अर्थिंग और न्यूट्रल के बीच अंतर ( Difference between Earthing and Neutral )
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विद्युत मशीनों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
इनके अलावा, एक और महत्वपूर्ण प्रकार है:
इन सभी मशीनों का आधार विद्युत चुंबकत्व का सिद्धांत है, जो उन्हें हमारे आधुनिक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
इसे अक्सर उद्योगों का घोड़ा (workhorse of industries) भी कहा जाता है।
तीन चरण प्रेरण मोटर का कार्य सिद्धांत फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम पर आधारित है। जब मोटर के स्टेटर (स्थिर भाग) को तीन चरण एसी विद्युत आपूर्ति से जोड़ा जाता है, तो स्टेटर वाइंडिंग में एक घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र (rotating magnetic field) उत्पन्न होता है। यह घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र रोटर के चालकों को काटता है, जिससे रोटर में एक विद्युत धारा (electric current) प्रेरित होती है। यह प्रेरित धारा एक चुंबकीय क्षेत्र बनाती है जो स्टेटर के घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र के साथ प्रतिक्रिया करती है। इस प्रतिक्रिया के कारण रोटर पर एक बल (force) और बलाघूर्ण (torque) लगता है, जिससे रोटर घूमना शुरू कर देता है।
तीन चरण प्रेरण मोटर का उपयोग उन जगहों पर होता है जहाँ स्थिर गति और उच्च टॉर्क की आवश्यकता होती है। इसके कुछ प्रमुख अनुप्रयोग इस प्रकार हैं:
यह मोटर अपनी सरल संरचना, कम लागत और उच्च दक्षता के कारण विभिन्न औद्योगिक और वाणिज्यिक अनुप्रयोगों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
स्टेटर (Stator) और रोटर (Rotor)।
स्टेटर (Stator): यह मोटर का स्थिर (static) भाग होता है। इसमें एक खोखली बेलनाकार कोर होती है जिसमें स्लॉट (slots) बने होते हैं। इन स्लॉट्स में तीन-चरण वाइंडिंग (winding) डाली जाती है, जिसे जब एसी (AC) आपूर्ति दी जाती है, तो एक घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र (rotating magnetic field) उत्पन्न होता है। स्टेटर के बाहरी हिस्से को फ्रेम (frame) या योक कहा जाता है, जो पूरे मोटर को सहारा और यांत्रिक सुरक्षा प्रदान करता है।
रोटर (Rotor): यह मोटर का घूमने वाला (rotating) भाग होता है। यह शाफ्ट (shaft) से जुड़ा होता है और स्टेटर के चुंबकीय क्षेत्र के भीतर घूमता है। रोटर दो प्रकार के होते हैं:
इन मुख्य भागों के अलावा, मोटर में कुछ और हिस्से भी होते हैं जैसे:
यह कई चरणों में काम करता है:
1. घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र (Rotating Magnetic Field - RMF) का निर्माण जब मोटर के स्टेटर को तीन चरण एसी (AC) आपूर्ति दी जाती है, तो स्टेटर वाइंडिंग में एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
चूँकि तीनों धाराएं एक दूसरे से 120° के कलांतर (phase difference) पर होती हैं, इसलिए उत्पन्न होने वाला चुंबकीय क्षेत्र स्थिर नहीं होता, बल्कि एक निश्चित गति पर घूमता है। इस घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र को तुल्यकालिक गति (synchronous speed) कहते हैं,
जिसकी गणना इस सूत्र से की जाती है: N_s = 120f/P
जहाँ f आपूर्ति की आवृत्ति (frequency) है और
P ध्रुवों (poles) की संख्या है।
2. रोटर में विद्युत धारा का प्रेरण घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र रोटर के चालकों को काटता है।
फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम के अनुसार, जब एक चालक किसी चुंबकीय क्षेत्र को काटता है, तो उसमें एक विद्युत वाहक बल (electromotive force - EMF) उत्पन्न होता है। चूँकि रोटर के चालक शॉर्ट-सर्किटेड होते हैं, इसलिए इस EMF के कारण रोटर में एक विद्युत धारा (current) प्रवाहित होने लगती है।
3. टॉर्क का निर्माण और रोटर का घूर्णन अब रोटर में विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है और यह स्टेटर के चुंबकीय क्षेत्र में स्थित है।
इस स्थिति में, रोटर पर एक बल लगता है, जिससे एक घूर्णन बल या टॉर्क (torque) उत्पन्न होता है। यह टॉर्क रोटर को घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में घूमने के लिए मजबूर करता है।
4. स्लिप (Slip) रोटर उसी दिशा में घूमता है जिस दिशा में घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र घूम रहा है,
लेकिन इसकी गति हमेशा तुल्यकालिक गति से कम होती है। यदि रोटर की गति तुल्यकालिक गति के बराबर हो जाती है, तो रोटर और चुंबकीय क्षेत्र के बीच कोई सापेक्ष गति (relative motion) नहीं होगी। इस स्थिति में, रोटर में कोई EMF प्रेरित नहीं होगा और इसलिए कोई टॉर्क उत्पन्न नहीं होगा, जिससे मोटर रुक जाएगी। इसलिए, रोटर की गति हमेशा तुल्यकालिक गति से थोड़ी कम होती है। इस अंतर को स्लिप कहा जाता है।
सारांश में:
स्टेटर का घूर्णन चुंबकीय क्षेत्र रोटर में धारा प्रेरित करता है, जो स्वयं एक चुंबकीय क्षेत्र बनाता है, और इन दोनों क्षेत्रों की परस्पर क्रिया से टॉर्क उत्पन्न होता है, जिससे रोटर घूमता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है, इसके कुछ कारण यहां दिए गए हैं:
संक्षेप में,
स्लिप एक इंडक्शन मोटर की काम करने की क्षमता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हमें बताता है कि मोटर कितनी तेज़ी से घूम रही है और यह मोटर के टॉर्क और दक्षता जैसे महत्वपूर्ण गुणों को सीधे प्रभावित करता है।
यह सबसे सामान्य प्रकार की तीन चरण मोटर है। इसका रोटर एक पिंजरे जैसा दिखता है, जिसमें मोटी तांबे या एल्यूमीनियम की छड़ें होती हैं जो दोनों तरफ से एंड-रिंग्स से शॉर्ट-सर्किट होती हैं।
इस मोटर का रोटर फेज-वाउंड (phase-wound) होता है। रोटर वाइंडिंग के सिरे स्लिप रिंग के माध्यम से बाहर लाए जाते हैं, जिससे बाहरी प्रतिरोध (resistance) जोड़ा जा सकता है।
यह वह सैद्धांतिक गति है जिस पर एक आदर्श मोटर चलती है, लेकिन व्यवहार में, प्रेरण मोटर का रोटर इस गति से थोड़ा कम गति पर घूमता है, जिसे स्लिप (slip) कहा जाता है। गणना तुल्यकालिक गति की गणना एक साधारण सूत्र से की जा सकती है: Ns = 120×f/P
जहाँ:
Ns = तुल्यकालिक गति (RPM में)
f = विद्युत आपूर्ति की आवृत्ति (हर्ट्ज में)
P = मोटर में ध्रुवों (poles) की संख्या
उदाहरण के लिए, 50 Hz की आवृत्ति और 4 ध्रुवों वाली मोटर के लिए तुल्यकालिक गति होगी:
Ns = 120×50/4 = 1500 RPM
महत्व तुल्यकालिक गति कई कारणों से महत्वपूर्ण है:
मोटर के संचालन का आधार: यह वह गति है जो मोटर के अंदर चुंबकीय क्षेत्र पैदा करती है, और इसी चुंबकीय क्षेत्र के कारण रोटर घूमता है।
स्लिप की गणना: स्लिप की गणना करने के लिए तुल्यकालिक गति का उपयोग किया जाता है, जो मोटर के प्रदर्शन को समझने में एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है।
गति नियंत्रण: मोटर की गति को नियंत्रित करने के लिए आवृत्ति (f) या ध्रुवों की संख्या (P) को बदला जाता है, जो सीधे तुल्यकालिक गति को प्रभावित करते हैं।
प्रेरण बनाम तुल्यकालिक मोटर: तुल्यकालिक मोटर में, रोटर बिल्कुल तुल्यकालिक गति पर घूमता है, जबकि प्रेरण मोटर में रोटर हमेशा तुल्यकालिक गति से कम गति पर घूमता है।
कम स्टार्टिंग टॉर्क: गिलहरी-पिंजरा (squirrel-cage) प्रेरण मोटरों में स्टार्टिंग टॉर्क (startup torque) कम होता है। इसके अलावा, स्टार्ट करते समय ये मोटरें बहुत अधिक करंट (inrush current) लेती हैं, जो रेटेड करंट से 4 से 8 गुना तक अधिक हो सकता है। यह समस्या विशेष रूप से उन अनुप्रयोगों में होती है जहाँ मोटर को भारी लोड के साथ शुरू करना होता है।
कम पावर फैक्टर: सामान्यतः, ये मोटरें लैगिंग पावर फैक्टर (lagging power factor) पर काम करती हैं। जब मोटर पर लोड कम होता है, तो पावर फैक्टर बहुत खराब हो जाता है (0.3 से 0.5 तक)। यह कम पावर फैक्टर प्रणाली की समग्र दक्षता को प्रभावित करता है।
गति नियंत्रण में कठिनाई: प्रेरण मोटर की गति को नियंत्रित करना जटिल होता है, क्योंकि इसकी गति मुख्य रूप से आपूर्ति की आवृत्ति और ध्रुवों की संख्या पर निर्भर करती है। इसकी गति को दक्षता में कमी लाए बिना बदलना मुश्किल है।
वोल्टेज उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशीलता: मोटर का प्रदर्शन वोल्टेज में बदलाव के प्रति संवेदनशील होता है। यदि वोल्टेज कम हो जाता है, तो मोटर को समान लोड को संभालने के लिए अधिक करंट लेना पड़ता है, जिससे मोटर गर्म हो सकती है और उसकी लाइफ कम हो सकती है।
उच्च हानि (Losses): प्रेरण मोटरों में कुछ आंतरिक हानियाँ होती हैं जैसे कि कोर हानि (core losses), कॉपर हानि (copper losses), और यांत्रिक हानि (mechanical losses), जो मोटर की दक्षता को कम करती हैं।
यह सबसे आम और व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली प्रेरण मोटर है।
इस मोटर का उपयोग उन अनुप्रयोगों में होता है जहाँ उच्च स्टार्टिंग टॉर्क और गति नियंत्रण की आवश्यकता होती है।
इन दोनों मोटरों के बीच चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि आपके अनुप्रयोग के लिए लागत, रखरखाव, स्टार्टिंग टॉर्क, और गति नियंत्रण में से कौन सी विशेषता अधिक महत्वपूर्ण है।
प्रत्यक्ष परीक्षण (direct test) और
अप्रत्यक्ष परीक्षण (indirect test)।
इनमें से अप्रत्यक्ष परीक्षण अधिक सामान्य हैं क्योंकि वे कम समय में और मोटर को नुकसान पहुँचाए बिना महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करते हैं।
अप्रत्यक्ष परीक्षण (Indirect Tests) ये परीक्षण मोटर के दक्षता (efficiency), हानियों (losses), और
समकक्ष परिपथ मापदंडों (equivalent circuit parameters) को निर्धारित करने के लिए किए जाते हैं।
कोई भार परीक्षण नहीं (No-Load Test): यह परीक्षण मोटर को बिना किसी यांत्रिक भार के चलाकर किया जाता है।
इससे मोटर की लोहे की हानि (core losses), घर्षण (friction) और
हवा के प्रतिरोध (windage losses) की गणना की जाती है। इस परीक्षण में, मोटर अपनी सामान्य गति के बहुत करीब चलती है।
अवरुद्ध रोटर परीक्षण (Blocked Rotor Test): इस परीक्षण में, मोटर के रोटर को स्थिर रखा जाता है। इसके लिए, मोटर के स्टेटर में कम वोल्टेज लगाया जाता है ताकि रेटेड (rated) करंट बह सके।
यह परीक्षण मोटर की पूर्ण भार (full-load) कॉपर हानि और लीकेज रिएक्टेंस (leakage reactance) को निर्धारित करने में मदद करता है।
स्टेटर वाइंडिंग प्रतिरोध परीक्षण (Stator Winding Resistance Test): इस परीक्षण में, मोटर के स्टेटर वाइंडिंग के प्रतिरोध को मापा जाता है। इससे स्टेटर की कॉपर हानि (copper losses) की गणना की जाती है।
प्रत्यक्ष परीक्षण (Direct Test) यह परीक्षण मोटर की दक्षता को सीधे मापने के लिए किया जाता है। इसमें मोटर पर विभिन्न प्रकार के यांत्रिक भार लगाए जाते हैं और इनपुट और आउटपुट पावर को मापा जाता है।
लोड टेस्ट (Load Test): इस परीक्षण में, मोटर को विभिन्न भारों पर चलाया जाता है और इनपुट पावर (इनपुट वोल्टमीटर, एमीटर और वाटमीटर से) और आउटपुट पावर (टॉर्क और गति मापकर) को रिकॉर्ड किया जाता है।
दक्षता की गणना निम्नलिखित सूत्र से की जाती है:
दक्षता = आउटपुट पावर / इनपुट पावर × 100 %
यह विधि सटीक होती है, लेकिन इसमें अधिक समय लगता है और यह मोटर के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
डीसी मोटर की गति को नियंत्रित करने के तीन मुख्य तरीके हैं:
तीन चरण प्रेरण मोटर की गति को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न विधियाँ हैं, जिन्हें स्टेटर साइड से और रोटर साइड से नियंत्रित किया जा सकता है।
इसके काम करने का तरीका कुछ इस तरह है:
इस पूरी प्रक्रिया के लिए किसी बाहरी उपकरण की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसे सेल्फ-स्टार्टिंग मोटर कहते हैं। इसके विपरीत, सिंगल-फेज इंडक्शन मोटर में केवल एक चुंबकीय क्षेत्र होता है जो घूमता नहीं है, इसलिए उसे शुरू करने के लिए बाहरी उपकरणों (जैसे कैपेसिटर) की आवश्यकता होती है।
यह वक्र मोटर के प्रदर्शन (performance) का एक महत्वपूर्ण मापदंड है, खासकर जब यह विभिन्न भारों (loads) के तहत काम करती है। प्रेरण मोटर का टॉर्क-स्पीड वक्र प्रेरण मोटर (induction motor) का टॉर्क-स्पीड वक्र एक अतिपरवलय (hyperbola) जैसा होता है और इसे
तीन मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:
प्रारंभिक या उच्च सर्पी क्षेत्र (Starting or High Slip Region): जब मोटर शुरू होती है, तो इसकी गति शून्य होती है और सर्पी (slip) का मान अधिकतम (S = 1) होता है।
इस स्थिति में, मोटर एक निश्चित प्रारंभिक टॉर्क (starting torque) उत्पन्न करती है।
जैसे-जैसे गति बढ़ती है, टॉर्क भी बढ़ता है।
स्थिर या निम्न सर्पी क्षेत्र (Stable or Low Slip Region): यह वक्र का वह हिस्सा है जहाँ मोटर सामान्यतः काम करती है। इस क्षेत्र में, गति तुल्यकालिक गति (synchronous speed) के बहुत करीब होती है और सर्पी का मान बहुत कम होता है। टॉर्क गति के लगभग व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) होता है।
इसका मतलब है कि जब मोटर पर भार बढ़ता है, तो उसकी गति थोड़ी कम हो जाती है, जिससे टॉर्क बढ़ जाता है और वह बढ़े हुए भार को संतुलित कर पाती है। यह मोटर की स्थिरता (stability) सुनिश्चित करता है।
तो मोटर इस अस्थिर क्षेत्र में प्रवेश कर जाती है। इस क्षेत्र में गति बढ़ने पर टॉर्क कम होने लगता है, जिससे मोटर की गति और भी कम हो जाती है और अंततः मोटर रुक जाती है।
टॉर्क-स्पीड विशेषताओं को प्रभावित करने वाले कारक कई कारक मोटर के टॉर्क-स्पीड वक्र को प्रभावित करते हैं:
रोटर प्रतिरोध (Rotor Resistance): रोटर का प्रतिरोध बढ़ने से प्रारंभिक टॉर्क बढ़ता है और वक्र का अधिकतम टॉर्क बिंदु (breakdown torque point) बाईं ओर (कम गति की ओर) चला जाता है।
आपूर्ति वोल्टेज (Supply Voltage): टॉर्क, आपूर्ति वोल्टेज के वर्ग (voltage squared) के समानुपाती होता है (T V^2)। यदि वोल्टेज कम हो जाता है, तो टॉर्क भी काफी कम हो जाएगा।
आपूर्ति आवृत्ति (Supply Frequency): आवृत्ति में बदलाव से तुल्यकालिक गति और परिणामस्वरूप पूरे टॉर्क-स्पीड वक्र में बदलाव आता है। प्रेरण मोटर का टॉर्क-स्पीड वक्र इस वीडियो में तीन-फेज इंडक्शन मोटर के टॉर्क-स्पीड वक्र की विशेषताओं को विस्तार से समझाया गया है।
टॉर्क एक घूर्णन बल है जो किसी वस्तु को उसके अक्ष के चारों ओर घुमाता है। यह एक प्रकार का बल है जो किसी चीज को घुमाने की प्रवृत्ति रखता है। किसी मोटर के लिए, टॉर्क वह शक्ति है जो मोटर शाफ्ट को घुमाती है, जिससे कोई काम हो पाता है, जैसे पंखे की ब्लेड को घुमाना या कार के पहियों को चलाना।
स्लिप, प्रेरण मोटर (induction motor) में होती है। यह मोटर के रोटर की गति (rotor speed) और सिंक्रोनस गति (synchronous speed) के बीच का अंतर है, जिसे प्रतिशत या प्रति इकाई (per unit) में व्यक्त किया जाता है। सिंक्रोनस गति वह गति है जिस पर मोटर का चुंबकीय क्षेत्र घूमता है। यदि रोटर बिल्कुल सिंक्रोनस गति पर घूमता, तो स्लिप शून्य होती। लेकिन, ऐसा कभी नहीं होता क्योंकि टॉर्क उत्पन्न करने के लिए रोटर के चालकों (conductors) को चुंबकीय क्षेत्र को काटना पड़ता है, और ऐसा तभी हो सकता है जब दोनों की गति में अंतर हो।
टॉर्क और स्लिप के बीच संबंध प्रेरण मोटर के प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह संबंध इस प्रकार है:
संक्षेप में,
स्लिप वह "आवश्यक" गति अंतर है जो टॉर्क उत्पन्न करने के लिए चाहिए होता है। जैसे-जैसे मोटर पर लोड बढ़ता है, टॉर्क की आवश्यकता भी बढ़ती है, और इसे पूरा करने के लिए मोटर की स्लिप भी बढ़ती है।
प्रेरण मोटर के रोटर में प्रेरित धारा की आवृत्ति है। यह आपूर्ति आवृत्ति (f) और मोटर की स्लिप (s) पर निर्भर करती है। इसे एक सरल सूत्र से व्यक्त किया जा सकता है: fr = sf
यहाँ:
fr = रोटर आवृत्ति
s = स्लिप (slip)
f = स्टेटर की आपूर्ति आवृत्ति (supply frequency)
विभिन्न स्थितियों में रोटर आवृत्ति जब मोटर स्थिर हो (Start-up): जब मोटर स्थिर होती है, तो रोटर की गति शून्य होती है। इस स्थिति में स्लिप (s) का मान 1 होता है।
fr = 1
f = f इसका मतलब है कि जब मोटर चलना शुरू करती है, तो रोटर की आवृत्ति आपूर्ति आवृत्ति के बराबर होती है। जब मोटर सामान्य गति पर चल रही हो:
जब मोटर अपनी सामान्य गति पर चलती है, तो स्लिप का मान शून्य और एक के बीच (0 < s < 1) होता है।
fr < f जब मोटर तुल्यकालिक गति पर हो (असंभव): अगर मोटर तुल्यकालिक गति पर चलती, तो स्लिप 0 होती। इस स्थिति में रोटर में कोई प्रेरित धारा नहीं होती, इसलिए रोटर आवृत्ति शून्य होती।
fr = 0
f = 0 लेकिन व्यवहार में ऐसा कभी नहीं होता, क्योंकि टॉर्क उत्पन्न करने के लिए स्लिप का होना आवश्यक है। रोटर आवृत्ति का महत्व रोटर आवृत्ति मोटर के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह रोटर प्रतिघात (rotor reactance) को प्रभावित करती है, जो मोटर के टॉर्क-स्पीड विशेषताओं को निर्धारित करती है।
रोटर प्रतिघात (Xr) का सूत्र 2pi fr Lr है,
जहाँ Lr रोटर का अधिष्ठापन (inductance) है।
जैसे-जैसे मोटर की गति बदलती है, स्लिप और रोटर आवृत्ति भी बदलती है, जिससे रोटर प्रतिघात बदल जाता है। यह परिवर्तन मोटर के टॉर्क और धारा को प्रभावित करता है।
1. इनपुट शक्ति (Input Power, P_{in})
यह वह कुल विद्युत शक्ति है जो मोटर के स्टेटर को तीन-चरण (three-phase) आपूर्ति से मिलती है।
P_{in} = {3} V_L I_L
V_L = लाइन वोल्टेज
I_L = लाइन करंट = शक्ति गुणक (power factor)
2. स्टेटर हानियाँ (Stator Losses)
स्टेटर में दो मुख्य प्रकार की हानियाँ होती हैं:
स्टेटर कॉपर हानियाँ (P_{scu}): यह स्टेटर वाइंडिंग के प्रतिरोध के कारण होती हैं।
P_{scu} = 3I_1^2 R_1 I_1 = स्टेटर करंट R_1 = स्टेटर प्रतिरोध स्टेटर कोर हानियाँ (P_{ci}): इसमें हिस्टैरिसीस (hysteresis) और एडी करंट (eddy current) हानियाँ शामिल हैं, जो चुंबकीय क्षेत्र के कारण होती हैं। इन हानियों के बाद, शेष शक्ति एयर गैप शक्ति (P_{ag}) कहलाती है। P_{ag} = P_{in} - (P_{scu} + P_{ci})
3. एयर गैप शक्ति (Air Gap Power, P_{ag})
यह वह शक्ति है जो स्टेटर से चुंबकीय क्षेत्र के माध्यम से रोटर में स्थानांतरित होती है। यह रोटर में कुल इनपुट शक्ति होती है। यह मोटर द्वारा विकसित कुल यांत्रिक शक्ति के बराबर होती है।
4. रोटर हानियाँ (Rotor Losses)
रोटर में मुख्य रूप से एक प्रकार की हानि होती है: रोटर कॉपर हानियाँ (P_{rcu}): यह रोटर वाइंडिंग के प्रतिरोध के कारण होती है। यह एयर गैप शक्ति (P_{ag}) और स्लिप (s) से संबंधित है।
P_{rcu} = sP_{ag} इसका मतलब है कि जैसे-जैसे स्लिप बढ़ती है, रोटर में हानि भी बढ़ती है।
5. विकसित यांत्रिक शक्ति (Developed Mechanical Power, P_{dev})
यह वह शक्ति है जो रोटर में विद्युत चुम्बकीय रूप से विकसित होती है। यह एयर गैप शक्ति में से रोटर कॉपर हानियों को घटाकर प्राप्त होती है।
P_{dev} = P_{ag} - P_{rcu} या P_{dev} = P_{ag} - sP_{ag} = P_{ag} (1-s)
6. आउटपुट शक्ति (Output Power, P_{out})
विकसित यांत्रिक शक्ति में से कुछ यांत्रिक हानियाँ भी घटानी पड़ती हैं:
घर्षण और वायु प्रवाह हानियाँ (P_{fw}):
यह मोटर के घूमने वाले हिस्सों में घर्षण और हवा के प्रतिरोध के कारण होती हैं। अंतिम आउटपुट शक्ति (या शाफ्ट पर उपलब्ध शक्ति) होती है: P_{out} = P_{dev} - P_{fw}
इसका मुख्य कारण प्रेरण (induction) और स्लिप (slip) के सिद्धांत में निहित है।
मुख्य कारण: प्रेरण का सिद्धांत प्रेरण मोटर का रोटर केवल तभी घूम सकता है जब रोटर के चालकों (conductors) में धारा उत्पन्न हो। यह धारा प्रेरण के माध्यम से उत्पन्न होती है।
घूर्णनशील चुंबकीय क्षेत्र (Rotating Magnetic Field - RMF):
जब मोटर के स्टेटर को तीन-फेज एसी आपूर्ति दी जाती है, तो यह एक घूर्णनशील चुंबकीय क्षेत्र (RMF) उत्पन्न करता है जो तुल्यकालिक गति (Ns) पर घूमता है।
प्रेरित ईएमएफ (Induced EMF):
यह घूमता हुआ चुंबकीय क्षेत्र रोटर के चालकों को काटता है। इस गति के अंतर के कारण, रोटर के चालकों में एक वोल्टेज (ईएमएफ) प्रेरित होता है, जैसा कि फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम में बताया गया है।
धारा और टॉर्क:
यह प्रेरित ईएमएफ रोटर में एक धारा उत्पन्न करता है। यह धारा फिर से चुंबकीय क्षेत्र के साथ क्रिया करती है और टॉर्क उत्पन्न करती है, जिससे रोटर घूमना शुरू करता है।
क्या होगा यदि मोटर तुल्यकालिक गति पर चले? यदि रोटर की गति (Nr) तुल्यकालिक गति (Ns) के बराबर हो जाती है, तो निम्न समस्याएँ उत्पन्न होंगी:
सापेक्षिक गति शून्य:
रोटर और घूर्णनशील चुंबकीय क्षेत्र के बीच की सापेक्षिक गति (relative speed) शून्य हो जाएगी (Ns - Nr = 0)।
कोई प्रेरित ईएमएफ नहीं:
चूंकि चुंबकीय क्षेत्र अब रोटर के चालकों को नहीं काटेगा, इसलिए कोई ईएमएफ प्रेरित नहीं होगा। कोई रोटर धारा नहीं: कोई प्रेरित ईएमएफ नहीं होने से, रोटर में कोई धारा प्रवाहित नहीं होगी।
कोई टॉर्क नहीं:
चूंकि टॉर्क उत्पन्न करने के लिए रोटर में धारा का होना आवश्यक है, इसलिए टॉर्क शून्य हो जाएगा। टॉर्क के शून्य हो जाने से, मोटर पर लगा हुआ यांत्रिक लोड (जैसे पंखा या पंप) मोटर को धीमा कर देगा, जिससे इसकी गति तुल्यकालिक गति से कम हो जाएगी। गति के कम होते ही,
सापेक्षिक गति फिर से उत्पन्न होगी,
जिससे टॉर्क फिर से उत्पन्न होगा और मोटर फिर से चलेगी। यही कारण है कि प्रेरण मोटर हमेशा तुल्यकालिक गति से थोड़ी कम गति पर चलती है, जिसे स्लिप कहते हैं। स्लिप, टॉर्क उत्पन्न करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है।
इस परीक्षण का मुख्य उद्देश्य मोटर की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताओं और हानियों (losses) का पता लगाना है।
बिना भार परीक्षण का उद्देश्य इस परीक्षण का उपयोग प्रेरण मोटर की निम्नलिखित विशेषताओं को निर्धारित करने के लिए किया जाता है:
स्थिर हानियाँ (Fixed Losses): ये वे हानियाँ हैं जो मोटर पर लोड की मात्रा पर निर्भर नहीं करती हैं। बिना भार परीक्षण से इन हानियों का पता लगाया जाता है:
कोर हानियाँ (Core Losses): इसमें हिस्टैरिसीस (hysteresis) और एडी करंट (eddy current) हानियाँ शामिल हैं, जो चुंबकीय क्षेत्र के कारण होती हैं।
यांत्रिक हानियाँ (Mechanical Losses): इसमें घर्षण (friction) और वायु प्रवाह (windage) हानियाँ शामिल हैं।
शंट शाखा के पैरामीटर (Shunt Branch Parameters): प्रेरण मोटर के समकक्ष सर्किट (equivalent circuit) में,
शंट शाखा चुंबकत्व (magnetizing) और कोर हानि घटकों को दर्शाती है।
बिना भार परीक्षण से इस शाखा के प्रतिरोध (R_0) और प्रतिघात (X_0) को ज्ञात किया जाता है।
नो-लोड करंट (I_0) और पावर फैक्टर (\cos\phi_0):
परीक्षण के दौरान मापी गई इनपुट शक्ति (input power),
वोल्टेज और करंट से नो-लोड पावर फैक्टर की गणना की जा सकती है, जो मोटर के चुंबकत्व (magnetizing) करंट को समझने में मदद करता है।
परीक्षण विधि बिना भार परीक्षण को करने के लिए, मोटर को बिना किसी यांत्रिक भार के रेटेड वोल्टेज और आवृत्ति पर चलाया जाता है।
इस दौरान, एक वोल्टमीटर, एक एमीटर, और दो वाटमीटर का उपयोग करके इनपुट वोल्टेज, करंट और शक्ति को मापा जाता है। इस परीक्षण में, चूंकि कोई यांत्रिक भार नहीं होता,
इसलिए रोटर की गति तुल्यकालिक गति के बहुत करीब होती है, और स्लिप (s) का मान बहुत कम होता है।
इस स्थिति में,
रोटर कॉपर हानियाँ (P_{rcu} = s \times P_{ag}) लगभग नगण्य होती हैं, इसलिए मापी गई इनपुट शक्ति मुख्य रूप से स्थिर हानियों (P_{scu} + P_{ci} + P_{fw}) के बराबर होती है।
यह परीक्षण मोटर के श्रेणी शाखा मापदंडों (series branch parameters) और पूर्ण-भार ताम्र हानियों (full-load copper losses) को निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
परीक्षण का उद्देश्य इस परीक्षण का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित मापदंडों को ज्ञात करना है:
पूर्ण-भार ताम्र हानियाँ (P_{sc}): यह परीक्षण मोटर के रोटर और स्टेटर में होने वाली कुल ताम्र हानियों को बताता है जब मोटर अपनी पूर्ण-भार धारा पर चल रही होती है।
समकक्ष परिपथ की श्रृंखला शाखा मापदंड: कुल रिसाव प्रतिरोध (R_{01}): स्टेटर और रोटर के समकक्ष प्रतिरोध का योग।
कुल रिसाव प्रतिघात (X_{01}): स्टेटर और रोटर के समकक्ष रिसाव प्रतिघात का योग।
शुरुआती टॉर्क (T_{st}): यह परीक्षण मोटर के शुरुआती टॉर्क का अनुमान लगाने में भी मदद करता है। परीक्षण विधि इस परीक्षण को करने के लिए, मोटर के रोटर को यांत्रिक रूप से अवरुद्ध (blocked) कर दिया जाता है ताकि वह घूम न सके। इस अवस्था में, रोटर की गति शून्य होती है, जिससे स्लिप (s) का मान 1 हो जाता है।
कम वोल्टेज का अनुप्रयोग: चूंकि रोटर अवरुद्ध होता है,
मोटर एक ट्रांसफार्मर के शॉर्ट-सर्किट की तरह व्यवहार करती है। यदि रेटेड वोल्टेज लगाया जाए, तो मोटर बहुत अधिक धारा (रेटेड धारा से 5 से 8 गुना) खींचेगी, जिससे मोटर को नुकसान हो सकता है।
इसलिए, स्टेटर वाइंडिंग पर एक कम, संतुलित तीन-फेज वोल्टेज लगाया जाता है।
रेटेड करंट का मापन: लगाए गए वोल्टेज को धीरे-धीरे तब तक बढ़ाया जाता है जब तक कि मोटर रेटेड करंट को नहीं खींचती। इस दौरान, एक वोल्टमीटर, एमीटर, और दो वाटमीटर का उपयोग करके वोल्टेज, करंट और इनपुट शक्ति को मापा जाता है।
हानियों की गणना: इस परीक्षण में, क्योंकि स्लिप 1 है, रोटर में प्रेरित आवृत्ति आपूर्ति आवृत्ति के बराबर होती है, और अधिकांश शक्ति रोटर और स्टेटर ताम्र हानियों के रूप में नष्ट हो जाती है। कोर हानियाँ (P_{ci}) नगण्य होती हैं क्योंकि वोल्टेज बहुत कम होता है।
इसलिए,
मापी गई शक्ति सीधे तौर पर कुल ताम्र हानियों के बराबर होती है।
यह परीक्षण मोटर की दक्षता,
गति नियमन, और टॉर्क-गति विशेषताओं का आकलन करने में मदद करता है।
परीक्षण का उद्देश्य लोड परीक्षण का उपयोग मोटर की निम्नलिखित विशेषताओं को ज्ञात करने के लिए किया जाता है:
दक्षता (Efficiency): मोटर की दक्षता, इनपुट विद्युत शक्ति और आउटपुट यांत्रिक शक्ति का अनुपात है।
{Efficiency} = {Output Power}}{Input Power} यह परीक्षण वास्तविक ऑपरेटिंग परिस्थितियों में दक्षता का मूल्यांकन करने का सबसे विश्वसनीय तरीका है।
गति नियमन (Speed Regulation): यह नो-लोड गति और पूर्ण-लोड गति के बीच का अंतर है, जिसे पूर्ण-लोड गति के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।
{Speed Regulation} = {No-load speed} - {Full-load speed}{Full-load speed}100 %
शक्ति गुणक (Power Factor):
यह इनपुट शक्ति और वोल्टेज-करंट उत्पाद का अनुपात है।
तापमान वृद्धि (Temperature Rise): यह दर्शाता है कि मोटर एक निश्चित लोड पर लगातार चलने के दौरान कितनी गर्म होती है। परीक्षण विधि लोड परीक्षण में, मोटर को उसके रेटेड वोल्टेज और आवृत्ति पर चलाया जाता है।
एक डायनेमोमीटर या ब्रेक ड्रम जैसे यांत्रिक भार को मोटर की शाफ्ट से जोड़ा जाता है।
भार का अनुप्रयोग: मोटर को चालू करने के बाद, उस पर धीरे-धीरे भार बढ़ाया जाता है।
मापन: प्रत्येक भार स्तर पर, निम्नलिखित मापदंडों को मापा जाता है:
इनपुट शक्ति (P_{in}): दो वाटमीटर का उपयोग करके मापा जाता है।
लाइन वोल्टेज (V_L) और लाइन करंट (I_L): वोल्टमीटर और एमीटर का उपयोग करके मापा जाता है।
गति (N): टैकोमीटर का उपयोग करके मापा जाता है।
टॉर्क (T): डायनेमोमीटर के साथ मापा जाता है।
गणना: इन मापों का उपयोग करके आउटपुट शक्ति, दक्षता, और अन्य मापदंडों की गणना की जाती है।
{Output Power} (P_{out}) = {2\pi NT}{60} (वाट में,
जहाँ N rpm में और T N-m में है) महत्व लोड परीक्षण मोटर के वास्तविक-विश्व प्रदर्शन को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
यह निर्माता को मोटर की रेटेड विशेषताओं को सत्यापित करने और यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि यह निर्दिष्ट शर्तों के तहत सुरक्षित रूप से और कुशलता से काम कर सकती है।
यह परीक्षण मोटर की दक्षता वक्र (efficiency curve) बनाने के लिए आवश्यक डेटा भी प्रदान करता है, जो विभिन्न लोड स्तरों पर इसकी दक्षता को दर्शाता है।
1. स्थिर हानियाँ (Constant Losses)
ये हानियाँ मोटर के भार (लोड) पर निर्भर नहीं करतीं और पूरे संचालन के दौरान लगभग स्थिर रहती हैं. इन्हें बिना-भार परीक्षण (No-Load Test) द्वारा निर्धारित किया जा सकता है.
स्थिर हानियों में दो प्रमुख प्रकार शामिल हैं:
लोहा हानियाँ या कोर हानियाँ (Iron or Core Losses):
ये हानियाँ मोटर के स्टेटर (स्थिर भाग) के कोर में होती हैं.
ये चुंबकीय क्षेत्र के कारण होती हैं और आपूर्ति आवृत्ति और फ्लक्स घनत्व पर निर्भर करती हैं.
इन्हें दो उप-भागों में बांटा जाता है: हिस्टेरेसिस हानि (Hysteresis Loss):
यह तब होती है जब मोटर के चुंबकीय कोर में बार-बार चुंबकत्व की दिशा बदलती है, जिससे ऊर्जा का क्षय होता है.
भंवर धारा हानि (Eddy Current Loss):
यह तब होती है जब बदलते चुंबकीय फ्लक्स से कोर में भंवर धाराएँ (Eddy Currents) उत्पन्न होती हैं,
जो ऊष्मा के रूप में ऊर्जा का क्षय करती हैं. इसे कोर को लैमिनेट (परतदार) करके कम किया जाता है.
यांत्रिक हानियाँ (Mechanical Losses): ये हानियाँ मोटर के घूमने वाले भागों में होती हैं. इनमें शामिल हैं:
घर्षण हानि (Friction Loss): यह मोटर के बियरिंग में घर्षण के कारण होती है.
वायु घर्षण हानि (Windage Loss): यह रोटर के घूमने से उत्पन्न हवा के घर्षण के कारण होती है.
2. परिवर्तनीय हानियाँ (Variable Losses)
ये हानियाँ मोटर के भार के साथ बदलती रहती हैं. जब मोटर पर भार बढ़ता है, तो मोटर अधिक धारा खींचती है, जिससे ये हानियाँ भी बढ़ जाती हैं. इन्हें अवरुद्ध रोटर परीक्षण (Blocked Rotor Test) द्वारा मापा जा सकता है.
इनमें दो मुख्य प्रकार शामिल हैं:
तांबा हानियाँ (Copper Losses): ये हानियाँ मोटर के स्टेटर और रोटर की वाइंडिंग में धारा प्रवाहित होने के कारण होती हैं. इन्हें {I^2R} हानियाँ भी कहा जाता है,
जहाँ I धारा और R वाइंडिंग का प्रतिरोध है.
स्टेटर तांबा हानि: यह स्टेटर वाइंडिंग में होती है.
रोटर तांबा हानि: यह रोटर वाइंडिंग में होती है.
आवारा भार हानियाँ (Stray Load Losses): ये हानियाँ मोटर के भार के साथ उत्पन्न होती हैं और इनकी गणना करना मुश्किल होता है. ये मुख्य रूप से रिसाव फ्लक्स (Leakage Flux) और हार्मोनिक घटकों (Harmonic Components) के कारण होती हैं.
ये सभी हानियाँ मोटर की दक्षता (efficiency) को प्रभावित करती हैं, क्योंकि वे उपयोगी आउटपुट शक्ति में से घटा दी जाती हैं.
दक्षता का सूत्र दक्षता को प्रतिशत (%) में दर्शाया जाता है और इसका सूत्र इस प्रकार है:
(%) = {आउटपुट शक्ति } (P_{out})}{इनपुट शक्ति } (P_{in})} times 100
जहाँ:
आउटपुट शक्ति (P_{out}): मोटर द्वारा प्रदान की गई यांत्रिक शक्ति है, जो मोटर के शाफ्ट पर उपलब्ध होती है.
इनपुट शक्ति (P_{in}): मोटर द्वारा खींची गई विद्युत शक्ति है. दूसरे शब्दों में, इनपुट शक्ति, आउटपुट शक्ति और सभी हानियों का योग होती है:
P_{in} = P_{out} + {हानियां} इसलिए,
दक्षता का सूत्र इस तरह भी लिखा जा सकता है:
(%) = {P_{in} - {हानियां}}{P_{in}}100 दक्षता को प्रभावित करने वाले कारक प्रेरण मोटर की दक्षता को कई कारक प्रभावित करते हैं:
हानियां (Losses): मोटर में होने वाली हानियां, जैसे कि तांबा हानियां, लोहा हानियां और यांत्रिक हानियां, सीधे तौर पर दक्षता को कम करती हैं. इन हानियों को कम करके दक्षता बढ़ाई जा सकती है.
भार (Load): मोटर की दक्षता भार के साथ बदलती रहती है. मोटर अपनी पूर्ण भार (full load) पर सबसे अधिक दक्षता प्राप्त करती है. कम भार पर दक्षता कम हो जाती है क्योंकि स्थिर हानियां (जैसे लोहा हानियां) समान रहती हैं, जबकि उपयोगी आउटपुट कम होता है.
मोटर का डिज़ाइन: अच्छी गुणवत्ता वाले कोर सामग्री, बेहतर वाइंडिंग और उचित वायु अंतराल (air gap) जैसी डिज़ाइन विशेषताएँ मोटर की दक्षता को बढ़ा सकती हैं.
वोल्टेज और आवृत्ति: मोटर को उसके रेटेड वोल्टेज और आवृत्ति पर चलाना सबसे अच्छा होता है. यदि वोल्टेज या आवृत्ति में बड़ा विचलन होता है, तो दक्षता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. आम तौर पर, एक अच्छी प्रेरण मोटर की दक्षता 85% से 95% तक हो सकती है.
विस्तृत विवरण प्रेरण मोटर में दक्षता को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है: = {आउटपुट शक्ति}}{इनपुट शक्ति}} = {P_{out}}{P_{in}} = {P_{in} - {हानियां}}{P_{in}}
जहाँ कुल हानियां (Total Losses) दो प्रकार की होती हैं:
स्थिर हानियाँ (P_{c}): ये भार पर निर्भर नहीं करती हैं,
जैसे कि कोर हानियां और यांत्रिक हानियां.
परिवर्तनीय हानियाँ (P_{v}): ये भार के साथ बदलती हैं,
जैसे कि तांबा हानियां.
इसलिए,
कुल हानियां = P_{c} + P_{v} दक्षता को अधिकतम करने के लिए, हमें कुल हानियों को न्यूनतम करना होता है.
गणितीय रूप से, यह स्थिति तब प्राप्त होती है जब परिवर्तनीय हानियों का मान स्थिर हानियों के बराबर हो जाता है.
शर्त: परिवर्तनीय हानियां = स्थिर हानियां P_v = P_c यानी,
रोटर और स्टेटर तांबा हानियां = कोर हानियां + यांत्रिक हानियां इस शर्त का पालन करके, मोटर अपने डिज़ाइन किए गए भार पर सबसे अधिक कुशलता से काम करती है.
जब एक मोटर को सीधे बिजली की आपूर्ति से जोड़ा जाता है, तो वह अपने शुरुआती क्षणों में बहुत अधिक धारा (current) खींचती है. यह धारा, जिसे इनरश करंट (inrush current) भी कहते हैं, सामान्य पूर्ण भार धारा (full load current) से 5 से 8 गुना अधिक हो सकती है. यह उच्च धारा कई समस्याएं पैदा कर सकती है:
स्टार्टर इस उच्च धारा को कम करके मोटर को सुचारू रूप से चालू होने में मदद करता है, जिससे मोटर और बिजली आपूर्ति प्रणाली दोनों सुरक्षित रहती हैं.
स्टार्टर सिर्फ धारा को कम नहीं करता, बल्कि यह मोटर को कई तरह की सुरक्षा भी प्रदान करता है:
1. डायरेक्ट-ऑन-लाइन (Direct-On-Line - DOL) स्टार्टर यह सबसे सरल और सबसे किफायती प्रकार का स्टार्टर है. इसमें मोटर को सीधे और पूर्ण वोल्टेज पर शुरू किया जाता है.
उपयोग: यह छोटे आकार की मोटरों (आमतौर पर 5HP या 7.5HP तक) के लिए उपयुक्त है.
फायदे: सरल संरचना, कम लागत और रखरखाव में आसान.
नुकसान: मोटर को शुरू करते समय बहुत अधिक धारा (full load current का 5 से 8 गुना) खींचता है, जिससे वोल्टेज में गिरावट हो सकती है.
2. स्टार-डेल्टा (Star-Delta)
स्टार्टर यह स्टार्टर मोटर को दो चरणों में शुरू करता है: पहले, मोटर को स्टार (star) कनेक्शन में जोड़ा जाता है, जिससे शुरुआती वोल्टेज 1/\sqrt{3} गुना कम हो जाता है और धारा भी घट जाती है. फिर, जब मोटर अपनी गति का लगभग 80% प्राप्त कर लेती है, तो इसे डेल्टा (delta) कनेक्शन में बदल दिया जाता है.
उपयोग: 5HP से 20HP तक की मध्यम से बड़ी मोटरों के लिए.
फायदे: शुरुआती धारा को DOL स्टार्टर की तुलना में काफी कम करता है.
नुकसान: यह थोड़ा जटिल है और DOL स्टार्टर से महंगा होता है.
3. ऑटो-ट्रांसफार्मर (Auto-Transformer)
स्टार्टर यह स्टार्टर वोल्टेज को कम करने के लिए एक ऑटो-ट्रांसफार्मर का उपयोग करता है. ट्रांसफार्मर में अलग-अलग टैपिंग (tappings) होती हैं, जिससे वोल्टेज को आवश्यकतानुसार कम किया जा सकता है.
उपयोग: बड़ी मोटरों (20HP से अधिक) के लिए, जहाँ शुरुआती धारा को और भी कम करने की आवश्यकता होती है.
फायदे: शुरुआती वोल्टेज को कई चरणों में नियंत्रित किया जा सकता है. यह सबसे कुशल स्टार्टर में से एक है.
नुकसान: यह अन्य स्टार्टर्स की तुलना में काफी महंगा और बड़ा होता है.
4. सॉफ्ट स्टार्टर (Soft Starter)
यह एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो थाइरिस्टर (thyristors) या सिलिकॉन नियंत्रित दिष्टकारी (SCRs) का उपयोग करके मोटर को धीरे-धीरे शुरू करता है. यह मोटर को बहुत सुचारू रूप से शुरू होने देता है, जिससे यांत्रिक तनाव और उच्च धारा दोनों कम हो जाते हैं.
उपयोग: ऐसी जगहों पर जहाँ यांत्रिक झटके या उच्च शुरुआती धारा को पूरी तरह से खत्म करना आवश्यक हो.
फायदे: सबसे सुचारू शुरुआत प्रदान करता है, यांत्रिक उपकरणों के जीवनकाल को बढ़ाता है और शुरुआती धारा को न्यूनतम रखता है.
नुकसान: यह सबसे महंगा स्टार्टर है.
5. वेरिएबल फ्रीक्वेंसी ड्राइव (Variable Frequency Drive - VFD)
VFD एक आधुनिक और बहुमुखी स्टार्टर है जो न केवल शुरुआती धारा को नियंत्रित करता है, बल्कि मोटर की गति को भी नियंत्रित कर सकता है. यह मोटर की गति और बलाघूर्ण को बदलकर उसके प्रदर्शन को पूरी तरह से नियंत्रित करता है.
उपयोग: उन अनुप्रयोगों के लिए जहाँ गति नियंत्रण की आवश्यकता होती है, जैसे कि पंखे, पंप और कन्वेयर बेल्ट.
फायदे: सबसे कुशल और सटीक नियंत्रण प्रदान करता है, ऊर्जा की बचत करता है और मोटर को सर्वोत्तम प्रदर्शन देता है.
नुकसान: यह सबसे महंगा और जटिल स्टार्टर है.
गिलहरी पिंजरे वाली प्रेरण मोटरों में प्रारंभिक अवस्था में रोटर का प्रतिरोध बहुत कम होता है, जिसके कारण वे अपनी सामान्य (rated) धारा से 5-8 गुना अधिक धारा खींचती हैं।
इस अत्यधिक धारा को नियंत्रित करने के लिए स्टार्टर की आवश्यकता होती है। DOL (Direct-On-Line) स्टार्टर का उपयोग DOL स्टार्टर सबसे सरल प्रकार का स्टार्टर है और इसका उपयोग छोटी गिलहरी पिंजरे वाली मोटरों के लिए किया जाता है।
छोटे आकार की मोटरों के लिए: यह 5 HP या 7.5 HP तक की छोटी मोटरों के लिए सबसे उपयुक्त है क्योंकि इन मोटरों की शुरुआती धारा इतनी अधिक नहीं होती कि बिजली की आपूर्ति प्रणाली को गंभीर नुकसान पहुँचाए।
सरल और सस्ता: इसकी संरचना बहुत सरल होती है, और यह अन्य स्टार्टर की तुलना में सस्ता होता है।
मुख्य कार्य: यह मोटर को सीधे पूर्ण वोल्टेज से जोड़ता है।
इसका मुख्य उद्देश्य ओवरलोड और अंडर-वोल्टेज जैसी स्थितियों से मोटर को सुरक्षा प्रदान करना है।
स्टार-डेल्टा (Star-Delta) स्टार्टर का उपयोग स्टार-डेल्टा स्टार्टर का उपयोग मध्यम से बड़ी गिलहरी पिंजरे वाली मोटरों के लिए किया जाता है।
उच्च प्रारंभिक धारा को कम करना: बड़ी मोटरों की शुरुआती धारा बहुत अधिक होती है, जिसे सीधे नियंत्रित करना मुश्किल होता है। स्टार-डेल्टा स्टार्टर मोटर को शुरू करने के लिए वोल्टेज को कम करके (स्टार कनेक्शन में) धारा को उसकी सामान्य शुरुआती धारा के केवल एक-तिहाई तक कम कर देता है।
दो-चरण की प्रक्रिया:
चरण 1 (स्टार): मोटर को पहले स्टार कनेक्शन में शुरू किया जाता है। इस अवस्था में, प्रति चरण वोल्टेज लाइन वोल्टेज का 1/\sqrt{3} गुना हो जाता है, जिससे शुरुआती धारा भी काफी कम हो जाती है।
चरण 2 (डेल्टा): जब मोटर अपनी गति का लगभग 80% प्राप्त कर लेती है, तो स्टार्टर स्वचालित रूप से इसे डेल्टा कनेक्शन में स्विच कर देता है, जहाँ यह सामान्य रूप से चलती है। यह विधि न केवल मोटर को उच्च धारा से बचाती है, बल्कि बिजली आपूर्ति प्रणाली को भी वोल्टेज में अचानक गिरावट से सुरक्षित रखती है।
जैसे कि वोल्टेज, आवृत्ति, या दोनों।
1. स्टेटर वोल्टेज नियंत्रण (Stator Voltage Control) इस विधि में, स्टेटर को दी जाने वाली वोल्टेज को बदलकर मोटर की गति को नियंत्रित किया जाता है।
जब स्टेटर वोल्टेज कम होता है, तो मोटर द्वारा उत्पन्न टॉर्क (बलाघूर्ण) भी कम हो जाता है, जिससे मोटर की गति कम हो जाती है। इसके विपरीत, वोल्टेज बढ़ाने पर गति बढ़ जाती है।
विधि: वोल्टेज को नियंत्रित करने के लिए अक्सर सिलिकॉन नियंत्रित दिष्टकारी (SCR) का उपयोग किया जाता है।
उपयोग: यह विधि मुख्य रूप से पंखों, पंपों और ब्लोअर जैसे अनुप्रयोगों में उपयोग की जाती है, जहां स्थिर टॉर्क की आवश्यकता नहीं होती है।
नुकसान: इस विधि का उपयोग करने पर मोटर की दक्षता कम हो जाती है और उच्च स्लिप पर टॉर्क भी कम हो जाता है।
2. स्टेटर आवृत्ति नियंत्रण (Stator Frequency Control)
यह गति नियंत्रण की सबसे प्रभावी और कुशल विधि है।
इस विधि में,
स्टेटर को दी जाने वाली आपूर्ति की आवृत्ति (frequency) को बदला जाता है। मोटर की तुल्यकालिक गति (synchronous speed) आवृत्ति के सीधे आनुपातिक होती है (N_s \propto f), इसलिए आवृत्ति को बदलकर गति को नियंत्रित किया जा सकता है।
विधि: आवृत्ति को बदलने के लिए एक परिवर्तनीय आवृत्ति ड्राइव (VFD) का उपयोग किया जाता है।
फायदे: यह विधि मोटर की दक्षता को उच्च स्तर पर बनाए रखती है और गति की एक विस्तृत श्रृंखला पर नियंत्रण प्रदान करती है।
उपयोग: यह उच्च प्रदर्शन वाले अनुप्रयोगों में उपयोग की जाती है, जैसे कि रोबोटिक्स और मशीन टूल्स।
3. वोल्टेज/आवृत्ति नियंत्रण (V/f Control)
यह स्टेटर साइड नियंत्रण की सबसे आम और कुशल विधि है। इसमें वोल्टेज और आवृत्ति दोनों को एक साथ इस तरह से बदला जाता है कि उनका अनुपात (V/f अनुपात) स्थिर बना रहे।
महत्व: V/f अनुपात को स्थिर रखने से मोटर के एयर गैप में चुंबकीय फ्लक्स (magnetic flux) भी स्थिर रहता है, जिससे मोटर का अधिकतम टॉर्क लगभग स्थिर बना रहता है।
लाभ: यह विधि गति की एक विस्तृत श्रृंखला पर मोटर को उसके रेटेड टॉर्क पर चलाने की अनुमति देती है, जबकि दक्षता भी उच्च बनी रहती है।
उपयोग: इसका उपयोग लगभग सभी आधुनिक औद्योगिक अनुप्रयोगों में किया जाता है, जहाँ मोटर की गति को कुशलता से नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है।
स्टेटर साइड नियंत्रण के विपरीत,
रोटर साइड नियंत्रण विधि भी होती है, जिसका उपयोग केवल स्लिप रिंग प्रेरण मोटरों में किया जाता है। हालाँकि, स्टेटर साइड नियंत्रण, विशेष रूप से V/f नियंत्रण, गिलहरी पिंजरे वाली मोटरों सहित सभी प्रकार की प्रेरण मोटरों में प्रभावी है।
कार्यप्रणाली अतिरिक्त प्रतिरोध जोड़ना: स्लिप-रिंग मोटर के रोटर वाइंडिंग के सिरे स्लिप रिंगों से जुड़े होते हैं, जो बाहरी प्रतिरोध को जोड़ने के लिए संपर्क प्रदान करते हैं।
टॉर्क और स्लिप संबंध: प्रेरण मोटर का टॉर्क रोटर प्रतिरोध के सीधे आनुपातिक होता है।
गति नियंत्रण: जब रोटर परिपथ में बाहरी प्रतिरोध जोड़ा जाता है, तो कुल रोटर प्रतिरोध बढ़ जाता है। बढ़े हुए प्रतिरोध के कारण, मोटर एक ही टॉर्क पर अधिक स्लिप पर चलती है। चूंकि स्लिप बढ़ने से मोटर की गति कम हो जाती है (N = N_s(1-s)), इसलिए मोटर की गति को नियंत्रित किया जा सकता है।
शुरुआती टॉर्क में वृद्धि: इस विधि का एक और फायदा यह है कि यह शुरुआती टॉर्क को भी बढ़ाती है। मोटर को शुरू करते समय, रोटर परिपथ में अधिकतम प्रतिरोध जोड़ा जाता है, जिससे उच्च शुरुआती टॉर्क प्राप्त होता है।
जैसे-जैसे मोटर गति पकड़ती है, प्रतिरोध को धीरे-धीरे कम किया जाता है।
फायदे और नुकसान फायदे: गति की एक विस्तृत श्रृंखला: यह विधि मोटर की गति को सिंक्रोनस गति के नीचे एक बड़ी रेंज में नियंत्रित करने की अनुमति देती है।
उच्च शुरुआती टॉर्क: बाहरी प्रतिरोध जोड़कर मोटर के शुरुआती टॉर्क को बढ़ाया जा सकता है, जो उच्च जड़त्व वाले भार (high-inertia loads) के लिए उपयोगी है।
नुकसान: कम दक्षता: बाहरी प्रतिरोध में ऊर्जा का क्षय ऊष्मा के रूप में होता है, जिससे मोटर की दक्षता काफी कम हो जाती है।
कम शक्ति गुणांक: यह विधि मोटर के शक्ति गुणांक (power factor) को भी कम कर देती है।
केवल स्लिप-रिंग मोटर के लिए: यह विधि गिलहरी पिंजरे वाली मोटरों में उपयोग नहीं की जा सकती क्योंकि उनके रोटर शॉर्ट-सर्किट होते हैं और बाहरी प्रतिरोध जोड़ने के लिए कोई संपर्क नहीं होता है।
इस विधि में,
मोटर को दी जाने वाली वोल्टेज (V) और आवृत्ति (f) दोनों को एक साथ इस तरह से बदला जाता है कि उनका अनुपात (V/f अनुपात) स्थिर बना रहे.
इसे अदिश नियंत्रण (Scalar control) के रूप में भी जाना जाता है. V/f नियंत्रण का सिद्धांत प्रेरण मोटर का टॉर्क (बल आघूर्ण) मोटर के अंदर उत्पन्न होने वाले चुंबकीय फ्लक्स के समानुपाती होता है.
चुंबकीय फ्लक्स आपूर्ति वोल्टेज और आवृत्ति के अनुपात (Φ \propto V/f) पर निर्भर करता है. जब आप मोटर की गति को कम करने के लिए केवल आवृत्ति (f) को कम करते हैं, तो V/f अनुपात बढ़ जाता है.
इससे फ्लक्स अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे मोटर की वाइंडिंग संतृप्त (saturated) हो सकती है और बहुत अधिक धारा खींच सकती है. जब आप मोटर की गति को बढ़ाने के लिए केवल आवृत्ति (f) को बढ़ाते हैं, तो V/f अनुपात कम हो जाता है.
इससे फ्लक्स कम हो जाता है, जिससे मोटर का टॉर्क भी कम हो जाता है. V/f नियंत्रण विधि में, इस समस्या से बचने के लिए, आवृत्ति के साथ-साथ वोल्टेज को भी उसी अनुपात में कम या ज्यादा किया जाता है,
ताकि V/f अनुपात स्थिर रहे. इससे फ्लक्स भी स्थिर बना रहता है, और मोटर अपनी पूरी टॉर्क क्षमता के साथ काम करती है, भले ही उसकी गति बदल रही हो. उपयोग यह नियंत्रण विधि एक परिवर्तनीय आवृत्ति ड्राइव (VFD) द्वारा लागू की जाती है.
VFD मोटर को नियंत्रित करने के लिए बिजली की आपूर्ति को समायोजित करता है, जिससे मोटर को उसकी बेस गति (rated speed) से नीचे और ऊपर दोनों तरह से चलाया जा सकता है.
यह पंखों, पंपों और कन्वेयर बेल्ट जैसे अनुप्रयोगों के लिए आदर्श है जहाँ व्यापक गति नियंत्रण की आवश्यकता होती है.
सामान्य परिचालन: मोटर सामान्य रूप से दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में घूम रही होती है.
फेज़ बदलना: मोटर को रोकने के लिए, आपूर्ति से जुड़े तीन फेज़ (R, Y, B) में से किसी भी दो फेज़ (उदाहरण के लिए, Y और B) को आपस में बदल दिया जाता है.
रोटर का विपरीत दिशा में घूमना: फेज़ बदलने से स्टेटर में चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) की घूमने की दिशा तुरंत विपरीत (वामावर्त) हो जाती है.
स्लिप का बढ़ना: इस समय, मोटर की गति (N) अभी भी अपनी मूल दिशा में है, लेकिन चुंबकीय क्षेत्र की गति (N_s) विपरीत दिशा में है. इससे स्लिप का मान बढ़कर (1-s) के बजाय (1+s) हो जाता है. स्लिप का मान 2 के करीब पहुंच जाता है,
जिससे रोटर में बहुत अधिक धारा प्रेरित होती है और एक बड़ा टॉर्क उत्पन्न होता है.
मोटर का रुकना: यह बड़ा और विपरीत दिशा में लगने वाला टॉर्क मोटर को तेज़ी से रोकता है.
मुख्य स्विच खोलना: जब मोटर रुक जाती है, तो उसे विपरीत दिशा में घूमने से रोकने के लिए तुरंत मुख्य आपूर्ति को काट दिया जाता है. यदि ऐसा नहीं किया गया, तो मोटर विपरीत दिशा में घूमना शुरू कर देगी.
फायदे और नुकसान फायदे: तेज़ ब्रेकिंग: यह सबसे तेज़ ब्रेकिंग विधियों में से एक है, क्योंकि यह एक बड़े और विपरीत टॉर्क का उपयोग करती है.
सरल विधि: यह विधि लागू करने में अपेक्षाकृत सरल है.
नुकसान: अत्यधिक ऊष्मा: प्लगिंग के दौरान, मोटर में बहुत अधिक धारा बहती है, जिससे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है. यह मोटर को नुकसान पहुंचा सकती है.
यांत्रिक तनाव: अचानक विपरीत दिशा में लगने वाला टॉर्क मोटर और उससे जुड़े उपकरणों पर भारी यांत्रिक तनाव डालता है.
ऊर्जा का अपव्यय: यह एक ऊर्जा-अकुशल विधि है क्योंकि मोटर की गतिज ऊर्जा (kinetic energy) ऊष्मा के रूप में व्यर्थ हो जाती है. इन कमियों के कारण, प्लगिंग का उपयोग केवल उन अनुप्रयोगों में किया जाता है
जहाँ मोटर को तेज़ी से रोकना आवश्यक होता है, भले ही इसके परिणामस्वरूप उच्च ऊर्जा अपव्यय या यांत्रिक तनाव हो.
फायदे:
नुकसान:
गतिशील ब्रेकिंग का उपयोग उन अनुप्रयोगों में किया जाता है जहाँ मोटर को तेज़ी से, लेकिन नियंत्रित तरीके से रोकना होता है, जैसे कि क्रेन और लिफ्ट.
यह सबसे कुशल ब्रेकिंग विधियों में से एक है क्योंकि इसमें ऊर्जा का संरक्षण होता है। पुनर्योजी ब्रेक लगाना कैसे काम करता है यह विधि तब काम करती है जब मोटर की गति उसकी तुल्यकालिक गति (synchronous speed, N_s) से अधिक हो जाती है।
ऐसा दो स्थितियों में हो सकता है: भार की वजह से गति बढ़ना: जब कोई भार, जैसे कि एक क्रेन, नीचे की ओर जा रहा हो और उसकी गुरुत्वाकर्षण बल के कारण मोटर की गति तुल्यकालिक गति से अधिक हो जाए।
आपूर्ति आवृत्ति को कम करना: जब एक परिवर्तनीय आवृत्ति ड्राइव (VFD) का उपयोग करके मोटर को चलाया जा रहा हो और VFD की आवृत्ति को अचानक कम कर दिया जाए। इससे मोटर की तुल्यकालिक गति कम हो जाती है, जबकि मोटर की वास्तविक गति अभी भी अधिक होती है।
इन दोनों स्थितियों में, मोटर का रोटर चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में तेज़ी से घूमता है।
जब ऐसा होता है, तो स्लिप (slip) का मान ऋणात्मक हो जाता है:
s = {N_s - N}{N_s} चूंकि रोटर की गति (N) तुल्यकालिक गति (N_s) से अधिक है, इसलिए (N_s - N) ऋणात्मक हो जाता है, जिससे स्लिप भी ऋणात्मक हो जाती है।
ऋणात्मक स्लिप होने पर,
मोटर की क्रियाविधि उलट जाती है और वह एक जनरेटर की तरह काम करना शुरू कर देती है। यह यांत्रिक ऊर्जा (रोटर की गतिज ऊर्जा) को विद्युत ऊर्जा में बदलती है और इस ऊर्जा को वापस आपूर्ति स्रोत में भेज देती है। यह प्रक्रिया मोटर पर एक ब्रेकिंग टॉर्क लगाती है, जिससे उसकी गति कम हो जाती है।
फायदे और नुकसान फायदे: उच्च दक्षता: यह सबसे अधिक ऊर्जा-कुशल ब्रेकिंग विधि है क्योंकि यह ऊर्जा को नष्ट करने के बजाय उसका पुनर्चक्रण करती है।
सुचारु ब्रेकिंग: ब्रेकिंग टॉर्क काफी नियंत्रित और सुचारु होता है, जिससे मोटर और यांत्रिक प्रणाली पर तनाव कम होता है।
सुरक्षित: यह विधि मोटर को बिना अधिक गर्म किए रोक सकती है, क्योंकि ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट नहीं होती।
नुकसान: केवल विशिष्ट अनुप्रयोगों के लिए: यह विधि केवल तभी प्रभावी होती है जब मोटर की गति तुल्यकालिक गति से अधिक हो। यह उन अनुप्रयोगों में उपयोग नहीं की जा सकती जहां मोटर को उसकी सामान्य गति पर अचानक रोकना हो।
महंगा: इसका उपयोग करने के लिए अक्सर VFD जैसे महंगे और जटिल उपकरणों की आवश्यकता होती है।
इस कारण,
पुनर्योजी ब्रेकिंग का उपयोग मुख्य रूप से उन प्रणालियों में होता है जहाँ मोटर की गति को बार-बार नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है, जैसे कि इलेक्ट्रिक वाहन, लिफ्ट और रोलिंग मिल्स।
विशेष प्रभाव मोटर के सामान्य संचालन के दौरान उत्पन्न होने वाली कुछ अनूठी घटनाएं हैं जो मोटर के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं.
दोष वे असामान्यताएं हैं जो मोटर के संचालन में बाधा डालती हैं और अक्सर क्षति का कारण बन सकती हैं.
इन सभी विशेष प्रभावों और दोषों को मोटर की नियमित जांच और सही सुरक्षा उपकरणों, जैसे ओवरलोड रिले, के उपयोग से कम किया जा सकता है.
कॉगिंग, जिसे चुंबकीय लॉक-इन (magnetic lock-in) भी कहते हैं, एक ऐसा दोष है जिसमें प्रेरण मोटर शुरू ही नहीं हो पाती है, या बहुत धीमी गति से चलती है। यह तब होता है जब मोटर के स्टेटर और रोटर के खांचों (slots) की संख्या समान हो या एक दूसरे के पूर्णांक गुणज (integral multiples) में हो।
क्रॉलिंग वह दोष है जिसमें प्रेरण मोटर अपनी सामान्य गति तक नहीं पहुँच पाती, बल्कि अपनी तुल्यकालिक गति (synchronous speed) के 1/7वें भाग जितनी धीमी गति पर चलने लगती है।
संक्षेप में,
कॉगिंग मोटर को शुरू होने से रोकती है, जबकि क्रॉलिंग मोटर को कम गति पर चलने के लिए मजबूर करती है।
एकल-फेजिंग से मोटर की सुरक्षा के लिए, ओवरलोड रिले और फेज-विफलता रिले (phase-failure relay) जैसे सुरक्षा उपकरणों का उपयोग किया जाता है। ये उपकरण मोटर में असंतुलित धारा का पता लगाते हैं और उसे नुकसान से बचाने के लिए बिजली की आपूर्ति काट देते हैं।
संक्षेप में, यदि एक चरण खो जाता है, तो मोटर जल सकती है, इसलिए ऐसे दोषों से तुरंत मोटर को बचाना महत्वपूर्ण है।
यह समीकरण मोटर के प्रदर्शन, जैसे कि गति और भार के साथ उसके व्यवहार को समझने के लिए महत्वपूर्ण है.
टॉर्क समीकरण प्रेरण मोटर का टॉर्क समीकरण निम्नलिखित है:
T = {3}{omega_s} {s E_2^2 R_2}{R_2^2 + (sX_2)^2}
यहाँ:
T = मोटर द्वारा उत्पन्न टॉर्क
omega_s = तुल्यकालिक कोणीय गति (Synchronous angular speed)
(रेडियन/सेकंड) = 2\pi N_s / 60
s = स्लिप (slip)
E_2 = रोटर में प्रति-फेज प्रेरित विद्युत वाहक बल (EMF) जब रोटर स्थिर हो
R_2 = रोटर का प्रति-फेज प्रतिरोध
X_2 = रोटर का प्रति-फेज प्रतिघात (reactance) जब रोटर स्थिर हो यह समीकरण दर्शाता है कि टॉर्क कई कारकों पर निर्भर करता है,
जिनमें स्लिप, रोटर का प्रतिरोध और प्रतिघात, और रोटर में प्रेरित वोल्टेज शामिल हैं.
समीकरण की व्याख्या यह समीकरण बताता है कि टॉर्क और स्लिप का संबंध रैखिक (linear) नहीं है, बल्कि एक वक्र (curve) के रूप में होता है.
कम स्लिप पर (गति तुल्यकालिक गति के करीब): जब मोटर सामान्य रूप से चलती है, तो स्लिप का मान बहुत कम होता है (s \approx 0). इस स्थिति में, R_2^2 का मान (sX_2)^2 की तुलना में बहुत बड़ा होता है.
इसलिए, समीकरण सरल होकर लगभग यह बन जाता है: T {s}{R_2^2} इसका अर्थ है कि कम स्लिप पर, टॉर्क स्लिप के सीधे आनुपातिक होता है.
अधिक स्लिप पर (शुरुआती समय पर): जब मोटर शुरू होती है, तो स्लिप का मान 1 के बराबर होता है (s=1).
इस स्थिति में,
टॉर्क मुख्य रूप से रोटर प्रतिघात पर निर्भर करता है. यदि रोटर का प्रतिरोध कम है, तो शुरुआती टॉर्क भी कम होता है.
यह समीकरण मोटर के प्रदर्शन के ग्राफ को समझने में मदद करता है, जिसे टॉर्क-स्लिप विशेषता वक्र (Torque-Slip Characteristics Curve) कहा जाता है. यह वक्र दर्शाता है कि मोटर की गति बदलने पर उसका टॉर्क कैसे बदलता है.
यह एक महत्वपूर्ण विशेषता है जो मोटर की अधिभार (overload) क्षमता को निर्धारित करती है.
अधिकतम टॉर्क के लिए शर्त को टॉर्क समीकरण को अवकलित करके प्राप्त किया जाता है:
टॉर्क समीकरण: T = {3}{omega_s}{s E_2^2 R_2}{R_2^2 + (sX_2)^2} टॉर्क को अधिकतम करने के लिए,
हमें टॉर्क समीकरण को स्लिप (s) के संबंध में अवकलित करके शून्य के बराबर करना होगा:
{dT}{ds} = 0 इस गणितीय प्रक्रिया के बाद,
हमें अधिकतम टॉर्क के लिए स्लिप (s_{mt}) का मान मिलता है:
s_{mt} = {R_2}{X_2} यह समीकरण दर्शाता है कि अधिकतम टॉर्क किस स्लिप पर होता है.
अब, यदि हम इस शर्त को टॉर्क समीकरण में वापस रखते हैं, तो हमें पता चलता है कि अधिकतम टॉर्क उस बिंदु पर होता है
जहाँ: R_2 = sX_2 यानी, जब रोटर प्रतिरोध, स्लिप पर रोटर प्रतिघात के बराबर हो जाता है, तो मोटर अधिकतम टॉर्क उत्पन्न करती है.
यह शर्त मोटर के शुरुआती टॉर्क (starting torque) को भी प्रभावित करती है. यदि R_2 का मान बढ़ाया जाए, तो अधिकतम टॉर्क की स्लिप भी बढ़ जाती है, जिससे मोटर का शुरुआती टॉर्क भी बढ़ जाता है.
यह समीकरण टॉर्क-स्लिप वक्र पर अधिकतम बिंदु को दर्शाता है.
इस वक्र में,
अधिकतम टॉर्क एक विशिष्ट स्लिप पर होता है, जिसे अक्सर s_{mt} से दर्शाया जाता है.
1. गति पर प्रभाव प्रेरण मोटर की तुल्यकालिक गति (N_s) सीधे आपूर्ति आवृत्ति के आनुपातिक होती है:
{N_s} = {120f}{P}
जहाँ:
N_s = तुल्यकालिक गति (rpm)
f = आपूर्ति आवृत्ति (Hz)
P = मोटर में पोल की संख्या जब आपूर्ति आवृत्ति बढ़ती है, तो मोटर की तुल्यकालिक गति और वास्तविक गति दोनों बढ़ती हैं.
इसके विपरीत, आवृत्ति कम होने पर गति कम हो जाती है.
2. टॉर्क पर प्रभाव आपूर्ति आवृत्ति में बदलाव मोटर द्वारा उत्पन्न टॉर्क को भी प्रभावित करता है, विशेष रूप से जब वोल्टेज को स्थिर रखा जाता है.
आवृत्ति कम होने पर: यदि वोल्टेज स्थिर रहता है और आवृत्ति कम होती है, तो V/f अनुपात बढ़ता है.
इससे चुंबकीय फ्लक्स (\phi) बढ़ जाता है, जिससे मोटर का कोर (core) संतृप्त (saturated) हो सकता है.
इस स्थिति में, मोटर अत्यधिक धारा खींचती है, जिससे कोर में हानियाँ और वाइंडिंग में गर्मी बढ़ती है.
आवृत्ति अधिक होने पर: यदि वोल्टेज स्थिर रहता है और आवृत्ति बढ़ती है, तो V/f अनुपात कम होता है.
इससे चुंबकीय फ्लक्स कम हो जाता है और मोटर का अधिकतम टॉर्क भी कम हो जाता है.
3. प्रतिघात पर प्रभाव मोटर का प्रतिघात (reactance) आवृत्ति के सीधे आनुपातिक होता है:
प्रेरकीय प्रतिघात (X_L): X_L = 2\pi fL धारितीय प्रतिघात (X_C): X_C = 1/(2\pi fC) आवृत्ति बढ़ने से प्रेरक प्रतिघात बढ़ जाता है, जबकि धारितीय प्रतिघात कम हो जाता है.
प्रेरण मोटर में मुख्य रूप से प्रेरक प्रतिघात होता है.
इसलिए, आवृत्ति बढ़ने पर प्रतिबाधा (impedance) बढ़ जाती है, जिससे धारा कम हो सकती है.
4. हानियों और दक्षता पर प्रभाव लोहा हानियाँ (Iron losses): ये हानियाँ आवृत्ति पर निर्भर करती हैं.
हिस्टेरेसिस हानि: ये आवृत्ति के आनुपातिक होती हैं.
भंवर धारा हानि: ये आवृत्ति के वर्ग के आनुपातिक होती हैं.
दक्षता: जब आवृत्ति बदलती है, तो मोटर की दक्षता भी बदल जाती है क्योंकि हानियाँ बदलती हैं.
यदि आवृत्ति को बिना वोल्टेज के अनुपात में बदले कम किया जाता है, तो कोर संतृप्ति और बढ़ी हुई हानि के कारण दक्षता कम हो जाती है.
आधुनिक गति नियंत्रण प्रणालियों (जैसे VFDs) में,
मोटर की गति को नियंत्रित करने के लिए वोल्टेज और आवृत्ति दोनों को एक साथ बदला जाता है, ताकि V/f अनुपात स्थिर बना रहे.
ऐसा करने से मोटर का फ्लक्स और टॉर्क स्थिर रहते हैं, जिससे मोटर अपनी पूरी दक्षता पर काम करती है.
प्रेरणिक स्वभाव (inductive nature) और
भार (load).
प्रेरण मोटर एक बड़ा प्रेरक भार (inductive load) है. इसका स्टेटर वाइंडिंग एक प्रेरक की तरह काम करता है, जिसे चुंबकीय क्षेत्र बनाने के लिए चुंबकन धारा (magnetizing current) की आवश्यकता होती है. यह चुंबकन धारा, जो यांत्रिक कार्य नहीं करती, वोल्टेज से लगभग 90 डिग्री पीछे रहती है और प्रतिक्रियाशील शक्ति (reactive power) की खपत करती है.
मोटर का शक्ति गुणक उसके भार के साथ बदलता है:
निष्कर्ष रूप में,
प्रेरण मोटर का शक्ति गुणक स्वाभाविक रूप से कम और पश्चगामी होता है, खासकर जब वह कम भार पर चल रही हो.
एकल-फेज़ प्रेरण मोटर का उपयोग अक्सर इन उपकरणों में किया जाता है:
तीन-फेज़ प्रेरण मोटर अपनी उच्च दक्षता और विश्वसनीयता के कारण सबसे अधिक उपयोग की जाती हैं। इनके कुछ प्रमुख अनुप्रयोग इस प्रकार हैं:
इसकी मुख्य विशेषताएँ जो इसे यह उपाधि दिलाती हैं, वे निम्नलिखित हैं:
इन सभी विशेषताओं के कारण,
प्रेरण मोटर उद्योगों में सबसे विश्वसनीय और कार्य-कुशल मशीन बनी हुई है, जो बिना थके लगातार काम करती रहती है।
प्रेरण मोटर के समतुल्य परिपथ में निम्नलिखित अवयव शामिल होते हैं:
यह परिपथ मोटर के प्रदर्शन (performance) का विश्लेषण करने में मदद करता है। इसका उपयोग करके हम मोटर की दक्षता (efficiency), शक्ति गुणांक (power factor), टॉर्क (torque), और गति (speed) जैसी विशेषताओं की गणना कर सकते हैं।
इसे I²R हानि भी कहते हैं क्योंकि यह वाइंडिंग के प्रतिरोध (R) और उसमें से प्रवाहित होने वाली धारा (I) के वर्ग के गुणनफल के बराबर होती है।
मुख्य बिंदु (Key Points) यह हानि परिवर्तनशील (variable) होती है, यानी यह मोटर पर लगे भार (load) के साथ बदलती रहती है। जब मोटर पर भार बढ़ता है, तो रोटर में धारा भी बढ़ती है, जिससे रोटर कॉपर हानि भी बढ़ जाती है। सामान्य ऑपरेशन में, रोटर कॉपर हानि, स्लिप (s) और रोटर इनपुट पावर (P₂) के गुणनफल के बराबर होती है।
रोटर कॉपर हानि का सूत्र (Formula for Rotor Copper Loss)
रोटर कॉपर हानि की गणना करने के लिए दो मुख्य सूत्र हैं:
रोटर प्रतिरोध और धारा का उपयोग करके:
P_{cu,r} = 3I_2^2R_2
जहाँ:
P\_{cu,r} = रोटर कॉपर हानि
I\_2 = प्रति चरण रोटर धारा
R\_2 = प्रति चरण रोटर प्रतिरोध
3 = 3-फेज मोटर के लिए स्लिप और
रोटर इनपुट पावर का उपयोग करके:
P_{cu,r} = s \times P_2
जहाँ: s = स्लिप (slip)
P\_2 = रोटर को दी गई शक्ति (air-gap power)
यह रोटर को घुमाने के लिए उपलब्ध कुल शक्ति है।
विकसित यांत्रिक शक्ति का स्थान प्रेरण मोटर में शक्ति प्रवाह (power flow) को तीन मुख्य चरणों में समझा जा सकता है:
रोटर इनपुट पावर (P₂ या P_gap): यह वह विद्युत शक्ति है जो स्टेटर से वायु अंतराल के माध्यम से रोटर में स्थानांतरित होती है।
विकसित यांत्रिक शक्ति (P_dev या P_md): यह वह शक्ति है जो रोटर इनपुट पावर से रोटर कॉपर हानि (rotor copper loss) को घटाने के बाद बचती है। यह मोटर के शाफ्ट पर यांत्रिक ऊर्जा के रूप में विकसित होती है।
शाफ्ट आउटपुट पावर (P_out): यह वह अंतिम शक्ति है जो शाफ्ट पर उपलब्ध होती है और भार को चलाने के लिए उपयोग की जाती है। यह विकसित यांत्रिक शक्ति से घर्षण और वायु प्रवाह हानि (friction and windage losses) को घटाने के बाद प्राप्त होती है।
सूत्र (Formula) विकसित यांत्रिक शक्ति की गणना निम्नलिखित सूत्र से की जा सकती है:
P_{dev} = P_2 - P_{cu,r}
जहाँ:
P_{dev} = विकसित यांत्रिक शक्ति
P_2 = रोटर इनपुट पावर (वायु अंतराल शक्ति)
P_{cu,r} = रोटर कॉपर हानि चूंकि रोटर कॉपर हानि
P_{cu,r} = s \times P_2 होती है (जैसा कि पिछली चर्चा में बताया गया है),
तो हम इस सूत्र को इस प्रकार भी लिख सकते हैं:
P_{dev} = P_2 - s \times P_2 या
P_{dev} = P_2 (1-s)
यह स्थिति तब आती है जब रोटर का प्रतिरोध (R2) और स्लिप (s) पर रोटर का प्रतिघात (sX2) बराबर होते हैं। R_2 = sX_2 इससे हम उस विशेष स्लिप (s_{max-power}) की गणना कर सकते हैं
जिस पर अधिकतम शक्ति विकसित होती है:
s_{max-power} = {R_2}{X_2}
यह स्थिति अधिकतम टॉर्क (maximum torque) की स्थिति से अलग है, क्योंकि अधिकतम टॉर्क की स्थिति में रोटर का प्रतिरोध स्टेटर और रोटर के कुल लीकेज प्रतिघात (leakage reactance) के बराबर होता है।
फिसलन का महत्व
मोटर पर भार बढ़ने के साथ-साथ उसकी गति थोड़ी कम हो जाती है और फिसलन का मान बढ़ जाता है। पूर्ण भार की स्थिति में, फिसलन का मान आमतौर पर 2% से 6% तक होता है, जो मोटर के आकार पर निर्भर करता है:
यह मान बताता है कि पूर्ण भार पर भी मोटर की गति तुल्यकालिक गति के बहुत करीब होती है, जिससे मोटर दक्षता (efficiency) के साथ काम करती है।
संक्षेप में,
प्रेरण मोटर का संचालन इस बात पर निर्भर करता है कि रोटर हमेशा तुल्यकालिक गति से थोड़ा पीछे रहे ताकि लगातार टॉर्क उत्पन्न हो सके।
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