अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर ( Difference between Earthing and Neutral )
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एक आदर्श स्ट्रिंग में,
प्रत्येक इंसुलेटर पर वोल्टेज समान रूप से वितरित होता है, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता। यह दक्षता कई कारकों पर निर्भर करती है,
जैसे कि इंसुलेटर के बीच की धारिता और लाइन कंडक्टर और टावर के बीच की धारिता।
स्ट्रिंग दक्षता को प्रभावित करने वाले कारक कंडक्टर और टावर के बीच धारिता (C_m): इसे शंट कैपेसिटेंस (shunt capacitance) भी कहते हैं। यह मुख्य इंसुलेटर कैपेसिटेंस (C) के साथ समानांतर (parallel) में होता है।
इस धारिता के कारण ही स्ट्रिंग के पास वाले इंसुलेटर पर अधिक वोल्टेज आता है, जिससे दक्षता घटती है।
इंसुलेटर के बीच की धारिता (C): यह एक आदर्श इंसुलेटर में समान होनी चाहिए।
इंसुलेटर की संख्या: स्ट्रिंग में जितने अधिक इंसुलेटर होंगे, शंट कैपेसिटेंस का प्रभाव उतना ही अधिक होगा और दक्षता उतनी ही कम होगी।
स्ट्रिंग की लंबाई: स्ट्रिंग की लंबाई बढ़ने से भी धारिता का प्रभाव बढ़ता है।
स्ट्रिंग दक्षता का सूत्र स्ट्रिंग दक्षता को निम्न सूत्र से दर्शाया जाता है:
{स्ट्रिंग दक्षता} = {स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज}{इंसुलेटरों की संख्या}{सबसे निचले इंसुलेटर के पार वोल्टेज}× 100%
इस सूत्र में,
सबसे निचले इंसुलेटर पर वोल्टेज सबसे अधिक होता है, क्योंकि यह कंडक्टर के सबसे करीब होता है और शंट कैपेसिटेंस का प्रभाव इस पर सबसे ज्यादा होता है।
स्ट्रिंग दक्षता को बेहतर बनाने के उपाय गार्ड रिंग (Guard Ring) या ग्रेडिंग रिंग (Grading Ring) का उपयोग: यह एक धातु की रिंग होती है जिसे निचले इंसुलेटर के चारों ओर लगाया जाता है। यह इंसुलेटर और टावर के बीच शंट कैपेसिटेंस को कम करके वोल्टेज को समान रूप से वितरित करने में मदद करती है।
श्रेणीबद्ध इंसुलेटर (Grading Insulators): इस विधि में, विभिन्न धारिता (capacitance) वाले इंसुलेटर का उपयोग किया जाता है। निचले इंसुलेटर, जो कंडक्टर के पास होते हैं, की धारिता सबसे अधिक होती है, और ऊपरी इंसुलेटर की धारिता सबसे कम होती है। यह वोल्टेज को समान रूप से वितरित करने में मदद करता है।
इंसुलेटरों के बीच की दूरी बढ़ाना: इंसुलेटरों के बीच की दूरी बढ़ाने से शंट कैपेसिटेंस का प्रभाव कम होता है, जिससे दक्षता में सुधार होता है।
विद्युत प्रणालियों में स्ट्रिंग दक्षता का सूत्र इस प्रकार है: {स्ट्रिंग दक्षता} = {स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज}{इंसुलेटरों की संख्या} {सबसे निचले इंसुलेटर के पार वोल्टेज}×100%
इस सूत्र में,
स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज इंसुलेटर स्ट्रिंग के दोनों सिरों के बीच का कुल वोल्टेज है। इंसुलेटरों की संख्या स्ट्रिंग में लगे इंसुलेटर डिस्क की कुल संख्या है। सबसे निचले इंसुलेटर के पार वोल्टेज उस इंसुलेटर पर मापा गया वोल्टेज है जो लाइन कंडक्टर के सबसे करीब होता है।
इस सूत्र में,
सबसे निचले इंसुलेटर पर वोल्टेज सबसे अधिक होता है क्योंकि यह शंट कैपेसिटेंस (shunt capacitance) के कारण कंडक्टर के सबसे पास होता है, जिससे स्ट्रिंग दक्षता 100% से कम हो जाती है।
यह एक तुलनात्मक माप है जो बताता है कि स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज, आदर्श वोल्टेज वितरण की तुलना में कितना है।
प्रमुख कारण:
चूंकि स्ट्रिंग दक्षता,
आदर्श स्थिति (100%) से हमेशा कम होती है, प्रतिशत में इसे व्यक्त करना इसके प्रदर्शन में कमी को मात्रात्मक रूप से दर्शाने का एक प्रभावी तरीका है।
यदि स्ट्रिंग दक्षता कम होती है, तो कंडक्टर के सबसे पास वाले इंसुलेटर पर सबसे अधिक वोल्टेज स्ट्रेस पड़ता है। यह अतिरिक्त तनाव उस इंसुलेटर के पंचर या फ्लैशओवर का कारण बन सकता है, जिससे पूरी स्ट्रिंग विफल हो सकती है। उच्च दक्षता यह सुनिश्चित करती है कि वोल्टेज समान रूप से वितरित हो, जिससे किसी भी एक इंसुलेटर पर अत्यधिक तनाव नहीं पड़ता।
जब एक इंसुलेटर विफल होता है, तो इससे लाइन ट्रिप हो सकती है और बिजली आपूर्ति बाधित हो सकती है। उच्च स्ट्रिंग दक्षता लाइनों की स्थिरता को बढ़ाती है, जिससे व्यवधानों की संभावना कम हो जाती है और बिजली ग्रिड की विश्वसनीयता बनी रहती है।
इंसुलेटर की विफलता के कारण होने वाली मरम्मत और प्रतिस्थापन महंगी होती है। उच्च दक्षता वाली स्ट्रिंग्स के साथ, इंसुलेटर के जीवनकाल में वृद्धि होती है, जिससे बार-बार रखरखाव की आवश्यकता कम हो जाती है और संचालन लागत में बचत होती है।
किसी भी विद्युत प्रणाली में, सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। जब एक इंसुलेटर पर अत्यधिक वोल्टेज स्ट्रेस होता है, तो यह कर्मियों और उपकरणों के लिए खतरा पैदा कर सकता है। स्ट्रिंग दक्षता में सुधार करके, इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।
संक्षेप में,
स्ट्रिंग दक्षता एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है जो यह निर्धारित करता है कि एक इंसुलेटर स्ट्रिंग कितनी कुशलता से और सुरक्षित रूप से कार्य करती है। एक उच्च दक्षता वाली स्ट्रिंग न केवल विश्वसनीय होती है, बल्कि यह प्रणाली की दीर्घायु और आर्थिक प्रदर्शन में भी योगदान देती है।
1. आपसी धारिता (Mutual Capacitance) प्रत्येक इंसुलेटर डिस्क के चीनी मिट्टी (porcelain) या कांच (glass) वाले हिस्से और उसके दो सिरों पर लगे धातु के हिस्सों के बीच एक धारिता होती है। इसे आपसी धारिता (C) कहते हैं। यह धारिता एक श्रृंखला परिपथ (series circuit) बनाती है, जिससे स्ट्रिंग के माध्यम से धारा प्रवाहित होती है।
2. शंट धारिता (Shunt Capacitance) प्रत्येक इंसुलेटर डिस्क के धातु के हिस्से और टावर के बीच एक दूसरी धारिता बनती है, जिसे शंट धारिता (C\_m) कहते हैं। यह धारिता आपसी धारिता के समानांतर (parallel) में होती है और इसके कारण एक अतिरिक्त धारा प्रवाहित होती है।
असमान वोल्टेज वितरण का कारण जब एक उच्च वोल्टेज कंडक्टर से धारा प्रवाहित होती है, तो यह धारा आपसी धारिता और शंट धारिता दोनों से होकर गुजरती है। शंट धारिता टावर के पास ग्राउंड होने के कारण, धारा का एक हिस्सा हर इंसुलेटर डिस्क के धातु के हिस्से से टावर की ओर चला जाता है।
इसका परिणाम यह होता है कि: सबसे निचले इंसुलेटर डिस्क (कंडक्टर के सबसे पास) पर सबसे अधिक वोल्टेज स्ट्रेस पड़ता है।
जैसे-जैसे हम टावर की ओर बढ़ते हैं,
प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज स्ट्रेस धीरे-धीरे कम होता जाता है। इस असमान वोल्टेज वितरण के कारण ही स्ट्रिंग दक्षता 100% से कम होती है, क्योंकि आदर्श स्थिति में सभी डिस्क पर वोल्टेज बराबर होना चाहिए।
एक इंसुलेटर स्ट्रिंग में, दो तरह की धारिताएँ (capacitances) काम करती हैं:
आपसी धारिता (Mutual Capacitance): यह प्रत्येक इंसुलेटर डिस्क के चीनी मिट्टी या कांच वाले हिस्से के कारण होती है। यह धारिता (C) एक श्रृंखला परिपथ बनाती है, और यदि केवल यही धारिता होती, तो वोल्टेज समान रूप से वितरित होता।
शंट धारिता (Shunt Capacitance): यह प्रत्येक इंसुलेटर डिस्क के धातु के हिस्से और टावर के बीच मौजूद होती है। इसे स्ट्रे धारिता (stray capacitance) भी कहते हैं।
यह धारिता (C_m) ग्राउंड (टावर) से जुड़ी होने के कारण, समानांतर में होती है। असमान वितरण का तंत्र जब लाइन कंडक्टर से धारा प्रवाहित होती है, तो यह दोनों धारिताओं में विभाजित हो जाती है।
शंट धारिता (C_m) के माध्यम से धारा का एक हिस्सा हर डिस्क के धातु के हिस्से से टावर की ओर प्रवाहित होने लगता है। यह अतिरिक्त धारा कंडक्टर के सबसे पास वाले इंसुलेटर से होकर गुजरती है, जिससे उस पर वोल्टेज स्ट्रेस सबसे अधिक होता है।
जैसे-जैसे धारा स्ट्रिंग में ऊपर की ओर जाती है, शंट धारिता के कारण धारा का मान धीरे-धीरे कम होता जाता है।
इस कारण,
सबसे निचले इंसुलेटर पर वोल्टेज सबसे अधिक होता है, और सबसे ऊपर वाले इंसुलेटर (टावर के पास) पर वोल्टेज सबसे कम होता है। यह असमान वोल्टेज वितरण ही स्ट्रिंग दक्षता को 100% से कम कर देता है और इंसुलेटर की विफलता का मुख्य कारण बनता है।
असमान वोल्टेज वितरण के कारण, कंडक्टर के सबसे पास वाले इंसुलेटर पर अत्यधिक विद्युत तनाव (electrical stress) पड़ता है। यह अतिरिक्त तनाव उस इंसुलेटर को समय से पहले पंचर (अंदर से क्षतिग्रस्त) कर सकता है या उसकी सतह पर फ्लैशओवर (हवा के माध्यम से उच्च वोल्टेज का निर्वहन) का कारण बन सकता है। एक भी इंसुलेटर के विफल होने से पूरी स्ट्रिंग विफल हो सकती है, जिससे लाइन ट्रिप हो जाती है।
जब एक इंसुलेटर स्ट्रिंग विफल होती है, तो यह अक्सर लाइन ट्रिपिंग का कारण बनती है, जिससे उस पूरे खंड में बिजली आपूर्ति बाधित हो जाती है। यह ग्रिड की विश्वसनीयता को कम करता है और ग्राहकों के लिए अनियोजित आउटेज का कारण बनता है।
उच्च वोल्टेज स्ट्रेस के कारण, इंसुलेटर की सतह पर कोरोना प्रभाव (हवा का आयनीकरण) बढ़ जाता है। इससे रेडियो हस्तक्षेप (radio interference) होता है, जो संचार प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। यह ऊर्जा का नुकसान भी है, जो प्रणाली की दक्षता को कम करता है।
असमान वोल्टेज वितरण के कारण इंसुलेटर का जीवनकाल कम हो जाता है, जिससे उन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। यह रखरखाव लागत को बढ़ाता है और लाइन के डाउनटाइम (सेवा से बाहर का समय) में वृद्धि करता है।
इन्सुलेटर पर असमान वोल्टेज वितरण का सबसे प्रमुख प्रभाव यह है कि यह प्रणाली की विश्वसनीयता को कम करता है और इंसुलेटर को समय से पहले विफल कर सकता है।
संक्षेप में,
लीकेज करंट इंसुलेटर की सुरक्षात्मक क्षमता को कम करता है और असमान वोल्टेज वितरण को बढ़ाता है, जिससे स्ट्रिंग दक्षता कम हो जाती है और इंसुलेटर की विफलता का खतरा बढ़ जाता है।
स्ट्रिंग दक्षता को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक शंट कैपेसिटेंस है, जिसे "स्ट्रे कैपेसिटेंस" भी कहते हैं। यह इंसुलेटर की धातु फिटिंग्स और टावर के बीच मौजूद होता है।
इंसुलेटर स्ट्रिंग में डिस्क की संख्या भी दक्षता को प्रभावित करती है।
इंसुलेटर की सतह पर धूल, प्रदूषण, और नमी के कारण लीकेज करंट प्रवाहित होता है।
यह प्रभाव मुख्य रूप से शंट कैपेसिटेंस (shunt capacitance) के कारण होता है।
संक्षेप में,
लंबी स्ट्रिंग में वोल्टेज वितरण अधिक असमान हो जाता है, जिससे इसकी दक्षता कम हो जाती है।
संक्षेप में,
पर्यावरणीय परिस्थितियाँ लीकेज करंट को बढ़ाकर स्ट्रिंग की दक्षता को कम करती हैं, जिससे इंसुलेटर की विफलता का खतरा और बिजली आपूर्ति में व्यवधान बढ़ जाता है।
यह असमान वोल्टेज वितरण स्ट्रिंग दक्षता को कम करता है और सबसे निचली डिस्क पर फ्लैशओवर का खतरा पैदा करता है। इस समस्या को हल करने के लिए अक्सर गार्ड रिंग (guard ring) जैसी विधियों का उपयोग किया जाता है।
स्ट्रिंग दक्षता में कमी का मुख्य कारण शंट कैपेसिटेंस (shunt capacitance) है।
इसलिए,
उच्च वोल्टेज के लिए अधिक डिस्क की आवश्यकता होती है, लेकिन इससे प्रत्येक डिस्क का प्रभावी उपयोग कम हो जाता है, जिससे कुल स्ट्रिंग दक्षता में कमी आती है।
सुधार का तंत्र ग्रेडिंग रिंग दो मुख्य तरीकों से स्ट्रिंग दक्षता को बढ़ाती है:
शंट कैपेसिटेंस को बेअसर करना: स्ट्रिंग दक्षता कम होने का मुख्य कारण शंट कैपेसिटेंस (C_m) है, जो इंसुलेटर डिस्क की धातु फिटिंग और टावर के बीच बनता है।
ग्रेडिंग रिंग टावर और अपने बीच एक अतिरिक्त कैपेसिटेंस (C_g) बनाती है, जो शंट कैपेसिटेंस के प्रभाव को संतुलित करती है। यह प्रभावी रूप से वोल्टेज के लिए एक अतिरिक्त पथ प्रदान करती है, जिससे धारा का वितरण अधिक समान हो जाता है।
वोल्टेज का समान वितरण: ग्रेडिंग रिंग इंसुलेटर स्ट्रिंग के चारों ओर विद्युत क्षेत्र (electric field) को फिर से वितरित करती है। यह सबसे निचली डिस्क के पास केंद्रित उच्च वोल्टेज स्ट्रेस को कम करती है।
ऐसा करने से, प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज का मान लगभग समान हो जाता है। जब इंसुलेटर डिस्क पर वोल्टेज का वितरण समान होता है, तो सबसे निचली डिस्क पर वोल्टेज का दबाव कम हो जाता है।
चूँकि स्ट्रिंग दक्षता को कुल वोल्टेज और सबसे निचली डिस्क पर वोल्टेज के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है, इस प्रक्रिया से दक्षता में सुधार होता है और फ्लैशओवर (flashover) का जोखिम कम हो जाता है।
जब उच्च वोल्टेज कंडक्टरों या उनके पास की नुकीली सतहों (जैसे कि इंसुलेटर क्लैंप) पर विद्युत क्षेत्र बहुत तीव्र हो जाता है, तो यह आस-पास की हवा को आयनित (ionize) कर देता है, जिससे एक नीली-बैंगनी चमक दिखाई देती है, जिसे कोरोना डिस्चार्ज कहते हैं। यह ऊर्जा का नुकसान, रेडियो हस्तक्षेप और उपकरण को नुकसान पहुँचाता है।
कोरोना रिंग इस समस्या को निम्नलिखित तरीके से हल करती है:
इस प्रकार,
कोरोना रिंग केवल ऊर्जा की हानि को ही नहीं रोकती बल्कि इंसुलेटर स्ट्रिंग की विश्वसनीयता और जीवनकाल को भी बढ़ाती है।
इस प्रकार,
सही फिटिंग व्यवस्था और सहायक उपकरणों का उपयोग करके वोल्टेज वितरण को नियंत्रित और बेहतर बनाया जा सकता है।
1. पोर्सिलेन (Porcelain)
2. टेम्पर्ड ग्लास (Tempered Glass)
3. सिलिकॉन रबर (सिलिकॉन कंपोजिट पॉलीमर)
इसलिए,
स्ट्रिंग दक्षता में सुधार के लिए सिलिकॉन कंपोजिट पॉलीमर इंसुलेटर सबसे अच्छे माने जाते हैं, क्योंकि वे लीकेज करंट और फ्लैशओवर को कम करने में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।
क्रीपेज दूरी वह सबसे छोटी दूरी है जो एक इंसुलेटर की सतह पर, ऊर्जावान भाग (जैसे कंडक्टर) और ग्राउंड किए गए भाग (जैसे टावर) के बीच मापी जाती है। इसे इंसुलेटर पर बनी लहरदार या घुमावदार संरचनाओं (sheds या skirts) के साथ मापा जाता है।
इस प्रकार,
क्रीपेज दूरी बढ़ाकर, इंसुलेटर की सतह के प्रतिरोध को बढ़ाया जाता है, जिससे लीकेज करंट कम होता है और स्ट्रिंग दक्षता में सुधार होता है।
1. परिभाषा स्ट्रिंग दक्षता, इंसुलेटर स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज और एक आदर्श स्थिति में कुल वोल्टेज का अनुपात है। एक आदर्श स्ट्रिंग वह होती है जिसमें प्रत्येक इंसुलेटर डिस्क पर वोल्टेज समान रूप से वितरित होता है।
2. सूत्रों का व्युत्पन्न आइए निम्नलिखित चर (variables) को परिभाषित करें:
V_s = स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज
n = इंसुलेटर डिस्क की संख्या
V_1 = कंडक्टर के सबसे पास वाली डिस्क पर वोल्टेज (जो सबसे अधिक होता है)
V_2, V_3, ..., V_n = क्रमशः अन्य डिस्क पर वोल्टेज चरण
1: वास्तविक वोल्टेज स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज सभी व्यक्तिगत डिस्क वोल्टेज का योग होता है।
V_s = V_1 + V_2 + V_3 + ... + V_n चरण
2: आदर्श वोल्टेज एक आदर्श स्ट्रिंग में, प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज समान होगा। सबसे अधिक वोल्टेज वाली डिस्क V_1 होने के कारण, आदर्श स्थिति में सभी n डिस्क पर वोल्टेज V_1 के बराबर होना चाहिए।
इस प्रकार, आदर्श कुल वोल्टेज होगा:
{आदर्श कुल वोल्टेज} = n × V_1 चरण
3: दक्षता सूत्र स्ट्रिंग दक्षता को वास्तविक कुल वोल्टेज और आदर्श कुल वोल्टेज के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है: = {{वास्तविक कुल वोल्टेज}}{{आदर्श कुल वोल्टेज}} × 100% ऊपर दिए गए मानों को सूत्र में रखने पर,
हमें मिलता है: = {V_s}{n×V_1} ×100% या,
व्यक्तिगत डिस्क वोल्टेज के संदर्भ में: = {V_1 + V_2 + V_3 + ... + V_n}× V_1} ×100% यह सूत्र दर्शाता है कि यदि सभी डिस्क पर वोल्टेज समान होता (V_1 = V_2 = ... = V_n), तो स्ट्रिंग दक्षता 100% होती। लेकिन चूंकि V_1 सबसे बड़ा होता है, इसलिए दक्षता हमेशा 100% से कम होती है।
यह सूत्र स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज और एक आदर्श स्थिति में कुल वोल्टेज का अनुपात देता है।
गणना विधि व्यक्तिगत वोल्टेज बूंदों का योग: सबसे पहले, आपको स्ट्रिंग में प्रत्येक व्यक्तिगत डिस्क पर वोल्टेज की बूंदों (V_1, V_2, ..., V_n) को मापना होगा और उनका योग करके स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज (V_s) प्राप्त करना होगा।
V_s = V_1 + V_2 + V_3 + ... + V_n सूत्र का अनुप्रयोग: इसके बाद, आप स्ट्रिंग दक्षता की गणना के लिए निम्नलिखित सूत्र का उपयोग करेंगे:
\eta = {स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज}}{{(डिस्क की संख्या) } ×{(कंडक्टर के पास वाली डिस्क पर वोल्टेज)}}× 100\% प्रतीकों में, यह सूत्र है: = {V_s}{n×V_1} ×100%
यहां, n स्ट्रिंग में इंसुलेटर डिस्क की कुल संख्या है।
V_1 वह वोल्टेज है जो कंडक्टर के सबसे पास वाली डिस्क पर है, क्योंकि यह सबसे अधिक वोल्टेज वाली डिस्क होती है।
V_s स्ट्रिंग के सभी व्यक्तिगत वोल्टेज बूंदों का योग है।
यह सूत्र दर्शाता है कि आदर्श दक्षता (100%) तभी प्राप्त होती है जब प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज समान रूप से वितरित हो।
चूंकि असमान वोल्टेज बूंदों में V_1 सबसे बड़ा होता है, इसलिए दक्षता हमेशा 100% से कम होती है।
आपको निम्न सूत्र का उपयोग करना होगा: स्ट्रिंग दक्षता (%) = {कुल लागू वोल्टेज}{n×डिस्क वोल्टेज}×100
जहाँ: कुल लागू वोल्टेज - यह इंसुलेटर स्ट्रिंग के पार कुल वोल्टेज है। डिस्क वोल्टेज - यह स्ट्रिंग में किसी एक डिस्क के पार वोल्टेज है। n - स्ट्रिंग में डिस्क की संख्या।
यह सूत्र इस तथ्य पर आधारित है कि एक आदर्श स्ट्रिंग में, प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज समान होना चाहिए, और कुल लागू वोल्टेज केवल डिस्क वोल्टेज का योग होना चाहिए (n × डिस्क वोल्टेज)।
हालांकि, व्यवहार में, स्ट्रिंग के विभिन्न बिंदुओं पर कैपेसिटेंस में भिन्नता के कारण वोल्टेज समान रूप से वितरित नहीं होता है। स्ट्रिंग दक्षता यह दिखाती है कि वास्तविक वोल्टेज वितरण आदर्श वितरण के कितना करीब है।
स्ट्रिंग दक्षता को प्रभावित करने वाले कारक स्ट्रिंग दक्षता कई कारकों से प्रभावित होती है,
जिनमें शामिल हैं:
स्ट्रिंग में डिस्क की संख्या (n): जैसे-जैसे n बढ़ता है, स्ट्रिंग दक्षता कम होती जाती है।
डिस्क के स्व-कैपेसिटेंस (C): उच्च स्व-कैपेसिटेंस से बेहतर दक्षता मिलती है।
शंट कैपेसिटेंस (Cₛ): यह मुख्य रूप से टावर के कारण होता है और यह दक्षता को कम करता है।
आर्द्र मौसम: आर्द्र मौसम में शंट कैपेसिटेंस बढ़ जाता है, जिससे दक्षता कम हो जाती है।
समस्या: एक 220 kV ट्रांसमिशन लाइन पर, एक स्ट्रिंग में 8 डिस्क इंसुलेटर लगे हैं। स्ट्रिंग के पार कुल लागू वोल्टेज 220 kV है, और सबसे नीचे वाली डिस्क (जो कंडक्टर के पास है) का वोल्टेज 30 kV है।
यदि प्रत्येक डिस्क का स्व-कैपेसिटेंस (C) और शंट कैपेसिटेंस (C_s) के बीच का अनुपात k = {C_s}{C} = 0.2 है, तो स्ट्रिंग दक्षता की गणना करें।
समस्या का हल चरण 1: स्ट्रिंग दक्षता के लिए सूत्र का उपयोग करें स्ट्रिंग दक्षता की गणना के लिए हम निम्न सूत्र का उपयोग करते हैं: स्ट्रिंग दक्षता (%) = {कुल लागू वोल्टेज}{n× डिस्क वोल्टेज}×100
जहाँ:
कुल लागू वोल्टेज = 220 kV
n = स्ट्रिंग में डिस्क की संख्या = 8 डिस्क वोल्टेज = सबसे नीचे वाली डिस्क का वोल्टेज = 30 kV
चरण 2: मानों को सूत्र में रखें अब हम इन मानों को सूत्र में रखते हैं:
स्ट्रिंग दक्षता (%) = {220 { kV}}{8×30 { kV}}× 100 स्ट्रिंग दक्षता (%) = {220}{240}×100 स्ट्रिंग दक्षता (%) = 0.9167 ×100 स्ट्रिंग दक्षता (%) = 91.67%
इस प्रकार, इस ट्रांसमिशन लाइन की स्ट्रिंग दक्षता लगभग 91.67% है।
नोट:
इस समस्या में, शंट कैपेसिटेंस अनुपात (k = 0.2) केवल अतिरिक्त जानकारी के लिए दिया गया था और दक्षता की गणना के लिए सीधे तौर पर इसका उपयोग नहीं हुआ, क्योंकि हमें पहले से ही डिस्क वोल्टेज और कुल लागू वोल्टेज ज्ञात थे। यदि हमें केवल डिस्क की संख्या और k का मान पता होता, तो हमें प्रत्येक डिस्क के वोल्टेज की गणना करनी पड़ती।
एक उच्च वोल्टेज लाइन में, स्ट्रिंग दक्षता आमतौर पर 70% से 95% की सीमा में हो सकती है।
स्ट्रिंग दक्षता एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है जो यह दर्शाता है कि इंसुलेटर स्ट्रिंग में वोल्टेज कितना समान रूप से वितरित है। दक्षता जितनी अधिक होगी, वोल्टेज वितरण उतना ही अधिक समान होगा, और सबसे नीचे वाली डिस्क (जो कंडक्टर के सबसे करीब है) पर तनाव उतना ही कम होगा।
कम दक्षता का मतलब है कि सबसे निचली डिस्क पर अत्यधिक वोल्टेज तनाव है, जिससे उसके खराब होने या फ्लैशओवर होने का खतरा बढ़ जाता है। स्ट्रिंग दक्षता को प्रभावित करने वाले कारक स्ट्रिंग दक्षता को कई कारक प्रभावित करते हैं,
जिनमें से मुख्य हैं:
स्ट्रिंग में डिस्क की संख्या (n): डिस्क की संख्या बढ़ने से शंट कैपेसिटेंस का प्रभाव बढ़ता है, जिससे वोल्टेज वितरण असमान हो जाता है और दक्षता कम हो जाती है।
शंट कैपेसिटेंस (C_s): यह टावर और कंडक्टर के बीच मौजूद कैपेसिटेंस है। शंट कैपेसिटेंस जितना अधिक होगा, दक्षता उतनी ही कम होगी।
स्व-कैपेसिटेंस (C): यह प्रत्येक इंसुलेटर डिस्क का अपना कैपेसिटेंस है। स्व-कैपेसिटेंस जितना अधिक होगा, दक्षता उतनी ही बेहतर होगी।
आर्द्र मौसम और प्रदूषण: नमी और प्रदूषण से शंट कैपेसिटेंस बढ़ जाता है, जिससे दक्षता घट जाती है। दक्षता बढ़ाने के तरीके इंजीनियरिंग में, स्ट्रिंग दक्षता को 100% के करीब लाने के लिए कई तरीकों का उपयोग किया जाता है:
ग्रेडिंग (Grading): प्रत्येक डिस्क के कैपेसिटेंस को अलग-अलग करके वोल्टेज वितरण को समान किया जाता है।
गार्ड रिंग (Guard Ring) या कोरोना रिंग (Corona Ring): ये कंडक्टर के पास लगे धातु के छल्ले होते हैं जो शंट कैपेसिटेंस को संतुलित करते हैं और वोल्टेज को समान रूप से वितरित करने में मदद करते हैं।
लंबे क्रॉस-आर्म का उपयोग: टावर और कंडक्टर के बीच की दूरी को बढ़ाकर शंट कैपेसिटेंस को कम किया जाता है। ये तरीके यह सुनिश्चित करते हैं कि इंसुलेटर स्ट्रिंग की विश्वसनीयता और सुरक्षा बनी रहे, खासकर उच्च वोल्टेज वाली लाइनों में।
एक आदर्श इंसुलेटर स्ट्रिंग में, प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज समान रूप से वितरित होना चाहिए, जिससे दक्षता 100% हो। हालांकि, व्यवहार में, शंट कैपेसिटेंस (टावर और कंडक्टर के कारण) और स्व-कैपेसिटेंस (प्रत्येक डिस्क का) के कारण ऐसा नहीं होता। ये कैपेसिटेंस समानांतर में काम करते हैं, जिससे स्ट्रिंग के सबसे नीचे वाली डिस्क, जो कंडक्टर के सबसे करीब होती है, पर सबसे अधिक वोल्टेज पड़ता है।
कम स्ट्रिंग दक्षता का अर्थ है कि यह वोल्टेज वितरण असमान है। जितनी कम दक्षता होगी, उतनी ही अधिक असमानता होगी और नीचे की डिस्क पर तनाव उतना ही अधिक होगा।
यह स्थिति न केवल बिजली की आपूर्ति को बाधित करती है बल्कि इंसुलेटर को भी नुकसान पहुंचा सकती है। फ्लैशओवर को रोकने के लिए, उच्च वोल्टेज लाइनों में स्ट्रिंग दक्षता को अधिकतम करने के लिए गार्ड रिंग जैसे उपाय किए जाते हैं, जो वोल्टेज को अधिक समान रूप से वितरित करने में मदद करते हैं।
इसे दो मुख्य तरीकों से किया जाता है:
प्रयोगशाला परीक्षण और क्षेत्रीय/ऑनलाइन निगरानी।
प्रयोगशाला में, इंसुलेटर स्ट्रिंग के नमूनों पर विभिन्न परीक्षण किए जाते हैं ताकि उनकी स्ट्रिंग दक्षता और अन्य गुणों की जांच की जा सके। यह आमतौर पर निर्माण के बाद या आवधिक निरीक्षण के दौरान किया जाता है।
उच्च वोल्टेज लाइनों पर, इंसुलेटर स्ट्रिंग की स्थिति की निरंतर निगरानी करना आवश्यक है ताकि संभावित विफलताओं को समय से पहले पहचाना जा सके।
इन सभी तरीकों से प्राप्त डेटा का विश्लेषण करके स्ट्रिंग दक्षता की स्थिति का आकलन किया जाता है और यदि आवश्यक हो, तो इंसुलेटर स्ट्रिंग को बदलने या उसकी मरम्मत करने का निर्णय लिया जाता है।
स्ट्रिंग दक्षता क्या है?
स्ट्रिंग दक्षता (String Efficiency), जिसे श्रृंखला दक्षता भी कहा जाता है, यह बताती है कि एक इंसुलेटर स्ट्रिंग पर वोल्टेज का वितरण कितना समान है। आदर्श रूप से, इंसुलेटर स्ट्रिंग के प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज समान होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता है। स्ट्रिंग दक्षता का मान 100% से कम होता है क्योंकि सबसे निचली डिस्क (जो कंडक्टर के सबसे करीब होती है) पर सबसे अधिक वोल्टेज होता है। उच्च स्ट्रिंग दक्षता का मतलब है कि इंसुलेटर स्ट्रिंग पर वोल्टेज का वितरण अधिक समान है।
उदाहरण समस्या एक 3-यूनिट इंसुलेटर स्ट्रिंग को 66 kV, 50 Hz की 3-फेज ट्रांसमिशन लाइन से जोड़ा गया है। यदि प्रत्येक डिस्क की स्व-धारिता (self-capacitance) C है और शंट धारिता (shunt capacitance) C_1 है, और C_1 = 0.1C है, तो स्ट्रिंग दक्षता की गणना करें। समस्या का हल इस समस्या को हल करने के लिए, हम सबसे पहले प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज की गणना करेंगे और फिर स्ट्रिंग दक्षता के सूत्र का उपयोग करेंगे।
चरण 1: इंसुलेटर स्ट्रिंग का आरेख ऊपर दिए गए चित्र में, V_1, V_2, और V_3 क्रमशः सबसे ऊपर, बीच और सबसे नीचे की डिस्क पर वोल्टेज हैं। V स्ट्रिंग पर कुल वोल्टेज है।
चरण 2: प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज की गणना हम किरचॉफ के धारा नियम (Kirchhoff’s Current Law) का उपयोग करके प्रत्येक नोड (जंक्शन) पर वोल्टेज की गणना करेंगे। मान लीजिए, I_1, I_2, और I_3 डिस्क के माध्यम से बहने वाली धाराएँ हैं, और I_{c1} और I_{c2} शंट धारिता के माध्यम से बहने वाली धाराएँ हैं।
सबसे निचले नोड पर (कंडक्टर के पास): I_3 = I_2 + I_{c2} \omega C V_3 = \omega C V_2 + \omega C_1 V_2 C V_3 = C V_2 + C_1 V_2 V_3 = V_2 + \frac{C_1}{C} V_2 चूंकि \frac{C_1}{C} = 0.1, V_3 = V_2 + 0.1V_2 = 1.1 V_2 ...(1) बीच के नोड पर: I_2 = I_1 + I_{c1} \omega C V_2 = \omega C V_1 + \omega C_1 (V_1 + V_2) यह गलत है।
सही नियम लागू करते हैं।
सही समीकरण इस प्रकार है: I_2 = I_1 + I_{c1} \omega C V_2 = \omega C V_1 + \omega C_1 V_1 V_2 = V_1 + \frac{C_1}{C} V_1 V_2 = V_1 + 0.1V_1 = 1.1 V_1 ...(2) अब V_1, V_2, V_3 के बीच संबंध स्थापित करते हैं: समीकरण (2) से: V_2 = 1.1 V_1 समीकरण (1) में V_2 का मान रखने पर: V_3 = 1.1 V_2 = 1.1 (1.1 V_1) = 1.21 V_1 कुल वोल्टेज (V) की गणना: V = V_1 + V_2 + V_3 V = V_1 + 1.1 V_1 + 1.21 V_1 V = 3.31 V_1
चरण 3: स्ट्रिंग दक्षता की गणना स्ट्रिंग दक्षता का सूत्र है: स्ट्रिंग दक्षता = {{स्ट्रिंग पर कुल वोल्टेज}}{{डिस्क की संख्या}×{सबसे निचली डिस्क पर वोल्टेज}}×100%
सूत्र में मान रखने पर: स्ट्रिंग दक्षता = {V}{3×V_3}×100% स्ट्रिंग दक्षता = {3.31 V_1}{3×1.21 V_1}×100% स्ट्रिंग दक्षता ={3.31}{3.63}×100% स्ट्रिंग दक्षता ≈ 91.18% परिणाम इस इंसुलेटर स्ट्रिंग की दक्षता 91.18% है।
यह 100% से कम है, जो दर्शाता है कि सबसे निचली डिस्क पर सबसे अधिक वोल्टेज है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि लाइन वोल्टेज (66 kV) का उपयोग इस विशिष्ट गणना में सीधे नहीं किया गया क्योंकि यह अनुपात पर आधारित है।
क्यों 100% दक्षता संभव नहीं है?
स्ट्रिंग दक्षता 100% से कम होने का मुख्य कारण शंट धारिता (Shunt Capacitance) या स्ट्रे धारिता (Stray Capacitance) है। यह धारिता इंसुलेटर के धातु फिटिंग (metal fittings) और टावर के बीच मौजूद होती है। इस धारिता के कारण, इंसुलेटर स्ट्रिंग पर वोल्टेज का वितरण असमान हो जाता है। सबसे निचली डिस्क (जो कंडक्टर के सबसे करीब है) पर वोल्टेज सबसे अधिक होता है, और जैसे-जैसे हम टावर की ओर बढ़ते हैं, वोल्टेज कम होता जाता है।
दक्षता को प्रभावित करने वाले कारक शंट धारिता और स्व-धारिता का अनुपात (K-factor): यह अनुपात (K = C_1/C) जितना कम होगा, स्ट्रिंग दक्षता उतनी ही अधिक होगी।
डिस्कों की संख्या: जैसे-जैसे इंसुलेटर डिस्क की संख्या बढ़ती है, स्ट्रिंग दक्षता घटती जाती है। इसलिए, लंबी स्ट्रिंग की दक्षता कम होती है।
आवृत्ति: उच्च आवृत्ति पर, शंट धारिता का प्रभाव अधिक होता है, जिससे दक्षता कम हो जाती है। दक्षता में सुधार के तरीके स्ट्रिंग दक्षता में सुधार करने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं:
लंबी क्रॉस-आर्म्स का उपयोग: यह शंट धारिता को कम करता है।
गार्ड रिंग या ग्रेडिंग रिंग का उपयोग: यह स्ट्रिंग के सबसे निचले हिस्से पर वोल्टेज को समान रूप से वितरित करता है।
धारिता ग्रेडिंग: स्ट्रिंग में अलग-अलग धारिता वाली डिस्क का उपयोग करना, जिससे वोल्टेज का वितरण अधिक समान हो सके।
कम स्ट्रिंग दक्षता का अर्थ है कि इंसुलेटर स्ट्रिंग के विभिन्न डिस्क पर वोल्टेज का वितरण असमान है। सबसे निचली डिस्क, जो ट्रांसमिशन लाइन कंडक्टर के सबसे करीब होती है, पर सबसे अधिक वोल्टेज स्ट्रेस होता है। यह वोल्टेज स्ट्रिंग में अन्य डिस्क पर वोल्टेज की तुलना में काफी अधिक होता है।
जब सबसे निचली डिस्क पर वोल्टेज सामान्य से बहुत अधिक हो जाता है, तो यह उस डिस्क के आस-पास की हवा की परावैद्युत शक्ति (dielectric strength) को पार कर सकता है। हवा, जो सामान्य रूप से एक उत्कृष्ट इंसुलेटर है, अत्यधिक वोल्टेज के कारण आयनीकृत हो जाती है और एक चालक बन जाती है।
एक बार जब सबसे निचली डिस्क के पास की हवा आयनीकृत हो जाती है, तो यह कंडक्टर से टावर तक एक चालक पथ (conductive path) बना देती है। इस पथ के माध्यम से एक आर्क या स्पार्क उत्पन्न होता है, जिसे फ्लैशओवर कहा जाता है। यह फ्लैशओवर इंसुलेटर की सतह के ऊपर से गुजरता है, जिससे इंसुलेटर को नुकसान नहीं होता है (पंचर के विपरीत), लेकिन यह एक शॉर्ट-सर्किट की स्थिति पैदा करता है।
फ्लैशओवर के कारण होने वाले शॉर्ट-सर्किट से लाइन में भारी मात्रा में धारा प्रवाहित होती है। इससे सर्किट ब्रेकर और रिले जैसी सुरक्षा प्रणालियां ट्रिगर हो सकती हैं, जिससे बिजली आपूर्ति बाधित हो जाती है। यह ट्रांसमिशन लाइन की विश्वसनीयता को कम करता है और रखरखाव लागत को बढ़ाता है।
संक्षेप में,
कम स्ट्रिंग दक्षता के कारण सबसे निचली डिस्क पर अतिरिक्त विद्युत तनाव पड़ता है, जो हवा को आयनीकृत करके फ्लैशओवर का कारण बन सकता है।
सैद्धांतिक गणना (theoretical calculation) और व्यावहारिक परीक्षण (practical testing)। दोनों विधियाँ यह सुनिश्चित करने में मदद करती हैं कि इंसुलेटर स्ट्रिंग सुरक्षित और कुशलता से काम कर रही है।
1. सैद्धांतिक गणना (Theoretical Calculation) सैद्धांतिक रूप से, स्ट्रिंग दक्षता की गणना करने के लिए गणितीय सूत्र का उपयोग किया जाता है।
इसके लिए, हमें इंसुलेटर के स्व-धारिता (self-capacitance) और शंट धारिता (shunt capacitance) के मूल्यों की आवश्यकता होती है।
मूल सिद्धांत: इंसुलेटर स्ट्रिंग को एक तुल्य-परिपथ (equivalent circuit) के रूप में दर्शाया जाता है, जहाँ प्रत्येक डिस्क को एक संधारित्र (C) से और डिस्क तथा टावर के बीच की शंट धारिता (C_1) को एक अन्य संधारित्र से दर्शाया जाता है।
सूत्र: स्ट्रिंग दक्षता की गणना इस सूत्र से की जाती है: {स्ट्रिंग दक्षता} = {स्ट्रिंग पर कुल वोल्टेज}}{{डिस्कों की संख्या}×{सबसे निचली डिस्क पर वोल्टेज}}×100%
लाभ: यह विधि सरल और तेज़ है, और इसका उपयोग डिजाइन चरण में किया जा सकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्ट्रिंग की दक्षता स्वीकार्य सीमा के भीतर है।
सीमाएँ: यह विधि केवल आदर्श परिस्थितियों पर आधारित है और वास्तविक दुनिया की पर्यावरणीय स्थितियों (जैसे आर्द्रता, प्रदूषण, हवा) को ध्यान में नहीं रखती है, जो दक्षता को प्रभावित कर सकती हैं।
2. व्यावहारिक परीक्षण (Practical Testing) वास्तविक क्षेत्र में स्ट्रिंग दक्षता का परीक्षण करने के लिए प्रयोगशाला या साइट पर विशिष्ट उपकरण और तकनीकें उपयोग की जाती हैं। सबसे आम तरीकों में से एक स्फीयर-गैप विधि है।
स्फीयर-गैप विधि: सिद्धांत: इस विधि में, एक कैलिब्रेटेड स्फीयर-गैप (sphere-gap) का उपयोग करके इंसुलेटर स्ट्रिंग के प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज को मापा जाता है।
प्रक्रिया: इंसुलेटर स्ट्रिंग पर एक उच्च वोल्टेज लगाया जाता है। सबसे निचली डिस्क के समानांतर (across) एक स्फीयर-गैप लगाया जाता है। स्फीयर-गैप के बीच की दूरी को तब तक समायोजित किया जाता है जब तक कि एक स्पार्क (flashover) उत्पन्न न हो जाए। इस स्पार्क की दूरी से, कैलिब्रेशन चार्ट का उपयोग करके उस डिस्क पर वोल्टेज का पता लगाया जाता है। यह प्रक्रिया स्ट्रिंग की सभी डिस्क के लिए दोहराई जाती है। एक बार जब प्रत्येक डिस्क पर वोल्टेज का मान ज्ञात हो जाता है, तो स्ट्रिंग दक्षता की गणना व्यावहारिक डेटा का उपयोग करके की जाती है।
इलेक्ट्रिकल टेस्टिंग: उच्च वोल्टेज प्रयोगशालाओं में, इंसुलेटर स्ट्रिंग का प्रदर्शन विभिन्न भारों और पर्यावरणीय स्थितियों के तहत परीक्षण किया जाता है, जैसे कि गीली स्थिति में फ्लैशओवर परीक्षण (wet flashover test) और पंचर परीक्षण (puncture test)। ये परीक्षण यह सुनिश्चित करते हैं कि इंसुलेटर विभिन्न मौसम की स्थितियों में भी प्रभावी ढंग से काम कर सके।
लाभ: व्यावहारिक परीक्षण वास्तविक परिचालन स्थितियों के तहत स्ट्रिंग के प्रदर्शन का सटीक मूल्यांकन प्रदान करता है।
सीमाएँ: ये परीक्षण महंगे और समय लेने वाले होते हैं, और इन्हें नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर, स्ट्रिंग दक्षता की निगरानी और परीक्षण, सैद्धांतिक गणना और व्यावहारिक माप दोनों के संयोजन से किया जाता है।
सैद्धांतिक गणना शुरुआती डिजाइन के लिए उपयोगी होती है, जबकि व्यावहारिक परीक्षण वास्तविक दुनिया की चुनौतियों के तहत इंसुलेटर के प्रदर्शन को सत्यापित करने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
इंसुलेटर स्ट्रिंग का नियमित निरीक्षण, आमतौर पर वर्ष में एक या दो बार, किया जाता है। यह निरीक्षण जमीनी स्तर से या ड्रोन का उपयोग करके किया जा सकता है।
प्रदूषित वातावरण में इंसुलेटर की नियमित सफाई करना उनकी दक्षता बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि निरीक्षण के दौरान कोई डिस्क क्षतिग्रस्त या विफल पाई जाती है, तो उसे तुरंत बदला जाना चाहिए।
इन रखरखाव प्रक्रियाओं को अपनाकर, बिजली कंपनियां यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि ट्रांसमिशन लाइनें सुरक्षित रूप से काम करती रहें और बिजली आपूर्ति में कोई रुकावट न आए।
उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों में, जब विद्युत क्षेत्र की तीव्रता हवा की परावैद्युत शक्ति से अधिक हो जाती है, तो आसपास की हवा आयनीकृत हो जाती है। यह आयनीकरण बैंगनी चमक, हिस्सिंग ध्वनि, और ओजोन गैस के रूप में प्रकट होता है। इस घटना को कोरोना प्रभाव कहते हैं।
कोरोना प्रभाव स्ट्रिंग दक्षता को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करता है क्योंकि स्ट्रिंग दक्षता मुख्य रूप से धारिता (capacitance) के अनुपात पर निर्भर करती है। हालांकि, यह अप्रत्यक्ष रूप से इंसुलेशन के प्रदर्शन को प्रभावित करता है:
संक्षेप में, कोरोना प्रभाव खुद स्ट्रिंग दक्षता को कम नहीं करता है, लेकिन यह इंसुलेटर की सतह को प्रदूषित करके और रिसाव धारा को बढ़ाकर इसके प्रदर्शन को प्रभावित करता है, जिससे स्ट्रिंग की विश्वसनीयता कम हो जाती है और फ्लैशओवर का खतरा बढ़ जाता है।
कोरोना प्रभाव को कम करने के लिए, गार्ड रिंग का उपयोग किया जाता है। यह एक धातु की रिंग होती है जिसे सबसे निचली इंसुलेटर डिस्क के चारों ओर लगाया जाता है। यह रिंग:
गार्ड रिंग का उपयोग करके,
हम न केवल कोरोना प्रभाव को कम कर सकते हैं, बल्कि स्ट्रिंग दक्षता में भी सुधार कर सकते हैं, क्योंकि यह वोल्टेज वितरण को अधिक समान बनाता है।
इंसुलेटर की सतह पर धूल, नमक, नमी और अन्य प्रदूषण के जमा होने से एक प्रवाहकीय पथ (conductive path) बनता है। इस पथ के माध्यम से थोड़ी मात्रा में धारा (जिसे रिसाव धारा कहते हैं) प्रवाहित होती है। इस प्रवाहकीय पथ द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रतिरोध को रिसाव प्रतिरोध कहते हैं। आदर्श रूप से, इंसुलेटर का रिसाव प्रतिरोध अनंत होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में यह बहुत अधिक, पर सीमित होता है।
कम स्ट्रिंग दक्षता का मुख्य कारण इंसुलेटर स्ट्रिंग के विभिन्न डिस्क पर वोल्टेज का असमान वितरण है। यह असमानता शंट धारिता (shunt capacitance) के कारण होती है। जब इंसुलेटर की सतह पर प्रदूषण जमा हो जाता है, तो रिसाव प्रतिरोध कम हो जाता है।
प्रदूषित वातावरण में, इंसुलेटर की सतह पर रिसाव प्रतिरोध कम हो जाता है। यह कम प्रतिरोध रिसाव धारा को बढ़ाकर वोल्टेज वितरण को अधिक असमान बना देता है, जिससे स्ट्रिंग दक्षता में कमी आती है। इसलिए, स्ट्रिंग दक्षता को बनाए रखने के लिए इंसुलेटर की नियमित सफाई (यानी रिसाव प्रतिरोध को अधिकतम करना) एक महत्वपूर्ण रखरखाव प्रक्रिया है।
अकुशल स्ट्रिंग्स में, वोल्टेज का वितरण असमान होता है, जिसमें सबसे निचली डिस्क पर अत्यधिक विद्युत तनाव होता है। यह बढ़ा हुआ तनाव वायु की परावैद्युत शक्ति को पार कर सकता है, जिससे फ्लैशओवर होता है। फ्लैशओवर एक शॉर्ट-सर्किट की तरह काम करता है, जो लाइन में अत्यधिक धारा प्रवाहित करता है। यह ओवरकरंट सुरक्षा प्रणालियों (जैसे रिले और सर्किट ब्रेकर) को ट्रिगर करता है, जिससे लाइन बंद हो जाती है और बिजली आपूर्ति में व्यवधान आता है।
जब एक ट्रांसमिशन लाइन फ्लैशओवर के कारण ट्रिप हो जाती है, तो इससे बिजली आउटेज होता है। ये आउटेज उपभोक्ताओं (घरों, व्यवसायों, उद्योगों) के लिए असुविधाजनक होते हैं और बिजली कंपनियों के लिए राजस्व का नुकसान करते हैं। बार-बार होने वाले आउटेज से ग्रिड की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है और सेवा प्रदाता की प्रतिष्ठा को नुकसान होता है।
फ्लैशओवर के कारण होने वाले उच्च विद्युत आर्क से इंसुलेटर और अन्य लाइन उपकरणों को स्थायी क्षति हो सकती है। यह क्षति उपकरण के जीवनकाल को कम करती है, जिससे बार-बार मरम्मत या प्रतिस्थापन की आवश्यकता होती है। इसके परिणामस्वरूप, रखरखाव और मरम्मत की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, जो अंततः बिजली प्रणाली के संचालन को और महंगा बनाती है।
अकुशल इंसुलेटर स्ट्रिंग्स के कारण होने वाले फ्लैशओवर या उपकरण विफलताओं से श्रमिकों और जनता के लिए सुरक्षा जोखिम भी उत्पन्न हो सकते हैं। एक विफल इंसुलेटर, जो लाइन को जमीन पर गिरा सकता है, एक बहुत गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
संक्षेप में,
अकुशल इंसुलेटर स्ट्रिंग्स से विद्युत प्रणाली की विश्वसनीयता कम हो जाती है क्योंकि वे फ्लैशओवर, आउटेज, उपकरण क्षति और रखरखाव लागत में वृद्धि का कारण बनते हैं। इसलिए, इंसुलेटर स्ट्रिंग्स की दक्षता को बनाए रखना बिजली प्रणाली के सुचारू और विश्वसनीय संचालन के लिए महत्वपूर्ण है।
संक्षेप में,
ग्रेडिंग रिंग का उपयोग करके, हम इंसुलेटर स्ट्रिंग की दक्षता में सुधार कर सकते हैं और विश्वसनीयता बढ़ा सकते हैं, जिससे बिजली प्रणाली का संचालन अधिक सुरक्षित और स्थिर हो जाता है।
एक इंसुलेटर स्ट्रिंग में तीन प्रकार की कैपेसिटेंस होती है:
ये शंट कैपेसिटेंस, मुख्य करंट (main current) को एक अलग मार्ग प्रदान करती हैं, जिसके कारण स्ट्रिंग में वोल्टेज का वितरण असमान हो जाता है।
असमान वोल्टेज वितरण का मुख्य कारण शंट कैपेसिटेंस है। यह कैपेसिटेंस एक करंट को चालक से टॉवर की ओर प्रवाहित करती है। इस कारण, जो करंट प्रत्येक यूनिट से होकर गुजरता है वह अलग-अलग होता है।
इस समस्या को हल करने के लिए, गार्ड रिंग (Guard Ring) या ग्रेडिंग रिंग (Grading Ring) का उपयोग किया जाता है। यह एक धातु की रिंग होती है जो सबसे नीचे वाली इंसुलेटर यूनिट को घेरती है और चालक से जुड़ी होती है। यह शंट कैपेसिटेंस को बदल देती है, जिससे स्ट्रिंग में वोल्टेज का वितरण अधिक समान हो जाता है। इससे स्ट्रिंग की दक्षता भी बढ़ जाती है।
यह आरेख एक इंसुलेटर स्ट्रिंग के दो परिदृश्य (scenarios) दिखाता है:
परिणाम: ग्रेडिंग रिंग के कारण, स्ट्रिंग के सभी इंसुलेटर यूनिट्स पर वोल्टेज का वितरण अधिक समान हो जाता है। यह स्ट्रिंग के सबसे कमजोर हिस्से (जो कंडक्टर के पास होता है) पर तनाव को कम करता है और पूरी स्ट्रिंग की दक्षता को बढ़ाता है।
जब यह तनाव इंसुलेटर की ढांकता हुआ शक्ति (dielectric strength) से अधिक हो जाता है, तो यह इंसुलेटर के चारों ओर की हवा को आयनित (ionize) कर देता है, जिससे एक आर्क (arc) बनता है। यह आर्क इंसुलेटर की सतह के ऊपर से गुजरता है और टॉवर तक एक चालक पथ बनाता है, जिससे लाइन का वोल्टेज सीधे जमीन पर चला जाता है।
विफलता का मामला: फ्लैशओवर कल्पना कीजिए कि एक 220 kV ट्रांसमिशन लाइन है जिसमें 15 इंसुलेटर यूनिट्स की एक स्ट्रिंग का उपयोग किया गया है।
सामान्य स्थिति: यदि स्ट्रिंग की दक्षता 100% होती, तो प्रत्येक यूनिट पर वोल्टेज समान रूप से वितरित होता। लेकिन, शंट कैपेसिटेंस के कारण, स्ट्रिंग की दक्षता केवल 70-80% होती है।
कम दक्षता का प्रभाव: इस कम दक्षता के कारण, सबसे निचली यूनिट पर वोल्टेज, औसत वोल्टेज की तुलना में 2-3 गुना अधिक होता है।
उदाहरण के लिए,
यदि औसत वोल्टेज V_{avg} है,
तो सबसे निचली यूनिट पर वोल्टेज V_{avg}×1.5 से V_{avg}× 2 तक हो सकता है।
विफलता: जब बिजली का उछाल (surge) या आकाशीय बिजली (lightning) गिरती है, तो लाइन का कुल वोल्टेज बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए वोल्टेज के कारण, सबसे निचली यूनिट पर वोल्टेज इतना अधिक हो जाता है कि यह यूनिट की इन्सुलेटिंग क्षमता को पार कर जाता है, जिससे उस पर फ्लैशओवर हो जाता है। यह फ्लैशओवर यूनिट को स्थायी रूप से क्षति पहुँचा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप पूरी ट्रांसमिशन लाइन में व्यवधान (outage) आता है। यह मामला स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कैसे कम स्ट्रिंग दक्षता के कारण इंसुलेटर की सबसे कमजोर कड़ी (सबसे निचली यूनिट) पर अत्यधिक तनाव पड़ता है, जिससे अंततः यह विफल हो जाता है।
1. इलेक्ट्रिक फील्ड मापन विधि (Electric Field Measurement Method) यह एक गैर-संपर्क विधि है जो ट्रांसमिशन लाइन के चालू रहने के दौरान भी की जा सकती है। यह तरीका इंसुलेटर के चारों ओर के इलेक्ट्रिक फील्ड को मापने पर आधारित है।
तरीका: एक विशेष ई-फील्ड (E-field) मीटर का उपयोग किया जाता है, जिसे हॉट स्टिक (hot stick) से जोड़ा जाता है। तकनीशियन इस मीटर को स्ट्रिंग की प्रत्येक यूनिट के पास ले जाकर इलेक्ट्रिक फील्ड की ताकत को मापता है।
अवलोकन: स्वस्थ इंसुलेटर में, इलेक्ट्रिक फील्ड का वितरण समान होता है। यदि कोई यूनिट दोषपूर्ण है, तो उसके पास के इलेक्ट्रिक फील्ड में असामान्य वृद्धि या कमी होती है। यह असमानता बताती है कि उस यूनिट पर वोल्टेज का तनाव अलग है, जिससे स्ट्रिंग की दक्षता कम हो जाती है।
लाभ: यह एक सुरक्षित विधि है क्योंकि इसमें सीधे संपर्क की आवश्यकता नहीं होती। इससे लाइव लाइन पर भी परीक्षण संभव है।
2. स्फीयर गैप विधि (Sphere Gap Method) यह एक संपर्क विधि है जिसका उपयोग प्रयोगशाला स्थितियों में या जब लाइन डी-एनर्जाइज़्ड (de-energized) हो, तब किया जाता है।
तरीका: पहले, एक कैलिब्रेटेड स्फीयर-गैप को इंसुलेटर स्ट्रिंग के प्रत्येक यूनिट के समानांतर (parallel) में जोड़ा जाता है। फिर, पूरे स्ट्रिंग पर धीरे-धीरे वोल्टेज बढ़ाया जाता है जब तक कि स्फीयर-गैप में स्पार्कओवर (sparkover) न हो जाए। जिस वोल्टेज पर स्पार्कओवर होता है, उसका उपयोग प्रत्येक यूनिट पर वोल्टेज ड्रॉप का पता लगाने के लिए किया जाता है।
गणना: प्रत्येक यूनिट पर मापा गया वोल्टेज जानने के बाद,
स्ट्रिंग दक्षता की गणना निम्न सूत्र का उपयोग करके की जाती है:
{स्ट्रिंग दक्षता} = {{स्ट्रिंग के आर-पार कुल वोल्टेज}}{{इंसुलेटर की संख्या}×{सबसे निचली यूनिट पर वोल्टेज}}
इस प्रकार, यह विधि स्ट्रिंग के वोल्टेज वितरण का सटीक माप प्रदान करती है।
पोर्सिलेन बनाम कंपोजिट इंसुलेटर: स्ट्रिंग दक्षता की तुलना
1. पोर्सिलेन इंसुलेटर पोर्सिलेन इंसुलेटर भारी और भंगुर (brittle) होते हैं। इनकी बनावट ऐसी होती है कि इनमें शंट कैपेसिटेंस (C_s) का प्रभाव अधिक होता है। पोर्सिलेन इंसुलेटर की धातु की टोपी (cap) और पिन (pin) के कारण, प्रत्येक यूनिट के बीच उच्च पारस्परिक कैपेसिटेंस बनती है।
यह उच्च शंट कैपेसिटेंस (C_s), मुख्य स्व-कैपेसिटेंस (C) की तुलना में काफी बड़ी होती है। इसका परिणाम असमान वोल्टेज वितरण होता है, जिसमें चालक के पास वाली यूनिट पर सबसे अधिक वोल्टेज होता है, जिससे स्ट्रिंग दक्षता कम हो जाती है।
2. कंपोजिट इंसुलेटर कंपोजिट इंसुलेटर में फाइबरग्लास कोर और सिलिकॉन रबर या पॉलीमर हाउसिंग होती है। इनकी स्ट्रिंग दक्षता पोर्सिलेन की तुलना में काफी बेहतर होती है।
कम शंट कैपेसिटेंस: कंपोजिट इंसुलेटर की पतली और हल्की संरचना के कारण, इनमें शंट कैपेसिटेंस (C_s) बहुत कम होती है।
उच्च हाइड्रोफोबिसिटी (Hydrophobicity): कंपोजिट इंसुलेटर की सिलिकॉन रबर सतह जल-विकर्षक (water-repellent) होती है। इसका मतलब है कि पानी सतह पर एक सतत फिल्म बनाने के बजाय बूंदों के रूप में रहता है, जिससे सतह पर लीकेज करंट कम हो जाता है।
समान वोल्टेज वितरण: कम शंट कैपेसिटेंस और बेहतर हाइड्रोफोबिसिटी के कारण, वोल्टेज वितरण अधिक समान होता है, जिससे स्ट्रिंग दक्षता बढ़ जाती है। मुख्य अंतर और निष्कर्ष
निष्कर्ष: कंपोजिट इंसुलेटर में उनकी कम शंट कैपेसिटेंस और बेहतर हाइड्रोफोबिक गुणों के कारण उच्च स्ट्रिंग दक्षता होती है, जो उन्हें उच्च-वोल्टेज अनुप्रयोगों के लिए अधिक प्रभावी बनाती है।
स्वच्छ वातावरण में स्ट्रिंग दक्षता एक स्वच्छ वातावरण में, जैसे कि ग्रामीण या कम-प्रदूषित क्षेत्रों में, इंसुलेटर स्ट्रिंग की सतह साफ रहती है।
सतह प्रतिरोध: इंसुलेटर की सतह पर प्रतिरोध बहुत अधिक होता है।
लीकेज करंट: लीकेज करंट (सतह पर बहने वाला बहुत कम करंट) लगभग नगण्य होता है।
वोल्टेज वितरण: वोल्टेज वितरण मुख्य रूप से इंसुलेटर की आंतरिक कैपेसिटेंस (C) और शंट कैपेसिटेंस (C_s) पर निर्भर करता है। यद्यपि वोल्टेज का वितरण असमान होता है, लेकिन यह प्रदूषण के कारण होने वाले नुकसान की तुलना में बहुत कम होता है।
दक्षता: स्ट्रिंग दक्षता अपेक्षाकृत उच्च होती है, हालांकि यह 100% नहीं होती। प्रदूषित वातावरण में स्ट्रिंग दक्षता औद्योगिक क्षेत्रों, तटीय क्षेत्रों या धूल भरे इलाकों जैसे प्रदूषित वातावरण में, इंसुलेटर की सतह पर धूल, नमक और अन्य प्रदूषक जमा हो जाते हैं।
प्रदूषण परत का निर्माण: जब हवा में नमी (जैसे बारिश, कोहरा या ओस) होती है, तो ये प्रदूषक एक आचरणशील (conductive) परत बनाते हैं।
सतह प्रतिरोध में कमी: यह आचरणशील परत इंसुलेटर की सतह के प्रतिरोध को काफी कम कर देती है।
लीकेज करंट में वृद्धि: प्रतिरोध में कमी के कारण, इंसुलेटर की सतह पर लीकेज करंट में भारी वृद्धि होती है।
वोल्टेज वितरण में परिवर्तन: यह बढ़ा हुआ लीकेज करंट वोल्टेज वितरण को और अधिक असमान बना देता है। यह इंसुलेटर की सबसे निचली यूनिट पर वोल्टेज तनाव को और भी बढ़ा देता है।
फ्लैशओवर का खतरा: यह अत्यधिक तनाव फ्लैशओवर (सतह पर बिजली का आर्क बनना) का कारण बन सकता है, जिससे पूरी लाइन बंद हो सकती है। इस स्थिति में स्ट्रिंग दक्षता नाटकीय रूप से कम हो जाती है। निष्कर्ष प्रदूषित वातावरण में, इंसुलेटर की सतह पर बनी आचरणशील परत के कारण स्ट्रिंग दक्षता में गिरावट आती है, जिससे फ्लैशओवर का खतरा बढ़ जाता है।
यही कारण है कि अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में, फ्लैशओवर को रोकने के लिए विशेष प्रदूषण-रोधी इंसुलेटर (जैसे कि बड़े शेड वाले या कंपोजिट इंसुलेटर) का उपयोग किया जाता है।
स्ट्रिंग की लंबाई बढ़ाना स्ट्रिंग की लंबाई बढ़ाने का अर्थ है इंसुलेटर यूनिट्स की संख्या बढ़ाना।
सिद्धांत: जैसे-जैसे स्ट्रिंग में यूनिट्स की संख्या बढ़ती है, कुल शंट कैपेसिटेंस (C_s) का प्रभाव कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि शंट कैपेसिटेंस केवल टॉवर और प्रत्येक यूनिट के बीच बनती है, जबकि स्व-कैपेसिटेंस (C) सभी यूनिट्स में होती है।
जब यूनिट्स की संख्या बढ़ती है, तो स्व-कैपेसिटेंस की कुल श्रृंखला प्रतिरोध (series impedance) बढ़ जाती है, जिससे कुल लीकेज करंट कम हो जाता है और वोल्टेज वितरण थोड़ा अधिक समान हो जाता है।
लाभ: यह एक सीधा और सरल तरीका है। यह स्ट्रिंग की कुल डाइइलेक्ट्रिक स्ट्रेंथ को भी बढ़ाता है, जिससे फ्लैशओवर के खिलाफ सुरक्षा बढ़ती है।
नुकसान: यह एक अत्यंत खर्चीला तरीका है। अधिक यूनिट्स का मतलब है अधिक वजन, जिसके लिए अधिक मजबूत और महंगे टावरों की आवश्यकता होती है। पूरी तरह से समान वितरण प्राप्त नहीं होता है। ग्रेडिंग रिंग का उपयोग करना ग्रेडिंग रिंग एक धातु की रिंग है जो स्ट्रिंग के सबसे निचले सिरे पर लगाई जाती है।
सिद्धांत: यह रिंग मुख्य कंडक्टर से जुड़ी होती है और एक अतिरिक्त कैपेसिटेंस (C_{G}) बनाती है जो इंसुलेटर यूनिट और रिंग के बीच शंट कैपेसिटेंस को प्रभावी ढंग से संतुलित करती है। यह इस तरह से कैपेसिटेंस को बदल देती है कि प्रत्येक यूनिट से गुजरने वाला लीकेज करंट लगभग बराबर हो जाता है।
लाभ: यह सबसे प्रभावी तरीका है क्योंकि यह वोल्टेज वितरण को लगभग 100% दक्षता के करीब ला सकता है। यह एक कम खर्चीला और अधिक व्यावहारिक तरीका है, खासकर मौजूदा लाइनों में सुधार के लिए। यह स्ट्रिंग को फ्लैशओवर से बचाने के लिए भी काम करता है।
नुकसान: डिजाइन को सावधानीपूर्वक करना पड़ता है ताकि रिंग सही कैपेसिटेंस प्रदान करे। रिंग लगने से टावर और स्ट्रिंग के बीच की दूरी बढ़ जाती है, जिससे अतिरिक्त जगह की आवश्यकता हो सकती है। तुलना और निष्कर्ष
निष्कर्ष: जबकि स्ट्रिंग की लंबाई बढ़ाना दक्षता को थोड़ा सुधार सकता है, ग्रेडिंग रिंग का उपयोग करना दक्षता में सुधार के लिए कहीं अधिक प्रभावी, व्यावहारिक और लागत-कुशल तरीका है। यही कारण है कि उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों में ग्रेडिंग रिंग्स का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
फायदे:
नुकसान:
फायदे:
नुकसान:
फायदे:
नुकसान:
क्रीपेज दूरी एक इन्सुलेट सामग्री की सतह के साथ दो प्रवाहकीय भागों के बीच की सबसे छोटी दूरी है। इसका उद्देश्य सतह पर बिजली के रिसाव या चाप (electrical arcing) को रोकना है, जो प्रदूषण, नमी और धूल जैसी पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण हो सकता है। यह सुनिश्चित करता है कि इन्सुलेटर की सतह पर कोई प्रवाहकीय पथ न बने, जिससे उपकरणों की विफलता या शॉर्ट सर्किट हो सकता है। संक्षेप में, क्रीपेज दूरी इन्सुलेटर की बाहरी सतह पर सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
स्ट्रिंग दक्षता हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों में उपयोग किए जाने वाले सस्पेंशन इन्सुलेटरों की एक श्रृंखला (a string of insulators) में वोल्टेज के वितरण का एक माप है। यह इस बात को मापती है कि वोल्टेज भार को इन्सुलेटरों के बीच कितनी समान रूप से वितरित किया जाता है। आदर्श रूप से, प्रत्येक इन्सुलेटर पर वोल्टेज समान होना चाहिए (100% दक्षता)। हालांकि, शंट कैपेसिटेंस (shunt capacitance) जैसे कारकों के कारण, कंडक्टर के सबसे नजदीक के इन्सुलेटर पर सबसे अधिक वोल्टेज होता है, जिससे दक्षता 100% से कम हो जाती है।
जैसा कि ऊपर बताया गया है, क्रीपेज दूरी और स्ट्रिंग दक्षता के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
दोनों ही विद्युत इन्सुलेटरों के उचित कामकाज के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे अलग-अलग समस्याओं का समाधान करते हैं और अलग-अलग मापदंडों पर निर्भर करते हैं।
फ्लैशओवर का स्ट्रिंग दक्षता से सीधा संबंध है। यह संबंध इस तरह से काम करता है:
संक्षेप में,
कम स्ट्रिंग दक्षता के कारण वोल्टेज का असमान वितरण होता है, जिससे कंडक्टर के पास के इन्सुलेटर पर तनाव बढ़ जाता है और फ्लैशओवर का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए, स्ट्रिंग दक्षता में सुधार करना (जैसे कि गार्ड रिंग या ग्रेडिंग का उपयोग करके) सीधे फ्लैशओवर की रोकथाम में मदद करता है।
संक्षेप में,
तापमान में वृद्धि से इन्सुलेटर की ढांकता हुआ ताकत और प्रतिरोध दोनों कम हो जाते हैं, जिससे इसकी दक्षता और समग्र विश्वसनीयता घट जाती है। इसलिए, इन्सुलेटर का चयन और डिजाइन करते समय उस वातावरण के तापमान को ध्यान में रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसमें इसका उपयोग किया जाएगा।
अपरिवर्तनशील वोल्टेज वितरण (non-uniform voltage distribution) में, कंडक्टर के सबसे पास के इन्सुलेटर पर सबसे अधिक वोल्टेज स्ट्रेस होता है। यह अत्यधिक वोल्टेज उस इन्सुलेटर की ढांकता हुआ ताकत (dielectric strength) को पार कर सकता है, जिससे फ्लैशओवर (flashover) हो सकता है। फ्लैशओवर से इन्सुलेटर को नुकसान पहुँच सकता है और बिजली आपूर्ति में रुकावट आ सकती है। समान वोल्टेज वितरण सुनिश्चित करता है कि कोई भी इन्सुलेटर अनावश्यक रूप से अधिक तनाव में न हो, जिससे फ्लैशओवर का जोखिम कम हो जाता है।
यदि वोल्टेज असमान रूप से वितरित होता है, तो कंडक्टर के पास के इन्सुलेटर को अधिकतम वोल्टेज स्ट्रेस का सामना करने के लिए बहुत मजबूत (और महंगा) बनाना पड़ता है, जबकि स्ट्रिंग के अन्य इन्सुलेटरों का पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाता है। समान वोल्टेज वितरण यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक इन्सुलेटर अपनी पूरी क्षमता से काम करे, जिससे इन्सुलेटरों का कुशल और किफायती उपयोग होता है।
स्ट्रिंग दक्षता (string efficiency) वोल्टेज वितरण की एक माप है। 100% दक्षता का मतलब है कि प्रत्येक इन्सुलेटर पर समान वोल्टेज स्ट्रेस है। असमान वितरण से कम स्ट्रिंग दक्षता होती है। समान वोल्टेज वितरण के लिए, स्ट्रिंग दक्षता को 100% के करीब लाना महत्वपूर्ण है, जिससे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता और दीर्घायु बढ़ जाती है।
कुल मिलाकर, ट्रांसमिशन लाइनों में समान वोल्टेज वितरण को बनाए रखना न केवल उपकरणों की सुरक्षा करता है, बल्कि पूरे सिस्टम की समग्र दक्षता और प्रदर्शन को भी बढ़ाता है।
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