पीयर (Ampere, A)

प्रतिरोध (Resistance, R)

R = {V}/{I}

ओम (Ohm, Omega)


V-I ग्राफ

​ओम के नियम का पालन करने वाले चालकों (जिन्हें ओमिक चालक कहा जाता है) के लिए, विभवांतर (V) और धारा (I) के बीच खींचा गया ग्राफ हमेशा एक सीधी रेखा (Straight Line) होता है जो मूल बिंदु से गुजरती है।

  • ​इस सीधी रेखा का ढलान (Slope) चालक के प्रतिरोध (R) को दर्शाता है, क्योंकि ढलान V/I के बराबर होता है।




प्रतिरोध के लिए कौन-कौन सी इकाइयाँ और प्रतीक प्रयुक्त होते हैं?

प्रतिरोध (Resistance) के लिए उपयोग होने वाले प्रमुख प्रतीक (Symbol) और मात्रक (Units) निम्नलिखित हैं:

​प्रतिरोध के लिए प्रतीक और इकाइयाँ

विवरण

प्रतीक (Symbol)

इकाई (Unit)

भौतिक राशि का प्रतीक

R

-

SI मात्रक (SI Unit)

-

ओम (Ohm)

SI मात्रक का प्रतीक

-

Omega (ओमेगा)

अन्य मात्रक

-

वोल्ट प्रति एम्पीयर (Volt per Ampere, V/A)


1. भौतिक राशि का प्रतीक (R)

​प्रतिरोध को भौतिकी और विद्युत परिपथों में अक्सर अक्षर R (अंग्रेजी शब्द Resistance से) द्वारा दर्शाया जाता है।

​2. SI मात्रक: ओम (Omega)

​प्रतिरोध का अंतर्राष्ट्रीय मानक (SI) मात्रक ओम (Ohm) है।

  • ​यह इकाई जर्मन भौतिक विज्ञानी जॉर्ज साइमन ओम के सम्मान में नामित की गई है, जिन्होंने ओम का नियम दिया था।
  • ​ओम का प्रतीक ग्रीक अक्षर ओमेगा (Omega) है: Omega।

​3. ओम की परिभाषा (अन्य मात्रक)

​ओम के नियम (R = V/I) के अनुसार, प्रतिरोध को वोल्ट प्रति एम्पीयर के रूप में भी परिभाषित किया जाता है:

1 Omega = {1 {वोल्ट} (V)}/{1 {एम्पीयर} (A)}

4. बड़े मात्रक (Multiples)

​परिपथों में प्रतिरोध का मान अक्सर बहुत अधिक होता है, इसलिए बड़े मात्रकों का भी प्रयोग किया जाता है:

  • किलोओम (Kiloohm): 1 k Omega = 10^3 Omega
  • मेगाओम (Megaohm): 1 M Omega = 10^6 Omega




प्रतिरोध और प्रतिरोधकता में क्या अंतर है?

प्रतिरोध (Resistance) और प्रतिरोधकता (Resistivity) दोनों विद्युत से संबंधित मूलभूत अवधारणाएं हैं, लेकिन वे अलग-अलग चीजों को दर्शाती हैं।

​इन दोनों के बीच मुख्य अंतरों को नीचे एक तालिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है:

​प्रतिरोध (R) और प्रतिरोधकता (rho) में अंतर

अंतर का आधार

प्रतिरोध (Resistance, R)

प्रतिरोधकता (Resistivity, rho)

परिभाषा

यह किसी विशिष्ट वस्तु (जैसे एक तार) का वह गुण है जो उसमें विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करता है। यह चालक का एक समग्र गुण है।

यह किसी पदार्थ (Material) का वह आंतरिक और विशिष्ट गुण है जो उसकी विद्युत प्रतिरोध क्षमता को दर्शाता है।

निर्भरता

यह चालक के आकार और ज्यामिति (Shape and Size) पर निर्भर करता है: लम्बाई (l) और अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल (A) पर।

यह चालक के आकार और ज्यामिति (l और A) पर निर्भर नहीं करता है। यह केवल पदार्थ की प्रकृति और तापमान पर निर्भर करता है।

सूत्र

ओम के नियम से:  ​R = {V}/{I}

प्रतिरोध के सूत्र से: ​rho = {R × A}/{l}

SI मात्रक

ओम (Omega)

ओम-मीटर (Omega cdot m)

भौतिक महत्व

यह उस रुकावट की वास्तविक मात्रा है जिसका सामना इलेक्ट्रॉनों को परिपथ के एक हिस्से में करना पड़ता है।

यह दर्शाता है कि कोई पदार्थ स्वभाव से कितना अच्छा या बुरा चालक है (जैसे तांबे की \rho कम है, इसलिए यह अच्छा चालक है)।



मुख्य अंतर का सार

​आप इसे इस प्रकार याद रख सकते हैं:

  1. प्रतिरोध (R): यह एक विशिष्ट तार (या वस्तु) का गुण है। अगर आप तार को लंबा करते हैं, तो R बदल जाएगा।
  2. प्रतिरोधकता (rho): यह उस सामग्री (जैसे ताँबा) का गुण है जिससे तार बना है। आप तार को कितना भी लंबा या मोटा कर लें, तांबे की rho समान रहेगी (बशर्ते तापमान न बदले)।






तार की लंबाई का प्रतिरोध पर क्या प्रभाव पड़ता है?

तार की लम्बाई (Length) का प्रतिरोध (Resistance) पर सीधा और महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

​लम्बाई का प्रतिरोध पर प्रभाव

​प्रतिरोध (R) चालक की लम्बाई (l) के सीधे समानुपाती (Directly Proportional) होता है।

​इसका अर्थ है:

यदि आप तार की लम्बाई दुगुनी कर देते हैं (l to 2l), तो उसका प्रतिरोध भी दुगुना हो जाएगा (R to 2R)।

यदि आप तार की लम्बाई आधी कर देते हैं, तो प्रतिरोध भी आधा हो जाएगा।

{R}


कारण (Mechanism)

​यह संबंध मुक्त इलेक्ट्रॉनों (Free Electrons) के प्रवाह में आने वाली रुकावट के कारण होता है:

  1. टक्करों की संख्या में वृद्धि: जब तार की लम्बाई बढ़ जाती है, तो इलेक्ट्रॉनों को परिपथ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ती है।
  2. विरोध में वृद्धि: इस लम्बी दूरी के दौरान, इलेक्ट्रॉनों की चालक के परमाणुओं (या जालक आयनों) के साथ टक्करों की संख्या बढ़ जाती है।
  3. परिणाम: अधिक टक्करों का मतलब है धारा के प्रवाह में अधिक रुकावट, इसलिए प्रतिरोध बढ़ जाता है

​गणितीय सूत्र

​प्रतिरोध को दर्शाने वाला सूत्र इस संबंध की पुष्टि करता है:

R = rho {l}/{A}

जहाँ:

  • ​R = प्रतिरोध (Resistance)
  • ​l = लम्बाई (Length)
  • ​A = अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (Area of Cross-section)
  • ​rho = प्रतिरोधकता (Resistivity), जो स्थिर रहती है।

​चूँकि लम्बाई (l) सूत्र में अंश (Numerator) में है, इसलिए l बढ़ने पर R भी बढ़ता है।





अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल का प्रतिरोध पर क्या प्रभाव पड़ता है?

अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (Cross-sectional Area) का प्रतिरोध पर सीधा और विपरीत प्रभाव पड़ता है।

​अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (A) का प्रतिरोध पर प्रभाव

​प्रतिरोध (R) चालक के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल (A) के व्युत्क्रमानुपाती (Inversely Proportional) होता है।

​इसका अर्थ है:

  • ​यदि आप तार के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (अर्थात मोटाई) दुगुना कर देते हैं (A to 2A), तो उसका प्रतिरोध आधा हो जाएगा (R to R/2)।
  • ​यदि आप तार को पतला करते हैं (क्षेत्रफल कम करते हैं), तो प्रतिरोध बढ़ जाएगा

{R = {1}/{A}}


कारण (Mechanism)

​आप इस संबंध को विद्युत धारा के प्रवाह को पानी के पाइप में पानी के प्रवाह से तुलना करके समझ सकते हैं:

  1. प्रवाह के लिए अधिक जगह: जब तार का अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (मोटाई) अधिक होता है, तो मुक्त इलेक्ट्रॉनों को एक सिरे से दूसरे सिरे तक प्रवाहित होने के लिए अधिक चौड़ा मार्ग मिल जाता है।
  2. कम भीड़/टकराव: अधिक चौड़े रास्ते के कारण इलेक्ट्रॉनों के बीच और इलेक्ट्रॉनों तथा परमाणुओं के बीच टकरावों की संभावना कम हो जाती है।
  3. परिणाम: कम रुकावट का मतलब है कि तार कम विरोध उत्पन्न कर रहा है, इसलिए प्रतिरोध घट जाता है

​गणितीय सूत्र

​प्रतिरोध का सूत्र इस संबंध की पुष्टि करता है:

R = rho {l}/{A}

जहाँ:

  • ​R = प्रतिरोध (Resistance)
    • ​A = अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (Area of Cross-section)
    • ​l = लम्बाई (Length)
    • ​rho = प्रतिरोधकता (Resistivity)

    ​चूँकि क्षेत्रफल (A) सूत्र में हर (Denominator) में है, इसलिए A बढ़ने पर R घटता है और A घटने पर R बढ़ता है।





    चालक क्या होता है?

    चालक (Conductor) वह पदार्थ होता है जो अपने में से होकर विद्युत धारा (Electric Current) को आसानी से प्रवाहित होने देता है।

    ​चालक (Conductor) क्या होता है?

    ​चालक ऐसे पदार्थ होते हैं जिनमें बड़ी संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन (Free Electrons) या आवेश वाहक (Charge Carriers) मौजूद होते हैं। ये मुक्त आवेश वाहक ही विद्युत धारा के प्रवाह के लिए जिम्मेदार होते हैं।

    ​चालकों की विशेषताएँ

    1. मुक्त इलेक्ट्रॉन: चालकों की परमाणु संरचना में सबसे बाहरी कक्षा में इलेक्ट्रॉन नाभिक से कमजोर रूप से बंधे होते हैं और कमरे के तापमान पर ही अलग होकर पूरे पदार्थ में घूमने के लिए स्वतंत्र होते हैं।
    2. कम प्रतिरोधकता: चालकों की प्रतिरोधकता (Resistivity) बहुत कम होती है (अर्थात, उनका प्रतिरोध बहुत कम होता है), जिससे वे धारा के प्रवाह का बहुत कम विरोध करते हैं।
    3. चालकता: उनकी चालकता (Conductivity) बहुत अधिक होती है।

    ​उदाहरण

    ​विद्युत धारा के प्रवाह के आधार पर चालक कई प्रकार के होते हैं:

    • धातु चालक (Metallic Conductors): इनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन आवेश वाहक होते हैं।
      • सर्वोत्तम चालक: चाँदी (Silver), ताँबा (Copper), सोना (Gold)।
      • सामान्य उपयोग: ताँबा (Wiring में), एल्युमिनियम (Transmission Lines में)।
    • वैद्युत अपघटनी चालक (Electrolytic Conductors): इनमें मुक्त आयन (Ions) आवेश वाहक होते हैं।
      • उदाहरण: नमक का घोल (NaCl Solution), सल्फ्यूरिक एसिड का तनु घोल।
    • गैसीय चालक: उच्च वोल्टेज और कम दाब पर कुछ गैसें भी चालक बन जाती हैं।




    तार की लंबाई दोगुनी करने पर प्रतिरोध पर क्या प्रभाव पड़ता है?

    यह एक बहुत ही सीधा और महत्वपूर्ण संबंध है जिसके बारे में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।

    ​तार की लम्बाई दोगुनी करने पर प्रतिरोध दोगुना (Double) हो जाता है।

    ​लम्बाई दोगुनी करने पर प्रभाव

    ​जैसा कि हम जानते हैं, प्रतिरोध (R) चालक की लम्बाई (l) के सीधे समानुपाती होता है:

    {R  l}

    यदि किसी तार की मूल लम्बाई l_1 है और उसका मूल प्रतिरोध R_1 है।

    यदि आप तार को बिना खींचे, एक ही मोटाई का एक और टुकड़ा जोड़कर उसकी लम्बाई दोगुनी कर देते हैं, तो नई लम्बाई l_2 = 2l_1 होगी।

    इस स्थिति में, नया प्रतिरोध R_2 भी दोगुना हो जाएगा:

    R_2 = 2 × R_1


    कारण

    ​इसका कारण यह है कि जब लम्बाई दोगुनी हो जाती है, तो इलेक्ट्रॉनों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए दोगुनी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे चालक के परमाणुओं के साथ उनकी टक्करों की संख्या भी लगभग दोगुनी हो जाती है। टक्करों में यह वृद्धि सीधे तौर पर विद्युत धारा के प्रवाह में दोगुना विरोध (प्रतिरोध) उत्पन्न करती है।

    ​खींचे हुए तार का मामला (Important Note)

    ​यदि प्रश्न यह होता कि "तार को खींचकर उसकी लम्बाई दोगुनी कर दी जाए", तो प्रतिरोध चार गुना हो जाता।

    • कारण: खींचने पर लम्बाई दोगुनी (l to 2l) होने के साथ-साथ, तार पतला हो जाता है, जिससे उसका अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल आधा हो जाता है (A to A/2)।
    • ​R  l/A सूत्र में, l के दोगुना होने और A के आधा होने, दोनों का प्रभाव मिलकर प्रतिरोध को चार गुना कर देता है।

    लेकिन

    आपके मूल प्रश्न का सीधा उत्तर है: लम्बाई दोगुनी करने पर प्रतिरोध दोगुना हो जाता है (यह मानते हुए कि मोटाई नहीं बदली गई है)।





    प्रतिरोध (a) का तापमान गुणांक क्या है?

    प्रतिरोध का तापमान गुणांक (Temperature Coefficient of Resistance) एक महत्वपूर्ण भौतिक राशि है जो यह दर्शाती है कि किसी पदार्थ का प्रतिरोध, तापमान में परिवर्तन के साथ कितनी तेज़ी से बदलता है। इसे ग्रीक अक्षर alpha (अल्फा) से दर्शाया जाता है।

    ​प्रतिरोध का तापमान गुणांक (alpha)

    ​प्रतिरोध का तापमान गुणांक (alpha) को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है:

    ​"प्रतिरोध का तापमान गुणांक किसी चालक के एकांक प्रतिरोध में, तापमान के एकांक परिवर्तन के कारण होने वाला प्रतिरोध परिवर्तन है।"


    ​इसे आमतौर पर 0^circ C या किसी संदर्भ तापमान (T_0) पर मापा जाता है।

    ​गणितीय सूत्र

    ​प्रतिरोध का तापमान गुणांक (alpha) का सूत्र निम्नलिखित है:

    alpha = {R_T - R_0}/{R_0 × (T - T_0)}

    जहाँ:

    • ​R_T = तापमान T पर चालक का प्रतिरोध।
    • ​R_0 = संदर्भ तापमान T_0 पर चालक का प्रतिरोध (अक्सर 0^circ C या 20^ circ C लिया जाता है)।
    • ​T - T_0 = तापमान में परिवर्तन (Delta T)।

    ​इस सूत्र से,

    हम किसी भी तापमान (T) पर प्रतिरोध (R_T) की गणना कर सकते हैं, यदि संदर्भ तापमान (T_0) पर प्रतिरोध (R_0) और alpha ज्ञात हो:


    R_T = R_0 [1 + alpha (T - T_0)]


    मात्रक

    ​प्रतिरोध के तापमान गुणांक का SI मात्रक प्रति डिग्री सेल्सियस (^circ C^{-1}) या प्रति केल्विन (K^{-1}) होता है।

    ​alpha का महत्व (पदार्थों का वर्गीकरण)

    ​alpha का मान यह निर्धारित करता है कि पदार्थ का प्रतिरोध, तापमान बढ़ने पर बढ़ेगा या घटेगा, जिससे पदार्थों को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है:

    पदार्थ का प्रकार

    alpha का मान

    तापमान का प्रभाव

    उदाहरण

    धातु (चालक)

    धनात्मक (Positive)

    तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है।

    ताँबा, एल्युमिनियम

    अर्धचालक

    ऋणात्मक (Negative)

    तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है।

    सिलिकॉन, जर्मेनियम

    मिश्र धातु

    बहुत कम धनात्मक (Very Low)

    तापमान का प्रतिरोध पर प्रभाव बहुत कम होता है।

    नाइक्रोम, मैंगनीन






    धनात्मक और ऋणात्मक तापमान गुणांक वाले पदार्थों के नाम बताइए?

    प्रतिरोध के तापमान गुणांक (alpha) के आधार पर पदार्थों को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जाता है, जो यह दर्शाता है कि तापमान बढ़ने पर उनका प्रतिरोध बढ़ेगा या घटेगा।

    ​यहां धनात्मक और ऋणात्मक तापमान गुणांक (alpha) वाले पदार्थों के नाम दिए गए हैं:

    ​1. धनात्मक तापमान गुणांक (alpha > 0) वाले पदार्थ

    ​इन पदार्थों का प्रतिरोध, तापमान बढ़ने पर बढ़ता है। इन्हें सामान्यतः चालक (Conductors) कहा जाता है।

    श्रेणी

    उदाहरण

    कारण

    शुद्ध धातुएँ

    ताँबा (Copper)

    मुक्त इलेक्ट्रॉनों की टक्करें बढ़ती हैं।

    एल्युमीनियम (Aluminum)

    चाँदी (Silver)

    सोना (Gold)

    टंगस्टन (Tungsten)

    अधिकांश मिश्र धातुएँ

    नाइक्रोम (Nichrome)

    बहुत कम धनात्मक, जिससे प्रतिरोध लगभग स्थिर रहता है।

    मैंगनीन (Manganin)


    मुख्य निष्कर्ष:

    सभी शुद्ध धातुएँ धनात्मक तापमान गुणांक वाली होती हैं।

    ​2. ऋणात्मक तापमान गुणांक (alpha < 0) वाले पदार्थ

    ​इन पदार्थों का प्रतिरोध, तापमान बढ़ने पर घटता है।

    श्रेणी

    उदाहरण

    कारण

    अर्धचालक

    सिलिकॉन (Silicon)

    तापीय ऊर्जा से मुक्त आवेश वाहकों की संख्या में वृद्धि होती है।

    जर्मेनियम (Germanium)

    कुचालक (विद्युतरोधी)

    रबर (Rubber)

    कागज़ (Paper)

    लकड़ी (Wood)

    वैद्युत अपघट्य

    लवण का घोल (Salt Solution)

    गतिशीलता बढ़ने से आयनों का प्रवाह आसान हो जाता है।

    कार्बन

    ग्रेफाइट (Graphite)


    मुख्य निष्कर्ष:

    अर्धचालक, कुचालक (विद्युतरोधी), और वैद्युत अपघट्य आमतौर पर ऋणात्मक तापमान गुणांक प्रदर्शित करते हैं।





    समांतर कनेक्शन में समतुल्य प्रतिरोध कितना होता है?

    समांतर कनेक्शन (Parallel Connection) में समतुल्य प्रतिरोध (Equivalent Resistance) की गणना करने का एक विशिष्ट तरीका होता है।

    ​समांतर कनेक्शन में प्रतिरोधों को एक-दूसरे के समानांतर जोड़ा जाता है, जिससे विद्युत धारा के प्रवाह के लिए कई रास्ते (Multiple Paths) उपलब्ध होते हैं।

    समांतर कनेक्शन में समतुल्य प्रतिरोध (R_{eq})

    ​समांतर कनेक्शन में, समतुल्य प्रतिरोध का व्युत्क्रम (Reciprocal) परिपथ में जुड़े सभी अलग-अलग प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों के योग (Sum of the reciprocals) के बराबर होता है।

    गणितीय सूत्र

    ​यदि किसी परिपथ में R_1, R_2, R_3, dots, R_n प्रतिरोध समांतर क्रम में जुड़े हैं, तो समतुल्य प्रतिरोध (R_{eq} या R_p) के लिए सूत्र है:

    {1}/{R_{eq}} = {1}/{R_1} + {1}/{R_2} + {1}/{R_3} + dots + {1}/{R_n}


    मुख्य निष्कर्ष

    ​समांतर कनेक्शन में समतुल्य प्रतिरोध का मान हमेशा परिपथ में जुड़े सबसे छोटे व्यक्तिगत प्रतिरोध (Smallest Individual Resistance) के मान से भी कम होता है।

    ​उदाहरण के लिए, यदि आप 10 Omega और 5 Omega के दो प्रतिरोधों को समांतर क्रम में जोड़ते हैं, तो समतुल्य प्रतिरोध 5 Omega से भी कम आएगा।

    दो प्रतिरोधों के लिए सरल सूत्र

    ​यदि केवल दो प्रतिरोध R_1 और R_2 समांतर क्रम में जुड़े हों, तो आप गणना को आसान बनाने के लिए यह सूत्र उपयोग कर सकते हैं:


    R_{eq} = {R_1 × R_2}/{R_1 + R_2}


    उदाहरण

    ​मान लीजिए R_1 = 6 Omega और R_2 = 3 Omega हैं:

    {1}/{R_{eq}} = {1}/{6} + {1}/{3} = {1+2}/{6} = {3}/{6} = {1}/{2}

    तो, R_{eq} = 2 Omega. (जो सबसे छोटे प्रतिरोध 3 Omega से भी कम है)।





    किस संयोजन से अधिक प्रतिरोध प्राप्त होता है - श्रृंखला संयोजन से या समानांतर संयोजन से?

    यह एक बहुत अच्छा और महत्वपूर्ण प्रश्न है।

    ​उच्चतम प्रतिरोध (Maximum Resistance) हमेशा श्रृंखला संयोजन (Series Connection) से प्राप्त होता है।

    उच्चतम प्रतिरोध: श्रृंखला संयोजन (Series Connection)

    ​श्रृंखला संयोजन में, प्रतिरोधों को एक के बाद एक जोड़ा जाता है, जिससे विद्युत धारा के प्रवाह के लिए केवल एक ही रास्ता होता है।

    ​1. कारण

    ​श्रृंखला संयोजन में, सभी व्यक्तिगत प्रतिरोध (Individual Resistances) सीधे जुड़ जाते हैं

    • समतुल्य प्रतिरोध (R_{eq}) सभी प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है।

    ​2. सूत्र

    ​यदि R_1, R_2, R_3 श्रृंखला में जुड़े हैं:

    R_{eq} = R_1 + R_2 + R_3 + 

    परिणामस्वरूप, समतुल्य प्रतिरोध का मान हमेशा परिपथ में जुड़े सबसे बड़े व्यक्तिगत प्रतिरोध के मान से भी अधिक होता है।

    निम्नतम प्रतिरोध: समानांतर संयोजन (Parallel Connection)

    ​समानांतर संयोजन में, प्रतिरोधों को अलग-अलग रास्तों (शाखाओं) में जोड़ा जाता है, जिससे धारा के प्रवाह के लिए कई रास्ते खुल जाते हैं।

    ​1. कारण

    ​समांतर कनेक्शन में प्रतिरोधों के व्युत्क्रम (Reciprocals) का योग किया जाता है।

    • ​यह संयोजन प्रभावी रूप से तार के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल को बढ़ा देता है, जिससे धारा को बहने के लिए अधिक जगह मिलती है और कुल प्रतिरोध घट जाता है।

    ​2. सूत्र

    {1}/{R_{eq}} = {1}/{R_1} + {1}/{R_2} + {1}/{R_3} + 

    परिणामस्वरूप, समतुल्य प्रतिरोध का मान हमेशा परिपथ में जुड़े सबसे छोटे व्यक्तिगत प्रतिरोध के मान से भी कम होता है।

    निष्कर्ष

    संयोजन (Connection)

                परिणामी प्रतिरोध

                            उपयोग

    श्रृंखला (Series)

                         अधिकतम (Maximum)

                                  प्रतिरोध को बढ़ाने के लिए।

    समानांतर (Parallel)

                          न्यूनतम (Minimum)

                                  प्रतिरोध को घटाने के लिए।





    1 ओम प्रतिरोध का भौतिक अर्थ क्या है?

    1 ओम प्रतिरोध का भौतिक अर्थ

    1 ओम ({1 } Omega) प्रतिरोध विद्युत प्रतिरोध (electrical resistance) की SI इकाई है। इसका भौतिक अर्थ ओम के नियम (V=IR) से सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है।

    • मूल परिभाषा: 1 ओम प्रतिरोध को किसी चालक (conductor) के दो बिंदुओं के बीच उस प्रतिरोध के रूप में परिभाषित किया जाता है, जब उन बिंदुओं पर 1 वोल्ट ({1 V}) का स्थिर विभवांतर (potential difference) लगाया जाता है और उस चालक में 1 एम्पियर ({1 A}) की धारा (current) उत्पन्न होती है।

    ​इसे सूत्र के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है:

    1 Omega = {1 { V}}/{1 { A}}

    भौतिक व्याख्या

    ​प्रतिरोध किसी चालक का वह गुण है जो उसमें से विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करता है।

    • विरोध की मात्रा: 1 ओम प्रतिरोध का मतलब है कि चालक विद्युत धारा के प्रवाह में एक निश्चित मात्रा में अवरोध पैदा कर रहा है।
    • ऊर्जा व्यय (Energy Dissipation): जब 1 एम्पियर की धारा 1 ओम के प्रतिरोध से गुजरती है, तो 1 वोल्ट का विभवांतर बनाए रखने के लिए ऊर्जा का उपयोग होता है, जो आमतौर पर ऊष्मा के रूप में व्यय होती है (जूल तापन - Joule Heating)।

    सरल शब्दों में:

    • ​यदि आपको किसी चालक में 1 एम्पियर की धारा प्रवाहित करनी है, और इसके लिए आपको उसके सिरों पर केवल 1 वोल्ट का विभवांतर लगाना पड़ रहा है, तो उस चालक का प्रतिरोध 1 ओम है।
    • ​यदि प्रतिरोध 1 ओम से कम है, तो धारा के प्रवाह के लिए 1 वोल्ट से कम विभवांतर की आवश्यकता होगी (अर्थात, यह एक अच्छा चालक है)।
    • ​यदि प्रतिरोध 1 ओम से अधिक है, तो धारा के प्रवाह के लिए 1 वोल्ट से अधिक विभवांतर की आवश्यकता होगी (अर्थात, यह धारा प्रवाह में अधिक अवरोध पैदा करता है)।





    परिपथों में प्रयुक्त होने वाले प्रतिरोधकों के प्रकार क्या-क्या हैं?

    परिपथों में प्रयुक्त होने वाले प्रतिरोधकों (Resistors) को उनकी कार्यक्षमता और संरचना के आधार पर मुख्य रूप से दो व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

    प्रतिरोधकों के मुख्य प्रकार (Main Types of Resistors)

    ​1. निश्चित प्रतिरोधक (Fixed Resistors)

    ​ये वे प्रतिरोधक होते हैं जिनका प्रतिरोध मान निश्चित होता है और इसे बदला नहीं जा सकता है। ये परिपथों में सबसे अधिक उपयोग किए जाते हैं, जैसे धारा को सीमित करने (current limiting), वोल्टेज विभाजित करने (voltage dividing) और भार (load) प्रबंधन के लिए।

    संरचना के आधार पर निश्चित प्रतिरोधकों के प्रकार:

    • कार्बन सिंथेटिक/कार्बन कंपोजिशन (Carbon Composition): ये कार्बन पाउडर और एक बाइंडर सामग्री को मिलाकर बनाए जाते हैं। ये सस्ते होते हैं, लेकिन इनका प्रतिरोध मान तापमान पर बहुत निर्भर करता है और सटीकता कम होती है।
    • कार्बन फ़िल्म (Carbon Film): ये एक सिरेमिक आधार पर कार्बन की एक पतली फिल्म जमा करके बनाए जाते हैं। ये कंपोजिशन की तुलना में अधिक स्थिर और सटीक होते हैं।
    • मेटल फ़िल्म (Metal Film): ये सिरेमिक रॉड पर धातु (जैसे निकेल क्रोमियम) की एक बहुत पतली फिल्म जमा करके बनाए जाते हैं। ये सबसे लोकप्रिय, उच्च सटीकता वाले, और तापमान परिवर्तनों के लिए बहुत स्थिर होते हैं।
    • वाउंड प्रतिरोधक (Wire Wound Resistors): ये चीनी मिट्टी के आधार पर उच्च-प्रतिरोध तार (जैसे नाइक्रोम) को लपेट कर बनाए जाते हैं। इनका उपयोग आमतौर पर उच्च शक्ति (High Power) वाले अनुप्रयोगों में किया जाता है जहाँ अधिक ताप उत्पन्न होता है।
    • सरफेस माउंट डिवाइस (SMD Resistors): ये छोटे, आयताकार चिप्स होते हैं, जिन्हें सीधे मुद्रित परिपथ बोर्ड (PCB) की सतह पर लगाया जाता है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में इनका उपयोग सबसे अधिक होता है।

    ​2. परिवर्तनीय प्रतिरोधक (Variable Resistors)

    ​इन प्रतिरोधकों का मान आवश्यकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है। इनका उपयोग मुख्य रूप से परिपथों में धारा या वोल्टेज को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।

    परिवर्तनीय प्रतिरोधकों के मुख्य प्रकार:

    • पोटेंशियोमीटर (Potentiometer - Pot): इसमें तीन टर्मिनल होते हैं और इसका उपयोग वोल्टेज विभाजक के रूप में किया जाता है। वॉल्यूम कंट्रोल या ब्राइटनेस एडजस्टमेंट जैसे अनुप्रयोगों में इनका इस्तेमाल होता है।
    • रियोस्टैट (Rheostat): इसमें दो या तीन टर्मिनल होते हैं और इसका उपयोग परिपथ में धारा को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। यह अक्सर उच्च शक्ति अनुप्रयोगों में उपयोग होता है।
    • ट्रिमर (Trimmer): ये छोटे पोटेंशियोमीटर होते हैं, जिन्हें एक बार सेट करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है (जैसे कारखाने में किसी परिपथ को कैलिब्रेट करना)।

    ​3. विशेष प्रतिरोधक (Special Resistors - Non-Linear)

    इन प्रतिरोधकों का मान किसी बाहरी भौतिक मात्रा पर निर्भर करता है:

    • थर्मिस्टर (Thermistor): इसका प्रतिरोध तापमान पर निर्भर करता है।
      • NTC (Negative Temperature Coefficient): तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है।
      • PTC (Positive Temperature Coefficient): तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है।
    • LDR (Light Dependent Resistor - प्रकाश निर्भर प्रतिरोधक): इसका प्रतिरोध उस पर पड़ने वाले प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करता है (प्रकाश बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है)।
    • वैरिएस्टर/VDR (Voltage Dependent Resistor): इसका प्रतिरोध लगाए गए वोल्टेज पर निर्भर करता है, और इसका उपयोग मुख्य रूप से सर्ज प्रोटेक्शन में किया जाता है।




    थर्मिस्टर क्या होता है?

    थर्मिस्टर (Thermistor) क्या है?

    थर्मिस्टर (Thermistor) दो शब्दों थर्मल (Thermal - तापीय) और रेज़िस्टर (Resistor - प्रतिरोधक) के संयोजन से बना है। यह एक विशेष प्रकार का प्रतिरोधक होता है जिसका प्रतिरोध मान तापमान में परिवर्तन के साथ बहुत तेज़ी से बदलता है।

    ​यह एक अत्यधिक तापमान-संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक घटक है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से तापमान को मापने, नियंत्रित करने और परिपथों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए किया जाता है।

    कार्य सिद्धांत

    ​थर्मिस्टर आमतौर पर विभिन्न धातुओं के ऑक्साइड (जैसे निकिल, कोबाल्ट, ताँबा) के अर्धचालक (Semiconductor) पदार्थ से बने होते हैं। तापमान बदलने पर इन पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉन (free electrons) और होल (holes) की संख्या बहुत अधिक बदल जाती है, जिससे उनका प्रतिरोध अत्यधिक प्रभावित होता है।

    थर्मिस्टर के प्रकार

    ​थर्मिस्टर को उनके तापमान गुणांक (Temperature Coefficient) के आधार पर दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:

    प्रकार

    पूर्ण नाम

    ताप के साथ प्रतिरोध का संबंध

    मुख्य उपयोग

    NTC

    नकारात्मक ताप गुणांक (Negative Temperature Coefficient)

    तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध घटता है

    तापमान संवेदन (Sensing), तापमान मापन, धारा सीमित करना (Inrush Current Limiting)।

    PTC

    धनात्मक ताप गुणांक (Positive Temperature Coefficient)

    तापमान बढ़ने पर प्रतिरोध बढ़ता है

    अति-धारा संरक्षण (Overcurrent Protection), रीसेट करने योग्य फ्यूज (Resettable Fuses), स्व-नियमन हीटर।


    थर्मिस्टर के अनुप्रयोग

    ​थर्मिस्टर अपनी उच्च संवेदनशीलता, छोटे आकार और कम लागत के कारण कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उपयोग किए जाते हैं:

    • तापमान मापन: डिजिटल थर्मामीटर, थर्मोस्टेट।
    • घरेलू उपकरण: एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, राइस कुकर में तापमान नियंत्रण।
    • ऑटोमोटिव: इंजन तेल और शीतलक (coolant) के तापमान को मापना।
    • परिपथ सुरक्षा: पावर सप्लाई में शुरुआती धारा (inrush current) को सीमित करना।






    किसी परिपथ में प्रतिरोधक का कार्य क्या होता है?

    किसी विद्युत परिपथ (Electric Circuit) में प्रतिरोधक (Resistor) का मुख्य कार्य उसमें बहने वाली विद्युत धारा के प्रवाह को नियंत्रित करना और ऊर्जा का प्रबंधन करना होता है।

    ​संक्षेप में, प्रतिरोधक परिपथ में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाता है:

    ​1. धारा को सीमित करना (Current Limiting)

    ​यह प्रतिरोधक का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

    • ​प्रतिरोधक, ओम के नियम (V=IR) के अनुसार, धारा के प्रवाह का विरोध करता है।
    • ​यह सुनिश्चित करता है कि परिपथ के अन्य संवेदनशील घटकों (जैसे LED, इंटीग्रेटेड सर्किट - IC) को अधिक धारा (Excess Current) न मिले, जिससे वे जलने या क्षतिग्रस्त होने से बच जाते हैं।
      • उदाहरण: LED को सीधे बैटरी से जोड़ने पर वह तुरंत जल जाएगी। उसे बचाने के लिए उसके साथ एक प्रतिरोधक को श्रेणी क्रम (series) में जोड़ा जाता है।

    ​2. वोल्टेज विभाजन (Voltage Division)

    • ​जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधकों को श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है, तो वे एक वोल्टेज विभाजक (Voltage Divider) बनाते हैं।
    • ​यह उच्च स्रोत वोल्टेज को आवश्यक निम्न वोल्टेज स्तरों में विभाजित करके परिपथ के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाता है।
      • उदाहरण: यदि आपको 9V स्रोत से एक 5V के घटक को चलाना है, तो आप दो प्रतिरोधकों का उपयोग करके वोल्टेज को विभाजित कर सकते हैं।

    ​3. ऊर्जा का क्षय (Energy Dissipation)

    • ​प्रतिरोधक विद्युत ऊर्जा को ऊष्मा ऊर्जा (Heat Energy) में परिवर्तित करता है, इस प्रक्रिया को जूल तापन (Joule Heating) कहते हैं।
    • ​यह कार्य अत्यधिक धारा से उत्पन्न अतिरिक्त ऊर्जा को सुरक्षित रूप से ऊष्मा के रूप में वातावरण में मुक्त करने के लिए आवश्यक है।
      • उदाहरण: हीटर, इलेक्ट्रिक टोस्टर और बल्ब (पुराने फिलामेंट वाले) प्रतिरोधक के इस सिद्धांत का उपयोग करके ही गर्मी या प्रकाश उत्पन्न करते हैं।

    ​4. समय नियतांक स्थापित करना (Setting Time Constants)

    • ​संधारित्र (Capacitor) या प्रेरक (Inductor) के साथ मिलकर, प्रतिरोधक RC या RL परिपथ बनाता है।
    • ​ये परिपथ समय नियतांक (tau) स्थापित करते हैं, जो यह निर्धारित करता है कि संधारित्र कितनी जल्दी चार्ज या डिस्चार्ज होगा। यह टाइमर, ऑसिलेटर और फिल्टर परिपथों के लिए महत्वपूर्ण है।

    ​5. पुल-अप और पुल-डाउन प्रतिरोधक (Pull-up and Pull-down Resistors)

    • ​डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में, प्रतिरोधकों का उपयोग इनपुट पिनों (input pins) के वोल्टेज को एक निश्चित लॉजिकल स्तर (जैसे HIGH या LOW) पर बनाए रखने के लिए किया जाता है, ताकि वे फ्लोटिंग अवस्था (Floating state) में न रहें और अनिश्चित व्यवहार न करें।






    वेरिएबल रेसिस्टर (रियोस्टैट) क्या होता है?

    रियोस्टैट (Rheostat) एक प्रकार का परिवर्तनीय प्रतिरोधक (Variable Resistor) होता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य किसी विद्युत परिपथ में प्रतिरोध को मैन्युअल रूप से समायोजित (Adjust Manually) करके उसमें बहने वाली विद्युत धारा (Current) के प्रवाह को नियंत्रित करना होता है।

    ​रियोस्टैट को अक्सर धारा नियंत्रक भी कहा जाता है।

    ​कार्य सिद्धांत और संरचना

    ​रियोस्टैट का निर्माण आमतौर पर एक सिरेमिक कोर के चारों ओर लिपटे हुए एक प्रतिरोधक तार (जैसे नाइक्रोम) का उपयोग करके किया जाता है।

    1. टर्मिनल: एक रियोस्टैट में आम तौर पर तीन टर्मिनल होते हैं, लेकिन इसे धारा नियंत्रक के रूप में उपयोग करते समय केवल दो टर्मिनल (एक स्थिर टर्मिनल और एक स्लाइडिंग या वाइपर टर्मिनल) का उपयोग किया जाता है।
    2. स्लाइडिंग संपर्क (Sliding Contact): रियोस्टैट में एक स्लाइडिंग संपर्क (जिसे वाइपर भी कहते हैं) होता है। उपयोगकर्ता इस संपर्क को प्रतिरोधक तार की लंबाई पर खिसकाकर या घुमाकर परिपथ में शामिल प्रतिरोधक तार की प्रभावी लंबाई को बदलता है।
    3. प्रतिरोध का नियंत्रण: हम जानते हैं कि प्रतिरोध तार की लंबाई (L) के सीधे आनुपातिक होता है (R \propto L)।
      • ​जब स्लाइडिंग संपर्क को तार की पूरी लंबाई पर ले जाया जाता है, तो परिपथ में अधिकतम प्रतिरोध शामिल होता है।
      • ​जब संपर्क को तार की कम लंबाई पर सेट किया जाता है, तो परिपथ में न्यूनतम प्रतिरोध शामिल होता है।
    4. धारा का नियंत्रण: प्रतिरोध को बदलकर, रियोस्टैट ओम के नियम (I = V/R) के अनुसार, परिपथ में धारा को नियंत्रित करता है। प्रतिरोध बढ़ने पर धारा घटती है और प्रतिरोध घटने पर धारा बढ़ती है।

    ​रियोस्टैट के अनुप्रयोग

    ​रियोस्टैट विशेष रूप से उन अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त होते हैं जहाँ उच्च धारा (High Current) को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है:

    • प्रयोगशालाएँ: विद्युत प्रयोगों में धारा के मान को ठीक से समायोजित करने के लिए।
    • मोटर नियंत्रण: DC मोटर्स की गति को नियंत्रित करने के लिए।
    • प्रकाश नियंत्रण: थिएटर या औद्योगिक सेटिंग्स में प्रकाश की चमक (Brightness) को नियंत्रित करने के लिए।
    • बैटरी चार्जिंग: चार्जिंग धारा को सीमित करने के लिए।






    चालकता (G) क्या है?

    चालकता (Conductance), जिसे G से दर्शाया जाता है, किसी पदार्थ या घटक का वह गुण है जो यह मापता है कि विद्युत धारा उसमें से कितनी आसानी से प्रवाहित हो सकती है।

    ​यह विद्युत प्रतिरोध (R) की विपरीत (Reciprocal) राशि है।

    ​1. मुख्य परिभाषाएँ

    मूल अर्थ: जबकि प्रतिरोध धारा के प्रवाह का विरोध करता है, चालकता उस प्रवाह का समर्थन करती है। जितना अधिक चालकत्व, उतनी ही कम बाधा और उतनी ही आसानी से धारा प्रवाहित होती है।

    गणितीय संबंध: चालकता G और प्रतिरोध R के बीच सीधा गणितीय संबंध होता है:

    G = {1}/{R}

    ओम के नियम से संबंध: ओम के नियम (V=IR) को चालकता के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है।

    चूंकि R = V/I, 

    इसलिए:


    G = {1}/{R} = {I}/{V}


    इसका अर्थ है कि एक निश्चित वोल्टेज (V) पर, परिपथ में बहने वाली धारा (I) चालकता (G) के सीधे आनुपातिक होती है।

    2. SI इकाई

    ​चालकता की SI इकाई (International System of Units) सीमेंस (Siemens) है, जिसे \text{S} से दर्शाया जाता है।

    • ​चूँकि G = 1/R और R की इकाई ओम (\Omega) है, चालकता की इकाई ओम इनवर्स (\Omega^{-1}) होती है।
    • ​Omega^{-1} को ही म्हो (Mho) भी कहा जाता था (जो {Ohm} का उल्टा है)।
    • ​अतः, 1 { S} = 1 Omega^{-1} = 1 { Mho}

    ​3. विशिष्ट चालकता/चालकता (Conductivity - /sigma)


    चालकता (G) एक विशिष्ट घटक (जैसे एक प्रतिरोधक) की विशेषता है।

    विशिष्ट चालकता (या केवल 'चालकता', जिसे /sigma या /kappa से दर्शाया जाता है) एक सामग्री का आंतरिक गुण है, जो उसके आयामों (लंबाई और क्षेत्रफल) पर निर्भर नहीं करता है।

    यह विशिष्ट प्रतिरोधकता (rho) का व्युत्क्रम होती है:

    /sigma = {1}/{rho}

    इसकी SI इकाई सीमेंस प्रति मीटर ({S/m}) होती है।







    चालकता और प्रतिरोध में क्या अंतर है?

    चालकता (G) और प्रतिरोध (R) विद्युत परिपथों के दो मौलिक और एक दूसरे के विपरीत गुण हैं। वे किसी चालक में धारा के प्रवाह के प्रति पदार्थ की प्रतिक्रिया को मापने का काम करते हैं।

    ​यहाँ दोनों के बीच मुख्य अंतरों को सारांशित किया गया है:

    विशेषता

    प्रतिरोध (Resistance) - R

    चालकता (Conductance) - G

    मूल अवधारणा

    यह विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करता है।

    यह विद्युत धारा के प्रवाह को समर्थन (आसानी से बहने की अनुमति) देता है।

    माप क्या करता है?

    यह मापता है कि पदार्थ धारा के प्रवाह में कितनी बाधा उत्पन्न करता है।

    यह मापता है कि पदार्थ धारा के प्रवाह में कितनी आसानी की अनुमति देता है।

    गणितीय संबंध

    इसे ओम के नियम से परिभाषित किया जाता है:  ​R = {V}/{I}

    यह प्रतिरोध का व्युत्क्रम होता है: ​G = {1}/{R} ={I}/{V}

    SI इकाई

    ओम (Omega)

    सीमेंस ({S}) (या म्हो (mho))

    उच्च मान का अर्थ

    उच्च प्रतिरोध का अर्थ है धारा का कम प्रवाह। (जैसे: इंसुलेटर)

    उच्च चालकता का अर्थ है धारा का अधिक प्रवाह। (जैसे: अच्छा चालक)


    प्रतिरोधकता (rho) और विशिष्ट चालकता (/sigma)

    ​इनके अनुरूप, जो सामग्री के आंतरिक गुण हैं, वे भी एक दूसरे के व्युत्क्रम (Reciprocal) होते हैं:

    विशेषता

    प्रतिरोधकता (Resistivity) - rho

    विशिष्ट चालकता (Conductivity) -/ sigma

    मूल अवधारणा

    यह पदार्थ का विशिष्ट गुण है जो धारा के विरोध को मापता है, भले ही उसके आयाम (आकार और लंबाई) कुछ भी हों।

    यह पदार्थ का विशिष्ट गुण है जो धारा के समर्थन को मापता है।

    गणितीय संबंध

    rho = R {A}/{L}

    यह प्रतिरोधकता का व्युत्क्रम है:  ​sigma = {1}/{rho}

    SI इकाई

    ओम-मीटर (Omega cdot {m})

    सीमेंस प्रति मीटर ({S/m})


    संक्षेप में, 

    यदि आप एक प्रतिरोधक का उपयोग करते हैं, तो आपका लक्ष्य धारा को सीमित करना है; यदि आप एक चालक का उपयोग करते हैं, तो आपका लक्ष्य धारा को अधिकतम करना है। यह दोनों राशियाँ किसी परिपथ में धारा नियंत्रण की दो विपरीत अभिव्यक्तियाँ हैं।





    अतिचालकता क्या है?

    अतिचालकता (Superconductivity) क्या है?

    अतिचालकता एक असाधारण भौतिक गुण है जिसमें कुछ पदार्थ एक विशिष्ट क्रांतिक ताप (Critical Temperature - T_c) से नीचे ठंडा किए जाने पर दो मुख्य घटनाएँ प्रदर्शित करते हैं:

    1. शून्य विद्युत प्रतिरोधकता: पदार्थ का विद्युत प्रतिरोध (Electrical Resistance) अचानक और पूर्ण रूप से शून्य हो जाता है।
    2. मेसनर प्रभाव (Meissner Effect): पदार्थ अपने आंतरिक भाग से सभी चुंबकीय क्षेत्रों को बाहर निकाल देता है।

    ​1. शून्य प्रतिरोधकता (Zero Resistivity)

    ​जब कोई पदार्थ अतिचालक अवस्था में प्रवेश करता है, तो उसमें से विद्युत धारा बिना किसी प्रतिरोध या ऊर्जा के नुकसान (ऊष्मा के रूप में) के प्रवाहित हो सकती है।

    • महत्व:
      • ​इसका अर्थ है कि एक बार अतिचालक तार में धारा स्थापित हो जाने पर, वह बिना किसी बाहरी वोल्टेज स्रोत के हमेशा के लिए बहती रह सकती है।
      • ​बिजली के पारेषण (Transmission) में ऊर्जा की शून्य हानि होती है।

    ​2. मेसनर प्रभाव (Meissner Effect)

    ​यह अतिचालकता की पहचान करने वाली दूसरी महत्वपूर्ण घटना है।

    • ​जब कोई अतिचालक अपने क्रांतिक ताप (T_c) से नीचे ठंडा होता है, तो वह एक पूर्ण डायमैग्नेटिक (Perfect Diamagnetic) बन जाता है और अपने आंतरिक भाग से सभी चुंबकीय बल रेखाओं को बाहर निकाल देता है।
    • ​यह प्रभाव अतिचालकों को चुंबक के ऊपर स्थिरता से मंडराने (Magnetic Levitation) की अनुमति देता है, जिसका उपयोग अतिचालक ट्रेनों (Maglev Trains) में किया जाता है।

    ​3. क्रांतिक ताप (T_c)

    • ​वह तापमान जिस पर किसी पदार्थ में अतिचालकता का गुण प्रकट होता है, उसे क्रांतिक ताप कहते हैं।
    • ​अधिकांश पारंपरिक अतिचालकों (जैसे पारा, टिन, एल्यूमीनियम) का क्रांतिक ताप बहुत कम होता है (परम शून्य के करीब, 0 { K} या -273.15^ circ{C} के आसपास)।
    • ​कुछ सिरेमिक पदार्थों को उच्च-तापमान अतिचालक (High-Temperature Superconductors) कहा जाता है, जिनका T_c द्रव नाइट्रोजन के क्वथनांक (Boiling point, -196^ circ {C} या 77 { K}) से अधिक होता है, जिससे उन्हें ठंडा करना आसान और सस्ता हो जाता है।

    ​4. अतिचालकता के अनुप्रयोग

    ​अतिचालकता में क्रांति लाने की क्षमता है, और इसके वर्तमान उपयोगों में शामिल हैं:

    • अतिचालक चुंबक: MRI (Magnetic Resonance Imaging) मशीन और कण त्वरकों (Particle Accelerators) में उपयोग किए जाने वाले शक्तिशाली और ऊर्जा-कुशल चुंबक।
    • मैगलेव ट्रेनें: चुंबकीय उत्तोलन (Magnetic Levitation) पर आधारित उच्च गति वाली ट्रेनें।
    • SQUIDs (Superconducting Quantum Interference Devices): ये दुनिया के सबसे संवेदनशील चुंबकीय-क्षेत्र मापी हैं, जिनका उपयोग मस्तिष्क स्कैनिंग में होता है।





    कम प्रतिरोध और उच्च प्रतिरोध वाले पदार्थ कौन से होते हैं?

    कम प्रतिरोध और उच्च प्रतिरोध वाले पदार्थों को आमतौर पर उनकी विशिष्ट चालकता (sigma) या विशिष्ट प्रतिरोधकता (rho) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

    ​सरल शब्दों में, कम प्रतिरोध वाले पदार्थ वे होते हैं जो विद्युत धारा को आसानी से बहने देते हैं, जबकि उच्च प्रतिरोध वाले पदार्थ वे होते हैं जो धारा के प्रवाह का पुरजोर विरोध करते हैं।

    ​यहाँ इन दोनों प्रकार के पदार्थों का विवरण दिया गया है:

    ​1. कम प्रतिरोध वाले पदार्थ (Low Resistance Materials)

    ​इन पदार्थों को चालक (Conductors) कहा जाता है। इनमें बड़ी संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं जो बाहरी विद्युत क्षेत्र लगाने पर आसानी से गति करते हैं।

    वर्ग

    पदार्थ (उदाहरण)

    विशिष्ट प्रतिरोधकता (rho) का स्तर

    मुख्य उपयोग

    सर्वोत्तम चालक

    चाँदी (Silver)

    सबसे कम (approx 1.59×10^{-8} Omega cdot {m})

    विशेष उच्च-प्रदर्शन वाले परिपथों, सटीक संपर्कों में।

    उत्कृष्ट चालक

    ताँबा (Copper)

    बहुत कम (approx 1.7×10^{-8} Omega cdot {m})

    घरों और उद्योगों में वायरिंग, मोटर वाइंडिंग, PCB ट्रैक में।

    सामान्य चालक

    सोना (Gold)

    कम (approx 2.44×10^{-8} Omega cdot {m})

    जंग-प्रतिरोधी विद्युत संपर्क, कनेक्टर पिन।

    एल्यूमीनियम (Aluminum)

    कम (approx 2.82×10^{-8} Omega cdot {m})

    उच्च-वोल्टेज पारेषण लाइनें (Transmission lines), क्योंकि यह हल्का होता है।

    पीतल (Brass)

    मध्यम-कम

    कनेक्टर, स्विच, टर्मिनलों में।





    कम प्रतिरोध क्यों आवश्यक है?

    मुख्य रूप से बिजली के पारेषण (Transmission) और वायरिंग में ऊर्जा की हानि (जूल तापन के कारण) को कम करने के लिए।

    ​2. उच्च प्रतिरोध वाले पदार्थ (High Resistance Materials)

    ​इन पदार्थों को अचालक या कुचालक (Insulators) कहा जाता है। इनमें इलेक्ट्रॉन मजबूती से बंधे होते हैं और सामान्य परिस्थितियों में गति नहीं करते हैं।


    वर्ग

    पदार्थ (उदाहरण)

    विशिष्ट प्रतिरोधकता (rho) का स्तर

    मुख्य उपयोग

    उच्च प्रतिरोधक

    नाइक्रोम (Nichrome) (निकल और क्रोमियम का मिश्र धातु)

    उच्च (approx 110 × 10^{-8} Omega cdot {m})

    हीटिंग तत्व (जैसे हीटर, टोस्टर), क्योंकि यह गर्म होने पर भी ऑक्सीकरण (Oxidation) का विरोध करता है।

    मैंगनीन (Manganin)

    उच्च (approx 44 × 10^{-8} Omega cdot {m})

    सटीक प्रतिरोधक (Precision Resistors), क्योंकि इसका प्रतिरोध तापमान के साथ कम बदलता है।

    कुचालक (Insulators)

    पोर्सिलेन/सिरेमिक

    बहुत अधिक (approx 10^{10}  - 10^{14} Omega cdot {m})

    उच्च-वोल्टेज बिजली लाइनों में अवरोधक (Insulators)।

    रबर, प्लास्टिक (PVC)

    बहुत अधिक (approx 10^{13} - 10^{16} Omega cdot {m})

    बिजली के तारों पर सुरक्षा कवच (Sheathing) और कवरिंग।

    कांच (Glass)

    बहुत अधिक (approx 10^{10}  -  10^{14} Omega cdot {m})

    विद्युत उपकरणों में इन्सुलेशन।


    उच्च प्रतिरोध क्यों आवश्यक है?

    • इन्सुलेशन: बिजली के झटके को रोकने और परिपथ के दो हिस्सों को विद्युत रूप से अलग करने के लिए।
    • हीटिंग: प्रतिरोधकों में धारा को ऊष्मा में परिवर्तित करके हीटिंग प्रभाव उत्पन्न करने के लिए।
    • नियंत्रण: परिपथ में आवश्यक धारा सीमित करने वाले प्रतिरोधकों के रूप में।




    प्रतिरोधकों में रंग कोड क्या होता है?

    प्रतिरोधकों में रंग कोड (Resistor Color Code)

    ​प्रतिरोधकों में रंग कोड (Color Code) एक मानकीकृत (Standardized) तरीका है जिसका उपयोग छोटे प्रतिरोधकों (विशेष रूप से कार्बन फ़िल्म और मेटल फ़िल्म प्रतिरोधकों) का प्रतिरोध मान (Omega), सहनशीलता (Tolerance), और कभी-कभी तापमान गुणांक (Temperature Coefficient) निर्धारित करने के लिए किया जाता है।

    ​यह विधि इसलिए अपनाई गई है क्योंकि ये प्रतिरोधक इतने छोटे होते हैं कि उन पर संख्याएँ छापना कठिन होता है।

    ​1. रंग कोड की संरचना

    ​एक प्रतिरोधक पर आमतौर पर 4 या 5 रंगीन बैंड (पट्टी) होते हैं। प्रत्येक रंग एक संख्या, गुणक (Multiplier), या सहनशीलता का प्रतिनिधित्व करता है।

    ​A. 4-बैंड प्रतिरोधक (सबसे आम)

    ​यह सबसे सामान्य प्रकार है और इसमें चार पट्टियाँ होती हैं:

    • बैंड 1 (Band 1): पहले अंक को दर्शाता है।
    • बैंड 2 (Band 2): दूसरे अंक को दर्शाता है।
    • बैंड 3 (Band 3): गुणक (Multiplier) को दर्शाता है।
    • बैंड 4 (Band 4): सहनशीलता (Tolerance) को दर्शाता है। यह पट्टी अन्य पट्टियों से थोड़ी दूर होती है।

    ​B. 5-बैंड प्रतिरोधक (सटीकता के लिए)

    ​इनका उपयोग अधिक सटीक प्रतिरोधकों (जैसे मेटल फ़िल्म प्रतिरोधकों) के लिए किया जाता है:

    • बैंड 1, 2, 3: पहले तीन अंक दर्शाते हैं।
    • बैंड 4: गुणक (Multiplier) को दर्शाता है।
    • बैंड 5: सहनशीलता (Tolerance) को दर्शाता है।

    ​2. रंग कोड सारणी (Color Code Table)

    ​प्रतिरोधक के मान को पढ़ने के लिए आपको एक मानक रंग कोड सारणी की आवश्यकता होती है।

    रंग

    अंक (Band 1, 2, 3)

    गुणक (Multiplier) (Band 3, 4)

    सहनशीलता (Tolerance) (Band 4, 5)

    काला (Black)

    0

    10^0 (या × 1)

    -

    भूरा (Brown)

    1

    10^1 (या × 10)

    pm 1 %

    लाल (Red)

    2

    10^2 (या × 100)

    pm 2 %

    नारंगी (Orange)

    3

    10^3 (या  × 1000)

    -

    पीला (Yellow)

    4

    10^4

    -

    हरा (Green)

    5

    10^5

    pm 0.5 %

    नीला (Blue)

    6

    10^6

    pm 0.25 %

    बैंगनी (Violet)

    7

    10^7

    pm 0.1 %

    स्लेटी (Grey)

    8

    10^8

    pm 0.05 %

    सफेद (White)

    9

    10^9

    -

    सुनहरा (Gold)

    -

    10^{-1} (या × 0.1)

    pm 5 %

    चाँदी (Silver)

    -

    10^{-2} (या × 0.01)

    pm 10 %

    कोई नहीं (None)

    -

    -

    pm 20 %


    3. मान निकालने का सूत्र

    ​प्रतिरोध का मान इस सूत्र से निकाला जाता है:

    {प्रतिरोध } R = ({पहला अंक} × 10 + {दूसरा अंक}) × {गुणक} pm {सहनशीलता}

    उदाहरण (4-बैंड): 

    यदि रंग हैं भूरा, काला, लाल, सुनहरा

    1. पहला अंक (भूरा): 1
    2. दूसरा अंक (काला): 0
    3. गुणक (लाल): 10^2 (या 100)
    4. सहनशीलता (सुनहरा): pm 5 %



    प्रतिरोधकों में रंग कोड क्या होता है?

    प्रतिरोधकों (Resistors) में रंग कोड एक मानक तरीका है जिसका उपयोग प्रतिरोधक के मान (Resistance Value) और उसकी सहनशीलता (Tolerance) को इंगित करने के लिए किया जाता है।

    ​यह छोटे प्रतिरोधकों पर मान को सीधे संख्या में लिखने की तुलना में बहुत आसान होता है।

    रंग कोड का अर्थ

    ​प्रतिरोधक पर अलग-अलग रंग की पट्टियाँ (बैंड्स) होती हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशेष मान, गुणक या सहनशीलता को दर्शाती है।

    रंग

    अंक (Digit)

    गुणक (Multiplier)

    सहनशीलता (Tolerance)

    काला (Black)

    0

    × 1

    -

    भूरा (Brown)

    1

    × 10

    pm 1 %

    लाल (Red)

    2

    × 100

    pm 2 %

    नारंगी (Orange)

    3

    × 1,000

    -

    पीला (Yellow)

    4

    × 10,000

    -

    हरा (Green)

    5

    × 100,000

    pm 0.5 %

    नीला (Blue)

    6

    × 1,000,000

    pm 0.25 %

    बैंगनी (Violet)

    7

    × 10,000,000

    pm 0.1 %

    ग्रे (Grey)

    8

    × 100,000,000

    pm 0.05 %

    सफेद (White)

    9

    × 1,000,000,000

    -

    सुनहरा (Gold)

    -

    × 0.1

    pm 5 %

    चाँदी (Silver)

    -

    × 0.01

    pm 10 %

    कोई नहीं (None)

    -

    -

    pm 20 %


    प्रतिरोध मान की गणना कैसे करें (4-बैंड)

    ​आमतौर पर प्रतिरोधकों में 4, 5 या 6 बैंड होते हैं। 4-बैंड वाले प्रतिरोधक का उदाहरण:

    1. पहला बैंड: यह पहला अंक बताता है (ऊपर की तालिका से)।
    2. दूसरा बैंड: यह दूसरा अंक बताता है।
    3. तीसरा बैंड: यह गुणक (Multiplier) बताता है, जिसका मतलब है कि पहले दो अंकों से बनी संख्या को इस मान से गुणा किया जाएगा।
    4. चौथा बैंड: यह सहनशीलता (Tolerance) बताता है, यानी वास्तविक मान, अंकित मान से कितना ऊपर या नीचे हो सकता है।

    उदाहरण:

    ​अगर बैंड का क्रम पीला, बैंगनी, लाल, सुनहरा है:

    • पीला (Yellow): 4 (पहला अंक)
    • बैंगनी (Violet): 7 (दूसरा अंक)
    • लाल (Red): × 100 (गुणक)
    • सुनहरा (Gold): pm 5 % (सहनशीलता)

    मान की गणना: 47 × 100 = 4,700 Omega (ओम)

    अंतिम मान: 4.7  k Omega (किलो-ओम) pm 5 %

    ​क्या आप किसी विशिष्ट रंग कोड का मान जानना चाहेंगे या 5-बैंड वाले कोड के बारे में जानना चाहेंगे?





    प्रतिरोधकों में सहनशीलता क्या होती है?

    आपने एक बहुत ही महत्वपूर्ण तकनीकी शब्द के बारे में पूछा है।

    ​इलेक्ट्रॉनिक्स में सहनशीलता (Tolerance) प्रतिरोधकों (Resistors) का एक महत्वपूर्ण गुण है।

    प्रतिरोधकों में सहनशीलता (Tolerance) क्या है?

    ​सहनशीलता एक प्रतिशत मान है जो यह दर्शाता है कि प्रतिरोधक का वास्तविक प्रतिरोध मान (Actual Resistance Value), उसके अंकित/नाममात्र मान (Nominal/Stated Value) से अधिकतम कितना कम या अधिक हो सकता है।

    संक्षेप में:

    सहनशीलता = अंकित मान से वास्तविक मान में अधिकतम विचलन (Maximum Deviation)


    ​1. विचलन का कारण

    ​प्रतिरोधक बनाते समय, निर्माण प्रक्रिया में कुछ अनिवार्य कमियाँ (inherent imperfections) रह जाती हैं, जिसके कारण हर प्रतिरोधक का मान बिल्कुल वैसा नहीं हो सकता जो उस पर लिखा गया है। सहनशीलता यह सुनिश्चित करती है कि प्रतिरोधक का मान एक स्वीकार्य सीमा के भीतर रहे।

    ​2. सहनशीलता का सूत्र

    ​यदि R_{{nominal}} प्रतिरोधक का अंकित मान है, और T इसकी सहनशीलता प्रतिशत में है, तो वास्तविक प्रतिरोध मान R_{{actual}} की सीमा इस प्रकार होगी:

    R_{{nominal}} - (R_{{nominal}} × {T}{100})  R_{{actual}}  R_{{nominal}} + (R_{{nominal}} × {T}/{100})


    3. उदाहरण

    ​मान लीजिए आपके पास 100 Omega का एक प्रतिरोधक है जिसकी सहनशीलता pm 5 % है (यह सुनहरा बैंड दर्शाता है):

    1. अंकित मान = 100 Omega
    2. विचलन मान = 100 Omega का 5 % = 5 Omega
    3. वास्तविक सीमा (Actual Range):
      • न्यूनतम मान (Minimum Value): 100 Omega - 5 Omega = 95 Omega
      • अधिकतम मान (Maximum Value): 100 Omega + 5 Omega = 105 Omega

    ​इसका अर्थ है कि कारखाने से निकलने वाला यह प्रतिरोधक 95 Omega से 105 Omega के बीच कोई भी मान धारण कर सकता है, और इसे अभी भी 100 Omega, pm 5 % का प्रतिरोधक माना जाएगा।

    ​4. अनुप्रयोग (Application)

    • कम सहनशीलता ( pm 1 % या pm 0.5 %, जैसे भूरा या हरा बैंड) वाले प्रतिरोधक अधिक महंगे होते हैं, लेकिन उनका उपयोग उन सर्किटों में किया जाता है जहाँ सटीकता (Precision) बहुत महत्वपूर्ण होती है (जैसे मापने वाले उपकरण, फिल्टर, आदि)।
    • उच्च सहनशीलता ( pm 5 % या  pm 10 %, जैसे सुनहरा या चाँदी बैंड) वाले प्रतिरोधक सस्ते होते हैं, और उनका उपयोग उन सर्किटों में किया जाता है जहाँ मान में थोड़ा विचलन सहनीय होता है (जैसे LED लिमिटिंग, सामान्य पावर सर्किट)।






    करंट प्रवाहित होने पर प्रतिरोधक गर्म क्यों हो जाते हैं?

    यह घटना विद्युत धारा का तापीय प्रभाव (Heating Effect of Electric Current) कहलाती है, और इसके पीछे का विज्ञान बहुत ही सीधा है जिसे जूल का तापन नियम (Joule's Law of Heating) समझाता है।

    ​प्रतिरोधक (Resistor) के गर्म होने का मुख्य कारण इलेक्ट्रॉनों और प्रतिरोधक के परमाणुओं के बीच होने वाली टक्करें (Collisions between electrons and atoms) हैं।

    तापीय प्रभाव का कारण

    1. इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह: जब किसी प्रतिरोधक से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो इसका अर्थ है कि मुक्त इलेक्ट्रॉन (Free Electrons) एक दिशा में गति कर रहे हैं।
    2. प्रतिरोध (Resistance): प्रतिरोधक का पदार्थ (जैसे कार्बन या धातु मिश्र धातु) इलेक्ट्रॉनों के इस प्रवाह को रोकता है।
    3. टक्करें और ऊर्जा का स्थानांतरण: इलेक्ट्रॉन जब प्रतिरोधक के भीतर गति करते हैं, तो वे लगातार प्रतिरोधक पदार्थ के स्थिर परमाणुओं या आयनों से टकराते हैं।
    4. ऊष्मा का उत्पादन: इन टक्करों के कारण, इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) का एक हिस्सा परमाणुओं को स्थानांतरित हो जाता है। यह अतिरिक्त ऊर्जा परमाणुओं को उनकी माध्य स्थिति के चारों ओर तेजी से कंपन (Vibrate more vigorously) करने के लिए मजबूर करती है।
    5. तापमान में वृद्धि: किसी पदार्थ के परमाणुओं या आयनों की बढ़ी हुई कंपन ऊर्जा ही ऊष्मा (Heat) होती है। इस प्रकार, प्रतिरोधक की आंतरिक ऊर्जा बढ़ जाती है, जिससे उसका तापमान बढ़ जाता है और वह गर्म हो जाता है।

    जूल का तापन नियम (Joule's Law)

    ​यह नियम बताता है कि एक प्रतिरोधक में कितनी ऊष्मा उत्पन्न होगी।

    उत्पन्न ऊष्मा (H) की मात्रा तीन कारकों पर निर्भर करती है:

    H = I^2 R t

    जहाँ:

    • ​H = उत्पन्न ऊष्मा (जूल में)
    • ​I = प्रतिरोधक से प्रवाहित विद्युत धारा (एम्पीयर में)
    • ​R = प्रतिरोधक का प्रतिरोध (ओम में)
    • ​t = वह समय जिसके लिए धारा प्रवाहित हुई (सेकंड में)

    इस सूत्र से स्पष्ट है:

    1. धारा के वर्ग के सीधे आनुपातिक (H = I^2): यदि आप धारा को दोगुना (Double) करते हैं, तो उत्पन्न ऊष्मा चार गुना (Four Times) हो जाती है। यही कारण है कि उच्च धारा पर चीजें बहुत जल्दी गर्म होती हैं।
    2. प्रतिरोध के सीधे आनुपातिक (H = R): जितना अधिक प्रतिरोध होगा, टक्करें उतनी ही अधिक होंगी, और उतनी ही अधिक ऊष्मा उत्पन्न होगी।
    3. समय के सीधे आनुपातिक (H = t): जितनी देर तक धारा प्रवाहित होगी, उतनी ही अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती रहेगी।





    प्रतिरोध को कैसे मापा जा सकता है?

    प्रतिरोध (Resistance) मापने के लिए कई विधियाँ और उपकरण उपलब्ध हैं। सबसे सामान्य और सुविधाजनक विधि ओममीटर या मल्टीमीटर का उपयोग करना है।

    ​यहाँ प्रतिरोध को मापने के मुख्य तरीके दिए गए हैं:

    ​1. ओममीटर या मल्टीमीटर (Ohmmeter or Multimeter) का उपयोग

    ​यह सबसे सामान्य और व्यावहारिक तरीका है। अधिकांश डिजिटल मल्टीमीटर (Digital Multimeter) में प्रतिरोध मापने की सुविधा होती है, जिसे {Omega} (ओमेगा) प्रतीक से दर्शाया जाता है।

    प्रक्रिया:

    1. सर्किट से डिस्कनेक्ट करें: प्रतिरोधक को हमेशा सर्किट से डिस्कनेक्ट (Unplug) कर देना चाहिए। सर्किट में रहते हुए मापने पर आस-पास के घटकों का प्रतिरोध रीडिंग को प्रभावित कर सकता है। सुरक्षा के लिए, सुनिश्चित करें कि सर्किट में कोई पावर (बिजली) न हो।
    2. उपकरण सेट करें: मल्टीमीटर को ओम (Omega) मोड पर सेट करें।
    3. रेंज चुनें: यदि मल्टीमीटर में ऑटो-रेंजिंग (Auto-Ranging) की सुविधा नहीं है, तो आपको अनुमानित प्रतिरोध मान से उच्चतम रेंज का चयन करना होगा (जैसे, अगर प्रतिरोधक 1 k Omega का है, तो 2 k Omega या 20 k Omega की रेंज चुनें)।
    4. प्रोब जोड़ें: मल्टीमीटर के दोनों प्रोब्स (जाँच लीड) को प्रतिरोधक के दोनों सिरों (टर्मिनलों) से स्पर्श कराएँ।
    5. रीडिंग लें: मीटर स्क्रीन पर ओम (Omega), किलो-ओम (k Omega), या मेगा-ओम (M Omega) में प्रतिरोध का मान प्रदर्शित होगा।

    ​2. ओम के नियम (Ohm's Law) का उपयोग करके (सर्किट में)

    ​यदि आपको सर्किट में लगे किसी घटक का प्रतिरोध जानना है, तो आप ओम के नियम का उपयोग कर सकते हैं।

    ओम के नियम का सूत्र है:

    R = {V}/{I}

    जहाँ:

    • ​R = प्रतिरोध (Resistance)
    • ​V = प्रतिरोधक के सिरों पर विभवान्तर/वोल्टेज (Voltage)
    • ​I = प्रतिरोधक से प्रवाहित विद्युत धारा (Current)

    प्रक्रिया:

    1. वोल्टेज मापें (V): एक वोल्टमीटर का उपयोग करके प्रतिरोधक के सिरों पर वोल्टेज (V) को समानांतर (Parallel) में मापें।
    2. धारा मापें (I): एक एमीटर का उपयोग करके उस प्रतिरोधक से प्रवाहित होने वाली धारा (I) को श्रृंखला (Series) में मापें।
    3. गणना करें: R = V/I सूत्र का उपयोग करके प्रतिरोध की गणना करें।

    ​3. व्हीटस्टोन ब्रिज (Wheatstone Bridge) विधि

    ​उच्च परिशुद्धता (High Precision) वाले मापन के लिए, खासकर प्रयोगशालाओं में, व्हीटस्टोन ब्रिज का उपयोग किया जाता है। यह एक ब्रिज सर्किट होता है जिसमें एक अज्ञात प्रतिरोध को तीन ज्ञात प्रतिरोधों के साथ संतुलित (Balance) किया जाता है।

    ​जब ब्रिज संतुलित होता है (गैल्वेनोमीटर में कोई धारा प्रवाहित नहीं होती), तो अज्ञात प्रतिरोध (R_x) की गणना इस सूत्र से की जाती है:


    R = {V}/{I}


    जहाँ:

    • ​R = प्रतिरोध (Resistance)
    • ​V = प्रतिरोधक के सिरों पर विभवान्तर/वोल्टेज (Voltage)
    • ​I = प्रतिरोधक से प्रवाहित विद्युत धारा (Current)

    प्रक्रिया:

    1. वोल्टेज मापें (V): एक वोल्टमीटर का उपयोग करके प्रतिरोधक के सिरों पर वोल्टेज (V) को समानांतर (Parallel) में मापें।
    2. धारा मापें (I): एक एमीटर का उपयोग करके उस प्रतिरोधक से प्रवाहित होने वाली धारा (I) को श्रृंखला (Series) में मापें।
    3. गणना करें: R = V/I सूत्र का उपयोग करके प्रतिरोध की गणना करें।

    ​3. व्हीटस्टोन ब्रिज (Wheatstone Bridge) विधि

    ​उच्च परिशुद्धता (High Precision) वाले मापन के लिए, खासकर प्रयोगशालाओं में, व्हीटस्टोन ब्रिज का उपयोग किया जाता है। यह एक ब्रिज सर्किट होता है जिसमें एक अज्ञात प्रतिरोध को तीन ज्ञात प्रतिरोधों के साथ संतुलित (Balance) किया जाता है।

    ​जब ब्रिज संतुलित होता है (गैल्वेनोमीटर में कोई धारा प्रवाहित नहीं होती), तो अज्ञात प्रतिरोध (R_x) की गणना इस सूत्र से की जाती है:

    R_x = R_3 × {R_2}{R_1}


    यह विधि अत्यंत सटीक रीडिंग देती है, खासकर मध्य-श्रेणी के प्रतिरोध मानों के लिए।

    सारांश: आज के समय में, अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक कार्यों के लिए मल्टीमीटर सबसे आसान और विश्वसनीय उपकरण है।





    व्हीटस्टोन ब्रिज क्या है?

    व्हीटस्टोन ब्रिज (Wheatstone Bridge), जिसे व्हीटस्टोन सेतु भी कहा जाता है, एक विशिष्ट विद्युत परिपथ (Special Electrical Circuit) व्यवस्था है जिसका उपयोग उच्च परिशुद्धता (High Precision) के साथ किसी अज्ञात प्रतिरोध (Unknown Resistance) का मान ज्ञात करने के लिए किया जाता है।

    ​इसका आविष्कार सैमुएल हण्टर क्रिस्टी (Samuel Hunter Christie) ने 1833 में किया था, लेकिन इसे चार्ल्स व्हीटस्टोन (Charles Wheatstone) ने उन्नत और लोकप्रिय बनाया।

    व्हीटस्टोन सेतु की संरचना

    ​व्हीटस्टोन ब्रिज चार प्रतिरोधों की एक चतुर्भुज (Quadrilateral) के आकार की व्यवस्था होती है।

    ​इस परिपथ में:

    1. चार भुजाएँ (Four Arms): इसमें चार प्रतिरोध P, Q, R, और S (या R_1, R_2, R_3, R_x) होते हैं, जो चतुर्भुज की चार भुजाओं में जुड़े होते हैं।
      • ​इनमें से तीन प्रतिरोध (P, Q, R) ज्ञात मान वाले होते हैं, जिनमें से एक को परिवर्तित किया जा सकता है।
      • ​चौथा प्रतिरोध (S या R_x) अज्ञात होता है, जिसका मान ज्ञात करना होता है।
    2. गैल्वेनोमीटर (Galvanometer - G): चतुर्भुज के दो विपरीत कोनों (बिंदुओं) के बीच एक गैल्वेनोमीटर (धारामापी) जोड़ा जाता है।
    3. सेल/स्रोत: अन्य दो विपरीत कोनों के बीच एक सेल या वोल्टेज स्रोत (Power Source) जोड़ा जाता है।

    व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धांत (Principle)

    ​व्हीटस्टोन सेतु शून्य विक्षेप विधि (Null Deflection Method) या संतुलन अवस्था (Balanced Condition) के सिद्धांत पर कार्य करता है।

    ​यह सिद्धांत बताता है कि जब परिपथ संतुलित होता है, तो गैल्वेनोमीटर से होकर कोई विद्युत धारा (Current) प्रवाहित नहीं होती है

    संतुलन की शर्त (Condition for Balance):

    ​जब गैल्वेनोमीटर में विक्षेप (Deflection) शून्य होता है, तो दो आसन्न भुजाओं (Adjacent Arms) के प्रतिरोधों का अनुपात शेष दो आसन्न भुजाओं के प्रतिरोधों के अनुपात के बराबर होता है:


    {P}/{Q} = {R}/{S}

    अज्ञात प्रतिरोध का मान ज्ञात करना:

    ​यदि S अज्ञात प्रतिरोध (R_x) है, तो संतुलन की अवस्था में इसका मान निम्न सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है:


    S = R × {Q}/{P}







    एमीटर-वोल्टमीटर विधि की सीमाएँ क्या हैं?

    एमीटर-वोल्टमीटर विधि (Ammeter-Voltmeter Method), जिसे ओम के नियम की विधि भी कहा जाता है, प्रतिरोध (Resistance) को मापने का एक सरल तरीका है। यद्यपि यह सीधी और सुलभ है, इसकी कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ (Limitations) हैं जिनके कारण उच्च सटीकता (High Accuracy) वाले मापन के लिए इसका उपयोग नहीं किया जाता है।

    ​यहां इस विधि की मुख्य सीमाएं दी गई हैं:

    एमीटर-वोल्टमीटर विधि की सीमाएँ

    ​1. उपकरणों की अपूर्णता (Imperfection of Instruments)

    ​यह विधि मानती है कि एमीटर और वोल्टमीटर दोनों आदर्श (Ideal) हैं, जो वास्तविक जीवन में नहीं होता:

    • एमीटर का प्रतिरोध: एक आदर्श एमीटर का प्रतिरोध शून्य होना चाहिए, लेकिन वास्तविक एमीटर में कुछ आंतरिक प्रतिरोध (R_A) होता है।
    • वोल्टमीटर का प्रतिरोध: एक आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध अनंत होना चाहिए, लेकिन वास्तविक वोल्टमीटर का प्रतिरोध (R_V) सीमित होता है।

    ​ये अपूर्णताएँ सर्किट से अतिरिक्त धारा खींचती हैं या प्रतिरोधक पर वोल्टेज ड्रॉप को प्रभावित करती हैं, जिससे गणना किए गए प्रतिरोध मान में त्रुटि (Error) आती है।

    ​2. मापन व्यवस्था का प्रभाव (Effect of Connection Arrangement)

    ​प्रतिरोधक के साथ एमीटर और वोल्टमीटर को जोड़ने के दो तरीके हैं, और दोनों में से कोई भी पूर्णतः सटीक परिणाम नहीं देता:

    (अ) एमीटर सीरीज में (Ammeter in Series) - उच्च प्रतिरोध (High Resistance) के लिए बेहतर

    • त्रुटि का कारण: वोल्टमीटर कुछ अतिरिक्त धारा खींचता है जो प्रतिरोधक से होकर नहीं गुजरती।
    • परिणामी त्रुटि: गणना किया गया प्रतिरोध मान (R_{{calculated}} = V/I) वास्तविक मान से कम आता है।

    (ब) वोल्टमीटर पैरलल में (Voltmeter in Parallel) - निम्न प्रतिरोध (Low Resistance) के लिए बेहतर

    • त्रुटि का कारण: एमीटर पूरे सर्किट की धारा को मापता है, जिसमें प्रतिरोधक से होकर गुजरने वाली धारा के साथ-साथ वोल्टमीटर से होकर गुजरने वाली धारा भी शामिल होती है।
    • परिणामी त्रुटि: एमीटर का आंतरिक प्रतिरोध (R_A) कुल प्रतिरोध में जुड़ जाता है, इसलिए गणना किया गया प्रतिरोध मान (R_{{calculated}} = V/I) वास्तविक मान से अधिक आता है।

    ​3. बिजली की खपत (Power Dissipation)

    ​जब हम मापन करते हैं, तो प्रतिरोधक गर्म हो जाता है (जैसा कि आपने पहले पूछा था)।

    • ऊष्मा का प्रभाव: उत्पन्न ऊष्मा प्रतिरोधक के तापमान को बढ़ाती है, और अधिकांश पदार्थों का प्रतिरोध तापमान के साथ बदलता है (Temperature Coefficient of Resistance)।
    • अस्थिर रीडिंग: तापमान बढ़ने से प्रतिरोध का मान भी बदल जाता है, जिससे हमें एक अस्थिर (Unstable) और त्रुटिपूर्ण रीडिंग मिलती है।

    ​4. कम सटीकता (Lower Accuracy)

    ​व्हीटस्टोन ब्रिज या ओममीटर जैसे उपकरणों की तुलना में, एमीटर-वोल्टमीटर विधि कम सटीक (Less Precise) है क्योंकि यह सीधे दो मापे गए मानों (V और I) के अनुपात पर निर्भर करती है, और इन दोनों मापों में व्यक्तिगत त्रुटियां अंतिम परिणाम में जुड़ जाती हैं।

    इस कारण से, 

    जहां बहुत उच्च सटीकता की आवश्यकता होती है, जैसे कि प्रयोगशाला मापन, वहां व्हीटस्टोन ब्रिज विधि को प्राथमिकता दी जाती है।






    प्रतिरोधक सामग्री के विभिन्न प्रकार क्या हैं?

    प्रतिरोधक (Resistor) बनाने के लिए कई अलग-अलग प्रकार की सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें उनकी निर्माण विधि, सामग्री के प्रकार और अंतिम अनुप्रयोग (Application) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

    ​यहां प्रतिरोधक सामग्री के विभिन्न मुख्य प्रकार दिए गए हैं:

    ​1. कार्बन आधारित प्रतिरोधक (Carbon-Based Resistors)

    ​ये सबसे सामान्य और सस्ते प्रकार के प्रतिरोधक हैं।

    (a) कार्बन कंपोजिशन प्रतिरोधक (Carbon Composition Resistors - CCR)

    • सामग्री: कार्बन पाउडर और इन्सुलेटिंग भराव (Insulating Filler) जैसे सिरेमिक पाउडर का मिश्रण। इस मिश्रण को एक ट्यूब में ढाला जाता है और लीड (Wires) जोड़ी जाती हैं।
    • विशेषताएँ: ये उच्च ऊर्जा स्पंदन (High Energy Pulses) को सहन कर सकते हैं। इनकी सहनशीलता (Tolerance) अक्सर अधिक ( pm 5 % से pm 20 %) होती है।
    • उपयोग: पुराने या कम सटीकता वाले इलेक्ट्रॉनिक्स में।

    (b) कार्बन फिल्म प्रतिरोधक (Carbon Film Resistors)

    • सामग्री: एक सिरेमिक कोर पर पतली कार्बन फिल्म को जमा (Deposit) किया जाता है। प्रतिरोध मान फिल्म की मोटाई और सर्पिल कट (Spiral Cut) द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
    • विशेषताएँ: ये कार्बन कंपोजिशन की तुलना में अधिक सटीक (सहनशीलता pm 1 % या pm 2 %) और कम शोर वाले होते हैं।
    • उपयोग: सामान्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जहां सटीकता मध्यम स्तर की चाहिए।

    ​2. धातु फिल्म आधारित प्रतिरोधक (Metal Film-Based Resistors)

    ​ये कार्बन फिल्म प्रतिरोधकों का उन्नत संस्करण हैं और उच्च प्रदर्शन के लिए उपयोग किए जाते हैं।

    (a) धातु फिल्म प्रतिरोधक (Metal Film Resistors)

    • सामग्री: एक सिरेमिक रॉड पर निकल-क्रोमियम (Ni-Cr) जैसी धातु मिश्र धातु की एक बहुत पतली फिल्म जमा की जाती है।
    • विशेषताएँ: बेहतरीन सटीकता (सहनशीलता \pm 0.1\% तक), कम तापमान गुणांक (Low Temperature Coefficient), और बहुत कम आंतरिक शोर।
    • उपयोग: सटीक मापन उपकरण, ऑडियो उपकरण, उच्च-आवृत्ति (High-Frequency) अनुप्रयोग।

    (b) धातु ऑक्साइड फिल्म प्रतिरोधक (Metal Oxide Film Resistors)

    • सामग्री: धातु ऑक्साइड (जैसे टिन ऑक्साइड) की फिल्म का उपयोग किया जाता है।
    • विशेषताएँ: उच्च तापमान और अधिक पावर रेटिंग (Wattage) को सहन कर सकते हैं, तथा कार्बन फिल्म प्रतिरोधकों की तुलना में अधिक स्थिर होते हैं।

    ​3. तार लपेटे हुए प्रतिरोधक (Wirewound Resistors)

    ​ये प्रतिरोधक उच्च शक्ति (High Power) अनुप्रयोगों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

    • सामग्री: मैंगनीन (Manganin) या नाइक्रोम (Nichrome) जैसी उच्च प्रतिरोधकता वाली मिश्र धातु के तार को एक इन्सुलेटिंग कोर (सिरेमिक या फाइबरग्लास) पर लपेटा जाता है।
    • विशेषताएँ: बहुत उच्च पावर रेटिंग (कुछ वाट से लेकर सैकड़ों वाट तक), उत्कृष्ट स्थिरता और सटीकता। हालाँकि, उच्च आवृत्तियों पर ये प्रेरक (Inductive) व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
    • उपयोग: पावर सप्लाई, मोटर कंट्रोल, हीटिंग तत्व, और जहाँ बहुत अधिक धारा को नियंत्रित करना हो।

    ​4. विशेष प्रतिरोधक (Specialized Resistors)

    ​ये विशिष्ट कार्यों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं:

    • सरमेट/पतली फिल्म प्रतिरोधक (Cermet/Thin Film Resistors): ये सिरेमिक और धातु के मिश्रण (Cermet) का उपयोग करके बनाए जाते हैं, जो उच्च तापमान पर स्थिरता प्रदान करते हैं।
    • सतह माउंट डिवाइस (Surface Mount Device - SMD): ये छोटे, चिप के आकार के प्रतिरोधक हैं जो पतली फिल्म या मोटी फिल्म तकनीकों का उपयोग करके बनाए जाते हैं। ये आधुनिक पीसीबी (PCB) में सबसे अधिक उपयोग किए जाते हैं।

    निष्कर्ष:

    ​प्रतिरोधक सामग्री का चयन मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि सर्किट को कितनी सटीकता, कितनी बिजली क्षमता (Wattage), और कितना तापमान स्थिरता चाहिए।







    इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में प्रतिरोधकों की क्या भूमिका होती है?

    इलेक्ट्रॉनिक परिपथों (Electronic Circuits) में प्रतिरोधक (Resistors) सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण घटक होते हैं। इनकी भूमिका कई मायनों में सर्किट के प्रवाह को नियंत्रित करने की होती है।

    ​यहां इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में प्रतिरोधकों की मुख्य भूमिकाएँ दी गई हैं:

    ​1. धारा सीमित करना (Current Limiting)

    ​यह प्रतिरोधक का सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक कार्य है।

    • कार्य: प्रतिरोधक, किसी विशेष घटक (जैसे LED या ट्रांजिस्टर) से होकर गुजरने वाली विद्युत धारा (Current) की मात्रा को सीमित करते हैं।
    • महत्व: यदि किसी संवेदनशील घटक को उसकी अधिकतम सीमा से अधिक धारा मिलती है, तो वह गर्म होकर स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है। ओम के नियम (I = V/R) का उपयोग करके, हम यह सुनिश्चित करते हैं कि घटक को सुरक्षित धारा मिले।
    • उदाहरण: LED को सीधे बैटरी से जोड़ने पर वह तुरंत जल जाएगी। प्रतिरोधक को श्रृंखला (Series) में जोड़ने से धारा सीमित होती है और LED सुरक्षित रूप से जलती है।

    ​2. वोल्टेज विभाजन (Voltage Division)

    ​प्रतिरोधक का उपयोग सर्किट में वोल्टेज को विभाजित (Divide) करने के लिए किया जा सकता है।

    • कार्य: दो या दो से अधिक प्रतिरोधकों को श्रृंखला में जोड़कर, कुल इनपुट वोल्टेज को वांछित अनुपात में कम किया जा सकता है, जिससे आउटपुट पर एक छोटा, नियंत्रित वोल्टेज प्राप्त होता है।
    • महत्व: यह तब उपयोगी होता है जब सर्किट के एक भाग को स्रोत वोल्टेज की तुलना में कम वोल्टेज की आवश्यकता होती है।
    • सर्किट: इसे वोल्टेज डिवाइडर सर्किट कहा जाता है।

    ​3. सिग्नल स्तर का समायोजन (Signal Level Adjustment)

    ​प्रतिरोधकों का उपयोग ऑडियो, रेडियो और अन्य सिग्नल की शक्ति (Amplitude) को घटाने या बढ़ाने के लिए भी किया जाता है।

    • कार्य: ऑडियो एम्पलीफायर और नियंत्रण सर्किट में, प्रतिरोधक यह सुनिश्चित करते हैं कि सिग्नल घटक की इनपुट सीमा से अधिक न हो या आवश्यक स्तर तक बढ़ाया जा सके।
    • उदाहरण: वॉल्यूम नियंत्रण नॉब (Volume Control Knob) वास्तव में एक परिवर्तनीय प्रतिरोधक (Potentiometer) होता है, जो आउटपुट सिग्नल के स्तर को नियंत्रित करता है।

    ​4. समय-आधारित सर्किट (Timing Circuits)

    ​संधारित्रों (Capacitors) के साथ मिलकर, प्रतिरोधक सर्किट को समय विलंब (Time Delay) या आवृत्ति-चयनात्मकता (Frequency Selectivity) प्रदान करते हैं।

    • सर्किट: RC सर्किट (Resistor-Capacitor Circuit) का उपयोग टाइमर, ऑसिलेटर और फिल्टर सर्किट (Filters) में किया जाता है।
    • कार्य: प्रतिरोधक यह नियंत्रित करता है कि संधारित्र कितनी तेजी से चार्ज या डिस्चार्ज होगा, जिससे सर्किट के लिए एक समय स्थिरांक (Time Constant) निर्धारित होता है।

    ​5. पुल-अप और पुल-डाउन प्रतिरोधक (Pull-up and Pull-down Resistors)

    ​डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स (Digital Electronics) में, इनका महत्वपूर्ण उपयोग है:

    • कार्य: ये डिजिटल इनपुट पिन के वोल्टेज को एक निश्चित, ज्ञात स्तर (जैसे 0V या सप्लाई वोल्टेज) पर खींचकर रखते हैं जब उस पिन को कहीं और से सक्रिय रूप से कनेक्ट नहीं किया जाता है।
    • महत्व: यह इनपुट पिन को "फ्लोटिंग" होने से रोकता है, जिससे अनिश्चित या गलत रीडिंग (False Readings) को रोका जा सके।

    संक्षेप में, 

    प्रतिरोधक इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में संरक्षण, नियंत्रण, समायोजन और समय-निर्धारण के लिए आवश्यक हैं, जिससे सर्किट सही और सुरक्षित तरीके से काम कर सके।






    यदि 10V की बैटरी 2A धारा प्रवाहित करती है, तो प्रतिरोध कितना होगा?

    यह प्रश्न ओम के नियम (Ohm's Law) पर आधारित एक सीधा और सरल गणना है।

    ​ओम का नियम वोल्टेज (V), धारा (I), और प्रतिरोध (R) के बीच संबंध स्थापित करता है।

    आवश्यक सूत्र

    ​ओम के नियम के अनुसार:

    नमस्ते! यह प्रश्न ओम के नियम (Ohm's Law) पर आधारित एक सीधा और सरल गणना है।

    ​ओम का नियम वोल्टेज (V), धारा (I), और प्रतिरोध (R) के बीच संबंध स्थापित करता है।

    आवश्यक सूत्र

    ​ओम के नियम के अनुसार:

    V = I × R

    चूँकि आपको प्रतिरोध (R) ज्ञात करना है, इसलिए सूत्र को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाएगा:

    R = {V}/{I}

    जहाँ:

    • ​R = प्रतिरोध (Ohms, Omega)
    • ​V = वोल्टेज (Volts, V)
    • ​I = धारा (Amperes, A)

    गणना

    ​आपके दिए गए मान:

    • ​वोल्टेज (V) = 10 V
    • ​धारा (I) = 2 A

    ​सूत्र में मान रखने पर:

    R = {10 V}/{2 A}

    R = 5 Omega

    उत्तर

    ​यदि 10 V की बैटरी 2 A धारा प्रवाहित करती है, तो सर्किट का कुल प्रतिरोध 5 Omega (ओम) होगा।

    ​क्या आप प्रतिरोध, धारा और वोल्टेज के संबंध को और अधिक स्पष्ट करने के लिए कोई आरेख देखना चाहेंगे?


    https://dkrajwar.blogspot.com/2026/01/what-is-resistance.html


    वायर वाउंड रेसिस्टर क्या होता है?

    वायर वाउंड रेसिस्टर (Wirewound Resistor) एक विशेष प्रकार का प्रतिरोधक होता है जिसे मुख्य रूप से उच्च शक्ति (High Power) वाले अनुप्रयोगों के लिए डिज़ाइन किया गया है।

    ​यह उन जगहों पर इस्तेमाल होता है जहाँ सामान्य कार्बन या मेटल फिल्म रेसिस्टर ज़्यादा गर्म होकर खराब हो सकते हैं।

    वायर वाउंड रेसिस्टर क्या है?

    ​वायर वाउंड रेसिस्टर एक प्रतिरोधक होता है जिसका प्रतिरोध तत्व (Resistive Element) एक उच्च प्रतिरोधकता वाली धातु के तार को एक अचालक (Insulating) और ताप-प्रतिरोधी (Heat-Resistant) कोर के चारों ओर लपेट कर बनाया जाता है।

    ​1. मुख्य सामग्री और निर्माण

    घटक

    सामग्री

    भूमिका

    कोर (Core)

    सिरेमिक (Ceramic) या फाइबरग्लास

    यह तार को सहारा देता है और ऊष्मा (Heat) को प्रभावी ढंग से बाहर निकालता है।

    प्रतिरोधक तार (Resistive Wire)

    नाइक्रोम (Nichrome), मैंगनीन (Manganin) या कॉन्स्टैन्टन

    इन मिश्र धातुओं में उच्च प्रतिरोधकता होती है और वे तापमान बढ़ने पर स्थिर रहते हैं।

    कोटिंग (Coating)

    सिलिकॉन वार्निश या ग्लास एनैमल

    यह तार को नमी, धूल और क्षति से बचाता है और ऊष्मा को फैलाने में मदद करता है।


    2. प्रमुख विशेषताएँ

    विशेषता

    विवरण

    कारण

    उच्च पावर रेटिंग

    ये 1 वाट से लेकर 1000 वाट तक या उससे अधिक की शक्ति को संभाल सकते हैं।

    धातु के तार और सिरेमिक कोर के कारण, जो ऊष्मा को कुशलता से संभालते हैं।

    बेहतरीन सटीकता

    अन्य प्रकारों की तुलना में तार के व्यास को बहुत सटीकता से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे इनकी सहनशीलता अक्सर \pm 1\% या उससे कम होती है।

    तार का सटीक गेज (Gauge) उपयोग किया जाता है।

    निम्न शोर

    इलेक्ट्रॉनिक शोर (Noise) का स्तर बहुत कम होता है।

    प्रतिरोध तार शुद्ध धातु का होता है।

    प्रेरक प्रभाव (Inductive Effect)

    यह इनकी सबसे बड़ी सीमा है। तार को कॉइल (Coil) के रूप में लपेटने के कारण, यह एक प्रेरक (Inductor) की तरह व्यवहार करता है।

    कॉइल में विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र बनता है।


    3. अनुप्रयोग (Applications)

    • पावर सप्लाई: वोल्टेज को नियंत्रित करने और अनावश्यक बिजली को ऊष्मा के रूप में नष्ट करने के लिए।
    • मोटर कंट्रोल: ब्रेक लगाना (Braking) या गति को नियंत्रित करना।
    • हीटिंग एलीमेंट: उच्च-शक्ति वाले हीटर (जैसे टोस्टर या ओवन) में, नाइक्रोम तार हीटिंग एलीमेंट के रूप में कार्य करता है।
    • ट्रांसड्यूसर (Transducer): स्ट्रेन गेज (Strain Gauges) में, जहाँ सटीकता और स्थिरता आवश्यक है।

    संक्षेप में, 

    वायर वाउंड रेसिस्टर जहाँ ताकत की जरूरत होती है (उच्च धारा और वोल्टेज) वहाँ सबसे उपयुक्त होते हैं, लेकिन उच्च आवृत्ति वाले सर्किटों में उनके प्रेरक प्रभाव के कारण उनसे बचा जाता है।






    कार्बन फिल्म प्रतिरोधक क्या है?

    कार्बन फिल्म प्रतिरोधक (Carbon Film Resistor - CFR), जिसे अक्सर संक्षिप्त रूप में CFR कहा जाता है, प्रतिरोधकों का एक बहुत ही सामान्य और व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला प्रकार है।

    ​यह कार्बन कंपोजिशन प्रतिरोधकों से अधिक आधुनिक और सटीक होते हैं, लेकिन मेटल फिल्म प्रतिरोधकों से कम सटीक होते हैं।

    कार्बन फिल्म प्रतिरोधक की संरचना

    ​कार्बन फिल्म प्रतिरोधक का निर्माण एक विशिष्ट प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है:

    1. कोर (Core): इसमें एक उच्च शुद्धता वाली सिरेमिक रॉड (Ceramic Rod) या कोर होती है। यह कोर अचालक (Insulator) होता है और प्रतिरोधक को यांत्रिक शक्ति (Mechanical Strength) प्रदान करता है।
    2. फिल्म (Film): कोर के चारों ओर बहुत पतली कार्बन की फिल्म जमा (Deposit) की जाती है। यह कार्बन फिल्म ही प्रतिरोधक तत्व (Resistive Element) के रूप में कार्य करती है।
    3. सर्पिल कट (Spiral Cut): वांछित प्रतिरोध मान प्राप्त करने के लिए, फिल्म में एक लेजर या अपघर्षक जेट (Abrasive Jet) का उपयोग करके एक सर्पिल कट बनाया जाता है। यह सर्पिल कट वास्तव में धारा को एक लंबा और पतला रास्ता प्रदान करता है, जिससे प्रतिरोध का मान बढ़ता है। कट की गहराई और पिच (Pitch) को समायोजित करके प्रतिरोध मान को सटीक रूप से नियंत्रित किया जाता है।
    4. लीड्स और कोटिंग: फिल्म के सिरों पर धातु की टोपी लगाई जाती है और लीड तार (Lead Wires) जोड़े जाते हैं। अंत में, नमी और क्षति से बचाने के लिए पूरे घटक को एक एपॉक्सी या वार्निश आवरण (Coating) से सील कर दिया जाता है।

    कार्बन फिल्म प्रतिरोधक की मुख्य विशेषताएँ

    विशेषता

    विवरण

    लागत (Cost)

    कम। मेटल फिल्म प्रतिरोधकों की तुलना में सस्ते।

    सहनशीलता (Tolerance)

    मध्यम। आमतौर पर pm 5 % या pm 2 %।

    शोर (Noise)

    कम। कार्बन कंपोजिशन की तुलना में काफी कम शोर उत्पन्न करते हैं।

    स्थिरता (Stability)

    मध्यम। धातु फिल्म प्रतिरोधकों की तुलना में तापमान, नमी और उम्र बढ़ने के साथ प्रतिरोध मान में थोड़ा अधिक परिवर्तन हो सकता है।

    पावर रेटिंग

    आमतौर पर 1 / 8 W से 1 W तक की निम्न से मध्यम पावर रेटिंग के लिए उपलब्ध होते हैं।



    अनुप्रयोग (Applications)

    ​कार्बन फिल्म प्रतिरोधक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में सबसे अधिक उपयोग किए जाते हैं क्योंकि वे अच्छे प्रदर्शन और कम लागत का संतुलन प्रदान करते हैं।

    • सामान्य इलेक्ट्रॉनिक्स: उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स (जैसे टीवी, रेडियो, खिलौने) के अधिकांश सर्किट में।
    • धारा सीमित करना: LED को सुरक्षित रखने और अन्य घटकों की धारा को नियंत्रित करने के लिए।
    • पुल-अप/पुल-डाउन: डिजिटल सर्किटरी में।

    ​यह प्रतिरोधक उन अनुप्रयोगों के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प है जहाँ उच्च सटीकता (जैसे 0.1 %) की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन कार्बन कंपोजिशन की तुलना में बेहतर स्थिरता वांछित होती है।







    मेटल ऑक्साइड रेसिस्टर क्या होता है?

    मेटल ऑक्साइड फिल्म रेसिस्टर (Metal Oxide Film Resistor - MOFR) भी प्रतिरोधकों का एक महत्वपूर्ण प्रकार है, जिसे अक्सर मेटल फिल्म प्रतिरोधक के एक विशिष्ट उप-प्रकार के रूप में देखा जाता है।

    ​यह उच्च विश्वसनीयता, स्थिरता और विशेष रूप से उच्च तापमान पर बेहतर प्रदर्शन के लिए जाना जाता है।

    मेटल ऑक्साइड रेसिस्टर की संरचना

    ​मेटल ऑक्साइड रेसिस्टर का निर्माण कार्बन फिल्म प्रतिरोधकों के समान होता है, लेकिन यहाँ प्रतिरोधक सामग्री बदल जाती है:

    1. कोर (Core): सिरेमिक रॉड का उपयोग किया जाता है।
    2. फिल्म (Film): प्रतिरोधक फिल्म एक धातु ऑक्साइड (Metal Oxide) यौगिक, जैसे टिन ऑक्साइड ({SnO}_2) या एंटिमनी के साथ टिन ऑक्साइड का मिश्रण होता है। इस ऑक्साइड को उच्च तापमान पर कोर पर रासायनिक रूप से जमा किया जाता है।
    3. प्रतिरोधक तत्व: यह मेटल ऑक्साइड फिल्म प्रतिरोधक तत्व के रूप में कार्य करती है, जिसे सर्पिल कट (Spiral Cut) द्वारा वांछित मान के अनुसार समायोजित किया जाता है।
    4. कोटिंग: अंतिम सुरक्षा के लिए सिरेमिक या एपॉक्सी आवरण दिया जाता है।

    मेटल ऑक्साइड रेसिस्टर की मुख्य विशेषताएँ

    ​मेटल ऑक्साइड प्रतिरोधक कई मायनों में सामान्य मेटल फिल्म प्रतिरोधकों से बेहतर हैं, खासकर गर्मी और विद्युत भार (Electrical Load) को संभालने में:

    विशेषता

    विवरण

    मेटल फिल्म से तुलना

    तापमान गुणांक

    बहुत कम तापमान गुणांक (Low TCR)। तापमान बदलने पर भी प्रतिरोध मान बहुत स्थिर रहता है।

    मेटल फिल्म के समान ही स्थिर।

    उच्च तापमान पर स्थिरता

    ये {350^circ C} तक के उच्च तापमान पर भी स्थिर रूप से काम कर सकते हैं।

    मेटल फिल्म से बेहतर।

    पल्स लोड क्षमता

    ये क्षणिक उच्च वोल्टेज या शक्ति स्पंदन (Transient High Voltage or Power Pulses) को बेहतर ढंग से सहन कर सकते हैं।

    उच्च क्षमता।

    शोर

    इलेक्ट्रॉनिक शोर (Noise) का स्तर बहुत कम होता है।

    मेटल फिल्म के समान।

    सहनशीलता

    आमतौर पर pm 1 % से pm 5 % तक।

    मेटल फिल्म (pm 0.1 % तक) से कम सटीक।


    अनुप्रयोग (Applications)

    ​अपनी उच्च तापमान स्थिरता और पल्स क्षमता के कारण, मेटल ऑक्साइड प्रतिरोधक विशिष्ट और कठिन अनुप्रयोगों के लिए एक लोकप्रिय विकल्प हैं:

    • पावर सप्लाई: जहाँ उच्च वोल्टेज या क्षणिक भार (Transient Loads) को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है।
    • उच्च आवृत्ति सर्किट: कम प्रेरकत्व (Low Inductance) के कारण।
    • हीटिंग सर्किट: जहाँ आसपास का तापमान अधिक हो सकता है।
    • सर्किट संरक्षण: सर्ज प्रोटेक्शन (Surge Protection) सर्किट में।

    संक्षेप में, 

    मेटल ऑक्साइड रेसिस्टर वे होते हैं जिन्हें तापमान या वोल्टेज की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में उच्च विश्वसनीयता और स्थिरता की आवश्यकता होती है।








    चालकों के लिए प्रतिरोध और तापमान के बीच क्या संबंध है?

    चालकों (Conductors) के लिए प्रतिरोध (Resistance) और तापमान (Temperature) के बीच एक सीधा और महत्वपूर्ण संबंध होता है।

    ​सामान्य नियम यह है कि:

    जब एक चालक (जैसे तांबा, एल्युमिनियम) का तापमान बढ़ता है, तो उसका विद्युत प्रतिरोध भी बढ़ता है।


    ​इसे सकारात्मक तापमान गुणांक (Positive Temperature Coefficient - PTC) कहा जाता है।

    संबंध का कारण (Microscopic Reason)

    ​यह संबंध मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉन और परमाणु की गति के कारण होता है:

    1. इलेक्ट्रॉन का प्रवाह: चालकों में विद्युत धारा मुक्त इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के कारण होती है।
    2. परमाणुओं का कंपन: चालक में परमाणु या आयन एक निश्चित जालक (Lattice) संरचना में स्थिर रहते हैं।
    3. तापमान में वृद्धि: जब चालक का तापमान बढ़ता है, तो परमाणु अपनी माध्य स्थिति के चारों ओर अधिक जोर से और तेज़ी से कंपन (Vibrate More Vigorously) करने लगते हैं।
    4. टक्करों में वृद्धि: ये अनियमित कंपन मुक्त इलेक्ट्रॉनों के रास्ते में अधिक बाधा (Obstruction) उत्पन्न करते हैं। इलेक्ट्रॉन के परमाणुओं से टकराने की संभावना बढ़ जाती है।
    5. प्रतिरोध में वृद्धि: इन बढ़ी हुई टक्करों के कारण, इलेक्ट्रॉनों का मुक्त प्रवाह बाधित होता है, जिसके परिणामस्वरूप चालक का प्रतिरोध बढ़ जाता है

    गणितीय संबंध

    ​प्रतिरोध और तापमान के बीच इस संबंध को एक सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है:

    R_T = R_0 [1 + alpha (T - T_0)]

    जहाँ:

    • ​R_T = तापमान T पर प्रतिरोध।
    • ​R_0 = संदर्भ तापमान T_0 पर प्रतिरोध (अक्सर 20^circ C या 0^circ C लिया जाता है)।
    • ​alpha = प्रतिरोध का तापमान गुणांक (Temperature Coefficient of Resistance)। यह दर्शाता है कि तापमान में प्रति डिग्री परिवर्तन के साथ प्रतिरोध कितनी तेज़ी से बदलता है।
      • चालकों के लिए alpha का मान धनात्मक (Positive) होता है।
    • ​(T - T_0) = तापमान में परिवर्तन।

    इसका महत्व

    ​इंजीनियरिंग और सर्किट डिजाइन में यह संबंध बहुत महत्वपूर्ण है:

    1. बिजली की हानि: पावर लाइनों में, उच्च तापमान के कारण प्रतिरोध बढ़ता है, जिससे I^2 R के अनुसार बिजली की हानि (Power Loss) बढ़ जाती है।
    2. मापन उपकरण: प्रतिरोध थर्मामीटर (RTDs - Resistance Temperature Detectors) इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। तापमान को मापने के लिए धातु के तार के प्रतिरोध में परिवर्तन का उपयोग किया जाता है।
    3. सर्किट स्थिरता: सटीक इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में, घटकों को गर्म होने से बचाना आवश्यक है ताकि उनका प्रतिरोध मान स्थिर रहे और सर्किट सही ढंग से काम करे।

    अपवाद:

    • अर्धचालक (Semiconductors): जैसे सिलिकॉन और जर्मेनियम, में प्रतिरोध का नकारात्मक तापमान गुणांक (Negative Temperature Coefficient - NTC) होता है। यानी, तापमान बढ़ने पर उनका प्रतिरोध कम होता है।
    • कुछ मिश्र धातुएँ (Alloys): जैसे मैंगनीन और कॉन्स्टैन्टन, में प्रतिरोध का तापमान गुणांक बहुत कम होता है, जिसका अर्थ है कि उनका प्रतिरोध तापमान परिवर्तन के साथ लगभग स्थिर रहता है। यही कारण है कि इनका उपयोग सटीक प्रतिरोधकों के निर्माण में किया जाता है।





    एक तांबे के तार का R = 10 ओम है 0 डिग्री सेल्सियस पर, अल्फा = 0.004 डिग्री सेल्सियस है। 50 डिग्री सेल्सियस पर R ज्ञात कीजिए।?


    यह प्रश्न प्रतिरोध और तापमान के संबंध (Temperature Coefficient of Resistance) पर आधारित है, जिसे आपने पिछले प्रश्न में पूछा था।

    ​हम इस गणना के लिए निम्न सूत्र का उपयोग करेंगे:

    R_T = R_0 [1 + alpha (T - T_0)]


    जहाँ:

    • ​R_T = नए तापमान पर प्रतिरोध (जो हमें ज्ञात करना है)
    • ​R_0 = संदर्भ तापमान पर प्रतिरोध (10 Omega at 0^circ C)
    • ​alpha = प्रतिरोध का तापमान गुणांक (0.004 ^circ C)
    • ​T = नया तापमान (50^circ C)
    • ​T_0 = संदर्भ तापमान (0^circ C)

    गणना

    तापमान में अंतर (Delta T) ज्ञात करें:

    Delta T = T - T_0 = 50^circ C - 0^circ C = 50^ circ C

    सूत्र में मान रखें:

    R_{50} = 10 [1 + 0.004 × (50 - 0)]

    R_{50} = 10 [1 + 0.004 × 50]

    कोष्ठक के अंदर गुणा करें:

    0.004 × 50 = 0.2

    कोष्ठक के अंदर जोड़ें:

    R_{50} = 10 [1 + 0.2]

    R_{50} = 10 [1.2]

    अंतिम प्रतिरोध ज्ञात करें:

    R_{50} = 12 Omega

    उत्तर

    ​50^ circ C पर तांबे के तार का प्रतिरोध 12 Omega (ओम) होगा।





    हीटिंग एलिमेंट में नाइक्रोम का उपयोग क्यों किया जाता है?


    हीटिंग एलिमेंट (Heating Element) जैसे टोस्टर, हीटर, या इलेक्ट्रिक केतली में नाइक्रोम (Nichrome) का उपयोग करने के मुख्य कारण इसके अद्वितीय विद्युत और भौतिक गुण हैं। नाइक्रोम एक मिश्र धातु (Alloy) है जो निकल (Nickel) और क्रोमियम (Chromium) से मिलकर बनती है (आमतौर पर 80% निकल और 20% क्रोमियम)।

    ​यहां उन प्रमुख कारणों का विस्तृत विवरण दिया गया है जिनके कारण नाइक्रोम को हीटिंग एलिमेंट के लिए सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है:

    ​1. उच्च प्रतिरोधकता (High Resistivity)

    • महत्व: नाइक्रोम की विद्युत प्रतिरोधकता (Electrical Resistivity) बहुत अधिक होती है।
    • परिणाम: ओम के नियम और जूल के तापन नियम (H = I^2 R t) के अनुसार, उच्च प्रतिरोध के कारण, समान धारा प्रवाहित करने पर यह किसी अन्य सामान्य चालक (जैसे तांबे) की तुलना में बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न करता है। यह हीटिंग एलिमेंट के लिए प्राथमिक आवश्यकता है।

    ​2. ऑक्सीकरण और संक्षारण के प्रति उच्च प्रतिरोध (High Resistance to Oxidation and Corrosion)

    • विशेषता: नाइक्रोम अत्यधिक उच्च तापमान पर भी ऑक्सीजन के साथ धीमी गति से प्रतिक्रिया करता है।
    • परिणाम: जब नाइक्रोम को पहली बार गर्म किया जाता है, तो इसकी बाहरी परत पर क्रोमियम ऑक्साइड की एक पतली, स्थिर परत बन जाती है। यह परत तार को आगे ऑक्सीकरण (Further Oxidation) और क्षरण (Corrosion) से बचाती है। इससे हीटिंग एलिमेंट की आयु लम्बी हो जाती है।

    ​3. उच्च गलनांक (High Melting Point)

    • विशेषता: नाइक्रोम का गलनांक लगभग 1400^\circ C (सेल्सियस) होता है, जो इसे अत्यंत उच्च तापमान पर भी संरचनात्मक रूप से स्थिर रखता है।
    • महत्व: हीटिंग एलिमेंट को अक्सर लाल-गर्म अवस्था (Red-Hot State) में काम करना पड़ता है, लेकिन नाइक्रोम पिघलता नहीं है, जिससे यह सुरक्षित रूप से कार्य करता रहता है।

    ​4. निम्न तापमान गुणांक (Low Temperature Coefficient of Resistance - TCR)

    • विशेषता: नाइक्रोम का प्रतिरोध तापमान बढ़ने पर बहुत कम बदलता है (लगभग स्थिर रहता है)।
    • महत्व: इसका मतलब है कि जब एलिमेंट ठंडा होता है और जब वह लाल-गर्म होता है, तो दोनों ही स्थितियों में उसका प्रतिरोध लगभग समान रहता है। इससे हीटिंग प्रक्रिया अधिक अनुमानित (Predictable) और स्थिर बनी रहती है।

    संक्षेप में, 

    नाइक्रोम अपनी उच्च प्रतिरोधकता, उच्च गलनांक और उत्कृष्ट संक्षारण प्रतिरोध के अद्वितीय संयोजन के कारण हीटिंग एलिमेंट के लिए सबसे आदर्श सामग्री है।

    अन्य सामान्य उपयोग:

    • ​इलेक्ट्रिक हीटर (Electric Heaters)
    • ​टोस्टर और ग्रिल (Toasters and Grills)
    • ​हेयर ड्रायर (Hair Dryers)
    • ​सोल्डरिंग आयरन (Soldering Irons)




    तीन 6 ओम के प्रतिरोधकों को समानांतर क्रम में जोड़ने पर कुल प्रतिरोध कितना होगा?

    यह प्रश्न प्रतिरोधकों के समानांतर क्रम संयोजन (Parallel Combination) पर आधारित है।

    ​जब प्रतिरोधकों को समानांतर क्रम में जोड़ा जाता है, तो कुल (तुल्य) प्रतिरोध ({R_{eq}}) का व्युत्क्रम (Reciprocal) प्रत्येक व्यक्तिगत प्रतिरोधक के व्युत्क्रमों के योग के बराबर होता है।

    समानांतर संयोजन का सूत्र

    ​तीन प्रतिरोधकों (R_1, R_2, R_3) के लिए, कुल प्रतिरोध का सूत्र है:

    {1}/{R_{eq}} = {1}/{R_1} + {1}/{R_2} + {1}/{R_3}

    गणना

    ​आपके पास तीन प्रतिरोधक हैं, और प्रत्येक का मान 6 Omega है:

    R_1 = 6 Omega

    R_2 = 6 Omega

    R_3 = 6 Omega

    व्युत्क्रमों को जोड़ें:

    {1}/{R_{eq}} = {1}/{6} + {1}/{6} + {1}/{6}

    {1}/{R_{eq}} = {1 + 1 + 1}/{6}

    {1}/{R_{eq}} = {3}/{6}

    परिणाम को सरल करें:

    {1}/{R_{eq}} = {1}/{2}

    कुल प्रतिरोध (R_{eq}) ज्ञात करने के लिए व्युत्क्रम लें:

    R_{eq} = 2 Omega

    शॉर्टकट (समान प्रतिरोधकों के लिए)

    ​जब N संख्या में समान प्रतिरोधकों को समानांतर में जोड़ा जाता है, तो कुल प्रतिरोध ज्ञात करने का एक आसान सूत्र है:

    R_{eq} = {R}/{N}

    जहाँ:

    • ​R = एक व्यक्तिगत प्रतिरोध का मान (6 Omega)
    • ​N = प्रतिरोधकों की संख्या (3)

    R_{eq} = {6 Omega}/{3} = 2 Omega

    उत्तर

    ​तीनों 6 Omega के प्रतिरोधकों को समानांतर क्रम में जोड़ने पर कुल प्रतिरोध 2 Omega (ओम) होगा।

    ध्यान दें: समानांतर क्रम में, कुल प्रतिरोध हमेशा सबसे छोटे व्यक्तिगत प्रतिरोध से भी कम होता है।





    तीन 6 ओम के प्रतिरोधों को श्रृंखला में जोड़ने पर कुल प्रतिरोध कितना होगा?

    यह प्रश्न प्रतिरोधकों के श्रृंखला क्रम संयोजन (Series Combination) पर आधारित है।

    ​जब प्रतिरोधकों को श्रृंखला (एक के बाद एक) क्रम में जोड़ा जाता है, तो कुल (तुल्य) प्रतिरोध ({R_{eq}}) ज्ञात करने के लिए व्यक्तिगत प्रतिरोधों के मानों को सीधे जोड़ दिया जाता है।

    श्रृंखला संयोजन का सूत्र

    ​तीन प्रतिरोधकों (R_1, R_2, R_3) के लिए, कुल प्रतिरोध का सूत्र है:

    R_{eq} = R_1 + R_2 + R_3

    गणना

    ​आपके पास तीन प्रतिरोधक हैं, और प्रत्येक का मान 6 Omega है:

    R_1 = 6 Omega

    R_2 = 6 Omega

    R_3 = 6 Omega

    सूत्र में मान रखने पर:

    R_{eq} = 6 Omega + 6 Omega + 6 Omega

    R_{eq} = 18 Omega

    उत्तर

    ​तीनों 6 Omega के प्रतिरोधकों को श्रृंखला क्रम में जोड़ने पर कुल प्रतिरोध 18 Omega (ओम) होगा।

    ध्यान दें: श्रृंखला क्रम में, कुल प्रतिरोध हमेशा सबसे बड़े व्यक्तिगत प्रतिरोध से भी अधिक होता है।


    https://dkrajwar.blogspot.com/2026/01/what-is-resistance.html

    व्यवहार में किसी चालक का प्रतिरोध स्थिर क्यों नहीं होता है?

    यह एक बहुत ही व्यावहारिक और महत्वपूर्ण प्रश्न है। आदर्श रूप से (Ideally), ओम के नियम के अनुसार किसी चालक का प्रतिरोध स्थिर होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में (In Practice) यह कई कारकों के कारण स्थिर नहीं रह पाता।

    ​चालक का प्रतिरोध मुख्य रूप से निम्नलिखित कारकों के कारण बदलता रहता है:

    ​1. तापमान में परिवर्तन (The Main Reason: Temperature Variation)

    ​यह प्रतिरोध के स्थिर न रहने का सबसे प्रमुख कारण है।

    • जूल तापन: जब भी चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसमें ऊष्मा उत्पन्न होती है (H = I^2 R t)। यह ऊष्मा चालक के तापमान को बढ़ाती है।
    • सकारात्मक तापमान गुणांक (PTC): अधिकांश शुद्ध चालकों (जैसे तांबा, एल्युमिनियम) में धनात्मक तापमान गुणांक (alpha) होता है। इसका मतलब है: ​तापमान बढ़ने पर चालक का प्रतिरोध भी बढ़ता है।
    • तापमान बढ़ने पर चालक का प्रतिरोध भी बढ़ता है।


      • कारण: उच्च तापमान पर, चालक के परमाणु अधिक तेज़ी से कंपन करते हैं, जिससे मुक्त इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह में अधिक बाधा उत्पन्न होती है और प्रतिरोध बढ़ जाता है।
      • परिणाम: चूँकि धारा के प्रवाह के कारण तापमान लगातार बदलता रहता है, इसलिए प्रतिरोध भी स्थिर नहीं रह पाता।

      ​2. यांत्रिक तनाव और विकृति (Mechanical Stress and Strain)

      ​यदि चालक तार को खींचा जाता है, मोड़ा जाता है, या उस पर यांत्रिक बल (Mechanical Force) लगाया जाता है, तो उसका प्रतिरोध बदल सकता है।

      • लंबाई और क्षेत्रफल में परिवर्तन: प्रतिरोध का सूत्र है: 
      • R =rho {L}/{A}
        • ​तार को खींचने पर उसकी लंबाई (L) बढ़ती है और अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A) घटता है, जिससे प्रतिरोध बढ़ जाता है
        • ​इस घटना का उपयोग स्ट्रेन गेज (Strain Gauges) जैसे मापन उपकरणों में किया जाता है।

      ​3. सामग्री की आयु (Ageing of Material)

      ​समय के साथ, चालक की भौतिक और रासायनिक संरचना में धीरे-धीरे परिवर्तन हो सकते हैं:

      • ऑक्सीकरण (Oxidation): यदि चालक कोटिंग (Insulation) क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो बाहरी हवा और नमी के कारण धातु का ऑक्सीकरण (जंग लगना) हो सकता है, जिससे उसकी प्रतिरोधकता (rho) बदल जाती है।
      • थकान: लगातार गर्मी और ठंडा होने के चक्र (Thermal Cycling) के कारण तार की संरचना में बदलाव आ सकता है, जिससे प्रतिरोध बदल जाता है।

      ​4. अशुद्धियों का प्रवेश (Introduction of Impurities)

      ​यदि सर्किट में किसी भी प्रकार की अशुद्धियाँ (जैसे वेल्डिंग से या दोषपूर्ण कनेक्शन से) आ जाती हैं, तो वे चालक की प्रतिरोधकता को बदल सकती हैं, जिससे प्रतिरोध का मान स्थिर नहीं रहता।

      निष्कर्ष:

      ​हालाँकि हम गणनाओं में एक स्थिर प्रतिरोध मान का उपयोग करते हैं, लेकिन व्यावहारिक इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में, ये सभी कारक (विशेष रूप से तापमान) प्रतिरोध को एक गतिशील (Dynamic) घटक बनाते हैं।






    उच्च प्रतिरोधकता वाली सामग्रियों के अनुप्रयोग क्या हैं?

    उच्च प्रतिरोधकता (High Resistivity) वाली सामग्रियों के अनुप्रयोग (Applications) बहुत व्यापक हैं, खासकर इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में। इन सामग्रियों की यह विशेषता उन्हें विशेष रूप से ऊष्मा उत्पन्न करने, धारा को सीमित करने, और मापन में सटीकता प्रदान करने के लिए आदर्श बनाती है।

    ​यहाँ उच्च प्रतिरोधकता वाली सामग्रियों के मुख्य अनुप्रयोग दिए गए हैं:

    ​1. तापन तत्व (Heating Elements)

    ​यह शायद उच्च प्रतिरोधकता वाली सामग्रियों का सबसे आम और महत्वपूर्ण अनुप्रयोग है।

    • आवश्यकता: जूल के तापन नियम (H = I^2 R t) के अनुसार, अधिकतम ऊष्मा उत्पन्न करने के लिए उच्च प्रतिरोध (R) की आवश्यकता होती है।
    • सामग्री: नाइक्रोम (Nichrome) (निकल और क्रोमियम का मिश्र धातु) इसका प्रमुख उदाहरण है।
    • अनुप्रयोग:
      • ​इलेक्ट्रिक हीटर और ब्लोअर
      • ​टोस्टर, ग्रिल और ओवन
      • ​इलेक्ट्रिक केतली
      • ​सोल्डरिंग आयरन (Soldering Iron)

    ​2. प्रतिरोधक (Resistors) का निर्माण

    ​प्रतिरोधकों के निर्माण के लिए ऐसी सामग्री आवश्यक है जो कम जगह में अधिक प्रतिरोध प्रदान कर सके।

    • आवश्यकता: प्रतिरोधक का मूल कार्य धारा को सीमित करना है, जिसके लिए प्रतिरोधक तत्व में उच्च प्रतिरोधकता होनी चाहिए।
    • सामग्री:
      • कार्बन (Carbon): कार्बन फिल्म और कार्बन कंपोजिशन प्रतिरोधकों में।
      • टिन ऑक्साइड (Tin Oxide): मेटल ऑक्साइड फिल्म प्रतिरोधकों में।
      • नाइक्रोम और मैंगनीन (Manganin): वायर वाउंड प्रतिरोधकों में (जहाँ उच्च शक्ति की आवश्यकता होती है)।
    • अनुप्रयोग: सभी इलेक्ट्रॉनिक सर्किटों में धारा सीमित करने, वोल्टेज विभाजित करने, और समय स्थिरांक (Time Constants) बनाने के लिए।

    ​3. मानक और सटीक मापन (Standard and Precision Measurement)

    ​मापन उपकरणों में प्रतिरोध को तापमान परिवर्तन से अप्रभावित रखना आवश्यक है।

    • आवश्यकता: सामग्री का प्रतिरोध न केवल उच्च हो, बल्कि उसका तापमान गुणांक (Temperature Coefficient of Resistance - TCR) बहुत कम या शून्य के करीब हो।
    • सामग्री: मैंगनीन (तांबा, मैंगनीज और निकल का मिश्र धातु) और कॉन्स्टैन्टन (तांबा और निकल का मिश्र धातु)।
    • अनुप्रयोग:
      • मानक प्रतिरोधक (Standard Resistors): जिनका उपयोग प्रयोगशालाओं में सटीक तुलना और अंशांकन (Calibration) के लिए किया जाता है।
      • व्हीटस्टोन ब्रिज (Wheatstone Bridge): के निर्माण में, जहाँ प्रतिरोध का मान स्थिर रखना महत्वपूर्ण है।

    ​4. फ्यूज और सर्किट सुरक्षा (Fuses and Circuit Protection)

    ​हालांकि फ्यूज के तार की प्रतिरोधकता बहुत उच्च नहीं होती, लेकिन यह सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    • आवश्यकता: फ्यूज तार को अत्यधिक धारा प्रवाहित होने पर जल्दी से पिघल जाना चाहिए। इसके लिए एक ऐसा चालक चाहिए जो ऊष्मा उत्पन्न करे और जिसका गलनांक (Melting Point) अपेक्षाकृत कम हो।
    • सामग्री: विशेष मिश्र धातुएँ जिनका गलनांक कम हो और प्रतिरोधकता सामान्य चालकों से अधिक हो।

    संक्षेप में, 

    उच्च प्रतिरोधकता वाली सामग्रियाँ हीटिंग, धारा नियंत्रण और सटीक मापन के लिए आवश्यक हैं क्योंकि वे उच्च विद्युत ऊर्जा को ऊष्मा में प्रभावी ढंग से परिवर्तित कर सकती हैं और स्थिरता बनाए रख सकती हैं।







    यदि किसी तार की लंबाई और व्यास दोनों को दोगुना कर दिया जाए तो उसका प्रतिरोध कितना होगा?

    यह प्रश्न प्रतिरोध की आयामों (Dimensions) पर निर्भरता पर आधारित है।

    ​प्रतिरोध (R) की गणना निम्नलिखित सूत्र का उपयोग करके की जाती है:

    R = rho {L}/{A}

    जहाँ:

    • ​R = प्रतिरोध
    • ​rho = प्रतिरोधकता (Resistivity) (यह सामग्री पर निर्भर करती है, जो स्थिर रहेगी)
    • ​L = तार की लंबाई (Length)
    • ​A = तार के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (Area of Cross-section)

    गणना

    ​मान लीजिए मूल तार का प्रतिरोध R_{old} है।

    R_{old} = rho {L}/{A}

    तार का अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल ({A}) उसके व्यास ({d}) पर निर्भर करता है:

    A = pi r^2 = pi ({d}/{2})^2 = {d^2}/{4}

    A = pi r^2 = pi ({d}/{2})^2 = {d^2}/{4}

    तो, मूल प्रतिरोध को व्यास के पदों में व्यक्त करने पर:

    R_{old} = rho {L}/{{d^2}/{4}} = {4rho L}/{pi d^2}

    अब, नई स्थिति में, हमें लंबाई (L) और व्यास (d) दोनों को दोगुना करना है:

    • ​नई लंबाई (L_{new}) = 2L
    • ​नया व्यास (d_{new}) = 2d

    ​नए तार का प्रतिरोध (R_{new}) ज्ञात करने पर:

    R_{new} = rho {L_{new}}/{A_{new}} = rho {2L}/{{pi (2d)^2}/{4}}






    विशिष्ट चालकता (या चालकता) को परिभाषित करें।


    विशिष्ट चालकता (Specific Conductivity) या केवल चालकता (Conductivity) को निम्नलिखित तरीके से परिभाषित किया जाता है:

    विशिष्ट चालकता की परिभाषा

    ​किसी चालक के प्रति इकाई आयतन में विद्युत धारा संचालित करने की क्षमता को उसकी विशिष्ट चालकता कहते हैं।

    ​यह उस सामग्री के प्रतिरोधकता (Resistivity) का व्युत्क्रम होती है। दूसरे शब्दों में, यह दर्शाती है कि कोई सामग्री कितनी आसानी से विद्युत धारा को अपने में से प्रवाहित होने देती है।

    गणितीय रूप

    ​विशिष्ट चालकता को प्रायः ग्रीक अक्षर सिग्मा (sigma) या कभी-कभी कप्पा (kappa) से दर्शाया जाता है।

    ​इसे प्रतिरोधकता (rho) के व्युत्क्रम के रूप में परिभाषित किया जाता है:

    sigma = {1}/{rho}

    जहाँ rho प्रतिरोधकता है।

    मात्रक (Units)

    ​इसका SI मात्रक सीमेंस प्रति मीटर (Siemens per meter, S/m) होता है।

    इसे Omega^{-1} cdot m^{-1} (ओम इनवर्स मीटर इनवर्स) या मोह प्रति मीटर ({mho} / m) भी कहा जाता है।

    मुख्य बिंदु

    1. प्रतिरोधकता का व्युत्क्रम: यदि किसी पदार्थ की प्रतिरोधकता अधिक है, तो उसकी चालकता कम होगी, और इसके विपरीत।
    2. पदार्थ का गुण: विशिष्ट चालकता पदार्थ का एक अभिलाक्षणिक गुण (Characteristic property) है, जिसका अर्थ है कि यह चालक के आकार या ज्यामिति (जैसे लंबाई या अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल) पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि केवल उसकी प्रकृति और तापमान पर निर्भर करती है।
    3. तापमान का प्रभाव: सामान्यतः, धात्विक चालकों की चालकता तापमान बढ़ने पर घटती है, जबकि इलेक्ट्रोलाइटिक विलयनों की चालकता तापमान बढ़ने पर बढ़ती है।






    चालकता और चालकता में क्या अंतर है?

    विशिष्ट चालकता (Specific Conductivity) और चालकत्व (Conductance) में मुख्य अंतर यह है कि चालकत्व एक विशेष वस्तु या घटक का माप है, जबकि विशिष्ट चालकता एक सामग्री (पदार्थ) का मूलभूत गुण है।

    ​दोनों के बीच के अंतर को निम्न तालिका से समझा जा सकता है:

    विशेषता

    चालकत्व (Conductance)

    विशिष्ट चालकता (Specific Conductivity या Conductivity)

    प्रतीक

    G

    sigma (सिग्मा) या kappa (कप्पा)

    परिभाषा

    यह प्रतिरोध (R) का व्युत्क्रम है। यह मापता है कि कोई विशेष चालक (जैसे एक तार या कोई घटक) कितनी आसानी से धारा प्रवाहित होने देता है।

    यह प्रतिरोधकता (rho) का व्युत्क्रम है। यह मापता है कि कोई सामग्री (जैसे तांबा, चांदी) प्रति इकाई आयतन में कितनी आसानी से धारा प्रवाहित होने देती है।

    सूत्र

    G = {1}/{R}

    sigma = {1}/{rho}

    निर्भरता

    यह चालक के भौतिक आयामों (लंबाई, अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल) और पदार्थ की प्रकृति दोनों पर निर्भर करता है।

    यह केवल पदार्थ की प्रकृति और तापमान पर निर्भर करता है। यह चालक के आकार या ज्यामिति से स्वतंत्र होता है।

    SI मात्रक

    सीमेंस (Siemens, S) या मोह (Mho, \Omega^{-1})

    सीमेंस प्रति मीटर ({S/m}) या मोह प्रति मीटर (Omega^{-1} \cdot m^{-1})

    प्रकार

    यह एक विस्तृत गुण (Extensive Property) है क्योंकि यह वस्तु के आकार पर निर्भर करता है।

    यह एक अभिलाक्षणिक गुण (Intrinsic Property) है, जो पदार्थ का मूलभूत गुण है।


    मुख्य निष्कर्ष

    1. चालकत्व (G): यह एक विशिष्ट वस्तु (जैसे आपके हाथ में 10 { cm} लंबा तांबे का तार) के लिए मापा जाता है।
    2. विशिष्ट चालकता (sigma): यह उस सामग्री (यानी तांबा) के लिए मापी जाती है, चाहे आप 1 { mm} मोटा तार लें या 1 { m} मोटी छड़। इसका मान तांबे के लिए हमेशा समान रहेगा (तापमान स्थिर रहने पर)।





    एक तार की प्रतिरोधकता p = 1.7×10⁻⁸ ओम.मीटर, लंबाई = 2 मीटर और क्षेत्रफल = 1 मिमी² है। प्रतिरोधकता (R) ज्ञात कीजिए।

    यह प्रतिरोध (Resistance, R) ज्ञात करने का एक सीधा सवाल है, जिसके लिए आपको प्रतिरोधकता का सूत्र उपयोग करना होगा।

    प्रतिरोध का सूत्र

    ​प्रतिरोध (R) की गणना प्रतिरोधकता (rho), लंबाई (L) और अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल (A) के संबंध का उपयोग करके की जाती है:

    R = {rho × L}/{A}

    जहाँ:

    • ​R = प्रतिरोध (ओह्म, Omega)
    • ​rho (रो) = प्रतिरोधकता (ओह्म.मीटर, Omega cdot m)
    • ​L = तार की लंबाई (मीटर, m)
    • ​A = अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (वर्ग मीटर, m^2)

    दिए गए मानों को मानक इकाई में परिवर्तित करना

    ​गणना करने से पहले, सुनिश्चित करें कि सभी मान SI इकाइयों (SI Units) में हैं।

    मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ।

    ​यह एक भौतिकी का प्रश्न है जिसमें आपको एक तार का प्रतिरोध (R) ज्ञात करना है, जिसके लिए तार के पदार्थ की प्रतिरोधकता ( rho ), लंबाई (L), और अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल (A) दिया गया है।

    ​सबसे पहले, आइए दिए गए मानों को SI इकाइयों में व्यवस्थित करें:

    दिए गए मान

    • प्रतिरोधकता (rho): 1.7 × 10^{-8} , {ओम} cdot {मीटर}
    • लंबाई (L): 2 , {मीटर}
    • अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल (A): 1 , {मिमी}^2

    ​हमें क्षेत्रफल को {मीटर}^2 में बदलना होगा, क्योंकि 1 , {मिमी} = 10^{-3} , {मीटर}:









    विद्युत चालकों में तांबा और एल्युमीनियम का उपयोग सबसे अधिक क्यों किया जाता है?

    विद्युत चालकों (electrical conductors) में तांबा (Copper) और एल्युमीनियम (Aluminium) का उपयोग सबसे अधिक निम्नलिखित गुणों के कारण किया जाता है:

    मुख्य कारण (Key Reasons)

    • उच्च विद्युत चालकता (High Electrical Conductivity) और कम प्रतिरोधकता (Low Resistivity):
      • ​ये दोनों धातुएँ बिजली को बहुत कुशलता से प्रवाहित होने देती हैं, यानी इनका विशिष्ट प्रतिरोध (Specific Resistance) कम होता है।
      • ​चांदी के बाद, तांबा सबसे अधिक चालकता वाला शुद्ध धातु है, जबकि एल्युमीनियम भी एक अच्छा चालक है, हालांकि तांबे से कम।
    • लागत-प्रभावशीलता और उपलब्धता (Cost-Effectiveness and Availability):
      • ​ये धातुएँ, विशेष रूप से एल्युमीनियम, चांदी जैसी अन्य उच्च चालकों की तुलना में बहुत सस्ती हैं और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। यह उन्हें बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाता है।
    • तन्यता (Ductility):
      • ​इन धातुओं को आसानी से पतले तारों (thin wires) के रूप में खींचा जा सकता है, जो विद्युत तारों के लिए एक आवश्यक गुण है।
    • संक्षारण प्रतिरोध (Corrosion Resistance):
      • ​ये धातुएँ जंग (rust) या संक्षारण (corrosion) के प्रति अपेक्षाकृत प्रतिरोधी होती हैं, जिससे तारों का जीवनकाल (lifespan) लंबा होता है। तांबा, एल्युमीनियम की तुलना में अधिक संक्षारण प्रतिरोधी होता है।

    अलग-अलग अनुप्रयोगों में प्राथमिकता (Preference in Different Applications)

    गुण (Property)

    तांबा (Copper)

    एल्युमीनियम (Aluminium)

    चालकता (Conductivity)

    बहुत उच्च (उत्कृष्ट)

    उच्च (तांबे से लगभग 61% कम)

    वजन (Weight)

    भारी

    बहुत हल्का (तांबे के वजन का लगभग एक-तिहाई)

    लागत (Cost)

    महंगा

    कम महंगा

    तन्यता और सामर्थ्य (Ductility & Strength)

    अधिक मजबूत और कम फैलता है

    कम मजबूत, तापमान परिवर्तन के साथ अधिक फैलता है

    उपयोग (Usage)

    घरों की वायरिंग, मोटर, ट्रांसफार्मर, इलेक्ट्रॉनिक्स, जहाँ कम जगह में अधिक करेंट चाहिए।

    ओवरहेड पावर लाइनें (Overhead Power Lines), लंबी दूरी के संचरण केबल (Transmission Cables), जहाँ हल्कापन महत्वपूर्ण है।


    निष्कर्ष:

    तांबा को बेहतर सुरक्षा, टिकाऊपन और उच्च प्रदर्शन के लिए पसंद किया जाता है।

    एल्युमीनियम को कम लागत और हल्के वजन के कारण बड़े और लंबी दूरी के विद्युत संचरण (power transmission) में उपयोग किया जाता है।







    पोटेंशियोमीटर क्या होता है?

    पोटेंशियोमीटर (Potentiometer) क्या है?

    ​पोटेंशियोमीटर (जिसे हिंदी में विभवमापी भी कहते हैं) एक तीन सिरे वाला निष्क्रिय इलेक्ट्रॉनिक घटक (three-terminal passive electronic component) है। इसे मुख्य रूप से एक परिवर्ती प्रतिरोध (Variable Resistor) के रूप में या विभव-विभाजक (Potential Divider) के रूप में उपयोग किया जाता है।

    मुख्य भाग और सिद्धांत

    ​पोटेंशियोमीटर के तीन मुख्य भाग और इसका कार्य सिद्धांत निम्नलिखित है:

    प्रतिरोधक ट्रैक (Resistive Track): यह एक स्थिर प्रतिरोध तत्व होता है जिसके दो सिरे (टर्मिनल) नियत (fixed) होते हैं। इन दो सिरों के बीच अधिकतम वोल्टेज लगाया जाता है।

    वाइपर/स्लाइडिंग संपर्क (Wiper/Sliding Contact): यह तीसरा सिरा होता है जो प्रतिरोधक ट्रैक के साथ गति करता है (स्लाइड या रोटेट होता है)।

    कार्य सिद्धांत (Principle): इसका कार्य सिद्धांत वोल्टेज डिवाइडर पर आधारित है।


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    • ​जब वाइपर प्रतिरोधक ट्रैक के साथ चलता है, तो यह ट्रैक को दो अलग-अलग प्रतिरोधों में विभाजित कर देता है।
    • ​आउटपुट वोल्टेज इनपुट वोल्टेज का एक अंश (fraction) होता है, जिसे वाइपर की स्थिति बदलकर लगातार परिवर्तित या समायोजित किया जा सकता है।

    पोटेंशियोमीटर का उपयोग

    ​पोटेंशियोमीटर के दो मुख्य उपयोग होते हैं:

    ​1. एक मापक उपकरण के रूप में (As a Measuring Instrument - विभवमापी)

    • सटीक विभवांतर मापन: इसका उपयोग दो बिंदुओं के बीच के विद्युत विभव (potential difference) को अत्यंत सटीकता से मापने के लिए किया जाता है।
    • अज्ञात EMF ज्ञात करना: किसी सेल (Battery) का अज्ञात विद्युत वाहक बल (ElectroMotive Force - EMF) ज्ञात करना।
    • आंतरिक प्रतिरोध ज्ञात करना: सेल का आंतरिक प्रतिरोध (Internal Resistance) ज्ञात करना।
    • शून्य विक्षेप विधि: यह शून्य विक्षेप विधि (Null Deflection Method) पर कार्य करता है। जब पोटेंशियोमीटर द्वारा मापा गया वोल्टेज बाह्य वोल्टेज के बराबर होता है, तो गैल्वेनोमीटर में कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है (शून्य विक्षेप)। इस स्थिति में, पोटेंशियोमीटर स्रोत से कोई धारा नहीं खींचता है, इसलिए माप बहुत सटीक होता है (वोल्टमीटर की तुलना में यह बेहतर माना जाता है)।

    ​2. एक परिवर्ती प्रतिरोध/वोल्टेज नियंत्रक के रूप में (As a Variable Resistor/Voltage Controller)

    • वॉल्यूम नियंत्रण: ऑडियो उपकरणों (जैसे स्पीकर या एम्पलीफायर) में ध्वनि की तीव्रता (Volume) को नियंत्रित करने के लिए।
    • टिमर नियंत्रण: पंखे या मोटर की गति को नियंत्रित करने के लिए।
    • लाइट डिमर (Dimmer): प्रकाश की चमक (Brightness) को नियंत्रित करने के लिए।




    एसी परिपथों में आवृत्ति से प्रतिरोध कैसे प्रभावित होता है?

    एसी परिपथों में आवृत्ति और प्रतिरोध का संबंध

    ​एसी (प्रत्यावर्ती धारा) परिपथों में, "प्रतिरोध" (Resistance) शब्द का उपयोग दो अलग-अलग संदर्भों में किया जाता है, जिनका आवृत्ति (Frequency) पर प्रभाव भी अलग-अलग होता है:

    ​1. शुद्ध प्रतिरोध (Ohmic or DC Resistance - R)

    ​एक शुद्ध प्रतिरोधक (Pure Resistor) के कारण उत्पन्न होने वाला प्रतिरोध सैद्धांतिक रूप से आवृत्ति पर निर्भर नहीं करता है।

    प्रभाव: यदि परिपथ में केवल एक आदर्श प्रतिरोधक (R) लगा है, तो उसकी प्रतिरोधक क्षमता (R) एसी की आवृत्ति (f) बढ़ने या घटने पर अपरिवर्तित रहती है।

    कारण: प्रतिरोध का मान तार की सामग्री (प्रतिरोधकता \rho), लंबाई (L), और अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (A) पर निर्भर करता है:

    R = rho {L}/{A}


    इनमें से कोई भी कारक आवृत्ति पर निर्भर नहीं करता है।


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    2. एसी परिपथ की कुल प्रतिबाधा (Total Impedance - Z)

    ​एसी परिपथ में धारा के प्रवाह के प्रति कुल विरोध को प्रतिबाधा (Z) कहा जाता है। प्रतिबाधा में प्रतिरोध (R) के साथ-साथ प्रतिघात (Reactance - X) भी शामिल होता है, और यह प्रतिघात आवृत्ति पर सीधे निर्भर करता है।

    Z = sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}

    यहाँ X_L और X_C का आवृत्ति से संबंध निम्नलिखित है:

    ​A. प्रेरकीय प्रतिघात (Inductive Reactance - X_L)

    ​यह एक प्रेरक (Inductor - L) के कारण होता है।

    • सूत्र: X_L = 2 pi f L
    • प्रभाव: आवृत्ति (f) बढ़ने पर X_L का मान बढ़ता है। प्रेरक उच्च आवृत्ति की धारा का अधिक विरोध करते हैं।

    ​B. धारितीय प्रतिघात (Capacitive Reactance - X_C)

    ​यह एक संधारित्र (Capacitor - C) के कारण होता है।

    • सूत्र: X_C = {1}/{2 pi f C}
    • प्रभाव: आवृत्ति (f) बढ़ने पर X_C का मान घटता है। संधारित्र उच्च आवृत्ति की धारा को आसानी से गुजरने देते हैं।

    मुख्य निष्कर्ष

    • शुद्ध प्रतिरोध (R): आवृत्ति से अप्रभावित रहता है।
    • कुल प्रतिबाधा (Z): आवृत्ति पर निर्भर करती है, क्योंकि यह प्रतिघात (X_L और X_C) से प्रभावित होती है।
    • व्यवहारिक (Practical) प्रभाव: बहुत उच्च आवृत्तियों पर, स्किन प्रभाव (Skin Effect) के कारण चालक के केंद्र के बजाय धारा उसकी सतह पर प्रवाहित होने लगती है, जिससे तार का प्रभावी प्रतिरोध (R) भी थोड़ा बढ़ जाता है।





    प्रतिरोध और प्रतिबाधा में क्या अंतर है?

    प्रतिरोध (Resistance) और प्रतिबाधा (Impedance) दोनों ही विद्युत परिपथ में धारा के प्रवाह के विरोध को दर्शाते हैं, लेकिन उनके बीच मूलभूत अंतर यह है कि वे किस प्रकार की धारा (DC या AC) से संबंधित हैं और किन घटकों (Components) को शामिल करते हैं।

    सीधे शब्दों में कहें तो:

    • प्रतिरोध (R) केवल ऊर्जा को ऊष्मा में परिवर्तित करता है और DC (दिष्ट धारा) और AC (प्रत्यावर्ती धारा) दोनों में समान रूप से कार्य करता है।
    • प्रतिबाधा (Z) एक व्यापक शब्द है जो AC परिपथ में प्रतिरोध और प्रतिघात (Reactance - X) दोनों के संयुक्त प्रभाव को दर्शाता है।

    प्रतिरोध (R) और प्रतिबाधा (Z) में मुख्य अंतर

    विद्युत प्रतिरोध (Electrical Resistance)

    विद्युत प्रतिरोध किसी चालक (Conductor) का वह मूल गुण है, जिसके कारण वह अपने में से प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करता है या उसमें रुकावट डालता है।

    ​जब इलेक्ट्रॉन किसी चालक में से गुजरते हैं, तो वे चालक के परमाणुओं और अन्य इलेक्ट्रॉनों से टकराते हैं, जिससे उनकी गति धीमी हो जाती है। यही टकराव प्रतिरोध के रूप में प्रकट होता है, और इस प्रक्रिया में विद्युत ऊर्जा का कुछ हिस्सा ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है।

    परिभाषा और सूत्र

    1. ओम के नियम के अनुसार परिभाषा:

    ​ओम (Ohm) के नियम के अनुसार, किसी चालक के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर (V) तथा उसमें प्रवाहित विद्युत धारा (I) के अनुपात को ही उस चालक का प्रतिरोध (R) कहते हैं।

    सूत्र


    R = {V}/{I}

    2. SI मात्रक:

    प्रतिरोध का SI मात्रक ओम (Ohm) है, जिसे ग्रीक अक्षर Omega (ओमेगा) से दर्शाया जाता है।

    1 { ओम} = 1 {{वोल्ट}}/{{एम्पीयर}}

    प्रतिरोध को प्रभावित करने वाले कारक

    ​किसी भी चालक का प्रतिरोध (R) निम्नलिखित चार मुख्य कारकों पर निर्भर करता है:

    चालक की लंबाई (l): प्रतिरोध लंबाई के सीधे आनुपापातिक होता है। (जितना लंबा तार, उतना अधिक प्रतिरोध)।

    R = l

    अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A): प्रतिरोध क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। (जितना मोटा तार, उतना कम प्रतिरोध)।

    R = {1}/{A}

    चालक की प्रकृति (rho): प्रतिरोध चालक के पदार्थ पर निर्भर करता है, जिसे विशिष्ट प्रतिरोध या प्रतिरोधकता (rho) कहते हैं। (जैसे, तांबे का प्रतिरोध एल्युमीनियम से कम होता है)।

    तापमान: सामान्यतः धात्विक चालकों का प्रतिरोध तापमान बढ़ने पर बढ़ता है।

    इन कारकों को मिलाकर गणितीय सूत्र यह है:

    R = rho {l}/{A}



    विद्युत प्रतिबाधा (Electrical Impedance)

    विद्युत प्रतिबाधा (Z) एक व्यापक और महत्वपूर्ण अवधारणा है जिसका उपयोग मुख्य रूप से प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - AC) परिपथों में किया जाता है।

    ​यह AC परिपथ में धारा के प्रवाह के कुल विरोध को दर्शाती है। प्रतिबाधा (Z) में केवल प्रतिरोध (R) ही शामिल नहीं होता, बल्कि यह प्रतिरोध और प्रतिघात (Reactance - X) के संयुक्त प्रभाव को प्रदर्शित करती है।

    प्रतिबाधा के घटक

    ​प्रतिबाधा (Z) दो मुख्य घटकों से मिलकर बनी होती है:

    ​1. प्रतिरोध (Resistance - R)

    • ​यह AC या DC दोनों परिपथों में धारा के प्रवाह का विरोध करता है।
    • ​यह ऊर्जा को ऊष्मा (Heat) के रूप में नष्ट करता है।
    • ​यह AC आवृत्ति पर सैद्धांतिक रूप से निर्भर नहीं करता।

    ​2. प्रतिघात (Reactance - X)

    • ​यह केवल AC परिपथों में ही प्रभावी होता है और ऊर्जा को भंडारित (store) करता है, नष्ट नहीं करता।
    • ​यह प्रेरक (Inductors) और संधारित्र (Capacitors) जैसे ऊर्जा-भंडारण तत्वों के कारण होता है।
    • ​यह AC की आवृत्ति (Frequency) पर निर्भर करता है।

    प्रतिघात दो प्रकार का होता है:

    • प्रेरकीय प्रतिघात (X_L): प्रेरक (Inductor) के कारण। X_L = 2 pi f L
    • धारितीय प्रतिघात (X_C): संधारित्र (Capacitor) के कारण। X_C = {1}/{2 pi f C}

    प्रतिबाधा का सूत्र

    ​प्रतिबाधा (Z) को प्रतिरोध (R) और शुद्ध प्रतिघात (X) के सदिश योग (Vector Sum) के रूप में परिभाषित किया जाता है, क्योंकि प्रतिरोध और प्रतिघात के प्रभाव एक-दूसरे से 90^\circ के कोण पर होते हैं।

    गणितीय सूत्र:

    Z = sqrt{R^2 + X^2}


    जहां X = X_L - X_C

    समिश्र संख्या (Complex Number) रूप:

    Z = R + jX


    (जहां j काल्पनिक इकाई है, जो यह दर्शाती है कि प्रतिघात का प्रभाव प्रतिरोध से 90^ circ आगे है)

    मात्रक और प्रदर्शन

    • SI मात्रक: प्रतिरोध की तरह, प्रतिबाधा का मात्रक भी ओम (Omega) होता है।
    • कला कोण (Phase Angle - phi): प्रतिबाधा केवल विरोध का परिमाण (magnitude) ही नहीं बताती, बल्कि यह भी बताती है कि वोल्टेज और धारा के बीच कितना कला कोण (phase difference) है।





    प्रतिघात (Reactance - X) क्या है?

    प्रतिघात (X) वह विरोधी गुण है जो केवल प्रेरक (X_L) और संधारित्र (X_C) जैसे ऊर्जा-भंडारण (energy-storing) तत्वों द्वारा AC धारा के प्रवाह में डाला जाता है।

    • ​प्रतिघात ऊर्जा को ऊष्मा में नष्ट नहीं करता, बल्कि ऊर्जा को विद्युत या चुंबकीय क्षेत्र के रूप में संग्रहीत करता है और फिर उसे परिपथ में वापस कर देता है।
    • ​यह धारा और वोल्टेज के बीच कला कोण (Phase Angle) परिवर्तन का कारण बनता है।





    प्रकाश पर निर्भर प्रतिरोधक (LDR) क्या है?

    प्रकाश पर निर्भर प्रतिरोधक (Light Dependent Resistor - LDR), जिसे फोटोरेज़िस्टर (Photoresistor) भी कहा जाता है, एक निष्क्रिय इलेक्ट्रॉनिक घटक (passive electronic component) है जिसका प्रतिरोध उस पर पड़ने वाले प्रकाश की तीव्रता के अनुसार बदलता रहता है।

    ​यह एक प्रकार का अर्धचालक (Semiconductor) उपकरण है जो मुख्य रूप से कैडमियम सल्फाइड (Cadmium Sulphide - CdS) जैसे प्रकाश-संवेदी पदार्थ से बना होता है।

    कार्य सिद्धांत (Working Principle)

    ​LDR का कार्य सिद्धांत फोटोकंडक्टिविटी (Photoconductivity) पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि यह प्रकाश की ऊर्जा को अवशोषित करके अपनी विद्युत चालकता को बढ़ाता है।

    1. अंधेरे की स्थिति में (Low Light/Darkness):
      • ​जब LDR पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता, तो इलेक्ट्रॉनों को मुक्त करने के लिए कोई बाहरी ऊर्जा नहीं होती।
      • ​इस स्थिति में, LDR एक उच्च प्रतिरोधक (High Resistance) के रूप में कार्य करता है, जिसका मान मेगाओम (M Omega) तक हो सकता है। यह धारा के प्रवाह का अधिक विरोध करता है।
    2. प्रकाश की उपस्थिति में (High Light Intensity):
      • ​जब प्रकाश (फोटॉन) LDR की सतह पर पड़ता है, तो फोटॉन की ऊर्जा अर्धचालक पदार्थ को अवशोषित करती है।
      • ​यह ऊर्जा वैलेंस बैंड (Valence Band) से इलेक्ट्रॉनों को मुक्त करके चालन बैंड (Conduction Band) में भेजती है, जिससे इलेक्ट्रॉन-होल जोड़े बनते हैं।
      • ​इन मुक्त इलेक्ट्रॉनों (Free Electrons) की संख्या बढ़ने से चालक की चालकता (Conductivity) बहुत बढ़ जाती है।
      • ​परिणामस्वरूप, LDR का प्रतिरोध तेज़ी से कम हो जाता है, जिसका मान कुछ सौ ओम (\Omega) तक गिर सकता है।

    संक्षेप में:

    • अधिक प्रकाश कम प्रतिरोध
    • कम प्रकाश अधिक प्रतिरोध

    अनुप्रयोग (Applications)

    ​LDR अपनी प्रकाश संवेदनशीलता के कारण विभिन्न स्वचालन (Automation) और नियंत्रण प्रणालियों में उपयोग किए जाते हैं:

    • स्वचालित स्ट्रीट लाइट (Automatic Street Lights): शाम होते ही लाइट को चालू करना और सुबह होते ही बंद करना।
    • प्रकाश संवेदन डिटेक्टर (Light Sensing Detectors): कैमरा लाइट मीटर, डार्क सेंसर सर्किट।
    • सुरक्षा अलार्म सिस्टम (Security Alarm Systems): जब कोई व्यक्ति प्रकाश की किरण को काटता है तो अलार्म ट्रिगर करना।
    • डिमर सर्किट: टीवी स्क्रीन की चमक को परिवेशी प्रकाश के अनुसार समायोजित करना।






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